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पंजाबी लोक त्योंहार और अब्दुल्ला भट्टी

       पंजाबी त्योंहार लोहिडी और दुल्ला भट्टी

पंजाब का बेटा कभी भी पंजाब की मिट्टी नहीं बेचेगा
फांसी पर चढ़ते समय अब्दुल्लाह भट्टी के अंतिम शब्द
                 दुल्हा भट्टी लाहौर पंजाब में प्रतिमा 
नाम - राय अब्दुल्ला खान भट्टी
(भट्टी जनजाति के एक पंजाबी राजपूत जमींदार)
उपनाम - उपनाम दुल्ला या दुल्ला भट्टी
जन्म - 23 जुलाई 1547 
मृत्यु - 26 मार्च 1599 लाहौर में फांसी 52 साल की उम्र
पिता - फरीद भट्टी (जन्म से 4 माह पूर्व अकबर द्वारा मार डाला गया)(मार्च 1599 फांसी के बाद फरीद भट्टी की लाश तीन दिन तक लाहौर किले पर टंगी रही जिससे लोगों में डर और भय व्याप्त किया जा सके।)
माता - लाधी (दुल्ला भट्टी और जहांगीर का जन्म एक ही दिन हुआ, राजशाही नियमों के अधीन राज कुमारों को ग्रामीण महिलाओं द्वारा दूध पिलाया जाता था, अब्दुल्ला भट्टी की मां लाधी द्वारा दूध पिलाया गया। अब्दुल्ला वहीं राजमहल में ही रहे।)
दादा - बिजली (संदल) भट्टी
(संदल भट्टी भी किसानी मूवमेंट के चलते सम्राट अकबर के मनसबदार बक्का मलकेंरा के हाथों शहीद हुए)
उपाधि  - 
पंजाबी लोक नायक
पंजाब का रॉबिनहुड
सामाजिक दस्यु
भारत के प्रथम किसान आंदोलन के जनक
जन्म स्थान - पिंडी भट्टियां (पंजाब ,पाकिस्तान )
पिंडी भट्टियां, जहां दुल्ले का जन्म हुआ इलाके को उसके दादा सांदल  के नाम से सांदल बार के नाम से जाना जाता है।
पालन पोषण - जब मां शहजादे शेखू को दूध पिलाने के लिए राज महल में आ गई तो भट्टी भी उनके साथ ही आ गए। वह कभी कभी शेखू को पीट दिया करता था।
शिक्षा - राज महल में शेखू के साथ मदरसा में 
युद्ध कला - भट्टी चंचल स्वभाव का लड़का था जो युद्ध कला में माहिर था।
शासन काल - अकबर 
विशेष - पंजाब में मुगल शासन के खिलाफ विद्रोह करने वाले दुल्ला भट्टी तात्कालिक इतिहास के पन्नों से गायब है जिसके होने का एकमात्र प्रमाण पंजाबी लोक गीतों से मिलता है। 
अभियान - मुगल सम्राट अकबर की केंद्रीकृत भू-राजस्व योजना (लगान) के विरुद्ध विद्रोह।
                दस्यु रूप में अब्दुल्ला भट्टी 

पंजाबी ढाढियों द्वारा गाये जाने वाले लोकगायन में अब्दुल्लाह भट्टी

सुंदर मुंदरीए हो
तेरा कोण बेचारा हो
दुल्ला भट्टी वाला हो......

हड्डा दा खुल्ला
पिंडी दा दुल्ला
मैदाने घुल्लदा
पाड़दा खांखां
वक्त सी थम्मया
लद्दी ने जम्मया
रगड़ के पिस्ते
घोट के दांखां।........

सुंदरी-मुंदरी गीत पंजाब में लोहिड़ी उत्सव के दौरान गाया जाता है 

               जवान उमर में अब्दुल्ला भट्टी 

घटनाक्रम - 
राज महल में शेखू के बड़े होने के बाद लाधी वापस अपने गांव लौट गई। जवान अब्दुल्ला को एक दिन जिद करने पर कि उनके पिता और दादा की मृत्यु कैसे हुई के कारण मां को अपने बेटे को फरीद और बिजली की मृत्यु अकबर की सेना के हमले (दोनों को मुगल सम्राट अकबर द्वारा लगाई गई नई और केंद्रीकृत भूमि राजस्व संग्रह योजना का विरोध करने के कारण मार डाला गया) के कारण हुई बताना पड़ा। उसने वहीं मुगल सेना से बदला लेने की ठान ली। अन्याय के विरुद्ध इस आंदोलन को नाम दिया गया "किसान वर्ग का युद्ध" ।
अकबर ने इसे डाकु  भट्टी के के रूप में विद्रोही घोषित कर दिया (संभवतः यह किसान वर्ग का राज सत्ता के विरुद्ध पहला किसान विद्रोह था)  
इस गिरोह ने जल्द ही एक बड़े तत्कालीन सामाजिक दस्यु गिरोह का रूप ले लिया जिसका काम था अमीरों को लूट कर गरीबों में बांटना।  पंजाब की लोककथाओं ने इस गिरोह को जन रक्षक के रूप में माना जो  गांव के की लड़कियों और गुलामों उठा कर बेचने का विरोध करते और यथा संभव उन्हें रोकने का प्रयास भी करते। जनता को राजकीय सेना से ज्यादा रक्षक के रूप में भट्टी गिरोह पर अधिक भरोसा हुआ। यह गिरोह अपहृत युवतियों का विवाह करवाते। पहले डाकुओं और जमींदारों के डर से ग्रामीण लोग अपनी बेटियों का विवाह रात के समय करते थे अब दिन में विवाह करने लगे। उस समय गुरु अर्जन देव जी ने भी भट्टी के कार्यों का समर्थन किया। अकबर ने दोआब क्षेत्र में विद्रोह को दबाने के लिए इस कानून में छूट भी दी पर भट्टी का गिरोह इस से संतुष्ट नहीं हुआ।
अफ्गानिस्तान के विजय अभियान से लौट रही मुगल सेना के मनसबदार बक्का मलकेंरा को दुल्ले ने मारकर उस जमाने की सुप्रीम पावर को चुनौती दी और दादा के हत्यारे को मौत के घाट उतार कर बदला ले लिया।
सम्राट अकबर को दुल्ले भट्टी को गिरफ्दार करने हेतु छोड़कर 1598 में लाहौर पड़ाव डालना पड़ा, मुगल इतिहास में यह पहला मौका था जब कोई मुगल बादशाह खुद किसी स्थानीय बागी से आमने-सामने लड़ने के लिए पहुंचा हो।
आमने सामने के युद्ध में दुल्ले भट्टी ने एक बार अकबर को बंदी बना लिया जिसे इस क्षेत्र में दोबारा नहीं आने की कुरान की कसम खाने पर छोड़ा, अकबर खाली हाथ लाहौर लौट गया।
लाहौर लौट कर उसने दुल्ले को पंजाब का गवर्नर जनरल बनाने के बहाने से बुलाया और गिरफ्तार करके मृत्यु दंड की सजा सुनाई। 
किसानों के हकों का आंदोलन लड़ने वाले योद्धा को लाहौर के नौलखा बाजार में सूली चढ़ा दिया।
लाहौर के मियां बाजार कब्रिस्तान में दुल्ले की कब्र आज भी मौजूद हैं।

साहित्य में अब्दुल्ला भट्टी -
अकबर के नवरत्नों में से एक अबुल फजल ने दुल्ले को इतिहास में डाकू, लुटेरा के रूप में पेश किया।

सन 1599 में सूली पर टंगे हुए दुल्ले भट्टी के आखिरी शब्दों को सूफी कवि शाह हुसैन लिखते हैं....
पंजाब दी धरती दा कोई वी गैरतमंद पुत्त ना इस ज़मीन दा,अते ना ज़मीर दा सौदा कदे वी नहीं करूगा।

भारतीय लेखकों ने साहित्यिक श्रद्धांजलि के रूप में -
1 नाटक - तख्त-ए-लाहौर 1973 लेखक नजम हुसैन सैयद
2 उपन्यास - सड़कनामा लेखक बलदेव सिंह

उनके जीवन पर बनाई गई फिल्म - 
निर्माता निर्देशक 
1 बलदेव आर. झिंगन  की फिल्म अब्दुला भट्टी (1966)
2 पम्मी वरिंदर की फिल्म दुल्ला भट्टी (1998)
3 मीनार मल्होत्रा ​​की फिल्म दुल्ला भट्टी (2016)
4 पाकिस्तानी फिल्म दुल्ला भट्टी (1956)

शहीद दुल्हा भट्टी चौक लाहौर 

शहीद दुल्हा भट्टी की याद में लिखा शिलालेख 

मियां साहिब कब्रिस्तान में दुल्ला भट्टी की कब्र

शमशेर भालू खान
जिगर चुरूवी
9587243963
स्त्रोत - स्थानीय लोक साहित्य

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