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✍️इस्लामिक जंग

अरब में वो चार महीने जिन में जंग मना थी - 
जिल हिज्जा की दसवी तारीख से रबीउल अब्बल आखिर की दसवी तक।

जंग ए बद्र
(पहली इस्लामिक जंग)
मक्का के बड़े व्यापारी अबु सूफियान का क़ाफ़िला शाम (सीरिया) से आ रहा था जिस में मुहाफिज कम और माल अधिक था, को कुछ सहाबियों के दिल में लूटने का ख्याल आया। संभावित लूट खबर मक्का के कुरैश को पहुंची, तो बहुत सी फ़ौज ले कर क़ाफ़िले निकले और बद्र नामी जगह पर लड़ाई शुरू हो गयी। लड़ाई का नतीजा यह था कि कुरैश गये और इतने ही गिरफ्तार हुए। जो माल व अस्बाब वह छोड़ कर भाग आये थे, वह सब आया। मगर कुरआनी आयतों से साफ़ मालूम होता है कि रसूले खुदा सल्ल० को मक्का के पड़ाई करने का हाल पहले मालूम हो चुका था और इस के बाद आप ने उन के मुक़ाबले थाः। बेशक कुछ सहाबा किराम की राय होगी कि शाम के क़ाफ़िले को लूट लिया जाए और में खुदा ने फ़रमाया कि तुम बे-शान व शोकत गिरोह को लेना चाहते हो, मगर खुदा ने के
प्यारे नबी सल्ल० , लूट लेने के इरादे इस राय को मंजूर लिए कूच फ़रमा इसी गिरोह के ब को बचाने के नि के सत्तर आदमी म
करमाया और यही चाहा कि हथियारों से लैस फ़ौज से जंग करें और बहादुरी दिखा कर फ़रह हासिल करें, चुनांचे ऐसा ही हुआ। इस लड़ाई की वजह, जो ज्यादा सही लगती है, यह है कि मक्का के कुरैश को मुहाजिरों और मदीने समीके भंसार के साथ कड़ी दुश्मनी थी और वे हमेशा उन को तकलीफ़ पहुंचाने पर तैयार रहते थे, तो हुजूर सल्ल॰ अपने दुश्मनों के हालात और इरादों से आगाह रहने के लिए कभी-कभी मक्का के चारों तरफ़ आदमी रवाना - न बम करमाते। बुनांचे एक बार नखला नामी जगह को, जो मक्का और ताइफ़ के बीच बाक्रेज है, आप ने कुछ लोगों को रवाना किया, जिन के सरदार आप के फूफीजाद भाई अब्दुल्लाह बिन जङ्ग थे। नखला एक निहायत इतरनाक जगह थी और वहां जाने में बहुत खतरा था। आप ने अब्दुल्लाह को एहतियात के साथ एक मील मुहर वरचा दिया और फ़रमाया कि मक्के की तरफ़ बराबर चले चलो। तीन दिन के बाद इस परचे को खोल कर पड़ना और जो कुछ उस में लिखा है, उस पर अमल करना। परचे में लिखा था, 'नखला तक चले जाओ और यहां पहन कर छिपे तौर पर कुरैश के हालात मालूम करो और हमारे पास उन की खबर जाओ अगर वहाँ जून है।
और ही मामला पेश आया, कि उन के नाले में पहुंचने के दो दिन बाद कुरैश का एक छोटा-सा क़ाफ़िला तायफ़ से तिजारत का माल लिए हुए आ पहुंचा। अब्दुल्लाह और उन के साथियों को इशदि नबवी और इस परचे का स्याल न रहा और उन्हों ने उन लोगों पर हमला कर दिया। नतीजा यह हुआ कि अग्न बिन अब्दुल्लाह हजरमो जो मक्के के सरदारों में से था, तीर से मारा गया और हकम विन केसान और उस्मान बिन अब्दुल्लाह मरुजूमो गिरफ्तार हो गये। जनाब रसूले खुदा सल्ल० ने उन लोगों को इस हरकत पर बहुत मलामत की और कैदियों को भी छोड़ दिया और अब्दुल्लाह बिन हजरमी का खून बहा भी अपने पास से दे दिया। मगर मक्का वालों के कपट की आग बगैर भड़के न रही और उन्हों ने साढ़े नौ सौ के करीब लड़ने के तजुर्बेकार योद्धा जमा किये, जिन में से तीन सौ के पास घोड़े और बाक़ी के पास सवारी और बोझ ढोने के लिए मात मी ऊंट थे। इस के अलावा किसी ने यह हवाई उड़ा दी कि जनाब रसूलुल्लाह अबू सुफ़ियान वाले क़ाफ़िले को जो शाम से मक्के को आ रहा है, लूटने का इरादा रखते हैं। इस खबर से उन का गुस्सा और भी भड़क उठा और वे फौरन मदीना पर हमला करने के लिए निकल खड़े हुए। इधर मदीने में यह खबर पहुंच चुकी थी कि मक्का के कुरैश बहुत जोर-शोर से मदीने पर चढ़ाई की तैयारियां कर रहे हैं। ऐसी हालत में जरूरी था कि रसूले खुदा सल्ल० अपनी हिफाजत का इन्तिजाम फ़रमाते, तो आप ने तीन सौ तेरह आदमियों के साथ मदीने से कूच फ़रमाया, जिन में से एक या दो के पास घोड़े थे और बाक़ी के पास सिर्फ सत्तर अंट थे, जिन पर बारी-बारी तीन-तीन, चार-चार आदमी सवार होते थे। चुनांचे खुद जनाब सरवरे कायनात सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और हजरत अली मुर्तजा रजि० और जैद बिन हारिसा रजि० एक ही ऊंट पर बारी-बारी सवार होते रहे। जब बद्र के मक़ाम पर पहुंचे तो कुरैश से लड़ाई हुई, जिस में उन के सत्तर आदमी मारे गये और इतने ही गिरफ्तार हुए और बहुत-सा मालं व अस्वाब मुसलमानों के हाथ आया। मक्तूलों में अबू जहल, उत्बा बिन रबीआ, शैबा बिन रबीआ, वलीद बिन उत्बा, हंजला बिन सुफ़ियान, नौफुल और अबुल बस्तरी वगैरह चौबीस आदमी कुरैश के सरदारों में से थे, जिन में से इब्ने हिशाम की रिवायत के मुताबिक़ नौ को हजरत अली रजि० ने क़त्ल किया था। मुसलमानों में से सिर्फ़ बौवह आदमी मारे गये, जिन में छः मुहाजिर और आठ अंसार थे। कुरआन की आयतों को देखो, पांचवीं आयत से मालूम होता है कि नबी सल्ल० अभी मदीने ही में थे और कूच नहीं फ़रमाया था कि सहाबा रजि० में इस्तिलाफ़ हो गया। कुछ लड़ाई को पसन्द करते थे, और कुछ ना-पसन्द करते थे। छठी आयत से मालूम होता है कि मुसलमान मक्का के कुरैश की इस भारी फ़ौज से हिचकिचाते थे, जो उन्हों ने मदीने पर हमले की गरज से जमा की थी वरना तिजारत के क़ाफ़िले को लूट लेने के इरादे से तक्लीफ़ करना किसी सूरत में भी मौत की तरफ़ हांका जाना नहीं हो सकता । सातवीं आयत में दो गिरोहों का जिक्र है, एक जो लड़ाइ का साज व सामान नहीं रखता था और वह अबू सुफ़ियान का तिजारत का काफ़िला था, जो शाम से आ रहा था। दूसरा गिरोह मक्का के कुरैश यानी अबू जहल का लश्कर था, जिस की तायदाद बहुत ज्यादा थी और जिस के साथ बहुत-सा जंग का सामान था, गरज बे-थियार लोगों पर हमला करना तो खुदा को मंजूर और पसंद न था, हथियारों से लैस फौज का मुकाबला किया गया, तो उस के बायदे के मुताबिक़ मुसलमानों को फतह हासिल हुई।

हुदेबिया की संधि एवं उसका तोड़ना - 
(सूरह ए तौबा)
इस सूरह के शुरू में बिस्मिल्लाह नहीं लिखी गयी और इम की बहुत-मी बजहे बयान की गयी है। हजरत अली रजि० कहते हैं कि बिस्मिल्लाह में अमान है, क्योंकि इस में खुदा का नाम इस खूबी के साथ लिया जाता है. जो अमान का काम करने वाला है यानी रहमत और यह सूर लड़ाई और जंग और अमान उठाने के लिए नाजिल हुई है, इस लिए इग में विस्मिल्लाह नहीं है। कुष्ठ ने वहां कि अरब की आदत थी कि जब उन में और किसी कौम में ममझोता होता था और वे उस को तोड़ना चाहते थे, तो इस बारे में जो खत कि उस कौम को लिखते 4. उम पर बिस्मिल्लाह नहीं लिखते थे। जब कुपफ़ार ने वह अहद (समझौता), जो मुसलमानों ने खुदा के हुषम से उन के साथ किया था, तोड़ डाला, तो खुदा ने मुमलमानों से फरमाया कि तुम को भी अपने अहद पर कायम रहना जरूरी नहीं। पग चूंकि इस मूर में अहद तोड़ डाला गया है और इस के नाजिल होने पर हुजूर मल्ल० ने हजरत अली रजि० को मुश्ठिकों के पाम भेजा। उन्हों ने यह मूरः उन को सुना दी और उन से कह दिया कि अब ममांना टूट चुका है। चार महीने के बाद हर जगह तुम लोगों से जंग है. इस लिए उन की आदत के मुताबिक उम के शुरू में 'विम्मिन्नाह' नहीं लिखी। इन के अलावा भी कई कौल हैं, मगर ज्यादा सही पहला कौल मालूम होता है।

हुदैबिया में दुष्कार के साथ दस वर्ष का समझौता हुआ था और इस शर्त पर सुनह करार पायी थी कि जो लोग मुसलमानों की पनाह में हैं, उन पर न मक्के वाले खुद हमला करने और न हमला करने वालों की मदर करेंगे और जो लोग मक्के बालों को पनाह में है. उन पर मुगलमान न हमला करेंगे और न हमला करने वालों को मदद करेंगे, मगर कुरैश ने अपना बहद तोड़ डाला। यानी बनुबक ने जो मक्के वालों की पनाह में थे, लुजामा पर, जो हजरत रमूनुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पनाह में थे चढ़ाई कर दी और कुरैश ने उन की मदद की। यह बाकिला होने पर खुजामा में से एक गरुन बन बिन सालिम नाम का हजरत सल्लाला अहि व सल्लम भी विदयत में हाजिर हुआ और कहा कि मक्के के काफिरों ने अपना अहद तोड़ डाला, तब आप ने फरमाया, मैं तुम्हारी मदद करू गा। गरज आप को मक्के वालों से जंग करनी पड़ी। चुनांचे आप ने सन् ८ हि० में उन पर बड़ाई की और मक्का फरह कर लिया ।

फतेह मक्का 20. रमजान उल मुबारक 8.हिज़री 
मोहम्मद साहब‎ दस हजार की फौज ले कर मदीना से 6 रमज़ान हिजरी 8 के दिन उल  सफर शुरू किया। 18 रमज़ान उल मुबारक को आप रसूलल्लाह ﷺ‎ मक्का में दाख़िल हुए। 
आप रसूलल्लाह ﷺ‎ मदीना से रवाना होने से पहले आप ने एक बड़ी फौज को इकट्ठा किया और इस मिशन को गुप्त रखा गया था, यहां तक ​​कि हज़रत मुहम्मद ﷺ‎ के करीबी सहाबा और सिपहसालारो को भी उनके इस मिशन की भनक तक न लगने दी गई थीं। हजरत मुहम्मद ﷺ‎ ने इस मिशन को इतना गुप्त रखा हुआ था कि कुरैश को भी इस की जानकारी नहीं दी कि हम मक्का पर हमला करने जा रहे है।
मुसलमानों की फ़ौज बुधवार, 29 नवंबर 629 (6 रमजान, 8 हिजरी।)को लगभग दस हजार फौज को मुनज़्ज़म और मजबूत करने के लिये शामिल हो गए। यह उस समय की सबसे बड़ी मुस्लिम ताक़त थी। फौज मक्का के उत्तर-पश्चिम में स्थित मील-उज़-ज़हरान में रही। पैगम्बर हज़रत मुहम्मद ﷺ‎ ने हर शख्स को अलग अलग आग जलाने का हुक्म दिया ताकि मक्का के लोग यह समझे कि मुसलमान बड़ी तादाद में हमला करने आये है।
पैगम्बर हजरत मुहम्मद ﷺ‎ ने कुरैश पर हमला किए जाने तक लड़ने से बचने पर जोर दिया। सोमवार, 11 दिसंबर 629 (18 / 20 रमजान 8 हिजरी) पर मुस्लिम फ़ौज मक्का में दाखिल हुई। दाखिल होने पर खालिद बिन वलीद र.अ. के मोर्चे को छोड़कर तीन हिस्सो पर अमन, शान्ति और खून रहित दाखिल था। इकरमह और अबसूफ़ियान जो मुसलमानों के बहुत बड़े दुश्मन थे। कुरैश सिपहसालारो के एक बड़े समुह को इकट्ठा किया और खालिद इब्न वलीद र.अ. के महाज़ पर हमला कर दिया। कुरेश ने मुसलमानों पर तलवार और धनुष के साथ हमला किया, मुसलमानों ने कुरेश पर आसानी से काबू पा लिया। एक छोटी सी भिड़ंत के बाद कुरेश ने 12 बहादुरों को खोने के बाद जमीन दे दी। मुसलमान जोश व खरोश से भरे हुए थे। कुरेश के लड़ने वालों ने हमला करने के कारण सिर्फ एक मोर्चे पर युद्ध हुआ जिसमें कुरेश के 12 आदमी और 2 मुसलमान बहादुर शहीद हुए
और फिर मक्का फ़तह हो गया

खाना-ए-काबा' में 360 बुतो की पूजा होती थी, फतेह मक्का के दिन हुजूर काबा में तशरीफ ले गए, उस वक्त दस्त-ए-मुबारक (हाथ) में 1 छड़ी थी और हुज़ूर ज़बान-ए-अक़दस से ये आयत तिलावत फरमा रहे थे।

तर्जुमा :
"हक आ गया और बातिल मिट गया।  यक़ीनन बातिल को मिटना ही था।"

और हुजूर सल्ललाहु अलैही वसल्लम ने अपनी छडी से जिस बूत (मूर्ति) की तरफ इशारा फरमा रहे थे, वह बगैर छूए हुए फकत इशारा करते ही धडाम से जमीन पर गिर पड़ता था।।
इस तरह इस्लाम के इतिहास में ये एक बहुत बड़ा मारअका पेश आया।।

हुनैन की जंग -
१. इन आयतों में खुदा ने उन मेहरबानियों का इञ्हार फ़रमाया है, जो मुसलमानों पर की थी। जब मक्का फ़ल्ह हो चुका और मक्का वाले इस्लाम ले आये, तो जनाब रसूले खुदा सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह खबर पहुंची कि हवाजिन कबीले के लोग हुनैन में आप के साथ लड़ाई करने को जमा है। यह वाकिआ सन् ०८ हि० का है। ।जिन एक तीरंदाज कौम थी और हुर्नन एक वादी है जो मक्के और तायफ़ के दमियान वाकेअ है। मुसलमानों क। फौज ग्यारह या बारह या सोलह हजार थी और काफिर सिर्फ चार हजार। इन्हें अपनी फ़ौज की ज्यादती पर घमंड हो गया कि काफ़िर है ही क्या। उन को तो यों ही मार कर भगा देंगे। खुदा को घमंड पसन्द न था। जब ये दुश्मन की तरफ चले तो वे जंगल के रास्तों और पहाड़ के दरों में बड़ी मुस्तैदी से उन की बात में लगे हुए थे। हजरत सल्ल० मय सहाबा रजि० के सुबह के अंधेरे में मैदान में उतरे थे कि उन्हों ने यकायक तीरंदाजी शुरू कर दी। तलवारें खीच कर यकबारगी ऐसा हमला किया कि मुसलमानों की फ़ौज बिखर गयी, मगर हजरत गल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम कि अपने खच्चर पर सवार थे, उसी तरह जमें रहे और उस को दुश्मनों की तरफ़ बढ़ाया। आप के चचा अब्बास रजि० रकाब पकड़े हुए थे और दूसरी रकाब अबू मुफ़ियान बिन हसं बिन अब्दुल मुत्तलिब के हाथ में थी। वह खच्चर को रोकते थे कि तेज न चले। हजरत अपना नामे मुबारक लेने कर मुमलमानों को पुकारते थे कि खुदा के बंदो। कहां जाते हो, मेरी तरफ़ आओ। मैं खुदा का रमून हैं। यह भी शरमाते थे कि 'अनन्नबीयु ला करिब० अनब्नु अव्दिल मुत्तलिव'। लिखा है कि मो के करीब महावी मावित कदम रहे, बाकी सब के पांव उखड़ गये। आप ने अपने चचा अध्यास में, कि वह बुलंद आवाज थे, इर्शाद फरमाया कि खूब जोर से पुकारें। वह पुकारने लगे तो लोग हजरत की तरफ रुजू हुए। जब कुछ लोग इस तरह पर जमा हा गये, त। हजरत ने उन को हमला करने का हुक्म दिया। चुनांचे इम हमले में हवाजिन को हार हुई। इम नहाई में ख़ुदा ने मुसलमानों को मदद के लिए फरिश्तों का लश्कर भेजा, जो मुसलमानो की तमन्नी की वजह बना । गरज खुदा ने मुसलमानों को उन के इतराने और घमंड करने पर चेतावनी दे कर उन्हें जिताया। इस लड़ाई में कुपकार के कत्ल और गिरफ्तारी के अलावा बहुत-सा माल हाथ आया। कहते हैं कि इस से श्यादा कोई बडी गनीमत हाथ नहीं आयी थी।

के दुश्मन थे।

मक्का की फ़तह

१० वीं रमजान ८ हिजरी को दस हजार सेना के साथ नबी सल्ल० मदीना से मक्का को फ़तह करने के उद्देश्य से रवाना हुए। इस सेना में एक हजार मर्द बनू सलीम के और एक हजार मुजीता के, चार सो ग़फ़्फ़ार के, ४ सौ अस्लम के और बाक़ी क़ुरैश व असद व ततीम और मुहाजिर व अन्सार के ममालीन व कताइब थे। मदीना में कल्सूम बिन हसीन बिन उतबा गफ्फ़ारी ही आपके क़ायम मुकाम (कार्यवाहक) हुए।

जिस समय आप जुल हलीफ़ा और कुछ कहते हैं कि हजफ़ह में पहुंचे अब्बास बिन अब्दुल मुत्त-लिब रजि० मक्का से हिजरत करके मदीने को आते हुए मिले। नबी सल्ल० के फ़रमाने से अब्बास रजि० आप' के साथ जिहाद के उद्देश्य से इस्लामी लश्कर के साथ मक्का को वापस हुए। आखिर-फार मषका बिना जंग के फ़तह हो गया और पूरे अरव की क़ौमें इस्लाम में दाखिल होना शुरू हुई।

१ जीकादा, जिलहिज्जा, मुहर्रम, रजब ।

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