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कहानी - कश्मीर में पढ़ने वाले छात्र की

#कहानी #कश्मीर_आंदोलन_की
राजस्थान से बाहर कश्मीर में 21 दिन के सफल आंदोलन की कहानी, साल- 2007
नंदऋषी कालेज बड़गांव श्रीनगर में अक्टूबर माह की सुबह का तकरीबन 10:00 बजे का वक़्त, कॉलेज के सभी साथी क्लासेज की तैयारी कर रहे थे, हम उसी कैंपस के होस्टल में रहते थे कि मेरा दोस्त दौड़ता हुआ आया के आज मेडम ने फाइन जमा करवा कर ही क्लास लेने को कहा है। 
हम 20-25 साथी मैडम से पूछने गये कि फाइन किस बात का ,जवाब आया मेरा बस चले तो तुम लोगों के सांस लेने पर भी फाइन लगा दूँ।
अक्सर शांत रहने वाला मैं, न जाने क्या हुआ, यकायक मेडम ओर स्टाफ से उलझ गया और विरोध शुरू कर दिया।
भानू प्रताप भागा-भागा आया के पूजा (जयपुर से B. Ed. साथी) को लेबर पैन शुरू हो गया है। मैं उस के लिए रिक्शा लेने दौड़ा। रिक्शा आ गया पर मेडम ने किसी को भी बाहर जाने की सख्त मनाही कर दी। हम ने उनसे कहा आप जितना चाहो हम से फाइन ले लो लेकिन अभी हमारी बहन को हस्पताल ले जाने दो, लेकिन वो पत्थर दिल ना पिघली हम लाख मन्नत करते रहे ,आखिर वो बेहोश हो गयी ओर खून बहने लगा, हम मन्नत पर मन्नत कर रहे थे पर मैडम ना मानी और पूजा का बच्चा उस के गर्भ में खत्म हो गया । मैने पूजा को जबरदस्ती ऑटो में डाल कर लाल डैड हॉस्पिटल श्रीनगर में भर्ती करवाया।
हमारा गुस्सा 7वें आसमा पर था, कुछ साथियों को हस्पताल छोड़ कर मैडम के केबिन में घुस गया और घरने व अनशन का एलान कर दिया।
वक़्त करीब शाम के 6:00-6:30 रहा होगा हम साथियों के साथ बड़गांव पुलिस स्टेशन पहुंचे और अनशन की प्रथम सूचना दी। बड़गांव पुलिस थाने के C. I. साहब को पूरी बात बताकर बड़गांव के चौराहे पर छात्र संघर्ष समिति के बैनर तले 11 सुत्री मांग पत्र के पूरे होने तक अनिश्चचित काल के लिए अनशन पर बैठ गए।
एक दिन कुछ खास न हुआ, दूसरे दिन C.I. साहब हमें लेकर कॉलेज गये, वार्ता करवाई पर सफलता नही मिली। इस दौरान वहां की सरकार, भारत सरकार, यूनिवर्सिटी प्रशासन, ज़िला प्रशासन बड़गांव, राजस्थान सरकार, हिमाचल सरकार, पंजाब व हरयाणा सरकार को भी ई मेल और फैक्स के माध्यम से सूचित कर दिया गया।
दो दिन बाद श्रीनगर यूनिवर्सिटी के डीन साहब लवाजमे के साथ आ पहुंचे असफल वार्ता के कारण वो थोड़ा गुस्सा दिखाकर चले गए, इस तरह 9 दिन बीत गए, साथी हिम्मत हारने लगे, हम कुछ लोग दिन में अनशन पर ओर रात को दूसरे कॉलेजों में जाकर लोगों को 11 सुत्री मांग पत्र के समर्थन के लिए मिलते रहे। 
अज़ीज, राजू, आशीष, भानु, जीतू, मदन, मांगीलाल, देव, रमाकांत, रणवीर, जाखड़, मुरली, पंडित जी जैसे लोग मेरे सुरक्षा के लिए मुस्तेद रहते थे इस कि वजह थी मैडम की धमकियां। 
अब उन लोगो ने जब डराने धमकाने से काम नही चलता देखा तो रात करीब 10:00 बजे हमें वार्ता के लिए बुलाया। वार्ता की पर हम अपनी मांगों पर अड़े रहे, अचानक मेडम ने एक थैला मेरे सामने रख दिया, पूछने पर बताया कि उस मे 20 लाख रुपये है जो मेरे लिए आंदोलन खत्म करने पर सारे कॉलेज वालों ने इक्कठे किये है और मेरे 18 साथियों की पूरी फीस माफ करने का भी इरादा जताया। वर्ना दूसरा रास्ता भी होने की धमकियां देने लगे। मैं टॉयलेट के बहाने से वहां से निकला और पूरी बात साथियों को बताई। 
आंदोलन को तकरीबन 15 दिन हो गए थे मेरी हालत बिगड़ने लगी थी साथी जिद छोड़ कर समझौते के लिए मनाने लगे पर हम कब मानने वाले थे। कुछ साथी मज़बूत थे और आंदोलन चलता रहा।
21वें दिन यूनिवर्सिटी डीन व कश्मीर के लोकल MLA साहब अच्छे इंसान थे, के साथ हमारी वार्ता हुई जिस में - 
1. 50 स्टूडेंट्स को 50000 रुपये प्रति स्टूडेन्ट स्कॉलरशिप।
2. पूजा को कंपनसेशन।
3. सभी तरह का फाइन माफ।
4. 25 रुपये का लिफाफा मय एडरेस लेकर छात्रों की मार्कशीट उन के घर पहुंचाना।
5. यूनिवर्सिटी द्वारा तय फीस से तकरीबन 24 करोड़ रुपये ज्यादा ली गई फीस 7 दिन में वापस करना।
6. श्रीनगर यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्रों को किसी तरह परेशान नहीं करना।
7. प्रिंसिपल मैडम को हटा कर दूसरा प्रिंसिपल लगाना।
जैसी मांगे मान ली गईं और हमने आंदोलन समाप्त करने की घोषणा कर दी।
पांच दिन बाद सभी स्टूडेंट्स से 14 हजार से 25 हजार रुपए फाइन के रूप में लिए गए पैसे कैंप लगा कर वापस किए गए। हमने रेजगी (खुल्ले रुपए) भी उनमें नहीं छोड़े। मैडम कट्टे भर भर कर रुपए लाई। हमने सभी स्टूडेंट्स को पूरी राशि मिलने के बाद अंत में अपने 16557 रुपए प्राप्त किए।
इस तरह हमारा तीसरा व राजस्थान से बाहर पहला 21 दिन चला आंदोलन सफलता पूर्वक पूरा हुआ।
"हक़ के लिए लड़ाई लड़ना गुनाह नहीं"
 ठाकुर शमशेर भालू खान

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