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लघुकथा - न्याय वाली पगड़ी

लघुकथा: न्याय वाली पगड़ी..... 

बात सल्तनत काल की है, दिल्ली जीतकर गौरी अपने क्षेत्र की ओर चल दिया। लौटते हुए उस ने अपने गुलाम कुतुबुद्दीन को लाहौर की गद्दी सौंप दी। थोड़े ही दिनों बाद गौरी की हत्या कर दी गई। सल्तनत बिखरने लगी, जागीरदार, मनसबदार, उमराव और जमींदारों ने स्वयं को अपने - अपने क्षेत्र का स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया।
इस स्थिति में कुतुबुद्दीन ने पूरी सल्तनत को पुनः एक करने के लिए ऐबक ने युद्ध शुरू कर दिया। 
एक दिन वह लड़ाई के मैदान से दूर जंगल में शिकार खेलने निकल पड़ा। रास्ते में एक बूढ़े आदमी ने उसे रोक लिया। उसके हाथ में सुंदर पगड़ी थी जिस पर लाल और माणिक जड़े हुए थे।ऐबक का मन उस पर आ गया। उसने पगड़ी का दाम लगा कर उसे बेचने हेतु बूढ़े आदमी से निवेदन किया। बूढ़े आदमी ने कहा कि इस पगड़ी का मोल है न्याय, तुम यदि न्याय के मार्ग पर चल सको तो इसे ले सकते हो।
ऐबक ने न्याय करने के वादे के साथ पगड़ी ले ली।
कुछ ही दूर चलने पर  दूर झाड़ियों में सरसराहट की आवाज सुनाई दी। ऐबक ने आवाज का पीछा किया, पलक झपकते ही उसने सरसराहट की ओर तीर चला दिया।
सैनिक तीर की दिशा में दौड़े, कुछ ही कदम lar उनके पैर ठिठक गए। तीर से लहूलुहान एक नौजवान पड़ा था। ऐबक के वहां पहुंचने तक लड़के की मौत हो गई। पता करने पर मालूम हुआ कि यह लड़का निकटवर्ती गांव में रहने वाली बुढ़िया का इकलौता बेटा है जो रोज जंगल से लकड़ियां काट कर उन्हें बेचकर आजीविका चलाता है। ऐबक घोड़े से उतरा, तलवार सैनिकों को सौंप कर उन्हें लौटने का आदेश दे कर काज़ी के दरबार में हाजिर हुआ।
उसने काजी को पूरी कहानी समझाई और मुकदमा चलाने की अर्जी दी।
काज़ी ने मोऑजिन के बुढ़िया को बुलावा भेज दिया।
काजी के यहां बुढ़िया और ऐबक का आमना-सामना हुआ। काज़ी ने पूरा मामला सुनाते हुए बुढ़िया से पूछा कि इस मुलजिम को क्या सजा देनी है, आप जो कहेंगी वहीं सजा दी जाएगी।बुढ़िया ने काफी देर सोच कर कहा कि मेरा बेटा इस आदमी के तीर से मरा है, इसकी सजा यही  है कि वह मेरे बेटे की जगह ले और मैं आज से इसकी मां की जगह।
काजी ने ऐबक से बुढ़िया की तीमारदारी बेटे की तरह करने का फैसला दिया जिसे ऐबक ने सर झुका कर कुबूल किया।
गुलाम, यतीम ऐबक की आंखों में आंसू निकल रहे थे, साथ में बूढ़ी अम्मा के भी।
फैसला होते ही सादा भेष में खड़े सैनिकों ने उसकी शासकीय वेशभूषा, तलवार और बूढ़े आदमी से ली हुई पगड़ी ऐबक को सौंप दी।
वस्त्र धारण करने के बाद काजी ने ऐबक से कहा, यदि तुम फैसला नहीं मानते तो मैं खुद तुम्हें एक मुलजिम की तरह सजा देता।
ऐबक ने काज़ी से कहा यदि तुमने ज़रा भी इंसाफ से पैर हटाया होता तो इस खंजर से तुम्हारी हत्या कर देता।
कुतुबुद्दीन ने पगड़ी पहनी और मां को साथ ले कर महल की ओर चल दिया।

शिक्षा - न्याय का सबसे बड़ा मुकुट सत्ता नहीं, निष्पक्षता होती है।

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👤 शमशेर भालू खान

📍 कायमखानी बस्ती सहजुसर ,चूरू राजस्थान Pin :-331001

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