प्राथमिक शब्दावली
1 फ़िक़्ह (मुस्लिम न्याय सिध्दांत)
2 सुन्नत (नबी द्वारा किये गये कार्य)
3 हदीष (नबी द्वारा कही गई बात)
4 कयास (स्थानीय रीति-रिवाज व सहाबियों के कथन(कौल)
मुस्लिम न्याय व नीति शास्त्र (फिक़ह)
शब्द फ़िक़्ह फ़िक़ अरबी शब्द से बना है जिसका अर्थ है गहरी/पूर्ण समझ।
फ़िक़्ह ईश्वरीय विधान का ज्ञान है
इब्ने खल्दून।
कुरआन,हदीष और सुन्नत के गहन अर्थ को प्रकट करने वाला ज्ञान के अनुसार ईश्वरीय (इस्लामी) कानून को मानवीय समझ तक पहुँचने का कार्य फ़िक़्ह के अनुसार किया जाता है।
कुरआन व हदीष के साथ-साथ सुन्नत में बहुत सी बातें इशारों व संक्षिप्त रूप में समझाई गई हैं जिनकी व्याख्या कर इस्लामिक न्यायविद फ़िक़्ह के द्वारा शरीयत का निर्धारण करते हैं।
फ़िक़्ह की व्यख्या करने वाले को फ़क़ह (फुक़हा) कहते हैं। यह एक डिग्री है जो निश्चित काल तक अध्ययन के बाद दारे इस्लाम मदारिस (कानूनी स्कूल) (विश्वविद्यालयों) द्वारा प्रदान की जाती है।
इस्लाम मे शिक्षा ग्रहण कर पूर्णता की कई डिग्रियां हैं
1 हाफ़िज़ (जिसने कुरआन कंठस्थ कर लिया हो)
2 मौलवी/मौलाना - (जिसने इस्लामिक लॉ की प्राथमिक शिक्षा पूर्ण कर ली हो, अधिकांशतः मस्ज़िद में इमाम का कार्य वही करते हैं।
3 आलिम - इस्लामिक मसलों की प्रारंभिक शिक्षा पूर्णता प्रमाण पत्र
4 मुअल्लीम - (इस्लामिक कानून व व्यस्थता का जानकार)
5 फ़ाज़िल - इस्लामिक मसलों के उच्च जानकर की डिग्री
6 क़ारी - कुरआन के शब्द (हरूफ बा हरूफ सही पढ़ने वाला (क़िरअत की डिग्री)
8 मुफ़्ती - शरीयत कानून के अनुसार फैसला देने की अधिकृत डिग्री (फतवा जारी करने का अधिकार)
9 फ़क़्ह - शरीयत, कुरआन, हदीष व सुन्नत के विश्लेषणकर्ता की डिग्री
10 मोरिख - इतिहासकार
11 क़ाज़ी - इस्लामिक न्यायदर्शन के ज्ञाता की डिग्री व फैसला करने का अधिकारी
(इस्लामिक न्यायालय को इज़्मा कहा जाता है)
(कुरआन, हदीष व सुन्नत के संदर्भ में आने वाली समस्याओं पर विचार करने व बहस (तर्क) करने की क्रिया को क्यूआस कहा जाता है।)
सरल शब्दों में फ़िक़्ह इस्लाम का संवेधानिक अध्ययन है जिस के आधार पर मुफ़्ती (शरीयत, व इस्लामिक रीति नीति, कानून की व्याख्या कर फैसला देने हेतु अधिकृत व्यक्ति) समस्या के समाधान हेतु आदेश (फतवा) देता है।
फ़िक़्ह के आधार पर बने शरिया कानून लगभग अपरिवर्तनीय होते हैं परंतु कुरआन व हदीष की नवीन व्यख्या के आधार पर फ़िक़्ह परिवर्तनशील है।
फ़िक़्ह के माध्यम से शरीयत के कानूनों की पालना, नैतिक व राजनीतिक व्यवस्था, आर्थिक क्रियान्वयन व मुस्लिम रीतियों का पालन कैसे करें का निर्धारण किया जाता है।
शिया समुदाय में 3 (स्कूल्स ऑफ शिया रितुअल्स) (मज़हब) इमाम हैं जिन की शिक्षाओं (व्याख्याओं) को आधार मानकर ही शिया मुस्लिम रीतियों व धार्मिक क्रियाकलापों का आयोजन निर्धारण व क्रियान्वयन किया जाता है।
सुन्नी मुस्लिम समाज मे चार (स्कूल्स ऑफ मुस्लिम रितुअल्स) (मदहब) इमाम हैं जिन की व्यख्याओं के आधार पर धर्म सम्बंधित सब कार्य नियोजित किये जाते हैं।
फ़क़ह का फैसला/व्याख्या अंतिम नहीं होती है, इसका कारण है कुरआन व हदीष में बहुत से अल्फ़ाज़ (शब्द) अनुत्तरित हैं, जिनका अर्थ कहीं नहीं निकलता।
हर फ़क़ीह अपनी बात इस बात पर ख़त्म करता है कि उसके द्वारा पूर्ण सावधानी से व्याख्या की गई है पर इसमें अंतर संभव है। इस्लामिक मान्यता अनुसार कुरआन, हदीष व सुन्नत ने हर छुपी हुई या प्रत्यक्ष बात का वर्णन कर दिया है जिसका खुलासा समय-समय और आवश्यकता पड़ने पर किया जाता है। जीवन के हर क्षेत्र में क्या, क्यों व कैसे का उत्तर इनमें निहित है पर सभी के लिये इसे समझ पाना या सही व्याख्या करना संभव नहीं है।
इस्लाम धर्म इब्राहिम के धर्म यहूदी व इसाई धर्म का परिष्कृत रूप है। ईश्वर ने पहले 124000 या 184000 हज़ार नबी पृथ्वी के सभी क्षेत्रों में दूत (प्रतिनिधि) के रूप में पृथक-पृथक भेजे। अंतिम नबी मुहम्मद साहब के रूप में सभी स्थानों व प्रतिनिधियों द्वारा निर्मित धर्म/मज़हब को पूर्णतः स्थगित कर सिर्फ एक नबी, एक किताब व एक ईश्वर को मानने के लिये समस्त पृथ्वी के निवासियों के लिये भेजा। इस प्रकार से अब तक के सभी धार्मिक क्रियाकलाप जो पृथक स्थानों पर पृथक-पृथक थे अब एक हो गए। आज तुम लोगों पर दीन पूरा-पूरा उतार दिया गया है, ईश्वर के सन्देश अब शेष नहीं रहे व तुम गवाह रहना मैंने अपनी तरफ से न कुछ जोड़ा है और न ही कुछ घटाया है। जो ईश्वर के आदेश थे अक्षरशः तुम लोगों तक पहुँचा दिया है। अब क़यामत तक तुम पर न कोई नबी आयेगा न हीं कोई दूसरी किताब। (कुरआन सूरह नम्बर 5 आयत नम्बर 3)
फ़िक़्ह के जानकार (स्कूल ऑफ फ़िक़्ह) सुन्नी या शिया के स्थान पर इस्लाम धर्म की वास्तविक शिक्षाओं पर जोर देते हैं। सभी ने इब्राहिम के धर्म के परिष्कृत रूप की व्याख्या की है जिसके अनुसार फ़िक़्ह की रचना हुई। अल्लाह झूठ नहीं बोलता - कुरआन की सूरह नम्बर तीन आयत नम्बर 95 में यह गवाही दिलवाई गई है।
फ़िक़्ह की व्याख्या को इज़्तिहाद कहते हैं व व्याख्या का अध्ययन करने वाले को मुजतहिद कहते हैं।
फ़क़ीह को सार्वभौमिक न्यायशास्त्र व व्यवहारिक परिस्थितियों को मद ए नज़र रखना चाहिये यदि कोई फ़क़ीह एक तरफ़ा सिद्धान्त लागू करता है तो वह वास्तविक फ़क़ीह नही हो सकता।
इस्लामिक साम्राज्य में या मुस्लिम के लिये आम जीवन मे आने वाली समस्याओं का अध्ययन कुरआन, हदीष व सुन्नत की रोशनी में किया जाता है। फ़िक़्ह के अध्ययन व उसकी व्याख्या करने के तरीके को इज़्तिहाद कहा जाता है।
इस्लाम धर्म मे अधिकांश मतभेद इज्तिहाद के कारण हुये।
हर फ़क़ह ने अपने विवेक के अनुसार कुरआन, हदीष व सुन्नत की व्याख्या की है जिसके मुताबिक शरिया कानूनों का निर्माण किया, जहां एक समान मामले के बारे में कुरआन या हदीष या सुन्नह में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता उन पर राय देना या कई ऐसे भी मामले थे जो नबी के समय से पूर्व व्यवस्था में थे,व्यावहारिक थे और उपयोग में भी आ रहे थे की पालना अनवरत रही, कोई आक्षेप या वर्जना के नहीं होने पर लोगों द्वारा उपयोग में लाया जाता रहा, में इज्तिहाद का उपयोग इसलिये किया गया कि यह कुरआन, हदीष व सुन्नत के विरोधाभाषी नहीं हैं।
मुस्लिम न्यायविदों ने समय-समय पर शासकों द्वारा भी यदि कुरआन, हदीष व सुन्नत की उपेक्षा की गई तो उन्हें सावधान किया व उनका विरोध भी किया। चतुर्थ ख़लीफ़ा अली, इमाम हुसैन, मोहम्मद इब्ने अबूबक्र व इमाम शाफ़ई इसके उत्तम उदाहरण हैं जिन्होंने शासकों की दमनात्मक नीतियों व अन्याय का विरोध किया व समय आने पर मुक़ाबला किया। उनके अनुसार कुरआन, हदीष व सुन्नत के फैसले अधिक उन्नत व निष्पक्ष हैं।
फ़िक़्ह (इस्लामिक न्यायव्यवस्था) के ही कारण इस्लाम धर्म मदीने से शुरू हो कर सम्पूर्ण विश्व में फैला जिसकी महत्वपूर्ण बात थी सम्पूर्ण समुदाय की भागीदारी।
फ़िक़्ह का विकास :-
वैसे तो मुहम्मद साहब के समय से ही न्यायशास्त्र का प्रारंभ हो गया था उनकी हदीष मुख्य न्याय स्रोत बनी। इस्लाम मे मुहम्मद साहब के बाद खलीफा उस्मान गनी ने मुस्लिम न्याय स्रोतों के विकास का कार्य शुरू किया जिसमें सबसे पहले कुरआन को सही तरीके से संरक्षित करना, आयशा व उम्मे हबीबा के सानिध्य में नबी की हादिशों को एकत्रित करने मुख्य कार्य था। चतुर्थ ख़लीफ़ा अली इब्ने अबु तालिब स्वयं एक अच्छे न्यायविद थे ने फ़िक़्ह के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ख़िलाफ़ते उम्मयद के समय इस्लामिक साम्राज्य काफी बढ़ गया और ख़िलाफ़ते अब्बासिया के दौर में फ़िक़्ह के केंद्र (स्कूल्स ऑफ इस्लामिक फ़िक़्ह) शुरू हो चुके थे। उसूल उल फ़िक़्ह (इस्लामिक न्यायशास्त्र के सिद्धांत) पर फुर अल फ़िक़्ह (इस्लामिक न्यायशास्त्र की शाखाएँ) का विकास प्रारंभ हुआ। सर्वप्रथम तर्कवादी दृष्टिकोण का विकास बगदाद (इराक़) में हुआ।
फ़िक़्ह में तर्क व बहस के बिंदु
1 फ़र्ज़ - हुकम(बहुवचन अहकाम) - ईश्वर द्वारा किसी काम को करने के हेतु दिये गये विशेष निर्णय। किसी भी परिस्थिति में टाला नहीं जा सकता।
2 वाजिब - अनिवार्य परन्तु परिस्थिति विशेष के अनुसार टाला भी जा सकता है।
3 हराम - किसी भी परिस्थिति में मना
4 हलाल - ईश्वर के आदेशानुसार किये जा सकने वाले कार्य जिनकी मनाही नहीं है। वर्जित
5 अज़ाब - ईश्वर के निर्देशानुसार कार्य नहीं करने व वर्जित कार्य करने पर दिया जाने वाला दण्ड।
6 सवाब - ईश्वर के आदेशानुसार कार्य करने पर व वर्जित कार्यो से बचने पर दिया जाने वाला पुरस्कार।
7 मकरूह - जो कार्य मना है पर करे तो कोई दोष नहीं। अस्वीकृत
8 ममनु - न करे तो ठीक करे तो कोई दोष नहीं पर बचना ही अच्छा है। मनाही
9 मुबाह - करे तो ठीक न करे तो ठीक
10 मंडीब - अनुषंशित
इसके अलावा भी समसामयिक समस्याओं पर विचार किया जा सकता है।
फ़िक़्ह को स्रोत के रूप में क्रमबद्ध इस प्रकार से किया जा सकता है: :-
1 अल्लाह के हुक्म
2 नबी की सुन्नत
3 अनुयायियों द्वारा वर्णित दृष्टांत (हदीष)
4 क्रम संख्या 01 से 03 के आधार पर व्याख्या करना ( फ़िक़्ह)
इस्लामी कानून शरिया (शरीयत)
इस्लामिक कानून को शरीयत कहते हैं जिसके अनुसार दैनिक जीवन के कार्य व मुस्लिम प्रथाओं का संचालन किया जाता है। इसके अनुसार इस्लामिक कानून को चार खण्ड में विभाजित किया जाता है :-
1 ईश्वर (अल्लाह)
2 नबी (मुहम्मद साहब)
3 सहाबी (मुहम्मद साहब के साथी)
4 ताबयीन - (सहाबियों के वंशज)
इस तरह से इस्लामिक स्रोत निम्नलिखित हैं जिनके आधार पर मुस्लिम कानून (शरीयत) का निर्माण होता है।
1 ईश्वर के आदेश (हुक्म) - कुरआन
2 मोहम्मद साहब के मुख से कही गई बात - हदीष
3 मुहम्मद साहब के द्वारा किये गये कार्य - सुन्नत
4 ताबेयीन व तबे ताबेयीन द्वारा उक्त तीन के अनुसार जारी निर्देश - नक़ल (निर्देश)
इस्लामिक न्यायशास्त्र के अनुसार सबसे प्रमाणित कार्य कुरआन, हदीष व सुन्ना के अनुसार हैं, परंतु ऐसे मशले जिनके बारे में इन तीनो द्वारा कोई स्पष्ट व्याख्या नहीं की जाती तो ताबेयीन व तबे ताबयीन के निर्देशन में कार्य किया जाता है।
इस्लामिक न्यायशास्त्र को आठ भागो में विभाजित किया जा सकता है :-
1 प्रारम्भिक काल -
हिज़री सन 11 अर्थात सन 632 की अवधि मुहम्मद साहब के हिज़रत से अवधि।
2 द्वितीयक काल -
हिज़री 11 से हिज़री 50 ख़लीफ़ा व सहाबा का दौर सन 632 से 661 तक की अवधि।
3 तार्किक काल :-
तर्कवादी दृष्टिकोण बगदाद (इराक) पश्चिमी अरब तक इस्लाम का फैलाव हिज़री 200 सन 661 से 822 तक की अवधि।
4 स्वर्णिम युग :-
इस्लामिक न्यायवाद का स्वर्णिम युग हिज़री 200 से 450 ईस्वी सन 822 से 1072 तक। इस काल मे 8 (आठ) मुस्लिम न्याय अध्ययन केंद्र प्रारंभ हुये जिनमे तीन शिया व 5 सुन्नी स्कूल्स थे।
अब तक सम्पूर्ण अरब व विश्व के अन्य भागों इस्लाम फैल चुका था व अरब भूमि के अलावा अन्य स्थानों के मुस्लिम समुदाय की समस्याओं से दो.चार होना पड़ा।
5 पंचम काल :-
हिज़री 450 से हिज़री 750 ईस्वी सन 1072 से 1258 के मध्य तक इस्लामी न्यायशास्त्र का विकास काल।
6 अंधेर युग :-
हिज़री सन सातवीं शताब्दी से हिज़री सन 1293 ईस्वी सन 1258 से 1876 तक के काल से 1293 के मध्य में बगदाद का पतन हो गया। इस पतन के कारण मुस्लिम न्यायशास्त्रियों का युग समाप्त प्रायः हो गया जिसे इस्लामिक न्यायशास्त्र का अंधेर युग कहा जाता है।
7 ऑटोमन काल :-
हिज़री सन 1293 के बाद ईस्वी सन 1876 तुर्की सम्राज्य (ऑटोमन सम्राज्य) के स्कूल ऑफ फ़िक़्ह मजल्लाह अल-अहकाम-ए-अदलिया में हनफ़ी न्यायशास्त्र को संहिताबद्ध किया गया।
8 आधुनिक काल : -
आधुनिक इस्लामिक न्यायशास्त्र के युग में पश्चिम के कानून और तकनीकी प्रगति के संपर्क से प्रभावित युग जिसमें इस्लामिक न्याय के न्यायिक सिद्धान्तों के न्यायिक पुनरुद्धार का कालखण्ड रहा है। मशहूर फ़क़ीह मुहम्मद अब्द व अब्दुल रज़्ज़ाक़ संहुरी आधुनिक मुस्लिम न्याय शास्त्री के रूप में विख्यात हैं।
फ़िक़्ह के केंद्र (स्कूल):-
अरबी भाषा मे इन्हें मज़हब कहा जाता है जहां आपराधिक मामले, अर्थशास्त्र, शिष्टाचार, परिवार, स्वच्छ विरासत, वैवाहिक संबंध,सैन्य व राजनीतिक मामले पर उलेमाओं (ज्ञानियों,जानकारों) द्वारा अध्ययन किया जाता है।
A - सुन्नी इस्लाम के स्कूल :-
सुन्नी मुस्लिम फ़िक़्ह के चार केंद्र हैं जिन्हें उनके संस्थापकों के नाम से जाना जाता है।
1 - हनफ़ी :-
( तुर्की , बाल्कन , लेवेंट , मध्य एशिया , भारतीय उपमहाद्वीप , चीन , अलेक्जेंड्रिया, मिस्र और रूस के मुस्लिम समुदाय )
2 - मलिकी :-
उत्तरी अफ्रीका , पश्चिम अफ्रीका और पूर्वी अरब धर्म
3 - शफी'ई :-
कुर्दिस्तान , इंडोनेशिया , मलेशिया , ब्रुनेई , काहिरा , पूर्वी अफ्रीका , दक्षिणी यमन और भारत के दक्षिणी हिस्से )
4 - हनबली :-
सऊदी अरब
B - वहाबी स्कूल:-
1 ज़हीरी ( मोरक्को और पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय ) जरीरी, लैथी, अवजाई, थावरी और कुर्तुबी अब मौजूद नहीं हैं।
C - शिया इस्लाम के स्कूल :-
1 -जाफरी -
ट्वेल्वर शिया - ईरान, अजरबैजान, इराक, लेबनान आदि देशों में।
2 - इस्माइली -
मध्य एशिया , लेवेंट , भारत और पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय
D - जायदी/जैदी -
उत्तरी यमन के मुसलमान जो सुन्नी और शिया दोनों परंपराओं से पूरी तरह से अलग हैं ख्वारिज इस्लाम ने अपना अलग स्कूल विकसित किया है।
E - इबादी -
ओमान में रहने वाले मुस्लिम का एक तबका जो कई फैसलों पर सहमत हैं, पर उन विशेष हदीसों पर भिन्न होते हैं जिन्हें वे प्रामाणिक मानते हैं और वे कठिनाइयों को तय करने में सादृश्य या कारण ( क़ियास ) को महत्व देते हैं।
(इस बारे में विस्तृत चर्चा आगे के लेख में की जावेगी।)
न्याय शास्त्र के सिद्धांत और कार्यप्रणाली में प्रगति
मुस्लिम न्यायशास्त्र के तृतीय काल मे शुरू हुआ जिसे प्रारंभिक मुस्लिम विधिवेत्ता मुहम्मद इब्न इदरीस ऐश-शफी (767-820) ने कुरआन, सुन्नत , इज्मा और क़ियास के आधार पर एक कानून की किताब अररिसालाह लिखी।
उन्होंने अपनी पुस्तक अररिसालाह में इस्लामी न्यायशास्त्र के बुनियादी सिद्धांतों को संहिताबद्ध किया ।
बाद की शताब्दियों में इसे अधिक विकसित और परिष्कृत किया गया जिसमें मुख्य रूप से न्यायिक वरीयता (इतिहसन) पिछले नबियों के कानून (शारा मन कबलाना) निरंतरता (इतिशाब) , विस्तारित सादृश्य (मसलहा मुर्साला), (अल-ज़रियाह), स्थानीय रीति-रिवाज और पैगंबर के एक साथीयों की बातें (कौल ए सहाबा)(क़ियास ) को महत्व देते हुये मुस्लिम कानूनों को अधिक सार्वभौमिक सारगर्भित व व्यवहारिक कानून बनाया गया। इस्लामिक न्याय व्यवस्था को व उसके केंद्रों के सम्बंध में अबु हफ़्स बिन उमर नसाफ़ी जो हनफ़ी स्कूल के न्यायविद थे ने विभिन्न न्याय केंद्रों के मध्य भेद करते हुये लिखा है कि हनफ़ी मज़हब त्रुटि की संभावना के साथ सही है, और दूसरे मज़हब सही होने की संभावना के साथ त्रुटि में है। अर्थात समय व परिस्थिति के साथ व्याख्या करने के भिन्न तरीके के कारण यह दावा नहीं किया जा सकता कि उक्त स्कूल ऑफ फ़िक़्ह गलत है औऱ उक्त सही। दोनों ही गलत हो सकते हैं, दोनों ही सही या एक गलत और एक सही। यह विवेचना के तरीके पर निर्भर करता है।
बाहरी कानूनों पर प्रभाव -
मुस्लिम शासन 100 हिज़री के बाद मक्का व मदीना के क्षेत्र से आगे विस्तार करने लगा। सन 720 में भारत के मुल्तान व लगभग सम्पूर्ण अरब तक इस्लामिक सम्राज्य फैल चुका था। जब दो सभ्यताएं सम्पर्क में आती हैं तो एक दूसरे पर प्रभाव डालती हैं। इसी प्रकार से यूरोप, भारत, अफ्रीका, व अमेरिका तक जब इस्लाम धर्म के मानने वाले फैले तो दोनों ही सभ्यताओं ने सांस्कृतिक आदान-प्रदान किया। मुस्लिम कानून के कुछ हिस्सों ने विश्व न्याय व्यवस्था को प्रभावित किया जैसे-
1 हवाला (रिफरेंस) -
हवाला एक प्रारंभिक अनौपचारिक मूल्य हस्तांतरण प्रणाली , जिसका उल्लेख 8वीं शताब्दी की शुरुआत में इस्लामी न्यायशास्त्र के ग्रंथों में किया गया है। हवाला ने बाद में आम कानून और नागरिक कानूनों जैसे फ्रांस के कानून में अवल और इटली के कानून में अवलो के रूप में काम लिया जाता है।
2 वक़्फ़(प्रोपर्टी ऑफ गॉड) -
इस्लामी कानून में वक्फ (ईश्वर की सम्पत्ति) 7वीं से 9वीं शताब्दी के मध्य विकसित हुआ। यूरोप व शेष विश्व मे यह ट्रस्ट कानून के रूप में काम मे लिया जाने लगा। वक़्फ़ की देख-रेख मकुफ़, मुतवल्ली, क़ाज़ी, और रिफाहे आम की अवधारणा में वक़ूफ़ (सेटलर), मुतवल्ली (ट्रस्टी), क़ाज़ी (जज), व रीफा ए आम (अप्पीलेंट पीपल) की अवधारणा मुस्लिम कानून की ही देन है।
12वीं व 13वीं शताब्दी में इंग्लैंड में धर्मयुद्ध के समय इंग्लैंड में विकसित ट्रस्ट कानून , क्रूसेडर्स (पश्चिमी अरब में इसाई धर्म की रक्षा के लिये लड़ने वाले स्थानीय लड़ाके जिन्हें पॉप का वरदहस्त प्राप्त था।) द्वारा पेश किया गया था जो इस्लामिक कानून से लिये गये थे।
3 लफीफ़ (ज्यूरी) -
किसी भी समस्या या मुक़दमे को निष्पक्ष सुलझाने के लिये बाद क्षेत्र के लोगो का समूह बना कर सुनवाई की जाती है।
सभी बेलिफ़ (ज्यूरी के सदस्य) अपना निष्पक्ष निर्णय मुख्य काज़ी (न्यायाधीश) को बताते हैं, जिसके गुण-अवगुण की व्याख्या करते हुये ज्यूरी फैसला देती है। इसमें अधिकांश लोग मुक़दमे के जानकार या प्रत्यक्षदर्शी होते हैं जो आम जनता में से चुन कर लिये जाते हैं ओर सत्य बोलने की शपथ लेते हैं। इस आधार पर निर्णय करने हेतु क़ाज़ी बाध्य होता है। इसमें वादी व प्रतिवादी को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दे कर न्याय किया जाता है। इंग्लैंड में नॉर्मन (अमीरात व इंग्लैंड को जीतने वाला शासक) ने ज्यूरी (लीफ) को आत्मसात किया जो भारत में बेंच सिस्टम के रूप में कार्यरत है।
4 ऋण अनुबंध (अक़्द) -
इस्लाम में किसी भी प्रकार का लेन-देन करते समय उसे लिख कर अनुबंधित करने की प्रथा रही है जिसमे दो से अधिक व्यक्तियो को गवाह बनाया जाता है। अनुबंध पत्र की प्रति समान रूप से वितरित होती है। जिसे लोन बांड के रूप में सम्पूर्ण विश्व के अर्थशास्त्रीयों ने अपनाया।
5 कानूनी स्कूल्स -
इस्लाम में कानून के अध्ययन के लिये बाकायदा आठ संस्थान काम कर रहे थे जहां प्रवेश के नियम बने हुये थे। इसी आधार पर लॉ कॉलेज (यूरोपीय इन्स ऑफ कोर्ट) व उनमे प्रवेश की अवधारणा को आत्मसात किया गया। यह कार्य पहले इंग्लैंड ने किये बाद में शेष विश्व ने आत्मसात किये। इसी प्रकार से वहां शिक्षण करवाने के लिये (यूरोपीय कमेंडा,इस्लामिक किराद) भी इस्लामिक लॉ से ही लिये गये हैं।
इसके अलावा जिरह(तर्क) (बहस),मिसाल (हवाला) (रिफरेंस),नज़ीर(ऐसे ही किसी मशले पर पहले किसी अन्य न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय) इस्लामिक न्याय प्रणाली से ही लिये गये हैं।
इस्लामी कानून ने सम्पूर्ण विश्व के कानूनों को एकीकृत कर आम कानून बनाने की नींव रखी। दरअसल इंग्लैंड के नॉर्मन द्वारा इंग्लैंड और सिसली के अमीरात की विजय के बाद और क्रूसेड्स के दौरान क्रूसेडर्स द्वारा इंग्लैंड में लागु किये गये।
विश्व के कानूनों का इस्लामिक कानूनों पर प्रभाव -
हम बात कर चुके हैं कि जब दो सभ्यताओं के मेल होता है तो दोनों ही आपस में सांस्कृतिक आदान-प्रदान करते हैं। इसी आधार पर मुस्लिम लॉ पर भी अन्य संस्कृतियों का प्रभाव पड़ा।
1 स्त्रियों का घर से बाहर निकलना व मर्दों के साथ कार्य करना जैसे ड्राइविंग आदि।
2 गुलाम प्रथा का उन्मूलन
3 अरब के लोगों में सर्वश्रेष्ठ होने के भाव का उन्मूलन।
4 तश्वीर खिंचवाना व बनवाना।
5 संगीत
6 श्रव्य दृश्य साधनों का उपयोग
फतवा -
मुस्लिम न्याय व्यवस्था के अंतर्गत फ़िक़्ह व शरीयत अनुसार किसी भी मुद्दे, मुक़दमे व मामले की सुनवाई कर मुफ़्ती द्वारा दिये जाने वाले फैसले को फतवा कहते हैं।
फतवा गैर बाध्यकारी फैसला होता है अर्थात कानूनी मिसालों के रूप में अदालती फैसलों का उपयोग करते हुए कानूनी सवालों के इस्लामी कानूनी विद्वानों (मुफ्ती) द्वारा गैर-बाध्यकारी उत्तर फ़तवा कहलाता है। फ़तवा में किसी उलझन या मशले पर स्पष्ट दर्शन या उत्तर दिखाई न दे या प्रश्नकर्ता किसी भी मामले को प्रश्न पूछकर स्पष्ट करना चाहे तो फ़तवा के माध्यम से स्पष्ट शब्दों में चुने हुये विषय पर निर्णायक व्यवस्था की जानकारी लिखित में ले सकता है, यही फ़तवा है। इस्लामिक न्यायालय दारुल क़ज़ात के पूर्व निर्णयों को सन्दर्भित करते हुये या क़यास व शरीयत के अनुसार कुरआन व हदीष की रौशनी में वर्तमान समय मे आने वाली समस्या के समाधान की क्रिया ही फ़तवा है। जैसे इस्लाम धर्म मे फोटो खिंचवाना मना है परन्तु आजकल पासपोर्ट व अन्य कानूनी/शिक्षा/व्यक्तिगत दस्तावेज में फोटो की ज़रूरत होती है जिस पर कुरआन व हदीष में पूर्णतया मनाही है। व्यक्तिगत दस्तावेज बनवाने भी ज़रूरी हैं तो इस स्थिति पर स्पष्ट निर्णय लेने के लिये फतवा लिया जाता है। मुफ़्ती के निर्णयानुसार व्यक्तिगत दस्तावेज व हुकूमत (सरकार) के दस्तावेजों में आवश्यकतानुसार फोटो खिंचवाना गुनाह (पाप) नहीं है। इस प्रकार से कई बार ऐसे मामले प्रत्यक्ष हो जाते हैं जहाँ क़ज़ात (इस्लामिक न्यायालय) कोई व्यवस्था नहीं दे पाता हो तो आंशिक राहत के लिये समस्या विशेष के संदर्भ में ही फ़तवा जारी किया जा सकता है। मुस्लिम समुदाय के यूरोप व अन्य देशों के सम्पर्क व अरब के अलावा अन्य संस्कृति वाले क्षेत्रों में इस्लामिक राज्यों की स्थापना के कारण अरब संस्कृति के नियमों के विपरीत परिस्थितियों का निर्माण हुआ जिनका स्थानीय प्रशासन व परिस्थितियों के अनुसार ही समाधान आवश्यक हो जाता है की समस्या के समाधान हेतु फ़तवा जारी किया जाता है। यह व्यवस्था मुहम्मद साहब के समय से ही रही है जिनकी चर्चा हदीष व कुरआन में है पर शेष विश्व से हुये सम्पर्क के कारण फतवे की शुरुआत आटोमन सम्राज्य (अरतगुल गाज़ी) (तुर्की) काई कबीले की खिलाफत (उस्मानिया) के आखरी दौर में शुरू हुई जिस पर रोमन प्रणाली का असर दृष्टिगत होता है।
नये दौर में इस्लामिक न्याय व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश -
हम पहले चर्चा कर चुके हैं कि समय काल व परिस्थितियों के अनुसार सभी समुदायों, धर्मों व राज्यों को नियम व उपनियम अपडेट करने पड़ते हैं। इसके साथ ही हम जिस स्थान पर स्थाई या अस्थायी रूप से निवास करते हैं तो कुछ व्यवस्था के अनुसार हम व कुछ हमारे अनुसार स्थानीय व्यवस्था में परिवर्तन होना निश्चित है।
इस्लाम का उदय अरब में हुआ जहां की सभ्यता व संस्कृति खानपान, रहनसहन, वेषभूषा व आचरण अन्य स्थानों से भिन्न है। आवश्यक नहीं कि किसी अन्य राष्ट्र के निवासियों ने इस्लाम धर्म तो ग्रहण किया पर स्थानीय संस्कृति को छोड़ दे। जैसे अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया व अफ्रीका के लोगों ने इस्लाम धर्म तो अपनाया पर पहनावा नहीं बदला जिस का असर यह हुआ कि अरब के लोग भी पेंट, शर्ट व कोट पहनने लगे जबकि यह पहनावा उनका नहीं है व अन्य देश के लोग अरब के विशेष तौलिया (अरब स्टाइल टर्बन) ओढ़ने लगे यही आदान-प्रदान है। आज से 1400 साल पहले की स्थितियां बदल गई हैं, जिनके बारे में हम खूब जानते हैं। संचार क्रांति ने समस्त विश्व को विश्व राष्ट्र के रूप में जोड़ दिया है जहां समाज व सामाजिक व्यवस्था अधिक जटिल होती जा रही हैं।
कुछ पुरानी परम्परा समाप्त हो रही हैं तो कुछ नई परंपराएं जन्म ले रही हैं। समय के साथ बदलाव व अपडेशन ज़रूरत की बात है। इस आधार पर इस्लाम धर्म के विचारकों के दो मत हैं कुछ बदलाव के पक्ष में है और कुछ किसी भी हाल में पुरानी परंपरा व व्यस्थाओं को बदलने के पक्ष में नही हैं।
इस्लामिक न्याय व्यवस्था में सुधार के पक्ष और विपक्ष में तर्क -
इस्लाम धर्म मे कई फिरके (मत) व्याप्त हैं जो कुरआन व हदीष की व्याख्या पृथक-पृथक करते हैं।
सुन्नी व शिया समुदाय में व इनके अलावा अन्य फिरकों के मत उनके विचारकों (इमाम) के द्वारा की गई व्याख्या के आधार पर धर्म का पालन करते हैं।
कानून की भूमिका
कानून प्रासंगिक हों जो समय, स्थान और संस्कृति जैसी परिस्थितियों के अनुसार विचार कर सिद्धांतों का निर्माण परिवर्धन, परिवर्तन समाहितिकरण या पृथक्करण करता है। यह आधारित हैं न्याय, समानता और सम्मान जैसे सार्वभौमिक लक्ष्यों की प्राप्ति पर। तकनीक व मानव व्यवहार के साथ-साथ कानून में भी बदलाव आना स्वाभाविक है।
बदलाव के विपक्ष में
एकेश्वरवाद व इस्लाम की मूल भावना के अलावा कई विभेद इनमें पाये जाते हैं। इस्लामिक न्यायालय, इसनद, व पुराने फैसलों को जमा कर उनकी तक़लीद ही महत्वपूर्ण रह गई जबकि विश्व संस्कृति में तेजी से बदलाव आ रहा है। कुछ विचारक व फिरके इसमें बदलाव के स्थान पर आज से 1400 साल पुराने नियमो के अनुसार ही इस्लामिक व्यवस्था व न्यायालय का संचालन करना चाहते हैं व शरीयत, फ़िक़्ह,कयास व फ़तवा में परिवर्तन को गैर-इस्लामिक मानते हैं। बदलाव के विपक्षी लोगों का मानना है कि मोहम्मद साहब के बाद किसी भी बात, नियम व व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता औऱ अगर किया गया तो इसे बिद्दत( बढ़ावा देना) की श्रेणी में मान लिया जावेगा। इस पक्ष के अधिकांश लोग रूढ़िवादी लोग है।
बदलाव के पक्ष में तर्क़ :-
वास्तव में धर्म का विकास व प्रादुर्भाव मानव जीवन को आसान व संपन्न बना था जिसके अधीन व्यक्ति संयमित व्यवहार के साथ जीवन निर्वाह कर सके। धर्म का मुख्य उद्देश्य है मानव व्यवहार को विनियमित करे और लोगों के नैतिक पक्ष का पोषण करे। सदियों पुरानी व्यवस्था आज बदल चुकी है जो वर्तमान में मौजूद नहीं है। और चूंकि इस्लाम की शुरुआत के बाद से मानव स्वभाव में मौलिक व आमूलचूल रूप से बदलाव आया है जिसके अनुसार ही न्याय व्यवस्था को अपडेट करना आवश्यक हो गया है।
इलाम के शुरुआत में जीवन की आवश्यकताये संक्षिप्त व स्थानीय थीं जो आज पूर्णतया बदल गईं हैं इसके लिए आधुनिक दुनिया के लिए उपयुक्त एक नया फ़िक़्ह तैयार करने की आवश्यकता है।
कुछ प्रश्न और उनके उत्तर...
प्रश्न 1. जन्नत (स्वर्ग) कहाँ है ?
उत्तर - जन्नत सातों आसमानों के ऊपर और पृथक है क्योंकि सातों आसमान क़यामत के दिन समाप्य हैं। परंतु जन्नत लाफानी (अनश्वर) है।
प्रश्न 2 - जहन्नम (नरक) कहाँ है ?
उत्तर - जहन्नम सातों ज़मीनों के नीचे सिज्जिन नाम की जगह पर है जो (अनश्वर) है जो जन्नत से हम किनार नहीं है। हमारी धरती पहली है के अलावा इस से नीचे की तरफ पृथक रूप से छह धरतियां और हैं।
प्रश्न 3 - सिदरतल मुंतहा क्या है ?
उत्तर - सिदरत अरबी में बेरी के पेड़ को कहते हैं और अलमुन्तही का अर्थ अंतिम सीमा। अर्श पर बेरी का दरख़्त मख़लूक़ की अंतिम सीमा है, इसके आगे फरिश्ते जिब्राइल भी नहीं जा सकते हैं। इस पेड़ की जड़ें छटे आसमान में और ऊँचाई सातवें आसमान तक है जिसके पत्ते हाथी के कान और फ़ल बड़े घड़े जैसे हैं। इस पर सुनहरी तितलियां मंडलाती हैं। यह पेड़ जन्नत से बाहर है जहां मुहम्मद साहब की जिब्राइल (फरिश्ते) से दूसरी बार भेंट हुई।
प्रश्न 4. - हुरेईन कौन हैं ?
उत्तर - हुरेईन जन्नत में मोमिन की पत्नियां होंगी जो इंसान/जिन/फ़रिश्ते नहीं हैं। हूर शब्द का अर्थ है सफेद आंखों में काली पुतलियों वाली और शब्द इन (आईना का बहुवचन) का अर्थ बड़ी आंखें वाली स्त्री है।
प्रश्न 5 - विलदान मुख़लदून कौन हैं?
उत्तर - जन्नत के ख़ादिम (सेवक) हैं इंसान/जिन/फ़रिश्ते नहीं हैं जो हमेशा एक ही उम्र के (बच्चे) ही रहेंगे। अलविलदान अलमुख़लदुन (जन्नतियों के सेवक) कहा जाता है। निम्नतम श्रेणी के जन्नती को दस हज़ार विलदान मुख़लदुन मिलेंगे।
प्रश्न 6 अरफ़ा क्या है ?
उत्तर - शब्द अरफा का अर्थ है बीच का (सीमांत)। जन्नत जहन्नम के बीच चौड़ी सीमा को अरफ़ा कहते हैं। जिन लोगों की अच्छाइयां और बुराइयां बराबर होंगी वो यहां फैसला होने तक यहां रहेंगे। इन्हें वहाँ भी खाने पीने के लिए दिया जाएगा।
प्रश्न 7 - क़यामत के दिन की लम्बाई कितनी है?
उत्तर - पचास हज़ार साल के बराबर एक दिन। इसके पचास युग (मोकफ) होंगे और हर युग हज़ार साल का होगा। कयामत के दिन रिश्तेदार याद रहेंगे पर तीन जगह कोई याद नहीं रहेगा -
1.जब किसी के आमाल (कर्म) तोले जाएंगे।
2.जब नामाए आमाल (कर्मों का परिणाम) दिए जाएंगे
3.जब पुलसिरात पर होंगे
प्रश्न 8 -पुल अल सिरात (पुल सीरात) क्या है ?
उत्तर - पुल का अर्थ ब्रिज और सिरात का अर्थ रास्ता।जन्नत में जाने का जहन्नम के ऊपर से गुजरने वाला रास्ता जो घुप अंधेर में कांटेदार बाल से बारीक और तलवार की धार से तेज होगा। अच्छे लोग हल्के होंगे और आराम से पार हो जायेंगे, जबकि बुरे लोगों की पीठ पर उनके कर्म होंगे जिससे वो इसे पार नहीं कर पाएंगे और जहन्नम में चीखते हुए गिर जायेंगे। इसे पार करने पर मुहम्मद साहब मिलेंगे और जन्नत में स्वागत करेंगे।
शमशेर भालू खां
जिगर चूरूवी
9587243963

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