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अख्तर खान अकेला कोटा की कलम

शमशेरभालु खान गांधी

भाई शमशेर खान भालू उर्फ़ गाँधी को सियासत विरासत में मिली, लेकिन वोह सियासत जोड़तोड़ ,मौक़ापरस्ती, उर्दू ज़ुबान,मदरसों की उपेक्षा की नहीं उनकी परवरिश गांधीवादी माहौल में रही। एक ईमानदाराना गांधी वादी संघर्ष में रही और यही वजह है के आज वोह उर्दू ,मदरसों के लिए, एक संघर्ष ,एक आवाज़ बनकर उभरे है।
अल्लाह से दुआ है कि इस लड़ाई को कामयाब करे।
उनके उठाये हुए मुद्दों के अलावा भी जो मुद्दे वो भूल गए है ,उन पर संयुक्त विचार कर ,जल्द ही,गाँधीवादी विचारधारा को पुनर्जीवित करने के लिए , ईमानदाराना फैसले भी ले , उन्हें तुरंत लागू भी करे।
राजस्थान में उर्दू ,उर्दू से जुड़े  लोगों के हक़, इन्साफ के लिए,उर्दू तहज़ीब के दायरे में खुद को तकलीफ देकर गाँधीवादी मुख्यमंत्री के राजस्थान में गांधीवादी तरीके से आंदोलन कर रहे भाई शमशेर खान भालू को दिल से सलाम सेल्यूट।
सेल्यूट इसलिए के अब तक जो भी तंज़ीमें जो भी तहरीकें जो भी संगठन आंदोलन के लिए आये वोह सिमट कर चले भी गये लेकिन उर्दू तहज़ीब के साथ बलात्कार कहो या फिर कहो पक्षपात या फिर कहो ज़ुल्म ज़्यादती वादा खिलाफी सब होते रहे और आंदोलन ठंडे बसते में जाते रहे ।
मैं खुद शमेशर खान भालू के पहले आन्दोलन के वक़्त अचानक आंदोलन खत्म करने के खिलाफ था में शमेशर खान भालू के इस तरह से बिना मुख्यमंत्री के साथ वार्ता में शामिल हुए सिर्फ वायदे के आधार पर चाहे वोह टूटी फूटी भाषा में लिखित में रहा हो,आन्दोलन खत्म करने के खिलाफ था मेने सबसे पहले शमशेर खान भालू के खिलाफ मोर्चा खोला था।
उनकी उनके समर्थकों की खुली आलोचना की थी क्योंकि अब तक के मेरे अनुभव में हमारे उर्दू , उर्दू तहज़ीब उर्दू को  जानने मानने वालों के साथ यही सब कुछ होता रहा है।
इंसाफ के परचम को बुलंद करने वाले लोगों को या तो धमकाया जाता है या खरीदा जाता है या प्रलोभन दिया जाता है वोटों का वास्ता दिया जाता है और बस एक ड्रामा होता है और आंदोलन खत्म हो जाता है।
उस वक़्त भी मेरे अनुभव के आधार पर मेरे ज़हन में वही पुरानी तस्वीरें थी और मेरे दिल दिमाग में शमशेर भाई भालू के यूँ पीक पर पहुंचने के बाद आंदोलन खत्म करने के खिलाफ गुस्सा था लेकिन वाह शमशेर भाई सेल्यूट है तुम्हे तुम्हारी ईमानदारी ईमानदाराना संघर्ष को जिसे फिर से तुमने बिना किसी लोभ लालच प्रलोभन के टारगेट के साथ खड़ा कर दिया ।
पीछ लग्गू हों या फिर हमारे और सरकार के बीच के डीलर उनकी ज़ुबान पर चाहे ताले लगे हों लेकिन मजबूरी में उन्हें समर्थन का पत्र मुख्यमंत्री साहिब के नाम लिखना पढ़ रहा है।
वह पत्र मुख्यमंत्री महोदय के पास पहुंचे ना पहुंचे  लेकिन यह लोग ,खुद की खीज मिटाने  खुद को पारसा साबित करने हमारे साथ हमारी  उर्दू हमारी तहज़ीब हमारे दस हज़ार से भी ज़्यादा मदरसा परिवारों के साथ बताने की कोशिश में इनके  लिखे गए पत्र को खुद के सोशल मीडिया एकाउंट पर सार्वजनिक कर रहे है कुछ ऐसे भी है जो उर्दू तहज़ीब के अलमबरदारों से जुड़े सभी लोगों के पुरे हिंदुस्तान के ज़िम्मेदार है लेकिन वोह राजस्थान में आये उन्होंने मुख्यमंत्री महोदय से मुलाक़ात की, इस मामले में कोई बात नहीं की जब दबाव बना तो, राहुल गाँधी ,सोनिया गांधी, अजय माकन से इस मामले में बात करने की सोशल मीडिया प्रचार जारी किया।
खेर एक तरफ सियासत है एक तरफ उर्दू के दुश्मन एक तरफ उर्दू तहज़ीब को मानने वाले समाज को गुमराह कर ठगने वाले है उनसे नफरत करने वाले है उनसे दोहरा व्यवहार करने वाले है उनकी उपेक्षा करने वाले है तो दूसरी तरफ कुछ तंज़ीमों के साथ अब खुद अकेले शमशेर खान ।
कड़ाके की सर्दी  ठिठुरती ठंड बरसते पानी में उर्दू,मदरसा पैराटीचर्स ,मदरसों, के संघर्ष के लिए ज़िंदाबाद होकर खड़े है।
यक़ीनन उन्हें प्रलोभन दिए होंगे यक़ीनन उन्हें धमकियां दी होंगी लेकिन वो अपनी मांग जो वाजिब भी है और हक़ भी है उसके पूरे होने तक खड़े है अल्लाह उन्हें जल्दी कामयाबी दे।
 फिर से कोई दलाल फिर से कोई गुमराह करने वाला भीतरघाती हमारे अपनों में से गद्दार कामयाब ना हो जाए यही दुआ है ,,शमशेर भालू ने आज से एक साल पहले , मुझे फोन करके उर्दू पैराटीचर्स ,मदरसों को इंसाफ दिलाने के लिए मुख्यमंत्री को पत्र लिखने के लिए विनम्र गाँधीवादी तहज़ीब से गुज़ारिश की थी। 
मेने नईमुद्दीन गुड्डू साहब व पंकज मेहता सहित कुछ प्रतिनिधियों से पत्र भी लिखवाये उस वक़्त और दूसरों की तरह कुछ क़दम आगे चलकर चुप बैठ जाने वालों में से में इन्हे भी वैसा ही एक समझने की गुस्ताखी कर रहा था।
में समझ रहा था के तहरीक ऐ उर्दू राजस्थान की जो हवा है जो कोशिशें है स्टाफिंग पैटर्न का जो दबाव है उसे खत्म करने के लिए यह एक नया कुछ बिचलियों का पैतरा है।
लेकिन में गलत था मुझे अफ़सोस है कि मेने ठाकुर शमशेर खान भालू गांधी को गलत समझा था लेकिन शाबाश शमेशर भाई तुम तो सो तक हीरा निकले मुजाहिद निकले तुम जो कहा वोह करने वाले निकले तुम ईमानदाराना आंदोलन मामले में चौबीस कैरेट सोना साबित हुए।
में सार्जनिक रूप से तात्कालिक माहौल में जो सोच मेरी नेगेटिव बनी थी उसके लिए दिल से तहे दिल से झुक कर माफ़ी मांगता हूँ आपको सलाम करता हूँ  व अल्लाह से दुआ है कि शमशेर भाई का यह आंदोलन जल्दी से जल्दी कामयाब हो।
अब तो दिल में बगावत होती है ,के जो होगा देखा जाएगा हम भी शमशेर साहब के साथ पार्टी का झोली झंडा छोड़कर तय्यार हो जाएँ और हम इसके लिए , शाना बा शाना मिलाकर आखरी दम तक किसी भी तरह की क़ीमत चुका कर भी संघर्ष के लिए तय्यार हैं।
ज़रा सोचो गरीबों के हमदर्द रहे जांबाज़ संघर्ष शील सिपाही चूरू के पूर्व विधायक स्वर्गीय भालू खान के सुपुत्र जिनके पास नौकरी है ऐशो आराम के साधन है  वोह एक लंगोटी के सहारे , एक गांधीवादी टोपी के सहारे सिद्धांतों के तहत गाँधीवादी विचार के साथ क्यों संघर्ष कर रहे है।
वायदा खिलाफी के बाद तो आक्रोश होना चाहिए लेकिन वोह वायदा याद दिलाने के लिए वही उर्दू की तहज़ीब वही मोहब्बत का इस्लामिक पैगाम और अपने हक़ संघर्ष के लिए वही इंसाफ के तरीके से ईमानदाराना जंग लड़ रहे है।
तेज़ धुप में ठिठुरती ठंड में बरसात में सर्दी में यह शमशेर भाई मेरी इस तहज़ीब उर्दू के लिए अनशन पर बैठे है।
शमशेर भाई जो ठाकुर भी है भालू भी है खान भी हैं जिनकी विरासत में ईमानदाराना सियासत भी है जो उर्दू के गुरु जी भी है ,और इन  शमेशर की शमशीर बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ के साथ साथ ज़ालिम ,नाइंसाफी के खिलाफ गाँधीवादी भी है। 18 अप्रेल 1975 में जन्में इस लाल ने सियासत की विरासत को घुड़की दी हालातों की वजह से वोह सिर्फ दलित पीड़ित शोषित निर्धन लोगों में शैक्षणिक जागरूकता उनके साथ हो रही ना इंसाफ़ी के खिलाफ संघर्ष की आवाज़ बनकर रहे।
 ,, उन्होंने एकसंघर्षशील युवा नेतृत्व की तरह , ईमानदारी से छात्रों के लिए संघर्ष किया, और प्रतिभावान छात्र की तरह अध्ययन भी किया यही वजह रही के, भाई शमशेर खान भालू को,2005 में उर्दू विषय में , सर्वाधिक अंक लाने पर ,गोल्ड मेडल के साथ बेहिसाब पुरस्कारों से नवाज़ा गया भाई शमशेर की परवरिश उनके वालिद मरहूम भालू खान के विधायक कार्यकाल और सियासी व्यवस्थाओं में हुई उन्होंने गाँधीवादी सियासत उन्ही से सीखी उनकी माँ सलामन बानो ने उन्हें भटके हुए लोगों को राह पर लाना ईमानदारी से पीड़ित लोगों के इंसाफ के लिए संघर्ष करना सिखाया , जबकि 20 अक्टूबर 1996 को  उनका निकाह बहन सदफ शमशेर गांधी से होने के बाद वोह उनकी शरीक ऐ हयात के साथ साथ ज़िंदगी की मार्गदर्शक बनीं।
उन्होंने भी भाई शमशेर का हर संघर्ष में कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया भाई शमशेर की बिटिया अंजलि खान वकील बनकर इन्साफ की जंग में शामिल है जबकि रोज़ा खान व प्रेरणा खान अपने पिता दादा श्री के पद चिन्हों पर है। भाई शमशेर खान अपना जीवन अपना भविष्य दांव पर लगाकर सिर्फ  उर्दू तहज़ीब उर्दू जुबान उर्दू के हमदर्दों मदरसों पैराटीचर्स उस्तादों के लिए संघर्ष कर रहे है अनशन कर रहे है।
 उनकी सियासी चाहत नहीं अब वक़्त आ गया है उनके इस संघर्ष के बाद हमारे अपने वोटों से चुने नेताओं ने जब मांगों के समर्थन में दिखावे के तोर पर पत्र लिखना शुरू किये है सोशल मीडिया पर हमदर्दाना दिखावे की शुरुआत की है तो फिर हमें भी एकजुट होकर इस मामले में रोज़मर्रा एक पत्र मुख्यमंत्री को मुख्य सचिव को लिखने का अभियान चलाना चाहिए।
हर ज़िले हर कस्बे हर शहर में जिला कलेक्टर,उपखण्ड,अधिकारी तहसील स्तर पर  अब इस आवाज़ के हक़ में संघर्ष की आवाज़ अलग-अलग टोलियां बनाकर बुलंद करना चाहिए।
अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

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