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शासन द्वारा एक गांव को समाप्त करने की कहानी

चूरू शहर की बसावट व जल निकासी के लिये बार बार योजनाएं बनी पर कुछ ज्यादा सफलता नहीं मिल पाई।
यहॉं जिस के जैसे जी में आया अपना घर बना लिया किसी तरह की प्लानिंग नहीं है।
पुराने शहर की गलियां संकड़ी व उबड़-खाबड़ होने के साथ -साथ बहुत ही घुमावदार मोड़ लिये हुये हैं।
300 साल से अधिक समय से बसा यह शहर प्लानिंग के अभाव में हर सुविधा संसाधन से उपेक्षित रहा।
पुराना शहर हाविलियों से अटा पड़ा है जिन में से 90℅ खाली हैं। जिनका कोई उपयोग नहीं हो पा रहा है।


नया शहर
 भूमाफियाओं की बुरी नज़र की भेंट चढ़ गया। कुछ सरकार द्वारा काटी गई कॉलोनी भी हैं जिन का सही सलामत होना बानगी की बात है। लगभग रास्तों को रोक लिया गया है चाहे अवैध निर्माण हो या पेड़ पौधों के नाम पर अतिक्रमण।
अतिक्रमण इस शहर की बड़ी समस्या रही है जिस के बारे में फिर कभी चर्चा होगी।

फिलहाल 2 लाख की आबादी के इस शहर में ड्रेनेज सिस्टम पर चर्चा की जाये।

आज से लगभग 30 साल पहले चूरू इतना बड़ा नहीं था ना ही इतना फैला हुआ।
शहर बढ़ा लोग अलग अलग गांवों से आकर बसने लगे जिस से कई निकटतम गांव इस शहर में समा गये जिन में से खाँसोली, डाबला व गाजसर महत्वपूर्ण हैं। कुछ गांवों का आतित्व 10 साल बाद समाप्त हो जायेगा जिन में रामसरा,देपालसर,घँटेल,सहजूसर श्यामपुरा व  लालसिंहपुरा आदि हैं। 

इतना बड़ा शहर होने पर ड्रेनेज व सीवरेज की समस्या का आन खड़ा होना स्वाभाविक है जिस का समाधान मात्र और मात्र दृढ़ इच्छाशक्ति वाले प्रशासन राजनेताओं व सभ्य जनता ही कर सकती है।
चूरू शहर में चूरू चौपाटी बनाने के नाम पर एक गाँव के अस्तित्व को कैसे समाप्त किया गया यह बहुत बड़ी कहानी अथवा शोध का विषय बन सकता है।
      आबादी विस्तार के कारण सीवरेज-ड्रेनेज वेस्टेज की विकराल व भयावह समस्या को निस्तारित किया जाना एक बड़ी समस्या है जिस के लिये गहन मनन व ईमानदारी से किये गये प्रयास अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। 1998 के आसपास केंद्र सरकार ने चूरू शहर के ड्रेनेज सीवरेज व वेस्टेज सिस्टम को डेवेलोप करने के लिये प्लान तैयार करवाया था जिसे तत्कालीन भैरोसिंह शेखवात सरकार द्वारा नगरपरिषद चूरू को बैंक गारंटी ना देने (तत्कालीन विधायक राजेन्द्र राठौड़ के कारण) प्लान ड्राप हो गया।
सन 2009 में चूरू के विधायक बने हाजी मकबूल मंडेलिया ने प्लान बनवाया व गाजसर गांव के पास स्थित बीहड़ भूमि पर यह प्लांट स्थापित करने का निर्णय लिया गया। तत्कालीन विधायक हाजी साहब की नीयत का तो कहा नही जा सकता पर नगरपालिका/नगरपरिषद की नीयत में खोट था यह इस प्लांट की स्थिति को देख कर स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है जिस के लिये तत्कालीन चैयरमेन गोविंद महनारिया के बाद विजय कुमार शर्मा की भूमिका पर संदेह किया जा सकता है।
इस गिनानी को गाजसर गांव से 1 से 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थापित किया गया है जिस ने पहले भी राजकीय माध्यमिक विद्यालय गाजसर को लील लिया था व कई घर डूब गये थे।
आज से 3-4 दिन पहले टूटी गिनानी की दीवार ने पूरे गांव को सकते में डाल दिया व संभव है लगभग लोग गांव छोड़ने को मजबूर हो जायें।
गिनानी की दीवारों का निर्माण घटिया सामग्री से हुआ जिस के लिये वर्तमान/निवर्तमान चैयरमेन, विधायक,अभियंता व प्रशासक के पश्चात ही ठेकेदार जिम्मेदार है।
इन सभी पर हत्या अथवा हत्या का प्रयास अथवा एक गांव की मृत्यु का प्रकरण चलाया जाना चाहिये।


चूरू: शहर में वर्षों से बरकरार है पानी निकासी की समस्या, आम लोग परेशान

चूरू: शहर में वर्षों से बरकरार है पानी निकासी की समस्या, आम लोग परेशान
आरयूआईडीपी के गाजसर गांव के पास बनाए गए स्टोरेज पर कार्यरत कर्मचारियों का कहना है कि इन दोनों स्टोरेज की कैपेसिटी  7 एमएलडी है।
 राजस्थान के कटोरानुमा बनावट वाले चूरू शहर में पानी निकासी की समस्या वर्षों से बनी हुई है. इस दौरान नगर परिषद ने कई बार करोड़ों रुपए की योजना बनाकर पानी निकासी के लिए बड़े नाले भी बनाए. लेकिन समस्या जस की तस बनी हुई है. जिस कारण आम लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.

आपको बता दें कि 2013 में कांग्रेस की पिछली सरकार ने चूरू में 1817 लाख की ड्रेनेज व सीवरेज की योजना बनाई थी. इस योजना के तहत शहर के मध्य जोहरी सागर के पास एक पंप हाउस बनाया गया और गाजसर गांव के पास वन विभाग की भूमि पर गंदे पानी के दो स्टोरेज बनाए गए. इन स्टोरेज की क्षमता कुल 7 एमएलडी की रखी गई।

योजना हो गई धराशाई
लेकिन ड्रेनेज सीवरेज के करोड़ों रुपए की योजना भी धराशाई हो चुकी है. इस दौरान कई जगह लाइन चोक हो चुका है. जिस कारण कई लोगों के घरों में शौचालय में पानी वापस आने लगता है. वहीं, बरसात के दिनों में शहर के पानी की निकासी नहीं होने से शहर के बड़े हिस्से में 3 से 4 फीट पानी भरा रह रहा है।
आरयूआईडीपी के स्टोरेज फेल
आरयूआईडीपी के गाजसर गांव के पास बनाए गए स्टोरेज पर कार्यरत कर्मचारियों का कहना है कि इन दोनों स्टोरेज की कैपेसिटी 7 एमएलडी है. जबकि शहर से आने वाला पानी 11 एमएलडी का है. जिस कारण इन दोनों स्टोरेज में पानी ओवरफ्लो हो जाता है. इस मामले में स्थानीय लोग इस तरह की लापरवाही का कारण राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को बताते हैं।


शेष चूरू की निरीह जनता पर निर्भर।

शमशेरभालु खान

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