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लघु कथा -बदलाव

लघु कथा - बदलाव - 
सुबह सात बजे का समय, शिक्षक शेर खां पसीना - पसीना स्कूल में प्रवेश करते हैं।
अभी प्रार्थना के समय में आधा घंटा शेष है। वो इधर - उधर घूम कर स्कूल भवन को देखते हैं। आजादी के बाद इस तरह का स्कूल जहां ना पीने के पानी की सुविधा, ना सही से बने कमरे।
शेर खां ने बच्चों के हाजरी रजिस्टर चैक किए तो कुल नामांकन 18 जबकि गांव में सौ से अधिक घर आबाद हैं। उसने पूर्व में कार्यरत अध्यापक से कम नामांकन का कारण जाना तो अध्यापक ने ज्यादा ध्यान नहीं दे कर आराम से नौकरी करने की सलाह दे डाली। अध्यापक की कही यह बात कि "यह लोग पढ़ लिख जाएंगे तो अपनी गाय भैंस कौन कराएगा!" उसके कानों में आज भी गूंजती रहती है।
पहले दिन स्कूल में ज्वाइनिंग थोड़ी देर हो गई, इस कारण वो पूरी जानकारी नहीं ली जा सकी।
हुआ यह कि शेर खां सुंदरपुरा गांव में पदस्थापित थे, सरकार बदली और उन्हें ब्लॉक के काला पानी की सजा के रूप में कठौड़ी गांव में भेज दिया गया।
इस गांव में ना सड़क, फोन, ना चिकित्सा सुविधा।
जिंदादिल शेर खां ने इस गांव में प्रवेश से पहले ही कुछ नया करने का मन बना लिया था।
पैदल छः किलोमीटर चल कर आने के बाद जोर की प्यास लगी, इतने में किसी एक बच्चे ने स्कूल में प्रार्थना की घंटी बजा दी।
शेर खां ने प्रार्थना की कतार में आगे ही आगे खड़ी लड़की कमला से पानी लाने को कहा, लड़की ने सर नीचा कर लिया, शेर खां ने फिर जोर दे कर कहा, पानी लाओ! पर कमला नहीं हिली। 
दूसरी कतार में खड़ा लड़का उठा, पानी का लौटा भर कर लाया।
शेर खां समझ गया, लड़की अनुसूचित जाति से संबंधित है जिसे यहां के बर्तनों को छूने की मनाही है।
पूरा दिन उसने बिना पानी पिए निकाल दिया। छुट्टी हुई शेर खां घर आया और अपनी पत्नी को पूरी कहानी बताई।
उसने कहा अब आप उस बच्ची के हाथ का ही पानी पीएंगे। 
जिस माहौल से शेर खां आता है वहां इस तरह की कोई बात नहीं होती। वह स्कूल पहुंचा, कमला स्कूल आ चुकी थी, उसने कमला से पीछे बने कुंड से पानी का कलशा भरने का कहते हुए जबरदस्ती कुंड तक ले गया। लड़की किसी हाल में कुंड पर चढ़ने के लिए राजी नहीं, जैसे - तैसे वो कुंड पर चढ़ी, कलशा भरा और घड़ूंचि पर रख दिया। शेर खां ने पानी का लौटा भर कर लाने को कहा, कुछ सकुचाते हुए कमला पानी का लौटा भर लाई।
पूरी स्कूल में खुसर - फुसर शुरू हो गई। आधे से ज्यादा बच्चे कलश से पानी नहीं पी रहे थे।
आधी छुट्टी हुई, कुछ बच्चे खाना खाने घर गए और आते हुए पांच - चार अभिभावकों को ले आए। गुरु जी आपने पाप कर दिया, एक अभिभावक ने कहा।
क्या हुआ साहब, आइए बैठ कर बताइए, कमला पानी लाना बेटा, कहते हुए शेर खां ने मामला समझने की कोशिश की, हालांकि वो पूरी बात समझ चुका था।
गुरुजी, आपने भांभी समाज की लड़की को कुंड पर चढ़ा दिया, कलश और लौटे के हाथ लगवा दिया, इस से हमारे बच्चों का धर्म भ्रष्ट हो गया।
अध्यापक ने समझाते हुए कहा, साहब यह स्कूल है, यहां छुआछूत नहीं चल सकती, हां! जो बच्चा यह पानी नहीं पीना चाहे तो घर से पानी ले आए, यहां सब विद्यार्थी समान हैं। थोड़ी बहुत कहा सुनी के बाद अध्यापक के समझाने पर अभिभावक चले गए।
स्कूल में मध्याह्न भोजन बनता था, इसमें जातिवार थालियां अलग - अलग बांटी हुई थीं। शेर खां ने सब थालियां एक जगह कर रखवा दीं। पांच - चार दिन खाना नहीं खाने, घर से पानी लाने के बाद सभी बच्चे सामान्य हो गए। भेदभाव की भावना को कम से कम स्कूल में तिलांजलि दे दी गई।
अब तीसरा काम करना था, हुआ यह कि गांव में एक आदमी के घर टावर वाला फोन लगा था, वो माइक से आवाज दे कर जिसका फोन होता बुलाता (किसी - किसी को जातीय भावना के कारण नहीं भी बुलाता।) अब शेर खां की गांव के दस - बीस लोगों से अच्छी पटने लगी। वो यह समस्या ले कर उसके पास आए। शेर खां के घर पर WLL वाला फोन था, उसने वो फोन गांव के गुवाड़ में लगवा दिया, लोगों को राहत मिली।
शेर खां चलता पुर्जा आदमी था, उसने संपर्क कर छात्र संख्या 18 से 59 कर दी। इस गांव से दूसरे गांव जाने वाले सब विद्यार्थियों को स्कूल से जोड़ा। स्कूल छोड़ चुके बच्चों के अभिभावकों को समझा कर उन्हें पुनः स्कूल में प्रवेश दिलवाया।
उसने कार्यालय से संपर्क कर स्कूल को उच्च प्राथमिक विद्यालय के रूप में क्रमोन्नत करवाने का प्रस्ताव भिजवाया। साथ ही दो कमरे, पानी की टंकी, टायलेट, और रसोई घर का प्रस्ताव भिजवाया। स्थानीय विधायक से गांव के लोगों की अच्छी बनती थी, शेर खां ने सड़क का प्रस्ताव बनवा कर गांव वालों को विधायक के पास भेजा। स्कूल में मूलभूत सुविधाओं हेतु ऑफिस से 50000 रुपए अतिरिक्त स्वीकृत करवा कर सामग्री खरीदी।
स्कूल खाते में पड़े पैसों से बाहर का चबूतरा बड़ा करवाया।
ईश्वर की कृपा से सभी काम दो महीनों में स्वीकृत हो गए। गांव के भामाशाहों से सहयोग ले कर बिजली कनेक्शन, साइन बोर्ड, नए बर्तन आदि खरीदे।
वह स्कूल में ही रहता, गांव वाले भोजन की व्यवस्था करते। स्कूल में उसने सैकड़ों पौधे लगवाए और शानदार लुक दिया।
युवाओं के लिए बॉलीवॉल का मैदान बनवाया, छोटी - मोटी जुकाम बुखार की दवा रखता और निशुल्क सेवा करता। गांव वाले उसे बहुत सम्मान देते।
अब शेर खां को स्कूल में तीन वर्ष हो चुके थे। लंबा रुकना उसकी फितरत में नहीं था सो अपना चयन कार्यालय संकुल संदर्भ केंद्र प्रभारी के रूप में करवा कर विदा ली।
आज भी गांव शेर खां को उसी मान सम्मान से याद करता है।
#जिगर_चूरूवी (शमशेर भालू खां)

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