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✅धनेड़ा की मस्जिद (पंडितों द्वारा निर्मित)

धनेड़ा की मजीद और ब्राह्मण की बेटी 
मुगल और राजपूत - 
राजपूत और मुगलों के संबंध 
क्या है इतिहास आइए विस्तार से बताता हूं

एक नजर।

जनवरी 1562- राजा भारमल की बेटी से अकबर की शादी (कछवाहा-अंबेर)

- 15 नवंबर 1570- राय कल्याण सिंह की भतीजी से अकबर की शादी (राठौर-बीकानेर)

- 1570- मालदेव की बेटी रुक्मावती का अकबर से विवाह (राठौर-जोधपुर)

- 1573 - नगरकोट के राजा जयचंद की बेटी से अकबर की शादी (नगरकोट)

- मार्च 1577- डूंगरपुर के रावल की बेटी से अकबर का विवाह (गहलोत-डूंगरपुर)

1581- केशवदास की बेटी की अकबर से शादी (राठौर-मोरता)

- 16 फरवरी, 1584- भगवंत दास की बेटी से राजकुमार सलीम (जहांगीर) की शादी

(कछवाहा-आंबेर)

1587- जोधपुर के मोटा राजा की बेटी से जहांगीर का विवाह (राठौर-जोधपुर)

- 2 अक्टूबर 1595- रायमल की बेटी से अकबर के बेटे दानियाल का विवाह (राठौर-जोधपुर)
: 28 मई 1608- राजा जगत सिंह की बेटी से जहांगीर की शादी (कछवाहा-आंबेर)

- 1 फरवरी, 1609- रामचंद्र बुंदेला की बेटी से जहांगीर का विवाह (बुंदेला, ओरछा)

- अप्रैल 1624- राजा गजसिंह की बहन से जहांगीर के बेटे राजकुमार परवेज की शादी (राठौर-जोधपुर)

- 1654- राजा अमर सिंह की बेटी से दाराशिकोह के बेटे सुलेमान की शादी (राठौर-नागौर)

- 17 नवंबर 1661- किशनगढ़ के राजा रूपसिंह राठौर की बेटी से औरंगज़ेब के बेटे मो. मुअज़म की शादी (राठौर-किशनगढ़)

- 5 जुलाई 1678- राजा जयसिंह के बेटे कीरत सिंह की बेटी से औरंगज़ेब के बेटे मो. आज़म की शादी (कछवाहा-आंबेर)

- 30 जुलाई 1681- अमरचंद की बेटी औरंगज़ेब के बेटे कामबख्श की शादी (शेखावत-मनोहरपुर)

कई राजपूत बच्चों ने पाई गद्दी

1587 में जहांगीर और मोटा राजा की बेटी जगत गोसांई की शादी हुई, जिससे 5 जनवरी 1592 को लाहौर में शाहजहां पैदा हुआ. अकबर ने जन्म के छठे दिन खुशी में उसका नाम खुर्रम (खुशी) रखा. जहांगीर की पत्नी: नूरजहां का काफ़ी ज़िक्र होता है पर शेर के हमले से उन्हें असल में उनकी राजपूत बीवी जगत गोसाईं ने ही बचाया था. तुजुक-ए-जहांगीरी के मुताबिक़ उन्होंने पिस्तौल भरकर शेर पर चलाई, जिसके बाद जहांगीर की जान बची. नूरजहां ने इसके बाद ख़ुद शिकार करना सीखा. यानी शाहजहां के बेटे औरंगज़ेब की दादी एक राजपूत थी. ग़ौरतलब यह भी है कि मुग़लों और राजपूतों के बीच शादियां औरंगज़ेब के समय भी जारी रहीं. ख़ुद औरंगज़ेब की दो पत्नियां हिंदू थीं. और उनसे पैदा हुए बच्चे कई बार बाक़ायदा उत्तराधिकार की जंग में जीते।
मुग़लों को मुसलमान कहना ही ग़लत' क्लीनिकल इम्यूनोलॉजिस्ट डॉ. स्कंद शुक्ला कहते हैं कि मुग़ल बादशाहों और राजपूत रानियों से पैदा होने वाली संतानें दरअसल आधी राजपूत होंगी।

औरंगजेब के बारे में कुछ भी कहा जाए, लेकिन था वो अजेय योद्धा!
15 साल की उम्र में पागल हाथी से लड़ाई हो या गुजरात का चार्ज, हर जगह शाहजहां की उम्मीद पर खरा उतरा।
सीढी दर सीढी चढ, वो सत्ता के शिखर तक पहुंचा।
मुग़ल बादशाह शाहजहां बूढ़ा हो चला था।शासन पर ध्यान देने के बदले बड़ी बड़ी इमारतें बनाने और अपने चमचों को दान दक्षिणा देने में सरकारी ख़जाने लुटाये जा रहा था।
ऐसे में उसके सबसे क़ाबिल शहज़ादे ने, उसको बा-ईज़्ज़त गद्दी से Retire करके मार्गदर्शक मंडल (लाल क़िला-आगरा) में बैठा दिया।काका आडवाणी और पंडित मुरली मनोहर जोशी को मार्गदर्शक में देखकर ख़ुश होने वाले, शाहजहां की याद में टसुवे बहाते हैं,कमाल है!!
औरंगजेब सबको एक ही लाठी से हाकँता था।
अपने बाप और बेटे, दोनों को समान रूप से ठिकाने लगाया।
हिंदू हो या मुसलमान सबको टैक्स के दायरे में लिया।
शाहजहां को Retire करने के बाद औरंगज़ेब ने देश के ख़ाली हो चुके ख़ज़ाने और डूबती हुई इकॉनमी को दुबारा खड़ा किया।
औरंगज़ेब ने 93 साल की उम्र में अपनी Natural Death होने तक राज किया।
उसपर इल्ज़ाम है कि उसने अपने भाई दाराशिकोह को मरवाया. बिल्कुल मरवाया।
पहले भाई-भाई हुकूमत के लिये एक दूसरे से लड़ा करते ही थे।
सम्राट अशोक और पांडवों ने राज के लिए अपने भाईयों को नहीं मरवाया ?
दाराशिकोह, औरंगज़ेब को मारने ही फ़ौज लेके आया था।वो नहीं मरता, तो औरंगज़ेब मरता!
औरंगजेब में ईमानदारी इतनी थी कि कभी सरकारी खजाने को निजी खर्च के लिए हाथ न लगाया. अपने भोजन की एवज म़े वो टोपी बुनता, चक्की चलाता या अन्य छोटे-मोटे काम करता।
फ्री का खाना हराम था उसके लिए!
वो इतना क़ाबिल हुकुमरान था कि इस बुढ़ापे में भी, उसने 50 सालों तक, देश पर सबसे लंबा राज किया।
उसका शासन आजतक का भारत का सबसे बड़ा- (अफ़्ग़ानिस्तान से लेकर बर्मा और कश्मीर से लेकर केरल तक)- शासन था।
यह औरंगज़ेब का सफ़ल नेतृत्व और Administrative capabilities ही थीं, जो उसने अपने बाप दादा के अय्याशी भरे जीवन के बाद, डूबती सल्तनत को, दुबारा खड़ा किया।
औरंगज़ेब के वक़्त भारत की GDP पूरी दुनियाँ की 25% के बराबर थी, जबकि भारत को लूटकर, जब अँग्रेज़ों ने 1947 में इसे छोड़ा, तब हमारी GDP, दुनियाँ की सिर्फ़ 4% ही बची थी!

Islamophobia से ग्रसित लोग फिर भी, अभी अँग्रेज़ों के तलुवे चाटते हुये और औरंगज़ेब को बुरा भला कहते मिलेंगे।
साभार- प्रोफेसर अरुणकुमार मिश्रा
औरंगजेब की हुकूमत में काशी (बनारस) में एक पंडित की लड़की थी जिसका नाम शकुंतला था. उस लड़की को एक मुसलमान सेनापति ने अपनी हवस का शिकार बनाना चाहा और उसके बाप से कहा “अपनी बेटी को डोली में सजा कर मेरे महल में 7 दिन में भेज देना”।
पंडित ने यह बात अपनी बेटी से कही. उनके पास कोई रास्ता नहीं था. बेटी ने पिता से कहा 1 महीने का वक़्त ले लो कोई भी रास्ता निकल जाएगा।
पंडित ने सेनापति से जाकर कहा मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि मैं 7 दिन में सजाकर लड़की को भेज सकूँ मुझे एक महीने का वक़्त दे दो. सेनापति ने कहा ठीक महीने के बाद भेज देना।
पंडित ने अपनी लड़की से जाकर कहा वक़्त मिल गया है, अब? लड़की ने मुग़ल शहज़ादे का लिबास पहना और अपनी सवारी को लेकर दिल्ली की तरफ़ निकल गई, कुछ दिनों के बाद दिल्ली पहुँची, तो वह दिन जुमे का दिन था।
जुमे के दिन औरंगजेब नमाज़ के बाद लोगों की फ़रियाद सुनते थे इसलिए मस्जिद की सीढियों के दोनों तरफ़ फरियादी खड़े रहते थे. औरंगजेब वो चिट्ठियाँ उनके हाथ से लेते जाते और फिर कुछ दिनों में फैसला सुनाते।
वो लड़की (शकुंतला) भी इस क़तार में जाकर खड़ी हो गयी. उसके चहरे पे नकाब था, और लड़के का लिबास (ड्रेस) पहना हुआ था, जब उसके हाथ से चिट्ठी लेने की बारी आई, तब हज़रत औरंगजेब आलमगीर ने अपने हाथ पर एक कपड़ा डालकर उसके हाथ से चिट्ठी ली।
तब लड़की बोली महाराज, मेरे साथ यह नाइंसाफी क्यों? सब लोगों से आपने सीधे तरीके से चिट्ठी ली और मुझ से हाथों पर कपड़ा रख कर? तब औरंगजेब ने कहा इस्लाम में ग़ैर मेहरम (पराई औरतों) को हाथ लगाना भी हराम है और मैं जानता हूँ तू लड़का नहीं लड़की है।
शकुंतला बादशाह के साथ कुछ दिन तक ठहरी और अपनी फरियाद सुनाई. औरंगजेब आलमगीर ने उससे कहा बेटी, तू लौट जा तेरी डोली सेनापति के महल पहुँचेगी अपने वक़्त पर।
शकुंतला सोच में पड़ गयी कि यह क्या? वो अपने घर लौटी और उसके पिता (पंडित) ने पूछा क्या हुआ बेटी? वो बोली एक ही रास्ता था, मै हिन्दोस्तान के बादशाह के पास गयी थी, लेकिन उन्होंने भी ऐसा ही कहा कि डोली उठेगी, लेकिन मेरे दिल में एक उम्मीद की किरण है, वो ये है कि मैं जितने दिन वहाँ रुकी बादशाह ने मुझे 15 बार बेटी कह कर पुकारा था और एक बाप अपनी बेटी की इज्ज़त नीलाम नहीं होने देगा।
फिर वह दिन आया जिस दिन शकुंतला की डोली सज–धज के सेनापति के महल पहुँची. सेनापति ने डोली देख के अपनी अय्याशी की ख़ुशी में फकीरों पर पैसे लुटाना शुरू किया. जब वह पैसे लुटा रहा था, तब एक कम्बल-पोश फ़क़ीर जिसने अपने चेहरे पे कम्बल ओढ रखा था. उसने कहा मैं ऐसा-वैसा फकीर नहीं हूँ, मेरे हाथ में पैसे दे. सेनापति ने जैसे ही हाथ में पैसे दिए उसी वक्त उन्होंने अपने मुह से कम्बल हटाया तो सेनापति देखकर हक्का बक्का रह गया. क्योंकि उस कंबल में कोई फ़क़ीर नहीं बल्कि औरंगजेब खुद थे।
उन्होंने कहा तेरा एक पंडित की लड़की की इज्ज़त पे हाथ डालना मुसलमानो की हुकूमत पे दाग लगा सकता है और औरंगजेब आलमगीर ने इंसाफ सुनाया।
4 हाथी मंगवा कर सेनापति के दोनों हाथ और पैर बाँध कर अलग अलग दिशा में हाथियों को दौड़ा दिया गया और सेनापति को चीर दिया गया. फिर उन्होंने पंडित के घर पर बने चबूतरे पर दो रकात नमाज़ अदा की और दुआ कि ऐ अल्लाह, मैं तेरा शुक्रगुजार हूँ, कि तूने मुझे एक ग़ैर इस्लामिक लड़की की इज्ज़त बचाने के लिए और इंसाफ करने के लिए चुना।
फिर औरंगजेब ने कहा बेटी एक ग्लास पानी लाना. लड़की पानी लेकर आई, तब उन्होंने कहा जिस दिन दिल्ली में मैंने तेरी फरियाद सुनी थी, उस दिन से मैंने क़सम खायी थी के जब तक तेरे साथ इंसाफ नहीं होगा पानी नहीं पिऊंगा. तब शकुंतला के पिता और बनारस के दूसरे हिन्दू भाइयों ने उस चबूतरे के पास एक मस्जिद तामीर की, जिसका नाम “धनेड़ा की मस्जिद” रखा गया।
और पंडितों ने ऐलान किया कि ये बादशाह औरंगजेब आलमगीर के इंसाफ की ख़ुशी में हमारी तरफ़ से इनाम है और सेनापति को जो सज़ा दी गई वो इंसाफ़ एक सोने की तख़्त पर लिखा गया था, जो आज भी धनेड़ा की मस्जिद में मौजूद है।

काशी विश्वनाथ मंदिर औरंगजेब ने तुड़वाने की कहानी -
बनारस में काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने के संबंध में पी. सीताराम नाथ ने सबसे महत्वपूर्ण तथ्य का उल्लेख किया है 
इसके अलावा वी.एन पांडे ने भी इस पर लेख और शोध लिखे है।
उनके अनुसार.... कच्छ की आठ रानियां काशी विश्वनाथ के दर्शन करने गई, जिसमें से एक सबसे सुंदर रानी का वहां के महंत ने अपहरण कर लिया ।
औरंगजेब को इसकी जानकारी कच्छ के राजा द्वारा दी गई तो औरंगजेब ने शुरू में यह कहकर टाल दिया कि वह हिंदुओं के बीच का आपसी मामला है । जब कच्छ के राजा द्वारा औरंगज़ेब से बार-बार कहा गया तब औरंगजेब ने तथ्य का पता लगाने के लिए सबसे पहले कुछ हिंदू सैनिकों को ही वहां भेजा ।
लेकिन महंत के आदमियों ने औरंगजेब के सैनिकों को डांट फटकार कर भगा दिया
औरंगजेब तक यह बात पहुंची, तो उसने एक पूरे सैनिक दस्ते को भेजा, मंदिर के पुजारियों ने इसका भी डटकर विरोध किया । आखिर में सैनिकों ने मुकाबला किया और मंदिर में प्रवेश करके खोई हुई रानी की तलाश करने लगे ।
सैनिकों को मुख्य देवता की मूर्ति के पीछे एक सुरंग का पता चला जिससे काफी गंध निकाल रही थी । दो दिनों तक दवा छिड़ककर गंध समाप्त किया गया । तीसरे दिन सैनिकों ने सुरंग के भीतर प्रवेश करके वहां से बहुत से नर कंकाल प्राप्त किए, जो स्त्रियों के थे ।
वहां, कच्छ की खोई हुई रानी की भी लाश भी मिली जो नग्न थी । और सामूहिक बलात्कार के कारण वह मर चुकी थी ।
प्रधान महंत गिरफ्तार किया गया और उसे कड़ी सजा मिली
इस घटना ने हिंदुत्व के असली चेहरे को उजागर किया । हिंदू महंतों ने हिंदू राजा की रानी के साथ दुराचार कर मार डाला ।
इसके बाद औरंगजेब ने मंदिर तोड़ने का आदेश दिया ।
संदर्भ- पिछड़ा वर्ग क्यों और कैसे कहे कि हम हिंदू हैं?
लेखक- दयाराम
पेज- 45-46
इस घटना को बहुत से इतिहासकारों और लेखकों ने लिखा है, 
मशहूर इतिहासकार डॉक्टर विश्वंभर नाथ पांडेय के अनुसार 
जब रानी मिली उस वक्त तो वो मृत नहीं जिंदा थी, और उसने अपने सामुहिक बलात्कार की बात औरंगजेब को बताई थी।
जब औरंगज़ेब को पंडितो की यह करतूत पता चली तो वह बहुत क्रुद्ध हुआ और बोला कि जहां मंदिर के गर्भ गृह के नीचे इस प्रकार की डकैती और बलात्कार हो, वो निस्संदेह ईश्वर का घर नहीं हो सकता. उसने मंदिर को तुरंत ध्वस्त करने का आदेश जारी कर दिया.'
इतिहासकार - विश्वंभर नाथ पांडेय (पूर्व गवर्नर उड़ीसा )
किताब - 'भारतीय संस्कृति, मुग़ल विरासत: औरंगज़ेब के फ़रमान'
पेज नंबर 119 और 120 में पट्टाभिसीतारमैया की किताब 'फ़ेदर्स एंड स्टोन्स' का रेफेरेंस देते हुए भी विश्वंभर नाथ पांडेय विश्वनाथ मंदिर को तोड़े जाने के बारे में बताते हैं ।
किसी भी इतिहासकार की माने तो, काशी विश्वनाथ मंदिर को इसलिए तोड़ा गया क्यूंकि वो शोषण, अत्याचार, दुराचार और अनैतिकता का अड्डा बन चुका था ।

पुरन्दर की संधि महान मराठा छत्रपति शिवाजी एवं मुगल सम्राट औरंगजेब के मध्य 1665 ईस्वी में सम्पन्न हुई थी.

यहां इस तथ्य को रेखांकित करना प्रासंगिक होगा कि आमेर के यशस्वी शासक मिर्जा राजा जयसिंह ने पुरन्दर की संधि करने के लिए छत्रपति शिवाजी को विवश किया था, जब उनके नेतृत्व में मुगल सेना ने रायगढ को घेर लिया था. 
वस्तुत: इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि हमारे देश के मध्यकालीन इतिहास में राजनैतिक वर्चस्व स्थापित करने की कथित जद्दोजहद में धर्म कभी उत्प्रेरक नहीं रहा है. 

इसी अनुसरण में उक्त तथ्य को उद्घाटित करना अपेक्षित होगा कि धार्मिक दृष्टि से उदार मुगल सम्राट अकबर के दरबार में 32 हिन्दू मनसबदार पदस्थ थे, जबकि धार्मिक दृष्टि से अनुदार मुगल सम्राट औरंगजेब के दरबार में 104 हिन्दू मनसबदार मुगल सत्ता के लिए सैन्य सेवाऐं देते हुए गौरवान्वित महसूस कर रहे थे. 

बाबर को भारत किस ने बुलाया - 
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जब इब्राहिम लोदी का साम्राज्य कमजोर होता जा रहा था, तब देश की रियासतें ताकत पकड़ने लगी थी। इस उथल-पुथल के दौर में मेवाड़ के शासक राणा सांगा स्वयं भारत का सम्राट बनने की चाहत रखने लगा था। उसको छोटी-छोटी 30-35 रियासतों का सहयोग भी प्राप्त हो गया था। लेकिन, देश की बाकी रियासतें राणा सांगा को अपना नेता नहीं मान रहीं थीं। ऐसी स्थिति में राणा सांगा का सम्राट बनना असंभव था। वह इब्राहिम लोधी को खुद हरा पाने में असमर्थ था।
बाबर अपने बाबरनामा में लिखता हैं कि जब हम काबुल में थे तब राणा सांगा ने खैर ख़्वाही के लिए अपना दूत भेजकर यह बात ठहराईं थी कि जब समरकंद का बादशाह उधर से दिल्ली तक आ जायेंगे तो मैं आगरा की तरफ़ कूंच करूंगा।
इस बाबरनामा का हिंदी तर्जुमा जोधपुर राज्य के मुंशिफ देवी प्रसाद कायस्थ ने किया है। इस बात की पुष्टि गजेटियर तथा मध्यकालीन भारत का इतिहास के लेखक वीडी महाजन तथा अन्य इतिहासकारों ने भी की है। सरकारी परीक्षाओं में भी इससे संबंधित पूछें गये प्रश्नों से भी इस बात की पुष्टि होती है।
समरकंद से चलकर बाबर अपने बीस हजार सैनिकों व तोपखाने के साथ 21 अप्रैल 1526ई० को पानीपत आ पहुंचा, यहां इब्राहीम लोदी के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में रेवाड़ी के शासक हरचंद राव व मेवात के शासक हसन खां के लिए बाबर व लोदी दोनों विदेशी थे। एक और नये विदेशी के भारत में पैर जमना इन दोनों शासकों को मंजूर नहीं था। इसे दृष्टिगत रखते हुए हरचंद राव व हसन खां ने लोदी का साथ दिया। पानीपत के मैदान में दोनों सेनाओं का भीषण युद्ध हुआ, राणा सांगा ने इस युद्ध से दूरी बनाए रखी। इस बात का जिक्र भी बाबर अपने बाबरनामा में करता है कि मैंने इब्राहिम को जेर करके दिल्ली और आगरा लें लिया, तब तक भी राणा की तरफ से कोई हरकत जाहिर नहीं हुईं।
इस बात का लाभ उठाकर वापस समरकंद जाने की बजाय बाबर दिल्ली का बादशाह बन बैठा।
अहिरात व मेवात में अपने खिलाफ बग़ावत की आग को दबाने के लिए बाबर ने इन्हें अपने निशाने पर लिया।
17 मार्च 1527ई० में खानवा के मैदान में बाबर से हरचंद राव व हसन खां मेवाती की सेनाओं का बाबर की सेना से फिर भीषण युद्ध हुआ। आखिर, अपनी व्यूह रचना में नाकामी देख राणा सांगा इस युद्ध में बाबर के खिलाफ शामिल हुआं। इस भीषण युद्ध में अपनी अपनी सेनाओं के साथ हरचंद राव व हसन खां मेवाती शहीद हो गए तथा राणा सांगा जख्मी हुआ। राणा के सैनिक जख्मी राणा को सुरक्षित स्थान पर ले गए।
बाबर ने अपनी जीत के बाद अहिरात व मेवात को पूरी तरह रौंद डाला।

शमशेर भालू खां 
 9587243963

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