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संतान ऐसी भी।


संतान ऐसी भी

घटना - 01
दिनांक 17.03.2024
मैं किसी काम से झुंझुनूं से चूरू आ रहा था। बिसाऊ स्टेंड पर मेरे प्राथमिक शिक्षक गन्ने की दुकान पर बैठे थे। गाड़ी रोक कर उनको लिफ्ट दी। प्रणाम करने के बाद गुरुजी के हाल चाल पूछे। एक गहरी सांस लेते हुए रुआंसे हो कर बोले अब तो बेटा मरने का इंतजार है बस इतना कहते ही झर झर आंसू बहने लगे।
गुरुजी 1984 में पहली कक्षा से मेरी स्कूल में थे और मैं उस समय सब से अधिक मार खाने वाला छात्र। गुरू जी गांव से साइकल पर चूरू से आते। उस समय लूना मोपेड चल चुकी थी। लीलाधर जी गुरुजी लूना ले कर आते थे। मैंने गुरुजी को धारी वाली शर्ट, सेंडल और कत्थई रंग की पेंट में ही देखा, शायद उनके पास दो ही जोड़ी कपड़े थे। बचत और रिटायरमेंट के पैसों से बड़ी संपत्ति बनाई।
मैने ढाढस बंधाते हुए गुरु जी से पूछा, क्या बात है ? कोई समस्या है जो मेरे लायक है तो बताइए। पानी पीते हुए बताने लगे, काफी समय से घर वाली बीमारी के कारण खाट पर है। एक बेटा दो बेटियां हैं। बेटा कहीं दूसरी जगह नौकरी करता है और बेटियां भी अपने ससुराल में व्यस्त हैं। बहु बेटे के साथ ही रहती है। मेरी 50 हजार से ज्यादा पेंशन आती है। शहर में करोड़ों की जायदाद है और गांव में भी करोड़ों की जायदाद है। हमारी सेवा करने वाला कोई नहीं। बहु खुद संभालती नहीं और दूसरा कोई सेवा कर भी दे बखेड़ा खड़ा कर देती है।  एक नौकरानी है जो खाना बनाती है। रात दिन की इस समस्या से अब थक गया हूं। भगवान उठा ले तो अच्छा हो। 
इतने में उनका घर आ गया और आशीर्वाद ले कर मैं आगे निकल पड़ा।

घटना - 02
दिनांक 25.04.2024
चूरु तहसील लगभग सभी गांवों में खुशी या गम के हालात में मैं शामिल होने का प्रयास करता हूं। इसी तरह गांवों शादी और गमी में शामिल होने हेतु गांव रायपुरिया पहुंचा। यहां मेघवाल समाज में एक महिला का देहांत हो गया। काफी देर बैठने के बाद दुर्गाराम जी ने बताया कि इनके घर वाली 15 साल से लकवाग्रस्त रहीं।  इनके दो बेटों ने पिता के सभी काम छुड़वा दिए कि आप सिर्फ मां की सेवा कीजिए। दोनों में से एक हमेशा घर पर रहता एक काम पर जाता। मां को नहलाने से लेकर सभी काम बेटा स्वयं करता। बीमारी और एक आदमी की कमाई के कारण गरीबी बढ़ती गई। फिर भी दोनों बेटे शांतिपूर्वक सेवा कार्य में लगे रहे। 
बेटों की शादी हो गई और ईश्वर की कृपा से दिनों बहु भी बेटी जैसी निकली। 
गांव के 20 लोग बैठे थे और बेटे बहु की प्रशंसा करते नहीं थक रहे थे।

दोनों ही घटनाओं ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया और यह कहावत चरितार्थ नजर आने लगी - 
पूत कपूत तो क्यों धन सींचे
पूत सपूत तो क्यों धन सींचे।

निशब्द
छोटी कहानी , बड़ा सन्देश
हैलो सर , मैं "वृद्धाश्रम" से बोल रहा हूँ , अखबार में आपके कुत्ते का फ़ोटो और विज्ञापन देखा कि वह लापता हो गया है , आपका कुत्ता हमारे वृद्धाश्रम में आ गया है और आपकी "माताजी" के साथ खेल रहा है ,
आप यहाँ आकर अपने "कुत्ते" को ले जा सकते हैं।

सत्य घटना
शमशेर भालू खान
(जिगर चुरूवी)

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