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✅नवाब जलाल खान का बीहड़ फतेहपुर

फतेहपुर का जलाल खान बीहड़ - 
नवाब जलाल खान का बीहड़ फतेहपुर-
नवाब जलाल खान ने 1479 से लेकर 1489 तक फतेहपुर पर शासन किया। पिता नवाब फतेह खान (फतेहपुर के प्रथम कायमखानी शासक एवं संस्थापक) की मृत्यु के बाद उनकी याद को चिरस्थाई बनाए रखने हेतु
यह बीहड़ राजस्थान के फतेहपुर सीकर के शासक नवाब जलाल ने गौ विचरण एवं वन्यजीवों के लिए छोड़ा था।
बीहड़ की सीमा निर्धारण हेतु 12 कोस का क्षेत्रफल की सीमा घोड़े पर चढ़ कर तय की गई थी, जहां जीवन के कई रंग दिखाई देते हैं। यह 36 किलोमीटर परिधि में 3796 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैला हुआ है।
फतेहपुर कस्बे के दक्षिण दिशा में लक्ष्मणगढ़ - सीकर (राष्ट्रीय राजमार्ग 11, दिल्ली जैसलमेर)  मार्ग के दोनों ओर फैला पक्षी एवं गौ अभ्यारण्य फतेहपुर कस्बे की आभा को दोगुना करता है।
बीहड़ छोड़ने की कहानी -
स्थानीय इतिहासकार प्रदीप पारीक के अनुसार फतेहपुर के दूसरे नवाब जलाल खान ने पिता की याद को चिरस्थाई रखने के लिए अभ्यारण्य छोड़ने की मंशा बनाई। इस हेतु क्षेत्र का नाप कैसे हो, इस समस्या के निदान हेतु एक घोड़ा छोड़ा गया। इसके पीछे सवार भेजे गए। नवाब जलाल खान ने तय किया कि यह घोड़ा जितनी परिधि में घूमकर वापस आएगा वही परिधि बीहड़ की सीमा होगी। यह घोड़ा लगभग 12 कोस की परिधि (36 किलोमीटर घूमकर वापस आया और इस विशाल बीहड़ क्षेत्र की सीमा आज भी वहीं है। 
जोहड़, कुएं ओर बावड़ियों का निर्माण- यहां के सेठ - साहूकारों ने कई कुएं और बावड़ियों का निर्माण करवाया गया।
1899 में अकाल के दौरान मजदूरों को कार्य देने के लिए इस इस जोहड़ का निर्माण करवाया था।
126 साल पुराना ऐतिहासिक जोहड़ा - 
इस अभ्यारण्य क्षेत्र से होते हुए अन्य क्षेत्रों से फतेहपुर आने वालों के लिए सन 1899 के राष्ट्रव्यापी (छप्पनियाँ) अकाल के समय  सेठों ने मजदूरों को कार्य देने हेतु यहां एक जोहड़ का निर्माण करवाया। जहां पहुंचकर आमजन अपनी प्यास बुझाते हैं। आज से 125 साल बीत जाने पर भी यह जोहड़ा उसी भव्यता के साथ मनोरम आभा लिए खड़ा है।
बुधगिरी महाराज की मंडी (मंदिर) - 
इस बीहड़ में विशाल आध्यात्मिक केंद्र श्री बुध गिरिमंडी अवस्थित है, जहां भक्तजन दर्शन करने के लिए आते रहते हैं।
अन्य धार्मिक स्थलों में यहां ऐतिहासिक बालाजी धाम एवं जांगिड़ शक्तिपीठ स्वयं अपनी महिमागान करते हैं। यहां आने वाले भक्तजन शांत वातावरण में प्रकृति का आनंद लेते हैं।
वन्यपशु एवं पक्षी विहार - 
इस बीहड़ में चिंकारा, नीलगाय, हरिण, गाय, लोमड़ी, खरगोश, जरख, गीदड़ सहित अन्य पक्षी मोर, तीतर, बटेर, चिड़िया, तोता, कोयल सहित कई पशु - पक्षियों का बसेरा है।
भेड़ प्रजनन केंद्र -
विशाल क्षेत्र में फैले इस भेड़ प्रजनन केंद्र में चोकला एवं अन्य भेड़ की नस्लों के सुधार हेतु अनुसंधान किया जाता है।
बीज उन्नति केंद्र -
इस बीहड़ क्षेत्र में बीज अनुसंधान एवं उन्नति केंद्र भी स्थापित किया गया है, जहां स्थानीय वातावरण में नई किस्म के बीज उत्पादन हेतु अनुसंधान किया जाता है।
स्थानीय रोजगार - 
यह बीहड़ कैर, सांगरी, पीलू, गोंद, लकड़ी एवं जड़ी बूंटियों का गढ़ है।
स्थानीय लोग राजमार्ग पर जगह - जगह इस बीहड़ से प्राप्त सामग्री तोड़ कर बेचते नजर आते हैं।
पर्यावरण संरक्षण - 
आज से लगभग साढ़े पांच सौ साल पहले जीव दया और पर्यावरण संरक्षण स्थानीय शाशको की लंबी सोच का द्योतक यह बीहड़ आज शहरी एवं अन्य पर्यावरणीय समस्याओं का निदान करता है। विश्व पर्यावरण संगठन द्वारा 33% भू - भाग पर वृक्षारोपण की अनिवार्यता आज की गई है जिसे हमारे बुजुर्गों ने सदियों पहले साकार कर दिया था।
बीहड़ क्षेत्र पर बढ़ता अतिक्रमण एक समस्या - 
इस क्षेत्र पर जगह - जगह अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है। भू - माफिया इस बेशकीमती जमीन को धार्मिक अथवा अन्य रंग दे कर हड़पना चाहते हैं। सरकार को चाहिए कि इस बीहड़ को पूर्णतया अतिक्रमण मुक्त कर स्थाई बाड़/दीवार का निर्माण करवाया, जिस से आने वाली पीढ़ियों का भविष्य उज्ज्वल हो सके।
चूरू से जयपुर जाते समय बनाया गया वीडियो - 
यह बीहड़ केवल एक भूखंड ही नहीं हमारी संस्कृतिक विरासत एवं आस्था का केंद्र है। शमशेर भालू खां 
जिगर चुरूवी 
9587243963

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