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किसान केसरी बलदेवा राम मिर्धा

बलदेवाराम मिर्धा परिचय एवं सामान्य इतिहास - 
मानव सभ्यता में दो पहलू होते है।एक अच्छाई का तो दूसरा बुराई का। प्रत्येक सभ्यता के प्रति कालखंड में अत्याचार के सीमा लांघने पर कोई न कोई महापुरुष बगावत का झंडा उठाकर खड़ा हो जाता है।
पुलिस सेवा में रहते हुए जब वो गांवों के दौरों पर जाते थे तो उन्होंने किसानों की हालत नजदीक से जानी। कहने को किसान थे बाकी हालात दो पैरों वाले जानवर सी थी। भू स्वामित्व जागीरदारों के पास था और किसान उनके दास। जब चाहे किसान को जागीर से भगा दिया जाता था।
                चौधरी बलदेव राम मिर्धा 

        बाल्यकाल भाई और पिताजी के साथ 

सामान्य परिचय - 
नाम - बलदेवा राम
उपाधि - मिर्धा
जन्म - 17 जनवरी 1889
जन्म स्थान - कुचेरा (नागौर)
मृत्यु - 2अगस्त 1953 (64 वर्ष)
शांत स्थल - नागौर
पिता का नाम - मांगा राम
माता का नाम - भोमी देवी
जाति - जाट (गोत्र  - राहड़)
पिता का व्यवसाय - जोधपुर रियासत में तार और संचार प्रभारी।
शिक्षा - मेट्रिक जोधपुर से 1914
व्यवसाय - सब इंस्पेक्टर 1920, 1943 में डीएसपी पद पर कर्मोन्नत 
विशेष - लूट विरोधी अभियान,1947 में किसान हित में DIG पद से त्यागपत्र। संस्थापक मारवाड़ किसान सभा।
सहोदर - थानाराम मिर्धा (नाथुराम मिर्धा के पिता)
पुत्र - रामनिवास मिर्धा

         पुलिस गणवेष में बलदेव राम मिर्धा 

शोषण के विरुद्ध 
जहां अंग्रेजों का सीधा राज था वहां इतना शोषण नहीं था जितना राजपुताना के जागीरदारों द्वारा किया जाता था।बिना जागीरदार की रजामंदी के गाय के लिए घास तक एकत्रित करना गुनाह था।यहां कोई किरायेदारी कानून लागू नहीं था।किसी जमीन पर पहली फसल उगाने पर 50%हिस्सा जागीरदार वसूलते थे।फिर नंबर आता था गांव के ठाकुर व चारणों/दरोगोँ का जिन्हें किसान कणवारिया कहते थे।कुल-मिलाकर किसानों के हिस्से 20-30%फसल आती थी जो धार्मिक कर्मकांडों व सामाजिक कुरीतियों के हवाले हो जाती थी।ग्रामीण क्षेत्रों में नाम के भी स्कूल नहीं थे और जनता अज्ञानता में फंसी हुई थी।
यह सब देखकर बलदेवराम जी मिर्धा व्याकुल हो जाते थे।जागीरदारी गुंडों का सामना करने की हालत में किसान थे नहीं।अशिक्षा,गरीबी के दलदल में फंसे किसानों की मुक्ति के लिए रणनीतिक जागरूकता की जागरूकता की जरूरत थी।पुलिस सेवा में रहते हुए किसानों की दशा व दिशा सुधारने के लिए उन्होंने पहला व सबसे महत्वपूर्ण हथियार शिक्षा को हाथ मे लिया।

शिक्षा की अलख - 
यह वो समय था जब संयुक्त पंजाब में चौधरी छोटूराम व सेठ छाजूराम मिलकर शिक्षण संस्थानों की श्रृंखला खड़ी कर रहे थे।किसान मसीहा सर चौधरी छोटूराम के जीवन को गहराई से समझने के बाद उन्हें अहसास हुआ कि शिक्षा ही हर समस्या का असली समाधान है |शिक्षा का जिम्मा सरकार के पास था लेकिन जागीरदारों के आगे शिक्षा सिर्फ शहरों में सिमटी हुई थी और ग्रामीण आँचल में सामंतों/ठाकुरों/कणवारियों का सिर्फ आतंक था।
बलदेवराम जी मिर्धा ने सरकारी सेवा में रहते हुए गांव-गांव छान मारा था और किसानों को जागरूक करके ग्रामीण आँचल में स्कूल खोले। उन्होंने राज्य के हर कौने, हर क्षेत्र में किसान छात्रावासों की श्रृंखला स्थापित की। जहां किसानों के बालक सीमित संसाधन होने पर भी रह पाए और शिक्षित हो सके।
अपने स्कूली मित्रों की मदद से उन्होंने जोधपुर, बाड़मेर, मेडता, परबतसर, डीडवाना, नागौर,पीपाड़ आदि मारवाड़ क्षेत्र के कस्बों में छात्रवास का निर्माण किया।इसी कड़ी में उन्हें चौधरी भींयाराम,चौधरी मूलचंद व बाबू गुल्लाराम जी चौधरी जैसे सारथी मिले और इन्होंने इस मुहिम में अपना सर्वस्व दिया। हजारों छात्रों ने इन छात्रावास का इस्तेमाल किया और डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी, राजनीतिज्ञ और शिक्षक बनते चले गए।
चौधरी छोटूराम,राय बहादुर चौधरी व बलदेवराम जी मिर्धा में एक समानता नजर आती है।वो यह है कि वो सरकार में रहकर अपनी कौम के हितों का सरंक्षण करते,शिक्षा का प्रचार-प्रसार करते,सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अभियान चलाते और लोगों को जागरूक करते थे।वो यह बखूबी समझते थे कि किसान कौम सरकार/जागीरदारों से सीधा मुकाबला करने की हालत में नहीं है इसलिए पहले उस पीक पॉइंट पर ले जाये कि सीधा टकराव झेलने में सक्षम हो जाये।

जो जोते जमीन उसकी
जब पूरे मारवाड़ में एक चेतना जगाने में कामयाब हो गए तो जो जोते जमीन उसकी का नारा घर-घर पहुंच गया,गांव-गांव किसानों का नेतृत्व करने के लिए शिक्षित लोग तैयार हो गए तो उन्होंने पंजाब सरकार के मंत्री चौधरी छोटूराम के आतिथ्य में मारवाड़ के कंसों की छाती  पर अर्थात जोधपुर में 1942 में बड़ा किसान सम्मेलन आयोजित किया जिसमें लाखों किसान शामिल हुए।इस सम्मेलन के बाद मारवाड़ के किसानों में एक नव चेतना का ऐसा ज्वार फूटा कि देखते ही देखते जागीरदारों के विरोध में गांव के गांव उठ खड़े हुए।

राजनीति में कदम - 
इधर लोकपरिषद, प्रजामंडल व कांग्रेस के नेताओं का आवागमन तेज होता गया और दुसरीं तरफ मारवाड़ किसान सभा एक बड़ी ताकत के रूप में उभरी।जब किसान सभा के बैनर तले किसान पूर्ण लामबंद हो गए तो बलदेवराम जी मिर्धा DIG के पद से त्याग देकर किसानों को नेतृत्व देने लिए 1947में खुलकर मैदान में उतर गए।
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया।जोधपुर राज्य में नई सरकार बनी।बलदेवराम जी मिर्धा के कद व लोकप्रियता से जयनारायण व्यास सहित जागीरदार व दरबारी लोग डरे हुए थे कि कहीं यह किसान नेता राज्य की सत्ता न निगल जाए इसलिए नई सरकार में बलदेवराम जी के बजाय उनके बड़े भाई थानाराम मिर्धा के पुत्र नाथूराम जी मिर्धा को कृषि व राजस्व मंत्री बनाया गया।

किसान जागरण
जब सरकारी नौकरियों में किसानों के बालकों की संख्या बढ़ी तो वो किसानों के हकों की आवाज बनने लगे।एक साथ मांगे उठी कि जागीर भूमि पर फसल के बंटवारे के बजाय पट्टे का नगद भुगतान हो, अनुचित टेक्स बंद हो और जागीरदारों की तानाशाही न्यायिक शक्तियों को खत्म की जाये।
राज्य सरकार अब इन जायज मांगों का विरोध नहीं कर सकती थी क्योंकि उसकी कार्यपालिका में किसानों के बालक ज्यादा थे ।अत: जागीरदारों की न्यायिक और पुलिस शक्तियां वापस ले ली गईं | जमीन के पट्टे का फसल में हिस्से की जगह नकद रूपये से भुगतान शुरू किया गया और सभी टेक्सों को जमीन के लगान के साथ ही एकीकृत किया गया ।
हालांकि सामन्ती जागीरदारों ने इसका कड़ा विरोध किया था । लगभग हर बड़े जागीर क्षेत्र में दंगे हुए थे। दबडा, खिवंसर, रतकुडीया आदि कई गांवों में काफी किसानों को अपना सर्वोच्च बलिदान करना पड़ा, वहां बहुत बड़ा रक्तपात हुआ और ये गांव किसानों के लिए पवित्र स्थान बन गए।
एकतरफ नाथूराम जी मिर्धा सरकार में मंत्री के तौर पर किसानों के हकों में फैसले ले रहे थे तो दुसरीं तरफ बलदेवराम जी मिर्धा किसान सभा के बैनर तले बड़ी बड़ी तकरीरों के माध्यम से किसान को उनके अधिकार प्रति जागरूक कर रहे थे।एक साल के भीतर ही “Marwar Tenancy Act, 1949” पारित किया गया और इस कानून ने मारवाड़ के किसानों को मध्य प्रान्त व संयुक्त पंजाब के प्रगतिशील किसानों के समकक्ष खड़ा कर दिया।6 अप्रैल, 1949 की आधी रात को बिना कोई पाई चुकाए ही सभी किसान उस जमीन के मालिक बन गये जिसको वह जोतते थे।
यह किसान केसरी बलदेवराम जी मिर्धा द्वारा निर्धारित लक्ष्यों में से एक बड़ी उपलब्धि थी ।उस दिन समूचे राजस्थान की फिजायें चौधरी बलदेव राम मिर्धा जिंदाबाद के नारों से गूंज उठी थी।1952 के पहले आमचुनाव से पहले कांग्रेस किसान सभा के नेताओं के पीछे-पीछे घूम रही थी।किसान सभा के नेताओं ने हालात को भांपकर सशर्त कांग्रेस में शामिल हो गए।उस समय जागीरदारों के आतंक को खत्म करने के लिए केंद्रीय सत्ता के साथ तालमेल बिठाना जरूरी था।किसान सभा के नेताओं का एकमात्र ध्येय किसानों का हित था।

किसानों की प्रेरणा 
किसान चेतना की एक चिंगारी जली थी वो किसानों के हर घर की दीवारों को चमका गई। 2अगस्त 1953 में वो शरीर हमारे बीच नहीं रहा लेकिन उनकी मिट्टी हमारे खेतों की मिट्टी में मिलकर हमारा आचमन करती है।समय के साथ हालात बदल जाते है लेकिन चेतना की अलख व विचार सदियों तक भावी पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बन जाते है।आज हमारे हौंसलों में मिर्धा जी विचार व चेतना की मोटी दीवार बनकर खड़े है।आज शान से सीना फुलाकर घर से,खेत से निकलते है तो सीने में बलदेवराम जी मिर्धा का हौंसला भरा होता है।आज सिर उठाकर,आंख से आंख मिलाकर सामंतों से सामना करते है तो बलदेवराम जी मिर्धा की चेतना का उबाल हमारे अंदर भरा होता है।

वर्तमान स्थिति और जाट राजनीति - 
एक DIG बने किसान के बेटे ने जागीरदारी दौर में किसान छात्रावासों की,स्कूलों की श्रृंखला खड़ी कर दी थी और आज रिटायर्ड DIG उसी एक छात्रावास के वार्डन बनकर रुक जाए,क्या यही जज्बा बचा है हमारे अंदर? एक रेलवे की नौकरी करने वाला किसान का बेटा पूरे बाड़मेर क्षेत्र में शिक्षा का ज्वार पैदा कर गया और आज सांसद/विधायक/आईएएस/आईपीएस बने किसान के बेटे क्या कर रहे है? तत्कालीन जोधपुर शहर की शिक्षा के मुकाबले रतकुड़िया को मारवाड़ की नालंदा के रूप में तैयार करने वाले चौधरी गुल्लाराम के गांव के विधायक/सांसद आज क्या कर रहे है? मैं किसी पर आरोप लगाकर ठेस पहुंचाना नहीं चाहता लेकिन हम सबको मिलकर अपने गिरेबान में जरूर झांकना चाहिए।
पहले जागीरदारी आतंक में गरीब किसान जकड़ा हुआ था और आज पूंजीवादी आतंक के बीच गरीब किसानों की आवाज,हक,सपनों को कुचला जा रहा है।दुश्मनों से लड़ना आसान होता है लेकिन जब घर मे ही दुश्मन पैदा हो जाये तो लड़ाई मुश्किल व उलझन भरी हो जाती है।हमने अपने घरों में जागीरदार पैदा कर लिए है जिन्होंने किसान छात्रावासों, शिक्षा केंद्रों पर कब्जा करके उजड़े भूखंडों में तब्दील कर दिया है,राजनीतिक दलाली के अड्डों में परिवर्तित कर दिया है।गरीब किसानों के बच्चों से इन संसाधनों को दूर कर दिया है। 

यादों में 
 1989 में भारत सरकार द्वारा जारी डाक टिकट

 नागौर में कृतज्ञ समाज द्वारा निर्मित स्मृति चिह्न
BMIT बलदेवाराम इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी 
                          जयपुर

पार्टी वाद और राजनेतिक महत्वकांक्षा ने जाट समाज की महान स्थिति में कोई दाग अवश्य लगाया है।

शमशेर भालू खान 
9587243963

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