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नशा और प्रेम

लघुकथा - नशा और प्रेम
बल सुधार गृह के कोने में बैठा प्रेम समय के बहते समंदर में गोते लगा रहा था।
भोलू और कांता के विवाह को काफी समय बीत गया। देवताओं के आशीर्वाद से पूरे दस वर्ष बाद बेटा हुआ, नाम रखा प्रेम। इकलौते बेटे प्रेम को दोनों ने बड़े लाड़ - प्यार से पालना शुरू किया। प्रेम धीरे - धीरे बड़ा हो रहा था। इस साल अच्छी फसल हुई तो भोलू ने बड़े चाव से प्रेम को तीसरी कक्षा पास करने पर सुंदर सी साईकिल ला कर दी। 
प्रेम बड़े रोब से साईकिल चला कर स्कूल जाता, स्कूल से आ कर खेत जाता।
जब कभी साईकिल पेंचर होती तो नुक्कड़ की राज साईकिल सेंटर पर चला जाता। धीरे - धीरे राज भाई से प्रेम की दोस्ती हो गई।
साईकिल पेंचर निकालने के बाद खाली ट्यूब से प्रेम खेलता रहता। उसे सोल्यूशन की महक अच्छी लगने लगी। 
अब प्रेम राज की खाली सॉल्यूशन ट्यूब ले कर बस्ते में रख लेता, जब समय मिलता ट्यूब निकालता और सूंघ लेता। 
चार - पांच महीने बाद वह राज से खुद ही पंचर निकालने के नाम पर भरी हुई ट्यूब ले जाता और खूब मजे से उसे सूंघता।
ट्यूब सूंघने के बाद प्रेम मस्त हो जाता। अब वह ट्यूब का सॉल्यूशन अपने रुमाल पर लगा कर सूंघने लगा। इस लत के कारण वह ज्यादातर छत पर या बाहर एकांत में बैठ कर सॉल्यूशन के मजे लेने लगा।
भोलू और कांता को प्रेम का यह एकाकी व्यवहार अखरने लगा। प्रेम से पूछने पर वह पढ़ाई की बात कह कर बात टाल देता। अब उसे भूख भी कम लगने लगी।
प्रेम रोज एक ट्यूब खत्म करने लगा। मक्कड़ साहब सोल्यूशन की दुकान वाला उसकी इस लत के कारण बढ़ी कीमत पर ट्यूब देने लगा। 
घर से मिलने वाला जेब खर्च कम पड़ने पर वह छोटी -मोटी चीजें चुरा कर कबाड़ी को ओने - पौने दाम में बेचकर सॉल्यूशन खरीदता। 
उसे ना खाने की सुध ना घर की चिंता। 
पढ़ाई का तो नाम ही नहीं सुहाता।
अब वह प्रतिदिन दस - बारह ट्यूब सूंघने लगा। भोलू और कांता को पता चल चुका था। वो उसकी इस लत से बहुत  दुखी थे। कल का प्यारा सा प्रेम अब सुखा कलूटा कांटा बन गया। अकेलेपन के लिए वह निकट के कब्रिस्तान में जा कर घंटों बैठने लगा।
एक दिन सॉल्यूशन खरीदने के पैसे नहीं होने पर उसने पिताजी का रेडियो चुरा लिया। 
खेत जाते समय पिताजी ने रेडियो संभाला, पर वह तो कबाड़ी की दुकान पर पहुंच चुका था। 
शाम को घर आने पर मां ने खूब धुलाई की,  गुस्से में वह घर से निकल गया। खेत से आ रहे भोलू ने प्रेम को पुकारा, पर नशे में धुत प्रेम ने  अनसुना कर दिया,  भोलू अब थोड़ा जोर से बोला, "प्रेम कहां जा रहे हो, घर चलो, खाना खा कर पढ़ाई करो।" पर प्रेम के दिमाग में तो सॉल्यूशन चढ़ा था, पिता पीछे दौड़ा, बेटा आगे भागा, भोलू ने प्रेम को पीछे से पकड़ने की कोशिश की, प्रेम के हाथ में पत्थर आया, धम से दे मारा उनके सर पर। पत्थर से सर फटा, भोलू धड़ाम से गिरा, और कभी नहीं उठा।
पिता की हत्या के आरोप में बेटा जेल में चला गया। नाबालिग होने के कारण उसे बाल सुधार गृह भेज दिया गया।
अपने किए पर पछता रहा प्रेम आंसुओं की धारा में बह रहा है।
शिक्षा - नशा रिश्तों की डोर की कैंची है।
लेखक - जिगर चुरूवी (शमशेर भालू खां) 

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