शायर का ताअरूफ -
नाम - शमशेर खान
उपनाम - प्रेम, शमशेर गांधी
तखल्लुस - पहले परवाना नाम से लिखना शुरू किया। पत्नी अख्तर बानो (सदफ) के सुझाव पर जिगर चूरूवी नाम से लिखना शुरू किया।
पैदाइश - 18.04.1978 सहजूसर, चूरू (राजस्थान)
पिता का नाम - श्री भालू खां (पूर्व विधायक (1980 से 1985), चूरू।
माता का नाम - सलामन बानो (गृहणी)
ताअलिम -
1. रामावि सहजूसर में पहली कक्षा में दाखिला 10.07.1984 से 1993 में मेट्रिक तक।
2. राउमावि बागला, चूरू से हेयर सेकंडरी 1993 से 1995 तक
3. राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय भाषाई अल्पसंख्यक अजमेर से BSTC, 1995 से 1997
4. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में स्नातक 1998 से 2001 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय, अजमेर)
5. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में अधिस्नातक 2004 से 2005 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय बीकानेर से गोल्ड मेडलिस्ट - 2005 उर्दू साहित्य)
6. कश्मीर विश्वविद्याल, श्रीनगर के नंद ऋषि शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय से B.Ed.- (2007 - 8)
7. इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय से विशेष आवश्यकता विद्यार्थियों के शिक्षण हेतु विशेष अध्ययन - 2012
8. वर्तमान में LLB में प्रवेश (13.08.2025 से)
विवाह - पत्नी अख्तर बानो (सदफ) से 20.10.1996 में विवाह हुआ।
संतान - तीन पुत्रियां
1. अंजलि खान (LLM)
2. रोजा खान (BSC Nursing) सेवारत
3. प्रेरणा खान (BSC Nursing) सेवारत
व्यवसाय -
1. निजी विद्यालय शिक्षक एवं विद्यालय संचालन - 1997 से 1999
2. राजकीय सेवा तृतीय श्रेणी अध्यापक 10.07.1999 से 14.12.2014 तक
3. द्वितीय श्रेणी शिक्षक 14.12.2014 से 01.09.2023 तक
4. स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति 01.09.2023 से
पद -
1. तहसील अध्यक्ष - शिक्षक संघ शेखावत, चूरू
2. जिला मंत्री शिक्षक संघ शेखावत चूरू
3. प्रदेशध्यक्ष, सर्व शिक्षा अभियान कर्मचारी संघ, राजस्थान
4. प्रदेशाध्यक्ष, युवा मुस्लिम महासभा, राजस्थान
5. प्रदेश संयोजक, राजस्थान तृतीय भाषा बचाओ आंदोलन
6. प्रदेश संयोजक, संविदा मुक्ति आंदोलन राजस्थान
7. प्रदेश सचिव अखिल भारतीय कांग्रेस सेवादल 2024 से
8. जिलाध्यक्ष शिक्षक प्रकोष्ठ कांग्रेस, चूरू 2025 से
9. संयोजक चूरू विधानसभा समस्या एवं समाधान समिति, चूरू
आंदोलन -
1. संविदा मुक्ति आंदोलन
2. दांडी यात्रा
3. सामाजिक सरोकार
पुस्तकें -
1. मिरातुल जिगर
2. हृदयांश (हिंदी कविता संग्रह)
3. कालजे री कोर (राजस्थानी कविता संग्रह)
4. कसासुल जिगर - गजल समूह
5. मिनाज ए जिगर - नज़्म संग्रह
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प्रस्तुत दोहा संग्रह - पुस्तक के बारे में -
प्रकाशकीय कथन -
हिंदी साहित्य की समृद्ध परंपरा में दोहा सदैव जनजीवन का सबसे निकटवर्ती और प्रभावशाली छंद रहा है। कबीर, रहीम, तुलसी, बिहारी और संत परंपरा के अनेक कवियों ने दोहे के माध्यम से जीवन-दर्शन, समाज, नीति, प्रेम और अध्यात्म को सहज भाषा में जन-जन तक पहुँचाया। उसी परंपरा को समकालीन संदर्भों में आगे बढ़ाने का एक सार्थक प्रयास है "झाड़ी के फूल: जिगर के दोहे"।
इस संग्रह के रचनाकार शमशेर भालू खां सहजूसर 'जिगर चुरूवी' ने अपने दोहों में केवल काव्य-सौंदर्य का निर्वाह नहीं किया है, बल्कि समाज की विसंगतियों, मानवीय मूल्यों, शिक्षा, प्रकृति, श्रम, राष्ट्र, न्याय, समानता, विज्ञान, प्रेम और नैतिक चेतना जैसे विविध विषयों को अत्यंत सरल, प्रभावी और विचारोत्तेजक ढंग से अभिव्यक्त किया है। इन दोहों में लोकभाषा की आत्मीयता है, साहित्य की गरिमा है और जीवन का यथार्थ भी।
इस कृति की एक विशेषता यह भी है कि लेखक ने वर्णमाला के क्रम में दोहों की रचना कर एक अनुशासित और अभिनव प्रयोग प्रस्तुत किया है। प्रत्येक दोहा केवल छंद का निर्वाह नहीं करता, बल्कि पाठक के मन में विचार का एक नया दीप भी प्रज्वलित करता है। भाषा सहज है, भाव स्पष्ट हैं और संदेश सार्वकालिक।
हमें विश्वास है कि यह संग्रह साहित्य-प्रेमियों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों तथा सामान्य पाठकों सभी के लिए समान रूप से उपयोगी सिद्ध होगा। यह पुस्तक केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि बार-बार मनन करने योग्य है।
हम लेखक शमशेर भालू खां सहजूसर 'जिगर चुरूवी' को इस महत्त्वपूर्ण साहित्यिक योगदान के लिए हार्दिक बधाई देते हैं तथा आशा करते हैं कि उनकी लेखनी भविष्य में भी समाज और साहित्य को नई दिशा प्रदान करती रहेगी।
झाड़ी के फूल.... जिगर के दोहे भाग - 1
1
आशा की झड़ी लगी, उम्मीद लगे बेर।
निराश क खेरी लगी, नाउम्मीद का केर।
जिगर चूरूवी
जिगर के दोहे......
जिगर चूरूवी का परिचय - दोहों में....
2
कबीरा रहीम दादू, कहे दोहे महान।
आज कल में जिगर हुआ, चूरू की पहचान।।
3
भालू खां का पूत है, सहजूसर गांव।
लिखे कहानी- गजल, छंद- लेख नज़्म दांव।।
4
नाम शमशेर खान है, माता सलमा खान।
जन्म अप्रैल माह में, देत ज्ञान का दान।।
5
अख्तर बानो भार्या, बेटी तीन सपूत।
अंजलि, रोजा बड़ी है, प्रेरणा जो सूत।।
6
कक्षा दस सहजूसर से, BA पढ़े स्वयंवीर।
एमए उर्दू से किया, की बीएड कश्मीर।
7
नौकरी अध्यापक की, निन्यानबे साल।
सेवा छोड़ी बीच में, आंदोलन की मशाल।।
8
तात विधायक चूरू, ठेठ गृहणी मात।
पत्नी काज संवारती, कायमखानी जात।।
9
राजस्थान का पूत है, चूरू धरा सपूत।
सदन सदफ आशियाना, गांधीवाद अकूत।।
10
बड़े जमाई आदिल खां, मझले आसाद खान।
हैं छोटे जाकिर खान, तीनों मेरी जान।।
11
तीन भाई है दो बहन, दोय साले साली दो।
ससुर लाल खान जी, सास रोशन बानो।।
12
कश्मीर दांडी संविद, आंदोलन का जीवन,
सरकार से लड़ते रहे, है संघर्ष आजीवन।।
13
दोहिती सहजन खान, कालजीय की कोर।
यह परिचय है मेरा, और बताऊं क्या ओर।।
जिगर चूरूवी
अक्षर बावनी (एक वर्ण एक दोहा)(अ से ज्ञ)
14 (अ)1
अभी घर का रुख करें, देखे जलते दीप।
अंत समय है दिन ढला, यम का गुर्ज समीप।।
गुर्ज - यमराज का कांटेदार हथियार।
15 (आ)2
आशा है तो जीवन है, निराशा संग मौत।
आलस छोड़ के काम कर, देख जली है जोत।।
16 (इ)3
इच्छा कभू पूर्ण हो, ऐसा नहीं वरदान।
पूर्वज पूर ना सके, नहीं समझे नादान।।
17 (ई)4
ईमान धर्म से कहिए, छोटा कौन महान।
ईश्वर सबन का एक है, मानव मान समान।।
18 (उ)5
उदय सूरज की तरहा, करे भोर सुहाए।
अस्त होते जावते, पात भी कुम्लाए।।
पात - पत्ते, कुम्लाए - कुम्हलाना/मुरझाना
19 (ऊ)6
ऊँची सोच सदैव बड़ी, छोटी पग की मोच।
साकार ऊर्जा मिले, रखना बडेरी सोच।।
20 (ऋ)7
ऋण मातृय अचूकता, ना पिता का भार।
घड़ा बांध कर पेट से, बैठना दुश्वार।।
21 (ए)8
एक सूर्य एक चंद्रमा, अकेली धरती मात।
एक प्राण हर जीव में, कब समझेगा बात।।
22 (ऐ)9
ऐसा समय एक आयेगा, भाई - भाई में बैर।
छांव बैठे आम की, वो लागेगी कैर।।
23 (ओ)10
ओज वाणी का खो गया, सत का सत्यानाश।
शिक्षा की जड़ें मिटी, नीति काल ग्रास।।
24 (औ)11
औषध का नहीं काम है , योगा है अनमोल।
नित व्रत से कर सके, जीवन अमृत घोल।।
25 (अं)12
अंग ऊतक है कोशिका, परमात्मा का रूप।
सुख दुःख एक समान हैं, है छांव कभी धूप।।
26 (अ:)13
अंतःकरण से पूछिए, सही गलत का भेद।
लाख बुराई हम रखें, करे बुरे पर खेद।।
27 (क)14
कहते जिगर से हम, पूज्य होते देव।
देता है वो देवता, नहीं भींत का लेव।।
भींत - दीवार, लेव - प्लास्टर/आवरण
28 (ख)15
खाली हाथ आए थे, जाना खाली हाथ।
अपनी करनी खुद भरे, कौन किस के साथ।।
29 (ग)16
गुरु लघु का फर्क है, मात्रा, मात्रा मांय।
एक खींचे एक कम, अर्थ बदलता जाय।।
30 (घ)17
घृणाएं घर देश में, नाहीं होती ठीक।
घर व समाज में एकता, यह जिगर की सीख।।
31 (ङ)18
खङग ओर तलवार में, अंतर क्या है बोल।
अर्थ एक हैं शब्द अलग, अल्लाह ईश्वर बोल।।
32 (च)19
चंचला चपला चित्तचोर, मोहनी मधुराग ।
चरित्रवान है गहना, चरित्रहीन बजराग।।
चपला - अधिक बोलने वाली, चित्तचोर - मन को चुराने वाली, मोहिनी - मोहने वाली, बजराग - दावानल (धकड़बोझ)
33 (छ)20
छल - कपट बुरी चीज है, दगा जिसका भाई।
चोर चकारी जामनी, चुगल खोरण माई।।
दगा - धोखा, चकारी - उठाई गिरी, खोरण - करने वाली/खाने वाली, जामनी - जमानत लेना।
34 (ज)21
जीवन सत का सार है, सेवाभाव त्याग।
सफल जीवन है वही, जहां रहे अनुराग।।
सत - सत्य, अनुराग - प्रेम।
35 (झ)22
झूठ पुन का नाश है, झाळ मद कूचाल।
धीरवानों के आंगने,
इनकी गले ना दाल।।
पुन - पुण्य, झाळ - क्रोध, मद - नशा, कूचाल - भटकना।
36 (ञ)23
पञचायत है दाग गर, करत भेद विभेद।
ज्ञात-अज्ञात सब एकसे, न्याय नाव म छेद।।
गर - यदि, करत - करते, एकसे - एक जैसा।
37(ट)24
टहनी झुकती है भली, ऊंची भली है बाड़। अहंकारी नीचा भला, कटे ना लंबी नाड़।।
टहनी - शाखा, नाड़ - गर्दन।
38 (ठ)25
ठोकर से सीख मिले, मिलता गुर ज्ञान। एके से शक्ति मिले, संस्कारी सम्मान।।
ठोकर - बाधा/असफलता, गुर - पैंतरा/सिखलाई
39 (ड)26
डाल पर लगे फूल हैं, जड़ होती प्राण।
भाई से जब भाई कटे, सूना होत जहान।।
40 (ढ)27
ढाई दिन की जिंदगी, चार अक्षरी प्रेम।
पांच तत्व की जान है, तेरहवें दिन क्षेम।।
अक्षरी - अंकों की, तेरहवें - मृत्यु के बाद अंतिम क्रियाक्रम का दिन, क्षेम - सुख
41 (ण)28
णकार विरल वर्ण है, हिंदी का है रूप।
प्रथम कहीं आता नहीं, रण रचयता अनूप।।
णकार - 'ण' अक्षर, रचयता - रचने वाला, अनूप - राजा
42 (त)29
तन मन धन से है बड़ा, सत्य साधना नाम।
गौरी पीपल पूजती, दे नीम के डाम।।
डाम - चोट
43 (थ)30
थाती भरी समाज से, जैसे झारी जल।
लोभी भूखा वास में, है करनी का फल।।
थाती - प्रसिद्धि, झारी - पानी का बेलनाकार बर्तन
वास - घर
44 (द)31
दाम निश्चत है हुआ , बिके हर एक चीज।
खुद को खुद साहूकार कहे, झूठा बीजे बीज।।
साहूकार - सच्चा
45 (ध)32
धर्म, माया का आवरण, माया जग की मात।
वेद बंदी वस्त्र गेरुआ, , कुरआन ताले सात।।
आवरण - ऊपरी वस्त्र, मात - माता, गेरुआ - भगवा
46 (न)33
नदी नीर नल बहते है, कल कल ध्वनि गाए।
अति गति विनाशनी, जोड़ा वो बह जाए।।
अति - तीव्र, विनाशनी - विनाश करने वाली
47 (प)34
परहित से बढ़कर नहीं, कोई कर्म महान।
दानी को सुख मिले, करता यश का पान।
परहित = दूसरों का भला, यश -प्रसिद्धि।
48 (फ)35
फल का फ़ल हल से लगा, हलधर मालामाल।
फल धार से सेना में, होता खून कताल॥
फल - हथियार/हल की नोंक, फ़ल - परिणाम/प्राप्ति, हलधर - किसान, कताल - हत्या।
49 (ब)36
बया बनाये घोंसला, कोयल ढूंढे ओर।
कौआ सयाना जन कहें, पैर पटकता मोर।।
सयाना - बुद्धिमान,
पैर पटकता - क्रोध करना
50 (भ)37
भ्रम के बादल छंट गए, जाग सके तो जाग।
डूंगर जलती दीखती, पैर म लगी है आग।।
भ्रम - नासमझी, डूंगर - पहाड़, डूंगर जलती दीखती - दूसरों में कमी दिखाई देना, पैर म लगी है आग - खुद की कमियां नहीं देखना।
51 (म)38
माखी मच्छर जीव है, सुख दुःख का भान।
हाथी गैंडा मस्त है, चिंतित हर इंसान।।
52 (य)39
यदि कहीं मिल जाए तो, ढूंढ लीजिए ठौर।
रवी डूबे चांद उगे, यति गति का जोर।।
53 (र)40
रहना सहना है जहां, वैसी भाषा बोल। सर्प समुख बीन बजा, भैंस के आगे ढोल।।
54 (ल)41
लगत गई गलत लत लगी, पीते भांग अफीम।
सात पुस्त की संपति, पीते बन कर भीम।।
55 (व)42
वय वय ही की बात है, वय से खुद को जांच।
बालपन की मस्तियां, बुरा बुढ़ापा सांच।।
56 (श)43
शिव आदम ईसा मसीह, गौतम और महावीर।
ईश्वर अल्ला ने रचे, धर्म वान सुधीर।।
57 (स)44
सर्प सुनता ही नहीं, बीन सपेरा धुन।
जीते जी रोटी नहीं, बाद मरे के पुन।।
58 (ष)45
षड्यंत्रों से दूर रहे, हों दूर दुर्भाव ।
षट्रिपुओं को जीते, निर्मल स्वभाव।।
षट्रिपु = काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर।
59 (ह)46
हल समस्या का है यहां, ठंडे मन से सोच।
ठीमर ठीमर बात कर, बातों में हो लोच।।
ठीमर = उत्तम
जिगर के दोहे (क्ष से ज्ञ)
60 (क्ष)47
क्षमा शस्त्र से ठीक है, जीतते मन युद्ध।
बैरी सज्जन होवते, जो न होत क्रुद्ध।।
61 (ज्ञ)48
ज्ञानी ज्ञान कहे सदा, नेमी विनय काज।
संन्यासी सत की कहे, भांत भांत समाज।।
62 (त्र)49
त्रियक रेखा काटती, टेढ़ी मेढ़ी रेख।
भुजा बांटती खेत को, घर- घर जा कर देख।।
गाय -
63
गाय सबकी मात भई, करे रक्षा सब जोय।
भारत राष्ट्र पशु गौ, मांगे एक सब होय।।
64
गौ शरीर म देव बसे, दूध अमृत समान।
होत घी दही छाछ से, भारत देश महान।।
65
राष्ट्र पुंज गाय है, देते सड़क धकेल।
ले दूध घर बाहर किया, यूँ ही खेले खेल।।
66
देश के रक्षक हम बने, न बने गौ के सूत।
दूध दुहते मां कहें, पाछे मारें जूत।।
67
गौ शाला में गाय है, भैंसा नहीं है एक।
दोनों देत हैं अमृत, हुये भेद अनेक।।
68
किसान की है साख गौ, माता बहन समान।
बेटी ब्याह के बखत, करता गौ का दान।।
69
गौ संपत्ति किसान की, बैल खेत की जान।
बहे नदियां दूध की, खेती हेत अदान।।
70
गाय कटती देख कर, बहे नैन में धार।
जो घर काढ़े गाय को, उसका होय संहार।।
71
माताजी के नाम पर, खोली एक दुकान।
भूखी गौ के नाम पर, लेत है अनुदान।।
72
बड़ा बाड़ा कर दिया, ले के आए कई गाय।
स्टाम्प गो कर मिले, मिल बैठ के खाय।।
नीति -
73
दर्द ना जाने गाय को, राजनीत रणवीर।
अपना काम निकलता, नहीं खाई है खीर।।
74
पाप बड़ा इतना बढ़ा, लेव राम अवतार।
कृष्ण जैसा मीत हो, यह है गीता सार।।
75
जज बिके वकालत भी, बिके पहरेदार।
चौथा स्तंभ मीडिया, बिका है अखबार।।
76
न्याय में देरी हुई, अन्याय खुलेआम।
न्याय है बाजार में, देव सके दे दाम।।
77
बातों से अगन लगी, प्रेम डाह मिटाए।
सारी सारी ले गयो, दो पल म बतियाए ।।
78
प्रेम बिना न जीना, जीवन है नि सार।
घर बुलावे पावना, मन की मन में सार।।
79
घणी पढ़ाई लड़कियां, लड़के अनपढ़ ठूंठ।
नाते बदल ब्याह हुआ, कैसे मिले जूंट।।
80
सगा सगे से मिले नहीं, सगी बढ़ाएं राड़।
खाई खोदते कूदकर, ताना कसी पहाड़।।
81
पोता पोती अनमना, नाती संगत स्नेह।
ओक लगावत माथे पे, बेढ़ब प्रेम मेह।।
82
खड़ी बोल को सायबो, गोरी सीकर पार।
कूकर सा लड़े फिरे, देखे लोग अपार।।
83
मूंछों की जब बात हो, नीची में है सार।
लाज गई दोनों घर की, भिड़त थानेदार।।
84
घर में विष ना पालिए, बेटों में कर भेद।
बीच समंदर जहाज में, हो गया जैसे छेद।।
85
पानी आँखों में नहीं, बहता पसीना धार।
हर घर नल से जल मिला, दावा करती सरकार।।
86
अस्सी फीसदी जन भूखे, ले रहे मुफ्त अनाज।
बढ़ती इकोनॉमी का, राग अलापे राज।।
87
कल का भरोसा नहीं, लगे बरसों ताला।
रात सोए नहीं जागे, फोटो ऊपर माला।।
88
भीड़ भाड़ में खो गया, मन का चैन करार।
नेताजी उलट हो गए, नैतिकता संहार।।
89
पंद्रह बरस का बालक, गया विदेश उड़ान।
टॉफी बाँटे ओरन को, खाली करे बखान।।
90
बाप कुछ करता नहीं, बैठे बेटे खाए।
दोनों हाथ उलीचता, किस हेतु लुटाए।।
91
कमिशनी का खेल है, खेलें मंत्री सचिव।
करदाता के माल से, पेट भरे परजीव।।
92
पुलिस रक्षक गैंग की, चहुं ओर अपराध।
बंधी बधी कोतवाल की, एक मेक में साथ।।
93
मोबाइल हाथ म लिए, कर मुट्ठी संसार।
रील में दिखे राम सा, राक्षसी व्यवहार।।
94
बिन फूल की बेल का, कौन सींचे बाग।
सोतों का पाडा हुआ, जाग मानुष जाग।।
95
बिना कमाए धन मिले, श्रम करेगा कौन।
चोरी चोरी घर भरें, बापू साधे मौन।।
96
भक्षक घूमे रक्षक बना, चारों ओर अपराध।
डंडा थामे घूमता, छुपा साधु साध।।
97
साग सुधारे सालना, बड़ी बहू को नाम।
पच-पच मरे छोटी बहू, नहीं काम से काम।।
98
आटि-पाटि लेय कर, बीरवानी गई सोय।
जाए कोई मनावण, दे दना-दन होय।।
99
मरे को ना मारिए, जीवन आस हजार।
होनी होकर ही रहे, अनहोनी बेकार।।
100
माया को है मानखो, उपजे कई विचार।
निर्धन पेटा काटकर, राखे जग सत्कार।।
101
सोशल मीडिया समय, कुछ का कुछ दिखलाय।
झूठ छुपावे सत्य को, कैसे रूप बनाय।।
102
आनंदमय संसार है, कलुषित सब विचार।
मीठी बोली बोलते, हिये रखे तरवार।।
103
बनिया खा गया खेत, घर खा गयो सुनार।
बैंक सोना खा गए, माया अपरम्पार।।
104
चाँदी चढ़ी अकास में, सोना हाथ न आय।
गहने सपने हो गए, खोटी टूम घड़ाय।।
105
त्रिया-धन ना बाप को, पुत्र-वधू बदमाश।
म्हारो जमाई भलो, बेटे को बनवास।।
106
अधम सौ गुण चाहता, फेर-फेर कर लेत।
सोने जड़ित कंगन में, भीतर पीतल रेत।।
107
असल सगा नसीब से, मिले साथ संजोग।
कृतघ्न समधी ना मिले, हुए फसल को रोग ।।
108
पीढ़ी अब अंजान नहीं, समझ बढ़ी है आज।
जज कह दे “कीड़ा” जिसे, श्रम न करे लाज।।
109
टाबर छोटो हो भले, सोच बड़ी दिन-रात।
बड़े बड़ाई में लगे, लोच न कुछ हाथ।।
110
आधी तेरी-मेरी, बारी-बारी खाय।
भूखा मरता आम जन, तन सूख सूख जाय।।
111
चाँद चढ़ा रवि ढल गया, छाया घोर अंधेर।
नेता गंद मचावते, रोज़ नया छीछालेदर।।
112
जा सो जा तू बावले, देर भोर हो जाय।
समय पड़े वन-बीच भी, पत्थर पानी खाय।।
113
बंद मुट्ठी में राज़ है, खुलते होवे खाक।
कौड़ी-कौड़ी जोड़ते, बन जावे धन लाख।।
114
बहू आई आंगन में, सास करे मनवार।
थोड़े दिन अनबन बढ़ी, बिखर गया परिवार।।
115
पाल-पोस बड़े किए, हिये रखी थी आस।
पंख लगे उड़ गए नन्हे, छोड़ गए संताप।।
116
मीठा बोल रे साथिया, मीठी तेज कटार।
मीठी संगत मेल सूं, कैरी बन जाय अचार।।
117
दादा-दादी घर नहीं, पोतो देख न पाय।
बेटा छोड़ बाप को, बुढ़ापे में रुलाय।।
118
उजड़ी बस्ती बस गई, खेड़े बसे अपार।
सुविधा बिन जन रो रहे, टूटे सपने सार।।
119
आड़ी टेढ़ी राखिए, जो घर हों बहु दोय।
बांस बजे ना मंजरी, ना उठा पटक होय।।
120
भाई भाई ना होया, न होय भतीज।
बड़ - बड़ परवार की, निपट गई तमीज।।
121
छोटा तो खोटा हुया, बड़े को न सुहाय।
पीपल पेड़ के आसरे, नीम नहीं लग पाय।।
122
कहे भतीज काक से, मैं बड़ा तुम नीच।
दाणो कु दाणो भयो, बीज भयो कुबीज।।
123
बहु लड़े है सास से बेटी लड़े है माय।
बहु न्यारी होयसी, धी ससुराल को जाय।
124
अनमना हीं पांवणा, गुणतुण गाए गीत।
आड़ी टेढी बात करें, इनकी उलटी रीत।।
125
दास, जवांई, भांणजो, लेते नीच पगाय,
होणी के सीरी बने, अणहोणी नट जाय।।
126
बेटी लाड़ लड़ाय के, भेजी पराई जाय।
ऊबी गई आंगने, सूती घर ना आए।।
127
नाचे पंख न देख कर, रोए देख के पग।
मोर बेचारो सुलखणो, डरे नाग को जग।।
128
बलवीर चला मारने, ले हाथ तलवार।
बेटा पन्ना ने दिया, अमर सिंह पे वार।।
129
बेटी मेरी सलूखणी, बहु अवगुणी नाम।
उलटी सोच के कारणे, बसे किण बिद गांव।
130
आटीपाटी लेय के, सो गई महला उनींद।
बीन्द लाड लडायतो, सो गयो काची नींद।।
131
तिरिया का तेरा करम, मत पूछ पिछाण।
रोटी के टेम पर, गौरी बुहारे ठाण।।
132
बेटी चाली बाप घर, अड़ा सासू के सींग।
कादो कढ़ासी बाप को, भाई बणासी भींग।।
133
आंचल छोटा पड़ गया, बेटे को हुलराय।
आई बहु यूं कहे, मात संग मत बतलाए।।
134
अंटशंट बोल कर, घर को किन्यों नाश।
दारू दबेड़ा कीजिए, जल्दी होय विनाश।।
135
नशो नाश को नाम है, देखो निजर पसार।
बासन बिकते देखिए, छोड़ चली घर नार।।
136
उद्यम कीजे आपणा, जो होणी सो होय।
अणहोणी ना होयसी, होणी को क्यों रोय।।
137
पग पसारो दो गुणा, जितनी है गुणज्यास।
साथ कुछ न लाए हम, न ले जाने की आस।।
138
धरधर धक्का मारिये, घर जाणी का खेल।
चित मेरी पट मेरी, हो गई धक्कम पेल।।
139
आटो उडिके टाबरी, सायबो कलाली के पास।
यूं बसे कदे घर नहीं, पड्यो नाली के पास।।
140
नयी सदी से मिल रही, दर्द भरी सौगात।
बेटा कहता बाप से, तेरी क्या औकात।।
141
प्रेम भाव सब मिट गया, टूटे रीत-रिवाज।
मोल नहीं सम्बन्ध का, पैसा सर का ताज।।
142
भाई-भाई में हुआ, अब भाव और वैर।
रिश्ते टूटे खून के, अपने लगते गैर।।
143
दगा बखत पर दे गए, संबंधी जो खास।
भाई अब कैसे करे, अपनों पे विश्वास।।
144
अब लहू अपना भी, करने लगा कमाल।
समझें बोझ माँ-बाप को, रहे घर से निकाल।।
145
होठों पर कुछ और है , मन में कुछ ओर।
मित्रों के व्यवहार ने, दिया हमें झकझोर।।
146
अपनी इच्छा है यही, मिले सबका प्यार।
पर देखा हमने हर जगह, रिश्तों का व्यापार।।
147
झूठी कसमें सभी, झूठ किया इकरार।
वो हमें छलता रहा, हम समझते रहे प्यार।।
148
साथ हमारा तज गए, मन के थे जो मीत।
अब हम किसको लिखें, मधुर प्रेम के गीत।।
149
माँ की ममता बिक रही, बिके पिता का प्यार।
प्रेम मिले बाज़ार में, वफ़ा बेचते यार।।
150
पानी आँखों का मरा, मरी शर्म और लाज।
कहे बहू अब सास से, घर में मेरा राज।।
151
प्रेम, आस्था, त्याग अब, बीते युग की बात।
बच्चे भी करने लगे, मात-पिता पे घात।।
152
भाई करता नहीं, भाई पर विश्वास।
बहन पराई हो गई, साली खासमखास।।
153
जीवन सस्ता हो गया, बढे धरा के दाम।
इंच-इंच पे हो रहा, भाइयों में संग्राम।।
154
वफ़ा रही ना हीर सी, ना रांझे सी प्रीत।
लूटन को घर यार का, बनते हैं अब मीत।।
155
तार-तार रिश्ते हुए, ऐसा बढ़ा जनून।
सरे आम होने लगा, मानवता का खून।।
156
मंदिर, मस्जिद, चर्च पर, पहरे दें दरबान।
गुंडों से डरने लगे, अल्लाह और भगवान।।
157
कुर्सी पे नेता लड़ें, रोटी को इंसान।
मंदिर मजित लड़ रहे, अल्लाह और भगवान।।
158
मंदिर में पूजा करें, घर में करें कलेश।
बापू तो बोझा लगे, पत्थर लगे गणेश।।
159
बचे कहाँ अब शेष हैं, दया, धरम, ईमान।
पत्थर के भगवान हैं, पत्थर दिल इंसान।।
160
भगवा चोला धार कर, करते खोटे काम।
मन में रावण बसाय के, मुख से बोलें राम।।
161
लोप धरम का हो गया, बढ़ा पाप का भार।
केशव भी लेते नहीं, कलयुग में अवतार।।
162
देख दिखावा भगत का, फैल रहा पाखंड।
मन का कोना बुझा हुआ, घर ज्योत अखंड।।
163
पत्थर के भगवान को, लगते छप्पन भोग।
मर जाते फुटपाथ पर, भूखे, प्यासे लोग।।
164
फैला है पाखंड का, अन्धकार सब ओर
पापी करते जागरण, मचा-मचा कर शोर।।
165
धरम करम की आड़ ले, करते हैं व्यापार।फोटो, माला, पुस्तकें, बेचें बंदनवार।।
166
लेकर ज्ञान उधार का, बने फिरे विद्वान्।
पापी, कामी भी कहें, अब खुद को भगवान।।
167
पहन मुखौटा धरम का, करते दिन भर पाप।
भंडारे करते फिरें, घर में भूखा बाप।।
168
मंदिर, मस्जिद, चर्च में, हुआ नहीं टकराव।
पंडित, मुल्ला कर रहे, हर दिन पथराव।
169
टूटी अपनी आस्था, बिखर गया विश्वास।
मंदिर में गुंडे पलें, मजीत में बदमाश।।
170
पत्थर को हरी मान कर, पूज रहे नादान।
फुटपाथ पे तज रहे, प्राणों को इंसान।।
171
खींचे जिसने उम्र भर, अबलाओं के चीर।
वो अब कहने लगे, खुद को सिद्ध फकीर।।
172
तन पे भगवा सज रहा, मन में पलता भोग।
कसम खुदा की खा रहे, बिकने वाले लोग।।
173
खुदा बनाई हूर पढ़ने लगे नमाज
ठोकर मारे बाड़ को आते जाते नबाब।।
174
पंडित मुल्ला पादरी करे धर्म विनाश
ईश्वर अल्ला जेब में बना मनुज है दास।।
175
हाथों पे कलावा बंधा, गरदन में ताबीज।
मन में रावण बसा, है कुबद को बीज।।
176
सास जने है साले को, भया जमाई भरतार।
ससुर बहु से लग रहा, हे दाता पालनहार।।
177
बहन भाई के प्रेम को लगी नजर गंभीर।
चाची संग भतीज लगा, का करिहे तदबीर।।
178
मूंछें रह गई नाम की, पूँछ दई कटवाए।
ममता मर गई आपणी, होड़म होड़ मचाए।।
179
चक्कर पे चक्कर चला, चली बात पे बात।
पूछ गधी के दूध की, मार गाय को लात।।
180
मुट्ठी भर लोगों ने, किया हमें शर्मशार।
देश बिके बेमोल है, अच्छे दिन की धार।।
181
चोर की महतारनी, रोए घट मुंह बांध।
मर जाता जापे में यह, रह जाती मैं बांझ।।
182
एक महि पे जन्में, ब्राह्मण दलित समाज
एक को रोटी नहीं, एक भोगे राज।।
183
छूत अछूत के रोग ने, किया समाज दो भाग।
अगड़े पिछड़े बीच में, चारों ओर है आग।।
184
पहले बात के ज़ोर से, लगते लोग अमोल।
बंध पत्र अब फटे पड़े, शपथ पत्र में झोल।।
185
खून के आंसू रो रही मात स्त्री और गाय
कुत्ते खाएं कुल्फियां वैश्या नाच नचाए।।
186
गांठ लगाई मन में, मंदिर ताला लटकाए
मजित पे दरबान है, कहां मनुज जाए।।
187
आंटी में गांठी है तो भये मीत अपार।
बिन गांठी का देवता, देखे है लाचार।।
188
बंदर को आसन मिला, सूअर को सिंहासन।
आदमी को छाया नहीं, नहीं खान को बासन।।
189
दानी दाता मुक्त है स्वर्ग नरक से आदान
पाप धन से धुले, सोचे है नादान।।
190
दादा पोते का प्रेम है असीम और अनंत।
थोड़ी लगावट नहीं, जोड़ी पीत बसंत।।
191
आठ को वही साठी को, करे बरानी बात।
खात खिंडाय गांव में, कु मानस की जात।।
192
लड़के जो पढ़ते नहीं, नहीं काम कुछ ओर।
डील तुड़ावे खेत म, कहां दिखाए जोर।।
193
बांस केरी खपच्चियां, जेन z की दरकार।
भेद मिटाओ जात को, क्या नर और नार।।
194
चल नरेगा चालस्या, कोनी करणो काम।
बैठ्या क दिन सात म, आवे हाथ में दाम।।
195
गुरुजी स्कूल गया, थोड़ी हो गई देर।
थोड़ा जल्दी लौट सी, दिया तले अंधेर।।
196
बीएड कॉलेज प्रवेश, होते देख अनेक।
कोई यहां नाहीं आना, फाइन देना फेंक।।
197
कॉलेज में सीख नहीं, नाहीं गुरु ज्ञान।
प्रोफेसर आते नहीं, नेता तीन जहान।।
198
पान पान हैं एक नहीं, सबके अलग हैं काम।
एके तुलता ताखड़ी, एक का नग पर दाम।।
199
व सोना किस काम का, करे कान में छेद।
रिश्ते किस काम के, आपस में विभेद।।
200
मन भाव नहीं जानता, पिया मन भावना।
काम सर पछे पूछता, होली पछ लावणा।।
201
हर घर पर हम देखते, कर बीमारी घात।
सर किसी का फूटता, है किसी को धात।।
जिगर के दोहे क से ज्ञ प्रति वर्ण 11 दोहे
202
अधजली रोटी खाय के, मत कीजीए संताप।
चुपड़ी चुपड़ी देख के, मीत करो न अलाप।।
203
अंधी है वोह मावड़ी, जो होती कू मात।
नीड़ धीव का तोड़कर, खोटी करती बात ।।
204
अमर नारे सफाई के, फिर भी गंदा गाम।
अटी हैं सड़कें गंद से, बोलो किसके नाम।।
205
अदना जो हूआ आदमी , मन में उसके खोट।
बड़े मन का घण हुआ, खाए खुद पर चोट।।
206
असल से ब्याज प्रीत, जो ना छोड़ा जाए।
बेटे से पोता प्रिय, कंधे चढ़े है आये।।
207
अधम करे ना चाकरी, करते उधम हजार।
अड़ा रहे हर बात पर, मन में होत पठार ।।
208
अजनबी यहां कोई नहीं, सबमें सबकी जान।
आँखों पर पर्दा पड़ा, कैसे हो पहचान।।
209
अबला कहो ना नार को, सबला वो हर बार।
सबसे रिश्ते जोड़ती, बना रहे घर बार।।
210
अमर हुआ ना सूरमा, नहीं तरु का पान।
छोटी हुई जमीन है, खैर करे भगवान।।
211
अल्लाह सब का है अगर, सबका ईश्वर होय।
हारे का सहारा जो, शक्ति है जो कोये।।
212
अकड़ कर नहीं चालिए, नापी धरा न जाय।
माटी से है जो बना, मिले माट में आय।।
213
आंचल छोटा न मात का, बड़ हीये का बाप।
प्रेम बरसाए सायबो, करे काहे संताप।।
214
आना-जाना धन का, कोउ ना रहे पास।
आता जाता यह भला, किसी का ना खास।।
215
आना है जी तो आईए, वर्ना जाओ दूर।
अंध प्रेम फंसे बुरा, होत गये मशहूर।।
216
आदत बुरी बोल की, करे घोल घिचोल।
काम बीगाड़े आपना, मन की मन में तोल।।
217
आडंबर है भारी हुआ, करे धर्म की बात।
चौदह साल की गाय कटे, ना होय बर्दाश्त।।
218
आलस छोड़ मीत मेरे, बांध कमर के डोर।
बरखा आवती देख के, मन का नाचे मोर।।
219
आए अफसर अभी लंच से, गए मीटंग तत्काल।
जनता ऊबी बार करे, राज काज निहाल।।
220
आटा नहीं एक कण, रोटी मांगे पूत।
खेतों का धणी भूखा, मांगे राजा सबूत।।
221
आँख खुली रख बावले, बंद नाम की मौत।
पानी पछे जात क्या, फिरे पूछे गौत।
222
आधी सदी स्वाधीन की, पराधीन है आज
स्वतंत्रता जूती तले, नहीं आये तनिक लाज।।
223
अनशन पर नेता गए, जाए सरकार पसीज।
दो खानें और चाहिए, दे दो सारी लीज।।
224
इतना दिया दाता ने, दीया दिनो रात।
पेट भरा जब भूख से, आने लगी है बात।।
225
इक तू इक मैं इक सांस को, बांधे है इक डोर।
तारा एक -एक बीनते, जस की तस है भोर।।
226
इंधन नरक का आदमी। पत्थर कई वीशाल।
होनी जानी कुछ नहीं, थोथे बजाते गाल।।
227
इक दिन की बात नहीं, जाल है जीवन का।
मेल हटाए तन का हम, का करिहे मन का।।
228
इक तू होय इक मैं हूं, है तू मैं का फेर।
एक हुये तो हम बने, नहीं राख को ढेर।।
229
इधर की बात उधर की, करे घात पर घात।
माल लूटेरे ले गये, घर में ही आघात।।
230
इधर का उधर ऐसा हुआ, भूल गया मैं आप।
पत्थर हाथ से छूट गया, लाखों करो अलाप।।
231
इकतरफा सुने जोय, दे न्याय की टेर।
देरी हुई इंसाफ में, मानवता है ढेर।।
232
इंजन यह काम है, गाड़ी चले अबाध।
धकमधक्का पेलीये, मंजिल नहीं है हाथ।।
233
इद्दत बूढ़ी औरत की, जवान की भी होय।
कारण क्या है इसका, जाने है नहीं कोय।।
234
इस जग में हर चीज का, होता है इक दाम।
टेबल क नीचे मिले, करवाले कोई काम।।
235
ईश्वर अल्लाह एक को, ढूंढे फरे जहान।
निज मन खोजे आपनो, ये धर्म विधान।।
236
ईद मुबारक आपको, पूर्ण हों सब काम।
सलाम होव जिगर को, रहें सुखी तमाम।।
237
ईर्ष्या ना मर तृष्णा, बड़ बड़ बढ़ती जात।
घर के बरतन टूटते, बिछे नई बिसात।।
238
ईमान के ग्रहण लगा, हराम कमाई हाथ।
हराम की औलाद हुई, को बुढ़ापे साथ।।
239
ईसा मूसा मोहम्मद, राम बुद्ध महान।
सत्य मार्ग महावीर का, सब के साब समान।।
240
ईषित चिंता मत करो, रहे काम से काम।
हद से पार नहीं कोई, कारज होते हाम।।
#ईषित - तनिक, हाम - धीमे
241
ईक्षण करते संबंधों का, खुदी पर विचार।
आड़ी टेढ़ी बातों से, मालक खेवनहार।।
#ईक्षण - निरीक्षण, जांच
242
ईमानदारी कहो कहां, बेइमान का खेल।
चोरन बैठे राज में, साहूकार न जेल।।
243
ईख बोया हर खेत में, उपजे मीठा धान।
ज़हर बोया मन में है, मिटत है सम्मान।।
244
ईदृश व्यवहार नहीं, सदृश नाल सरोज।
जले जाल भीतर वहां, सूखी ताहे खोज।।
#ईदृश - इस प्रकार, ऐसा,
#सदृश - जैसा, समान दिखने वाला
245
ईला कहे पुकार कर, आ बसो मेरे पास।
नील नीला मिल गया, बची नहीं है लाश।।
#ईला - पृथ्वी, धरा
246
उदर पूर्ति करत हैं, कीड़ा, हाथी, सांप।
भेड़ जैसी होती हैं, ये पंचायती खांप।।
247
उठी किलोल हिय से, करती भाव विभोर।
बागों की या मोरनी, मेरे मन की चोर।।
248
उनमनी बैठी गौरड़ी, सायबो है उदास।
प्रभु पंख जो देयता, होते दोनों पास।।
249
उठती आग लकड़ी जले, जलता मांस शरीर।
हंस उड़ गया आकाश में, माटी हुई अधीर।।
250
उड़ा पंछी उस पेड़ से, नीड़ नहीं संग जाए।
दाना पानी उठ गया, भाग कहां ले जाए।।
251
उठ बंदे कुछ काम कर, कर जतन व्यापार।
साठी पछे कुछ नहीं, कांपे हाड़ कतार।।
252
उद्यमी सुख देखता, अधम जान की जूंख।
बैठे बैठे न मिले, कुवन जाते सूख।।
253
उड़ाते धन बापू का, माता करती सार।
बीच भंवर म डूबते, कोई न खेवनहार।।
254
उड़ती देखी न फंसती, देखे जीवन सार।
समय- समय की बात है, वो दाता दातार।।
255
उलझती रुई ओट के, काता जात कपास।
डोरी उलझी जीव की, कोइ काहे उदास।।
256
उत्तम खेती काम की, नौकर रहते त्रास।
मजदूरों का मान नहीं, उस राज्य का नास।।
257
ऊपर वाला जाने सब, तेरी मेरी हाण।
टोपी, तिलक दाढ़ीयाँ, होती नहीं पीछाण।
258
ऊसर भूमि जोतन की, माटी उड़ उड़ जाए।
समय रहे ना पाल बंधी, अब काहे पछताए।
259
ऊर्जा सूर्य से मिली, जल धूमकेत लाय।
पंचतत्व से जीव बना, सृष्टि का उपाय।
260
ऊर्णा हेतुल रेवड़, अन्न हेतुल खेत।
संतान हेतु पाप करे, चेत सके तो चेत।।
ऊर्णा - ऊन
261
ऊर्मि समंदर से उठी, ले गई सबन उठाए।
अपराध बोध हो गया, दो-दो आंसू बहाए।।
ऊर्मि - लहर
262
ऊपजे सबका भाग है, अकाल सबकी मौत।
ले हल खेत संवारिए, अनंत निपजे जोत।।
263
ऊंचा नाम है एक का, जिसके नीचे हम।
भली-बुराई जानता, क्या खुशी का ग़म।।
264
ऊख लगे ना बाड़ में, इतर करिए उपाय।
सुंठ लगे ना खेत में, को तोहे समझाए।।
ऊख - गन्ना, ईख
265
ऊंट शक्ति का पुंज है, ये थके नहीं काज।
तप्त दिन की धूप में, मूर्ख कहे समाज।।
266
ऊषा की रण भूमि में, सजे धरा के फूल।
दोष सूरज को मिले, मानव करता भूल।।
267
ऊबड़ खाबड़ जीवन है, नाहीं सपाट होय।
जीवन मरण अटल हुआ, रोक सके ना कोय।।
268
ऋतु बसंती उत्तम है, शीत ग्रीष्म घोर।
फाग पपीहा टेरता, सावणी चितचोर।।
269
ऋणी ना कर्जे बावजी, उऋणी लाख उपाय।
चूके दाम न कर्ज के, मरते मर मर जाय।।
270
ऋषभ लांघता बाड़ को, गौ माता का पूत।
गोशाला के दान से, दारू पीत अकूत।।
ऋषभ - बैल, सांड, अकूत - अत्यधिक
271
ऋग्वेद में दया धर्म, यही कहे कुरान।
बाइबल सत्य खोजता, नश्वर है इनसान।।
272
ऋत्विज यज्ञ मंत्र गाते, मुल्ला कह अजान।
बीशप ईशू याद करे, एकेक को परमान।।
ऋत्विज- पुरोहित, मुल्ला - मुस्लिम धर्मगुरु, बीशप - ईसाई धर्मगुरु
273
ऋजु ना कोई मन रहा, ना सीधी सट बात।
पानी पी के पूछता, का तिहारी जात।।
ऋजु - सीधा, सरल
274
रिद्धी सिद्ध एकदंत, शिव तांडव अंधेर।
शांत देव हैं राम जी, किशन रण का फेर।।
ऋद्धि - समृद्धि, उन्नति, तांडव - शिव का नृत्य, किशन - कृष्ण
275
ऋचा पढ़े पंडित जी, पढ़े आयत कुरान।
सुमिरत नाम एक को, जान सके तो जान।।
ऋचा - वेद मंत्र, आयत - कुरान के मंत्र
276
ऋषि संत गुरु हुये, देत ज्ञान आपार।
नासमझ समझते नहीं, मानुष का संहार।।
ऋषि - गुरू, मानुष - मनुष्य
277
ऋतम्भरा की खोज में, मानव चढ़े पहाड़।
मन काहे ना खोजता, जहां विष के झाड़।।
ऋतम्भरा - सत्य की खोज, मोक्ष हेतु साधना
278
ऋतुराज के आने से, बंध गई पायल पांव।
फूले फले हरि हरि, नाचे पीपल छांव।।
ऋतुराज - बसंत ऋतु
279
एड़ी मार कर धरा पर, शक्ति करे बखान।
विपत्ति मूंह आ लगे, ढूंढे कौन खदान।।
280
एक नाम एक को, दो में नहीं समाय।
एक-एक में आकर मिले, नीर गंगा कहलाय।।
281
एक से होत अनेक हैं, अनेक टूटते एक।
समय समय की बात है, साहब राखे टेक।।
साहब - ईश्वर, टेक - लाज
282
एकाग्रता से साधिए, चाहे जो फल खास।
भटके कुछ ना मिले, काहे होत उदास।।
283
एकता में है बल बसै, कर फूट नुकसान।
एक एक कांकड़ जोड़ कर, चुन जाता मकान।।
284
एकांत में जो खोजता, निज मन का संसार।
पावता है वही अंततः, जीवन का आधार।।
285
एहसानों का बोझ मत, सर पर रखना मीत
नेकी करके भूल जा, यह संतन की रीत।।
एहसान - परोपकार
286
एतबार जिस पर करो, करते हो एतमाद।
सोने जैसा दीखता, हो सकती है खाद।।
एतबार - भरोसा, एतमाद - भरोसा, खाद - उर्वरक, सोने में मिलने वाली धातु, खोट
287
एड़ी घिस-घस चल पड़ा, लेकर मन में आस।
मंजिल पांव पखारती, हृदय में विश्वास।।
पखारती - धोना, साफ करना
288
एक दिवस सब छोड़ कर, जाना पड़े जहान।
नेकी ही संग चल सके, रहे यहीं सामान।।
289
एषणा है जो बलवती, करती कौल अनेक।
तृष्णा धोखेबाज है, फेंक सके तो फेंक।।
एषणा - तीव्र इच्छा, तृष्णा - प्यास।
जिगर के दोहे (ऐ)
290
ऐनक लगत दुनिया को, दिखे दीन हज़ार।
मन का दर्पण साफ हो, दृष्टव्य सनसार।।
दृष्टव्य - जो दिखाई देता है।
291
ऐतिहासिक कर्म जो, परोपकार महान।
बाद मरने के रहता, उनका यश सम्मान।।
यश - शान ओ शौकत, मान।
292
ऐश्वर्य मिला अपार जब, भूला अपना मूल।
झोंका आया पवन का, गिरा अहं का फूल।।
ऐश्वर्य - धन संपदा, अहं - घमंड।
293
ऐच्छिक सेवा जो करे, न कोई प्रतिदान।
उन चरणों में मिलती, मानवता की शान।।
ऐच्छिक - स्व प्रेरणा से, प्रतिदान - बदला
294
ऐक्य भाव से देश का, बढ़ता है सम्मान।
टूटे जब आपस में मन, होत है नुकसान।।
एक्य - एकता
295
ऐलानों से कुछ नहीं, सम न हो व्यवहार।
फल देत हरा वृक्ष ही, नहीं ठूंठ के भार।।
296
ऐंठन मन की छोड़ दे, रख विनम्रता संग।
झुकती डाल फल भरे, बजती थाप मृदंग।।
297
ऐड़ी रगड़े आदमी, धनी धान के हेत।
सुख मिलता संतोष से, मोती निपज खेत।।
298
ऐरावत सा बल मिले, हो जो मन में धीर।
विपत्ति मुड़ जात हैं, शांति रहे शरीर।।
ऐरावत - एक हाथी का नाम।
299
ऐयाशी की मार्ग पर, जो चले दिन-रेन।
गवां देता सम्मान वह, रहता है बेचैन।।
300
ऐंद्रजाल है यह जगत, मायावी विक्षोभ।
सत खोजता जो फिरे, छोड़ सके ना लोभ।।
ऐद्रजाल - इंद्रजाल
301
ओज भरे सत्कर्म से, जग में हो पहचान।
धन वैभव सब छूटते, अमर रहेगा ज्ञान।।
ओज - चमकता,
सत्कर्म - अच्छे कर्म
302
ओस कणों का जीवन है, चढ़ते सूरज खोय।
जीवन बादल रुई का, समझ सके ना कोय।।
304
ओढ़नी मातृ स्नेही, बड़ी सर्वोच ढाल।
तपती धूप दिन चढ़े, रखती सदा संभाल।।
मातृ - माँ,
सर्वोच - सबसे बड़ी
305
ओट धर्म की ले रहा, करता है अन्याय।
भीतर मन के झांक ले, सत्य मिलेगा आय।।
306
ओझल होता जा रहा, मानव मुखी नूर।
नफरत के बाजार में, घृणा है भरपूर।।
नूर - चमक, प्रकाश,
नफरत - घृणा
307
ओंकार की है साधना, करे मन को विशाल।
अंतर पे अधिकार को, करे वश में कमाल।।
ओंकार - ऊं आकार, शिव
साधना - पूजा
अंतर - अतः मन (भावार्थ)
308
ओला पड़ा किसान पर, टूटी सारी आस।
मेहनत उसकी ढह गई, बैंक कुर्की वास।।
कुर्की - बैंक द्वारा कर्ज नहीं चुकाने पर घर, मकान पर कब्जा करना।
309
ओछा मत व्यवहार कर, चाहे हो बलवान।
मृदु वचनों से बने, मीठी ठेठ ज़बान।।
मृदु - मीठा
310
ओखल में सर दे दिया, फिर काहे का डर।
संकट से जो खड़ा रहा, हो विजय उसी घर ।।
ओखल - ओखली
311
ओंधे मु बजार गिरा, ताक में संविधान।
बंदर बांट खाते सबन, देश धर्म अवसान।।
अवसान - नीचे गिरना
312
ओढ़ते सत्य की ओढ़नी, झूठ के व्यपारी।
मुख कालिख से जड़ा, खंजर हैं दोधारी।।
दोधारी - दो मुंहि
313
औचित्य बिन कर्म के, होते नहीं सकार।
तीनअवतार मिल कर, बनाते है सनसार।।
औचित्य - उचित होना
314
औषधि तन के रोग की, मन की नहीं है कोये।
मन की हो चिकित्सा, निर्मल गंगा धोये।।
औषधि - दवाई
315
औदार्य जहाँ दिल में, बसता सत्य प्रेम।
धन से बढ़कर मानिए, मानवता का नेम।।
औदार्य - मानवीय मूल्य, उदारता
316
औजार हल है खेत के, भरा पूरा उद्यान।
फूल खिले अरमान के, नीपज गेहूं धान।।
औजार - उपकरण
317
औसत जीव जी रहे है, सभी जगत के लोग।
सपनों को निखार दे, सुंदर सारा लोक।।
318
औलाद यह पहचान हैं, मां पिता की शान।
संस्कार से दे दिया, जीवन को सम्मान।।
औलाद - संतान
319
औपचारिक संबंधों से, मिलता कहाँ सुकून।
मन मन से जुड़ा रहा, दिन रात हो दून।।
320
औद्योगिक विकास से, भौतिकी विकास।
प्राकृतिक विनाश, दारूण्य अहसास।।
321
औत्सुक्य मन में रखो, सीख नित नव ज्ञान।
रुकता जल दुर्गंध दे, बहता अमृत पान।।
औत्सुक्य - उत्सुकता
322
औकात से न तौलिये, धीरज धर ले यार।
कर्मफल से ऊँचा बने, जीवन का उद्धार ।।
औकात - सामर्थ्य
323
औघड़ बनकर घूमते, इतने जग में लोग।
निर्मल हो प्रेम से, मिट जाएँ सब रोग।।
औघड़ - संन्यासी
324
अंक पढ़ाई की पहचान, संस्कारों से दूर।
शून्य नैतिक सीख है, अंक मिले भरपूर।।
325
अंग देह से हैं जुड़े, है ज्यों समुदाय।
एक में विकार हो तो, दूजा भी करे हाय।।
326
अंश-अंश से पूर्ण होय, कण- कण का स्वरूप।
बूंद-बूंद के मेल से, वर्षा का है रूप।।
327
अंकुर फूटे बीज से, पाकर पानी खाद।
माता देवती घर में, वर्ण निनाद।।
देवती - देती
328
अंगारे उगल वो रहे, जो धर्म के अधीश।
मजहब को जाने नहीं, उलटी चाकी पीस।।
329
अंगूर मीठे हैं नहीं, सच्ची लोमड़ बात।
दादुर काम टर्रना, जब आएगी बरसात।।
330
अंधा मांगता लाकड़ी, बूढ़ा मांगे प्रीत।
बालक का मन खान कू, सेना मांगे जीत।।
कू - के लिए
331
अंधविश्वास बढ़ गया, फैल गया पाखंड ।
सत्य छुपा समाज से, असत्य हुआ प्रचंड।।
प्रचंड - अत्यधिक
332
अंत समय कुछ साथ ना, धन वैभव परवार।
सत्कर्म का पूंज संग, कर दे बेड़ा पार।।
वैभव - शान
333
अंतरमन की यह कबत, कहती नानी रोज।
नाती पोते सुन रहे, नयी कहानी खोज।।
कबत - कहावत
334
आनंद उसको कह दिया, क्षणिक जो अहसास।
परमानंद को भूल कर, झूठी सुख की आस।।
परमानंद - परम आनंद
335
कर्म बिना किस भाग्य का, खुलता जग में द्वार।
मेहनत की पतवार से, मिलता बेड़ा पार।।
336
करुणा जिसके हृदय में, बसता सदा विवेक।
दुखियों के आँसू पिए, वही मनुज है नेक।।
337
कल्याणक पथ पर चले, त्यागे छल अभिमान।
उसके जीवन में सदा, खिलते रहें विहान।।
338
कर्तव्यनिष्ठ मनुष्य का, ऊँचा होता मान।
संकट में भी जो अडिग, वही सच्चा इंसान।।
339
कृपा ईश की प्राप्त हो, जब हो निर्मल चित्त।
द्वेष कपट सब दूर हों, जागे प्रेम असीमित।।
340
कौशल से हर कार्य का, मिलता सुंदर रूप।
अनगढ़ पत्थर भी बने, साधक पाकर धूप।।
341
कल्पना के पंख पर, उड़ता मानव ज्ञान।
इसी शक्ति से गढ़ सका, विज्ञानों का मान।।
342
काव्य हृदय की वेदना, और खुशी का गान।
शब्दों में ढलकर बने, जनमन की पहचान।।
343
कीर्ति वही अमर रहे, जो जनहित में खोय।
स्वार्थों की दीवार तो, समय स्वयं ही धोय।।
344
कृतज्ञता का भाव हो, जीवन बने महान।
जिसने दिया सहारा कभी, रखना उसका मान।।
345
संस्कृति की छाया तले, फलता सदा समाज।
जड़ से कटकर वृक्ष भी, खो देता है ताज।।
346
खग नभ में उड़ते रहे, नूतन रोज उड़ान।
बंटे देश सीमा बनी, अविभक्त आसमान॥
खग - पक्षी, नभ - आकाश, नूतन - नया, अविभक्त - बिना बंटा हुआ।
347
खगोल के इस भेद में, समाहित सनसार। जिज्ञासा की जोत से, लिख विज्ञान का सार॥
खगोल - अंतरिक्ष विज्ञान, समाहित - जुड़ा हुआ , जिज्ञासा - उत्सुकता।
348
खबर वही उत्तम लगे, सच का जो हो स्तंभ। झूठी खबर परोसकर, टीआरपी का दम्भ॥
स्तंभ - खंभा, टीआरपी - प्रसिद्धि, दंभ - अहंकार।
349
खुशी बाँटन से बढ़े, घटे नहीं इक बार। दीपक जैसे जोत दे, प्रकाशित संसार॥
जोत - ज्योति।
350
ख्यात हो सत्कर्म से, धन मिले सामान। सज्जनता के कारणे, हो मनुज भगवान॥
ख्यात - प्रसिद्धि, सत्कर्म - अच्छे काम, मनुज - मानव।
351
खनिज धरा की संपदा, संतुलित उपभोग।
अंधाधुंध दोहन करे, सम्मुख संकट कोप॥
दोहन - अत्यधिक उपयोग, कोप - ईश्वर का क्रोध।
352
खजाना सोना है नहीं, शिक्षक है धनवान। चोर नहीं चुरा सके, ज्ञानी का सामान॥
353
खलिहान में गूँजती, मधुर श्रम हुंकार। क्रांति धवल हरि से, पड़े अकाल से पार॥
धवल - सफेद
354
खिड़की सबन खोल दो, ना बंदी घर समाज।
खुले हों विचार तो, झुकी आँख में लाज॥
लाज - लज्जा
355
खेती धरती की उमंग, पुजा करे किसान।
पेट काटकर पालता, उपजे गेहूं धान॥
356
खेद जता ना गए समय, सोच भविष्य कार।
करे लगन से काम तो, उपजे सोन पठार॥
कार - कार्य
357
गगन विशाल सीख है, देख अपनी औकात।
जमी से जुड़कर रहे, ज्यों सूर प्रभात॥
सूर - देवता, सूर्य
358
गंगाजी की धारा में, निरमल हो शरीर।
सेवा और प्रेम से, एक हो सरवर तीर।।
सरवर - तालाब
359
गणित सिखाता जगत को, करे सवाल जवाब।
तजे तर्क विज्ञान को, कह दो उसको साब॥
हाथ जोड़ दो साब - अलविदा/किनारा करना
360
गति जीवन की थम गई, छूट गए जो प्राण।
सरिता सागर मिली, बंद नख शिख घ्राण॥
सरित - नदी, नख - नाखून, शिख - चोटी, घ्राण - नाक।
361
गरिमा उसकी बढ़ गई, जिसने छोड़ा दंभ।
विनय सुगंध फूल की, कृष्ण रुकमणि शंभ॥
शंभ - कृष्ण रुक्मणि का पुत्र/कल्याणकारी/लाभदायक
362
गर्व करो उस कर्म पर, परहित की जे कोइ।
वचन असत्य त्याग कर, ब्रह्मलीन होइ॥
ब्रह्मलीन - मोक्ष प्राप्ति।
363
गहन अँधेरा छँट गया, जला ज्ञान का दीप।
मन दीपक जला रहे, मुमुक्षु प्रदीप॥
मुमुक्षु - सन्यासी, प्रदीप - प्रकाशित
364
गायक वह उत्तम कहे, जो गायन मन छूत।
स्वर भरे समवेदना, बाजे चर्म अछूत॥
समवेदना - संवेदना, चर्म - चमड़ा।
365
गाथा उनकी गूँजती, जो करते उपकार।
जीवन पथ पर छोड़ते, सेवा मय सत्कार॥
उपकर - भलाई
366
गुरु बिन ज्ञान न ऊपजे, मद मिटे ना मोह।
ईश्वर चरण गुरु के, तनिक नहीं संदेह॥
मद - नशा, मोह - लगाव
367
गौरव उसको है मिला, सतही करता काम।
धरा अविरल घूमती, होती सुबह शाम॥
सतही - फलदायक, अविरल - लगातार
368
घड़ी समय की दे रही, पल-पल नई पुकार।
जो इसका सम्मान कर, उसका हो उद्धार।।
369
घर खाली प्रेम बिन, मन बिन विश्वास।
धन-दौलतें व्यर्थ हैं, अपनापन सूवास।।
370
घन नभ छांवन में बने, घनेर बरसे नीर।
धरती मुस्काए तभी, हर ले मन की पीर।।
371
घनघोर अँधेरा हुआ, घेरले चारों ओर।
आशाओ के दीपक जले, तब ही होती भोर।।
372
घमंड अहं दो शत्रु है, करे मति विनाश।
विनती की पौधों पर, फलत यश विश्वास।।
373
घमासान जीवन हुआ, हर कोई परेशान।
धीर जिसकी ढाल हो, क्षमावान बलवान।।
374
घटना हर सिखा रही, देखे सारे ढंग ।
अनुभव गुणवान है, सातों कला के रंग।।
375
घोषणा में कुछ नहीं, जब तक ना हो काम।
मन के सोचे हो नहीं, भ्रमण चारों धाम।।
376
घास झुके तूफान म, लौटे उसी स्थान।
जो जन अकड़े है यहां, कब पाता सम्मान।।
377
घट-घट का पानी पिए, देखे जग का खेल।
पल-पल फिरत बात से, ये हैं बांके छैल।।
378
घोड़ा बन के चर रहा, लोभी भरता पेट।
जन्म मरण के बंधन से, अपने पाप समेट ।।
379
चंद्रमा शीतलता कर, जग को देत संदेश।
क्रोधाग्न त्याग कर, मिटता विद्वेष॥
380
चमन फलता प्रेम से, खिले फूल हजार।
मन उपवन फुले - फले, तज द्वेष विकार॥
381
चतुर वही संसार में, जो पहचाने काल।
अवसर का उपयोग कर, थरपे नूतन भाल॥
382
चरित्र है धन से बड़ा, दुष्कर इसकी रक्ष।
धन वैभव मिट जाते, चरित्र कीर्ति यक्ष।
383
चिंता चिता का नाम, जलाती मन शरीर।
चिंतने समाधान है, रखते समझ गंभीर॥
384
चैतन्यता जब बलवती, मिटता है अंधेर।
ज्ञान दीप के तेज से, रात में भी सवेर॥
385
चिकत्सक भगवान हैं, करते हैं उपचार।
फीस कमीशन भर रहे, वो अपना घर बार।।
386
चित्र में है रंग भरे, और जीवन में उमंग।
सुख, दुख के साथ है, जैसे थाप और चंग॥
387
चीड़ मणिकों से बने, गहनों की बंदनवार।
बांधे डोर स्नेह की, प्रिय को भरतार॥
388
चिलचिलाती धूप में, लिए फावड़ा हाथ।
एक किरण उम्मीद की, दे दे भगवन साथ॥
389
चक्र समय का घूमता, रहता नहीं समान।
रात काल की छंट गयी, बदलते दिन- मान॥
390
छत के नीचे बैठ कर, मत कर मन की बात।
जीवन कोरा है घड़ा, फोड़ न कर तू घात॥
391
छल-कपट सब त्याग कर, साधो निर्मल भाव।
खुद को जो पहचान ले, अमृतमय प्रभाव॥
392
छाता लेकर चल पड़ा, धूप, छाँव या रात।
थोड़ा जीने के लिए, मुख बुराई बात॥
393
छड़ी हाथ में थाम कर, बुढ़या धीरे आए।
छन-छन सांसे टूटती, बीता न वापस आए॥
394
छाल पेड़ की देख ले, सूख रही जो तान।
छेद करे घुन जहाँ, का ही करे इंसान॥
395
छलनी से छनता नहीं, मीठा-मीठा नीर।
पीना चाहे जो इसे, धार बहुते धीर॥
396
छाया में आराम करे, तपी हुई है धूप।
खड़ा जहाँ पर पेड़ है, वहीं मिलता कूप॥
397
छलांग लगा व्योम में, अब तू डर को छोड़।
छोर मिले जब लक्ष का, मन से मनका जोड़॥
398
छिलका न बेकार है, रक्षक फल की करे।
रक्षक को हमी फेंकते, देखें कामी देह॥
399
छकड़ा धू-धू जल गया, स्वाह है सब यार।
जो बीते को भूलते, वही करें सुधार॥
400
छह ऋतुएं हैं वर्ष में, बदलें अपने भेष।
सुख-दुख इ समान हैं, काहे करे क्लेश॥
401
सागर सा निर्मल हो, होए मनवा शुद्ध।
मैला हृदय धो सके, यह धर्म का युद्ध॥
402
जग यह है स्कूल बड़ा, नित्य नया संदेश।
सीखे जो हर हाल में, हर ग्राम और देश॥
403
जन जन में ईश्वर बसे, धारे मानव रूप।
बन सेवक भगवन मिले, नमाज पूजा धूप॥
404
मनवा करे काम सही, फले बांस सी बेल।
अवगुण बदनाम करे, अजीब खेले खेल॥
405
जीवन इक प्रवाह है, बहुते दिन-रात।
बिन रुके चलता रहे, पाए वही सौगात॥
406
जय उसकी सनसार में, जो जीते नीजि लोभ।
मन के रण को जीत कर, मिटते सकल क्षोभ॥
407
जतन से फलते-फुले, होता जग में मान।
मेहनती की धूप से, सूर्य चंद्र समान॥
408
जागृत हो ज्योत जो, मिटे अज्ञान-अंधेर।
ज्ञान-दीप जब जल गया, छँटे भ्रम के फेर॥
409
जंगल देता सीख यही, रहो सब ही के संग।
तरुवर मिलकर बना, प्रकृतिक सतरंग॥
410
जिज्ञासा की अगन से, खुलत ज्ञान-कपाट।
प्रश्न से ही खोज लो, जीवन की सब बाट॥
411
जुनून गर अटल रहे, होत सफलता-धाम।
काँटों में खिलते है , श्रम के परिणाम॥
412
झरना बहे प्रेम का, देता शीतल पान।
ठहरे जो सड़ने लगे, सतगुरु का ज्ञान॥
413
झंडा ऊँचा राष्ट्र का, रहे सदैव संभाल।
निज देश सम्मान में, दे दे तन मन भाल॥
भाल - सिर
414
झंकार वीणा की कहे, जीवन मधुर धुन।
कटु वाणी को छोड़ के, मीठी बोली चुन॥
415
झलक सत्य की पा गया, मिट जाता अज्ञान।
एक किरण से दूर हो, अंधियार का भान॥
भान - विश्वास
416
झोपड़ी हो प्रेम की, होय स्वर्ग समान।
महल से क्या लाभ है, यदि न हो सम्मान॥
417
झूला जीवन का यहां, सुख-दुख है छोर।
धीरज जा की डोर है, अस्त उदयत भोर॥
अस्त - डूबना, छिपना
उदयत - उगने वाला, उठने वाला
भोर - सुबह
418
झाड़ी जैसी सोच को, रखिए दूरी काट।
सद्गुगुणों के बीज से, फसल सुहानी लाट॥
लाट - खेत में खड़ी फसल को काट कर इकट्ठा करना।
419
झगड़ा अगन समान है, जला देत परवार।
प्रेम रस की बूँद से, सदा बसे घर बार॥
420
झूमर बन सूर्य देव, करता जगत आलोक।
घूम घूम अवलोकता, कहां धरा पर शोक॥
421
झरोखे से न देखिए, जग का सुंदर रूप।
बाहरी आकर देखिए, कहां छाँव या धूप॥
422
झंझावातों का डर नहीं, संगी साहसी साख।
संघर्षों के मैदान में, खुदी कटते बाख॥
साख - सम्मान, बाख - ऊपरी त्वचा के नीचे की त्वचा/epidrmis
423
टहल रहे हैं बाग में, मन में भरी उमंग।
डाली - डाली झूमती, चहकता हर इक अंग॥
424
टमाटर रंग लाल भया, जैसे भानु भोर।
टोकरी सी है भरी, देख धरा चहुं ओर॥
425
टकराव से न बात हो, कर जीवन में मेल।
बिछड़ के फिर मिलें, ना जाने का खेल॥
426
टांग अड़ाना छोड़ दे, मत करो ओछे काम।
टिकता है यहां वही, रखे काम से काम॥
427
सर पर टोपी है धरी, है धर्म परिधान।
मिलता मोक्ष कर्म से, झूठ करे अवसान॥
428
टिमटिम तारे करे, शांत हुई है रात।
दूर हुए जब मोह से, चले छोड़ के साथ॥
429
रोटी टुकड़ा नाहीं, यही जीवन आधार।
टूट न जाये भूख से, सपनों का सनसार॥
430
टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता, रुका वहीं का होय ।
टूटी टहनी नीम की, जोड़ सके ना कोय॥
431
टंकण करती मशीन है, आखर गढ़ती हजार।
सधी अंगुली से बने, सुबह का अखबार॥
432
टलता नहीं समय कभी, जो लिखा सो होय।
लाख करे उपचार जो, मर्ज ना मारे कोय॥
433
टकरा कर जो है चला, कहलाता है वीर।
अंत तक जो टिका रहा, वही है परमवीर।।
434
ठंडी तरवर की छाया, देती सुख अपार।
तप्त धरती पर मिले, जीवन तारण हार॥
435
ठहरावों से सीखते, चलने का विकल्प।
साधु हठी बहते भले, करके जतन अकल्प।।
अकल्प - अनगिनत
436
ठिकाना ठाकुर के भला, चौधरयों के धान।
पंडित घर पोथी भली, मुल्ला घर कुरान ॥
437
ठिठोली सीमित हों, घर जानी का खेल।
हंसी हंसी में बढ़ती है, ये झगड़ों की बेल॥
438
ठोस इरादे का धनी, ऊँची भरे उड़ान।
दृढ़ संकल्प के बिना, ना ही बढ़ता मान॥
439
ठेला श्रमिक खींचता , माथा पसीने तर ।
रहते समय संभला नहीं, जो जी चाहता कर॥
440
ठगी चोरी कूमार्ग है, आजीवन का ये दंश।
भूत योनि में भटके, पत्थर मारता वंश॥
441
ठप्पा है ऊँच-नीच का, मानवता पे कलंक।
सबका लहू है एक सा, होय राजा या रंक॥
442
ठसक अहं की त्याग कर, समझे का है फेर।
बेफल पेड़ ऊंचा गया, झुकी झाड़ी बेर।
443
ठाठ-बाट सब रहे गए, निकले जब प्राण।
कर्म किए ही संग चले, विधि का विधान॥
444
ठोकर खाकर जो उठे, बनते हैं बलवान।
लाल पालने का कहे, बेमाता का दान॥
बेमाता - भाग्य की देवी।
445
डगर कठन हो सामने, शेष बहुते काम।
साहस जिसके संग है, करो आराम हराम॥
446
डाली-डाली फूल हैं, है मधुर सुवास।
राम भरोसे चल रहा, तार तम विश्वास॥
447
डंका बजे है जगत में, झूठा बेड़ा पार।
सम्मान बिन कर्म के, सच के टूटे तार ॥
448
डमरू डमडम करे, देता शुभ संदेश।
शिवम डमरू बोलता, हो तांडव प्रवेश ॥
449
डब्बा भरकर लोभ का, मत रखना मन माहिं।
संतोषी मन में लिये, होती कमी नाहिं॥
450
डाकया ले डाक चले, घर-घर बांटे स्नेह।
प्रीत पत्री से जुड़े, बरस लाडले मेह॥
451
डोर जैसी प्रीत हो, होय सरल मजबूत।
बंधन बंधे अटूट रहें, धन्य धान्य अकूत॥
452
डोली ले कर चल पड़ी, बेटी अपने धाम।
आँखें नम परिवार की, चलते अपने गाम॥
453
डेरा यहां चार दिन, भोर तक का पड़ाव।
सत्कर्म पूंजी संग में, अमर यही प्रभाव॥
454
डुबकी ज्ञान कुंड में, करके सच का भान।
चुन मोती सीपी से, पूरे सब अरमान॥
455
डगमग नैया बीच में, है भंवर अति जोर।
जो लिखा सो होयसी, टूटे श्वास डोर।
456
ढंग सलुखना सीख ले, होय जीवन आसान।
मीठे बोलों से बढ़े, जन जन में सम्मान।।
457
ढांचा चित्र चरित्र का, रखिए सदा सँभाल।
आंधी बरखा लाख होय, टूटे सके न ढाल।।
458
ढाल बने जो ओरों की, वो है बड़ा इंसान।
स्व सुख को छोड़ कर, रखता सबका मान।।
459
ढीला मत ना छोड़ना, कर्मों का एतबार।
मेहनत से होय सके, जीवन का उद्धार।।
460
ढोल बजाकर क्या मिले, जो मन रहे उदास।
प्रसन्नता प्रेम में, झूठ है सारी आस॥
461
ढोंग सम्मुख दीखता, नहीं शुद्धाचार।
अंतर निर्मल है नहीं, कहां बसे करतार॥
462
ढूंढें जग में सुख सभी, भटके बारमबार।
अपने भीतर झाँक ले, वहीं है सुखसास।।
463
ढेर लगे धन-धान का, होत फिर बेचैन।
संतोषी के हृदय में, बसता सुख दिन रैन।।
464
ढेला छोटा सा सही, कर दे जल में शोर।
छोटा सा प्रयास भी, बदल सके है दौर॥
465
ढाबे जैसी प्रीत हो, खुले हुए द्वार।
भूख मिटती अन्न से, तृप्ति का गहवार॥
गहवार - आश्रय/पालना
466
ढलना सीखो समय संग, यही समय का ज्ञान।
बदलावों को मानता, लगती उसकी तान।।
467
देत तरवर छांव नित, फल भी दे भरपूर।
अंधाधुंध है काटता, मानव मद में चूर।।
468
तप से कुंदन बन सके, मिट जात विकार।
छैनियों की चोट से, पत्थर बने सरदार।।
469
तपस्वी वही जानिए, जीते मन के भाव।
लोभ मोह को त्याग कर, साधे सत का दाव।।
470
तन मानव को है मिला, कुदरती उपहार।
दया, साधना, सीख से, द्रवत कर उपकार।।
द्रवित (द्रवत) - लयात्मक/लचीला
471
तनया घर की रोशनी, जीवन का आधार।
रौनक रहती हर घड़ी , आंगन कुटि द्वार।।
472
तनिक धीरज राखिए, धरिये ऊंची पाग।
मेह आव शनै शनै, गाए पपीहा राग।।
473
तन्मय होकर जो करे, सफल होत हैं काज।
रहे सफलता चरण में, सजता सर पर ताज।।
474
तलवार की जीत नहीं, है पूंचा में पाण।
मन जीते की जीत है, खींचे टूटे ताण।।
पूंचा - हाथ की कलई, पाण - शक्ति/बल, ताण - खिंचाव, बुनाई का धागा।
475
तारा बन चमको सदा, रह बढ़त दिन रात।
सूरज चढ़ता ही करे, सब जग में प्रभात॥
476
तुलसी की साधुता, रहीम जैसा काम।
दादू , मीरा जायसी, कबीर जैसा नाम॥
477
तेज, त्याग सुगंध सा, रहे निर्मल होय।
दिन दून प्रगति करे, जो इंसान हो कोय।।
478
थकन होय पथ बीच में, मत करना विश्राम।
मंजिल उनको मिल गई, जो चले अविराम।।
479
थल पर चलते कारवाँ, सहते धूप अपार।
कर्मफल सिद्धांत है, नहीं भाग का भार।।
480
थाम हाथ कमजोर का, बन के तारण हार।
सेवा से बढ़कर नहीं, कोई धर्म विचार॥
481
थाती अपनी भौम की, रखिए सदा सँभाल।
पुरखों की विरासतें, होत अनुपम ढाल॥
482
थिर जां का मन होया, जीते जग के खेल।
चपलता इक जंजाल है, रहे डील को ठेल॥
थिर - स्थिर, चपलता - चालाकी, डील - शरीर।
485
थिरके मन संगीत से, उठ पांव खुद ज़ोर।
सुर ताल जहां मिलें, नाचे मन का मोर।।
486
थाह धरा की न मिली, हुआ न सागर सार।
गहराई मन की मिले, भव सागर से पार।
487
थूकता ऊपर जो कोई, गिरे खुद पर आन।
घमंडी सर नीचे रहे, रख सदा यह ध्यान।।
488
थैले धन से भर लिए, सके न नींद खरीद।
संतोष हृदय में रहे, साधु होय फरीद।।
489
थरथर कायर कांपते, दिखते संकट दूर।
मिठाई गपा गप करे, खारा लगे है थूर।
थूर - थोर/कंटीला पौधा।
490
थामे अटल की आंगली,
हो सोच गतिशील।
झूठ चंद दिन ही चले, स्थिर सत की कील।।
491
दया धर्म की साख है, इंसान की पहचान।
बिना दया नहीं लगे, मजहब का उद्यान॥
492
दान वही उत्तम हुआ, करे जो हाथ जोर।
दीन हीन का मन रहे, नहीं मचाए शोर॥
493
दर्पण झूठ न बोलता, सत्य दिखाए रूप।
अन्तरमन गंगा हो तो, मानव नहीं कुरूप
494
दर्शन धोत न पाप को, न हज नाश गुनाह।
परहित ऐसा काज है, मिले ईश की छाह।।
495
दरिया जैसा दिल हो तो, उपजे मोती लाख।
मीठी बोली शहद सी, चाख सके तो चाख।।
496
दूता भला न देवता, कराता है क्लेश।
दूती जाती है जहां, झगड़े का प्रवेश।।
497
दीप जलते प्रेम के, अन्त घृणा अंधेर।
संवेदना के आलोक से, निकसे मन का बैर।
498
दिशा सम हो कर्म की, मिले रब निवास।
भटके मन को थाम ले,
बन मालक का खास।।
499
दिव्य जीवन वो कहें, जा में हो सद्भाव।
साधु उसको कहीये, उसके घट सम भाव।।
घट - हृदय
500
दुःख सुख एक वहम है, कारण इसका लोभ।
लालच जो जीत ले, उसका मिटता क्षोभ।।
क्षोभ - दुःख
501
दोस्त है एक ही भला, दे विपत में साथ।
गुण गाड़ी भरे नहीं, अनाथ का भी नाथ।।
502
धन बिना ना मिले, कफ़नी का सामान।
धन से ही होती रही, घर- बाहर पहचान।।
कफनी - कफ़न
503
धर्म कभी मिटता नहीं, लाखों कर के जतन।
अधर्म होत भंगूर है, होगा जरूर पतन।।
भंगूर - नश्वर/क्षणिक
504
धरती सबकी मात है, पोषत सीना चीर।
संतान मिटाने पर तुली, बात है यह गंभीर।।
मात - माता, पोषत - पालना/पोषण
505
धैर्य का धन है बड़ा, रहे हो के गंभीर।
चढ़ने बाद ढलान है, रख मन में धीर।।
506
ध्यान कर चहुं दिशा, सजन दुर्जन भेद।
एक थाली में जीम कर, कौन करेगा छेद।।
सजन - मित्र/भला, दुर्जन - शत्रु/बुरा, जीम - भोजन करना।
507
ध्वज देश की शान है, पूर्वजों की ग़ाथ।
श्वास बदले यह बचे, ओढ़े कफ़न के साथ।।
508
धूप जितनी है खिले, कीजे उतना काम।
सोवता प्रीतम नहीं, हुआ आराम हराम।।
सोवता - नींद में, प्रीतम - प्रियतम।
509
धुन जिस मन में बसी, करता वही कमाल।
बाधाएँ झुकने लगें, वही बदलते हाल।।
510
धारणा को छोड़िये, देओ छोड़ गुमान।
मस्त रहो सब खोल में, रख कर सबका मान।।
देओ - दीजिए, खोल - अपने आप में।
511
धरोहर संभलती नहीं, पूर्वजी सौगात।
नाम गमाया सड़क पे, बड़ी करें हैं बात।।
पूर्वजी - पुरखों की, गमाया - खो दिया।
512
ध्रुव उत्तर में अटल, आये चाहे काल।
निश्चिंत उद्यम करे, बदल ग्रह की चाल।।
513
पतंग जो बिन डोर की, लुटती हाथों हाथ।
स्वछंदता के कारणे, मानव पशु अनाथ।।
स्वछंदता - बिना बंधन के स्वतंत्रता/अनियमित
514
पत्थर होना ना सरल, कटे, फूटे, ताप।
चोट खुद पर लेत है, नहीं करता संताप।।
संताप - दुःख जताना/रोना
515
पवन धीमी ही भली, होय सुहानी भोर। अंधड़ कब भला करे, है तांडव चहुं ओर।।
तांडव - तबाही
516
पानी का कोई रंग नहीं, नहीं कार आकार।
जो बासन में डारते, वही है व्यवहार।।
कार - बंधन, बासन - बर्तन
517
परिवारों की एकता, सबसे बड़ा है काम।
सुख-दुख में साथ दे, उसी का भाई नाम।।
518
पर्वत कांकर से बड़ा, जो छूता आसमान।
काम जो किसी ना आए, काऊ काम की शान।।
कांकर - पत्थर का टुकड़ा, काऊ - किसी के, शान - रुतबा।
519
परवरिश फलती वही, दस नख कमाई खाए।
ऊपरी कमाई से पले, औलाद ऊत ही जाए ।।
दस नख कमाई - मेहनत, ऊत जाना - असामाजिक व्यवहार
520
परीक्षा समय की साधना, धैर्य की पहचान।
नेक कमाई के आसरे, करते दिव्य दान।।
521
प्रकाश भगवान हुआ, अंधेरों से अज्ञान।
दोऊं का अस्तित्व है, माने या ना मान।।
522
प्रेम की भाषा सब सुनें, क्रोध है अत्याचार।
मीठा बोल बाणीया, हो सफल व्यापार।।
बाणिया - व्यापारी
523
प्रार्थना पूजा करें, जाते मंदिर रोज।
मसीत में खुदा नहीं, खुद के अंदर खोज।।
मसीत - मस्जिद
524
फल पेड़ पर फले फूल, टहनी पत्ते साथ।
जीव पेट इससे भरें, अस्तित्व परमाथ।।
अस्तित्व - वजूद, परमाथ - परमार्थ
525
फूल मुस्कान पंखड़ी, हर्षित मुख फूल।
रोमांच से खिल उठे, बाहर होते शूल।।
हर्षित - खुश, पंखड़ी - पंखुड़ी, फूल की पत्ती, शूल - कांटे।
526
फसल काट कर घर लाए, पाए श्रम का मोल।
हिरण चरते खेत में, बाजे मन के ढोल।।
527
फकीर का यह काम है, करता जड़ता नाश।
ईश्वर का वही रूप है, हर घर मेह उजास।।
जड़ता - अंधविश्वास, उजास - प्रकाश।
528
फंदा लोभ का पड़ गया, अब छूटे ना कोय।
संतोष जग से उठ गया, उड़े मुख से तोय।।
तोय - पानी/चमक
529
फाटक लग गई जीभ के, बंदी बोल कुबोल।
दुर्गुण अंदर न घुसें, गलत न हो पंचोल।।
कुबोल - अप्रिय भाषा, पंचोल - बिना मतलब की बात।
530
फागन रुत प्रेम की, वर्षा काम हजार।
सरदी ऋतु संतोष की, भाव बसंत विभोर।।
सरदी - सर्दी, विभोर - खुशी से नाचना।
531
फुहारों की छाप से, बढ़ता काया नेह।
कूंचे उठती बांस की, रोम रोम और देह।।
नेह - प्रेम/स्नेह, कूंचे - बगल/भुजा, देह - शरीर।
532
फौलादी हैं हौंसले, आएं विपत्ति लाख।
बीच मझधार न रुकूं, जब तक बाकी साख।।
विपत्ति - मुश्किल, मझधार - समुद्र के बीच में, साख - सम्मान।
533
फिक्र नहीं परिणाम की, होनी हो सो होय।
चलता पथिक न रुके, वारि अविरल होय।।
पथिक - राहगीर, वारि - पानी
534
फर्ज़ जो निभा न सके, मुख उसी पर धूल।
मरे जवां कुमौत वो, सुधर सके न भूल।।
धूल - असम्मान, कुमौत - अप्रत्याशित मृत्यु।
535
बंधन बांधे प्रेम से, जोड़ता मन का मन।
स्वार्थों के संबंध जो, टूटते उस ही क्षण॥
536
बल से जंग जीत लिये, जीते देश अपार।
काल को ना जीत सके, करे जो नर संहार।।
अपार - कई, काल - समय/मौत, नर संहार - इंसानों को मौत के घाट उतारना।
537
बिन मति के मंत्री हैं, शासक के हैं मीत।
ज्ञान खो गया भ्रम में, हुई अजब सी रीत॥
मति - बुद्धि, मीत - मित्र, भ्रम - वहम, रीत - परम्परा।
538
बहारें आतीं देख कर, दे विरह पुकार।
सायब गए विदेश में, कौन करे दुलार।।
विरह - प्रिय से अलग प्रियसी की पुकार, सायब - प्रिय/प्रेमी/पति।
539
बागों जैसी जिंदगी, पुष्पों का संसार।
प्रीत जल से सिंचिए, मतवाला भरतार।।
भरतार - पति
540
बसंत हृदय बसा गया, पीत फूल का शूल।
प्रियतमा लाड करे, गौरी सावन झूल।।
पीत - पीला, प्रियतमा - प्रेमिका/पत्नी, लाड़ - प्रेम
541
बरगद जैसे वृक्ष की, बूढ़े होते छांव।
बिन बुजुर्गों के हो रहे, सूने अंगना गांव।।
542
बदलावों को मान ले, यही समय की मांग।
ना बदला वो खो गया, पढ़े वेद वेदांग।।
543
भरोसे की भैंसन के, पाडे बारम्बार।
बीन देखे जो मानता, मिले न दूध धार।।
भैंसन - भैंस का बहुवचन, पाडा - भैंस का नर बच्चा, धार - दूध का ग्रामीण प्रचलित नाम।
544
बूँद-बूँद से भर गया, धन का यह भण्डार।
थोड़ी थोड़ी बचत से, हुआ है चमत्कार॥
545
बहादुरी इसमें नहीं, करते रण की जीत।
न्याय की रख साख ले, हो देश से प्रीत।।
546
भक्त की पहचान है, पूज भींत का लेव।
दया, करुण, प्रेम से, सत्य अहिंसा देव।।
पूज - पूजते, भींत - दीवार, लेव - प्लास्टर/आवरण, देव - देवता।
547
भक्तों को भगवान का, कैसे हो दीदार।
पेट में सांप लौटते, मन में पापाचार।।
दीदार - दर्शन, पेट में सांप लौटना - पापी, पापाचार - पाप मय व्यवहार।
548
बेमाता संजोग लिखे, सबका न एक समान।
लिखे को जो बदलता, कहते उसे इंसान।।
बेमाता - भाग्य की देवी, संजोग - भाग्य।
549
भवन बड़े खड़े किये, ईंटों के हैं अंबार।
पत्थर छुपता नींव में, सहे भार प्रहार।।
अंबार - ढेर, प्रहार - चोट।
550
भविष्यक चिंता नहीं, वर्तमान भरपूर।
राम भरोसे जिंदगी, है खुदा का नूर।।
नूर - प्रकाश।
551
भावना में बहत नहीं, वोह जन मन पठार।
कनखियों से काटते, मान वय सरोकार।।
कनखियो - नीची पुतली से, मान वय - सम्मान एवं आयु।
552
भाषा जोड़े देश को, बोल भाव प्रधान।
मातृभाषा कारणे, मन भावन बखान।।
553
भारत भूमि दाता है, माता समान होय।
माटी में वास मेरा, बाद मरग के होय।।
554
भेदभाव की अगन में, जलता भारत देश।
समता की वर्षा करो, ब्रह्म और महेश।।
555
भ्रम की चादर ओढ़कर, करते तीर्थ लोग।
हज में पत्थर मारते, स्व शैतानी भोग।।
हज में पत्थर मारते - हज के समय शैतान को कंकड़ मारने की प्रथा।
556
भूमि रक्त न सिंचिए, सिंचित सुख पान।
धर्म की रक्षा कीजिए, पहल धर्म को जान।।
557
मंदिर बनते दान से, उसे लूटते लोग ।
दान भेंट है जेब में, कर मदिरा का भोग।।
558
मस्जिद पल में बन गई, मुल्ला कहे अजान।
गुल्लक का धन खा गए, अल्ला निगहबान।।
अजान - नमाज के समय की पुकार, निगहबान - रखवाला।
559
मात स्वर्ग दायिनी, पिता स्वर्ग द्वार।
सेवा उनकी कीजिए, स्वर्ग यही संसार।।
दायिनी - देने वाली।
560
मातभोम के वास्ते, उद्यम करिए कोय।
इसके बदल यह मिले, संपन्न जीवन होय।।
मातभोम - मातृभूमि, उद्यम - कार्य।
561
मित्र वही सच्चा हुआ, राह सही सुझाए।
गलत बात पर टोकता, अपनी कमी बताए।।
राह - मार्ग
562
मधु मीठा होता है, घी के संग ना मेल।
कटु भाँख के बीज हैं, मीठा इसका तेल।।
मधु - शहद, कटु - खारा, भाँख - खेतों में उपजने वाली घास (भांखड़ी) का कांटेदार बीज जो शुगर रोग में दवाई के काम आता है।
563
मंगल हमी बसने चले, आधा भू निवास।
चन्द्र पर है घर बना, मानव का विनाश।।
हमी - हम, भू - धरती, चन्द्र - चांद
564
मंदिर मस्जिद एक हैं, एक शक्ति के नाम।
अल्ला बसे न मसीत म, न मंदिर श्रीराम॥
मसीत - मस्जिद
565
मार्ग कठिन समक्ष हो, मत होना लाचार।
कर्म से खुलते सदा, बंदी भाग्य द्वार॥
समक्ष - सामने।
566
मोती बनता सीप में, सह कर पीड़ा घोर।
संघर्ष से बनता गया, मनु यहां सरमौर॥
सरमौर - सिरमौर/अग्रणी
567
मर्यादा की जो रखे, खुद जीवन में आस।
स्वयं को पहले ढालिए, फिर दूजे के पास।।
568
यज्ञ सार्थक कार्य हैं, जो करते हम रोज।
अग्नि से प्रकट हुआ, मानवता का ओज।।
अग्नि - आग, ओज - प्रकाश।
569
यश की गत ना चालिए, होय कर्म का दास।
फूल नहीं पुकारता, आ भंवरे मेरे पास।।
यश - ख्याति, भंवरे - भंवरा
570
यात्रा पर हम चल पड़े, हैं परीक्षा अनेक।
मंशा जिनकी जीत है, हो भावातिरेक।।
मंशा - इच्छा, भावातिरेक - भावनाओं से भरा।
571
यतीम के सर पर रहे, ममत्वता का हाथ।
जीवन भर उसकी दुआ, बेनाथों का नाथ।।
यतीम - जिसके माता पिता ना हों, ममत्वता - माता का स्नेह/वात्सल्य, बेनाथ - बिना पालनहार, नाथ - मालिक।
572
याचक बन कर मत रहो, तजिए झूठी आस।
जतन से मिलता गया, सत्यमेव प्रकाश॥
याचक - मांगने वाला/भिखारी, तजिए - छोड़ना, जतन - कोशिश, सत्यमेव - सत्य के साथ।
573
युक्ति कोई कीजिए, धरती करे पुकार।
बुध- महावीर की धरा, हिंसा का है भार।।
युक्ति - उपाय, हिंसा - उपद्रव।
574
युग गया, बदला समय, बदला जगते काज।
मोह, क्रोध भावना, नहीं बदले हैं आज।।
575
योग नाम है जोड़ का, जोड़े टूटे तार।
अंगे- अंग प्रसन्न हुआ, पुलकित नर- नार।।
पुलकित - प्रसन्न
576
युद्ध नहीं हितकर हुआ, हो काहू खिलाफ।
दिल कोई का न दुखे, होये गलती माफ॥ काहू - किसी, खिलाफ - विरुद्ध।
577
यथार्थों से सामना, करते वीर महान।
सत्य को स्वीकारता, करता है उत्थान।।
यथार्थ - वास्तविकता, उत्थान - प्रगति।
578
यकीन करना स्वयं पर, खुद पर विश्वास।
यश चाहे नहीं मिले, छोड़त परे खटास।।
यकीन - भरोसा, यश - ख्याति, खटास - दुर्भावना।
579
रथ हांकते कृष्ण से, ले अर्जन उपदेश।
रण में शत्रु भाई नहीं, यही स्पष्ट संदेश।।
580
रतन नगीने धन नहीं, धन बजार में साख।
सदा धन नहीं होयता, साख क पल्लू लाख।।
साख - क्रेडिट/विश्वास
581
राग-द्वेष नहीं चले, लंबा शासनादेश।
राजा क बैराग भला , लाग-पाट ना शेष।।
राग द्वेष - लगाव या शत्रुता, शासनादेश - राज्यादेश, लाग पाट - लगाव
582
राजा वो राजा नहीं, अन्याय के जो संग।
शांति की बात नाहीं, करते जंगो पे जंग।।
583
रक्षक ही जब भक्षक बने, अब और न कहीं ठौर।
हाथ को हाथ ख़ावता, चले पतन की ओर।।
584
राज की यह नीति हो, प्रजा हिते काज।
अनुशासनाय शासना, हो एक मेव समाज।।
585
रचना जो ने है रची, पर्दे पीछे ज्ञान।
परत -परत है खोलता, गाए जा गुणगान।।
586
रमणीय पर्वत को किया, हरे- भरे मैदान।
प्रकृति शक्ति बड़ी, होय नत श्रद्धावान।।
रमणीय - सुंदर, नत - झुकना/धन्यवाद कहना, श्रद्धावान - उपासक।
587
रस भरे हैं फल दिये, दिया धान अनाज।
कड़ी - कड़वी ओषधि, जान पड़े ना राज।।
धान - चावल, कड़वी - खारी
588
रवि उदय पश्चिम से, पूर्व म छिप जाए।
नदी ढलती पहाड़ से, मिल सागर से आए ।।
रवि - सूर्य
589
रिश्ते न बच पाएंगे, दुष्कर है संभाल।
टूट गया जो एक बार, होता नहीं बहाल।।
दुष्कर - मुश्किल
590
लता वृक्ष से लिपट कर, होती है विशाल।
थाप संगत से मरी चाम, देती सुर और ताल।।
591
लहरें सागर विशाल, बंधे बांध दीवार।
साहिब जीभ से बंधा, जो समझे घर नार।।
साहिब - पति, घर नार - पत्नी
592
ललाट पर बदा नसीब, थोड़ी हाथ लकीर।
झूठी पोथी बांचता, लकीरों का फकीर।।
593
लज्जा अपना गहना है, विनय अपनी शान। मर्यादा दीवार है, हो दक्ष हर इनसान।।
594
लाभ हानि के चक्र से, रथ जीवन का हांक।
कालचक्र को पारता, रुके ना एक छटांक ।।
हांक - चलाना, कालचक्र - समय, पारता - पार करता
छटांक - थोड़ा सा
595
लालच मन का रोग है, बढ़े है दिन- रात।
सदा न दुख की अवस्था, सदा सुख ना सात।।
596
लाठी से मरता नहीं, लोभी काम क्रोध।
इच्छा मानव दास है, कहे बड़ों का शोध।।
597
लक्ष्य वही पाता सदा, संग दृढ़ विश्वास।
पग पग बाधा हों भले, छोड़ता जो ना आस।।
598
लिखा है तलवार से, भाग्य का यह लेख।
होनी हो टलती नहीं, देख सके तो देख।।
599
लोभी फंसता जाल में, लालच गला कटाए।
क्रोधी मरता असमय, गल फांसी लटकाए।।
600
लीला उसकी अगम है, ज्ञात ज्ञान विज्ञान।
परा ग्रह निवासता, कौ उसका भगवान।।
अगम - समझ से परे, परा - दूसरा, कौ - कौन
601
आदिवासी इंसान हैं, करते हैं वनवास ।
सच यह हैं आदि मानव, जो राम का आवास॥
602
वचन दिया प्रेम से, रखिए उसका मोल।
बोल निकले मुख से. पहले लीजे तोल॥
603
वंदन कीजिए कर्म का, कर्मे ही भगवान।
सींचे पानी प्रेम का, पात फल गुणवान॥
वंदन - पूजा, पात - पत्ता/प्राप्त करना
604
वक्त बड़ा बलवान है, खेले नए नए खेल।
राजा सांकल से बंधा, गड़रिये सर तेल॥
सांकल - बेड़ियां, गड़रिये सर तेल - भेड़ के चरवाहे को राज मिलना।
605
वकील वो उत्तम कहें, क्लाइंट हितकार।
निर्बल को बल मिले, हकदार अधिकार॥
क्लाइंट - मुवक्किल/याचि
606
वस्त्र भले न महंगे हों, सस्ता मोटा थान।
फटे हाल सुदामा हैं, दे केशव सम्मान।।
थान - 20 मीटर लम्बा कपड़ा, केशव - कृष्ण
607
विद्यालय से रूष्ट, आज सरस्वती मात।
कक्ष में सुविधा नहीं, विद्या पर आघात॥
रूष्ट - रूठा हुआ, आघात - चोट।
608
विद्यार्थी धर्म है , करत नित अभ्यास।
एक- एक पल है काम का, पाए सफलता खास॥
609
विज्ञान की देन यहां, बदला विश्व सार।
धात से धातु जुड़ी, मानव का उद्धार॥
धात - धातु
610
विश्वास की नींव पर, टिकते सब सम्बंध।
भरोसा टूटे न टिके, मधुर बंधन का बंध॥
611
वीर दानी हीरक वय, जीते हैं सौ साल।
गंध सुगंध है फूल की,
बांटे जो निहाल।।
हीरक वय - साठ वर्षो वर्ष की आयु, निहाल - सम्मानित/धनवान होने का भाव।
612
शांति सम्पनता बढ़े, हिंसा से विनाश।
सर्वमंगल की भावना, युद्ध काल म त्रास।।
613
शक्ति का सदुपयोग, बलशाली का काम।
दुर्जन को बल मिले, होता त्राहिमाम।।
614
शिक्षा दूध शेरनी का, पीएं दहाड़े लोग।
आज बिकती बजार में, धन बटोरे अमोघ।।
अमोघ - अत्यधिक
615
शपथ पद की मर्यादा, राजन काजन खाए।
वचन निभान दुष्कर, बिरला ही निभाए।।
616
शास्त्र पोथी में पढ़ा, है यह जगत सराए।
आज रुके कल चल दिए, दूजा ठहरता आए।।
617
शस्त्र धातुओं से बना, शास्त्र कागद मसी।
एक लीलता जीव को, एके है वचन मसी।।
शस्त्र - हथियार, कागद - कागज, मसी - स्याही, लीलता - जीवन समाप्त करना/हत्या, मसी - मसीह (भलाई का संदेश वाहक)
618
शौर्य गाथा वीर की, गाते चारण भाट।
कथाएं हैं रणधीर की, कटे शीश नहीं नाट।।
शौर्य गाथा - साहस की कहानी, चारण- भाट - राजा के दरबार में इतिहास लेखक, रणधीर - धैर्यवान, नाट - इंकार/मनाही
619
शरण दाता गरीब का, विश्व का धनवान।
महिपाल वास्तविक, धरती का भगवान॥
महिपाल - पृथ्वी का राजा
620
शुद्ध मिले दूध ना, ना पानी की बूंद।
तेल में मिलावट है, रबड़ मिलता गूंद।।
621
शहीदों के कफ़नों का, सौदा करत दलाल।
बहनों का भईया गया, गया माई का लाल।।
622
श्वास- श्वास याद रख, चंद दिन मेहमान।
छोड़े जाना सब यहीं, शेष रहत निशान॥
श्वास - सांस,
623
सूर्य सम तू जगमगा, दूर छोड़ कर दोष।
मन की ज्योत्सना, शरीर का है कोष।।
सम - बराबर, ज्योत्सना - चांदनी/सफेद प्रकाश, कोष - धन संग्रह
624
समाज नीति अजीब है, बड़ बोलों के साथ।
कर्म देवता मौन है, ताज वाच के माथ।।
ताज - मुकुट, वाच - अधिक बोलने वाला, माथ - सिर
625
सहयोग से काम बने, कीट फलते पराग।
सात सुर के मेल से, बने शब्द से राग।
626
सन्त महिमा सांकड़ी, फंदा गले का हार।
आत्म हो प्रभाविनी, स्वयं का कर संहार।।
सांकड़ी - सीमित, संहार - हत्या/विनाश
627
सात दिन का चक्र है, जन्म मरण एक खेल।
एकेक दिवस काल को, अनन्त काल धकेल।।
628
सम विषम का भेद है, दिन- रात के नाम।
भेद मिटे दिवस कटे, एके आकार अनाम।।
629
संसार चलता स्व रुख, दुखी सुख अंबार।
आड़ी रेखाएं जीवनी, पैरों तले अंगार।।
अंगार - आग
630
संदेश एक प्रसार हो , धूर्त दूर धकेल।
अहंकारी जले आग में, अपराधी को जेल।।
धूर्त - चापलूस/चालाक
631
सफल विजयी होत है, असफलता को हार।
गिरत गिरते ऊठती, चींटी चढ़े पहाड़।।
632
सदा दिन ना चमकते, सदा न काली रात।
सदा ना क्षण प्रेम के, सदा न बहकी बात।।
636
साधना से सिद्धि मिले, अवसर चूके हार।
एकता से विजयी हुए, पौरुष और तातार।।
पौरुष - कर्म, तातार - आक्रमणकारी
637
षड्यंत्र वो रचते रहे, तकते पराई भोम।
दिखत देवता से जो, उनका मालिक ओम।।
भोम - भूमि, ओम - ईश्वर
638
षट्कर्म खलल डालने, धरे मेनका रूप।
ऋषि ऋचा भूलावती, इंद्र की यही दूत।।
षट्कर्म - वेदों के अनुसार छः कार्य, खलल - विघ्न , मेनका - ऋषियों के कार्य में बाधा डालने वाली इंद्र की अप्सरा, इंद्र - राजा, ऋषि - षट्कर्म संपन्न करवाने वाला/ज्ञानी, ऋचा - वेद मंत्र,
639
षट्भुज एक आकार है, काली का है रूप।
महिषसुर मर्दन करे, पूज्य नृप अनूप।।
महिषासुर - एक राक्षस, मर्दन - संहार, नृप - राजा, अनूप - सम्राट
640
षट्कोण सा जीवन है, पांच अंकों का मूल।
सद्कर्म सुहासिनी, काफी एक ही भूल।।
षट्कोण - छः अवस्थाएं (गर्भ, जन्म, जवानी, बुढ़ापा, मृत्यु, परलोक), पांच अंक - पांच इंद्रियां, सुहासिनी - अच्छे कर्म
641
षडरस भोजन कीजिए, तन होगा बलवान।
ज्यों कंट संग पुष्प से, खिलत है उद्यान।।
षड्रस - छः रस (मीठा, खट्टा, नमकीन, कड़वा, तीखा, कसैला), कंट - कांटा, पुष्प - फूल, उद्यान - बगीचा
642
षण्मुख बीज ज्ञान के, खोले मन की गांठ।
विद्या धन सब ते बड़ा, मिट जाती उचांट।।
षण्मुख - कार्तिकेय, मन की गांठ - अज्ञान, उचांट - असमंजस
643
षोडश कला पूर्णता, विनय रहता साथ।
लोभ,मोह, मद, तृष्णा, हमको करें अनाथ।।
षोडश - सोलह, मद - नशा, तृष्णा - लालच
644
षष्ठी मात की कृपा, छोटों को वरदान।
सरस्वती विराजती, रखे भवानी शान।।
षष्ठी - बच्चों का भला करने वाली छठ माता, सरस्वती - विद्या की देवी, भवानी - शक्ति की देवी
645
षड्विकार को दूर कर, करते नित ध्यान।
नित्य कर्म के बाद में, होत तुरंत स्नान।।
षड्विकार - (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य), नित्य कर्म - सुबह के कार्य
646
षडानन के छः मुख है, सबके अपने काम।
पढ़ लिख कर स्मरण रख, कार्तिकेय नाम।।
647
षड्दर्शन का सार है, दया, सत, विश्वास।
प्रेम करुणा आंगने, सदा सुख का वास।।
षड्दर्शन - छः दर्शन
648
हिम्मत रखे भाल पर, लगातार प्रयास।
हारे मन को हार है, विजयत विश्वास।।
भाल - मस्तिष्क, विजयत - विजयी
649
हित - अहित सीढ़ियां, चढ़े जो ऊपर जाए।
प्रातः अहित सामने, संध्या हो हिताए।।
हित - अहित - लाभ- हानि, प्रातः - सुबह, संध्या - शाम
650
हिंसा से हिंसा बढ़े, घटता प्रेम भाव ।
अहिंसा हथियार है, शनै शनै प्रभाव।।
651
हवाओं की सीमा नहीं, नहीं देश का भेद।
बाढ़ तोड़ती सींव को, पत्थर कर दे छेद।।
सीँव - सीमा
652
हल से अनाज उपजता, धरती सीना चीर।
पेट सबन का पालते, कृषक है रणवीर।।
सबन - सभी, कृषक - किसान, रणवीर - विजेता
653
हवन पावन घृत जले, जलते सब विकार।
हृदय कपट से भरा, सर्व काज बेकार।।
हवन - यज्ञ, पावन - पवित्र, घृत - घी, कपट - पाप, सर्व - सभी
654
हकीकत जानता नहीं, रोजा हजे नमाज।
दिल बंदे का तोड़ कर, हो खुदा नाराज।।
हकीकत - वास्तविकता
655
हरियाली है औषधि, लगें पेड़ ही पेड़।
फल छाया भरपूर हों, हरित भू और मेड़।।
मेड़ - सीमा
656
हास्यपद स्थिति है, टरकाती सरकार।
बाड़ खाए खेत को, दया करो करतार।।
टरकाती - दूर करना, करतार - ईश्वर
657
हथयार नहीं जीतते, सेना रण जिताए।
खेत सींचते खून से, श्रम धरा मिताए।।
मिताए - मित्रता
658
हिमालय उत्तर में टिका, सागर दक्षिण दीश।
गंगा लहरे पूर्व में, पछिम रेत मनीष।।
दीश - दिशा, पछिम - पश्चिम, मनीष - मानवीय
659
क्षमा शमां का गीत है, पले प्रेम प्रीत।
बैरी लू के बीच में, ठण्डा झोंका शीत।।
क्षमा - माफ़ी, शमां - दीपक, बैरी - शत्रु
660
क्षण-क्षण लिखा जात है, जीवनी इतिहास।
तक्षणिक नादानियाँ, हरत हैं विश्वास।।
क्षण - पल, हरत - समाप्त करना
661
क्षणिक सुख के मोह में, खो दिया सम्मान।
मात - पिता मान गया, मर गया अभिमान।।
क्षणिक - थोड़े समय का
662
क्षति धन की कुछ नहीं, चरित्र क्षति अनेक।
शरीर कटे क्षत विक्षत, रख विधाता टेक ।।
क्षति - हानि, विधाता - ईश्वर, टेक - लाज
663
क्षय आलस्य के कारणे, मुरझात हैं फूल।
श्रममेव विजयेते, सोना बनती धूल।।
क्षय = नाश, श्रममेव - मेहनत करने वाले, विजयेते - विजयी होते
664
क्षुधा ना पहचानती, धनी गरीबी जात।
रोटी सदा बड़ा धर्म, जीवन की सौगात।।
क्षुधा = भूख, सौगात - भेंट
665
क्षेम यह परिवार की, अनबन होती त्रास।
प्रेम और सम्मान से, निकसता उल्लास।।
क्षेम - कुशल-मंगल, त्रास - दुःख, उल्लास - खुशी
666
क्षेत्र छोटा बड़ा नहीं, राज धर्म सम्राट।
धरती माँ का आँचल है, किसान का ललाट।।
क्षेत्र = खेत, भूमि
667
क्षमता जा की है जोउ, करता वो वही काम।
बालक खेले गेंद से, पिता कमाए दाम।।
क्षमता = सामर्थ्य, दाम - धन
668
क्षितिज मिलता नहीं, मति भ्रम मिटाए।
पानी मिले जलज से, ठहरे सतह पर आए।।
क्षितिज - जहाँ धरती और आकाश मिलते प्रतीत हों, मति भ्रम - बुद्धि का भ्रम, जलज - कमल
669
क्षरण भोम का रोकिए, कर धरा श्रृंगार।
भू भरी मुस्कान से, सुखी जीव आधार।।
क्षरण - मिट्टी का कटाव, भोम/धरा/भू - धरती/भूमि
670
त्राण बने जो दीन का, सच में वही इंसान।
स्वय हित से ऊपर ले, परहित की पहचान।।
त्राण - सहायक वाला, दीन - कमजोर/गरीब
671
त्रास ना टिकता कभी, साहस के संग ताल।
नाम जिसका अमर हो, हो भाग्य विशाल।।
त्रास - दुख/मुश्किल
672
त्रासदी से सीखते हैं, कुछ न अपने कोल।
असंतुलन विकास का, है चुकाना मोल।।
कोल - पास/निकट
673
त्रिलोक में आलोक है, देवों का है वास।
धरालोक इंसानों का, नियम से निवास।।
674
त्रिकोणी मुकाबला, तीनों भुज समान।
घर समुदाय देश को, समझे एक बलवान।।
675
त्रिवेणी पवित्र है, पावन चारों धाम।
तीर्थ चरण माता के, पूज्य देश तमाम।।
त्रिवेणी - तीन नदियों का संगम, तमाम - सम्पूर्ण
676
त्रिशूल के तीन शूल, मंदिर देवी हाथ।
सिंह सवारी करती है, एक है औरत जात।।
सिंह - शेर
677
त्रिनेत्र त्रिदेवों के, हो गए हैं पाबंद।
मानव फरश्त देवता, कहते पुराण स्कंद।।
त्रिनेत्र - शिव, त्रिदेव - ब्रह्मा/विष्णु/महेश, फरश्त- फरिश्ता
678
त्रिलोक म है गूँजता, ब्रह्म ज्ञान स्वरूप।
बहते जल में नाद है, जीव आत्म का रूप।।
नाद - स्वर
679
त्रयोदसी का चंद्रमा, ग्रहण उस पर धूल।
धवल चांदनी मोहिनी, जलते सरोज फूल।।
680
त्रेता युग में घी नद, बहती दूध की धार।
कलयुग में बार खुले, जहां चाहे पधार।।
त्रेता - एक युग
681
ज्ञानी वह कहलाय जो, त्यागे अभिमान।
सत्य प्रकाश जगमगे, जीवन चांद समान।।
682
ज्ञानहीन पशु समान, जैसे बूझी राख।
ना विवेक न रोशनी, अंधे नयन हजार।।
683
ज्ञात से अज्ञात की ओर, खोज करे विज्ञान।
सूर्य किरण ज्ञात हों, लेओ सृष्टि ज्ञान।।
684
ज्ञात हो सत्य सबन को, लगे दिन दस पांच।
अफवाहों को रोकने, कर ध्यान पढ़ साँच।।
685
ज्ञान प्रकाश का आंगना, अज्ञान घर अंधकार।
उजाले प्रवेश नहीं, हो तिम अपरंपार।।
तिम - अंधेरा, अपरंपार - अत्यधिक
686
ज्ञेय हो जो संसार में, अनुभवों से सींच।
किताब ज्ञान माध्यम , खुली आँख मत मीच।।
ज्ञेय - ज्ञात, सींच - आगे बढ़ाना
687
ज्ञातव्य यही बात है, अटल हैं दिन- रात।
हम कहें उमर बढ़े, पल- पल घटते जात।।
ज्ञातव्य - जानकारी
688
ज्ञात अज्ञान का भाई है, अन्तर अक्षर अकार।
अ घटे हो ज्ञान आलोक, अ बड़े हो अंधकार।।
689
ज्ञानदीप त्रिय जलाए, उजियारा घर दोय।
माई का घर संवार कर, सास घर वृंद होय ।।
त्रिय - स्त्री, उजियारा - प्रकाश, वृंद - वृन्दावन/खुशहाल
690
ज्ञानचक्षु ज्यों खुले, स्वाहा भरम जाल।
कांकर -कंकड़ में ईश्वर, बाकी मायाजाल।।
691
ज्ञानर्जन के वास्ते, नापो कोसों मील।
मूरत पूज द्रोण की, वोह एकलव्य भील।।
ज्ञानार्जन - ज्ञान प्राप्ति, मील - दूरी का मापक, मूरत - मूर्ति, पूज ,- पूजना, एकलव्य - महाभारत काल एक भील लड़का जिसने द्रोणाचार्य की मूर्ति बना कर धनुर्विद्या सीख कर अर्जुन से अधिक पारंगत होने वाला छात्र।
युगबोध -
692
बेटी के बेटी हुई, हुई खुशी अपार।
नाम सहजान है रखा, कृपा कर करतार।।
693
गांधीजी का शिष्य म, अहिंसा है संदेश।
धोती टोपी धारता, चला देश प्रदेश।।
694
जिगर ने दोहे कहे, रख छाती पर हाथ।
ना काहू से हूं परे, ना काहू के साथ।।
695
मीराजी ने पद कहे, रसखान के गीत।
बिहारी दोहे कहे, मसी तुलसी मीत।।
मसी - भलाई का उपदेश देने वाला
696
कढ़ी बिगाड़ ना कहे, कहत भली सरीर।
साध सीधी बात कहे, तिरछी कह फकीर।।
कढ़ी बिगाड़ - बनते काम को बिगाड़ने वाला
697
कबीर बोल प्रेम के, तुलसी गाए राम।
रहीम नीति दीप हैं, जग में उनका नाम।।
698
मीरा कृष्ण की सखी, जा के हैं रसखान।
नानक शबद गहन गढ़े, दादू द्वारे तान।।
699
बिहारी दोहे अमर, वृंद रचे रसधार।
रहिमन की नीति से, होते भव के पार।।
700
आदिम युग में नरबलि, मानव मारे खाएं।
वर्तमान काल में आदमी, जिंदा मांस चबाए।।
आदिम - पाषाण काल
कालगीत -
701
कड़कती ना नार भली, नुगरा मोट्यार।
हो मूळकती भार्या, धरे धीर भरतार।।
कड़कती - चिल्लाने वाली, नुगरा - असामाजिक, मूळकती - मुस्कुराने वाली, भार्या - पत्नी, धीर - धैर्य, भरतार - पति
702
इस मूंछ की लड़ाई में, खत्म हो व्यापार।
खेती कचहरी खा गई, बिक गये घर बार।।
मूंछ की लड़ाई - व्यर्थ घमंड/द्वेष
स्वयं -
703
जिगर निकले न कमी, औरन को ना दोष।
खुदी को सुधार तू, धर कर साधू भेष।।
खुदी - स्वयं
704
जन्मतिथि जो बुझता, सात संग दो दो एक।
जोड़ गुण का चक्र है, सात पर दो दो एक।।
जिगर चूरूवी की जन्मतिथि (कुल 702 2 +1 दोहे)
7+2=9x2=18,
2+2=4, 70+2+2+1= 75
705 (साहित्य सम्राट को श्रद्धांजलि)
कबीर तुलसी रहीम, मीरा जी रसखान।
बिहारी नानक देव, दादु वृंद महान।।
कुल 705 दोहे जिन्हें (700 +2+2+1) की श्रृंखला में रखा गया है।
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