जिगर के दोहे -
आड़ी टेढ़ी राखिए, जो घर हों बहु दोय।
बांस बजे ना मंजरी, ना उठा पटक होय।।
भाई भाई ना होया, न होय भतीज।
बड़ - बड़ परवार की, निपट गई तमीज।।
02.
छोटा तो खोटा हुया, बड़े को न सुहाय।
पीपल पेड़ के आसरे, नीम नहीं लग पाय।।
03.
कहे भतीज काक से, मैं बड़ा तुम नीच।
दाणो कु दाणो भयो, बीज भयो कुबीज।।
04.
बहु लड़े है सास से बेटी लड़े है माय।
बहु न्यारी होयसी, धी ससुराल को जाय।
06.
अनमना हीं पांवणा, गुणतुण गाए गीत।
आड़ी टेढी बात करें, इनकी उलटी रीत।।
07.
दास, जवांई, भांणजो, लेते नीच पगाय,
होणी के सीरी बने, अणहोणी नट जाय।।
08.
बेटी लाड़ लड़ाय के, भेजी पराई जाय।
ऊबी गई आंगने, सूती घर ना आए।।
09.
नाचे पंख न देख कर, रोए देख के पग।
मोर बेचारो सुलखणो, डरे नाग को जग।।
10.
बलवीर चला मारने, ले हाथ तलवार।
बेटा पन्ना ने दिया, अमर सिंह पे वार।।
11.
बेटी मेरी सलूखणी, बहु अवगुणी नाम।
उलटी सोच के कारणे, बसे किण बिद गांव।
12.
आटीपाटी लेय के, सो गई महला उनींद।
बीन्द लाड लडायतो, सो गयो काची नींद।।
13.
तिरिया का तेरा करम, मत पूछ पिछाण।
रोटी के टेम पर, गौरी बुहारे ठाण।।
14.
बेटी चाली बाप घर, अड़ा सासू के सींग।
कादो कढ़ासी बाप को, भाई बणासी भींग।।
15.
आंचल छोटा पड़ गया, बेटे को हुलराय।
आई बहु यूं कहे, मात संग मत बतलाए।।
16.
अंटशंट बोल कर, घर को किन्यों नाश।
दारू दबेड़ा कीजिए, जल्दी होय विनाश।।
17.
नशो नाश को नाम है, देखो निजर पसार।
बासन बिकते देखिए, छोड़ चली घर नार।।
18.
उद्यम कीजे आपणा, जो होणी सो होय।
अणहोणी ना होयसी, होणी को क्यों रोय।।
19.
पग पसारो दो गुणा, जितनी है गुणज्यास।
साथ कुछ न लाए हम, न ले जाने की आस।।
20.
धरधर धक्का मारिये, घर जाणी का खेल।
चित मेरी पट मेरी, हो गई धक्कम पेल।।
21.
आटो उडिके टाबरी, सायबो कलाली के पास।
यूं बसे कदे घर नहीं, पड्यो नाली के पास।।
जिगर के दोहे -
22.
नयी सदी से मिल रही, दर्द भरी सौगात।
बेटा कहता बाप से, तेरी क्या औकात।।
23.
प्रेम भाव सब मिट गया, टूटे रीत-रिवाज।
मोल नहीं सम्बन्ध का, पैसा सर का ताज।।
24.
भाई-भाई में हुआ, अब भाव और वैर।
रिश्ते टूटे खून के, अपने लगते गैर।।
25.
दगा बखत पर दे गए, संबंधी जो खास।
भाई अब कैसे करे, अपनों पे विश्वास।।
26.
अब लहू अपना भी, करने लगा कमाल।
समझें बोझ माँ-बाप को, रहे घर से निकाल।।
27.
होठों पर कुछ और है , मन में कुछ ओर।
मित्रों के व्यवहार ने, दिया हमें झकझोर।।
28.
अपनी इच्छा है यही, मिले सबका प्यार।
पर देखा हमने हर जगह, रिश्तों का व्यापार।।
29.
झूठी कसमें सभी, झूठ किया इकरार।
वो हमें छलता रहा, हम समझते रहे प्यार।।
30.
साथ हमारा तज गए, मन के थे जो मीत।
अब हम किसको लिखें, मधुर प्रेम के गीत।।
31.
माँ की ममता बिक रही, बिके पिता का प्यार।
प्रेम मिले बाज़ार में, वफ़ा बेचते यार।।
32.
पानी आँखों का मरा, मरी शर्म और लाज।
कहे बहू अब सास से, घर में मेरा राज।।
33.
प्रेम, आस्था, त्याग अब, बीते युग की बात।
बच्चे भी करने लगे, मात-पिता पे घात।।
34.
भाई करता नहीं, भाई पर विश्वास।
बहन पराई हो गई, साली खासमखास।।
35.
जीवन सस्ता हो गया, बढे धरा के दाम।
इंच-इंच पे हो रहा, भाइयों में संग्राम।।
36.
वफ़ा रही ना हीर सी, ना रांझे सी प्रीत।
लूटन को घर यार का, बनते हैं अब मीत।।
37.
तार-तार रिश्ते हुए, ऐसा बढ़ा जनून।
सरे आम होने लगा, मानवता का खून।।
38.
मंदिर, मस्जिद, चर्च पर, पहरे दें दरबान।
गुंडों से डरने लगे, अल्लाह और भगवान।।
39.
कुर्सी पे नेता लड़ें, रोटी को इंसान।
मंदिर मजित लड़ रहे, अल्लाह और भगवान।।
40.
मंदिर में पूजा करें, घर में करें कलेश।
बापू तो बोझा लगे, पत्थर लगे गणेश।।
41.
बचे कहाँ अब शेष हैं, दया, धरम, ईमान।
पत्थर के भगवान हैं, पत्थर दिल इंसान।।
42.
भगवा चोला धार कर, करते खोटे काम।
मन में रावण बसाय के, मुख से बोलें राम।।
43.
लोप धरम का हो गया, बढ़ा पाप का भार।
केशव भी लेते नहीं, कलयुग में अवतार।।
44.
देख दिखावा भगत का, फैल रहा पाखंड।
मन का कोना बुझा हुआ, घर ज्योत अखंड।।
45.
पत्थर के भगवान को, लगते छप्पन भोग।
मर जाते फुटपाथ पर, भूखे, प्यासे लोग।।
46.
फैला है पाखंड का, अन्धकार सब ओर
पापी करते जागरण, मचा-मचा कर शोर।।
47.
धरम करम की आड़ ले, करते हैं व्यापार।फोटो, माला, पुस्तकें, बेचें बंदनवार।।
48.
लेकर ज्ञान उधार का, बने फिरे विद्वान्।
पापी, कामी भी कहें, अब खुद को भगवान।।
49.
पहन मुखौटा धरम का, करते दिन भर पाप।
भंडारे करते फिरें, घर में भूखा बाप।।
50.
मंदिर, मस्जिद, चर्च में, हुआ नहीं टकराव।
पंडित, मुल्ला कर रहे, हर दिन पथराव।
51.
टूटी अपनी आस्था, बिखर गया विश्वास।
मंदिर में गुंडे पलें, मजीत में बदमाश।।
52.
पत्थर को हरी मान कर, पूज रहे नादान।
फुटपाथ पे तज रहे, प्राणों को इंसान।।
53.
खींचे जिसने उम्र भर, अबलाओं के चीर।
वो अब कहने लगे, खुद को सिद्ध फकीर।।
54.
तन पे भगवा सज रहा, मन में पलता भोग।
कसम खुदा की खा रहे, बिकने वाले लोग।।
55.
खुदा बनाई हूर पढ़ने लगे नमाज
ठोकर मारे बाड़ को आते जाते नबाब।।
56.
पंडित मुल्ला पादरी करे धर्म विनाश
ईश्वर अल्ला जेब में बना मनुज है दास।।
57.
हाथों पे कलावा बंधा, गरदन में ताबीज।
मन में रावण बसा, है कुबद को बीज।।
58.
सास जने है साले को, भया जमाई भरतार।
ससुर बहु से लग रहा, हे दाता पालनहार।।
59.
बहन भाई के प्रेम को लगी नजर गंभीर।
चाची संग भतीज लगा, का करिहे तदबीर।।
60.
मूंछें रह गई नाम की, पूँछ दई कटवाए।
ममता मर गई आपणी, होड़म होड़ मचाए।।
61.
चक्कर पे चक्कर चला, चली बात पे बात।
पूछ गधी के दूध की, मार गाय को लात।।
62.
मुट्ठी भर लोगों ने, किया हमें शर्मशार।
देश बिके बेमोल है, अच्छे दिन की धार।।
63.
चोर की महतारनी, रोए घट मुंह बांध।
मर जाता जापे में यह, रह जाती मैं बांझ।।
64.
एक महि पे जन्में, ब्राह्मण दलित समाज
एक को रोटी नहीं, एक भोगे राज।।
65.
छूत अछूत के रोग ने, किया समाज दो भाग।
अगड़े पिछड़े बीच में, चारों ओर है आग।।
66.
पहले बात के ज़ोर से, लगते लोग अमोल।
बंध पत्र अब फटे पड़े, शपथ पत्र में झोल।।
67.
खून के आंसू रो रही मात स्त्री और गाय
कुत्ते खाएं कुल्फियां वैश्या नाच नचाए।।
68.
गांठ लगाई मन में, मंदिर ताला लटकाए
मजित पे दरबान है, कहां मनुज जाए।।
69.
आंटी में गांठी है तो भये मीत अपार।
बिन गांठी का देवता, देखे है लाचार।।
70.
बंदर को आसन मिला, सूअर को सिंहासन।
आदमी को छाया नहीं, नहीं खान को बासन।।
71.
दानी दाता मुक्त है स्वर्ग नरक से आदान
पाप धन से धुले, सोचे है नादान।।
72.
दादा पोते का प्रेम है असीम और अनंत।
थोड़ी लगावट नहीं, जोड़ी पीत बसंत।।
#जिगर_चूरूवी
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