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फातिमा शेख

                 फातिमा शेख 

यह सत्य है इतिहास, इतिहासकारों, सरकारों और स्तंभकारों ने फातिमा शेख, उस्मान शेख और अतीक शेख के साथ अन्याय किया। इस अन्याय के कारण आज की पीढ़ी उस असाधारण महिला और परिवार के बारे में अधिक जानकारी से वंचित रह है।
वास्तव में ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई फुले वो स्थान प्राप्त ही नहीं कर पाते जो आज के समय में दिया गया है।
गुमनाम अंधेरों में छुपी फातिमा शेख की कहानी को आम जनता के सामने लाने का छोटा सा प्रयास है, मेरा यह लेख। यह सत्य है कि हम उनके बारे में बहुत कम जानते हैं पर जितना जान सके उस से अधिक जानना जारी रहेगा।

दो शब्द - 
समस्त बाधाओं को तोड़ते हुए भारत में महिला और दलित - मुस्लिम शिक्षा हेतु फातिमा शेख ने मजबूत स्तंभ के रूप में अनुकरणीय कार्य किया। फातिमा शेख 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के प्रारंभ में भारतीय शिक्षा प्रणाली में एक प्रमुख हस्ती रहीं। भारत की पहली वनस्पति वैज्ञानिक महिला भारत में शिक्षा और महिला सशक्तिकरण हेतु उनके काम ने भावी पीढ़ियों को शिक्षा प्राप्त करने और लैंगिक असमानता की समाप्ति की ओर एक बड़ा कदम रहा।

एकमात्र उपलब्ध वास्तविक चित्र जिसमें फातिमा शेख अपनी सखी सावित्री बाई फुले के साथ। चित्र में उनकी दो छात्राएं दिखाई दे रही हैं।

               फातिमा शेख 
              एक तैलीय चित्र

जन्म - 9 जनवरी 1831 पूना, बॉम्बे प्रेसीडेंसी
मृत्यु - 9 अक्टूबर 1900

व्यवसाय - समाज सुधारक, शिक्षिका (भारत की प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका)
सहोदर  - बड़े भाई उस्मान शेख
पति - शेख अब्दुल लतीफ

फातिमा शेख एक परिचय - 
अंधकार मय उस युग के समय महिला शिक्षा के सीमित अवसरों के बावजूद फातिमा शेख ने स्वयं शिक्षा प्राप्त की। निजी शिक्षकों के माध्यम से पढ़ कर उर्दू, अरबी एवं फ़ारसी भाषाओं में पारंगत हुईं।
फ़ातिमा शेख़ उस्मान शेख की बहन थीं। उस्मान शेख वही व्यक्ति हैं जिनके घर पर ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले ने प्रवास किया। फुले दंपति को दलितों और महिला उत्थान हेतु कार्य के कारण घर - परिवार से बेदखल कर दिया था। सन 1848 में उस्मान शेख ने ना केवल उन्हें रहने को घर दिया साथ ही विद्यालय एवं स्वदेशी पुतलालय के संचालन हेतु स्थान उपलब्ध करवाया। इसी स्कूल में दलित बच्चों और महिलाओं की शिक्षा का कार्य प्रारंभ हुआ। फुले दंपति फातिमा शेख के साथ उस्मान शेख के सहयोग से दलित वर्ग और महिलाओं की शिक्षा हेतु अनवरत लग गए। शिक्षण के साथ - साथ फ़ातिमा शेख़ और सावित्री बाई फुले ने महिलाओं और पीड़ित वर्ग के उत्थान का कार्य प्रारंभ किया। जब फुले का कोई नहीं था और हर जगह स्वयं के समाज द्वारा उपेक्षित हो रहे थे तब फातिमा और उस्मान शेख ही थे जिन्होंने संसाधन के साथ आर्थिक सहायता से फुले के कार्य को पोषित किया। जहां कहीं फुले का विरोध होता दोनों भाई - बहन दृढ़ता पूर्वक उनके समर्थन में उतर आते। शिक्षण कार्य हेतु शिक्षकों की कमी के कारण फातिमा ने तय किया कि वह खुद सावित्री बाई के साथ शिक्षिका के रूप में कार्य करेंगी। वर्ष 1851 में फातिमा शेख ने मुंबई ,(तत्कालीन बॉम्बे) में स्वयं के दो महिला स्कूल खोले। अब इस स्कूल में सावित्री बाई, फातिमा शेख और सागुना बाई एक साथ कार्य करने लगीं। पुणे के संभ्रांत उच्च वर्ग ने एकजुट हो कर सनातन महिला और लड़कियों के इस स्कूल में जाने का प्रबल विरोध किया। फ़ातिमा ने निडरता पहल कर सामाजिक और सांप्रदायिक विरोध के बावजूद इस पुनीत एवं ऐतिहासिक कार्य में शामिल हो गई। यह संघर्ष रंग लाया, आगे  चलकर स्कूल परवान चढ़ने लगा। फातिमा शेख घर - घर जा कर वंचित समुदायों के लोगों को शिक्षा के महत्व के बारे में बताती और उन्हें स्कूल में प्रवेश हेतु प्रोत्साहित करतीं। लड़कियों के लिए दो स्कूल स्थापित किए, उस समय सामाजिक मानदंडों और महिलाओं की शिक्षा पर प्रतिबंधों के कारण उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। सावित्री बाई, फातिमा शेख और सुगनी बाई साथ लड़कियों हेतु दो स्कूल स्थापित किए। यह वह समय था जब महिलाओं के अधिकारों के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था।

दुर्गा बाई देशमुख 
इसी समय दुर्गा बाई नामक एक समाज सुधारक महिला ने आंध्र महिला सभा का गठन किया, जिसका स्कूल उद्देश्य सभी समुदाय की लड़कियों को शिक्षा प्रदान करना था। यह आंध्र प्रदेश क्षेत्र में लड़कियों हेतु प्रथम स्कूल था जिसने महिला शिक्षा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जातिगत भेदभाव और लैंगिक असमानता के खिलाफ लड़ाई - 
सामाजिक प्रगति के लिए शिक्षा के महत्व को पहचाना हेतु महिलाओं की शिक्षा आवश्यक है। फातिमा ने 1860 के दशक के प्रारंभ में मुस्लिम महिलाओं और लड़कियों को शिक्षा देना आरंभ किया।
फातिमा शेख न केवल एक शिक्षिका थीं बल्कि महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक सुधारों की समर्थक भी थीं। उन्होंने सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय तौर पर भाग लिया और अपने पति शेख अब्दुल लतीफ (समाज सुधारक) के साथ काम किया। फातिमा ने जातीय भेदभाव और लैंगिक असमानता, धार्मिक रूढ़िवाद सहित अलग - अलग सामाजिक अन्यायों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। फातिमा ने सावित्री बाई के संग विधवा पुनर्विवाह और सती प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके साहसी कार्यों और अथक प्रयासों ने लाखों लोगों का जीवन स्तर बदल दिया।

राजस्थान के सवाई माधोपुर में अमन फाउंडेशन द्वारा फातिमा शेख अवार्ड की शुरुआत की गई।

फातिमा शेख की कहानी हमें महिला सशक्तिकरण, सामाजिक न्याय और शिक्षा को परिवर्तनकारी शक्तिदाता के रूप में याद दिलाती रहेगी।

स्त्रोत -
विभिन्न पत्रिकाओ के लेख और संदर्भ संपादकीय।

चित्र -
गूगल के साभार

शमशेर भालू खां 
जिगर चुरूवी 
9587243963


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