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विपत्ति सरकार और हम

विपत्ति सरकार और हमसदियों पूर्व न जाने कितनी आपदा व महामारी मानव के अस्तित्व को मिटाने का असफल प्रयास कर चुके हैं,परन्तु हम हर एक बाधा को पार करते हुये आगे बढ़े।। इस सदी की भयंकर त्रासदी कोविड महामारी से सरकारी आंकड़ों से अधिक जानें गईं। इसका कारण देश और प्रदेशों की सरकारों के गैरजिम्मेदाराना रवैये, आपदा के समुचित प्रबन्धन में आपसी तालमेल की कमी, आपसी राजनैतिक आरोप-प्रत्यारोप के साथ साथ इसके जिम्मेदार कहीं न कहीं हम सब रहे हैं। आमजन की अज्ञानता और हम सब द्वारा महामारी का सटीक मूल्यांकन नहीं कर पाना भी कारण रहा। इस महामारी ने हमें इस बात का अहसास अवश्य करवा दिया है कि अभी बुराई चाहे कितनी शक्तिशाली हो अच्छाई के मानने वाले हार नहीं मानते। आपदा में अवसर की तलाश करने वाले कालाबाज़ारियों,कफ़न बेचने वालों,मुनाफाखोरों, अंग बेचने वाले जल्लाद डॉक्टरों,शेखी बघारने वाले नेताओं,दोगुने तीन गुने मूल्य पर ऑक्सीजन बेचने वाले लोगों,सो गुना से ज्यादा कीमत वसूल करने वाले केमिस्टों, बीस गुना किराया लेने वाले एम्बुलेंस वालों, अंतिम क्रियाकर्म में लूटने वाली संस्थाओं को आइना दिखाते हुये निस्वार्थ अपने संसाधनों से सेवा करने वाले सेवकों ने मानवता के उच्चतम मूल्यों को स्थापित किया।विपदा की घड़ी में जिन्होंने असमय अपनों को खोया वह दर्द असहनीय है। जिन बच्चों से हमें सहारे की उम्मीद थी उनको कंधा देना पहाड़ उठाने से मुश्किल था। गांव-गांव मोहल्ले-कॉलोनियों में डर के माहौल को शब्दों में वर्णित करना मेरे लिये लगभग असंभव है। हमने देखा जहाँ लोग अपनो को श्मशान/कब्रिस्तान तक पहुँचाने से कतरा रहे थे पर कुछ लोग जीवन की परवाह किये बगैर यह कार्य निकट संबन्धी नहीं होने के बावजूद भी बड़ी दिलेरी से कर रहे थे। मालिक की इच्छा के आगे हम सब नतमस्तक हैं। सरकार के बारे में क्या लिखा जाये कुछ नेताओं को छोड़ कर अधिकांश स्वयं को बचाने में लगे थे। सरकार को रोटी-पानी की व्यवथा करने के स्थान पर मूलभूत सेवा करने में असफल होते देखा। यह अहसास हुआ काश इस सरकार के होने से न होना बेहतर था। कंधों, साइकिल, रिक्शा में परिजन लाशें ढो रहे हैं और सरकार स्वयं अपनी पीठ थपथपा रही है।जब इंसान मर रहे थे नेतागण बड़ी बड़ी सभा बुलाकर आम जन के जीवन को खतरे में डाल कर बड़े गर्व से एलान कर रहे थे "इतनी भीड़ अपने जीवन में कभी नहीं देखी।" जब श्मशान में जलाने के लिये स्थान नहीं मिला तो माँ गंगा जो पवित्रता के साथ पूजी जाती थी के किनारे थोड़ी सी मिट्टी डाल कर शवों से अटा दिये गये। नज़रों को भी तरस आया जब हज़ारों की संख्या में शव नदियों में बहा दिये गये जिनको जंगली सुअर व कुत्ते नोच-नोच कर खा रहे थे। यह सरकारों के अंतिम क्रियाकर्म का दृश्य था जो आने वाली पीढियां सुनेंगी-पढ़ेंगी तो हम पर थूकेंगी। यदि सरकार ऐसी होती है तो मैं उस युग में जाना पसंद करूँगा जहाँ इस नाम की कोई संस्था न हो।सकारात्मक सहयोग व आपसी मदद के कारण महामारी के संक्रमण दर में अभी कुछ कमी आई है पर पूर्ण समाप्त नहीं हुआ है।अभी कुछ दिन, पहले की तरह सावधानी बरतें संभव हो तो मुसीबत में आये आम इंसान की मदद करें यह वक़्त है निकल जायेगा। काल का ग्रास बने लोगों के परिवारजनों को परमपिता परमेश्वर ये दुःख सहने की ताकत प्रदान करे और दिवंगत आत्माओं को स्वर्ग/जन्नत में स्थान प्रदान करे | आपसे पुनः सावधानी बरतने व सुरक्षित रहने की अपील।
आपका अपनाशमशेर गांधी

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