समानता - भेदभाव वास्तविकता, मिथ्या व कानून
समानता - भेदभाव क्या क्यों और कैसे
मानव सभ्यता की शुरुआत ने इस शब्द की रचना की। प्रकृति ने किसी के साथ भी समानता का व्यवहार नहीं किया। किसी को पूंछ दे दी तो किसी को सींग, किसी को गर्दन लंबी दे दी तो किसी को टांग, किसी को शक्तिशाली पंजे दे दिए तो किसी को पंख, किसी को बोलने की क्षमता दी तो किसी को सूंघने की। प्रकृति ने सृष्टि में जो एक विशेषता किसी एक को दी है उसे हम भेदभाव नहीं कह कर विशिष्टता कह सकते हैं। अक्सर लोग कहते हैं ईश्वर ने सब को एक सा नहीं बनाया, हां, परन्तु ईश्वर ने हर एक को विशिष्ट पहचान दी है जो उसकी व्यक्तिगत है। यह पहचान भेदभाव नहीं एक गुण है।
भेदभाव (Discrimination) - सजातीय व्यक्तियों द्वारा आपसी मेलजोल में किया जाने वाला असमान्य व्यवहार जो उसके सम्मान के प्रतिकूल हो भेदभाव कहलाता है।
समाजशास्त्रीय अर्थ - भेदभाव से तात्पर्य किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह द्वारा अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह के साथ उसके किसी विशेष गुण, पहचान या विशेषता के आधार पर दूसरों की तुलना में प्रतिकूल या अनुचित व्यवहार करना है।
भेदभाव की परिभाषा - भेदभाव तब होता है जब किसी व्यक्ति को उसकी जाति, लिंग, धर्म, जन्म स्थान, भाषा, शारीरिक क्षमता या आर्थिक स्थिति के आधार पर उन अधिकारों या अवसरों से वंचित कर दिया जाता है, जो दूसरों को उपलब्ध हैं। यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है।संविधान के अनुसार - राज्य या किसी नागरिक के साथ राज्य या कोई नागरिक केवल रंग, आयु, धर्म, वंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान के आधार पर निषेधात्मक व्यवहार को भेदभाव कहेंगे।
भेदभाव के प्रकार -
प्रत्यक्ष भेदभाव - जब किसी व्यक्ति के साथ स्पष्ट रूप से उसकी पहचान के कारण बुरा व्यवहार किया जाए। (जैसे - किसी खास जाति के होने के कारण नौकरी देने से मना करना)। इस प्रकार के भेदभाव सामाजिक भेदभाव होते हैं। छुआछूत इन में से एक है।
अप्रत्यक्ष भेदभाव - देखने में नियम या शर्तें सबके लिए समान होती हैं, लेकिन उनका प्रभाव किसी विशेष समूह पर नकारात्मक पड़ता है। (जैसे: ऐसी शारीरिक ऊंचाई की शर्त रखना जिसकी आवश्यकता कार्य के लिए न हो, जिसके कारण विशेष क्षेत्र के लोग उस अवसर से वंचित हो जाएं)। इस प्रकार के भेदभाव राज्य की ओर से किए जाते हैं।
भेदभाव के आधार -
1. सामाजिकता - जाति (Caste) और वर्ग (class) के आधार पर।
2. लैंगिकता - महिला, पुरुष या ट्रांसजेंडर होने के आधार पर।
3. धार्मिकता - अल्पसंख्यक या किसी विशेष पंथ से जुड़े होने के आधार पर।
4. शारीरिकीय - विकलांगता या बीमारी के आधार पर।
5. क्षेत्रीयता - क्षेत्र विशेष को अधिक प्राथमिकता देना और दूसरे क्षेत्रों के प्रति द्वेष।
6. भाषा - किसी एक भाषा को मानने या बोलने के कारण किया जाने वाला तिरस्कार।
भेदभाव के कारण - भेदभाव कोई आकस्मिक घटना नहीं है, यह सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक जड़ों से जुड़ा हुआ बिंदु है। इसके मुख्य कारण -
1. पूर्वाग्रह (Prejudice) - यह भेदभाव का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक कारण है। पूर्वाग्रह का अर्थ है किसी व्यक्ति या समूह के बारे में बिना किसी ठोस प्रमाण या अनुभव के पहले से ही कोई धारणा बना लेना (अक्सर नकारात्मक)। जब ये धारणाएं व्यवहार में उतरती हैं, तो भेदभाव का रूप ले लेती हैं। जातिवाद इसका मुख्य उदाहरण है।
2. रूढ़िवादिता (Stereotyping) - समाज में कुछ समूहों के प्रति कुछ निश्चित विचार घर कर जाते हैं। जैसे - अमुक जाति के लोग ऐसे ही होते हैं, या महिलाएं यह काम नहीं कर सकतीं। ये रूढ़ियाँ व्यक्ति की व्यक्तिगत क्षमता को नज़रअंदाज़ कर देती हैं और भेदभाव को जन्म देती हैं।पितृसत्ता इसका मुख्य उदाहरण है।
3. अज्ञानता एवं अशिक्षा - जब लोगों को दूसरे धर्मों, संस्कृतियों या समुदायों के बारे में सही जानकारी नहीं होती, तो वे उन्हें अलग या निम्न समझने लगते हैं। शिक्षा की कमी के कारण लोग तार्किक रूप से सोचने के बजाय सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा करते हैं। धार्मिक कट्टरता इसका मुख्य उदाहरण है।
4. ऐतिहासिक कारण - भारत जैसे देशों में जाति व्यवस्था सदियों से चली आ रही है। पुरानी परंपराओं और पदानुक्रम (Hierarchy) के कारण समाज का एक वर्ग खुद को उच्च और दूसरे को निम्न मानने लगा, जो आज भी कई रूपों में भेदभाव का कारण बना हुआ है।
5. आर्थिक कारण - नौकरी, जमीन या अन्य संसाधन कम होने पर प्रभावशाली समूह दूसरे समूहों को बाहर करने की कोशिश करता है ताकि वे उन संसाधनों पर अपना कब्ज़ा बनाए रख सकें। यह आर्थिक असमानता भेदभाव को और गहरा करती है।
6. मनोवैज्ञानिक कारण - डर, असुरक्षा की भावना, श्रेष्ठता के भ्रम (अहम) के कारण दूसरे लोगों से हीन भाव से व्यवहार करना। समुदायों के बीच ध्रुवीकरण, वोट बैंक की राजनीति इसका मुख्य उदाहरण है।
उस समय के ज्ञान के अनुसार -
वेदों में पर्दे (हिजाब) के बारे में ऋग्वेद, मण्डल नं. 8, सूक्त नं. 33, मंत्र नं. 19 में स्पष्ट श्लोक लिखा है -
अ॒धः प॑श्यस्व॒ मोपरि॑ संत॒रां पा॑द॒कौ ह॑र।
मा ते॑ कशप्ल॒कौ दृ॑श॒न्त्स्त्री हि ब्र॒ह्मा ब॒भूवि॑थ॥
अर्थात..-.उस (स्त्री) के शरीर के सभी अवयव अच्छी प्रकार ढके रहें. स्त्री का यदि कोई भाग खुला रहेगा तो उसे देखकर पुरुषों के मन में कुभाव जागेंगे....!"यही उत्तम उपदेश है।
6. विचारधारा और परवरिश - अक्सर बच्चे घर और आस-पड़ोस के माहौल से भेदभाव सीखते हैं। यदि परिवार में ही किसी विशेष समूह के प्रति घृणा या तिरस्कार का भाव दिखाया जाता है, तो अगली पीढ़ी में वही सोच स्वतः विकसित होने लगती है।
भेदभाव के नुकसान - भेदभाव न केवल उस व्यक्ति को प्रभावित करता है जिसके साथ यह होता है, बल्कि यह पूरे समाज और राष्ट्र की प्रगति की नींव को कमजोर कर देता है।
1. व्यक्तिगत एवं मनोवैज्ञानिक नुकसान - किसी व्यक्ति के साथ होने वाला भेदभाव उसकी मानसिक स्थिति पर गहरा प्रहार डालता है, इसके कारण हीन भावना, अकेलापन, और मानसिक विकार पैदा हो जाते हैं -
क. आत्मविश्वास में कमी - निरंतर भेदभाव का सामना करने वाला व्यक्ति अपनी क्षमताओं पर संदेह करने लगता है और खुद को दूसरों से कमतर समझने लगता है। आखिरकार उसमें हीन भावना पैदा हो जाती है।
ख. मानसिक तनाव और अवसाद - अपमान और बहिष्कार की भावना व्यक्ति में चिंता (Anxiety), क्रोध (anger) और अवसाद (Depression) पैदा कर देती है।
ग़. प्रतिभा का ह्रास - भेदभाव के कारण योग्य व्यक्ति को अवसर नहीं मिलते, जिससे उसकी प्रतिभा दब कर रह जाती है।
2. सामाजिक नुकसान - समाज के स्तर पर भेदभाव एक ज़हर की तरह काम करता है -
क. सामाजिक विखंडन - यह समाज को हम और वे की श्रेणियों में बाँट देता है, जिससे भाईचारा खत्म होता है और आपसी अविश्वास बढ़ता है।
ख. हिंसा और संघर्ष - जब एक समूह को लंबे समय तक प्रताड़ित या उपेक्षित किया जाता है, तो यह अक्सर विरोध, दंगों या सामाजिक अस्थिरता का रूप ले लेता है। पंजाब, मणिपुर, नक्सल और अन्य जनजातीय संघर्ष इसके उदाहरण हैं।
ग. अन्याय को बढ़ावा - भेदभावपूर्ण समाज में न्याय का समान वितरण नहीं हो पाता, जिससे "कानून का शासन" (Rule of Law) कमजोर होता है। कश्मीर समस्या इसका मुख्य उदाहरण है।
3. आर्थिक और राष्ट्रीय नुकसान - एक देश के रूप में विश्व स्तर पर भेदभाव की भारी कीमत चुकानी पड़ती है, इससे गरीबी का दुष्चक्र बढ़ता है और जीडीपी में गिरावट आती है। इसके कारण आंतरिक सुरक्षा को खतरा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खराब छवि बनती है -
क. मानव संसाधन की बर्बादी - यदि किसी विशेष वर्ग को शिक्षा या नौकरियों से दूर रखा जाता है, तो देश उनकी कार्यकुशलता और कौशल का लाभ नहीं उठा पाता।
ख. उत्पादकता में कमी - कार्यस्थल पर भेदभाव होने से कर्मचारियों का मनोबल गिरता है, जिससे संस्था और देश की कुल उत्पादकता कम होती है।
ग. विकास की असमानता - भेदभाव के कारण कुछ क्षेत्र या समुदाय बहुत पिछड़ जाते हैं, जिससे देश में गरीबी और बेरोजगारी का असंतुलन अनवरत बना रहता है।
भेदभाव 1947 से पहले और अब - 1947 से पहले का भारत और आज का भारत, भेदभाव के स्वरूप और उसे निपटने के तरीकों में एक बहुत बड़ा बदलाव दर्शाता है। हमने एक वैधानिक भेदभाव वाले समाज से संवैधानिक समानता वाले समाज की यात्रा तय की है। हम यहां दोनों समय कालों की तुलनात्मक स्थिति का अवलोकन करेंगे -
1. सामंती/औपनिवेशिक दौर 1947 से पहले - आजादी से पहले भेदभाव को न केवल सामाजिक मान्यता प्राप्त थी, बल्कि कई मामलों में कानूनी समर्थन भी प्राप्त था। आगे की बात से पहले हम सामंत, महंत ओर शूद्र कौन इस पर चर्चा कर लेते हैं -
I. सामंत (क्षत्रिय)- क्षेत्र का कुलीन जो राजकीय कार्य अथवा दरबार में काम करने वाले लोग जिन्हें आम भाषा में ठाकुर कहा जाता था।
II. महंत (गुरु/ब्राह्मण)- पुरोहित, पुजारी या शिक्षण कार्य करने वाले आचार्य जिन्हें सामंत के बाद समाज में उच्च स्थान प्राप्त था। न्यायिक निर्णयों में इनकी राय ही अंतिम होती थी। इसी आधार पर मनु, याज्ञवल्क्य, चाणक्य आदि के न्यायिक उल्लेख आज भी प्रचलित हैं।
III. वैश्य (वणिक)- व्यापार करने वाले लोग जिन्हें स्थानीय भाषा में बनिया, साहूकार या सेठ कहा जाता था। यह तीसरी श्रेणी के लीग होते थे जिन्हें महंत और सामंत के बाद समाज में उच्च पद प्राप्त था। हालांकि वैश्य को महंत और सामंत के समकक्ष दर्जा प्राप्त नहीं था, पर यह शूद्र से ऊंचा स्थान रखते थे। सम्पूर्ण व्यापार इनके कब्जे में था।
IV. शूद्र (कर्मकार) - सामंत और महंत के अलावा काम करने वाले लोग जिन्हें स्थानीय भाषा में कारू - कमीण कहते हैं जैसे कृषक, बढ़ई (खाती), सुनार (स्वर्णकार), लुहार, चर्मकार (चमार), चरवाहा (गुर्जर), मल्लाह, मछुआरा, कसाई, नाई (क्षोरकार) अर्थात हाथ से काम करने वाला व्यक्ति शूद्र की श्रेणी में आता था। यही वर्ग आगे चलकर दलित समाज बना। आजकल इसे OBC, Sc एवं ST के नाम से जाना जाता है।
जातिवादी भेदभाव (छुआछूत) -
क. संस्थागत जातिवाद - छुआछूत चरम पर थी। दलितों और पिछड़े वर्गों को सार्वजनिक कुओं, मंदिरों और स्कूलों के उपयोग की अनुमति नहीं थी। इसे धर्म और परंपरा के नाम पर सही ठहराया जाता था। मनु स्मृति के अनुसार नीच जाति के लिए अक्षर ज्ञान हासिल करना वर्जित था। इसके अनुसार शूद्र यदि छुप कर भी ज्ञान प्राप्त कर ले या उसके कानों में वेदों के श्लोक चले जाएं तो उसके कानों में शीशा भर दिया जाना चाहिए। शास्त्रों में लिखे सूत्र यत्र नारी पूज्यंते तत्र रमंते देवता के विपरीत तुलसीदास जी ने यहां तक कह दिया है कि -
ढोल पशु गंवार शूद्र और नारी
यह सब ताड़न के अधिकारी।
नीच जाति (शूद्र) को
∆. शूद्र स्त्रियों को स्तन ढकने का अधिकार नहीं था।
∆. ठाकुर या राजा के घर के आगे से नंगे पैर या कहीं - कहीं चप्पल सर पर रख कर चलना पड़ता था।
∆. ऊंची जाति के व्यक्तियों पर शूद्र की छांव नहीं पड़े इसका उन्हें ध्यान रखना होता था, साथ ही उनके पैरों के निशान गांव के रस्ते पर न पड़ें इसलिए कमर के पीछे झाड़ू बांधनी पड़ती थी।
∆. शूद्रों को जमीन पर थूकने की अनुमति नहीं थी, उन्हें गले में कुल्हड़ बांध कर रखना पड़ता था जिसमें वो थूकते थे।
∆. डोळ। प्रथा - नव विवाहित दुल्हन पहली रात को स्थानीय उच्चीं जाति के (ठाकुर) के पास गुजारती थी , बाद में ससुराल में आती थी।
∆. देवदासी प्रथा - शूद्र समाज की नव कन्याओं को भगवान की सेवा हेतु देवदासी के रूप में समर्पित करना होता था, जिनका शोषण महंत आदि करते थे। सोमनाथ के मंदिर में हजारों देवदासीयां होती थीं।
∆. बेगार प्रथा - उच्च जाति के लोग शूद्रों से बिना मजदूरी का भुगतान किए मजदूरी करवाते थे।
∆. शूद्रों की छाया पढ़ने, उनकी बस्ती से गुजरने या सामने मिलने पर उच्च जाति के लोग पहले स्नान करते उसके बाद घर में प्रवेश करते थे।
∆. सामंतों या उच्च जाति के लोगों द्वारा शूद्र की सुंदर कन्याओं से बलात्कार करना समाज में पाप नहीं समझा जाता था। नारद ऋषि का जन्म इसी प्रकार के बलात्कार का परिणाम था।
∆. शूद्रों का किसी के घर (ड्योढ़ी) में प्रवेश पूर्णतया वर्जित था, यदि वो ऐसा करते तो कोड़ों की सजा का प्रावधान था।
∆. शूद्र स्त्रियों को सोने - चांदी के गहने पहनना मना था, यदि वो यह पहन लेतीं तो उनके हाथ कटवा दिए जाते।
इसके अलावा अन्य बहुत सारी वर्जनाएं शूद्र (कर्मकार) वर्ग पर लगाई गई थी। उन्हें मुख्य बस्ती से दूर बसना पड़ता था। सार्वजनिक स्थानों, कुएं, बावड़ी, मंदिर, विद्यालय या अन्य सुविधाओं का उपभोग उनके लिए वर्जित था।
वर्ष 1920 में शूद्र स्त्री को पानी पिलाती हुई स्वर्ण महिला।
ख. औपनिवेशिक भेदभाव - अंग्रेज खुद को नस्लीय रूप से भारतीयों से श्रेष्ठ मानते थे। सार्वजनिक स्थानों (जैसे क्लबों या ट्रेनों) के बाहर Dogs and Indians not allowed जैसे बोर्ड लगना आम था। हालांकि अंग्रेजों के समय में बहुत सी कुप्रथाओं का अंत करने हेतु कानून बनाए थे जिनमें सती प्रथा निषेध कानून एक था, परन्तु वो स्वयं को अन्य मानव जातियों से श्रेष्ठ समझते थे।
ग. लैंगिक स्थिति - महिलाओं के पास संपत्ति के अधिकार बराबर थे और शिक्षा तक उनकी पहुँच बहुत सीमित थी। पर्दा प्रथा और सती प्रथा जैसी कुरीतियाँ समाज का हिस्सा थीं। महिलाओं को पैर की जूती समझा जाता था। परिवार पितृसत्तात्मक होते थे, बेटी को पराया धन समझा जाता था। समाज में उन्हें कुरड़ी (कचरा डालने का स्थान) का धन कहा जाता था। इसी कारण बेटी जन्मते ही उसे मार दिया जाता था, जो हाल के बीस वर्षों में कम हुआ है।
घ. कानून का अभाव - भेदभाव को रोकने के लिए कोई सशक्त कानूनी ढांचा नहीं था। इस पर ब्रिटिश नीति फूट डालो और राज करो पर आधारित थी। इससे समाज में नीचे (शूद्र) लोगों की स्थिति अधिक दयनीय हुई।
2. वर्तमान स्थिति, 1947 के बाद का संवैधानिक और लोकतांत्रिक दौर - वर्ष
1950 में संविधान लागू होने के बाद भेदभाव की स्थिति में क्रांतिकारी बदलाव आए हैं फिर भी स्थिति को संभालने के लिए सरकार को UGC कानून ले कर आना पड़ा।
भेदभाव वर्तमान स्थिति -
∆. संवैधानिक सुरक्षा - सम्पूर्ण विश्व में भेदभाव की समाप्ति के लिए वर्ष 1700 से 1900 का दौर अति महत्वपूर्ण रहा। इसी समय में मार्टिन लूथर किंग ने भेदभाव विरोधी किया, अब्राहम लिंकन ने दास प्रथा विरोधी आंदोलन चलाया, मार्क्सवादी एवं साम्यवादी आंदोलन ने पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का नाश किया। इसी दौर में लोगों ने अधिकारों की लड़ाई शुरू की। महिलाओं को मत, संपत्ति एवं समान मजदूरी का अधिकार मिला। विश्व में औपनिवेशिक नीतियों का विरोध होने लगा, लोग आजादी की मांग करने लगे। गांधीजी ने अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध आंदोलन छेद दिया।
भारत में 1947 में आजादी के बाद बने संविधान के अनुच्छेद 15 के अंतर्गत भेदभाव को प्रतिबंधित किया गया और अनुच्छेद 17 द्वारा छुआछूत को पूरी तरह समाप्त कर दंडनीय अपराध बना दिया गया। भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 से 32 मानव अधिकारों का घोषणा पत्र बन गया। इसमें दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक एवं महिलाओं के प्रति जन्मों से चला आ रहा भेदभाव आधिकारिक रूप से समाप्त कर दिया गया। इतना ही नहीं यदि किसी ने भेदभाव किया तो उसके लिए कड़ी सजा की व्यवस्था की गई।
मैं उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में घुमा, आज भी कम ही सही कहीं ना कहीं यह स्थिति बनी हुई है।
∆. सकारात्मक भेदभाव - पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण जैसी व्यवस्थाएं की गईं, ताकि सदियों पुराने अन्याय की भरपाई की जा सके। इस आरक्षण का वास्तविक लाभ अंतिम छोर के दलित और पिछड़े तक नहीं पहुंचा। कुछ विशेष लोग पिछड़ों में अगड़े हो गए हैं और कुछ लोग पिछड़ों में अतिदलित।
महिलाओं की स्थिति में सुधार - हिंदू विवाह, हिंदू उत्तराधिकार एवं हिंदू दत्तक ग्रहण अधिनियम 1955 से 1956 तक ने महिलाओं को संपत्ति में समान अधिकार (2005 के संविधान संशोधन द्वार) दिए। आज महिलाएं सेना से लेकर अंतरिक्ष तक हर क्षेत्र में नेतृत्व कर रही हैं। वास्तव में महिलाओं की स्थिति में बदलाव हुआ है। एक समय था जब बेटी बोझ थी आज नहीं है। परंतु उत्तर एवं पूर्वी भारत में बेटियों को बेचा जा रहा है जिन्हें हरियाणा, पंजाब एवं राजस्थान में सरेआम खरीदा जा रहा है। महिला सरपंच, विधायक, सांसद, मंत्री एवं अधिकारी का पति ही वास्तव में उसकी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं। फिर भी कह सकते हैं कि स्थिति में बदलाव आया है।
जागरूकता और तकनीक: सोशल मीडिया और शिक्षा के प्रसार से अब भेदभाव की घटनाओं को दबाना मुश्किल है। लोग अपने अधिकारों के प्रति अधिक सजग हैं।
भेदभाव का तुलनात्मक चार्ट -
1947 से पहले = अब (वर्तमान) स्थिति
I. कानूनी स्थिति - भेदभाव को सामाजिक/कानूनी मौन सहमति = भेदभाव दंडनीय अपराध।
II. शिक्षा - शिक्षा केवल उच्च वर्गों तक सीमित = शिक्षा का अधिकार (RTE) अनिवार्य शिक्षा।
III. छुआछूत - समाज में अनिवार्य एवं वैध = कानूनन प्रतिबंधित और सामाजिक रूप से निंदनीय।
IV. सरकारी पद - उच्च पदों पर केवल कुलीन = योग्यता और आरक्षण के आधार पर सभी वर्गों की भागीदारी (कोलियम व्यवस्था के कारण यह स्थिति अभी तक न्यायपालिका में नहीं बन पाई है)
क्या भेदभाव पूरी तरह खत्म हो गया है - एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि कानून बनने के बावजूद भेदभाव का स्वरूप बदल गया है जिसके कई कारण एवं बदलते रूप -
I. मानसिकता - ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी जातिगत भेदभाव के मामले सामने आते हैं।
II. अप्रत्यक्ष भेदभाव - शहरी क्षेत्रों में अब यह जाति के बजाय आर्थिक स्थिति या विचारधारा के आधार पर अधिक दिखाई देता है। असम के मुख्यमंत्री का हाल का बयान इसका साफ उदाहरण हैं।
III. डिजिटल भेदभाव - अब इंटरनेट पर भी विशेष समुदायों के प्रति नफरत के रूप में भेदभाव दिखता है।
भेदभाव समाप्त करने के उपाय - भेदभाव को समाप्त करने हेतु कानूनी प्रक्रिया के साथ - साथ सामाजिक और मानसिक बदलाव की आवश्यकता है। इसे खत्म करने के लिए व्यक्तिगत, सामाजिक और सरकारी स्तर पर निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं -
1. शिक्षा और जागरूकता - शिक्षा भेदभाव के खिलाफ सबसे सशक्त हथियार है -
I. मूल्यों पर आधारित शिक्षा - स्कूलों के पाठ्यक्रम में समानता, सहानुभूति और मानवाधिकारों को शामिल किया जाना चाहिए ताकि बच्चे शुरुआत से ही विविधता का सम्मान करना सीखें।
II. जागरूकता अभियान - मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से रूढ़िवादिता को तोड़ने वाले कार्यक्रमों का प्रचार-प्रसार करना चाहिए।
2. कानूनी प्रावधानों का कड़ाई से पालन - भारत में भेदभाव रोकने के लिए मजबूत कानून हैं, लेकिन उनका सही क्रियान्वयन जरूरी है -
I. संवैधानिक संरक्षण - अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) को धरातल पर प्रभावी बनाना।
सरकार द्वारा इस हेतु बनाए गए नियम अधिनियम - भारत के संविधान के अनुच्छेद 15(3) और महिलाओं एवं बच्चों के लिए किए गए विशेष प्रावधान -
A. भारत के संविधान के अनुच्छेद 15 सामान्य रूप से भेदभाव का निषेध करता है, लेकिन इसका खंड (3) एक बहुत ही महत्वपूर्ण अपवाद है। यह राज्य को सकारात्मक भेदभाव करने की शक्ति देता है। यह अनुच्छेद स्पष्ट रूप से कहता है कि:
अनुच्छेद 15 की कोई भी बात राज्य को स्त्रियों और बालकों के लिए कोई विशेष उपबंध करने से निवारित (रोक) नहीं करेगी। इसका अर्थ है कि यदि सरकार महिलाओं या बच्चों के उत्थान हेतु कोई खास कानून बनाती है, तो उसे अनुच्छेद 15 के खिलाफ (पुरुषों के साथ भेदभाव) नहीं माना जा सकता।
संविधान निर्माताओं का मानना था कि सदियों से सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी महिलाओं को पुरुषों के बराबर लाने के लिए विशेष सहायता की आवश्यकता है। उदाहरण हैं -
∆. आरक्षण: स्थानीय निकायों (पंचायतों और नगर पालिकाओं) में महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण का प्रावधान है। सरकार ने संसद एवं विधानसभा में महिलाओं के आरक्षण का बिल पास कर दिया है।
∆. श्रम कानून - कारखानों या खदानों में महिलाओं के लिए काम के घंटों का निर्धारण और कठिन कार्यों से छूट।
∆. प्रसूति प्रसुविधा - कामकाजी महिलाओं के लिए सवैतनिक मातृत्व अवकाश का प्रावधान।
∆. नि:शुल्क कानूनी सहायता - महिलाओं को कई मामलों में मुफ्त विधिक सहायता दी जाती है।
B. बालकों हेतु विशेष प्रावधान - बच्चों के कोमल स्वभाव और उनके शोषण की संभावना को देखते हुए राज्य उनके लिए भी विशेष नियम बनाता है -
∆. नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा अनुच्छेद 21A ke अनुसार 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए प्राथमिक निशुल्क करने हेतु शिक्षा का अधिकार (RTE) पारित किया गया।
* बाल श्रम पर रोक: खतरनाक उद्योगों (जैसे पटाखा फैक्ट्री) में बच्चों के नियोजन पर प्रतिबंध।
∆. पोषण योजनाएं - धात्री, गर्भवती एवं शिशुओं के लिए आंगनबाड़ी में पोषक आहार एवं स्कूलों में मिड-डे मील जैसी योजनाएं बच्चों के स्वास्थ्य का ध्यान रखने हेतु संचालित की जा रही हैं।
∆. न्याय प्रणाली - बच्चों के लिए अलग जुवेनाइल जस्टिस कानून और अदालतों की व्यवस्था।
∆. महिला एवं बाल विकास विभाग - ICDS की स्थापना महिला एवं शिशुओं के कल्याण हेतु की गई है।
B. सकारात्मक भेदभाव के कानूनी सिद्धांत - इसे संरक्षणात्मक भेदभाव का सिद्धांत कहा जाता है। कानून की नजर में समानता का मतलब यह नहीं है कि सबके साथ एक जैसा व्यवहार हो, बल्कि इसका मतलब है कि समान लोगों के साथ समान व्यवहार हो। चूँकि महिलाएं और बच्चे ऐतिहासिक या शारीरिक कारणों से पुरुषों के समान स्थिति में नहीं होते हैं, उनका शोषण तब के समाज में होता था आज भी होता है (एपस्टीन फाइल) इसलिए उन्हें विशेष संरक्षण देना वास्तविक समानता प्राप्त करने का माध्यम है।
II. विशेष कानून - अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम और कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (POSH) जैसे कानूनों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना।
III. त्वरित न्याय - भेदभाव से जुड़े मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि पीड़ितों को तुरंत न्याय मिल सके।
3. आर्थिक सशक्तिकरण - आर्थिक असमानता अक्सर भेदभाव का आधार बनती है -
I. समान अवसर - भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता लाना ताकि योग्यता के आधार पर सबको अवसर मिलें।
II. आरक्षण और छात्रवृत्ति - पिछड़े वर्गों और हाशिए पर रहने वाले समुदायों को मुख्यधारा में लाने के लिए विशेष आर्थिक सहायता और आरक्षण का प्रभावी उपयोग।
4. सामाजिक समावेश - समाज को जोड़ने के लिए सामुदायिक स्तर पर प्रयास आवश्यक हैं -
I. अंतर्जातीय और अंतर्धार्मिक संवाद - विभिन्न समुदायों के बीच आपसी बातचीत और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना ताकि अविश्वास कम हो।
II. प्रतिनिधित्व - राजनीति, मीडिया और कॉर्पोरेट जगत के निर्णय लेने वाले पदों पर सभी वर्गों का उचित प्रतिनिधित्व होना चाहिए।
5. व्यक्तिगत जिम्मेदारी - परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से होती है -
I. अपने स्वयं के पूर्वाग्रहों को पहचानना और उन्हें दूर करना।
II. यदि कहीं भेदभाव होते देखें, तो उसके विरुद्ध आवाज उठाना और पीड़ित का साथ देना।
III. भेदभाव मिटाने के उपाय -
संवैधानिक उपाय - विधि का शासन और समानता सुनिश्चित करना। |
संस्थागत उपाय - संस्थानों में विविधता और समावेश की नीति लागू करना।
सांस्कृतिक - पुरानी और संकीर्ण रूढ़ियों को त्यागकर आधुनिक मानवीय मूल्यों को अपनाना।
निष्कर्ष - भेदभाव मुक्त समाज न केवल नैतिक रूप से सही है, बल्कि यह देश की प्रगति के लिए अनिवार्य है। भेदभाव का मूल कारण पूर्वाग्रह और रूढ़िवादिता हैं। यह न केवल व्यक्ति के आत्मसम्मान को ठेस तो पहुँचाती ही है साथ में समाज की प्रगति में भी बाधक हैं।
भेदभाव मुक्त समाज ही आधुनिक एवं विकसित समाज है।
शमशेर भालू खां
9587243963
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