Skip to main content

✅झज्जर के शहीद

1857 की क्रांति में झज्जर के शहीद - 
         झज्जर का युद्ध स्थल 
झज्जर की स्थापना - 
झज्जर की स्थापना छज्जु नामक किसान ने की जिसके कारण पहले इसका नाम छज्जु नगर था, बाद में यहां की मशहूर (झझरी) सुराही के कारण इसका नाम झज्जर पड़ा।
झज्जर का इतिहास - 
झज्जर के दो मुख्य शहर बहादुरगढ़ और बेरी है। बहादुरगढ़ की स्थापना राठी जाटों ने की थी। पहले बहादुरगढ़ को सर्राफाबाद के नाम से जाना जाता था। पिछले दिनों बहादुरगढ़ का तेजी से औद्योगिकरण हुआ है। बेरी इसका दूसरा मुख्य शहर है। यहां भीमेश्वरी देवी का प्रसिद्ध मन्दिर है। इस मन्दिर में पूजा करने के लिए देश-विदेश से पर्यटक प्रतिवर्ष आते हैं। मन्दिरों के अलावा पर्यटक यहां पर भिंडावास पक्षी अभ्यारण भी है।
झज्जर का गुरुकुल संग्रहालय - 
यह हरियाणा के सबसे बड़े संग्रहालय का निर्माण 1959 ई.में स्वामी ओमानंद सरस्वती ने किया था।
इसमें विश्व की प्राचीन वस्तुएं संग्रहित की हैं जो झज्जर की प्रसिद्धि का एक कारण है। देश-विदेश के शोधार्थी यहाँ आते रहते हैं जो यहां पर रोम, यूनान, गुप्त, पाल, चोल, गुजर, प्रतिहार, चौहान, खिलजी, तुगलक, लेड़ही और बहमनी वंश के सिक्के व कलाकृतियां देख सकते हैं। इसके अलावा यहां पर नेपाल, भूटान, श्रीलंका, चीन, पाकिस्तान, जापान, थाईलैंड, बर्मा, रूस, कनाडा, आस्ट्रेलिया, फ्रांस और इंग्लैंड आदि देशों की मुद्राएँ भी देखी जा सकती हैं। जेल के संस्मरण, विदेश-यात्रायें, संग्रहालय की स्थापना और उसमें एकत्रित दुर्लभ वस्तुओं का विवरण, हरियाणा बनाने में झज्जर का योगदान, आमरण अनशन, हिन्दी आंदोलन, अस्त्र-शस्त्रों का बीमा, हिन्दू-मुस्लिम मारकाट के संस्मरण, महाभारत काल के अस्त्र-शस्त्र, 1947 के 1000 कारतूस, दिव्य अस्त्रों का जखीरा, हाथी दांत पर कशीदाकशी से शकुंतला की आकृति, चन्दन की जड़ में सर्प, चित्तौड़गढ़ का विजय स्तंभ, बादाम में हनुमान, झज्जर के नवाब फारुख्शयार का कलमदान और मोहर, नवाबों की चौपड़, गोटियां और पासे, माप-तोल के बाट और जरीब आदि गुरुकुल की धरोहर हैं।
बुआ का गुम्बद व तालाब - 
झज्‍जर में स्थित बुआ का गुम्बद व तालाब बहुत खूबसूरत है जिसका निर्माण मुस्तफा कलोल की बेटी बुआ ने अपने प्रेमी की याद में करवाया। वह दोनों इसी तालाब के पास मिलते थे।
झज्जर के नवाब - 
झज्जर के नवाब अब्दुल रहमान खान
1857 की क्रांति के समय झज्जर हरियाणा की सबसे बड़ी रियासत थी जिसके नवाब अब्दुर्र रहमान खान थे। 11 मई को दिल्ली में बहादुर शाह जफर का शासन स्थापित होने के बाद उन्होंने वहां से अंग्रेज अधिकारियों यहां से भगा दिया था।
इस दौरान जान मैटकाफ व किचनर अपने परिवार सहित शरण लेने झज्जर पहुंचे। नवाब ने उन्हें शरण देने से मना कर दिया।
इस कारण से उन्हें रात में ही भागना पड़ा। इसके बाद नवाब व इस क्षेत्र की जनता ने खुली बगावत कर रोहतक व दिल्ली के विद्रोह में हिस्सेदारी की। नवाब ने रोहतक के डिप्टी कमिश्नर को शरण व सहायता नहीं दी। 23 मई को नवाब ने 300 घुड़सवार व पैदल सैनिक दिल्ली में मुगल बादशाह के पास भेज दिए। उसने दिल्ली में शासन को पांच लाख रुपये देने का वायदा भी किया। इस तरह नवाब अपनी जनता के साथ अंग्रेजों से स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत था। इस कारण दिल्ली जीतने के बाद अंग्रेजों ने यह क्षेत्र भी अपने कब्जे में ले लिया।

1857 का युद्ध - 
ये कब्रिस्तान हरियाणा की झज्जर रियासत के उन बीस सैनिकों का है जिनको 15 अक्टूबर 1857 को गुडियानी गाँव में अंग्रेज़ो द्वारा गोली मारकर शहीद कर दिया गया था। अंग्रेजों के दिल्ली पर कब्ज़े के बाद झज्जर नवाब को पकड़ने के लिए ब्रिगेडियर शॉवर को भेजा गया था। लेकिन वो गुड़गांव, रिवाड़ी, जटुसाना, गुडियानी, चरखी दादरी, छुच्छकवास और फिर झज्जर होते वहां पहुंचा।  ब्रिगेडियर शॉवर को लग रहा था की अगर वह सीधे दिल्ली से झज्जर गया तो लड़ाई बहुत जबरदस्त होगी। क्योंकि उस समय झज्जर छावनी में झज्जर रियासत की एक तैयार सेना थी। इस ब्रिटिश टुकड़ी ने दादरी जाते समय झज्जर नवाब के 20 घुड़सवारों को से गोली मार दी। लेकिन झज्जर के आखिरी नवाब ने अभी तक अंग्रेजों से लड़ने का फैसला नहीं किया था, यहां तक ​​कि दिल्ली रिज पर भी। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों की मदद के लिए 23 मई 1857 में केवल 300 घुड़सवार सेना दिल्ली भेजी। 
20 सितंबर 1857 को दिल्ली पतन के बाद स्थितियां बदल गईं। 4 अक्टूबर को कैप्टन हडसन ने झज्जर पर आक्रमण कर दिया। 13 दिन चले युद्ध के बाद भी हडसन सफल नहीं हुआ तो 17 अक्टूबर को लारेंस की सेना भी आ गई। 18 अक्टूबर को हडसन व लारेंस ने नवाब को छुकछुकवास में वार्ता के लिए बुलाया और बंदी बना लिया। इसके बाद झज्जर, छुकछुकवास, कोनौड़ (वर्तमान में महेंद्रगढ़) में अंग्रेजों ने लूटपाट की। उन्हें यहां 21 तोपें, सोने की मोहरों के पांच थैले (तत्कालीन मूल्य 1,39,000 रुपये) व विभिन्न दस्तावेज मिले। जिनको नवाब के खिलाफ मुकदमे का आधार बनाया गया। 26 नवंबर को उनके विरुद्ध आरोप पत्र बना कर लालकिले में उसी अदालत के सामने पेश किया, जिसमें बहादुर शाह जफर का मुकदमा चला था। आठ से 14 दिसंबर तक प्रतिदिन मुकदमे की औपचारिकता की गई। नवाब की चार बेगमों व परिवार को आवास से बेदखल कर दिया गया। महिलाओं को छोड़कर नवाब परिवार के 11 पुरुषों को तोप से बांधकर उड़ा दिया गया। झज्जर रियासत को समाप्त कर इसे रोहतक का हिस्सा बना दिया गया।
एक छोटी सी पहाड़ी के पास गुड़ियानी गांव में झज्जर सैनिकों की याद में 1990 के आसपास एक शिलालेख बनाया गया था।
स्त्रोत - विभिन्न पत्रिकाएं एवं लेख

शमशेर भालू खां 
#जिगर चुरूवी 
9587243.63

Comments

Popular posts from this blog

बासनपीर मामले की हकीकत

इस ब्लॉग और मेरी अन्य व्यक्ति से हुई बातचीत पर मंहत प्रतापपुरी का बयान जीवनपाल सिंह भाटी की आवाज में सत्य घटना सद्भावना रैली बासनपीर जूनी पूर्व मंत्री सालेह मुहम्मद का बयान बासनपीर जूनी के सत्य एवं जैसाने की अपनायत की पड़ताल -  पिछले कुछ दिनों से जैसलमेर के बासन पीर इलाके का मामला सामने रहा है। कहा जा रहा है कि पूर्व राज परिवार की जमीन पर बासनपीर गांव के लोगों द्वारा कब्जा किया जा रहा है। नजदीक से पड़ताल करने पर हकीकत कुछ ओर निकली। जिसके कुछ तथ्य निम्नानुसार हैं - रियासत काल में सन 1662 में बीकानेर और जैसलमेर रियासत के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में जैसलमेर सेना के दो वीर योद्धा सोढ़ा जी और पालीवाल जी शहीद हो गए। युद्ध के बाद बासन पीर (युद्ध स्थल) तालाब की तलहटी पर शहीदों की स्मृति में छतरियां बनवाई हैं। जैसलमेर के चारों और 120 किलोमीटर इलाके में 84 गांव पालीवाल ब्राह्मणों ने बसाए जिनमें से एक गांव बासनपीर जूनी भी था। पालीवाल ब्राह्मण समृद्ध किसान और व्यापारी थे, रियासत के दीवान सालिम सिंह से अनबन के कारण सन् 1825 में सभी गांव खाली करने को मजबूर हो गए। पालीवाल...

✍️कायम वंश और कायमखानी सिलसिला सामान्य इतिहास की टूटी कड़ियाँ

कायमखानी समाज कुछ कही कुछ अनकही👇 - शमशेर भालू खां  अनुक्रमणिका -  01. राजपूत समाज एवं चौहान वंश सामान्य परिचय 02. कायम वंश और कायमखानी 03. कायमखानी कौन एक बहस 04. पुस्तक समीक्षा - कायम रासो  05. कायम वंश गोत्र एवं रियासतें 06. चायल वंश रियासतें एवं गोत्र 07. जोईया वंश स्थापना एवं इतिहास 08. मोयल वंश का इतिहास 09. खोखर वंश का परिचय 10. टाक वंश का इतिहास एवं परिचय  11. नारू वंश का इतिहास 12 जाटू तंवर वंश का इतिहास 13. 14.भाटी वंश का इतिहास 15 सरखेल वंश का इतिहास  16. सर्वा वंश का इतिहास 17. बेहलीम वंश का इतिहास  18. चावड़ा वंश का इतिहास 19. राठौड़ वंश का इतिहास  20. चौहान वंश का इतिहास  21. कायमखानी समाज वर्तमान स्थिति 22. आभार, संदर्भ एवं स्त्रोत कायम वंश और कायमखानी समाज टूटी हुई कड़ियां दादा नवाब (वली अल्लाह) हजरत कायम खां  साहब   नारनौल का कायमखानीयों का महल     नारनौल में कायमखानियों का किला मकबरा नवाब कायम खा साहब हांसी,हरियाणा   ...

✅इस्लाम धर्म में व्यापार, ब्याज एवं मुनाफा

अरब व्यापारी हर देश में हर देश का हर एक सामान खरीदते और बेचते थे। अरब में व्यापार -  किसी भी क्षेत्र में सभी सामान उपलब्ध नहीं हो सकते। हर क्षेत्र का किसी ना किसी सामान के उत्पादन में विशेष स्थान होता है। उपलब्ध सामग्री का उत्पादन, भंडारण, परिवहन एवं विपणन ही व्यापार कहलाता है। क्षेत्र अनुसार इसके अलग - अलग नाम हो सकते हैं। इस्लाम धर्म का उदय अरब में हुआ। अरब क्षेत्र में तीन प्रकार की जनजातियां रहती थीं। बायदा - यमनी  अराबा - कहतानू (मिस्र) मुस्ता अराबा - अरबी (इस्माइली) यह जनजातियां खेती, व्यापार एवं अन्य कार्य करती थीं। हजारों सालों से इनका व्यापार रोम, चीन एवं अफ्रीका के देशों से रहा। अरब व्यापारी पश्चिम में अटलांटिक महासागर से लेकर पूर्व में अरब सागर तक, अरब प्रायद्वीप तक व्यापार करते थे। अरब नील से ह्यांग्हो तक व्यापार करते थे। अरब प्रायद्वीप कई व्यापार मार्गों के केंद्र में स्थित था, जिसमें दक्षिण पूर्व एशिया, भूमध्य सागर और मिस्र शामिल थे। यहां मुख्य सभ्यताएं रहीं -  - सुमेरियन एवं बेबीलोन  सभ्यता (मेसोपोटामिया/इराक) (दजला फरात) की सभ्यता। - फ...