डच व्यापारियों ने 1600 के दशक में यमन से कॉफ़ी के पौधे चुरा लिए और उन्हें इंडोनेशिया के जावा द्वीप में एक कठोर पर्यावरण में उगाने में सफलता हासिल कर ली। ये कठोर पर्यावरण के बागान यूरोप को असीमित कॉफ़ी बीन्स उपलब्ध कराते थे, जिससे पूरे महाद्वीप में कॉफ़ी का जुनून छा गया।
यह फ़सल इतनी सफल रही कि “जावा” यूरोप और अमेरिका में कॉफ़ी का दूसरा नाम बन गया औपनिवेशिक शोषण की एक विरासत भी, जो आज भी हमारी कितबों में मौजूद है।
यमन में पवित्र पेय से लेकर जावा में वैश्विक वस्तु तक, कॉफ़ी ने विश्व व्यापार और संस्कृति को नया रूप दिया।
9वीं–10वीं सदी – इथियोपिया (काफ़ा क्षेत्र) में कॉफ़ी पौधे की खोज सबसे पहले ख़ालिद नाम के एक चरवाहे ने की थी, 11वीं सदी में ये कॉफ़ी अरब जगत (यमन) पहुँची और सूफ़ी संत इसे रातभर इबादत व ध्यान के लिए पीने लगे ताकी नींद ना आए।
15वीं सदी – यमन में मोचा (Mocha) बंदरगाह से कॉफ़ी का व्यापार शुरू हुआ।
16वीं सदी – मक्का, काहिरा, दमिश्क और इस्तांबुल तक कॉफ़ीहाउस ("क़हवा खाना") खुल गए,कॉफ़ी उस दौर में एक “पवित्र पेय” और सामाजिक मेलजोल का साधन थी।
1600 के दशक में डच व्यापारियों ने यमन से चोरी करके कॉफ़ी के पौधे बाहर निकाले और इस तरह 1616 पहली बार युरोप में कॉफ़ी लाई गई।
1650–1700 – इंग्लैंड, फ्रांस और इटली में कॉफ़ीहाउस खुलने लगे, वहां कॉफ़ीहाउस को "पैनी यूनिवर्सिटी" कहा जाता था क्योंकि यहाँ लोग एक पैनी देकर कॉफ़ी और ज्ञान दोनों लेते थे।
1600 से 1700 के दौर में डचों ने इंडोनेशिया (जावा) में कॉफ़ी की खेती करवाई और "Java" शब्द कॉफ़ी का पर्याय बना गया, 1720 में फ्रांसीसी उपनिवेशों (कैरेबियन, मार्टिनीक) में कॉफ़ी पहुँची।
1700s के अंत तक – ब्राज़ील कॉफ़ी उत्पादन का केंद्र बन गया और आगे चलकर दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक बना।
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