Skip to main content

✅दीन ए इलाही मान्यता विश्वास व संक्षिप्त इतिहास

अकबर महान धर्म सभा मे वाद-विवाद व आध्यात्मिक चिंतन करते हुये।
(फतेहपुर सीकरी)

दीन‌-ए-इलाही
इलाही (ईश्वर) का धर्म (ईश्वर का मार्ग)

मुग़ल सम्राट अकबर :-
विजयी सेना का कोई भी सैनिक साम्राज्य के किसी भी भाग में इस प्रकार का कार्य न करे और स्वतन्त्रतापूर्वक बन्दियों को अपने कुटुम्बियों के पास जाने दे। - अकबर
अकबर जवानी में
      मुग़ल साम्राज्य का तीसरा बादशाह
नाम - जलालुद्दीन मोहम्मद
उपनाम -
1 अकबर (महान)
2 महाबली बादशाह
3 शहंशाह अकबर
4 अकबर ए आज़म
जन्म - 15 अक्टूबर 1542 (4 रजब 949 हिज़री)
जन्म स्थान - अमरकोट के राजपूत परिवार के घर
मृत्यु - 27 अक्टुबर 1605 (63 वर्ष उम्र)
मकबरा - सिकंदरा ( अंत्येष्टि बिना किसी संस्कार के)
पिता - नसीरुद्दीन मोहम्मद हुमायूँ (तैमूर फेमिली) 
माता - हमीदा बेगम (चंगेज खानदान)
(पिता सुन्नी मां शिया)
विवाह - सात विवाह किये उनमें पहली पत्नी बिल्किश बेगम थी। राजस्थान की जोधा से विवाह चर्चित है।
सन्तान -
1 सलीम (शेखू,जहांगीर) (उत्तराधिकारी)
2 खुसरो पुत्र
3 दारा शिकोह पुत्र

राज्याभिषेक
14 फ़रवरी 1556 को कलनोर पंजाब में अकबर का राज्याभिषेक मुगल साम्राज्य का दिल्ली की गद्दी पर अधिकार के लिये सिकंदर शाह सूरी से चल रहे युद्ध के दौरान हुआ। बेराम खां संरक्षक बना। (उम्र 13 वर्ष- 4 माह)
शिक्षा - नहीं (सामान्य व धार्मिक शिक्षा उस्ताद अब्दुल लतीफ शिया से प्राप्त की)
विशेष -
1 ललित व चित्रकला  (मुगल-यूरोपीय शैली)
2 अनेक संस्कृत पाण्डुलिपियों व ग्रन्थों का फारसी में तथा फारसी ग्रन्थों का संस्कृत व हिन्दी में अनुवाद करवाया।
3 सहिष्णु विचारधारा से जजिया समाप्त किया
4  धार्मिक चर्चायें व वाद-विवाद आरंभ कराये
5 दीन ए इलाही  शुरू किया।
6 शेरशाह के आक्रमण समाप्त किये।
7 हेमू को हराया।
8 लगभग सम्पूर्ण तत्कालीन भारत पर सम्राज्य।

अकबर की नीतियां :-

1 सुलह-ए-कुल की नीति :-
विश्व के सभी धर्मों का एक ही उद्देश्य है शान्ति जो सर्वधर्म समन्वय से ही संभव है। अकबर की यही नीति सुलह ए कुल (सभी से समझौता) है।
अकबर ने सब धर्मों की अच्छी बातों को ग्रहण करने हेतु आपसी वार्ता की व्यवस्था की।

2 धार्मिक एकता की नीति :-
 बादशाह हर धार्म के वास्तविक तत्वों की तह में जा कर सत्य को पहचानने की हर संभव कोशिश करता रहता था।अपना। वह मानता था कि राजा को प्रजा से भेदभाव नहीं रखना चाहिये ।
बादशाह के सामने दरबार में अनेक धर्म के लोगो के आपसी धार्मिक श्रेष्ठता के वाद-विवाद उग्र होने लगे जिसमें बादशाह के सामने तहजीब का ध्यान न रखते थे। यह देखकर अकबर के मन में सच्चाई की खोज की प्रवृत्ति और अधिक बढ़ी।
उसने फतेहपुर सीकरी में दरबार से अलग एक दरवाजा धार्मिक वाढ-विवाद के लिये बनवाया। 
उसने राजपूत राजकुमारियों से विवाह किया और उन्हें अपने हरम में हिन्दू धर्म अपनाने की पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की। 
अकबर ने युद्ध बन्दियों को जबरन मुसलमान बनाना निषिद्ध घोषित किया।

कट्टरपंथ के विरुद्ध की नीति :-
सम्राज्य में शांति व आंतरिक झगड़ों से मुक्त हो कर अकबर ने धर्म-सुधार की ओर ध्यान दिया
फतेहपुर सीकरी में दरबार में सभी धर्मों और संप्रदायों के विद्वान भर बुलाये गये। सभी की धार्मिक मान्यताओं पर सहिष्णुता पूर्वक विचार होता।  इस्लाम धर्म के शिया व सुन्नी आलिमों के साथ-साथ अन्य धर्म के विभिन मत के लोगों को एक साथ  बेठ कर चर्चा करता। कुरान, वेद-पुराण धर्मशास्त्र,बाइबल तौरात पर सन्दर्भ सहित चर्चा अकबर की महत्वपूर्ण बात थी। कट्टरपंथी व अंधविश्वासी विचारधारा के अकबर विरुद्ध था।
किसी भी साम्राज्य के लिये यह ठीक नहीं कि जनता में धार्मिक वैमनस्य हो, अतः सभी धर्मों में समन्वय अपेक्षित है। -अकबर

सभी धर्मों के सम्मान की नीति :- 
एक बार अकबर शिकार खेलने मथुरा की तरफ निकल गये और आमजन से मुगल सल्तनत के बारे में चर्चा करने लगा,एक व्यक्ति ने कहा मुगल हमारे राजा नहीं हैं, मथुरा आने पर हिन्दुओं को धार्मिक यात्रा कर (जजिया) देना पड़ता है। अकबर वापस फतेहपुर सीकरी आया और यात्रा कर समाप्त कर दिया ।
बाद में सभी धर्मों के आचार्यों,पादरियों, मौलवियों व मनसबदारों को बुला कर राज्याभिषेक की नौवीं वर्षगाँठ पर 1564 में यह कहते हुये कि यह कहाँ का न्याय है कि राजा के धर्म के अलावा के धर्मावलम्बियों से उनके ईश्वर की पूजा की एवज में कर लिया जाये गैर मुस्लिमों पर लगने वाले कर जजिया के समाप्ति की घोषणा कर दी। 115 वर्ष बाद बादशाह औरंगजेब ने 1679 में जसवंतसिंह की मृत्यु के बाद जजिया कर पुनः लागू किया।

अकबर की धार्मिक नीति :-
अकबर की धार्मिक नीति सहिष्णुता व सर्वधर्म समभाव की थी जिसका निर्माण में कई घटनाओं व परिस्थितियों के कारण हुआ। 
1 अकबर के पिता हुमायूँ व मा शिया मुस्लिम थी  2 संरक्षक बैरम खाँ शिया सम्प्रदाय से था।
3 अकबर के उस्ताद अब्दुल लतीफ को शिया मत के मानने वाले सुन्नी और सुन्नी मत के मानने वाले शिया समझते,उनकी शिक्षाओं का गहरा असर पड़ा।
4 राजतिलक के बाद अकबर शैवों,सन्तों, योगियों व अन्य धर्म के मानने वालों के सम्पर्क में आया जिससे उसके धार्मिक विचार व नीति सहिष्णु एवं सर्वधर्म समभाव की बनी।
5 सूफीवाद व भक्ति आंदोलन का असर
6 राजपूत राजघरानो से सम्पर्क
7 सम्राट के साथ-साथ धार्मिक नेता बनने की महत्वकांक्षा।

अहिंसा नीति :-
अकबर के दरबार में जैन मुनि भी थे जिनमें दो प्रमुख जैन श्वेबांतर मुनि हीर विजयजी व उनके शिष्य विजयसेन सूरी सन 1584 में राज दरबार में पर्यूषण पर्व पर जीव हत्या नहीं करने का फरमान जारी करने हेतु निवेदन करने बादशाह अकबर से मिलने आये औऱ शंहशाह अकबर ने इस हेतु तुरन्त फरमान जारी कर दिया। इसके बाद कई अन्य तिथियों पर उसने अपने साम्राज्य में जीव हिंसा की मनाही की व स्वयं ने मांसाहार कम कर दिया। अकबर हर शुक्रवार शाकाहारी भोजन करने लगा।

धार्मिक वाद- विवाद हेतु इबादत खाने की स्थापना :-
अकबर ने जिज्ञासु प्रवृत्ति की सन्तुष्टि हेतु सन  1575 ईस्वी में फतेहपुर सीकरी में इबादत खाने की स्थापना जहाँ विभिन्न धार्मिक विषयों पर हर सप्ताह गुरुवार के दिन विचार विमर्श होता था। शुरू में तो यहां सिर्फ मौलवी ही आते रहे बाद में शान्ति व सच्चे धर्म की खोज के उद्देश्य से शुरू  इबादत खाने में सनातन,जैन,ईसाई व पारसी एवं इन धर्मों की विभिन्न शाखाओं के धर्माधिकारी भी आने लगे।

तौहीद ए इलाही (दीन ए इलाही) :-
तौहीद ए इलाही =तोहिद-एक ईश्वर की भक्ति
इलाही - ईश्वर =(एक ईश्वर की भक्ति)
दीन ए इलाही =ईश्वर को प्राप्त करने का मार्ग
अकबर इबादतखाने में हर धर्म व पंथ के बारे में विचारों को सुनता व उनका विश्लेषण करता। हर धर्माधिकारी स्वयं के धर्म व पंथ को श्रेष्ठ तो बताता पर अकबर को संतुष्ट नहीं कर पाता था। 
इबादतखाने के माध्यम से हिन्दू धर्माचार्यों, जैन साधुओं, पारसी सन्तों एवं ईसाई मत के विद्वानों से अकबर को जो अच्छी बातें ज्ञात हुईं उनके आधार पर निष्कर्ष पर पहुँचा कि मौलिक रूप से सभी धर्म एक हैं और सभी का ध्येय भी एक है। धार्मिक क्षेत्र में प्रमुख स्थान प्राप्त करने के लिए उसने 1589 ई. में फैजी द्वारा रचित ख़ुत्बा पढ़ा
उसने मजहर नाम से फरमान जारी कर हेनरी अष्टम (ईसाई धर्म) की तरह इस्लाम धर्म से संबन्धित विवादों पर अन्तिम निर्णय का अधिकार स्वयं के लिये घोषित कर दिया। यह इसलिये किया गया कि धार्मिक मौलवी कुरआन या अन्य हदीष की आड़ मे उसके राजकार्य में बाधा पहुंचा सकते हैं के समस्त अधिकार सुरक्षित कर लिये गये। सन 1582 ईस्वी में उसने सभी धर्मों के मूल तत्वों का निचोड़ सम्मिलित करते हुये नये धर्म का शुरू किया जिसका नाम तौहीद ए इलाही (एक ईश्वर की पूजा) शुरू किया जो बाद में दीन ए इलाही के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसमें इस्लाम का एकेश्वरवाद, पारसी धर्म के सूर्य और अग्नि की पूज,सनातन की धूप-बत्ती,बौद्ध व जैन धर्मों के अहिंसा सिद्धान्त को इस धर्म में जगह दी गई।
अकबर ने इस धर्म का प्रचार नहीं किया व न ही जनता पर यह आवश्यक किया गया कि दीन ए इलाही मानना ही पड़ेगा। यह ऐच्छिक था।
अकबर ने नये सिक्के ढलवा कर उन पर अल्लाह हु अकबर लिखवाया। यह अनेकार्थी शब्द है। अकबर का अर्थ है महान या सबसे बड़ा। इससे इसके तीन अर्थ निकलते हैं ;-
1 अल्लाह हु अकबर यानी अल्लाह बड़ा है।
2 अल्लाह महान हैं। 
3 अकबर अल्लाह है।
वास्तव में दीन ए इलाही कोई धर्म/पंथ न होकर अकबर के साम्राज्य की आचार सहिंता ही था। अकबर ने इसे धार्मिक उद्देश्यों के लिए नहीं अपितु सामान्य शाही प्रशासनिक नीति के एक हिस्से के रूप में स्थापित किया। 
यह नवीन धर्म नहीं बल्कि विश्वास व विचारों का संग्रह था। दीन-ए-इलाही में रहस्यवाद, प्रकृति पूजा और दर्शन आदि शामिल थे। 
अकबर ने इस धार्मिक सिद्धांत में पैग़म्बरवाद  को नकारा व स्वयं को नबी (पैगम्बर) घोषित किया। 
अकबर शांति और सहिष्णुता की नीति का समर्थक था।

दीन-ए-इलाही के सिद्धान्त :-
(1) ईश्वर एक है और अकबर उसका पैगम्बर है।
(2) मांसाहार निषेध व गाय का मांस पूरी तरह से प्रतिबंधित।
(3) सूर्य (सुबह,दोपहर व शाम को) पूजा
(4) गर्भवती,वृद्ध,बाँझ स्त्रियों व बालिकाओं के साथ सहवास निषेध।
(5) मृतक के सर को पूर्व की ओर व पैर पश्चिम की ओर करके दफ़नाना मना।
(6) धर्म परिवर्तन हेतु रविवार का दिन निश्चित।
(7) जनता को सम्राट के लिये सर्वस्व बलिदान करने हेतु तैयार रहना ज़रूरी।
(8) परस्पर अभिवादन के लिए अल्लाह हु अकबर या/और जल्ले जलालहू कहना।
(9) भोग,उपभोग,घमंड,निंदा,इल्जाम तराशी पाप
(10)  दया,विचार शीलता और संयम ही पुण्य है।
(11) अग्नि की उपासना दीपक नमस्कार करना।
(12)  हवन कार्य (अग्नि अनुष्ठान) करना।
(13) दाढ़ी नहीं बढ़ाना (क्लीन शेव)। 
(14) एक से अधिक विवाह वर्जित। 
(15) सती प्रथा समाप्त।

दीन ए इलाही पंचांग :-
अकबर ने नये पंचांग की रचना करवाई जिसमें एक ईश्वरीय संवत को आरम्भ किया जो उसके राज्याभिषेक के दिन से प्रारम्भ होत है।
इलाही संवत चन्द्रदर्शन अनुसार प्रारम्भ 14 फरवरी 1556 को एक इलाही संवत शुरू हुआ।
14 फरवरी 2022 को इसे 476 वर्ष हो गये। 477वां इलाही सन शुरू है।

क्या अकबर खुद को खुदा घोषित करना चाहता था :-
दीन-ए-इलाही धर्म की स्थापना के नेपथ्य में संभव है अकबर के दिल में ईश्वर बनने की इच्छा रही होगी परन्तु इतिहास में यह अप्रमाणित व तथ्यहीन वक्तव्य है जिसका कोई आधार नहीं है। 

दीन ए इलाही के अनुयायी :- 
अकबर के अलावा केवल राजा बीरबल ही मृत्यु तक इस के अनुयायी थे।
1 अकबर (संस्थापक)
2 बीरबल (अकबर के नो रत्नों में से एक)
3 सलीम(शेखू) (अकबर का पुत्र)
4 अबुल फ़ज़्ल (लेखक-इतिहासकार, आईने अकबरी)
5 खुसरो (शहजादा)
6 दारा शिकोह (शहजादा) 
(13 अन्य)
शाहजादा खुसरो और दाराशिकोह , अकबर की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते थे परन्तु सत्ता उनके हाथों में नहीं आ पाई। इसलिए दीन ए इलाही' अधिक समय तक अपना अस्तित्व नहीं बनाये रख सका।

निष्कर्ष :-
अकबर एक महत्वाकांक्षी व आम जन की भावना को समझने वाला दूरदर्शी व्यक्ति था। उसने मुगल सल्तनत को चिरस्थाई बनाने हेतु स्थानीय लोगों के दिलों को जीतना जाना। यही वजह है कि भारत के इतिहास में मुगल काल विशेष तौर से अकबर युग स्वर्णिम काल माना जाता है। कुछ मुस्लिम मौलानाओं ने इसकी आलोचना की है पर अकबर की दूरदर्शिता व जनता पर राज करने की नीति अनुकरणीय है जहां हर धर्म, जाति, पंथ, सम्प्रदाय का मान सम्मान था। यद्यपि यह धर्म (दीन ए इलाही) अभी अस्तित्व में नहीं है परंतु इसने भारत में विदेशी मुगलों पर भारतीय होने की छाप लगाई।

जिगर चुरुवी 
9587243963

Comments

Popular posts from this blog

बासनपीर मामले की हकीकत

इस ब्लॉग और मेरी अन्य व्यक्ति से हुई बातचीत पर मंहत प्रतापपुरी का बयान जीवनपाल सिंह भाटी की आवाज में सत्य घटना सद्भावना रैली बासनपीर जूनी पूर्व मंत्री सालेह मुहम्मद का बयान बासनपीर जूनी के सत्य एवं जैसाने की अपनायत की पड़ताल -  पिछले कुछ दिनों से जैसलमेर के बासन पीर इलाके का मामला सामने रहा है। कहा जा रहा है कि पूर्व राज परिवार की जमीन पर बासनपीर गांव के लोगों द्वारा कब्जा किया जा रहा है। नजदीक से पड़ताल करने पर हकीकत कुछ ओर निकली। जिसके कुछ तथ्य निम्नानुसार हैं - रियासत काल में सन 1662 में बीकानेर और जैसलमेर रियासत के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में जैसलमेर सेना के दो वीर योद्धा सोढ़ा जी और पालीवाल जी शहीद हो गए। युद्ध के बाद बासन पीर (युद्ध स्थल) तालाब की तलहटी पर शहीदों की स्मृति में छतरियां बनवाई हैं। जैसलमेर के चारों और 120 किलोमीटर इलाके में 84 गांव पालीवाल ब्राह्मणों ने बसाए जिनमें से एक गांव बासनपीर जूनी भी था। पालीवाल ब्राह्मण समृद्ध किसान और व्यापारी थे, रियासत के दीवान सालिम सिंह से अनबन के कारण सन् 1825 में सभी गांव खाली करने को मजबूर हो गए। पालीवाल...

✍️कायम वंश और कायमखानी सिलसिला सामान्य इतिहास की टूटी कड़ियाँ

कायमखानी समाज कुछ कही कुछ अनकही👇 - शमशेर भालू खां  अनुक्रमणिका -  01. राजपूत समाज एवं चौहान वंश सामान्य परिचय 02. कायम वंश और कायमखानी 03. कायमखानी कौन एक बहस 04. पुस्तक समीक्षा - कायम रासो  05. कायम वंश गोत्र एवं रियासतें 06. चायल वंश रियासतें एवं गोत्र 07. जोईया वंश स्थापना एवं इतिहास 08. मोयल वंश का इतिहास 09. खोखर वंश का परिचय 10. टाक वंश का इतिहास एवं परिचय  11. नारू वंश का इतिहास 12 जाटू तंवर वंश का इतिहास 13. 14.भाटी वंश का इतिहास 15 सरखेल वंश का इतिहास  16. सर्वा वंश का इतिहास 17. बेहलीम वंश का इतिहास  18. चावड़ा वंश का इतिहास 19. राठौड़ वंश का इतिहास  20. चौहान वंश का इतिहास  21. कायमखानी समाज वर्तमान स्थिति 22. आभार, संदर्भ एवं स्त्रोत कायम वंश और कायमखानी समाज टूटी हुई कड़ियां दादा नवाब (वली अल्लाह) हजरत कायम खां  साहब   नारनौल का कायमखानीयों का महल     नारनौल में कायमखानियों का किला मकबरा नवाब कायम खा साहब हांसी,हरियाणा   ...

01. मीरातुल जिगर (दीवान ए जिगर) (हिंदी/उर्दू गज़ल संग्रह 01) 75 गजल पूर्ण

शायर का ताअरूफ -  नाम - शमशेर खान  उपनाम - प्रेम, शमशेर गांधी तखल्लुस - पहले परवाना नाम से लिखना शुरू किया। पत्नी अख्तर बानो (सदफ) के सुझाव पर जिगर चूरूवी नाम से लिखना शुरू किया। पैदाइश - 18.04.1978 सहजूसर, चूरू (राजस्थान) पिता का नाम - श्री भालू खां (पूर्व विधायक (1980 से 1985), चूरू। माता का नाम - सलामन बानो (गृहणी) ताअलिम -  1. रामावि सहजूसर में पहली कक्षा में दाखिला 10.07.1984 से 1993 में मेट्रिक तक। 2. राउमावि बागला, चूरू से हेयर सेकंडरी 1993 से 1995 तक 3. राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय भाषाई अल्पसंख्यक अजमेर से BSTC, 1995 से 1997 4. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में स्नातक 1998 से 2001 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय, अजमेर) 5. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में अधिस्नातक 2004 से 2005 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय बीकानेर से गोल्ड मेडलिस्ट - 2005 उर्दू साहित्य) 6. कश्मीर विश्वविद्याल, श्रीनगर के नंद ऋषि शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय से B.Ed.- (2007 - 8) 7. इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय से विशेष आवश्य...

👤 शमशेर भालू खान

📍 कायमखानी बस्ती सहजुसर ,चूरू राजस्थान Pin :-331001

💬 Chat on WhatsApp

© 2026 ShamsherBhaluKhan.com | Designed & Managed by Shamsherbhalukhan