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✅भारत, नेतृत्व तब और अब

राष्ट्र के नक्शे के किनारे यूं ही खींची लकीरें नहीं होते। वो कहानी होते हैं किसी की हिम्मत और हौंसले की। राष्ट्र निर्माण खामोशी से किया जाता है, बुलबुले की तरह क्षणिक हौंसले से देश नहीं बना करते।
                       भारत के इस नक्शे को में एक छोटा सा भू भाग है जिसे सिक्किम के नाम से जानते हैं। यह भू भाग भारत का भाग कैसे बना? यह वही सिक्किम है, जो कभी एक स्वतंत्र राज्य (देश) था। ठीक वैसे ही जैसे नेपाल, भूटान। राजा के ताज और महल पर चीन की छत्रछाया थी। महल की रानी CIA (चाइना इंटेलिजेंस एजेंसी) का मोहरा थी जिसके माध्यम से भारत पर नज़र रखी जाती थी। वर्ष 1975 में चीन की अति से तंग आकर #इंदिरा ने वहां जनमत संग्रह करवाकर सिक्किम की जनता की भावना के अनुसार सिक्किम को भारत का 22वाँ राज्य बनाया वो भी बिना किसी जनहानि के, राजनयिक कौशल के दम पर।
                   नॉर्थ ईस्ट मिज़ोरम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा, नागालैंड जो नक्शे में भारत के हाथ की तरह हैं यह नेहरू, इंदिरा और राजीव की देन है।
● मणिपुर को 1949 में विलय करवाया गया।
● त्रिपुरा को महारानी के हस्ताक्षर से भारत में मिलाया गया।
● नागालैंड को 1963 में राज्य का दर्जा दिया गया।
● मिज़ोरम में 1986 के समझौते से अलगाववाद बंद हुआ।
राजीव जी ने मिज़ोरम, असम और नागालैंड में जो संधियाँ किं वो केवल शांति के कागज़ नहीं थे, वो थे एक ढाल जो भारत राष्ट्र की सीमाओं को खून-खराबे से बचाती हैं और बचाती रहेंगी।
                      चीन की नज़र भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्र पर टिकी थी तो भारत सरकार सजग थी। चीन अरुणाचल प्रदेश को वो दक्षिण तिब्बत कहकर आँसू बहाता रहा है तब नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी (NEFA) कहलाता था को बिना ड्रैगन की परवाह किए और बिना लाल आंख दिखाए वर्ष 1987 में भारत का पूर्ण राज्य बना दिया गया। वो #राजीव ही थे जो चीनी भभकियों धमकियों  से बिना डरे बिना कोई सामरिक बयान दिए लगातार भारत की सीमाओं को मजबूत करते जा रहे थे और हिमालय की एक-एक पहाड़ी, एक-एक घाटी पर तिरंगा लहराए जा रहे थे।
                      #नेहरू राज में अंडमान से अरुणाचल तक, भारत ने राजनयिक, सामरिक और राजनीतिक रूप से अपनी जड़े मजबूत की। राजीव ने वहां केवल कम्यूटर ही नहीं पहुंचाया बल्कि आतंक में तपते उत्तर पूर्व तक शांति की ठंडक भी पहुंचाई।
                   उस समय किसी टीवी चैनल पर विजय उत्सव नहीं हुआ करता थे, सेना की बात सेना तक ही सीमित रहती थी और ना ही प्रधानमंत्री सर्जिकल स्ट्राइक में बादलों की ओट में फाइटर जेट छिपाया करते थे। तब छाती का नाप नहीं होता था, और ना ही सेना ने कभी छाती का नाप दिखाया, दिखाया तो बस सीमा पर सीना दिखाया। अब छाती 56 इंच की है या नहीं पता नहीं पर जबान 156 इंच की अवश्य हो गई है। 
                        आज मिज़ोरम का बेटा भारत माता की जय कहता है, सिक्किम का किसान फसल बीमा का लाभ लेता है, अरुणाचल का युवा सेना में भर्ती होता है तो वो सिर्फ़ एक नेता को याद नहीं करता,वो उस अदृश्य विजयी मुस्कान को सलाम करता है, जिसने चुपचाप, मगर पक्के इरादे से एक इस बिखरे उपमहाद्वीप को विशाल राष्ट्र बनाया। एक समय था जब चीन को अखबारों में नहीं, फ़ाइलों और मोर्चों में जवाब दिया जाता था।
                अपने तवांग घाटी का नाम सुना है, जिसे चीन आज भी आँख की किरकिरी बनाए बैठा है जो भारतीय सीमा की केवल एक पोस्ट नहीं बल्कि महान विजय गाथा है जिसे हमारे सैनिकों ने अपनी हड्डियों की कलम से लहू को स्याही बनाकर लिखा है। उन सैनिकों की शहादत की यादें उनका बहता लहू और टपकता पसीना आज भी उन चट्टानों पर चीख - चीख कर अपनी कहानी कहता है। तवांग में भारत ने बिजली, सड़क, स्कूल और सैनिक अड्डे स्थापित किए और चीन खड़ा देखता रहा। तब भारत की बात लोकतंत्र तय करता था और आज हजारों किलोमीटर हमारी जमीन में चीन के घुस आने के बाद चौकीदार सोया है और तानाशाह को साँप सूंघ गया है।
                     जब चीन से रिश्ते शून्य थे और 1986-87 में सुमदोरोंग चू घाटी विवाद पर दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी थीं, युद्ध जैसे हालात थे तब एक रणनीतिक समझ के साथ राजीव ने सेना को पीछे हटाने से मना कर दिया और फारवर्ड पॉलिसी के तहत भारत अग्रिम चौकियाँ बढ़ाता गया।
तिलमिलाया चीन भाषण देता रहा और भारत का राजीव चुपचाप नक्शा खींचता रहा।
                   31 वर्ष बाद प्रधानमंत्री की हैसियत से  वर्ष 1988 में राजीव जी चीन पहुंचे और पहली बार दोनों देशों ने एक-दूसरे की राजनीतिक सीमाओं को मान्यता देने के समझौते पर सहमति व्यक्त की। एक ऐसा नेतृत्व जो अपने सैनिकों को माइक पर नहीं, सीमा पर यकीन दिलाता था कि हम पीछे नहीं हटते। 
                    आज अरुणाचल प्रदेश के संदर्भ में चीन द्वारा अनर्गल बातें कही जा रही हैं और नेतृत्व खड़ा मुस्कुरा रहा है। इस संदर्भ में हम संसद, सीमा और सड़क पर चीन को करारा जवाब 1987 में दे चुके हैं। हम वो लोग हैं जो इतिहास भाषणों से नहीं, फ़ील्ड रिपोर्ट से पढ़ते हैं, जब नॉर्थ ईस्ट के बच्चे देश के लिए एशियाड, ओलिंपिक में मैडल लाकर तिरंगे को सलाम करते हैं, तो ड्रैगन का बुखार वैसे ही चढ़ता है जैसे हमारी सीमाओं पर तिरंगा।
                    तुरतुक हो या तवांग, गोवा हो या सिक्किम, भारत की असली ताकत उन सरकारों में थी जो चुनावों में भाषणों के स्थान पर काम करने में यकीन रखती थीं...हमारे नेताओं की हल्की सी मुस्कुराहट दुश्मनों की नींद उड़ा देने में सक्षम थी।
                 1999 में ऑपरेशन कारगिल में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की दृढ़ता और बोफोर्स की अग्निवर्षा को आतंकी देश पाकिस्तान कभी भुला नहीं पाएगा। 
                      अंत में - 
हँस के बता दूँ मैं अपने हाले-दिल तुझे से
आकर कहकहों की फिज़ा में मिल मुझसे।

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