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हसन खान मेवाती

       राजा हसन खाँ मेवाती एक वीर

15 मार्च 1527 हसन खां व 12000 घुडसवारों का 495वाँ शहीद दिवस (खानवा का युद्ध राणा सांगा व बाबर के मध्य )
 
बाबर सू  जा कर  लडो़, लड़्योरोप दई छाती
खानवा को जंग अधूरो बिन हसन खाँ मेवाती।

        बहुत ही कम ऐसे लोग होंगे जिन्हें शायद यह मालूम हो कि 495 वर्ष पहले अलवर ओर मेवात पर ठठ्ठा के खानजादो/मेवो का शासन था।

     नोट- मेव खानजादा एक ही जाति विशेष शब्द है।
मेव आज अलवर,भरतपुर फिरोजाबाद,दिल्ली, पुन्हाना,आगरा,अलीगढ़,चित्तौड़,भीलवाड़ा,मध्यप्रदेश(छोटी-मेवात,गुजरात के क्षेत्र में पाये जाते हैं।
          बादशाह फ़िरोज तुगलक के काल मे भारत के गढ,मलिपुर,चम्पारन,राजपुर इत्यादि इलाकों के बहुत से यदुवन्शी ओर परमार राजा राजपूतो ने इस्लाम-धर्म स्वीकार किया जिनमें ठठ्ठा के यदुवन्शी राजकुमार साँभरपाल ने भी इस्लाम धर्म की दीक्षा ली।
         सांभर या सांभरपाल की तीसरी पीढ़ी में लोधीवंश के अलावत खाँ का जन्म हुआ हसन खाँ मेवाती उनके पुत्र थे।
                हसन खाँ मेवाती ओर इब्राहिम लोदी आपस मे मौसरे भाई थे। 1517 ई. मे जब लोदी वंश के इब्राहिम लोधी को दिल्ली का सिंहासन मिला तो उसने हसन खाँ को अलवर ओर मेवात का इलाका व उतरी मेवात के वे भाग भी लौटा दिये जिनको अहमद खा लोदी ने जीत कर दिल्ली मे मिला लिया था।
              हसन खाँ ने अपने समय मे अलवर ओर मेवात को समृद्ध बनाने में कोई कसर न रख छोड़ी। हसन खाँ बलवान,साहसी ओर कमर्ठ शाशक था। इस से पहले अलवर ओर मेवात किसी एक निर्दिष्ट रियासत के रूप में स्थापित नहीं था। हसन खान ही प्रथम शासक था जिसने यहाँ स्थिर शासन का सूत्रपात किया।

            अलवर के किले का पुराना कोटा जिसे बडगुजरो ने मिट्टी ओर पत्थर से बनवाया था,उसे गिरवा कर उसकी नीव पर चूने के साथ पत्थर की पक्की,कन्गूरेदार दिवारें व बुर्जे बनवाये जो आज तक विद्यमान हैं। इसके अलावा बहुत सी,इमारत सड़कें,बाग मकबरे व सराये भी बनवाईं जिनके ध्वंसावशेष टपूकड़ा, तावडू, रामगढ़, किशनगढ़,
पहाड़ी,कामा,घुसड़वली,गोविन्दगढ़,फ़िरोजपुर, भौंडसी,तिजारा,अलवर,तथा,ढ़ढीकर इत्यादि  इलाकों में मौजूद हैं।
                    हसन खाँ विद्या प्रेमी भी थे। उनके संरक्षण में बहुत से विद्वानों का पालन-पोषण होता रहा। वे शायरी का भी शोक रखते थे, अपने समकालिन कवियों में उस्ताद के नाम से मारूफ थे । सबके अतिरिक्त स्वदेश प्रेम उसमे कूट-कूट कर भरा हुआ था। इस्लाम धर्मवलम्बी होते हुए भी,प्राण व प्रतिष्ठा के लिए स्वधर्मी के साथ युद्ध करने मे कभी नहीं चुके।  
         पानीपत के विख्यात युद्ध मे इब्राहिम लोदी का भाग्य अस्त हो गया। मुगलों की वीरता के आवेग के सम्मुख खानजादों(मेवों) की सीमित सेना नहीं ठहर सकी।  हसन खाँ अपने चुने हुए सरदारों के साथ जंगलों मे भटकते रहे। डेढ़ साल तक बाबर की सेना मेवात के एक सिरे से दूसरे सिरे तक उन्हें खदेड़ती रही। मेवातियों की सहानुभूति और अपने अदम्य साहस के बल पर मुगलो को चैन नहीं लेने दिया।
          इस बीच उनको मेवाड के राणा सांगा का निमन्त्रण मिला जो बिखरे हुए राजपूतों की विशाल सेना इकट्ठी कर बयाना के विशाल मैदान की ओर बाबर से लोहा लेने के लिये आगे बढ़ रहे थे। उधर बाबर ने अपने प्रतिनिधि मुल्ला तुर्क अली और नजफ़बेग के हाथ सुलह की सूचना हसन को भेजी जिसमें लिखा था कि वह उसे मेवात का स्वतंत्र राजा बना देगा यदि एक बार बाबर की अधीनता स्वीकार कर ले। बाबर ने भेंट स्वरूप अशर्फ़ियों के थाल,दास-दासी और नीलम के मूठ की तलवार भी भेजी थी। बाबर ने मित्रता प्रदर्शित करते हुये हसन खां के लड़के को रिहा कर दिया,जिसे पानीपत के युद्ध में बन्दी बनाया था।
          वास्तव मे बाबर को राणा सांगा से उतना भय नहीं था जितना हसन खाँ से जिसका कारण मेवात का दिल्ली के पड़ोस में होना भी था यहाँ राजनीति में पड़ौसी को दुश्मन बना लेना घातक होता है के नियम से बाबर भलीभाँति भिज्ञ था। दिल्ली व आगरा के अतिरिक्त उसका शासन अन्य प्रान्तो मे अत्यंत शिथिल था। फ़लत: परिस्थितियों ने उसे मजबूर कर दिया कि सांगा को हराने से पहले वह हसन खाँ को अपना मित्र बनाये। स्वाभिमानी हसन खाँ मेवाती ने बाबर का निमंत्रण ठुकरा कर स्वदेश प्रेमयों के साथ रहना उचित जाना।
            खानदानी अधिकारों व राणा सांगा की मित्रता के सामने धन-वैभव की क्या बिसात थी। हसन ने अपने पुत्र कि आहुति तक देने का दृढ निश्चय कर लिया। बाबर के निमंत्रण का प्रत्युत्तर दिल्ली पहुँचे उस से पूर्व हसन खां का पुत्र बाबर द्वारा स्वतंत्र किया जा चुका था जिसका वर्णन (बाबर की पुस्तक 'तुजुक' मे भी कई स्थानों पर किया है)। 
                        राणा राणा सांगा को हसन खाँ मेवाती वचन दे चुके थे कि वह उसी वंश की ओर से अताताइयों से युद्ध करेगा जिसमें वह पैदा हुआ। वीरो के लिए प्रणपालन सबसे अमूल्य धन है।
           धर्म,जाति,भाषा व देश कि विभिन्नताएँ उनके उद्देश्यों पर घात नहीं लगा सकती (जाय लाख रहे साख) के आदर्श पर ही वीर मर मिटते हैं। 
     हसन खाँ राणा सांगा से बयाना में सेना सहित जा मिले,जो आगरा से 50 मील कि दूरी पर स्थित है।  28 फ़रवरी 1527 ई. को फ़तेहपुर-सीकरी के उत्तर मे घमासन युद्ध हुआ बाबर कि फौज व मुगल सरदारों की हिम्मत टूट गई। शेख जमाली ओर मुल्ला तुर्क अली की सलाह से उसने अजमेर की तरफ भाग जाना ठीक समझा। यदि हसन खां के आदेशानुसार उसी समय मुगलों का पीछा किया जाता तो सभंवत: मुगल वंश का नाम लेवा भारत मे कोई नहीं रहता और भारत के इतिहास का घटनाक्रम ही बदल जाता।
           लेकिन सांगा की फौजें वापिस अपनी छावनी लौट कर आमोद-प्रमोद में लीन हो गई जिसका मुगल सेना ने लाभ उठाया बाबर को सेना संगठित करने का मौका मिल गया और 2-3 दिन के अन्तर से मेवाड़ के साथ मेवात पर चढ़ाई कर दी नतीजा फ़तेहपुरी के मैदान मे मुग़ल जीत गये। अन्तिम युद्ध के पूर्व राजा हसन खाँ मेवाती को उसके गुरू शय्यद जमाल अहमद बहादुरपुरी ने बाबर से लड़ने के लिए मना कर किया था। सय्यद साहब पर उसका बहुत विश्वास था ओर बचपन से युवा होने तक हसन खां ने कभी उसकी आज्ञा नहीं टाली पर वीरत्व के गर्व/घमण्ड के सामने गुरु की सीख को अनदेखा किया गया।
       हसन अलवर से विदा होते कहकर गया था कि या तो वह मेवात के लिए स्वन्त्रता लायेगा या उसकी लाश शहर में लौटेगी। यही हुआ हसन ओर उसके 12000 सैनिक वीरों की तरह लड़ते हुये खानवा के मैदान में शहीद हो गये।
      जमाल खा फ़तहजंग और हुसैन खाँ जो उसके सबंधी थे ने हसन लाश अलवर लाकर नगर के उतरी पाश्व मे दफ़नाई और तुर्बत पर छतरी बनवा दी जो आज भी हसन खां की छतरी के नाम से विख्यात है।
                      हसन खाँ की मृत्यु के सबन्ध मे इतिहासकारों के भिन्न-भिन्न अनुमान हैं। बमोलवी नजमुल गनी रामपुरी जकाउल्ला देहलवी कर्नल जैम्स टाँड अन्य विद्वानों कि राय में उसकी मृत्यु समरक्षेत्र में बन्दूक के आघात से हुई। हैकेट साहब अपने गजेटियर में उसकी मृत्यु का कारण पारस्परिक वैमनस्य बताते हैं। बाबर ने तुजक में लिखा है कि ललाट पर तीर लगने से उसके प्राण पखेरु उड़ गये। 
       अधिक विश्वासनीय यही बात जंचती है कि आजादी का वह फ़रिश्ता समर-क्षेत्र में ही वीरगति को प्राप्त हुआ।
       सच बात तो यह है कि देश की स्वन्त्रता के लिए मेवाड़ी ओर मेवाती दोनो ही शहीद हो गए।
          देश कि स्वन्त्रता के लिए दोनों की तलवार एक साथ उठी। 
आज भी यह लोकगीत प्रसिद्ध है :-
यह मेवाती वह मेवाड़ी मिल गये दोनों सैनाणी।
हिन्दु-मुस्लिम भाव छोड़ मिल बैठे दो हिन्दुस्ताणी।

           देश की रक्षा के लिए एक झण्डे के नीचे हिन्दु-मुस्लिम एकता का प्रतीक खानवा (बयाना) 495 वाँ यादगार यौम-ए-शहादत सभी वीरो को नमन।
माखुज़।
शमशेर भालुखान
जिगर चूरूवी

Comments

  1. वाकई आप की पोस्ट ज्ञान को बढ़ाने वाली है
    हमे गर्व है ऐसे देश प्रमियो पर जिन्होंने देश की आन बान और शान के लिए अपने प्राणों तक की परवाह नहीं की

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