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अस्मिता की जंग

अस्मिता की जंग - 
बात दूसरे विश्व युद्ध की है।। जापान, तुर्की, इटली और जर्मनी के सैनिक और मित्र राष्ट्रों की सेना के सिपाही लंबे समय से लड़ाई लड़ रहे थे।
लड़ाई को महीने बीत चुके थे, फौजी थकान और सहवास की तीव्र इच्छा के कारण निढाल हुए जा रहे थे।
जापान ताकतवर था। उसके लाखों सैनिक जंग लड़ रहे थे। राशन और गोला-बारूद तो उनके पास थे, लेकिन शरीर की जरूरत के लिए लड़कियां नहीं थीं।
कमांडरों ने सरकारों को इस संबंध में सूचित कर दिया। 
समस्या विकट होती जा रही थी जिसका समाधान फौजियों को बिना छुट्टी दिए किया जाना ही संभव था।सभी देशों में सैनिकों की संख्या लगातार घटती जा रही है और जो जिंदा थे वो थकान से निढाल।
फ्रांस, ब्रिटेन, ऑस्ट्रिया और मित्र राष्ट्रों ने इस हेतु प्रोफेशनल सेक्स वर्कर और गुलाम (उपनिवेश) देशों से अपहृत लड़कियों को सेना के सामने परोसा गया। जर्मनी ने रूस और दूसरे देशों से पकड़ी गई युवतियों को नोचने के लिए भूखे भेड़िए की तरह व्यवहार करने वाले सैनिकों के सामने चारे के रूप में फेंक दिया।
जापान में इसी तरह से नौची गई एक स्त्री की कहानी झकझोरने वाली है।
फिलीपींस की सड़क पर एक शाम को 07 से 15 साल की लड़कियों को खेत से आते समय जापानी सैनिक और साथ की लड़कियों को उठा लिया। उनके मुंह को ग्रीस एवं कीचड़ में सने मौजे ठूंस कर बंद कर लॉरी में डाल कर एक सुनसान जगह ले जाते। सब से पहले अपहरणकर्ता बारी-बारी से उनका बलात्कार करते इसके बाद उन्हें इसी तरह से बड़े अफसरों को खुश करने के लिए भेज दिया गया।
सात-आठ साल की बच्चियां जिनके गुदगुदे गाल देख कर प्यार करने को दिल चाहे को ड्रग्स दिए गए ताकि उनकी देह भर जाए और वे सैनिकों को औरत की तरह सुख दे सकें।
कितनों ने एक ही लड़की से अपनी हवस बुझाई लड़कियां याद ही नहीं रख पा रहीं थीं। कुछ बेहोश हो गई, कुछ दर्द के मारे मर गईं उन्हें वहीं कीचड़ में फेंक दिया गया। बेहोश को होश आने पर वही काम लगातार किया जाने लगा। अब वो जापान के किसी सैनिक छावनी में पहुंच चुकी थीं। लंबे - लंबे टेंट में सिर्फ रोशनदान की रोशनी, हर टेंट में 10 से 12 लड़कियां और सैकड़ों फौजी।
यहां फिलीपींस के अलावा बर्मा, कोरिया और दूसरे पड़ोसी देशों से हजारों लड़कियां उठा कर लाई गईं और प्रताड़ित की जाती रहीं।
एक रात उन्हें बताया गया कि युद्ध से लौट रहे 5 हजार से ज्यादा जापानी सैनिकों को संतुष्ट करना है। उस समय लगभग एक लड़की के हिस्से में प्रतिदिन 60 से अधिक मर्द। बलात्कार की असहनीय पीड़ा से वो मर नहीं रही थीं पर जिंदा भी नहीं थीं।
इन देशों ने अत्यंत खुफिया तरीके से जीते हुए भूभाग की कुंवारी लड़कियों को पकड़ते और सैनिक कंफर्ट स्टेशन्स में जमा कर देते। कंफर्ट स्टेशन वह जगह जहां लड़कियों को यौन दासी के रूप में रखा जाता था।
इस युद्ध की यह भयावह तस्वीर रोंगटे खड़े करने वाली है। इन्हें कम्फर्ट वुमन नाम दिया गया जो सिर्फ लोगों को खुश करने का काम करती थीं। सभी देशों की सेनाओ ने कब्जा किए गए क्षेत्रों की 15 लाख से अधिक महिलाओं को सैनिकों की हवस मिटाने के लिए गुलाम बनाया।
कच्ची उम्र की एक-एक बच्ची रोज 40 से 50 पके हुए सैनिकों को सर्व करती। जो विरोध करती, उसका गैंगरेप सबक की तरह सारी लड़कियों के सामने होता और फिर बंदूक की नोंक मार-मारकर ही उसकी जान ले ली जाती। गोली से नहीं, क्योंकि सैनिक गुलाम लड़कियों पर गोली खर्च नहीं करना चाहते थे।
लड़कियां प्रेगनेंट न हों, इस हेतु उन्हें नंबर 606 नाम का इंजेक्शन दिया जाता था। इस इंजेक्शन के बहुत सारे साइड इफेक्ट थे। लड़कियों की भूख मर मर गई, चौबीसों घंटे सर दर्द, पेट में ऐंठन और अंदरुनी अंगों से खून का रिसाव शुरू हो जाता। उनके लिए लड़कियों की समस्या कोई समस्या नहीं थी, जरूरी यह था कि वे किसी भी तरह बिना प्रेग्नेंट हुए सैनिकों की भूख मिटाती रहें।
सब से पहले ऊंची रैंक के अफसर रेप करते, फिर पुरानी होने के बाद लड़कियों को नीचे की रैंक के सैनिकों के पास छोड़ा जाने लगा।  
हर दिन पचासों मर्दों की भूख मिटाने वाली लड़की के यदि कोई यौन रोग होने के पता चलता तो उसे रातों- रात वहां से गायब कर दिया जाता।
युद्ध खत्म हो गए परन्तु इन लड़कियों की कहानी हैं बहुत कम लोग जानते हैं। यह कहानियां वहीं दफन हैं जहां उन्हें जिंदा दफना दिया गया।
युद्ध में मिट्टी के बाद जिसे सर्वाधिक कुचला गया, वह स्त्री है।
कांगो के गायनेकोलॉजिस्ट डॉक्टर डेनिस मुकवेजवर्ष को वर्ष 2018 का नोबेल पुरस्कार युद्ध में कौमार्य खो चुकी कंफर्ट स्लेवस की ऑपरेशन द्वारा कौमार्यता की पुनः बहाली के लिए नोबल पुरस्कार दिया गया।
समाल यह है कि क्या उनकी आत्मा में लगे घाव को किसी शल्य क्रिया द्वारा भरा जा सकता है। इस वजाइना रिपेयरिंग में स्थान पर ऐसी चिकित्सा की जा सकती है जो युद्ध के समय बंदी बनाकर कंफर्ट विमेन बनने पर चिथड़ा-चिथड़ा हुई आत्मा को पुनः उसी स्थिति में ला सके। नहीं शायद नहीं।
रूस - यूक्रेन युद्ध एवं अमेरिका, ईरान एवं इजरायल युद्ध के चलते क्या लड़कियों की यह स्थिति नहीं हो रही है। 
बात सुनने में मामूली है, पर सत्य यही है कि युद्ध दो देशों की सेना लड़ती है और उसका हर्जाना स्त्री को अपनी अस्मिता को रौंद कर चुकाना पड़ता है।
मानवाधिकार आयोग, विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं संयुक्त राष्ट्र महासभा इस संबंध में कतई पंगु बनकर रह गए हैं।मोसाद, आईएसआई, आईएसआईएस, हिजबुल्लाह, या अन्य किसी राष्ट्र का खुफिया तंत्र आज भी स्त्री अस्मिता का सौदा धड़ल्ले से कर रहे हैं और हम मूक हैं। युद्ध सीमाओं के साथ-साथ औरतों के शरीर पर लड़ा जाता रहा है।
यह सीमा पर लड़े जाने वाले युद्ध एक दिन रुक जाएंगे, दुश्मन दोस्त बन जाएंगे, शत्रु हाथ मिलाएंगे पर स्त्री की भंग लज्जा को वापस नहीं कर पाएंगे। 
रुके हुए व्यापार फिर चल पड़ेंगे पर बिना युद्ध में शामिल हुए जीवन से स्त्री होने का युद्ध लड़ने वाली रुकी औरतें अपने स्वतंत्र अस्तित्व का युद्ध इस आधुनिक जीवन में भी लड़ती रहेगी।
अमेरिका - वियतनाम युद्ध के बाद जब अमेरिकी फौज वहां से चली गई, वियतनाम में हजारों बच्चे बिन ब्याही माओ से पैदा हुए जो गर्भनिरोधक ड्रग्स के कारण अपाहिज हो चुके थे। नाबालिक मांओं ने नफरत भरी यादों से आक्रोशित हो कर बलात्कार के कारण जन्मे जिंदा बच्चों को सड़क पर फेंक दिया जिन्हें सरेआम कुत्तों ने नोचा। इन बच्चों को वियतनामी में बुई दोई यानी जीवन की गंदगी कहा गया।
सीमाओं के साथ - साथ युद्ध औरतों के शरीरों पर भी लड़े जाते है, जिसमें मर्द अपनी थकान, हार का गुस्सा, या जीत का जश्न मनाते आ रहे हैं।
इस कहानी का उपर का हिस्सा कोरियन कंफर्ट स्लेव
चोंग ओके सन के 1996 में यूनाइटेड नेशन्स की रिपोर्ट में छपे बयान पर आधारित है जिस पर कभी खुलकर बात नहीं हुई। इसे शरीर का वह खुला हिस्सा मानकर छिपाया गया जिससे इंसानियत नंगी ना हो जाए।
युद्धों के अलावा दो देशों की लंबी और दूरस्थ सीमाओं पर लंबे अंतराल तक रहने वाले फौजियों के लिए आज भी यह व्यवस्था की जाती होगी, यह जांच का विषय है
अमेरिकी एप्सटीन फाइल्स के खुलासे के बाद ओर हॉलीवुड - बॉलीवुड फिल्मों की कहानियों में जासूसी के लिए लड़कियों का उपयोग आज भी आम बात है।
स्त्री अस्मिता की रक्षा उसका मौलिक अधिकार है।
शमशेर भालू खां 
#जिगर_चूरूवी

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