मतदान एवं चुनाव लड़ने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय -
मतदान करना और चुनाव लड़ना मौलिक अधिकार नहीं है यह वैधानिक अधिकार है, जो संस्थागत शर्तों के अधीन है।
सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि वोट देने का अधिकार (Right to Vote) और चुनाव लड़ने का अधिकार (Right to Contest Election) मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) नहीं हैं, बल्कि ये वैधानिक अधिकार (Statutory Rights) या संवैधानिक अधिकार हैं।
इस तथ्य को और अधिक स्पष्टता से समझने के लिए इसे कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं में विभाजित किया जा सकता है -
1. वैधानिक बनाम मौलिक अधिकार (Statutory vs. Fundamental Right) - संविधान के भाग III में दिए गए मौलिक अधिकार (जैसे समानता या अभिव्यक्ति की आजादी) स्वतः प्राप्त होते हैं और सरकार उनमें आसानी से कटौती नहीं कर सकती। इसके विपरीत, चुनाव लड़ना और वोट देना जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 के दायरे में आता है।
चूंकि यह कानून द्वारा निर्मित अधिकार है, इसलिए कानून ही इसकी शर्तें तय करता है।
उदाहरण -
1. दो से अधिक संतान - यदि कानून कहता है कि दो से अधिक संतान होने पर पंचायत चुनाव नहीं नहीं लड़ा जा सकता जिसे मौलिक अधिकार का हनन बताकर चुनौती नहीं दे सकते, क्योंकि यह एक संस्थागत शर्त है। इस प्रतिबंध को राजस्थान सरकार अब समाप्त करने जा रही है।
2. अनुच्छेद 326 और संवैधानिक स्थिति
आपने सही उल्लेख किया कि अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार की बात करता है। न्यायपालिका ने इसे संवैधानिक अधिकार माना है, लेकिन मौलिक अधिकार नहीं है। इसका अर्थ यह है कि राज्य उचित प्रतिबंध (जैसे- आयु सीमा, मानसिक स्वास्थ्य, या आपराधिक दोषसिद्धि) लागू सकता है।
3. सूचना का अधिकार - एक अनूठा मोड़ - यहाँ एक बहुत ही रोचक कानूनी पेच है, जिसके अनुसार चुनाव लड़ना मौलिक अधिकार नहीं है।
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) बनाम भारत संघ केस के बाद यह स्थापित हुआ कि - मतदाता को अपने संभावित प्रतिनिधि (उम्मीदवार) के बारे में जानने का अधिकार (उसकी पृष्ठभूमि, चाल - चलन, अपराधिक रिकॉर्ड, आर्थिक स्थिति, संपत्ति, शिक्षा आदि) के बारे में अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मौलिक अधिकार है।
अर्थात अधिकार लड़ने (प्रत्याशी) वाले का नहीं, बल्कि चुनने (मतदाता) वाले का मौलिक है।
राजस्थान दुग्ध संघ मामले के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने मतदान (Right to Vote) और उम्मीदवारी (Right to be Elected) के बीच एक स्पष्ट विभाजक रेखा खींची है।
मतदान - यह प्रक्रिया में भागीदारी है।
चुनाव लड़ना - यह एक विशेषाधिकार है जो कानून द्वारा निर्धारित योग्यताएं (Qualifications) पूरी करने पर मिलती हैं। सुप्रीम कोर्ट के इन निर्णयों का सार यह है कि लोकतंत्र का अर्थ निरंकुश अधिकार नहीं है। चुनाव की पवित्रता बनाए रखने हेतु संसद को यह शक्ति दी गई है कि वह योग्यता और अयोग्यता के मानक तय करे। जैसा कि ज्योति बसु बनाम देबी घोषाल में कहा गया था कि - चुनाव एक विशुद्ध वैधानिक प्रक्रिया है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस विषय पर राजस्थान हाईकोर्ट के उस विशिष्ट तर्क के बारे में राय - राजस्थान जिला दुग्ध संघों (District Milk Unions) के इस मामले में हाई कोर्ट ने ऐसा फैसला दिया जो चुनावों में कानून द्वारा स्थापित सिद्धांतों के विपरीत था जिसके विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई।
मामला एवं पक्ष - सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सहकारी सोसायटी नियम, 1981 (Rajasthan Co-operative Societies Rules, 1981) के नियम 45 के संदर्भ में निम्नलिखित बारीकियों पर प्रकाश डाला -
1. हाईकोर्ट की चूक - वोट और चुनाव' को एक मानना - राजस्थान हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह मानते हुए निर्णय दे दिया कि यदि किसी व्यक्ति को वोट देने का अधिकार है, तो उसे अनिवार्य रूप से चुनाव लड़ने का अधिकार भी होना चाहिए। कोर्ट ने इसे लोकतांत्रिक समानता के रूप परिभाषित किया।
सुप्रीम कोर्ट का सुधार - जस्टिस रवींद्र भट ने स्पष्ट किया कि कानून की नज़र में ये दोनों जुड़वां अधिकार नहीं हैं। मतदान का अधिकार एक व्यापक लोकतांत्रिक भागीदारी है, जबकि चुनाव लड़ना एक विशेषाधिकार है जो केवल तभी सक्रिय होता है जब आप कानून द्वारा तय की गई पात्रता (Eligibility) को पूरा करते हैं।
2. संस्थागत शर्तें (Institutional Conditions) - सहकारी समितियों या जिला दुग्ध संघों के मामले में, उप-नियमों (Bye-laws) द्वारा कुछ शर्तें लगाई गई - जैसे - उम्मीदवार ने गत वर्ष कितना दूध समिति को बेचा एवं वह समिति का सक्रिय सदस्य है या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन शर्तों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संस्था का नेतृत्व वह व्यक्ति करे जो वास्तव में उस कार्य से जुड़ा हो।
उक्त शर्तें मतदान के अधिकार को नहीं छीनतीं, बल्कि केवल यह तय करती हैं कि प्रबंधन (Management) में कौन बैठेगा।
3. योग्यता और अयोग्यता का कानूनी आधार - अदालत ने दोहराया कि जब तक कानून (Statute) किसी को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं देता, तब तक कोई भी व्यक्ति यह दावा नहीं कर सकता कि उसे चुनाव लड़ने का जन्मसिद्ध या मौलिक अधिकार है।
उदाहरण - यदि कानून कहता है कि किसी विशिष्ट पद के लिए न्यूनतम शिक्षा या कोई विशेष अनुभव चाहिए, तो वह भेदभाव नहीं है, बल्कि उस पद की गरिमा के लिए लगाई गई एक कानूनी शर्त है।
इस निर्णय का व्यापक प्रभाव -
सुप्रीम कोर्ट के इस रुख ने भविष्य के लिए तीन बातें साफ कर दीं -
1. संसद और विधायिका की शक्ति - सरकार चुनाव लड़ने हेतु शैक्षणिक योग्यता या अन्य अयोग्यताएं (जैसे बच्चों की संख्या या शौचालय की अनिवार्यता) कानून बनाकर लागू कर सकती है।
2. न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा - कोर्ट चुनाव की शर्तों में तब तक दखल नहीं देगा जब तक उक्त शर्तें संविधान के किसी अन्य प्रावधान (जैसे अनुच्छेद 14 - समानता) का स्पष्ट उल्लंघन न करती हों।
3. सहकारी लोकतंत्र - सहकारी संस्थाओं में पेशेवर प्रबंधन सुनिश्चित करने हेतु विशेष योग्यताएं वैध मानी जाएंगी।
हम इस मामले को Administrative Law और Constitutional Interpretation के बेहतरीन उदाहरण के रूप में देख सकते हैं, जो स्पष्ट करता है कि संवैधानिक ढांचा (Democracy) और वैधानिक नियम (Statutory Rules) परस्पर साथ चलते हैं।
राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने मतदान करने और चुनाव लड़ने के अधिकार को एक समान मान कर गलती की है। इस मामले में उप नियम केवल चुनाव लड़ने की पात्रता तय करते हैं, वे मतदान के अधिकार को प्रभावित नहीं करते हैं। इन नियमों का उद्देश्य यह तय करना है कि कौन व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है या पद पर बना रह सकता है। इन्हें योग्यता से जोड़ना गलत है।
कोर्ट ने कहा कि मतदान का अधिकार व्यक्ति को चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर देता है, जबकि चुनाव लड़ने का अधिकार एक अलग और अतिरिक्त अधिकार है। इस पर योग्यता, अयोग्यता और अन्य संस्थागत शर्तें लागू की जा सकती हैं।
यह अधिकार कानून द्वारा लागू किए गए हैं जिन्हें उसी सीमा तक लागू किया जा सकता है, जितनी कानून अनुमति देता है।
इस सिद्धांत को दोहराने वाले निर्णय का विवरण-
केस का नाम - भीम राव बसवंत राव पाटिल बनाम मदन राव विश्वनाथ राव पाटिल (BhimRao Baswanthrao Patil v. Madanrao Vishwanathrao Patil)
केस नंबर - Civil Appeal No. 6645 of 2022
आदेश दिनांक - 24 जुलाई, 2023
पीठ (Bench): जस्टिस एस. रवींद्र भट और जस्टिस अरविंद कुमार।
मुख्य कानूनी बिंदु -सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्णय और इससे पहले के प्रसिद्ध मामलों (जैसे ज्योति बसु बनाम देबी घोषाल) का हवाला देते हुए ये बातें स्पष्ट की हैं।
मौलिक अधिकार नहीं - न्यायालय ने कहा कि लोकतंत्र में चुनाव लड़ना या वोट देना कोई सामान्य कानून (Common Law) या मौलिक अधिकार नहीं है।
यह केवल एक वैधानिक अधिकार है, जिसे संसद द्वारा बनाए गए कानून (जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951) के तहत नियंत्रित किया जाता है।
संवैधानिक प्रावधान - वोट देने का अधिकार अनुच्छेद 326 के तहत एक संवैधानिक अधिकार है, लेकिन यह भाग III (मौलिक अधिकार) के दायरे में नहीं आता।
सूचना का अधिकार बनाम चुनाव लड़ना - हालांकि चुनाव लड़ना मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन मतदाता का यह जानना कि उसका उम्मीदवार कैसा है (उसका आपराधिक रिकॉर्ड, संपत्ति आदि), अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत एक मौलिक अधिकार है।
प्रमुख ऐतिहासिक संदर्भ (अन्य महत्वपूर्ण केस) - सुप्रीम कोर्ट के आदेश -
ज्योति बसु बनाम देवी घोषाल (1982) - इसमें स्पष्ट कहा गया था कि चुनाव का अधिकार न तो मौलिक अधिकार है और ना ही सामान्य कानून का अधिकार ; यह विशुद्ध रूप से एक वैधानिक अधिकार है।
कुलदीप नैयर बनाम भारत संघ (2006) - 5 जजों की पीठ (बेंच) ने पुष्टि की कि अनुच्छेद 326 के तहत वोट देने का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है, लेकिन मौलिक अधिकार नहीं।
निष्कर्ष - चुनाव लड़ने और वोट देने की शक्ति संविधान और कानून - (Representation of the People Act) से मिलती है। चूंकि ये मौलिक अधिकार नहीं हैं, इसलिए संसद इन पर उचित कानूनी प्रतिबंध लगा सकती है।
शमशेर भालू खां
LLB (प्रथम सेमेस्टर)
राजकीय विधि महाविद्यालय, चूरू
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