उर्दू/हिंदी गज़ल संग्रह - नश्तर
नश्तर
शायर का ताअरूफ -
नाम - शमशेर खान
उपनाम - प्रेम, शमशेर गांधी
तखल्लुस - पहले परवाना नाम से लिखना शुरू किया। पत्नी अख्तर बानो (सदफ) के सुझाव पर जिगर चूरूवी नाम से लिखना शुरू किया।
पैदाइश - 18.04.1978 सहजूसर, चूरू (राजस्थान)
पिता का नाम - श्री भालू खां (पूर्व विधायक (1980 से 1985), चूरू।
माता का नाम - सलामन बानो (गृहणी)
ताअलिम -
1. रामावि सहजूसर में पहली कक्षा में दाखिला 10.07.1984 से 1993 में मेट्रिक तक।
2. राउमावि बागला, चूरू से हेयर सेकंडरी 1993 से 1995 तक
3. राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय भाषाई अल्पसंख्यक अजमेर से BSTC, 1995 से 1997
4. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में स्नातक 1998 से 2001 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय, अजमेर)
5. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में अधिस्नातक 2004 से 2005 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय बीकानेर से गोल्ड मेडलिस्ट - 2005 उर्दू साहित्य)
6. कश्मीर विश्वविद्याल, श्रीनगर के नंद ऋषि शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय से B.Ed.- (2007 - 8)
7. इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय से विशेष आवश्यकता विद्यार्थियों के शिक्षण हेतु विशेष अध्ययन - 2012
8. वर्तमान में LLB में प्रवेश (13.08.2025 से)
विवाह - पत्नी अख्तर बानो (सदफ) से 20.10.1996 में विवाह हुआ।
संतान - तीन पुत्रियां
1. अंजलि खान (LLM)
2. रोजा खान (BSC Nursing) सेवारत
3. प्रेरणा खान (BSC Nursing) सेवारत
व्यवसाय -
1. निजी विद्यालय शिक्षक एवं विद्यालय संचालन - 1997 से 1999
2. राजकीय सेवा तृतीय श्रेणी अध्यापक 10.07.1999 से 14.12.2014 तक
3. द्वितीय श्रेणी शिक्षक 14.12.2014 से 01.09.2023 तक
4. स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति 01.09.2023 से
पद -
1. तहसील अध्यक्ष - शिक्षक संघ शेखावत, चूरू
2. जिला मंत्री शिक्षक संघ शेखावत चूरू
3. प्रदेशध्यक्ष, सर्व शिक्षा अभियान कर्मचारी संघ, राजस्थान
4. प्रदेशाध्यक्ष, युवा मुस्लिम महासभा, राजस्थान
5. प्रदेश संयोजक, राजस्थान तृतीय भाषा बचाओ आंदोलन
6. प्रदेश संयोजक, संविदा मुक्ति आंदोलन राजस्थान
7. प्रदेश सचिव अखिल भारतीय कांग्रेस सेवादल 2024 से
8. जिलाध्यक्ष शिक्षक प्रकोष्ठ कांग्रेस, चूरू 2025 से
9. संयोजक चूरू विधानसभा समस्या एवं समाधान समिति, चूरू
आंदोलन -
1. संविदा मुक्ति आंदोलन
2. दांडी यात्रा
3. सामाजिक सरोकार
पुस्तकें -
1. मिरातुल जिगर
2. हृदयांश (हिंदी कविता संग्रह)
3. कालजे री कोर (राजस्थानी कविता संग्रह)
4. कसासुल जिगर - गजल समूह
5. मिनाज ए जिगर - नज़्म संग्रह
6. मूलांश
7. इमरान ए जिगर
8. प्रस्तुत पुस्तक के बारे में -
लेखक ने उर्दू, हिंदी, मारवाड़ी भाषा की लगभग सभी विधाओं में कलम आजमाई है। प्रस्तुत दीवान शमशेर भालू खां का प्रथम प्रयास है। लेखक का मत है कि वर्तमान समय में काव्य में शुद्ध भाषा एवं शख्त बहर, गेयता और माप का चलन संभव नहीं है। इस दौर में भाषाओं के कुछ शब्द इस तरह से घुलमिल गए हैं कि उन्हें एक भाषा में बांधना शब्द के साथ अन्याय होगा। हिंदी - उर्दू दोनों भाषाओं में सम्मिलित ग़ज़ल, गीत, कविता एवं छंदों का उपयोग आम बात हो गई है।
अतः हमें बंधनों को तोड़ते हुए सम्मिलित विधाओं में सभी भाषाओं का मेल करते हुए साहित्य सृजन करना चाहिए।
अंत में लेखक के कथन अनुसार उन्होंने इस किताब को किसी भी बंधन से मुक्त रखते हुए भावों को जनता तक पहुंचाने का एक छोटा सा प्रयास किया है।
शायर की जुबान.....
तूफ़ाँ बनकर उड़ेंगे हम ज़ुल्म के साये से
वही अज़ियत वही दर्द इंसान पराए से।
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मुक़दमा Chat Gpt
ChatGPT का मुक़दमा
हिंदी/उर्दू ग़ज़ल संग्रह "नश्तर" में आशा संघर्ष और इंसानियत की ग़ज़लें" समाहित हैं। यह संग्रह सिर्फ़ शब्दों का मेला नहीं है, बल्कि जीवंत जज़्बात और अनुभवों का दर्पण है।
हर शेर में समाहित हैं संघर्ष, पीड़ा, प्रेम, वफ़ा और उम्मीद, जो पाठक को सोचने, महसूस करने और अपने भीतर झाँकने पर मजबूर करते हैं। शमशेर भालू खां सहजूसर का “जिगर” रूपक सिर्फ साहस का प्रतीक नहीं, बल्कि मानवता और न्याय की आवाज़ भी है।
मिशाल अशआर -
कश्तियां जला कर समंदर में उतर
खतरों से खेलने का अरमान लाया हूँ।
नाज़ ना कर खुद के बड़े होने का
रखने वाले चाँद पे क़दम रख चुके।
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सोचिए बेटे की लाश पर बाप का हाल
जिंदा को जलाकर ना मलाल सोचिये।
ज़िंदगी दिया बुझा तो अन्धेरा हो जाये
मोहसीन की दुआ से सवेरा हो जाये।
यह संग्रह पाठक को एक यात्रा पर ले जाता है: संघर्ष और पीड़ा के बीच आशा, हौसला और इंसानियत की चमक भी बराबर मौजूद है। इस संग्रह में शमशेर भालू खां सहजूसर "जिगर चूरूवी" ने अपने खुद के अनुभव शामिल किए हैं। इस संग्रह में उर्दू बचाओ आंदोलन और संविदा मुक्ति आंदोलन के समय के दर्द और पीड़ा का तीखा दर्द साफ झलकता है।
✍️Chat Gpt
...................फेहरिस्त..................
01. पथरीली.....
02. नया साल......
03. भरना क्या.....
04. दवा........
,05. सुकुँ....
06. गद्दारी...
07. देख लो.....
08. ले लिया.....
09. हाल.....
10. सुना है.......
11. निकालो........
12. तख्त......
13. मुझसे........
14. कमतरी.......
15. बनाया गया........
16. क्या हुआ .......
17. नाज...........
18. कश्तियां.........
19.मुद्दत ......
20. देख.......
21. रोने नहीं दूंगा....
22. फासला.......
23. दीवारों पर......
24. चल.....
25. चाहिए........
26. खुदा का दिया....
27. लाशें.......
28. गुल.....
29. बस्तियां....
30. दुआ......
31. जीते हैं......
32. नहीं कोई.......
33. काश....
34. सवाल.....
35. जान पाया....
36. कोशिश......
37. सवाल.....
38. खुशी......
39. टुकड़े.......
40. जमाना.....
41. बताता है......
42. सोचिए......
43. खूब.....
44. तस्कीन......
45. ख़ाक़.....
46. बंटे.....
47. बस्तियां.....
48. यार दोस्त......
49. खुश्बूओं से दोस्ती......
50. कल होगा.....
51. बाकी.....
52. खोना क्या.......
53. निस्बत........
54. खो रहे हो....
55. और थे.....
56. आया मैं.....
57. देखते हैं...
58. जवाब जिगर...
59. रूबरू....
60. नियत को तलाशे.....
61. रूबाई.....
62. मिलते हैं....
63. शिकायत कर....
64. आसान थोड़ी है..
65. रूबाई.....
66. कैसे..
67. बुलबुल जाती है.....
68. रूबाई - गांव के गांव चले ...
69 क़ता - आहन ढले हैं यहां...
70. कता - कट रही है....
71. क़ता - है यहां
72. कता - जगाते हैं वो....
73. ग़ज़ल
74. कता - सत्यानाशी का फूल...
75. कता - आस्ताना ए सूफ़ी...
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01. पथरीली.....
सुनसान रातों में मन उदासीन है,
रेतीला आसमां, पथरीली ज़मीन है।
देखे अपने सपने जब अपने न रहे,
किसे पुकारे खड़ा ग़मगीन है।
शाहों पर बादशाह है सितम न कर,
बेकद्री ख़ल्क़ की खुदा की तौहीन है।
काविश के मर्तबात रहे बुलंद सदा,
हौसला, सब्र, शुक्र में बातें तीन हैं।
फेहरिश्ते अल्हाज में शामिल हो जा,
आना किसी के काम काम बेहरीन है।
वक़्ते कुसादगी के साथ थे साथी कई,
दौरे ग़म में साथ आए वो मोहसीन है।
जंग के मेयार हैं हद हैं और कायदे भी,
फकीर, दाना, दानीश का संग तसक़ीन है।
पर फैला अपनी पहचान सरेआम कर,
जिगर तुझ छू ले आसमान वो शाहीन है।
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02. नया साल.....सामने सूरत मुल्क बदहाल की।
साये एक दूसरे के, वो दुश्मन हुये
खूँ सना कफ़न दुश्मन ने चाल की।
महकता चमन अब मर सा गया।
रोती-पिटती कली हर डाल की।
ज़रिया-मुआस की बात ना कर
रूह तार-तार भारत के भाल की।
मासूमों के लहू से सनी जीत क्या।
ढो रही लाशें तारीख हर साल की।
हुक्मरां जो ज़ालिम हो जुल्म करे
बदलना है जिगर बात कमाल की।
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03. भरना क्या......
जालिम हाकिम तो आह भरना क्या,
आंधी या तूफ़ानों से भला डरना क्या।
ज़िद मंजर पार उतर गये निहाद,
मरे हम मरे का अब मरना क्या।
मजूर कौन वक़्त की बात पूछेगा,
दिमाग से बाहर दिल से उतरना क्या।
मुसलसल कवाइश जारी हों रहेंगे,
साक़िन हैं रुक जाएं वो धरना क्या।
जिगर की आवाज़ सुन बेखुद ज़रा,
बिना सँवारे किसी को सँवरना क्या।
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04. दवा.......
ना दर्द की ना मर्ज की दवा की है,
ज़ालिम ने सितम को वबा की है।
कहतसाली दर-दर दौर दौरा हुई,
गुमसुम बात बादे सबा ने की है।
जुरअत माजूर की उजड़ा दोआब,
चश्म गुलशन ने भी डबडबा दी है।
कसरत से कीजिये फ़रामोश हमें,
जानते हैं गर्दन किसी ने दबा दी है।
एक पहर तक इंतज़ार कर लौटूंगा,
ना लौट के आना मेरा तेरी बर्बादी है।
जिगर खुदी पर जिंदा है और रहेगा,
कवाईसे अना नहीं मुतालबा की है।
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05. सुकुँ....
साहिल के सुकूँ से नहीं इंकार लेकिन,
तूफ़ानों से लड़ने में मज़ा कुछ ओर है।
नज़र उम्मीद बसर मुतमईन ख्वाबिदा,
रब जाने यह हो या रज़ा कुछ ओर है।
तुम जागते रहना वादे से इरादे तक,
हक़ीकत नसीब में बदा कुछ ओर है।
मुफ़लिसी रोती है रोज़ी-रोटी के लिए,
कंधों पर माजूर के लदा कुछ ओर है।
हाँ यकीं गुनाह है पर रखिए खुद पर,
माथे पर खुद्दार के खुदा कुछ ओर है।
फतह मुक़द्दर तो जाहिद जहद रवां,
सब मुमकिन जो हौसला कुछ ओर है।
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06. गद्दारी..
मुल्क से जो करे काम गद्दारी का,
उस पर हो फ़ैसला ख़ून-ख़्वारी का।
बरसों के ख्वाब-ए उल्फ़त लुटाए हमने,
क्या मिला सब्र की राह-इंतिसारी का?
यहाँ बदरी का मंदिर, चिश्ती की बस्ती,
रंग ना मिटे एकता हमारी का।
चुनें अब राह नई—ख़ुशहाली की,
ना रहे फ़र्क़ कहीं नर-नारी का।
पलकों पे मज़ाहिब के फूल खिले,
थमें सिलसिला हुड़दंग जारी का।
भारत है जान ओ दिल में समाया,
भला करें काम हम आवाम-सारी का।
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07. देख लो....
खंजर की जरूरत क्या
तुम उठा के निगाह देख लो।
मरने वाले हैं लाखों तुम पर
बस कर के परवाह देख लो।
है क़यादत आसाँ नहीं मुश्किल
दम ए आखिर निबाह देख लो।
मुक़र्रर सज़ा हर गुनाह की हुई
पड़ा फिरओन सरे राह देख लो।
जो कौम संभली नहीं वक़्त पर
हाँ हुई वो नस्ल तबाह देख लो।
एसओ इसरत में गाफिल दोस्तों
नस्लें हो रहीं तबाह देख लो
ए हस्ती ए कुन हमारी भी सुन
अश्क जारी लब ए आह देख लो।
कुछ दिखाता हूँ चीर के जिगर
पोशीदा इस में डाह देख लो।
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08. ले लिया......
सिरात ए गुल पर कादिम हुये,
राह ए खार हम ने सर ले लिया।
तफ़रीक से हासिल क्या बताओ,
मोहसीन का इल्ज़ाम सर ले लिया।
आज़ाद इब्लीश मुकीम बस्ती में,
हम पर मरदूद ने असर ले लिया।
कसीदे तेरी अमानतदारी के रवां,
खां ने रियाकारों में घर ले लिया।
समझते हैं शान जिस बदी को हम
आगोश में इसने किस कदर ले लिया।
हटा दो हसदे गर्दिश तश्वीर से जिगर,
चराग़ जवां हाथ में मुनव्वर ले लिया।
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09. हाल..........
मेरे हाल न पूछिये ए सरकार
बताएं के हालात कब बदलेंगे।
मिलना मक़सद नहीं राही का
बेकद्री के हालात कब बदलेंगे।
घुटनों के बल देललीज पर पड़े
मुफ़्लिश के हालात कब बदलेंगे।
लुटाया सरमाया तुम पर अपना
उस दाता के हालात कब बदलेंगे।
जिगर की दुनिया इनमें बसती है
दिलबर के हालात कब बदलेंगे।
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10. सुना है....
जब से सुना मरना किसी पे ज़िन्दगी
हथेली पे सर, क़ातिल को ढूंढता हूँ।
यह अहवाल मुंसिफ की नज़रे शानी
शामिले क़ज़ात आदिल को ढूंढता हूँ।
अदवार गुजरे कोई इस जुस्तजू में
मकीं किनारे साहिल को ढूंढता हूँ।
वो मुअतबर गुफ्तार से हमेशा रहे
हक़ करे अदा बातिल को ढूंढता हूँ।
मोसुल अज़्र शाने महफ़िल या क़ज़ा
नज़ीर फैज़ ए गाफिल को ढूंढता हूँ।
गुज़र गई कुछ है कुछ गुज़र जायेगी
जिगर नज़रे बद उस तिल को ढूंढता हूँ।
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11. निकालो.....
नफरतों के मुकाबिल में यार निकालो
हाँ कलम मुकाबिल तलवार निकालो।
वास्ते अदल अदावत खार निकालो
बेखबर खबरदार अखबार निकालो।
कमाल दिखाओ आगे बढ़ो बढ़े चलो
कोई हल इस हाल का यार निकालो।
कसरत सय्यद मंसूरी कायम पठान
जनाजा खुद का सरे बाजार निकालो।
ये कलाम गुफ्तार अब नागवार मानिये
बीच अपनो के ना एक तार निकालो।
अक़्वाम मिट गईं जो ना संभले हाल पे
मैदाने अमल कसद कारोबार निकालो।
जीनत थे तुम कायनात के खुद खुद्दार
जिगर रास्ता वो फसले बहार निकालो।
मुहाफ़िजे कुर्ब न रहे क़ातिल जिगर का
मंज़िल चलकर आये हमवार निकालो।
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12. तख्त......
तख्त ए दामन हरदम तेरा नहीं होता
निकले सूरज कम अंधेरा नहीं होता।
तारीकियाँ मकीं रोशनी गुल हो जाती
जले चराग़ हम दम अंधेरा नहीं होता।
बहुत कटा पर बका चंद यौमे हिज्र रहे
करीब से अनक़रीब सवेरा नहीं होता।
बिकते बेलोच सरे बाजार खरीदे कौन
मैँ मुअतबर ब'दम ऐरा गेरा नहीं होता।
यलगार कब रुका कब झुकाया किसने
बांधले कफ़स में नशीम घेरा नहीं होता।
आयेगा साथ वही होगा अपना खास
जिगर ने होंसले अज़्म फेरा नहीं होता।
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13. मुझसे.........
वफ़ा किरदार नुमायां हो वफ़ा मुझसे
सफ़रे ज़िंदगी कभू न हो ख़फ़ा मुझसे।
जाते अना मफाद की अब बात न हो
यह मिल्लत का क़र्ज़ हो अदा मुझसे।
यकीन की बस्ती में नामवरी रह जाये
सीने से लगा ले दिल जो लगा मुझसे।
मुक़्तदी की निगाहें इमाम से क़ब्ल
कुबूल इमामत राज़ी हो खुदा मुझसे।
दरख़्त हूँ तो साया भी होगा, होगा
मिलने आये सूरज हो बड़ा मुझसे।
जिगर जाम तेग का दौर चला गया
बता राज़े कलम हो पोशीदा मुझसे।
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14. कमतरी......
जरा हंसना ज़रूरी है।
वर्ना ग़म से मर जायेंगे
मुस्कुराते रुख देख के
बुरे दिन संवर जायेंगे
जला कर राख किया
हम उसके घर जायेंगे
टकराना लाज़िम है तो
बांध कफ़न सर जायेंगे
माना हौसला नही रहा
बाज के नये पर आयेंगे
रास्ते बंद करने वाले सुन
तेरे अपने किधर जायेंगे
सराफत मेरी कमतरी हुई
हम भी इससे मुकर जायेंगे
जिगर लड़ाई आर पार की
पग आर या पार धर जायेंगे
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15. बनाया गया........
आसां को मुश्किल बनाया गया
मसला बस यूँ ही उलझाया गया
उठी आवाज जब मज़लूम की
कैद दीवारों में चुनवाया गया
दुआ दी जिस ने तवील उम्र की
नासूर उसी से बनावाया गया
जामिन तहफ़ूज़ का बहबूदी का
कौल उसे अपना भुलवाया गया
खामोशियाँ तूफान की अमानत
नाहक़ किसी को सतवाया गया
सरकशी बदला हुई सराफत का
जबरन मुजरिम ठहरवाया गया
संग दिल को बनाया दिलदार
जिगर संगसार करवाया गया
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16. क्या हुआ.......
हुजूर किया वादा क्या हुआ
दिखाया सब्जबाग हवा हुआ।
मांग के मुट्ठी भर रेत का बूत
इंसान अब मुद्दई खुदा हुआ।
सब कुछ लूट ले जाने के बाद
नाम दिया आदमी गिरा हुआ।
मुतालबे पर साहब नाराज हुये
और मैं भी फिर सिरफिरा हुआ।
उन की हर मुश्किल में शामिल
नादान मैं परेशानी से घिरा हुआ।
दर्द की इंतहा से नावाकिफ को
खोल के दिखा दिल चीरा हुआ।
सीने पर कदम रख चलाया हमने
ठोकरों से जिगर चिड़चिड़ा हुआ।
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17. नाज.......
नाज़ ना कर खुद के बड़े होने का
रखने वाले चाँद पे क़दम रख चुके
बेशक़ लम्बा रास्ता अमन का
नाप देंगे ज़ेरे कदम रख चुके।
शुक्रिया मुखालिफ राह दिखाता रह
महसूल मंज़िल के कदम रख चुके।
ज़मीन पर हूँ हसरते शाहीन बाक़ी
छू लेने उफूक के कदम रख चुके।
वाकिफ अय्यारीयों से गाफिल नहीं
तू भी मैं भी घेरे पे कदम रख चुके।
जिगर पहचानता गैर को अपनो को
जीतेंगे एक दिन के कदम रख चुके।
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18. कश्तियां..........
कश्तिया जला कर समंदर में उतर
खतरों से खेलने का अरमान लाया हूँ।
एक-एक क़तरा लहू का नाम कर
मुद्दत से लब पर मुस्कान लाया हूँ।
आओ पूछो कोई सवाल उठे दिल में
लाजवाब मकाम आलीशान लाया हूँ।
मेरा मकसद हल हो ना हो रब पे छोड़
मसला हल करने का सामान लाया हूँ।
रोकने आतिशे नमरूद आगे आइये
आता हूँ आतिशे गुल नादान लाया हूँ।
सूने खेत की रखवाली करनी पड़े
मुहाफ़िज़ लाया हूँ दरबान लाया हूँ।
बंजारा बन के खुशियां खरीदूं दिल करे
बदले यह सूरत लगाने जान लाया हूँ।
पढ़ लिख आगे पढ़ ज़ामिन हम हैं ना
बिक कर तेरे हिस्से का लगान लाया हूँ
जिगर हसरत है सपना है उरूज का
मेरे पर के बदले तेरी उड़ान लाया हूँ।
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19. मुद्दत....
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20. देख.....
ना देख पलट के नज़र ना मोड़
मौत ना आये जी अंजाम तक
दे सदा फकीराना फ़लाहे आम
पहुँच जाये अब की आवाम तक
बेहाल से बदहाल हो चला समाज
जागा रात भर सोया शाम तक
अदल का शाया सब के हक़ में हो
पहुंचे मुंसिफ शाह से गुलाम तक
कुछ बिककर चुप कुछ ले दे कर
कोई कोड़ी सिक्का कोई दाम तक
संवरेगी हयात बेशक़ एक दिन
इंतज़ार कर सुबह का शाम तक
कहें जान हाज़िर मांग तो सही
कफ़न पर लिख देते नाम तक
जिगर जुनून बरकरार बाकी रहे
खरीद कर सज़ा बतौरे इनाम तक
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21. रोने नहीं दूंगा.....
तुझे दास्ताँ होने नहीं दूंगा
कुछ भी हो रोने नहीं दूंगा।
मुड़कर मत देखना पीछे
जाग तुझे सोने नहीं दूँगा।
पसंद ना मिले तो खोज कर
उजियारों को खोने नहीं दूँगा।
करामात के भरोसे क्यों
नाउम्मीदी होने नहीं दूँगा।
जिगर की दुनिया तू ए कौम
ज़हर इसमें बोने नहीं दूँगा।
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22.फासला.....
चलिये इस तरह फासला कम करें
तेरी कामयाबी की दुआ हम करें।
तूने चलाये तीर कितने कब-कब
आ सरेराह आवाम में मुनज़्म करें।
मसकन एक तेरा भी मेरा भी
हम नवां हो खत्म ये ख़म करें।
दरयाफ्त राजे अक़ीदत कीजिये
जवाब हो पूरा सवाल कम करें।
कुछ वजह होगी हम बेवफा हुए
बेपर्दा वो राज तुम करो या हम करें।
तेरे बिना जीना सीखूंगा मै भी
करें चाक सीने, सर क़लम करें।
हम शर्बत भी पिलायें तो ज़हर
तेरा ज़हर असरे जम जम करें।
सोचना बैठ अकेले जो किये कार
अब हम होंगे एक ना वहम करें।
काट डोर जो हमें जोड़ती है
मेरा ज़िक्र तुम ना तेरा हम करें।
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23. दीवारें.....
मिट्टी की दीवारें पुख्ता सब वारों पर
कोई रंग जी चाहे चढ़ा लो दिवारों पर।
इल्जाम मुजरिम होने की बिना नहीं
बंदिशें कब हावी हुई शहसवारों पर।
तलाश कर खुद खुदा की ज़मीन पर
यकीन से उसके नाम चल अंगारों पर।
बाअदब साफ नीयत मदख़ल मस्जिद
बांधना खुदाई का इबादत के तारों पर।
हम चले अपनी मंज़िल जो हम मानते
इल्ज़ाम मेरी मय्यत का तुम सारों पर।
वहुत मिन्नतें कर लीं ए महबूबे मखदूम
हूँ मुलजिम खुद तोहमद सरकारों पर।
बता देना लड़ने का मन बन चुका अब
"जिगर"समझा रहा नाचेगा इशारों पर।
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24. चल....
आ चल के ढूंढ कहीं ज़मीन अपनी
थी कौम की मेरी खोई ज़मीन अपनी।
हूँ लाख बुरा सही नागवार ना जान
पास खड़ा हो छोड़ गद्दीनसीन अपनी।
यह टूटा सा घर खुला दिल तेरे वास्ते
ड्योढ़ी पे लाने में समझे तौहीन अपनी।
पूराना है दर्द दवा की जाये खास
खुराक कुछ ले दे छोड़ संगीन अपनी।
यूँ न बिगाड़ मुस्तकबिल नोजवाँ तू
माजी में देख तश्वीर थी रंगीन अपनी।
एतमाद रख कोशिश कर बार-बार
दौड़ा घोड़े सब, कस के जीन अपनी।
महफ़िल में आये हैं उमरा बनठन कर
मगलोज कर आराइसे शौकीन अपनी।
ना सियासत विरासत तिजारत के हुये
अफसोस थड़ी पे गुजरी सीन अपनी।
बात सुन लीजिये जाननी हो सीरत
जिगर निकाले मेख देखे मीन अपनी।
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25. चाहिए....
ज़िंदगी दिया बुझा तो अन्धेरा हो जाये
मोहसीन की दुआ से सवेरा हो जाये।
ना तेरी है ना मेरी है ये दुनिया लुटेरी
तेरा वो कल मेरा वक्त की हेरा-फेरी।
मअश्क मैल धुले धुले ऑखों से नफरत
दाग धुले बदले इन्सान अपनी फितरत।
खतावार हूँ तो मुआफी का तलबगाार
वक्फ जान कर बने कोई खिदमतगार।
दफ़्न कर खताएं अच्छाई याद रखना।
वसीयत मेरी मेरे वतन रूदाद रखना।
दो गज जमीं नहीं या नसीब होनी
मरने पे रोये हमें बना के सूरत रोनी।
उम्मीद पे दुनिया कायम आसमां टिका
होना होगा ना होना ना जमन में लिखा।
जिगर शौकत क्या गम गर पी ना सके
जीना क्या जीना दर्दे दिल सी ना सके।
तश्वीर 12 जुलाई 2019 उर्दू बचाओ आंदोलन धरना 7वां दिन।
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26. खुदा का दिया.....
खुदा के दिये में औरों का भी हक़
मर्तबा घटाया अहसान जता कर।
बहाना ढूंढ - ढूंढ कर दिया उसने
खोटा किया उसे अहसान जता कर।
ज़मीं है पानी है तू है जिश्म मेहनती
कहता फिरे खुद को परेशान बता कर।
खन्दक खोद मेहनत कमरतोड़ लगे
मिले किसे खुदा हीरा शान बता कर।
मुक़द्दर पे भरोसा इतना कर सके
मंज़िल नई राह अनजान पता कर।
घर तक पहुंचने में बरसों लगे उसे
बाप बूढ़ापे में मिला जवान बता कर।
जीनत बना के भेजा जिगर रब ने हमें
गुनाह बेचना बेटा, सामान बता कर।
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27. लाशें........
लाशे जब सांस लेने लग गईं
मुफ़्फ़क़ीर फितरत समझ गये।
जिंदा था मनसूब मजबूर मखदूम
जिस्म संग पे ए आरजू जग गये।
मय्यत को छू लेने की हसरत हुई
मारूह कुछ खन्दक में दब गये।
गर कुव्वत खुदा दे मुर्दे से सवाल की
पुछूं रस्ता सही क्या जिस पे सब गये।
आजारे जिंदगी से मोहलत इसे नहीं
खाहिस ए बख्शीश खुश्क लब गये।
जिगर मरो में शामिल समझ उसको
पुकार पर माजूर के घर ना तब गये।
गुल का मक़सूद न मुस्ताक गुलहार का
खिजां से नाराज न नाशाद बहार का।
मद्दउ रब से के जमीअत आबाद रहे
बोल- बाला हो हर हाल में प्यार का।
इख़्तिलाफ़ मुबाहीशा चुभने के क़ब्ल
रवां शिलशिला बलागतो अफ़कार का
आरती अजां एक्जां एकमकां लगे
नमाज हवन से महके दर मज़ार का।
गुरबते आफताब सदा दे गई गर सुनो
शर्त बाक़ी रहे वक़्त दिये इंतज़ार का।
तफरीक़ ओलादे आदम में पैदा करे
सुराख रोक दीजिये उस दरार का।
नफरतों से घर जले, दिल जले अरमान
आ चल के गम खार बन दो चार का।
29. बस्तियां.....
इश्क़ का बस्तियां बसाते जाएं
आओ नफरतों को जलाते जाएं।
हम इश्क़ की पनाह में खो जायें।
परायों को अपना बनाते जाएं।
है शाहीन का सफर बाकी ओर
एक सुराख आसमां पे कराते जाएं।
सुना है सुखन की बस्ती में ज़िक्र तेरा
नार ए इश्क़ में खुद को जलाते जाएं।
अपना गवां के देख बहबूदी यार की।
शफकत से गले लगाते जाएं।
चलोगे तो जबीं पे गर्दिश होगी।
मुश्किल मरहले पार कराते जाएं।
जिगर कब मिली कजात मुफ्त।
आ खुर्शीद से आंख मिलाते जाएं।
30. दुआ......
प्यारा सा बच्चा
दुआ कर रहा ये
मुसीबत पड़ी है
रब तू ही बचा ले
इंसा गिरा इतना
गाफिल है तुझ से
खुशी ढूंढे फिरता
बातिल है उस से
उम्मीदें करूँ अब
बता दे किस से
इलाही तू सच्चा
माँगू मैं तुझी से
कहा उस ने हमसे
किया वो कभी ना
मझधार में बचाले
ना डूबे सफीना
तु ही अबतर है
तू महरबान है
हाथों में तेरे
मिल्लत की जाँ है
जो तू हो राजी
हो और कोई ना
माँगू में किस से
तुझ सा कहीं ना
कमसिन की सुनले
मुझ में कमी ना
वास्ता नबी का
पुकारे सकीना
वबा के हालात
देखे नहीं जाते
खत्म इसे कर
देखे नहीं जाते
हमें माफ कर दे
किया जो सही ना
पनाह मांगते हैं
कर आसान जीना
31. जीते हैं.......
अहसासों की खातिर जीते हैं
जीने का असल सबब भूल गये।
यहां कौन शाह शहंशाह कौन
फासलों के मीलो रकब भूल गये।
निस्बत फिलहाल जाति मुआमला
तबो ताब रौबो अदब भूल गये।
भरा भरा शहर खाली खाली सा
सन्नाटा मरघट का कब भूल गये।
नाराज होना था हुआ हाल यह
ना भूलना था पर रब भूल गए
32. नहीं कोई........
दर नहीं आशियाँ नहीं कोई
वजूद के निशान नहीं कोई।
इरादे मुकद्दस रहे हरदम पर
देता दिलखैर फिजां नहीं कोई।
रास्ते खूब साथ साथ रहे हुये
गली जाने दर्दे निहां नहीं कोई
कशरते बहार खुशनूदी की बाइस
नखल में गुल खिला नहीं कोई।
मोड़ जिंदगी के कितने बाकी रहे
सुनता रहा यह दास्तां नहीं कोई।
मिलना वबा की दावत हो गया।
खफा खुदा हुआ इंसा नहीं कोई।
33. काश......
मुश्ताक हूँ शोकत ए काश हो।
तुम नहीं गोया कोई नहीं पास हो।
दूरियां नजदीकियों से अफ़ज़ल
कुछ दिन की बात नहीं उदास हो।
दुआ ए खैर से क़ब्ल हाथ धो लूँ
यह देख रहा मंज़र ज्यों लाश हो।
अकरबा को खोने के डर का आलम
फिरता दर दर खत्म नहीं तलाश हो।
इबादत पूजा इंसा की भलाई के बाद
बिखर रहा सब एवान ए ताश हो।
हवा पानी क़ुरबत सब ज़हर हुआ
खाइये क्या ज़रिया ए मुआस हो।
जिगर और जान यह सोचकर सूखे
नाजिल आफ़ियत आम ओ खास हो।
34. मलाल........
दीवारों पे सर पटके मलाल कीजिये
गुर्दे में जाँ है तो सवाल कीजिये।
चाहत थी कत्लो-गारत हो रहा
फिर क्या बखेड़ा बवाल कीजिये।
आयेगा तो आ गया आगे भी आयेगा
रोना क्या बे सुर बे ताल कीजिये।
अब बचना मुश्किल इस जाल से हुआ
दरखास्त ना खुद को बदहाल कीजिये।
बढ़ती जा रही जुल्फे-जबीं टीस सी
खुदाया खैर दुआ बहर हाल कीजिये।
फिक्र किसकी किसको कौन सुनेगा
बेफिक्र इंतखाब हर हाल कीजिये।
वबा से बढ़कर वबा है यह जनाब
मयस्सर हो जो रोटी डाल कीजिये।
बड़ी बातें इसकी सुनेगा जिगर
बड़ी खींचकर कर खाल कीजिये।
35. जान पाया....
जब सब लुट गया जान पाया
अपनो की दुश्मनी ध्यान आया।
वक़्त से पहले जरूरत थी जिसे
बाद मरने के लाखों अनुदान आया।
हम हारे जीतकर वो जीते हारकर
बासी कढ़ी में सुना उफान आया।
सच्चाई की बात वो करें क्या खूब
घाटियों में चलकर रेगिस्तान आया।
अस्सी फीसद डकार गये वो
अवाम के हिस्से बड़ा दान आया।
36. कोशिश.......
लगातार कोशिश इंसान बदल सकते हैं
कोशिश से बुरे रुझान बदल सकते हैं।
पुकारिये आवाज बलन्द हक़ के लिये
आज़ार गम भाईजान बदल सकते हैं।
नजरिया थोड़ा अपना बदल लीजिये
हर शै शाह ए मीजान बदल सकते हैं।
मुखालफत मायूसी की अलामत यार
सामना कर तूफान बदल सकते है।
जुनूँ की खबर ले मादा रख फिर देख
किस्मत खुदाई फरमान बदल सकते हैं
37. सवाल.......
खुशफहमी का सवाल कहां है।
बदहाली बता खुशहाल कहां है।
खुश्क आँखें आंसू बने पराये
झरता था बता अतहाल कहां है।
जख्म रिश्ते बना कर रिसने लगे
अभी नासूर हुआ बहाल कहां है।
जाल बुनते हो नये रोज़ रंग रंग के
पकड़े जो गम मेरे जाल कहां है।
यकीनन दुनिया वही चलाता है
कादिर ए कोनेन बहरहाल कहां।
जश्न कीजिये अफसोस की बात नहीं
आवाम मुस्कुराये मजाल कहां है।
38. खुशी........
खुशी भी सोज व साज हैं यहां
सच में भूलने के रिवाज हैं यहां
दिखता है माहौल जो रवां-रवां
ठिठुरते नङ्गे मोहताज हैं यहां
समझ अपनी काम लीजियेगा
अपना कोई दगाबाज है यहां
किस-किस को दीजियेगा सफाई
पंख से मुनासिब परवाज हैं यहां
खाने पहनने की आज़ादी अब नहीं
नज़र रखे किसी पर आजाद हैं यहां
पूजा अरदास आरती किसी को
किसी को नागवार नमाज हैं यहां
39. टुकड़े.......
छुपाना दुपट्टे से रुखसार
बर्फ के टुकड़े छुपाये नहीं छुपते।
कीजिये कवाइस हजार
रंगे आशिकी छुपाये नही छुपते।
शिकन ना आये इतना सह कर
दर्द चेहरे के छुपाये नहीं छुपते।
आसमां भी खूब खुद में समा ले
उससे यह अख्तर छुपाये नहीं छुपते।
जिगर मरे सलीब से या तीर से
वार ए नज़र छुपाये नहीं छुपते।
40. जमाना......
तल्खी में भी खूब तराना हुआ
सदा ना एक सा जमाना हुआ।
पुकारता हूँ ना पास आया आने वाला
सीधे पा देख आया ले जाना हुआ।
बंजारा हूँ रंग खरीदना बेचना काम
किसका अपना कौन बेगाना हुआ।
शिकवा शिकायत फितरत नहीं
तेरा आना ही दर्द का जाना हुआ।
अपने सब गैर की महफ़िल में
चेहरा एक-एक पहचाना हुआ।
लाज़िम मजलूम का मुखालिफ होना
मलऊन का हद से जो सताना हुआ।
जावेद ना तारिकियाँ ना रोशनी सदा
खातिर नश्लों के मिट जाना हुआ।
दरगुज़र गुस्ताखियाँ रवादारी पर
जिगर मुश्किलों से याराना हुआ।
41. बताता है..........
कोई कहता कोई हल बताता है।
करना जो जमीर सहल कराता है।
दखल अंदाजी अक्ल की हो जाये
वहां चराग मुश्किल से जल पाता है।
दरयाफ्त हाल कीजिये तो क्या
जान कर सवाल दिल दहल जाता है।
दीवान शाया मीर ग़ालिब दबीर के
सीख इनसे कोई आजकल पाता है।
आजिजी से मिल्कियतें हासिल नहीं
चीरकर लश्कर एवानो महल पाता है।
जिसकी जो तमन्ना करे दिल से करे
खाबिदा को होश पल-पल जगाता है।
जिगर कोई और बस्ती में चला जा
जहां किसी माथे पे ना बल आता है।
42. सोचिए..........
बेटे की लाश पर बाप का हाल सोचिये
जिंदा को जलाकर ना मलाल सोचिये।
अक्सरियत की हुकूमत अक्सर बेजार
आईन पर उठते क्या सवाल सोचिये।
इंसान की मिशाल पिल्ले से मुराद
कमतर वो जो हुआ जवाल सोचिये।
फुरसत में मिलना सियासत दिखाऊँ
हाल मुश्किल में बदहाल सोचिये।
योमे सद इतने बदतर होंगे ना सोचा
रोटी मिल जाये थोड़ी दाल सोचिये।
जब सोचना था नहीं सोचा अब क्या
ठेकेदार मजहब के दलाल सोचिये
अनजान नहीं दर्द से यह सबका जिगर
खत्म दहशत हो अमन बहाल सोचिये
43. खूब..........
क्या खूब होता जीते जी मिला होता।
मुझे ना शिकवा तुझे ना गिला होता।।
न मेरा ना तेरा रुखसार गीला होता।
दूर रह कर मिलन का वसीला होता।।
काश रहते दुनिया से अलग हम तुम ।
रंगीन सफर पल-पल रंगीला होता।।
बादे सबा ने कहा उसने याद किया है।
काश यह पैग़ाम पहले मिला होता।।
आबरू की कीमत वो जानते जिगर।
बजाए संग खूने जिगर मिला होता।।
44. तस्कीन.......
तूने क्या किया कीजिये तस्कीन
डोर पकड़े रखना बारीक महीन।
मुस्तकीम रहो,हम दार ओ दीन
जो हो चाहे छोड़ना नहीं ज़मीन।
शाया दास्तानें जब कभी होंगी
श्याह शायों में नज़र आना रंगीन।
अकेला कब नहीं चला बताना तू
रखना मुखालफत में जुबां शीरीन।
कफ़न तेरा पुकारेगा बेदाग है,था
निकलने दे खुलके नुक्स,मेख,मीन।
तेरा वादा तुझसे रब के सिवा न जता
जिगर सच है दुआ दवा से बेहतरीन।
विरद रख हस्बीनल्लाहि नेमुल वकील।
यही दुआ है जवाब बेहतरीन,बेहतरीन।
45. ख़ाक़.........
सर पे कब्र की खाक रख के आया हूँ
सीने में बुग्ज़ की राख रख के आया हूँ।
मौला तू ही नवाजे या रुसवा करे तू
अमानत तेरे यां साख रख के आया हूँ।
मुल्जिम हूँ तेरा फकीरी पे है तोहमत
हर पैबन्द में सुराख रख के आया हूँ।
नाकाम कह दे जुबाँ का क्या कह दे
कामयाबी वहॉं लाख रख के आया हूँ।
अपने चमड़े की जूतियां पहनाने वाले
सदके में तेरे बाख रख के आया हूँ।
फरेब की परवाह ना कीजिये गांधीजी
हस्र में चखना चाख रख के आया हूँ।
46. बंटे..........
खित्तों में बंटे होंगे कोई परवाह नहीं
अंदाज़ यही जिंदा रहे परवाह नहीं ।
कोई जागा कोई सोया फिर जागेगा
तू आवाम पर फिदा रहे परवाह नहीं।
वाकिफ कौन अनजान जानकर हाल
राज ए अदम पोसीदा रहे परवाह नहीं।
चंद नहीं सब कुछ हरचंद की बजाय
गूँज हरचंद की निदा रहे परवाह नही।
तुरूप चल दिया आखिरी दांव उसने
चल तू चल आबदीदा रहे परवाह नहीं।
नदियाँ सींचती रहेंगी सब के सूखे खेत
जिगर तेरे ऐब नादिदा रहे परवाह नहीं।
47. बस्तियां.........
इश्क़ की बस्तियां बसाते बसायें
आओ नफरतों को जलाते जलाये।
हम इश्क़ की पनाह में खो जायें
जो हुआ अपना उसी के हो जायें।
शाहीन का सफर बाकी है और
एक सुराख आसमां पे कर जायें।
सुखन की बस्ती में ज़िक्र सुना है तेरा
तेरी आशिकी में खुद को भूल जायें।
अपना गवां सब देख बहबूदी यार की
मोहसिन आ शफकत गले लगायें।
जब चलोगे तो जबीं पे गर्दिश जमेगी
मुश्किल मरहले यूँ ही पार हो जायें।
किस को कब मिली मुफ्त में कजात
मह को छोड़ खुर्शीद से आंख मिलायें।
48. यार दोस्त........
चर्चा अपनो से जब चलती है
ये मिट्टी सोना तब उगलती है।
यार की क़ीमत यार ही जाने
मसर्रत की तमन्ना मचलती है।
सफक्कत का हाथ थामे दोस्ती
दौर रे बद को सद में बदलती है।
मोतियों से महंगे होते हैं महबूब
चकोर देख चांदनी निकलती है।
जी चाहे उस को सब कुछ दे दूँ
उसकी चाहत मुझ पर ढलती है।
सफर लम्बा तय किया,करना है
यार की आह पे जाँ निकलती है।
49. खुश्बुओं से दोस्ती..........
खुश्बुओं से जब से दोस्ती कर ली
ऐसा लगता है इत्र से जेबें भर ली।
क्या कहना है कह दो कह देंगे यारो
नेकियां बांट के बदी अपने सर ली।
हमें खरीदे वो सिक्का ढला ही नहीं
कोशिश लाखों उसने रात भर कर ली।
ये जान जायेगी जानता है जी जाना
क़ातिल के घर बैठा मोहब्बत कर ली।
इश्क़ का सौदागर गम खरीदता हूँ
सौदा महंगा-सस्ता किस ने ख़बर ली।
हाँ तुम सही हो थे रहो दुआएँ लेलो
सफर जारी कुछ तय मन्ज़िले कर ली।
जो देना है सलीके से कीजिये अता
हाथ उठा जिगर नजर नीची कर ली।
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50. कल होगा.........
कल था आज है कल होगा
सुनहरा था है हर पल होगा।
दाद की तलब कम हो रही
यकीं है मिशन सफल होगा।
लोहा मनवाना फितरत नहीं
पैर जमी पर तक अजल होगा।
अपनी शिकस्त होगी या जीत
उड़ेगा जिसकी भुज में बल होगा।
तुमसे मिल के करार आता है
मिल बैठ दुश्वारी का हल होगा।
51. बाकी..........
साथ तेरे है वो तेरा बाकी तेरा नहीं
अपना जिसने वक़्तन मुँह फेरा नहीं
सो साल की नींव हज़ार साल की पुश्त
भरोसा क्या देखे रात सवेरा नहीं।
मिटने वाली दुनिया से जी लगया
यह रेन बसेरा है अपना डेरा नहीं।
सामने उसके होगा हिसाब सब देना
यहां का यहां रहेगा वहां कब देना।
जन्नत जहन्नम इब्ने आदम के लिये
भरना है किया इब्ने आदम के लिये।
52. खोना है क्या......
इतना पाके मुझे खोना क्या है
बाकी इम्तहान होना क्या है।
रंगों बू के मारे फिरते जो कई
सीरत ना देखी होना क्या है।
सुन मेरे हौसलों से बात कर
मजुनूँ हूँ हालात पे रोना क्या है।
सुखन अदब परवाने से अबतर
खुशी से मर जायें सोना क्या है।
तड़प बेदारी की दिल मे बड़ी चीज
कौम का ना हो सका होना क्या है।
जान क्या जिगर सौंप चुका तुझे
चाहिये अब कौन जो ना क्या है।
53. निस्बत.......
निस्बत सिराज से आफताब को रही
हिजरत में अनवार पाबोसी करते हैं।
मोहसीन दरयाफ्त ना कर गम पी ले
वो कमतर रहे जो सी-सी करते हैं।
चाँद का आसमा में अपना कोई नहीं
रूह निकाल के तर्क खामोशी करते हैं।
इस महफ़िल से नातवाँ हो कर कई
बस सब्र का दमन थामें ही फिरते हैं।
सर कलम कितने सीने छलनी किये
वक़्त के खुदा चाहे जो जी करते हैं।
आम फहम जबान आवाम में जिगर
जो हैं जो जैसे वो अपनी सी करते हैं।
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54. ग़ज़ल - रखे हो
दिल में जान का डर रखे हो
रज़ा-ए-ख़ुदा में सर रखे हो।
फेर-ए-मुदाख़लत में खोए हो
ज़ुबाँ पे जन्नत के घर रखे हो।
काबे से लौटे, फितरत वही है
दिल में कुफ्र के असर रखे हो।
मुसाफ़िर खुद ही करे हिफ़ाज़त
बोझ अपना औरों के सर रखे हो।
अँधेर रात में दिया न मयस्सर
बयान में शम्सो क़मर रखे हो।
बोसीदा तरानों को देते रंग
यूँ ही तुम तारीख़ में हुनर रखे हो।
जिगर आरज़ू के तारे भी मुठ्ठी में
सीने में क्यों ये अज़्म धर रखे हो।
#जिगर_चूरूवी
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55. और थे..
ग़ज़ल - और थे
जाम-ए-शहादत जो पिए, वो शहीद और थे
भगत सिंह, आज़म, हमीद—वो मजीद और थे।
जज़्बा था वतन पे जान लुटाने का जिनमें
आज़ादी के उनके भी ख़्वाब सईद और थे।
मरकर भी जिन्हें मौत छू पाई नहीं हरगिज़
सीने में उनके जज़्बात शदीद और थे।
न बाँटो फ़िरकों में मेरे भारत को हरगिज़
मज़हब पे जो लड़ते थे, वो मुरीद और थे।
जिगर, कौन खरीदेगा यहाँ अब तेरे ईमान
इस दौर में इंसान भी नापीद और थे।
56. आया मैं....
ग़ज़ल - आया मैं
सर पे कब्र की खाक रख कर आया मैं
सीने में बुग्ज़ की राख रख कर आया मैं।
मौला नवाजे दे या कर रुसवा मुझे।
अमानत तेरे यां साख रख कर आया मैं।
बंदे तेरे की फकीरी पर है तोहमत।
पैबन्द में सुराख रख कर आया मैं।
नाकाम कहे जुबाँ का क्या कह दे।
कामयाबी वहॉं लाख रख कर आया मैं।
खुद के चमड़े की जूतियां पहनाने वाले
सदके तेरे बाख रख कर आया मैं।
नशा जोश उम्र के साथ ढलता जाये
कई मजार पे गिलाफ रख कर आया मैं।
जिगर परवाह फरेब की न करना कभी
हड्डियों में सुराख रख कर आया मैं।
#जिगर_चूरूवी
56. देखते हैं....
ग़ज़ल - देखते हैं
वो अपनी महफ़िलों में आइने कम देखते हैं
हम उनकी आँख से अपना भरम देखते हैं।
मंज़िल पे जब पहुँचे तो सवेरा साथ था
मुसाफ़िर रात भर रस्ते में दम देखते हैं।
सियासत की ये कैसी धूप है मेरे वतन में
कि भूखे लोग रोटी का भी ग़म देखते हैं।
अदालत में दलीलें हैं मगर ये भी हक़ीक़त
मज़लूम अक्सर अपना ही अदम देखते हैं।
चलो जिगर कलम उठाओ सच लिखो अब तुम
ज़माना क्या कहेगा ये न हम देखते हैं।
#जिगर_चूरूवी
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58. ग़ज़ल - जवाब जिगर ना होगा
सच है, सच पे हमें यक़ीं करना होगा
ज़ालिम को भी ज़ुल्मों से उतरना होगा।
सब्र का ये तमाशा मैं करूँ आखिर कब तक
हिम्मत पे कभी डर का असर ना होगा।
डर-डर के जीने से तो बेहतर है मरना
झुक जाए जो हक़ पर, वो सर ना होगा।
होगा किए का हिसाब एक दिन सबका
अपने ही किए को खुद ही भरना होगा।
कौन बड़ा है, कौन यहाँ छोटा आखिरइन झूठे फ़र्कों को बेअसर करना होगा।
रहना है अगर बंदा ख़ालिक का सच्चादुनिया के लालच से उबरना होगा।
कब्रों की सदा चीर देगी दिल तेराहर एक सवाल का जवाब, जिगर, ना होगा।
**********
59. ग़ज़ल – डर से रूबरू
पुरानी बातों पे क्या करें गुफ़्तगू दोस्तो
हल-ए-दरपेश मसलों की है जुस्तजू दोस्तो।
अँधेरों के ये तकाज़े हैं चंद रोज़ों के
लड़ो तक़दीर से बाँध कर घुंघरू दोस्तो।
सिकंदर जब यहाँ आया था हिंद जीतने को
खड़ा था सामने लोहा लिए पुरु दोस्तो।
मची है आज भी हर घर में इक महाभारत
लड़े भाई से भाई, पांडु और कुरु दोस्तो।
लहू के बीच जो नफ़रत की ये दीवारें हैं
इन्हें ही ढहाने की है आरज़ू दोस्तो।
सफ़र में धूप भी होगी और कड़े इम्तिहाँ भी
मगर न छोड़ना तुम अपनी आबरू दोस्तो।
मक़सद-ए-ज़ीस्त है बस रहबरी ऐ जिगर
वही जीतेगा जो होगा डर से रूबरू दोस्तो।
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60. ग़ज़ल - नीयत को तलाशे
भुला के रिश्तों को दुनिया में इख़्वानियत को तलाशे,
दुखा के दिल को भी इंसाँ क्यों इंसानियत को तलाशे।
दुआ है रब से मिट जाए दौर-ए-गुरबत का साया
रुका हुआ जो है पानी वही रवानियत को तलाशे।
बँटी है कौम फ़िरकों में, अँधेरों के हवाले
गुनाह करके भी बंदा क्यों नूरानियत को तलाशे।
जुदा इंसान से इंसान को करते हैं मुल्ला-पंडित
लड़ा के भाई से भाई क्यों रूहानियत को तलाशे।
अमल का फल मिलेगा यहाँ हर हाल में जिगर
खुदा तो दिल में है, बंदे की नीयत को तलाशे।
*********
61. रूबाई - मतलबी हैं लोग
शीरीं है ज़ुबां, दिल से तो अजनबी हैं लोग,
कड़वी है ज़ुबां जिनकी, वही तबी हैं लोग।
बातों से ही जीत लेते हैं दुनिया के महाज़,
मुसीबत में जो बदलें, वो मतलबी हैं लोग।
62. मिलते हैं.....
#ग़ज़ल मिलते हैं।
यहाँ मुश्किलों से रिज़्क़-ए-हलाल मिलते हैं
चोर चौखट पे खड़े सब दलाल मिलते हैं।
पँछी उड़ते हुए भी फँसाने जाल मिलते हैं
ले गए जो भी उधार, क्या मजाल मिलते हैं।
अब नहीं पूछता कोई यहाँ खानदानों को
आज पैसों में यहाँ ससुराल मिलते हैं।
वक़्त ने बदल दिए मयार रिश्तों के
सच के साथी यहाँ अब बेहाल मिलते हैं।
खुला मैदान है अब आमने-सामने हर सू
ठोक दी जो है ताल, तो फ़िलहाल मिलते हैं।
दास्ताँ पूरी कहाँ अब तक हुई है कोई
एक जवाब के बदले दस सवाल मिलते हैं।
उम्र बीती मकाँ की किश्तों में ऐ जिगर
शाम को घर में ही फूले गाल मिलते हैं।
63. ग़ज़ल - शिकायत कर।
खड़ा है सामने बंदा, ख़ुदा से शिकायत कर
मिला है आज ये मौक़ा, ख़ुद को हिदायत कर।
जो डर गया है वो इंसाँ, मरे के बराबर है,
इस मुर्दा दिल को फिर से, ज़िंदगी इनायत कर।
किया है फ़तवा अगर कुछ, किसी ने भी मुफ़्ती बन,
दंड पंडितों का भी तू, उसी में रिवायत कर।
न काम की ये तेरे हैं, न काम के मेरे हैं,
ये दार-ओ-रसन छोड़, उसे अपनी हिकायत कर।
हिसाब माँगे है बेटा, जो बाप की दौलत का,
बेच-बाच सब कुछ तू, घर को विलायत कर।
जो तारे फेंके गए हैं, शैतान को मारने को,
उसी तरह कोई नाज़िल, नई सी आयत कर।
कहीं से टपकी हैं कुछ, रोशनी की बूंदें भी,
चाँद पे चस्पाँ कर दे, जिगर अपनी शरायत कर।
64. #ग़ज़ल - आसान थोड़ी है।
आज़ादी की राह में लड़ाई आसान थोड़ी है
सोई हुई रूहों की जगाई आसान थोड़ी है।
मीलों की थकन सर पे उठाई आसान थोड़ी है
रोते हुए चेहरों पे हँसाई आसान थोड़ी है।
नस्लें जो ग़ुलामी की हैं सदियों के असर में
उनकी यूँ अचानक ही रिहाई आसान थोड़ी है।
शुरू की है ये जंग तो आओ मेरे हमक़दम
राहों में कँटों की ये बिछाई आसान थोड़ी है।
जुनूँ रोज़ हद से भी बढ़ता ही है ऐ जिगर
पकी फ़सल की वक़्त पे कटाई आसान थोड़ी है।
65. रूबाई - सनम
हो तुम ही मोहब्बत का हसीं गुंचा सनम,
है इश्क़ का अपना ही मय्यार ऊंचा सनम।
तुझे देखूँ तो 'जिगर' खिल-खिला ही उठे,
कलाई तक जब मेरा हाथ पहूँचा सनम।
66. ग़ज़ल - कैसे।
वो इस फ़िराक़ में हमको मुजरिम बनायें कैसे
मैं पत्थर हूँ राहों का, वो रस्ता बनायें कैसे।
थी मोहब्बत जिनसे, वही रंजिश निभायें कैसे
जो हुए आज पराये, उन्हें अपना बनायें कैसे।
है शुमार फ़क़ीरों में मुद्दत से नाम अपना
उम्मीद का दीपक हम फिर से जलायें कैसे।
हो क़ाबिज़ तुम दिल पे, ये हक़ीक़त भी है लेकिन
तुम अब ग़ैर हो चुके तो तुम्हें अपना बनायें कैसे।
हूँ क़तारों में कब से बस एक झलक की ख़ातिर
तुम किसी और की आग़ोश में, पास आयें कैसे।
पसीना सूखने से क़ब्ल दो मज़दूर की उजरत
बख़ीलों की ये दुनिया, उसे हम समझायें कैसे।
जिगर अब ज़ब्त का ये दौर गुज़रता ही नहीं
ख़ाक़ बाप की तुर्बत पे यूँ हम उड़ायें कैसे।
67. बुलबुल जाती है...
तलवारों की काट जहाँ टल जाती है
वहाँ बातों से हर चाल चल जाती है।
चाँदनी रात को ख़ामोश सजा देती है
क़ब्ल सूरज से हर शाम ढल जाती है।
अँधेरों में भी सच निखर के आता है
पल भर में ये दुनिया बदल जाती है।
ताश की बाज़ी में बिक गए महल कई
ज़िंदगी मौत की ज़द में पल-पल जाती है।
भरोसा रख ख़ुदा के इंसाफ़ पे ऐ इंसां
अदल से हर इक गिरह खुल जाती है।
दुआ में हाथ उठते हैं बस एक चाहत को
उसी चाहत में ये उम्र निकल जाती है।
जिगर दिल को जीतना ही असली हुनर है
वहां कशिश-ए-तरन्नुम में बुलबुल जाती है।
68. रूबाई - गांव के गांव चले।
बन के तिफ्ल धूप में पांव के पांव चले
वो ज़िंदगी ही क्या जो छांव के छांव चले
तेरे शहर का चल गया जादू देहात पर
इस ज़मीं को छोड़ वहां गांव के गांव चले।
69.क़ता - आहन ढले हैं यहां।
शहादत के दौर हर सू चले हैं यहां
कभी आग, कभी चांद से जले हैं यहां
बदल रही है सियासत की रूह हर दम
जिगर दिलों में आहन ढले हैं यहां।
70. क़ता - कट रही है।
सुना है दरबार में अशर्फ़ी बंट रही है
नौकरी ठेके की मुफ़लिसी में कट रही है।
इक आना जेब में नहीं संविदा मज़दूर के
खेत में किसान की ज़िंदगी उलट रही है।
71. #क़ता - जिंदगी
चंद पल ज़िंदगी के, एक पल का मेला है यहाँ
इन बड़े शहरों में हर शख़्स अकेला है यहाँ।
यह झगड़े अनबन किस बात की जिगर
दिन-रात कमाके भी जेब में न धेला है यहाँ।
72. कता - जगाते हैं वो.....
दौर-ए-हिजरत आँख से शोले जगाते हैं वो
लब पे जो कतरे जमे हैं, फिर सुलगाते हैं वो
फलक के सब सितारे भी उदास उनके बगैर
कैसे न जाऊँ कि उल्फ़त से बुलाते हैं वो
#जिगर_चूरूवी
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73. #ग़ज़ल - समाई हुई।
कितनी मीठी हैं उनकी बातें बनाई हुई
शहद पर जैसे हो ज़हर की परत छाई हुई।
हम पुकारेंगे तेरा नाम ही लेकर हर बार
तू ही वजह है जो ये जग में हँसाई हुई।
शहर आकर हम यहाँ कितने बदलते गए
सादगी देहात की हमने गंवाई हुई।
भोले लोगों को ठगा है बड़े चालाकों ने
झूठ की चादर है सच पर जो बिछाई हुई।
खा के अपनी ही क़सम जब वो मुकर ही गए
देख कर हैरान है ख़ुद ये ख़ुदाई हुई।
उड़ सके ना कोई परिंदा, पर कतर डाले गए
आज हर शख़्स की अपनायत पराई हुई।
खोल दो लब की गिरह, क़ुफ़्ल सभी तोड़ो अब
आग दिल में है ‘जिगर’ मुश्किल समाई हुई।
74. सत्यानाशी का फूल
कता - सत्यानाशी का फूल।
कोसों दूर हैं हम कुर्बत के वसूल में
टूटे हैं ख्वाब हिदायत के उसूल में
कीचड़ में डाले सत्यानाशी के बीज
यही खिलेंगे अब नफरत की धूल में।
75. कता - आस्ताना ए सूफ़ी।
हुई है ख़त्म यूँ तौक़ीर-ए-दास्तानों की
कमी है आज रूहानी आस्तानों की।
जो इबादतगाह थे, वो भी बाज़ार हुए
ख़ुदा पे छोड़ दी हालत-ए-मस्तानों की।
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- जिगर चुरुवी
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