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✅फातिमा बिन्ते मोहम्मद

फातिमा बिन्ते मोहम्मद (स.)
नाम - फातिमा
उपनाम (पदवी, उपाधियां - 
1 अल-सिद्दीक़ा (सत्यवादी)
2 अल-मुबारका (आशीर्वाद प्राप्त)
3 अल-ताहिरा (पवित्र)
4 अल-ज़किय्या (निष्पाप)
5 अल-रज़िया (सन्तोषी)
6 अल-मुहद्दिसा (ईश्वर के फरिश्तों द्वारा नामित)
7 अल-बतूल (निष्कलंक)
8 अल-ज़हरा (प्रकाशवान)
9 सय्यदतुन निसा अल-आलमीन (विश्व की सभी महिलाओं की नेता)
10 सय्यदतुन जन्नत (जन्नत में सभी स्त्रियों की अगवा)
11 उम्मे अबिहा (माँ की तरह प्यार, देखभाल करने वाली)
12. ज़ाकिरा
13 मरज़िया
पिता - मुहम्मद (स.)
माता - खतीजा 
(अरब की प्रसिद्ध धनी महिला जिसका व्यापार कई देशों में फैला हुआ था मोहम्मद साहब 582 से 608 इश्वी सन तक उनके व्यापारिक प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते थे। विश्व की प्रथम महिला जिसने इस्लाम स्वीकार किया। खतीजा बेवा थी जिससे मोहम्मद साहब ने उनकी 45 वर्ष की आयु में खुद से बड़ी उम्र होने पर भी शादी की। खतीजा ने अपनी पूरी सम्पत्ति वक़्फ़ कर दी जो इस्लाम के प्रचार में खर्च की गई।)
जन्म - 27 जुलाई 604 इश्वी सन 20 जमादि उल आखिर 17 हिजरी पहले
जन्म स्थान - मक्का शहर 
सिलसिला- अहले अल बैत
कबीला - क़ुरैश
मृत्यु - 28 अगस्त 632 इश्वी सन 3 जमादि उल शानी 11 हिजरी।
(पिता की मृत्यु के 90 दिन बाद कुल आयु 28 वर्ष विवाह के 9 वर्ष बाद)।
मृत्यु का स्थान - मदीना
नाना  - खवालीद
दादा  - अब्दुल्ला
दादी  - आमना
मृत्यु का कारण- 
मआविया के समर्थक व अली के शत्रुओं द्वारा अली की हत्या की व्यूह रचना के अंतर्गत घर में घुस गए। फातिमा ने मुख्य द्वार बंद कर उसे हाथों से रोके रखा। शत्रुओं के धक्के से द्वार खुल गया, फातिमा दरवाजे और दिवार के बीच आने से उनकी पसलियां टूट गईं। पेट में बच्चा था वो भी मर गया। इसी हाल में वहीं पर देहांत हो गया।
दफ़न- 
मरने से पहले फातिमा ने कुछ लोगों को उनके जनाज़े में शामिल नहीं करने व रात के वक़्त ही दफनाने की वसीयत की थी।
हजरत अली व उनके कुछ साथियों ने कई जगह पहचान छुपाने हेतु कब्र के निशान बनाये। संभावना यही ही कि फातिमा को जन्नतुल बकी (मदीना) में ही दफनाया गया।
विवाह अली इब्ने अबी तालिब
623 मदीना शहर में हिज़री 1 को तालिब के पुत्र अली (मोहम्मद साहब के चचेरे भाई से, खलीफा ए राशिदीन के चौथे खलीफा) 
सन्तान- 3 बेटे 2 बेटियाँ - 
1 इमाम हसन
2 इमाम हुसैन 
3 मुहसिन 
(पैदा नहीं हुये माता के साथ गर्भ में ही इंतकाल पिता अली ने जन्म से पहले ही नाम रख दिया था)
4 ज़ैनब 
5 उम्मे कुलशुम

हजरत फातिमा का जीवन-
संसार में बाप - बेटी या मां - बेटे अथवा पति - पत्नी के रिश्ते को जानना हो तो फातिमा का जीवन इस संबंध में आदर्श जीवन है। फातिमा जिसका लालन - पालन ऐसे घर में हुआ जहां एकेश्वरवाद (तौहीद) संसार में ईश्वर की सत्ता की स्थापना, ईश्वर के प्रति समर्पण, नैतिकता एवं अखवत (भाईचारा) किस प्रकार से स्थापित किया जा सकता है यह सब देखने का मौका उसे अपने पिता मोहम्मद साहब के घर पर मिला। फातिमा अपनी मां खतीजा के लिए घर में काम करने के साथ-साथ पिता पैगंबर मोहम्मद साहब से शिक्षा भी लिया करती थी। फातिमा की 9 साल की उम्र में उसकी मां का देहांत हो गया और उसने अपने पिता पैगंबर मोहम्मद की देखभाल एक बेटी और एक मां बन करके की।
 वह उनकी हर बात का ख्याल रखती थी। एक बार फातिमा अपने घर पर खाना खा रही थी उसके घर में चार रोटीयाँ थी कि अचानक उसे अपने पिता की याद आई तो उसने आधी रोटी कपड़े में लपेटी और पिता के घर आई, पिता ने पूछा फातिमा कैसे आना हुआ तो उसने कहा हो सकता है मेरे वालिद भूखे हों और उन्होंने खाना नहीं खाया हो तो उनके लिए खाना लाई हूँ।  पिता पैगंबर मोहम्मद ने कहा फातिमा आज 3 दिन बाद खाना खा रहा हूं। फातिमा ने अपने हाथ से पिता को खाना खिलाया। फातिमा ने कई बार युद्ध भूमि में पिता व पति चिकित्सकीय व अन्य सहायता दी। फातिमा घायलों की सेवा स्वयं करती व अन्य स्त्रियों को भी गैर मरहम की (जिन से विवाह वर्जित अर्थात हराम हो) मरहम-पट्टी करने हेतु प्रेरित करती थी। फातिमा के 5 बच्चे हुये उसके पति अली विवाह के बाद लगभग धर्म प्रचार के लिए या तो युद्ध में रहे या घर से बाहर रहे इस दौरान फातिमा ने अपने सभी बच्चों का पालन - पोषण, शिक्षा - दीक्षा और प्रशिक्षण - कौशल आदि स्वयं सिखाकर उन्हें एक विश्व विख्यात व्यक्ति के रूप में मान्यता दिलवाई। संतान को फातिमा ने ही सिखाया था कि किसी का खून बहाना किसी से झगड़ा करना धर्म नहीं है। यह बहुत आवश्यक हो तभी ही किया जाना चाहिये वरना शांति ही सर्वश्रेष्ठ है । फातिमा ने अपने पति के लिए अपनी जान दे दी पैगंबर मोहम्मद के आखिरी दिन चल रहे थे वह अपने पिता की सेवा में लीन रहती थी एक दिन वह अपने पिता को देखते - देखते रोने लगी, पिता ने कहा क्या बात है ? फातिमा ने कहा कि नहीं कुछ नहीं। पैगंबर मोहम्मद ने कहा मेरे पास आओ और उन्होंने फातिमा के कान में कुछ कहा पैगंबर मोहम्मद के जाने के बाद उन्होंने यह बताया मेरे वालिद ने मुझे यह कहा कि मेरे जाने के बाद सबसे पहले मेरे परिवार में मेरे पास तुम आओगी और इससे मैं बहुत खुश हूं। 
घर के काम व सेवा कार्य से समय मिलने पर वो महिलाओं को शिक्षा देने का कार्य भी करती थीं। कई महिलाये 10 बार से अधिक बार सवाल करतीं तब भी मुस्कुरा कर जवाब देतीं उन्हें अच्छे से समझातीं। बार-बार कहतीं की एक अच्छे मुल्लिम और उस्ताद को कभी बार - बार सवाल से नहीं घबराना चाहिये और नहीं झुंझलाहट करनी चाहिये। जिसने हसन और हुसैन जैसी संतान जनी, जिसने अपने पिता और पति दोनों की सेवा पूर्ण मनोयोग से की उनका नाम है फातिमा। आज हर पिता इच्छा रखता है उसकी बेटी भी फातिमा जैसी हो हर पति उस जैसी पत्नी और हर संतान उन जैसी मां की चाहत रखती है।

शमशेर भालू खां 
9587243963

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