Skip to main content

खान अब्दुल गफ्फार खान

खान अब्दुल गफ्फार खान 
हिन्दूस्तान जैसा वतन दुनियां में और नहीं है,
बाचा खान जैसा रतन दुनियां में और नहीं है।

आओ सच्चे खुदाई खिदमतगार बनें ! मगर कैसे?

सीमांत गांधी जी के बताए रास्ते पर चलकर।
क्या उनके दिखाए रास्ते पर चल कर हम असली खुदाई खिदमतगार बन सकते हैं ?
अगर नहीं तो खुद भी जानें और दूसरों को भी बतायें, समझें और समझायें, आपस में विस्तार से चर्चा करके कि कैसे हम खुदाई खिदमतगार बन सकते हैं। कैसे हम आपसी भाईचारा बना कर आपस में एकजुटता से रह सकते हैं। हम आने वाली पीढ़ियों को विरासत में क्या दे कर जा रहे हैं।
आओ आज हम यह सोचें कि हम खुद को बहुत बड़ा समझते हैं और बड़े होना चाहते हैं क्या एक दूसरे को नीचा दिखा कर हम बड़े हो सकते हैं। अगर हम वास्तव में बड़े बनना चाहते हैं तो हमें दिल भी बड़ा रखना/करना पड़ेगा। आओ सच्चे असली खुदाई खिदमतगार बनें और आपसी भाईचारा बनाने के लिए ज्यादा से ज्यादा समय निकाल कर लोगों को जागरूक करें।

अमन की बात हो, सबसे प्यार से मुलाकात हो,
चाहे किसी का कोई भी धर्म और जात हो।

मिशन खुदाई खिदमतगार में हैं जुझारू जांबाज निराले,
शक है अगर किसी के दिल में वह जब चाहे आजमां ले।

फैसल खान जी के निराले अगर अंदाज नहीं होते,
खुदाई खिदमतगारों को एकजुट कर रहे आज नहीं होते।
कैसे वह खुदाई खिदमतगार को फिर से शुरू करते साथियो,
अगर उनके संग में गुरू इनाम,कृपाल जैसे जांबाज नहीं होते।

क्यों आज जरूरी है सीमांत गांधी जी का संदेश?

दुनियां में जीवन का सबसे ज्यादा समय जेल में बिताने वाले सीमांत गांधी बादशाह खान जी ने खुदाई खिदमतगार नामक संगठन करीब 1929 में बनाया।
सभी धर्मों में सद्भावना स्थापित करना खुदाई खिदमतगारों का मुख्य उद्देश्य था। बादशाह खान जी कहते थे मजहब तो दुनियां में इन्सानियत, अमन, मोहब्बत, प्रेम, सच्चाई और खुदा की मखलूक की खिदमत ( ईश्वर के बंदों की सेवा) के लिए आता है। जमातें तो सेवा के लिए बनाई जाती हैं और हर एक का दावा भी यही है , फिर उनमें झगड़ा क्यों हो?
आजादी की लड़ाई के दौरान सीमांत गांधी जी ने खुदाई खिदमतगार संगठन आरंभ किया था, अपनी गहरी निष्ठा और न्याय के लिए पूरे देश में एक मिसाल बना था। स्वयं महात्मा गांधी इस प्रयास से इतने प्रभावित हुए थे कि क्षेत्र के दौरे से लौट कर उन्होंने लिखा था," सीमांत प्रांत मेरे लिए एक तीर्थ रहेगा, जहां मैं बार-बार जाना चाहूंगा।
लगता है कि शेष भारत सच्ची अहिंसा दर्शाने में भले ही असफल हो जाए; तब भी सीमांत प्रांत इस कसौटी पर खरा उतरेगा। 

Comments

Popular posts from this blog

बासनपीर मामले की हकीकत

इस ब्लॉग और मेरी अन्य व्यक्ति से हुई बातचीत पर मंहत प्रतापपुरी का बयान जीवनपाल सिंह भाटी की आवाज में सत्य घटना सद्भावना रैली बासनपीर जूनी पूर्व मंत्री सालेह मुहम्मद का बयान बासनपीर जूनी के सत्य एवं जैसाने की अपनायत की पड़ताल -  पिछले कुछ दिनों से जैसलमेर के बासन पीर इलाके का मामला सामने रहा है। कहा जा रहा है कि पूर्व राज परिवार की जमीन पर बासनपीर गांव के लोगों द्वारा कब्जा किया जा रहा है। नजदीक से पड़ताल करने पर हकीकत कुछ ओर निकली। जिसके कुछ तथ्य निम्नानुसार हैं - रियासत काल में सन 1662 में बीकानेर और जैसलमेर रियासत के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में जैसलमेर सेना के दो वीर योद्धा सोढ़ा जी और पालीवाल जी शहीद हो गए। युद्ध के बाद बासन पीर (युद्ध स्थल) तालाब की तलहटी पर शहीदों की स्मृति में छतरियां बनवाई हैं। जैसलमेर के चारों और 120 किलोमीटर इलाके में 84 गांव पालीवाल ब्राह्मणों ने बसाए जिनमें से एक गांव बासनपीर जूनी भी था। पालीवाल ब्राह्मण समृद्ध किसान और व्यापारी थे, रियासत के दीवान सालिम सिंह से अनबन के कारण सन् 1825 में सभी गांव खाली करने को मजबूर हो गए। पालीवाल...

✍️कायम वंश और कायमखानी सिलसिला सामान्य इतिहास की टूटी कड़ियाँ

कायमखानी समाज कुछ कही कुछ अनकही👇 - शमशेर भालू खां  अनुक्रमणिका -  01. राजपूत समाज एवं चौहान वंश सामान्य परिचय 02. कायम वंश और कायमखानी 03. कायमखानी कौन एक बहस 04. पुस्तक समीक्षा - कायम रासो  05. कायम वंश गोत्र एवं रियासतें 06. चायल वंश रियासतें एवं गोत्र 07. जोईया वंश स्थापना एवं इतिहास 08. मोयल वंश का इतिहास 09. खोखर वंश का परिचय 10. टाक वंश का इतिहास एवं परिचय  11. नारू वंश का इतिहास 12 जाटू तंवर वंश का इतिहास 13. 14.भाटी वंश का इतिहास 15 सरखेल वंश का इतिहास  16. सर्वा वंश का इतिहास 17. बेहलीम वंश का इतिहास  18. चावड़ा वंश का इतिहास 19. राठौड़ वंश का इतिहास  20. चौहान वंश का इतिहास  21. कायमखानी समाज वर्तमान स्थिति 22. आभार, संदर्भ एवं स्त्रोत कायम वंश और कायमखानी समाज टूटी हुई कड़ियां दादा नवाब (वली अल्लाह) हजरत कायम खां  साहब   नारनौल का कायमखानीयों का महल     नारनौल में कायमखानियों का किला मकबरा नवाब कायम खा साहब हांसी,हरियाणा   ...

✅इस्लाम धर्म में व्यापार, ब्याज एवं मुनाफा

अरब व्यापारी हर देश में हर देश का हर एक सामान खरीदते और बेचते थे। अरब में व्यापार -  किसी भी क्षेत्र में सभी सामान उपलब्ध नहीं हो सकते। हर क्षेत्र का किसी ना किसी सामान के उत्पादन में विशेष स्थान होता है। उपलब्ध सामग्री का उत्पादन, भंडारण, परिवहन एवं विपणन ही व्यापार कहलाता है। क्षेत्र अनुसार इसके अलग - अलग नाम हो सकते हैं। इस्लाम धर्म का उदय अरब में हुआ। अरब क्षेत्र में तीन प्रकार की जनजातियां रहती थीं। बायदा - यमनी  अराबा - कहतानू (मिस्र) मुस्ता अराबा - अरबी (इस्माइली) यह जनजातियां खेती, व्यापार एवं अन्य कार्य करती थीं। हजारों सालों से इनका व्यापार रोम, चीन एवं अफ्रीका के देशों से रहा। अरब व्यापारी पश्चिम में अटलांटिक महासागर से लेकर पूर्व में अरब सागर तक, अरब प्रायद्वीप तक व्यापार करते थे। अरब नील से ह्यांग्हो तक व्यापार करते थे। अरब प्रायद्वीप कई व्यापार मार्गों के केंद्र में स्थित था, जिसमें दक्षिण पूर्व एशिया, भूमध्य सागर और मिस्र शामिल थे। यहां मुख्य सभ्यताएं रहीं -  - सुमेरियन एवं बेबीलोन  सभ्यता (मेसोपोटामिया/इराक) (दजला फरात) की सभ्यता। - फ...