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बंटवारा

लघुकथा – 
बंटवारा
एक समय की बात है। एक कस्बे में एक किसान अपनी पत्नी और बच्चों के साथ सादगी और श्रद्धा से जीवन यापन करता था। पूरा परिवार धर्मपरायण और आस्थावान था। ईश्वर की कृपा से घर में सुख-शांति और समृद्धि का वास था।
एक अनहोनी ने इस खुशहाल परिवार की रौनक छीन ली। किसान का एक बेटा लंबी बीमारी के बाद ईश्वर को प्यार हो गया। इस हादसे के बाद जैसे घर की सारी खुशियां ही समाप्त हो गईं।
लगातार कलह और मनमुटाव के कारण दिवंगत बेटे की पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया, एक बेटा गांव छोड़ दूसरे शहर में रहने लगा। धीरे-धीरे किसान भी बीमारियों से जूझता हुआ इस संसार को अलविदा कह गया।
टूटते परिवार जो जोड़ने वाली कड़ियां जर्जर होने लगीं। रिश्ते स्वार्थ की भेंट चढ़ने लगे। परिवार का हर सदस्य संपत्ति के बंटवारे को लेकर एक-दूसरे का शत्रु बन गया। कभी भाई-भाई पर मुकदमा करता, तो कभी बेटा अपनी मां पर। कहीं बहनें भाई के खिलाफ पंचायत करवा रही थीं, तो कभी मां अपने ही बेटों के खिलाफ न्यायालय में गुहार लगा रही थी।
तनाव, बीमारी और उपेक्षा के जहर ने एक दिन मां का जीवन लील लिया। बेटे बेटियों पर थोड़ा सा अंकुश था वो समाप्त हो गया। मां की अंतिम क्रिया के दिन ही खेत बेचने और घर की जमीन को लेकर परिवार दो गुटों में बंट गया। एक गुट में बहनें और एक भाई, दूसरे में शेष भाई। भाइयों का गुट खेत बेचना चाहता था, जबकि बहनों ने उसमें अपने बराबर के हिस्से की मांग कर दी।
गांव में यह चर्चा का विषय बन गया - "भाण-बेटी हांति की हकदार हैं, पाँती की नहीं"। परंपरा कहती हैं कि बहनें अक्सर कोर्ट में भाइयों के पक्ष में हकत्याग लिख देती हैं परन्तु इस मामले में स्वार्थ ने परंपरा को तोड़ दिया और सामाजिक ढांचा बिखर गया।
कई वर्षों तक आरोप-प्रत्यारोप का खेल चलता रहा। अंततः एक दिन दोनों पक्षों में खूनी संघर्ष शुरू हुआ। किराए के लठैतों की बरछियों और भालों ने पूरे परिवार को निगल लिया। खेत खून से लाल हो गए। दुधमुंहे बच्चों के चीथड़े बिखर गए, कटे हुए अंग, बेजान शरीर, और बहता खून अशोक को पश्चाताप की आग में जलाते कलिंग युद्ध की याद दिला गया।
बीच-बचाव करने आए लोग जान बचाकर भागने लगे। उस किसान के परिवार में अब कोई शेष नहीं बचा। 
शेष बचे हैं खंडहर, जहां बरसों बीत जाने पर भी हर रात उस दिन की चीखें सुनाई देती हैं। शेष हैं बीहड़ बन चुके खेत जहां पैर रखने पर पूरा शरीर खून में सना हुआ प्रतीत होता है।
शिक्षा - 
जब तक जीवन है, तब तक  संपत्ति और सुख है, मरने के बाद सब शून्य। 
लड़ाई किसी समस्या का हल नहीं विनाश को निमंत्रण है। 
स्वार्थ आत्मा की मृत्यु के कारण पनपता है।
लेखक - 
- शमशेर भालू खां सहजूसर

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