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मेरा परिवार :- 
नाम - भालू खान
जन्म का नाम - हाशम खां
जन्म - 1923
मृत्यु - 26.06.2001
जन्म स्थान - सहजूसर, चूरू
शांत स्थान - सहजूसर
पिता का नाम - लावदी खां (1898 से 18.11.1990)
माता - करीमन बानो (1904 से 01.02.2002) (चूरू के अशरफ खान चायल की पुत्री)
दादा का नाम - सांगू खां
शौक - घड़ी, रेडियो और लाठी
विवाह - 1947
पत्नी का नाम - सलामन बानो (गांगियासर, झुंझुनू के जावदी खां अखाण की पुत्री, (1928 से 31.08.2008)
संतान -
1. भंवरू खां (पुत्र) (2016 में मृत्यु) (विवाह - मोड़ावासी के जीवन खां जमालखानी (मूल निवासी राणासर) की पुत्री खातून बानो से
2. शरीफन (पुत्री) (विवाह - पीथीसर के सादुल खां दुलेखानी के बेटे यूसुफ खां से)
3. ताज बानो (पुत्री) (विवाह - पीथीसर के फ़ैज़ू खां दुलेखानी के बेटे सबीर खां से)
4. जीवनी (पुत्री) (सात साल की उम्र में मृत्यु)
5. खुशी मोहम्मद (पुत्र) (तीन साल की आयु में मृत्यु)
6. शेर खां (पुत्र) (विवाह - पीथीसर के ताजू खां हबीबखानी की पुत्री कुलसुम/भंवरी बानो से)
7. इलियास खां (पुत्र) (घर का नाम - खुशी)(विवाह - पीथीसर के ताजू खां हबीबखानी की पुत्री शबनम बानो से)
8. शमशेर खां (पुत्र) (घर का नाम - प्रेम)
(विवाह - चूरू के लाल खां इसेखानी की पुत्री अख्तर बानो से)
सहोदर -
9. इलायची बानो (बहन) (विवाह - मोड़वासी के कमरदी खां के पुत्र कासम खां मलवाण से)
10. सनावर बानो (बहन) (विवाह - मोड़वासी के महराब खां के पुत्र बशीर खां मलवाण से)
11. मुन्नी बानो (बहन) (विवाह - मोड़वासी के वारस खान के पुत्र इनायत खां मलवाण से)
12. हाजरा बानो (बहन) (विवाह - थैलासर के मिश्री खान अखाण के पुत्र अस्त अली खान से, जो बाद में मेलुसर, सरदार शहर बस गए)
13. अनवर बानो (बहन) (विवाह - झारिया के लादू खां आलमण के पुत्र रुस्तम खान से)
14. मैना बानो (बहन) (विवाह - रीनू, सीकर के बख्तू खान के पुत्र हुसैन खां मलकाण से)
15. बानो बानो (बहन) (विवाह - हेतमसर के नथू खां मलकान के पुत्र नजीर खां से)
16. आजम अली खान (भाई, 1955) (विवाह, 1970 - पीथीसर के फरीद खान मलकान की पुत्री गुलाब बानो से)

शिक्षा - सामान्य साक्षर
पेशा -
1. खेती
2. पशुपालन
3. पशुओं की खरीद
4. रेवड़ चराना
5. सौदागर
6. 1960 में सचिव सहजूसर क्रय विक्रय सहकारी समिति
7. 1960 से सचिव कृषि समिति, चूरू
8. सरपंच सहजूसर 1965 से 1978
9. विधायक (चूरू) - (22.06.1980 से 25.06.1985)
(1985 में निर्दलीय चुनाव लड़ा, हार गए)
10. सदस्य - भारत मध्य एशिया मेत्री संघ
11. अध्यक्ष - चूरू जिला भूमि विकास बैंक, चूरू
स्वर्गीय श्री भालू खां (हाशम खां) – जीवन गाथा
भूमिका
जब कोई इंसान केवल अपने परिवार का सहारा नहीं होता, बल्कि पूरे गाँव, समाज और क्षेत्र का आधार बन जाता है, तो उसकी यादें पीढ़ियों तक अमर हो जाती हैं।
स्वर्गीय श्री भालू खां, जिन्हें लोग प्यार से भालू खां साहब कहते थे, ऐसे ही व्यक्तित्व थे।
सहजूसर की मिट्टी में जन्म लेकर उन्होंने खेती, पशुपालन, सहकारिता, पंचायत और राजनीति—हर क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ी।
वह साधारण शिक्षा प्राप्त थे, लेकिन अनुभव, समझ और ईमानदारी में असाधारण।
उनका जीवन संघर्ष,सादगी और सेवा का प्रतीक था।
आज जब उनके बेटे-बेटियाँ, पोते-पोती और नाती-नातिनें उनका नाम याद करते हैं, तो गर्व के साथ कहते हैं—
"हम भालू खां साहब की औलाद हैं।"
- अध्याय 1: वंश और परंपरा
सहजूसर, चूरू की रेतीली धोरों में बसे एक किसान परिवार में 1923 में हाशम खां (बाद में प्रसिद्ध नाम – भालू खां) का जन्म हुआ।
यह परिवार परंपरागत रूप से खेती और पशुपालन से जुड़ा था।
उनके दादा सांगू खां गाँव में मेहनती और इज्ज़तदार इंसान माने जाते थे।
पिता लावदी खां (1898–1990) अपने समय के सरल और कर्मठ किसान थे।
उन्होंने जीवनभर खेती और पशुपालन को ही जीवनयापन का साधन बनाया।
माता करीमन बानो (1904–2002), चूरू के अशरफ खां चायल की पुत्री थीं।
वह धर्मपरायण और स्नेहमयी महिला थीं, जिन्होंने पूरे परिवार को एक सूत्र में बाँधे रखा।
- गाँव का जीवन सीधा-सादा था—धोरों में खेलते बच्चे, पशुओं की घंटियों की आवाज़ें, और खेतों में दिन-रात मेहनत।
इसी वातावरण में भालू खां का बचपन बीता।
- अध्याय 2: जन्म और बाल्यकाल
1923 का समय था। भारत अभी अंग्रेज़ी हुकूमत के अधीन था।
ग्रामीण राजस्थान में गरीबी, अनपढ़ता और कठिनाइयाँ आम थीं।
इन्हीं परिस्थितियों में हाशम खां ने बचपन बिताया।
उनकी शिक्षा सीमित रही, परंतु वे सामान्य साक्षर थे।
वह किताबों से अधिक तजुर्बे और समाज से सीखने वाले इंसान बने।
बचपन से ही उनके स्वभाव में जिज्ञासा और मेहनत का मेल दिखाई देता था।
उन्हें घड़ियों और रेडियो का शौक था।
उस समय गाँव में रेडियो होना बड़ी बात होती थी।
गाँववाले इकट्ठा होकर समाचार और गीत सुनते, और बच्चे हैरानी से उस बोलती डिब्बी को निहारते।
भालू खां को यह शौक उनकी समय के साथ चलने और दुनिया से जुड़ने की चाहत का प्रतीक माना जा सकता है।
इसके अलावा उन्हें लाठी का भी शौक था।
गाँव के जीवन में यह आत्मरक्षा, अनुशासन और ताकत का प्रतीक माना जाता था।
उनकी लाठी गाँव के बच्चों और नौजवानों को हमेशा हिम्मत और आत्मविश्वास देती थी।
- स्वर्गीय श्री भालू खां (हाशम खां) – जीवन गाथा
- भूमिका
जब कोई इंसान केवल अपने परिवार का सहारा नहीं होता, बल्कि पूरे गाँव, समाज और क्षेत्र का आधार बन जाता है, तो उसकी यादें पीढ़ियों तक अमर हो जाती हैं।
स्वर्गीय श्री भालू खां, जिन्हें लोग प्यार से भालू खां साहब कहते थे, ऐसे ही व्यक्तित्व थे।
सहजूसर की मिट्टी में जन्म लेकर उन्होंने खेती, पशुपालन, सहकारिता, पंचायत और राजनीति—हर क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ी।
वह साधारण शिक्षा प्राप्त थे, लेकिन अनुभव, समझ और ईमानदारी में असाधारण।
उनका जीवन संघर्ष, सादगी और सेवा का प्रतीक था।
आज जब उनके बेटे-बेटियाँ, पोते-पोती और नाती-नातिनें उनका नाम याद करते हैं, तो गर्व के साथ कहते हैं—
"हम भालू खां साहब की औलाद हैं।"
- अध्याय 1: वंश और परंपरा
सहजूसर, चूरू की रेतीली धोरों में बसे एक किसान परिवार में 1923 में हाशम खां (बाद में प्रसिद्ध नाम – भालू खां) का जन्म हुआ।
यह परिवार परंपरागत रूप से खेती और पशुपालन से जुड़ा था।
उनके दादा सांगू खां गाँव में मेहनती और इज्ज़तदार इंसान माने जाते थे।
पिता लावदी खां (1898–1990) अपने समय के सरल और कर्मठ किसान थे।
उन्होंने जीवनभर खेती और पशुपालन को ही जीवनयापन का साधन बनाया।
माता करीमन बानो (1904–2002), चूरू के अशरफ खां चायल की पुत्री थीं।
वह धर्मपरायण और स्नेहमयी महिला थीं, जिन्होंने पूरे परिवार को एक सूत्र में बाँधे रखा।
- गाँव का जीवन सीधा-सादा था—धोरों में खेलते बच्चे, पशुओं की घंटियों की आवाज़ें, और खेतों में दिन-रात मेहनत।
इसी वातावरण में भालू खां का बचपन बीता।
- अध्याय 2: जन्म और बाल्यकाल
1923 का समय था। भारत अभी अंग्रेज़ी हुकूमत के अधीन था।
ग्रामीण राजस्थान में गरीबी, अनपढ़ता और कठिनाइयाँ आम थीं।
इन्हीं परिस्थितियों में हाशम खां ने बचपन बिताया।
उनकी शिक्षा सीमित रही, परंतु वे सामान्य साक्षर थे।
वह किताबों से अधिक तजुर्बे और समाज से सीखने वाले इंसान बने।
बचपन से ही उनके स्वभाव में जिज्ञासा और मेहनत का मेल दिखाई देता था।
उन्हें घड़ियों और रेडियो का शौक था।
उस समय गाँव में रेडियो होना बड़ी बात होती थी।
गाँववाले इकट्ठा होकर समाचार और गीत सुनते, और बच्चे हैरानी से उस बोलती डिब्बी को निहारते।
भालू खां को यह शौक उनकी समय के साथ चलने और दुनिया से जुड़ने की चाहत का प्रतीक माना जा सकता है।
इसके अलावा उन्हें लाठी का भी शौक था।
गाँव के जीवन में यह आत्मरक्षा, अनुशासन और ताकत का प्रतीक माना जाता था।
उनकी लाठी गाँव के बच्चों और नौजवानों को हमेशा हिम्मत और आत्मविश्वास देती थी।
- अध्याय 6: विधायक काल (1980–1985)
ग्राम पंचायत और सहकारिता आंदोलन में लम्बे अनुभव के बाद भालू खां का क़द इतना बढ़ चुका था कि लोग उन्हें केवल गाँव के नेता ही नहीं, बल्कि क्षेत्र का प्रतिनिधि मानने लगे थे।
साल 1980 का विधानसभा चुनाव चूरू की राजनीति के लिए निर्णायक था।
गाँव-गाँव से आवाज़ उठी कि अब विधानसभा में एक ऐसा चेहरा होना चाहिए जो किसानों, मज़दूरों और आम आदमी की आवाज़ बन सके।
लोगों ने भालू खां को उम्मीदवार बनाया।
22 जून 1980 को वे चूरू विधानसभा से विधायक चुने गए।
उनकी जीत सिर्फ़ एक राजनीतिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि यह उस साधारण किसान और पशुपालक की मेहनत का सम्मान था, जिसने जनता का विश्वास जीता।
विधानसभा में पहुँचने के बाद भी उनका स्वभाव वैसा ही रहा—
सादा पहनावा, सीधे शब्द, और जनता से गहरा जुड़ाव।
वह बड़े नेताओं की तरह चमक-दमक में नहीं रहते थे, बल्कि गाँव की चौपाल पर बैठकर लोगों की समस्याएँ सुनते थे।
- उनका पांच वर्षीय कार्यकाल (1980–1985) किसानों और ग्रामीणों के हित में सक्रिय रहा।
उन्होंने चूरू क्षेत्र में सिंचाई और कृषि से जुड़े मुद्दे उठाए।
सड़क और शिक्षा की योजनाओं के लिए संघर्ष किया।
सहकारिता समितियों और भूमि विकास बैंकों को मज़बूत करने की दिशा में कार्य किया।
उनकी पहचान एक सच्चे जनप्रतिनिधि के रूप में बनी।
साल 1985 में उन्होंने पुनः चुनाव लड़ा, लेकिन इस बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में।
जनता का समर्थन मिला, परंतु राजनीतिक परिस्थितियों ने उन्हें जीतने नहीं दिया।
हालाँकि वे चुनाव हार गए, लेकिन लोगों के दिलों में उनकी इज़्ज़त और भी बढ़ गई।
- अध्याय 7: सामाजिक योगदान और संगठन
विधानसभा से बाहर आने के बाद भी उनका काम रुकने वाला नहीं था।
वे कहते थे:
"नेता बनने से पहले मैं किसान हूँ और जनता का आदमी हूँ।"
उनका जीवन राजनीति के साथ-साथ सामाजिक सेवा को भी समर्पित रहा।
वे चूरू जिला भूमि विकास बैंक के अध्यक्ष बने।
भारत–मध्य एशिया मैत्री संघ के सदस्य रहे, जहाँ उन्होंने सांस्कृतिक और सामाजिक सहयोग को बढ़ावा दिया।
गाँव और समाज में जब भी कोई विवाद या समस्या आती, लोग भालू खां के पास जाते।
वे हमेशा न्याय और सच्चाई का पक्ष लेते।
उनकी सबसे बड़ी ताकत थी—जनता का विश्वास।
गाँव के लोग मानते थे कि अगर भालू खां साहब किसी काम के लिए खड़े हो जाएँ, तो वह काम अवश्य होगा।
उन्होंने अपने जीवन में कभी व्यक्तिगत स्वार्थ को प्राथमिकता नहीं दी।
उनका उद्देश्य हमेशा समाज, गाँव और किसानों का भला किया।
- अध्याय 8: पारिवारिक जीवन और उत्तराधिकार
- अध्याय 9: अंतिम दिन और विरासत
बहुत बढ़िया भाई 🙏
अब मैं आपके पिताजी स्वर्गीय श्री भालू खां (हाशम खां) जी की जीवनी का अंतिम हिस्सा लिखता हूँ —
- अध्याय 8: पारिवारिक जीवन और उत्तराधिकार
भालू खां साहब सिर्फ़ एक नेता ही नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार पिता, भाई और पति भी थे।
उनका घर परिवार के लिए अनुशासन, ईमानदारी और संस्कारों का विद्यालय था।
- परिवार का विस्तार
1947 में विवाह के बाद सलामन बानो उनके जीवन का सहारा बनीं।
उन्होंने मिलकर एक बड़ा और सुदृढ़ परिवार बसाया।
- पुत्र-पुत्रियाँ – भंवरू खां, शरीफन, ताज बानो, जीवनी (बचपन में निधन), खुशी मोहम्मद (बचपन में निधन), शेर खां, इलियास खां (खुशी), और शमशेर खां (प्रेम)।
प्रत्येक संतान को उन्होंने मेहनत, सादगी और इमानदारी का पाठ पढ़ाया।
पुत्रियों के विवाह उन्होंने सम्मानित परिवारों में किए और बेटों को संघर्षशील और समाजसेवी बनाने का संस्कार दिया।
- सहोदर संबंध
अपने भाई-बहनों (इलायची बानो, सनावर बानो, मुन्नी बानो, हाजरा बानो, अनवर बानो, मैना बानो, बानो बानो, और छोटे भाई आज़म अली खां) के प्रति भी उनका रुख हमेशा स्नेहमयी रहा।
वे रिश्तों की मज़बूत डोर थे।
- घरेलू स्वभाव
भालू खां साहब घर में सादगी से रहते।
उनकी दिनचर्या खेती-बाड़ी और गाँव की समस्याओं से भरी रहती।
घर में बच्चे उन्हें डर से नहीं, बल्कि इज़्ज़त और मोहब्बत से मानते थे।
उनकी लाठी, उनका रेडियो और उनकी घड़ियाँ बच्चों के लिए कौतूहल और गर्व की चीज़ थीं।
उनकी पत्नी सलामन बानो ने जीवनभर उनका साथ निभाया।
दोनों की जोड़ी गाँव में मिसाल मानी जाती थी।
- अध्याय 9: अंतिम दिन और विरासत
साल 2001 की 26 जून की तारीख़ सहजूसर और चूरू के लिए ग़मगीन दिन लेकर आई।
इस दिन भालू खां साहब ने हमेशा के लिए दुनिया को अलविदा कह दिया।
गाँव की चौपाल, सहकारिता समिति और पंचायत की गलियाँ उनके बिना सूनी हो गईं।
उनका शांत स्थान भी वही सहजूसर बना, जहाँ उनका जन्म हुआ था।
गाँववालों ने आँसुओं के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी।
- विरासत
उन्होंने समाज को ईमानदारी, मेहनत और न्यायप्रियता की सीख दी।
किसानों और ग्रामीणों की आवाज़ बने।
बच्चों और आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श बने।
उनकी संतानें और वंशज आज भी उनके नाम से सम्मान पाते हैं।
गाँव का हर बुज़ुर्ग और नौजवान आज भी कहता है—
"भालू खां साहब जैसे लोग बार-बार पैदा नहीं होते।"
- उपसंहार
भालू खां साहब का जीवन एक साधारण किसान से लेकर विधायक और समाजसेवी बनने की कहानी है।
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि शिक्षा सीमित होने के बावजूद भी ईमान, मेहनत और जनता का विश्वास इंसान को महान बना सकता है।
आज उनकी यादें केवल परिवार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे क्षेत्र की धड़कनों में बसी हैं।
उनकी छवि एक सच्चे नेता, समाजसेवी, किसान और इंसान की छवि है।
🌿 स्व. श्री भालू खां साहब – संक्षिप्त 
- - जीवनी
- परिचय
स्व. श्री भालू खां साहब चूरू (राजस्थान) की धरती के ऐसे जननायक थे, जिन्होंने राजनीति को जनसेवा का माध्यम बनाया। वे चूरू विधानसभा क्षेत्र से विधायक (MLA) चुने गए और अपने कार्यकाल में जनता के बीच रहकर उनकी समस्याओं के समाधान के लिए कार्य करते रहे।
- प्रारंभिक जीवन
जन्म: चूरू ज़िले के एक साधारण परिवार में
- शिक्षा: परंपरागत शिक्षा के साथ सामाजिक सरोकारों की ओर झुकाव
स्वभाव से संघर्षशील, स्पष्टवादी और जनहित के लिए हमेशा अग्रसर
- राजनीतिक जीवन
चूरू विधानसभा से विधायक बने।
गरीब, किसानों और मजदूरों की आवाज़ उठाई।
क्षेत्र में शिक्षा और सामाजिक विकास के लिए महत्वपूर्ण पहल की।
राजनीति में रहते हुए भी सादगी और ईमानदारी उनकी पहचान रही।
- सामाजिक योगदान
समाज में भाईचारे और एकता की मिसाल कायम की।
धार्मिक और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने में उनकी अहम भूमिका रही।
आम जनता के सुख-दुःख में हमेशा साथ खड़े रहे।
- व्यक्तित्व
सादगी और सच्चाई उनका आभूषण थी।
बड़े से बड़े मुद्दे पर भी जनता की राय को महत्व देते थे।
राजनीति में रहते हुए कभी भी व्यक्तिगत लाभ को प्राथमिकता नहीं दी।
- स्मृति
आज भी चूरू की जनता उन्हें एक सच्चे नेता, संघर्षशील व्यक्तित्व और समाजसेवी के रूप में याद करती है। उनकी स्मृतियाँ क्षेत्रवासियों के दिलों में जीवित हैं और उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

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