Skip to main content

सामाजिक सरोकार


रिश्तों का निभाव, लालची कौन।
समाज में आम धारणा बनी है कि लड़के वाले लालची होते हैं, वो दहेज मांगते हैं और दहेज नहीं देने पर लड़की पर अत्याचार करते हैं।
अनुभव और वर्तमान परिस्थितियों से सरोकार के आधार पर मैं कह सकता हूं कि लालची लड़के वाले नहीं अपितु लड़की वाले होते है। 
रिश्ता करने से पहले प्राथमिकता से जांच का ओर पूछताछ का विषय बड़ा घर/कोठी, सरकारी नौकरी, जमीन जायदाद, इकलौता लड़का,ननद न हो, आदि रहते हैं। इसके साथ ही रिश्ता करने से पहले लश्करों का आना जाना बड़ी संख्या में, खास तौर से औरतों का हुजूम देखने लायक होता है। पहले जिस तरह लड़की वाले को रिश्ते से पहले टोकनी की तरह मांजा जाता था आज कल लड़के वालों की जम कर धुलाई होती है। पूरी चमक दिखने के बाद ही हां होती है।
यह सामाजिक कुरीति धीरे से सामाजिक सच बनती जा रही ही और हम आहिस्ता से इसे स्वीकार कर रहे हैं।
पुराने समय में रिश्ते का आधार बड़ा परिवार, सामाजिक प्रतिष्ठा, चाल चलन, व्यक्तिगत संपर्क और आपसी सहयोग की जांच पड़ताल होता था। घर का कोई एक सदस्य लगभग पूरे परिवार का रिश्ता कर के परिवार में सिर्फ यह बताता था कि फलां लड़के/लड़की का रिश्ता मैं अमुक स्थान पर कर आया हूं।
पहले और अब के आधार पर आसानी से कहा जा सकता है  कि पहले रिश्ते होते थे अब सौदे होते हैं।
एक अन्य स्थिति भी बनती जा रही है कि आज लगभग माँ-बाप मे इतनी हिम्मत नही रही कि बच्चों के संबंध अपनी मर्जी से तय कर सकें।
लड़की को घर का काम कम से कम करना पड़े यह पहली सोच रहती है।
पहले रिश्ता जोड़ते समय लड़की वाले कहते थे कि हमारी बेटी घर के सारे काम जानती है और अब शान से कहते हैं हमने बेटी से कभी घर का काम नही करवाया है। 
रिश्तों का बाजार सजा है गाड़ियों की तरह, शायद और कोई नई गाड़ी लांच हो जाये। अंत में लड़के और लड़की की उम्र शादी की उम्र से कहीं दूर चली जाती है।
यहां से असामाजिक कामों की शुरुआत होती है जिसे आज के समाज ने सहर्ष स्वीकार कर लिया है।
शादी की उम्र निकल जाने के बाद की शादी में दांपत्य और सामाजिक जीवन का वो हिस्सा गायब हो जाता है जिस के लिए वास्तविक रूप से हम शादी करते हैं। 
दोनों के चेहरे की चमक और भावनात्मक लगाव गायब होते जा रहे हैं। बुटीक और ब्यूटीपार्लर सभ्यता का जन्म हो चुका है जिस से कोई बच नहीं सकता। रंग रोगन करवा कर हम ऊपरी चमक तो दिखा सकते हैं पर वास्तविक चमक खो देते हैं।
संक्रमण यहां खत्म नहीं होता, हर लड़की के पिता को सरकारी नौकर जमाई चाहिए। नौकरी वाले लड़के की बड़ी बोली लगती है। ज्यादातर लड़के वालों को भी नौकरी वाली बहू चाहिये।
शादी के बाद घर में खाना होटल या ऑनलाइन आयेगा। मां  बाप अपना खाना खुद बनाओ या वृद्धाश्रम जाओ।
सामाजिक ताने बाने के बिखरने और तनाव के कारण एक दूसरे से भावनात्मक जुड़ाव के स्थान पर मानसिक कब्जे की भावना का विकास हो रहा है जो असहनशीलता को बढ़ावा दे रहा है।
हमारे घरों मे आज कपड़े धोने के लिए मशीन, मसाला पीसने के लिये मिक्सी, पानी भरने के लिए मोटर, मनोरंजन के लिये टीवी, बात करने मोबाइल,वातानुकूल एसी और बहुत सुविधाएं मौजूद हैं  फिर भी जीवन में संतुष्टि नहीं।
पहले ये सब कोई सुविधा नहीं थी
मनोरंजन का साधन केवल परिवार और घर का काम था, इसलिए फालतू की बातें दिमाग मे नहीं आती थी न तलाक न फाँसी ना ही अन्य अलगाव।
आजकल दिन मे तीन बार मोबाइल पर लंबी बात, सीरियल देख कर, ब्यूटीपार्लर मे टाइम पास किया जा रहा है।
समय से शादी अति आवश्यक है।
इस स्थिति के अतिरेक का अंत हत्या, आत्महत्या या तलाक से होता है। 

घर परिवार झुकने से चलता है अकड़ने से नहीं। घर चलाने के लिए प्रेम की आवश्यता अत्यधिक है।

शमशेर भालू खान
9587243963

Comments

Popular posts from this blog

बासनपीर मामले की हकीकत

इस ब्लॉग और मेरी अन्य व्यक्ति से हुई बातचीत पर मंहत प्रतापपुरी का बयान जीवनपाल सिंह भाटी की आवाज में सत्य घटना सद्भावना रैली बासनपीर जूनी पूर्व मंत्री सालेह मुहम्मद का बयान बासनपीर जूनी के सत्य एवं जैसाने की अपनायत की पड़ताल -  पिछले कुछ दिनों से जैसलमेर के बासन पीर इलाके का मामला सामने रहा है। कहा जा रहा है कि पूर्व राज परिवार की जमीन पर बासनपीर गांव के लोगों द्वारा कब्जा किया जा रहा है। नजदीक से पड़ताल करने पर हकीकत कुछ ओर निकली। जिसके कुछ तथ्य निम्नानुसार हैं - रियासत काल में सन 1662 में बीकानेर और जैसलमेर रियासत के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में जैसलमेर सेना के दो वीर योद्धा सोढ़ा जी और पालीवाल जी शहीद हो गए। युद्ध के बाद बासन पीर (युद्ध स्थल) तालाब की तलहटी पर शहीदों की स्मृति में छतरियां बनवाई हैं। जैसलमेर के चारों और 120 किलोमीटर इलाके में 84 गांव पालीवाल ब्राह्मणों ने बसाए जिनमें से एक गांव बासनपीर जूनी भी था। पालीवाल ब्राह्मण समृद्ध किसान और व्यापारी थे, रियासत के दीवान सालिम सिंह से अनबन के कारण सन् 1825 में सभी गांव खाली करने को मजबूर हो गए। पालीवाल...

✍️कायम वंश और कायमखानी सिलसिला सामान्य इतिहास की टूटी कड़ियाँ

कायमखानी समाज कुछ कही कुछ अनकही👇 - शमशेर भालू खां  अनुक्रमणिका -  01. राजपूत समाज एवं चौहान वंश सामान्य परिचय 02. कायम वंश और कायमखानी 03. कायमखानी कौन एक बहस 04. पुस्तक समीक्षा - कायम रासो  05. कायम वंश गोत्र एवं रियासतें 06. चायल वंश रियासतें एवं गोत्र 07. जोईया वंश स्थापना एवं इतिहास 08. मोयल वंश का इतिहास 09. खोखर वंश का परिचय 10. टाक वंश का इतिहास एवं परिचय  11. नारू वंश का इतिहास 12 जाटू तंवर वंश का इतिहास 13. 14.भाटी वंश का इतिहास 15 सरखेल वंश का इतिहास  16. सर्वा वंश का इतिहास 17. बेहलीम वंश का इतिहास  18. चावड़ा वंश का इतिहास 19. राठौड़ वंश का इतिहास  20. चौहान वंश का इतिहास  21. कायमखानी समाज वर्तमान स्थिति 22. आभार, संदर्भ एवं स्त्रोत कायम वंश और कायमखानी समाज टूटी हुई कड़ियां दादा नवाब (वली अल्लाह) हजरत कायम खां  साहब   नारनौल का कायमखानीयों का महल     नारनौल में कायमखानियों का किला मकबरा नवाब कायम खा साहब हांसी,हरियाणा   ...

✅इस्लाम धर्म में व्यापार, ब्याज एवं मुनाफा

अरब व्यापारी हर देश में हर देश का हर एक सामान खरीदते और बेचते थे। अरब में व्यापार -  किसी भी क्षेत्र में सभी सामान उपलब्ध नहीं हो सकते। हर क्षेत्र का किसी ना किसी सामान के उत्पादन में विशेष स्थान होता है। उपलब्ध सामग्री का उत्पादन, भंडारण, परिवहन एवं विपणन ही व्यापार कहलाता है। क्षेत्र अनुसार इसके अलग - अलग नाम हो सकते हैं। इस्लाम धर्म का उदय अरब में हुआ। अरब क्षेत्र में तीन प्रकार की जनजातियां रहती थीं। बायदा - यमनी  अराबा - कहतानू (मिस्र) मुस्ता अराबा - अरबी (इस्माइली) यह जनजातियां खेती, व्यापार एवं अन्य कार्य करती थीं। हजारों सालों से इनका व्यापार रोम, चीन एवं अफ्रीका के देशों से रहा। अरब व्यापारी पश्चिम में अटलांटिक महासागर से लेकर पूर्व में अरब सागर तक, अरब प्रायद्वीप तक व्यापार करते थे। अरब नील से ह्यांग्हो तक व्यापार करते थे। अरब प्रायद्वीप कई व्यापार मार्गों के केंद्र में स्थित था, जिसमें दक्षिण पूर्व एशिया, भूमध्य सागर और मिस्र शामिल थे। यहां मुख्य सभ्यताएं रहीं -  - सुमेरियन एवं बेबीलोन  सभ्यता (मेसोपोटामिया/इराक) (दजला फरात) की सभ्यता। - फ...