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✅सुअर

सुअर (pig 🐷) -

सूअर के संबंध में लोकोक्तियां एवं मुहावरे - 
सुअर - गंदा, भद्दा व्यक्ति
सुअर की ओलाद - एक gaali

पर्यायवाची - 
सुकर, वाराह, 

नाम - 
सुअर - नर
सुरड़ी - मादा
पोर्क - सुअर का मांस
सुकरदंत - जंगली सुअर के बाहर निकले दांत।

सुअर का वैज्ञानिक वर्गीकरण - 
जगत - जंतु
संघ - रज्जुकी (कार्डेटा)
वर्ग - स्तनधारी (मेमलिया)
गण - आर्टियोडैकटिला
उपगण - सुइना
कुल - सूइडाए 
वंश - सुस
जाति - सुस डोमेस्टिकस
द्विपद नाम - Sus domesticus

सुअर पालन का इतिहास - 
मनुष्यों ने आज से लगभग 9,000 साल पहले अनातोलिया (आधुनिक तुर्की) और पूर्वी एशिया में जंगली सूअरों से सूअरों को पालतू बनाया। पालतू सूअर की उत्पत्ति यूरेशियन जंगली सूअर (सस स्क्रोफा) से हुई है।

शारीरिक बनावट - 
घरेलू पालतू सुअर लगभग काले या फेयर रंग के होते हैं। कान छोटे ऊपर की ओर लाल थूथन और लम्बा मुंह।
खुर वाले इन सूअरों की खाल बहुत मोटी होती है जिस पर कड़े बाल होते हैं। इनका थूथन आगे की ओऱ चपटा रहता है जिसके भीतर मुलायम हड्डी का एक चक्र होता है,  थूथन को कड़ा बनाए रखता है। इसी थूथन के सहारे ये जमीन खोद डालते हैं और भारी-भारी पत्थरों को आसानी से उलट देते हैं। जंगली सुअरों के कुकुरदंत आत्मरक्षा के हथियार हैं जो इतने मजबूत और तेज होते हैं कि घोड़े का पेट फाड़ डालते हैं। ऊपर के कुकुरदंत तो बाहर निकलकर ऊपर की ओर घूमे रहते हैं लेकिन नीचे के बड़े और सीधे रहते हैं। जब ये अपने जबड़ों को बंद करते हैं तो ये दोनों आपस में रगड़ खाकर हमेशा तेज और नुकीले बने रहते हैं। सूअरों के खुर चार हिस्सों में बँटे होते हैं जिनमें से आगे के दोनों खुर बड़े और पीछे के छोटे होते हैं। पीछे के दोनों खुर टाँगों के पीछे की ओर लटके रहते हैं। सुअर की घ्राण शक्ति बहुत तेज होती है जिनकी सहायता से जमीन के अंदर की स्वादिष्ट जड़ों का पता लगा लेते हैं। 

भोजन - 
जंगली सुअर मांसाहारी  होते हैं पर साथ ही कीड़े, छोटे जानवर, ट्टटी और गोबर भी चाव से खाते हैं। पालतू सुअर घास, कचरे एवं विष्ठा को लगन से खाते हैं।

पालतू सुअर की नस्लें - 
पालतू सूअर संसार के प्राय: सभी देशों में मिलते हैं। स्थान, जलवायु एवं अन्य कारणों से इनकी भिन्न-भिन्न देशों में भिन्न ,- भिन्न नस्ल पाई जाती हैं - 
1. बर्क शायर - 
इंग्लैंड में संकरित सूअर काले रंग के होते हैं जिनका चेहरा, पैर और दुम का सिरा सफेद रहता है। इनका माँस बहुत स्वादिष्ट होता है।
2. चेस्टर ह्वाइट - 
सफेद चेहरे गुलाबी खाल वाली अमेरिकी मूल की नस्ल का विकास अमरीका के चेस्टर काउन्टी में किया गया जो केवल अमरीका में ही मिलता है।
3. ड्यूराक - 
यह लाल रंग की अमेरिकी मूल की नस्ल है जो वजन में भारी और जल्द बढ़ने वाली नस्ल है।
4. हैंपशायर - 
अत्यधिक चर्बी वाले, काले रंग की इंग्लैंड मूल की नस्ल जिसके शरीर के चारों और एक सफेद पट्टी पड़ी रहती है। यह जल्दी बढ़ते हैं।
5. हियरफोर्ड - 
अमेरिकी मूल की इस नस्ल का रंग लाल,  सिर, कान, दुम का सिरा और शरीर का निचला भाग सफेद होता है। ये कद में अन्य सूअरों की अपेक्षा छोटे होते हैं और जल्द ही प्रौढ़ हो जाते हैं।
6. लैंडरेस - 
सफेद रंग के इन सूअर की नस्ल डेनमार्क, नार्वे, स्वीडन, जर्मनी और नीदरलैंड में मिलती हैं। इनका शरीर लंबा और चिकना होता है।
7. लार्ज ब्लैक - 
इंग्लैंड मूल के काले रंग के सुअर जिनके कान बड़े और आँखों के ऊपर तक झुके रहते हैं।
8. मैंगालिट्जा - 
बाल्कन मूल की नस्ल जो हंगरी, रूमानियाँ और यूगोस्लाविया में पाए जाते हैं। ये या तो घुर सफेद होते या इनके शरीर का ऊपरी भाग भूरापन लिए काला और नीचे का भाग सफेद होता है। इनको प्रौढ़ होने में लगभग दो वर्ष लग जाते हैं और इनकी मादा कम बच्चे जनती है।
8. पोलैंड चाइना - 
ओहायो प्रदेश की बट्लर और वारेन काउंटी मूल की नस्ल की तरह अमरीका में बड़ी संख्या में मिलते हैं। इनका रंग काला, टाँगें, चेहरा और दुम का सिरा सफेद होता है। इनका वजन चार क्विंटल तक हो जाता है। इनकी छोटी, मझोली और बड़ी तीन नस्लें पाई जाती हैं।
9. स्पाटेड पोलैंड चाइना -
अमरीकी मूल की यह नस्ल के सूअर पोलैंड एवं चाइना नस्ल जैसे ही होते हैं जिनमें यह अंतर है कि इन का शरीर सफेद चित्तियों से भरा रहता है।
10. टैम वर्थ - 
लाल रंग की इंग्लैंड की पुरानी नस्ल जिसका सर पतला और लंबोतरा, थूथन लंबे और कान खड़े, आगे की ओर झुके रहते हैं। यह सूअर इंग्लैंड के अलावा कैनाडा और यूनाइटेड स्टेट्स में फैले हुए हैं।
11. वैसेक्स सैडल बैक - 
काले रंग एवं मझोले कद, इंग्लैंड मूल की नस्ल जिनकी पीठ का कुछ भाग और अगली टाँगें सफेद होती हैं। ये अमरीका के हैंपशायर सूअरों से मिलते-जुलते हैं।
12. यार्कशायर -
इंग्लैंड मूल की नस्ल जो यूरोप, कैनाडा और यूनाइटेड स्टेट्स में मिलते हैं। इनका रंग सफेद होता है। मादा अधिक बच्चे जनती है। इनका मांस बहुत स्वादिष्ट होता है।

सूअरों में प्रजनन - 
मादा सुअर में एस्ट्रस चक्र औसतन 21 दिनों तक रहता है। गर्भावस्था के दौरान सूअर व्यवहारिक रूप से असंयमी होते हैं। समूह पालन, उच्च फ़ीड स्तर, विभाजित या आंशिक वीनिंग, सूअर के संपर्क के संयोजन की स्थितियों को छोड़कर स्तनपान के पहले 3 सप्ताह तक ओव्यूलेटरी एस्ट्रस नहीं होता है। आंशिक वीनिंग या गोनाडोट्रोपिन उपचार स्तनपान के दौरान एस्ट्रस को प्रेरित कर सकता है। अधिकांश सूअर वीनिंग के 3-7 दिन बाद रजस्वला दर्शाते हैं।
शुक्राणु कोशिकाएँ प्रजनन के 30 मिनट के भीतर डिंबवाहिनी तक पहुँच जाती हैं और अगले 2 घंटों में शुक्राणु भंडार का निर्माण जारी रखती हैं। निषेचन अण्डोत्सर्ग के 2-6 घंटों के भीतर होता है, बशर्ते शुक्राणु पहले से मौजूद हों। निषेचन दर सूअरों में 100% तक पहुँच जाती है; हालाँकि, भ्रूण मृत्यु दर 30%-40% तक होती है, जो कि सामान्य रूप से पैदा होने वाले कुल 12-16 सूअरों के आकार के लिए जिम्मेदार होती है। अण्डोत्सर्ग के 48-60 घंटों के बाद भ्रूण गर्भाशय में प्रवेश करते हैं। अण्डोत्सर्ग के 144 घंटों के बाद भ्रूण ज़ोना पेलुसिडा से निकलते हैं और ब्लास्टोसिस्ट बनाते हैं। मादा में गर्भावस्था की शारीरिक पहचान (एस्ट्राडियोल स्रावित करने वाले भ्रूण) गर्भधारण के 12-14वें दिन तक होती है, जिसमें भ्रूण का अंतर्गर्भाशयी प्रवास और वितरण होता है। भ्रूण का लगाव 13-14वें दिन से शुरू होता है, और 40वें दिन तक आरोपण पूरा हो जाता है; गर्भावस्था को जारी रखने के लिए इस समय कम से कम चार भ्रूण मौजूद होने चाहिए। कंकाल खनिजीकरण 35वें दिन तक विकसित हो जाता है, तथा भ्रूण 70-75वें दिन तक प्रतिरक्षात्मक रूप से सक्षम हो जाता है। 40वें दिन के बाद होने वाली भ्रूण मृत्यु के परिणामस्वरूप पहचाने जाने योग्य पिगलेट को निष्कासित या रोक दिया जा सकता है। इस बाँझ वातावरण में रखे गए मृत भ्रूण ममी बन जाते हैं तथा आमतौर पर प्रसव के समय बाहर निकाल दिए जाते हैं। औसत गर्भधारण अवधि 115 दिन होती है तथा बड़े बच्चों वाली सूअरों में यह अवधि कुछ कम होती है।
पहले 30 दिनों के दौरान भ्रूण के मारने की आशंका अधिक होती है। 16 दिनों की गर्भावस्था विशेष रूप से गर्मी के तनाव के प्रति संवेदनशील होती है। बाहरी जानवरों के संपर्क में आने से बचने से बीमारी का खतरा कम हो जाता है।
एक सुअर के आठ से अधिक (अधिकतम सोलह) बच्चे हो सकते हैं। यह बहुत जल्द बड़े होते हैं। जन्म के समय बच्चा गुलाबी रंग का होता है।

सुअर का धार्मिक महत्व - 
सूअर का धार्मिक महत्व अलग-अलग धर्मों में अलग-अलग है। कुछ धर्मों में इसे पवित्र माना जाता है, तो कहीं निषिद्ध।
आयरलैंड के ड्र्यूड्स के पुजारियों को 'सूअर' कहा जाता था। रोमन देवी डायना एवं मिश्र की देवी आइसिस  के लिए सूअर पवित्र जानवर था। यहूदी और इस्लाम धर्म में सूअर का मांस खाना वर्जित है। ईसाई धर्म में भी सूअर का मांस  एडवेंटिस्ट बाइबिल के कानून के अनुसार अशुद्ध है। इथियोपियाई एवं इरिट्रिया के रूढ़िवाद चर्च में सूअर का मांस खाने की अनुमति नहीं है। हिब्रू रूट्स मूवमेंट के अनुयायी भी सूअर का मांस नहीं खाते हैं।

इस्लाम एवं यहूदी धर्म में सुअर का महत्व - 
दोनों ही धर्मों में सुअर को अशुद्ध एवं इसका मांस खाना वर्जित किया गया है। अरबी भाषा में इसका नाम खिंजिर है।

सनातन धर्म में सुअर का महत्व - 
सनातन धर्म में सूअर के सिर वाले वराह को भगवान विष्णु के अवतार के रूप में पूजा जाता है। वाराह के रूप में इसकी पूजा की जाती है।

सुअर धन संपदा का प्रतीक - 
पिग्गी बैंक (गुल्लक) पैसे बचाने के लिए सिरेमिक/मिट्टी/धातु से बने सुअर के आकार के डब्बे होते हैं। यह गुल्लक 12वीं शताब्दी में जावा, इंडोनेशिया और 13वीं शताब्दी में थुरिंगिया, जर्मनी में पाए गए। पूर्वी एशिया में बचत, समृद्धि और सूअरों के बीच संबंध उनका गोल पेट पृथ्वी और आत्माओं के साथ संबंध को दर्शाता है।

सुअर पालन व्यवसाय - 
सड़ी गली कुछ भी चीज खा लेने के कारण सूअर पालन एक लाभदायक व्यवसाय है।  यह कम समय, श्रम एवं लागत से अधिक मुनाफा देने वाला व्यवसाय है। इनके लिए अन्य स्तनधारी की तुलना में अधिक खर्च कर आवास बनाने की आवश्यकता नहीं होती है।

सुअर से प्राप्त उत्पाद - 
सुअर का मांस (सस, पोर्कस, पोर्को, एपर, पोर्क, सॉसेज) -
यह अधिक चिकना एवं प्रोटीन युक्त होता है जिसे पोर्क कहते हैं। सूअर का मांस अरब क्षेत्र को छोड़ कर लगभग सभी देशों में लोकप्रिय भोजन है।
सुअर के बाल -
सूअरों के बाल ब्रश से जाते हैं।
सुअर की खाल - 
सुअर की खाल का उपयोग कपड़े, दस्ताने, जैकेट, जूते, और किताबों की बाइंडिंग में किया जाता है। सुअर की खाल मोटी और टिकाऊ होती है जो भेड़ और बकरी के चमड़े की तुलना में सस्ता होता है और कम फटता है। 16वीं शताब्दी में, जर्मनी में सूअर की खाल सबसे लोकप्रिय पुस्तक-बाइंडिंग सामग्री थी। सूअर की खाल का इस्तेमाल मानव त्वचा के प्रतिरूप के रूप में भी किया गया है। सूअर की खाल का इस्तेमाल घाव भरने, जलने, ट्रांसडर्मल प्रवेश, डिलीवरी, विष विज्ञान, संक्रामक रोग, विकिरण और यूवीबी प्रभाव, सांप के ज़हर, और टेसर आकलन के अध्ययन में किया जाता है। सूअरों का चमड़ा और कंडरा नामक वाद्ययंत्रों के लिए तार बनाने में इस्तेमाल किया जाता था

सुअर पालन हेतु प्रशिक्षण एवं आर्थिक सहायता - 
सूअर पालन के लिए ट्रेनिंग के लिए कृषि विज्ञान केंद्र में प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए जाते हैं। इसके अलावा, भारतीय सूअर पालन प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान भी सूअर पालन में प्रशिक्षण देता है। सूअर पालन ट्रेनिंग कृषि विज्ञान केंद्र में सूअर पालन के लिए सात दिवसीय प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए जाते हैं।
भारतीय सूअर पालन प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान में सुअर पालन, स्वास्थ्य प्रबंधन, प्रजनन तकनीक और खेत प्रबंधन प्रथाओं जैसे विषयों में प्रशिक्षण दिया जाता है। सूअर पालन के लिए ऑनलाइन कोर्स भी उपलब्ध हैं। सूअर पालन के लिए सरकार सब्सिडी देती है।

खेती कार्यों पर जंगली सूअरों का प्रभाव - 
सुअर की थूथन बड़ी एवं सख्त होती है। यह इसके उपयोग से पौधों एवं फसलों को जड़ से निकाल कर चट कर देते हैं। खेतों में यह बड़ी संख्या में एक साथ चरने आते हैं। कृषकों पर हमले कर घायल भी कर देते हैं। इनकी बढ़ती संख्या कई जगह खेतिहर लोगों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई है।

भारत में वर्तमान में सुअर पालन का व्यवसाय जोरों पर है। यह सस्ता होने के साथ - साथ अधिक लाभ देने वाला व्यवसाय है।

शमशेर भालू खां 
9587243963

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