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समाज अपराध व पुलिस

-: समाज अपराध और रक्षक :-
समाज:-
   समान मान्यता व धारणाओं के लोगों का समुह जो जन्म से मृत्यु तक किन्ही अलिखित नियमों का पालन करता है। समाज के अंग धर्म,जाति, उपजाति(गोत,गोत्र,नख) होते हैं। सभी लोगों का एक जैसा धर्म नहीं होता पर स्थानीय परम्परा व मान्यता समान होती हैं।
          अपराध:-
अपराध दो प्रकार के होते हैं
1) समाज के नियमों का उलंघन
2) देश के नियमों का उल्लंघन
यदि कोई व्यक्ति समाज के नियमों का पालन नहीं करता है तो समाज(बिरादरी) के लोग उक्त को नियमों की पालना के लिये शारीरिक दंड तो नहीं दे सकते पर समाज से बहिष्कार या जात बाहर कर देते है जिस का पुराना नाम हुक्का-पानी बन्द कर देना है। इस के अलावा सामाजिक तिरस्कार भी एक बड़ा साधन होता है जिस से लोगों पर नियंत्रण किया जाता है।
जो व्यक्ति सामाजिक नियमों का पालन नहीं करता है वो सामाजिक अपराधी की श्रेणी में आता है,ओर समाज के पास समुचित व्यवस्था इस प्रकार के कृत्यों को रोकने की है। इन में अपराधी के बचने की संभावना न्यून होती है ओर फैसला भी तुरंत हो जाता है। अपराध नियंत्रण की यह व्यवस्था अरब देशों व आदिवासी समुदाय में आज भी प्रचलित है।
  राष्ट्र या देश की व्यवस्थाओं के सही संचालन के लिए बनाये गए नियमों के उल्लंघन करने का अपराध जटिल और पेचीदा और लिखित कानून के दायरे में आते हैं जिन का चिह्नीकरण,पंजीयन, रोकथाम एवं निषेध की एक प्रक्रिया के माध्यम से होता है। 
   आजकल सभ्य समाज मे पुरानी व्यवस्था के स्थान पर यही व्यवस्था काम मे ली जाती है। जिस की महत्वपूर्ण जिमेदारी सरकार और उस के आंतरिक सुरक्षा विभाग (पुलिस) की है।
पुलिस की अपराध नियंत्रण प्रणाली :-
    समाज मे व्यक्ति रहते है जो एक जैसी सोच समझ के नहीं हो सकते। एक ही स्थान पर रहने वाले व्यक्तियों का व्यवहार भिन्न-भिन्न होता है। और यहीं से शुरू होती है असामाजिकता। इस पर नियंत्रण व रोकथाम के लिये पुलिस का काम भी इसी समाज मे छुपे विपरीत व्यवहार के लोगो की पहचान कर उन को सही सजा दिलवाने का होता है।
   समाज का पुलिस के प्रति कर्तव्य:-
  हमे असामाजिक व्यक्तियों की संपूर्ण सूचना पुलिस को देनी चाहिए और सही दिशा में उन का सहयोग करना चाहिये पर क्या हम ऐसा करते हैं यह सोचने लायक बहस हो सकती है जिस के बारे में आईन्दा लिखना बेहतर रहेगा। फिलहाल हम सकारात्मक स्तर पर सोच रख कर कह सकते है कि हम जो भी प्रक्रिया है उस के अधीन सामाजिक व्यवहार को बनाए रखने में पुलिस की मदद करें।
महत्वपूर्ण बात क्या पुलिस स्वतन्त्रता पूर्वक बिना भेदभाव व द्वेष,लोभ या लालच के अपना करती है। 
  इस सवाल के जवाब में सभ्य/असभ्य समाज का प्रतिबिम्ब उभर कर सामने आता है। आप मैं और हम इस पर बहस कर सकते हैं ।
  कुछ उदाहरण
हम जानते हैं एक बुराई का आधार 100 जुर्म हैं और एक जुर्म को रोकने से 100 अपराध रुक सकते है।
बलात्कार की घटनाओं पर गौर करेंगे तो 99% बलात्कारी शराब के नशे में पाये जाते हैं और इस हक़ीक़त से इन्कार नहीं किया जा सकता कि शराब का कारोबार विधि सम्मत दुकान(ठेकों) के स्थान पर गैर कानूनी रूप से ज्यादा फल-फूल रहा है जिस के लिये किये गए सर्वे के अनुसार 90% पुलिस जिम्मेदार है। जिस का काम अपराध की रोकथाम था वो अपराधियों के साथ मिलकर इस काम को बख़ूबी अंजाम दे रही है और मेरी मान्यता के अनुसार यहां पर प्रांरम्भिक अवस्था का मुज़रिम पैदा हो जाता है।
एक क्षेत्र में मेरे स्वयं द्वारा की गई तफ्तीश के अनुसार 1 सरकारी नियमों के अनुसार ठेका स्वीकृत है पर उसी ठेके की 15 से 20 ब्रांच खुले आम संचालित की जा रही हैं पुलिस की नाक के नीचे। उन से इस के संचालन की प्रक्रिया पूछी जाने पर बताया मुख्य थाने पर 15000 मासिक ओर चौकी पर 5000 मासिक हर महीने ईमानदारी से पहुँचा दिया जाता है जिस के बदले में या तो वो आते नहीं और शिकायत या दूसरे कारण से आते हैं तो किसी माध्यम से   पहले ही सूचना पहुंचा देते हैं कि आज इस समय लगभग हम आएंगे सम्भल कर रहना। बड़ी चलाकि के साथ शिकायत कर्ता/सिस्टम को धत्ता बता दिया जाता है। 
  इसी तरह किसी हत्या का जघन्य अपराध होने पर भी 10 हत्यारों में से 7-8 के नाम बड़ी आसानी से सुविधा शुल्क ले कर निकालना किसी से छुपा नहीं है। ओर fir/तफ्तीश के भारी भरकम शब्दों के जाल में उलझा कर शेष को किस तरह आज़ाद किया जाता है ये भी हम भली-भांति जानते हैं।  अपराधी के विरुद्ध कमज़ोर वर्ग का अभियोजन या तो लिखा ही नहीं जाता है और लिख भी दिया जाए तो इस तरह तोड़-मरोड़ कर लिखा जाता है कि न्याय की आशा शून्य के समान रहती है।
           पुलिस के बाद न्याय की रक्षा की जिम्मेदारी अदालत की होती है शब्द अदालत अरबी भाषा के अदल से बना है जिस का अर्थ होता है न्याय और अदालत का अर्थ न्याय का स्थान। 
क्या आजकल के अदालत के न्याय से ओर उस मे छुपे अन्याय या न्याय में देरी के कारण अपराध को बढावाव नहीं दे रहे हैं। देरी से किया गया न्याय भी अन्याय की श्रेणी में आता है जो आजकल का एक सभ्य प्रचलन बन गया है। दूसरे न्याय का आम आदमी की पहुंच से दूर होना किसी मासूम पर हुई ज़ोर-जबरदस्ती पुलिस ने दर्ज भी कर ली तो मुल्ज़िम को जमानत मिल जाती है और मुस्तगिश की जान माल को ख़तरा दबी ज़बान सभी स्वीकार कर लेंगे।
  आप के सामने उदाहरण है दिल्ली का निर्भया काण्ड जिसे 10 साल से ऊपर हो गये अपराध सिद्ध हो गया पर अपराधी अब भी जिंदा है और नागरिकों के खून पशीने की कमाई से दीये गये टेक्स को मज़े ले कर चर रहे हैं। कठुआ का 7 साल की बच्ची से बलात्कार और उस मे पुलिस की भूमिका ओर 4 साल बाद भी न्याय नहीं मिलना,ज़ालिमों का ज़िंदा होना,यूपी के विधायक-पूर्व सांसद का हस्पताल में होना व मज़लूम का ज़ेल में होना क्या न्याय कहा जा सकता है उस पर समाज के कुछ दूषित मानसिकता के लोगों का धर्म/जाति को खोजना दुर्दांत मानसिकता का परिचायक है।
         जाके पैर फ़टे ना बियाई।
         वो क्या जाने पीर पराई।।
हम प्रबुद्ध समाज का निर्माण कैसे कर सकते है हर संस्था,नागरिक,सरकार व कानून के पालक को कुछ देर अपने आप को उस मज़लूम के स्थान पर रख कर अपने कलेजे पर हाथ रख कर सोचना होगा कि ये अपराधी किसी जाति धर्म के नहीं इन की एक ही जात है सिर्फ और सिर्फ अपराधी/कातिल।
  आइये हम मिलकर नये सभ्य समाज के निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा कर आत्मा को संतोष प्रदान करें।
                    
            ठाकुर शमशेरभालु खान

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