ALU Jaipur, Semester Seco. 2.4
पाठ्यक्रम
परिवार विधि-II (मुस्लिम विधि)
इकाई-I
परिवार विधि का परिचय
1.1 मुस्लिम विधि के स्रोत
A.मुस्लिम विधि के प्रमुख स्रोत
B. प्राथमिक एवं द्वितीयक स्रोत
1.2 मुस्लिम विधि का अनुप्रयोग
A.मुस्लिम विधि के लागू होने की परिस्थितियाँ
B.भारत में मुस्लिम विधि का अनुप्रयोग
1.3 भारत में लागू एवं व्याख्यायित
A.मुस्लिम विधि की प्रकृति एवं उद्भव
B.मुस्लिम विधि की प्रकृति
C.मुस्लिम विधि का उद्भव
D.भारत में मुस्लिम विधि का विकास एवं न्यायिक व्याख्या
1.4 मुस्लिम विधि के संप्रदाय, प्रव्रजन एवं धर्म परिवर्तन
A.मुस्लिम विधि के विभिन्न संप्रदाय/स्कूल
प्रव्रजन (Migration)
B.धर्म परिवर्तन (Change of Religion)
1.5 मुस्लिम विधि में विवाह की संकल्पना
A.विवाह संस्कार है या संविदा?
B.वैध विवाह की आवश्यक शर्तें
C.विवाह के प्रकार
D.शून्य (Void), अनियमित (Irregular) एवं वैध (Valid) विवाह के प्रभाव
E.धर्म परिवर्तन का विवाह पर प्रभाव
इकाई-II
मेहर एवं भरण-पोषण
2.1 मुस्लिम विधि में मेहर की संकल्पना
मेहर का अर्थ
A.मेहर की प्रकृति एवं उद्देश्य
2.2 मेहर के प्रकार एवं उसकी प्रकृति
मेहर के विभिन्न प्रकार
A.मेहर की विधिक प्रकृति
B.क्या मेहर उत्तराधिकार योग्य है?
C.क्या मेहर हस्तांतरणीय है?
2.3 मेहर के बदले संपत्ति पर पत्नी का प्रतिधारण का अधिकार
A.मेहर के बदले पत्नी का संपत्ति पर प्रतिधारण का अधिकार
B.मेहर का भुगतान न किए जाने के प्रभाव
2.4 भरण-पोषण
A.मुस्लिम विधि में पत्नी के भरण-पोषण से संबंधित प्रावधान
B.अन्य आश्रितों के भरण-पोषण से संबंधित प्रावधान
2.5 तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के अधिकार
A.मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 के निहितार्थ
B.दंड प्रक्रिया संहिता के धारा 125–128 के प्रावधान
C.न्यायिक दृष्टिकोण
इकाई-III
वैवाहिक उपचार, संरक्षकता, पितृत्व एवं दत्तक ग्रहण
3.1 तलाक के सिद्धांत
A.तलाक से संबंधित विभिन्न सिद्धांत
B.तलाक के विधिक आधार
3.2 मुस्लिम विधि के अंतर्गत तलाक के आधार एवं प्रकार
A.तलाक के आधार
B.तलाक के विभिन्न प्रकार
3.3 संरक्षकता के विधि-संबंधी प्रावधान
A.संरक्षकता की संकल्पना
B.संरक्षकता से संबंधित कानून
C.नाबालिगों के संरक्षण से संबंधित नियम
3.4 संरक्षक के प्रकार
A.विभिन्न प्रकार के संरक्षक
B.संरक्षक के अधिकार एवं कर्तव्य
3.5 वैधता एवं वैधीकरण, पुत्रत्व की स्वीकृति तथा दत्तक ग्रहण
A.वैधता (Legitimacy)
B.वैधीकरण (Legitimation)
C.मुस्लिम विधि के अंतर्गत पुत्रत्व की स्वीकृति
D.मुस्लिम विधि में दत्तक ग्रहण
E.क्या मुस्लिम विधि में दत्तक ग्रहण मान्य है या नहीं?
इकाई-IV
दान/हिबा, वक्फ, वसीयती एवं निर्वसीयती उत्तराधिकार तथा पूर्वक्रय
4.1 मुस्लिम विधि के अंतर्गत दान/हिबा की संकल्पना
A.हिबा का अर्थ एवं परिभाषा
B.हिबा की आवश्यक शर्तें
C.हिबा की विधिक प्रकृति
4.2 दान के प्रकार एवं वक्फ
A.दान/हिबा के प्रकार
B.वक्फ का परिचय
4.3 वक्फ
A.मुस्लिम विधि के अंतर्गत वक्फ की संकल्पना
B.वक्फ का उद्देश्य
C.वक्फ की आवश्यक शर्तें
D.वक्फ के प्रकार
E.मूसा का सिद्धांत (Doctrine of Musha)
F.मुतवल्ली (Mutawalli)
G.वक्फ एवं सदका में अंतर
4.4 .वसीयती उत्तराधिकार एवं निर्वसीयती उत्तराधिकार
A.मुस्लिम विधि के अंतर्गत वसीयत
B.भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के अंतर्गत वसीयत
C.मुस्लिम विधि के अंतर्गत उत्तराधिकार का कानून
D.भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के अंतर्गत निर्वसीयती उत्तराधिकार
4.5 पूर्वक्रय का अधिकार
A.पूर्वक्रय (Pre-emption) की संकल्पना
B.मुस्लिम विधि के अंतर्गत पूर्वक्रय/शुफा का कानून
C.पूर्वक्रय के अधिकार की संवैधानिक वैधता
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मुस्लिम विधि का परिचय -
मुस्लिम विधि (Muslim Law) को समझने के लिए उसके उद्गम, स्रोत, प्रमुख शाखाओं, मूल सिद्धांतों तथा भारतीय विधि-व्यवस्था में उसके स्थान को क्रम से समझना जरूरी है। मुस्लिम विधि से आशय उन विधिक नियमों और सिद्धांतों के समूह से है जो इस्लाम धर्म के अनुयायियों के व्यक्तिगत एवं पारिवारिक मामलों को नियंत्रित करते हैं।
इसे सामान्यतः इस्लामी विधि (Islamic Law) या शरीयत (Shariat) से संबंधित विधि कहा जाता है। हालाँकि एक महत्वपूर्ण अंतर समझना चाहिए कि शरीयत का अर्थ व्यापक रूप से इस्लामी जीवन-पद्धति और ईश्वरीय मार्गदर्शन से है।
फिक़्ह (Fiqh) उन सिद्धांतों की मानवीय व्याख्या और उनसे विकसित विधिक नियमों को कहा जाता है।
भारतीय न्यायालयों में लागू मुस्लिम व्यक्तिगत विधि का बड़ा हिस्सा फिक़्ही सिद्धांतों और उनके विभिन्न मतों से विकसित हुआ है।
मुस्लिम विधि की प्रमुख विशेषताएँ -
(1) धार्मिक आधार - मुस्लिम विधि का मूल आधार इस्लामी धर्मग्रंथ और पैगम्बर मुहम्मद की शिक्षाएँ हैं। इसलिए इसका प्रारंभिक स्वरूप धार्मिक और नैतिक सिद्धांतों से गहराई से जुड़ा हुआ है।
(2) व्यक्तिगत विधि का स्वरूप - भारत में मुस्लिम विधि मुख्यतः इन विषयों में दिखाई देती है -
1. विवाह
2. तलाक
3. मेहर
4. भरण-पोषण
5. वैधता
6. संरक्षकता
7. वक्फ
8. उत्तराधिकार
9. वसीयत
10. उपहार
अर्थात इसका प्रमुख क्षेत्र व्यक्तिगत विधि (Personal Law) है।
(3) विभिन्न मत और संप्रदाय - मुस्लिम विधि एकरूप नहीं है। इसके प्रमुख दो संप्रदाय हैं -
1. सुन्नी - सुन्नी विधि में प्रमुख स्कूल -
A हनफ़ी - इसके संस्थापक इमाम अबू हनीफा माने जाते हैं। भारत में सुन्नी मुसलमानों के बीच हनफ़ी मत का ऐतिहासिक रूप से सबसे अधिक प्रभाव रहा है। इस स्कूल में तर्क, कियास और विधिक विवेक को अपेक्षाकृत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। भारत में हनफ़ी मत का विशेष प्रभाव रहा है।
B मालिकी - इसके प्रमुख प्रवर्तक इमाम मालिक थे। इसमें मदीना की प्रथा और आचरण को विशेष महत्व दिया गया।
C शाफ़ई - इसके संस्थापक इमाम शाफ़ई माने जाते हैं। इस स्कूल ने कुरआन, सुन्नत, इज्मा और कियास को व्यवस्थित रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
D हंबली - इसके प्रवर्तक इमाम अहमद इब्न हंबल थे। यह कुरआन और हदीस के शाब्दिक एवं पारंपरिक पालन पर अधिक बल देता है।
2. शिया विधि -शिया विधि की प्रमुख शाखा इथना-अशरी या इमामिया स्कूल है। भारत में शिया मुस्लिम व्यक्तिगत विधि के संदर्भ में इसका विशेष महत्व है। शिया विधि में -
A इमामिया
B इथना-अशरी, मत प्रमुख है।
सुन्नी और शिया विधि में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, अस्थायी विवाह आदि अनेक विषयों पर अंतर पाया जाता है।
(4) धार्मिक और लौकिक तत्वों का संबंध - मुस्लिम विधि के प्रारंभिक विकास में धार्मिक नियमों का महत्वपूर्ण स्थान था, लेकिन आधुनिक भारत में मुस्लिम व्यक्तिगत विधि का संचालन संविधान, संसद द्वारा बनाए गए कानूनों और न्यायिक निर्णयों के साथ मिलकर होता है।
3. मुस्लिम विधि के स्रोत - मुस्लिम विधि के स्रोतों को सामान्यतः प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों में समझा जाता है।
A. प्राथमिक स्रोत -
1. कुरआन - कुरआन मुस्लिम विधि का सबसे महत्वपूर्ण और मूल स्रोत है। इसमें विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, मेहर, पारिवारिक संबंध, न्याय और सामाजिक आचरण से संबंधित अनेक सिद्धांत मिलते हैं। कुरआन को मुस्लिम विधि का सर्वोच्च मूल स्रोत माना जाता है।
2. सुन्नत- सुन्नत से आशय पैगम्बर मुहम्मद के आचरण और अनुमोदनों से है। इन्हें परंपरागत रूप से हदीस के माध्यम से जाना जाता है। जब किसी विषय पर कुरआन में स्पष्ट नियम उपलब्ध नहीं होता, तो पैगम्बर की परंपरा और शिक्षाओं का सहारा लिया जाता है।
3. हदीस - मोहम्मद साहब के कथनों का संग्रह जिन्हें तत्कालीन साथियों द्वारा प्रमाणित किया गया था को हदीस कहा जाता है। हदीस वो संक्षिप्त दृष्टांत हैं जिन्हें पैगंबर साहब ने किसी समस्या के समाधान हेतु बताया था।
4. इज्मा (Ijma) - इज्मा का अर्थ योग्य मुस्लिम विधिवेत्ताओं द्वारा किसी विधिक प्रश्न पर सहमति से है। जब किसी विषय पर कुरआन और सुन्नत से सीधे समाधान उपलब्ध न हो, तो विद्वानों की सहमति से विधिक सिद्धांत विकसित किए गए। इज्मा ने मुस्लिम विधि के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
4. कियास (Qiyas) - कियास का अर्थ तर्क या सादृश्य के आधार पर विधिक नियम निकालना है। यदि किसी नए प्रश्न का स्पष्ट उत्तर कुरआन, सुन्नत या इज्मा में उपलब्ध न हो, तो समान परिस्थितियों वाले स्थापित नियम के आधार पर नए मामले का समाधान किया जाता है। उदाहरण के लिए, किसी नए प्रकार की परिस्थिति पर पुराने स्थापित सिद्धांत को तर्कसंगत रूप से लागू करना कियास की प्रक्रिया हो सकती है।
4. मुस्लिम विधि के द्वितीयक स्रोत -
प्रमुख द्वितीयक स्रोतों में निम्न शामिल हैं -
(1) रूढ़ि और प्रथा - किसी क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही वैध और निश्चित प्रथा कुछ परिस्थितियों में विधिक महत्व प्राप्त कर सकती है। हालाँकि कोई प्रथा ऐसी नहीं हो सकती जो अनिवार्य विधि या सार्वजनिक नीति के विरुद्ध हो।
(2) न्यायिक निर्णय - भारतीय न्यायालयों के निर्णयों ने मुस्लिम व्यक्तिगत विधि की व्याख्या और विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उच्च न्यायालय और विशेष रूप से सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों ने मुस्लिम विवाह, तलाक, भरण-पोषण, वक्फ आदि क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किए हैं।
(3) विधायन - भारत में संसद द्वारा बनाए गए कानूनों ने मुस्लिम व्यक्तिगत विधि के अनेक क्षेत्रों को प्रभावित और विनियमित किया है। उदाहरण के लिए -
(1) Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937
(2) Dissolution of Muslim Marriages Act, 1939
(3) Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act, 1986
(4) Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Act, 2019
इसलिए आधुनिक भारत में मुस्लिम विधि केवल पारंपरिक धार्मिक ग्रंथों से निर्धारित नहीं होती, बल्कि विधायन और न्यायिक व्याख्या भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
6. भारत में मुस्लिम विधि का विकास -
भारत में मुस्लिम शासन के साथ मुस्लिम विधि का प्रभाव बढ़ा। सल्तनत और मुगल काल में मुस्लिम शासकों के न्यायिक प्रशासन में इस्लामी विधिक सिद्धांतों का महत्वपूर्ण स्थान था। ब्रिटिश काल में स्थिति बदली। अंग्रेजी शासन ने मुस्लिम व्यक्तिगत मामलों में मुस्लिम विधि को काफी हद तक लागू किया, जबकि अन्य क्षेत्रों में अंग्रेजी और भारतीय कानून विकसित हुए। सन 1772 के वॉरेन हेस्टिंग्स के न्यायिक प्रशासन संबंधी प्रबंध में व्यक्तिगत मामलों में हिंदुओं और मुसलमानों के धार्मिक कानूनों को लागू करने की नीति अपनाई।
बाद में न्यायालयों ने मुस्लिम विधि के सिद्धांतों की व्याख्या की और अनेक न्यायिक नजीरें विकसित हुईं।
7. मुस्लिम विधि के प्रमुख क्षेत्र -
1. विवाह (निकाह) - मुस्लिम विधि में विवाह को निकाह कहा जाता है।
परंपरागत मुस्लिम विधि में निकाह को एक सिविल संविदा (Civil Contract) के रूप में देखा जाता है, यद्यपि इसमें धार्मिक और सामाजिक तत्व भी जुड़े होते हैं।
1. सुन्नी विधि में विवाह (निकाह) -
अर्थ - सुन्नी विधि में विवाह को निकाह कहा जाता है। निकाह एक सिविल संविदा (Civil Contract) है, हालांकि इसके धार्मिक और सामाजिक महत्व भी हैं।
सरल शब्दों में निकाह वह वैध संविदा है जिसके द्वारा एक पुरुष और स्त्री वैवाहिक संबंध स्थापित करते हैं और एक-दूसरे के प्रति वैधानिक अधिकार एवं दायित्व प्राप्त करते हैं। इसमें विवाह हेतु विशेष धार्मिक अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि प्रस्ताव और स्वीकृति महत्वपूर्ण हैं।
2. सुन्नी विधि में वैध विवाह की आवश्यक शर्तें - सुन्नी विधि में निकाह के लिए मुख्यतः निम्न बातें आवश्यक हैं:
प्रस्ताव और स्वीकृति - विवाह में एक पक्ष द्वारा प्रस्ताव (इजाब) किया जाता है।
दूसरे पक्ष द्वारा स्वीकृति (कबूल) दी जाती है। प्रस्ताव और स्वीकृति एक ही बैठक में होनी चाहिए। दोनों एक-दूसरे से संबंधित होने चाहिए।
उदाहरण - A ने B से विवाह का प्रस्ताव किया और B ने उसी बैठक में उसे स्वीकार कर लिया। अन्य आवश्यक शर्तें पूरी होने पर निकाह संपन्न हो सकता है।
पक्षकारों की क्षमता - निकाह करने वाले पक्षकारों में -
1. वयस्कता
2. स्वस्थ मस्तिष्क
3. स्वतंत्र सहमति का महत्व है।
मुस्लिम विधि में नाबालिग का विवाह अभिभावक के माध्यम से किए जाने की व्यवस्था भी पारंपरिक रूप से मिलती है।
गवाह - सुन्नी विधि में विवाह के समय गवाहों की उपस्थिति महत्वपूर्ण है। सुन्नी विधि के अनुसार दो पुरुष गवाह, अथवा एक पुरुष और दो स्त्री गवाह विवाह के समय उपस्थित होने चाहिए।
निषिद्ध संबंध नहीं होना चाहिए - ऐसे व्यक्तियों के बीच विवाह नहीं हो सकता जिनके बीच मुस्लिम विधि द्वारा निषिद्ध संबंध हों। निषेध रक्त-संबंध, विवाह-संबंध
दूध का संबंध के आधार पर हो सकता है।में जिसे महरम (घर के) से निकाह नहीं हो सकता इनमें मां, सगी बहन, मौसी, बुआ, बेटी, बेटे की बहू, दूध शरीक भाई/बहन, सास आदि से निकाह हराम है।
मेहर - मेहर (Dower/Mahr) पत्नी का वैधानिक अधिकार है। यह पति द्वारा पत्नी को दिया जाने वाला धन या संपत्ति है।
मेहर विवाह की कीमत नहीं है, बल्कि पत्नी का वैधानिक अधिकार और विवाह से उत्पन्न आर्थिक दायित्व है।
मेहर दो प्रकार का हो सकता है -
(क) शीघ्र मेहर (Prompt Dower) मेहर ए मोअज्जल जो सिक्का रायजुल वक्त (उस समय की प्रचलित मुद्रा में) जिसकी मांग पत्नी विवाह के बाद कर सकती है।
(ख) स्थगित मेहर (Deferred Dower)
जो सामान्यतः विवाह-विच्छेद या पति की मृत्यु जैसे अवसर पर देय होता है।
3. सुन्नी विधि में विवाह के प्रकार -
सुन्नी विधि में विवाह को तीन श्रेणियों में बांटा जाता है -
I. सहीह निकाह (Sahih) - यह वैध विवाह है। जब विवाह की सभी आवश्यक शर्तें पूरी हों और कोई कानूनी बाधा न हो, तो विवाह सहीह होता है। इसके परिणाम स्वरूप पत्नी को मेहर का अधिकार, भरण-पोषण का अधिकार, वैध संतान, उत्तराधिकार के अधिकार, वैवाहिक अधिकार एवं दायित्व उत्पन्न होते हैं।
II. बातिल निकाह (Batil) - यह शून्य विवाह (Void Marriage) है। जब विवाह ऐसी मूलभूत निषिद्धता के कारण किया जाए जिसे मुस्लिम विधि स्वीकार नहीं करती, तो वह बातिल हो सकता है।उदाहरण - ऐसे निकट संबंधों में विवाह जिनसे विवाह स्थायी रूप से निषिद्ध (हराम) है।
फासिद निकाह (Fasid) - यह अनियमित विवाह (Irregular Marriage) है। इसमें विवाह पूर्णतः शून्य नहीं होता, बल्कि कोई ऐसी अनियमितता होती है जिसे दूर किया जा सकता है।
उदाहरण - आवश्यक गवाहों का अभाव
कुछ परिस्थितियों में ऐसी स्त्री से विवाह जिससे विवाह अस्थायी रूप से निषिद्ध हो
यदि अनियमितता दूर कर दी जाए तो विवाह वैध हो सकता है।
4. विवाह के प्रभाव -
वैध निकाह के बाद पति-पत्नी के बीच अनेक अधिकार और दायित्व उत्पन्न होते हैं।
पत्नी के अधिकार - मेहर, भरण-पोषण
वैवाहिक सहवास, उत्तराधिकार, सम्मान एवं संरक्षण
पति के अधिकार - वैवाहिक सहवास, पत्नी से वैवाहिक निष्ठा, वैध वैवाहिक जीवन, दोनों के बीच वैध संतान का संबंध भी स्थापित होता है।
5. सुन्नी विधि में तलाक -
तलाक का अर्थ है पति पत्नी का मुस्लिम विधि के अनुसार विवाह-विच्छेद करना।
परंपरागत सुन्नी विधि में पति को तलाक देने की शक्ति प्राप्त थी, लेकिन यह शक्ति पूर्णतः निरंकुश नहीं मानी जानी चाहिए। आधुनिक भारतीय कानून ने तलाक के संबंध में महत्वपूर्ण सीमाएँ और प्रक्रियाएँ निर्धारित की हैं।
तलाक के प्रमुख प्रकार - सुन्नी विधि में तलाक को निम्न प्रकारों से समझा जाता है है-
तलाक-ए-अहसन - इसे तलाक का सबसे उत्तम और अनुमोदित तरीका माना जाता है। इसमें -
1. पत्नी के तुअहर (शुद्धता की अवधि) में एक बार तलाक दिया जाता है।
2. उस अवधि में पति-पत्नी के बीच सहवास नहीं होता।
3. इसके बाद इद्दत की अवधि पूरी होने तक प्रतीक्षा की जाती है।
4. इद्दत के दौरान पति तलाक वापस ले सकता है।
5. इद्दत समाप्त होने पर तलाक प्रभावी हो जाता है।
अहसन = एक घोषणा + इद्दत + वापसी की संभावना
तलाक-ए-हसन - इसमें पति तीन अलग-अलग तुअहरों में एक-एक बार तलाक की घोषणा करता है। शर्त यह है कि प्रत्येक घोषणा के बीच वैवाहिक सहवास न हो।
तीसरी घोषणा के बाद तलाक अंतिम हो जाता है।
दोनों तलाक में अंतर -
अहसन - एक ही घोषणा।
हसन - तीन अलग-अलग अवसरों पर तीन घोषणाएँ।
तलाक-उल-बिद्दत - इसे तीन तलाक भी कहा जाता है। इसमें पति एक ही अवसर पर तीन बार तलाक कहकर विवाह समाप्त करने का प्रयास करता है।
उदाहरण - पति द्वारा एक ही बार में लगातार तीन बार तलाक, तलाक, तलाक कह दे तो यह तलाक ए बिद्दत है।
भारत में यह यह तलाक निषिद्ध है क्योंकि Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Act, 2019 के तहत तलाक-ए-बिद्दत अथवा इसी प्रकार का तत्काल और अपरिवर्तनीय तलाक शून्य और अवैध है तथा इसके उच्चारण को दंडनीय बनाया गया है।
तलाक-ए-तफवीज - यह प्रत्यायोजित तलाक (Delegated Divorce) है। इसमें पति अपनी तलाक देने की शक्ति पत्नी को या किसी अन्य व्यक्ति को प्रत्यायोजित कर सकता है।
उदाहरण - पति विवाह के समय यह शर्त रख सकता है कि यदि वह दूसरी शादी करता है, तो पत्नी को अपने लिए तलाक लेने का अधिकार होगा। इसे तलाक-ए-तफवीज कहा जाता है।
खुला (Khula) क्रय किया हुआ तलाक- खुला पत्नी की पहल से विवाह-विच्छेद का एक तरीका है। इसमें पत्नी पति से विवाह समाप्त करने की इच्छा व्यक्त करती है और सामान्यतः मेहर या किसी अन्य आर्थिक अधिकार के त्याग/वापसी जैसी शर्तों पर दोनों के बीच समझौता हो सकता है। अर्थात पत्नी की पहल से पारस्परिक सहमति के आधार पर विवाह-विच्छेद।
11. मुबारात (Mubarat) - मुबारात में पति और पत्नी दोनों विवाह समाप्त करना चाहते हैं। खुला में पहल पत्नी की ओर से होती है, जबकि मुबारात में दोनों पक्ष विवाह समाप्त करने के इच्छुक होते हैं।
मुबारात की मुख्य विशेषता पारस्परिक सहमति है।
लियान और तलाक - यदि पति अपनी पत्नी पर व्यभिचार/अवैध यौन संबंध का आरोप लगाए और पत्नी उस आरोप से इनकार करे, तो विशेष परिस्थितियों में लियान की कार्यवाही का प्रश्न उठ सकता है। आधुनिक भारतीय न्यायालयों में मुस्लिम विवाह-विच्छेद के मामलों में इस सिद्धांत का ऐतिहासिक महत्व है।
इला और ज़िहार - ये भी मुस्लिम वैवाहिक विधि के पुराने सिद्धांत हैं।
इला - पति शपथ लेकर पत्नी के साथ एक निश्चित अवधि तक सहवास न करने की प्रतिज्ञा करता है।
ज़िहार - पति पत्नी की तुलना अपनी ऐसी महिला रिश्तेदार से करता है जिससे उसका विवाह हमेशा के लिए निषिद्ध है। इनका विवाह पर प्रभाव मुस्लिम विधि में अलग-अलग परिस्थितियों में निर्धारित किया गया है।
पत्नी द्वारा तलाक लेने का अधिकार मुस्लिम विधि में विवाह-विच्छेद का मार्ग केवल पति तक सीमित नहीं है। भारत में मुस्लिम पत्नी को Dissolution of Muslim Marriages Act, 1939 के अंतर्गत न्यायालय से विवाह-विघटन की डिक्री प्राप्त करने के विभिन्न आधार प्राप्त हैं। जैसे -
• पति का लापता होना।
• पति द्वारा भरण-पोषण न करना
• पति का कारावास
• पति की नपुंसकता
• पति द्वारा क्रूरता
• पति द्वारा वैवाहिक दायित्वों का पालन न करना
• एक से अधिक पत्नियों के बीच समान व्यवहार न करना
• अन्य वैधानिक आधार
तलाक या पति की मृत्यु के बाद इद्दत -
इद्दत वह प्रतीक्षा-अवधि है जिसे मुस्लिम विधि में तलाक या पति की मृत्यु के बाद निर्धारित परिस्थितियों में पत्नी को पूरी करना होता है। इसका प्रमुख उद्देश्य -
गर्भावस्था की स्थिति स्पष्ट करना
वंश की निश्चितता बनाए रखना
पुनर्विवाह से पहले निर्धारित अवधि पूरी करना है।
तलाक की स्थिति में 90 दिन एवं पति की मृत्यु की स्थिति 90 दिन प्रतीक्षा के और 40 दिन शौक के कुल 130 दिन इद्दत की होती है।
परीक्षा में याद रखने का सूत्र -
विवाह -
इजाब + कबूल + गवाह + क्षमता + निषिद्ध संबंध का अभाव + मेहर
विवाह के प्रकार -
सहीह → फासिद → बातिल
तलाक -
अहसन → हसन → बिद्दत
पत्नी/पारस्परिक विवाह-विच्छेद -
खुला → मुबारात → न्यायालय द्वारा विघटन
शिया मुस्लिम विधि में विवाह और तलाक -
शिया विधि सुन्नी विधि से कई बिंदुओं पर अलग है। खासकर अस्थायी विवाह (मुताह), गवाह और तलाक की प्रक्रिया में अंतर महत्वपूर्ण है -
1. शिया विधि में विवाह का अर्थ - शिया विधि में विवाह को निकाह कहा जाता है। यह एक वैधानिक संविदा है, जिसके द्वारा पुरुष और स्त्री के बीच वैवाहिक संबंध स्थापित होते हैं तथा उनके पारस्परिक अधिकार और दायित्व उत्पन्न होते हैं। शिया विधि में विवाह दो प्रकार का होता है -
1. स्थायी विवाह (निकाह-ए-दाइम) -
स्थायी विवाह में विवाह की कोई निश्चित समाप्ति तिथि पहले से निर्धारित नहीं होती। इसके प्रमुख तत्व हैं -
इजाब और कबूल - एक पक्ष द्वारा इजाब (प्रस्ताव) और दूसरे पक्ष द्वारा कबूल (स्वीकृति) होना आवश्यक है। दोनों एक ही बैठक में होने चाहिए और विवाह की इच्छा स्पष्ट होनी चाहिए।
पक्षकारों की क्षमता - विवाह करने वाले व्यक्ति विधि के अनुसार सक्षम होने चाहिए।
स्वतंत्र सहमति - विवाह में सहमति का विशेष महत्व है। दबाव या अनुचित प्रभाव से प्राप्त सहमति विवाद का आधार बन सकती है।
निषिद्ध संबंध - ऐसे व्यक्तियों के बीच विवाह नहीं किया जा सकता जिनके बीच मुस्लिम विधि द्वारा स्थायी विवाह निषिद्ध है।
मेहर - मेहर पत्नी का महत्वपूर्ण वैधानिक अधिकार है।
शिया और सुन्नी विवाह में एक अंतर - शिया विधि में विवाह के लिए गवाहों की उपस्थिति आवश्यक नहीं मानी जाती, जबकि सुन्नी विधि में गवाहों का विशेष महत्व है।
शिया विधि में मुताह विवाह - यह शिया विधि की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में से एक है। मुताह एक अस्थायी विवाह है, जिसमें विवाह की अवधि पहले से निर्धारित होती है।
उदाहरण - यदि पुरुष और स्त्री यह तय करें कि उनका विवाह 1 वर्ष की अवधि के लिए होगा और मेहर भी निश्चित करें, तो यह मुताह विवाह हो सकता है।
मुताह की आवश्यक शर्तें -
1. अवधि निश्चित होना
2. मेहर निश्चित होना
3. इजाब और कबूल
4. पक्षकारों की वैधानिक क्षमता
5. विवाह किसी निषिद्ध संबंध के बीच न हो
महत्वपूर्ण बात - अवधि या मेहर निर्धारित न हो तो मुताह की वैधता प्रभावित होती है।
मुताह के परिणाम - मुताह और स्थायी विवाह में महत्वपूर्ण अंतर हैं। मुताह में
पत्नी को स्थायी विवाह जैसी भरण-पोषण की व्यवस्था प्राप्त नहीं होती। पति-पत्नी को एक-दूसरे से उत्तराधिकार नहीं मिलता।
अवधि समाप्ती पर विवाह स्वत समाप्त हो जाता है। तलाक की आवश्यकता नहीं होती। इस विवाह से उत्पन्न संतान वैध होती है और उसे माता-पिता से उत्तराधिकार मिलता है।
मुताह कैसे समाप्त होता है? मुताह -
• निर्धारित अवधि समाप्त होने पर, या
• पति द्वारा शेष अवधि का त्याग करने पर
समाप्त होता है। इसे तलाक की तरह नहीं समझना चाहिए।
शिया विधि में तलाक -
शिया विधि में तलाक के लिए औपचारिक शर्तें अपेक्षाकृत कठोर हैं। विशेष रूप से तलाक के समय दो न्यायप्रिय पुरुष गवाहों की उपस्थिति आवश्यक मानी जाती है।
यह सुन्नी और शिया विधि का महत्वपूर्ण अंतर है।
शिया विधि में तलाक की आवश्यक शर्तें
• पति सक्षम हो
• तलाक देने वाला व्यक्ति बालिग हो,
• स्वस्थ मस्तिष्क का हो,
• अपनी इच्छा से तलाक दे।
• जिस पत्नी को तलाक दिया जा रहा है
• उस पत्नी की पहचान स्पष्ट हो।
• स्वतंत्र इच्छा हो - मजबूरी में दिया गया
• तलाक शिया विधि में वैध नहीं माना जा सकता।
• तलाक की मौखिक घोषणा -
• तलाक के लिए निर्धारित शब्दों में स्पष्ट घोषणा आवश्यक होती है।
• दो न्यायप्रिय पुरुष गवाह - शिया विधि में
• दो न्यायप्रिय पुरुष गवाहों की उपस्थिति में
• तलाक की घोषणा आवश्यक है।
तलाक-ए-सुन्नत और तलाक-ए-बिद्दत - शिया विधि में तलाक, तलाक-ए-सुन्नत के अनुरूप होना चाहिए। शिया विधि तलाक-ए-बिद्दत अर्थात एक ही समय में तीन तलाक देने को मान्यता नहीं है।
इसलिए शिया विधि में एक साथ तीन बार तलाक कहने से तलाक की अवधारणा स्वीकार नहीं होती। भारत में तो इससे भी आगे जाकर Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Act, 2019 ने तलाक-ए-बिद्दत या इसी प्रकार के तत्काल और अपरिवर्तनीय तलाक को शून्य और अवैध घोषित किया है।
तलाक-ए-अहसन - शिया विधि में तलाक का एक स्वीकार्य रूप तलाक-ए-अहसन है। इसमें पति पत्नी को उसके तुअहर में एक बार तलाक देता है और उस अवधि में सहवास नहीं करता। इसके बाद इद्दत की अवधि आती है।
तलाक-ए-हसन - तलाक-ए-हसन में अलग-अलग तुअहरों में तलाक की घोषणाएँ की जाती हैं। लेकिन शिया विधि में तलाक के संबंध में निर्धारित औपचारिकताओं और गवाहों की शर्त का विशेष महत्व है।
शिया विधि में तलाक और सुन्नी विधि का मुख्य अंतर -
आधार - सुन्नी विधि - शिया विधि
विवाह - स्थायी - विवाह स्थायी + मुताह
मुताह - मान्य नहीं - मान्य है
विवाह में गवाह - आवश्यक - आवश्यक नहीं
तलाक में गवाह - आवश्यक नहीं - दो न्यायप्रिय पुरुष गवाह आवश्यक
तीन तलाक - मान्य है - मान्य नहीं
तलाक का तरीका - व्यापक - औपचारिक
मुताह की समाप्ति - लागू नहीं - अवधि समाप्त/अवधि का त्याग
मुताह में उत्तराधिकार - लागू नहीं- पति-पत्नी में नहीं
मुताह की संतान - लागू नहीं - वैध
शिया विधि में खुला और मुबारात -
खुला - जब पत्नी विवाह समाप्त करना चाहती है और पति की सहमति से विवाह-विच्छेद होता है, तो इसे खुला कहा जाता है।
मुबारात - जब पति और पत्नी दोनों विवाह समाप्त करना चाहते हैं, तो इसे मुबारात कहा जाता है।
अर्थात: खुला = पत्नी की पहल प्रमुख है और मुबारात = दोनों की इच्छा।
शिया विधि में इद्दत - तलाक के बाद पत्नी को निर्धारित परिस्थितियों में इद्दत पूरी करनी होती है। स्थायी विवाह में सुन्नी नियम लागू, मुताह के बाद भी इद्दत के विशेष नियम लागू होते हैं, जो स्थायी विवाह के तलाक की इद्दत से अलग होते हैं।
निष्कर्ष - इस प्रकार शिया मुस्लिम विधि में विवाह का सबसे विशिष्ट पहलू मुताह विवाह है, जबकि तलाक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता दो न्यायप्रिय पुरुष गवाहों की उपस्थिति और तलाक की औपचारिकता है। शिया विधि में स्थायी विवाह के साथ-साथ निश्चित अवधि वाला मुताह विवाह भी मान्य है, जबकि एक साथ तीन तलाक को वैध तलाक का रूप नहीं माना जाता।
उत्तराधिकार (मिरास ) - मुस्लिम उत्तराधिकार विधि में संपत्ति के वितरण के विस्तृत नियम हैं। इसमें प्रमुख रूप से -
अंश (shares)
Residuaries
Distant Kindred
जैसी श्रेणियों का उल्लेख किया जाता है।
मृतक की संपत्ति के वितरण से पहले सामान्यत -
1. अंतिम संस्कार के खर्च,
2. ऋण,
3. वैध वसीयत
आदि का ध्यान रखा जाता है और उसके बाद उत्तराधिकारियों के अधिकार निर्धारित किए जाते हैं।
मुस्लिम विवाह में संविदा के तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं -
प्रस्ताव + स्वीकृति + क्षमता + सहमति + मेहर + वैधानिक परिणाम
लेकिन निकाह केवल सामान्य व्यापारिक संविदा जैसा भी नहीं है। इससे परिवार, संतान, उत्तराधिकार, भरण-पोषण और पति-पत्नी के व्यक्तिगत अधिकारों जैसे अनेक सामाजिक एवं कानूनी परिणाम उत्पन्न होते हैं।
9. वसीयत (Will) - मुस्लिम विधि में वसीयत के संबंध में विशेष नियम हैं। कोई मुस्लिम व्यक्ति अपने संपत्ति के एक-तिहाई तक की संपत्ति की वसीयत स्वतंत्र रूप से कर सकता है, जबकि उससे अधिक के संबंध में उत्तराधिकारियों की सहमति का आवश्यक है।
10. हिबा (Gift) - मुस्लिम विधि में उपहार को हिबा कहा जाता है। हिबा के आवश्यक तीन आवश्यक तत्व हैं -
1. दाता द्वारा घोषणा
2. प्राप्तकर्ता द्वारा स्वीकृति
3. कब्जे का हस्तांतरण।
11. वक्फ (ईश्वर की संपत्ति जिस की आय से जरूरतमंद की जरूरतों को पूरा किया जा सके) - वक्फ का अर्थ किसी संपत्ति को धार्मिक, पवित्र या परोपकारी उद्देश्य के लिए स्थायी रूप से समर्पित करना है। वक्फ मुस्लिम विधि की महत्वपूर्ण संस्था है। भारत में वक्फ से संबंधित मामलों के लिए अलग वैधानिक व्यवस्था भी मौजूद है।
भारतीय संविधान और मुस्लिम विधि
भारतीय संविधान में अनुच्छेद 14 समानता, अनुच्छेद 15 भेदभाव का निषेध,
अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता,
अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता के संबंध में राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत
महत्वपूर्ण हैं।
इसलिए आधुनिक भारत में मुस्लिम व्यक्तिगत विधि का अध्ययन व्यक्तिगत विधि और संवैधानिक मूल्यों के बीच संबंध को ध्यान में रखकर किया जाता है।
13. महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय -
(1) Mohd. Ahmed Khan v. Shah Bano Begum (1985) - सर्वोच्च न्यायालय ने तलाकशुदा मुस्लिम महिला के भरण-पोषण के प्रश्न पर महत्वपूर्ण निर्णय दिया।
(2) Danial Latifi v. Union of India (2001) - सर्वोच्च न्यायालय ने 1986 के कानून की व्याख्या करते हुए तलाकशुदा मुस्लिम महिला के अधिकारों को महत्वपूर्ण संरक्षण दिया।
(3) Shamim Ara v. State of U.P. (2002) - इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम पति द्वारा तलाक की वैधता के संबंध में महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किए और मात्र कथन के आधार पर तलाक को स्वीकार करने की प्रवृत्ति पर रोक लगाई।
(4) Shayara Bano v. Union of India (2017) - तत्काल तीन तलाक अर्थात तलाक-ए-बिद्दत की संवैधानिक वैधता पर ऐतिहासिक निर्णय दिया गया।
निष्कर्ष - इस प्रकार मुस्लिम विधि एक विकसित और बहुआयामी व्यक्तिगत विधि है, जिसका मूल आधार कुरआन और पैगम्बर की सुन्नत है तथा जिसके विकास में इज्मा, कियास, फिक़्ह, प्रथा, न्यायिक निर्णय और आधुनिक विधायन का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारत में इसका प्रमुख क्षेत्र विवाह, मेहर, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, वसीयत, हिबा और वक्फ है। आधुनिक समय में मुस्लिम विधि को समझने के लिए उसके पारंपरिक धार्मिक स्रोतों के साथ-साथ भारतीय संविधान, संसद के अधिनियमों और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का अध्ययन भी आवश्यक है।
मुस्लिम विधि का अनुप्रयोग
मुस्लिम विधि लागू होने की परिस्थितियां - भारत में मुस्लिम विधि का अनुप्रयोग मुख्यतः व्यक्ति की धार्मिक पहचान, विषय-वस्तु तथा लागू वैधानिक प्रावधानों पर निर्भर करता है। मुस्लिम विधि का सबसे महत्वपूर्ण वैधानिक आधार मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 है।
1. व्यक्ति का मुस्लिम होना - मुस्लिम विधि लागू होने की सबसे प्रमुख परिस्थिति यह है कि संबंधित व्यक्ति मुस्लिम हो। किसी व्यक्ति के मुस्लिम होने का निर्धारण सामान्यतः उसके जन्म से मुस्लिम परिवार में होने, इस्लाम स्वीकार करने, या मुस्लिम होने की वैध स्थिति से किया जाता है। इस हेतु केवल धार्मिक पहचान पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना आवश्यक है कि विवाद किस विषय से संबंधित है और उस विषय पर कोई विशेष अधिनियम लागू तो नहीं है।
2. मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 - धारा 2 मुस्लिम व्यक्तिगत विधि के अनुप्रयोग का प्रमुख प्रावधान है। इसके अनुसार, जहाँ पक्षकार मुस्लिम हैं, वहाँ अधिनियम में निर्दिष्ट व्यक्तिगत मामलों में निर्णय का नियम मुस्लिम व्यक्तिगत विधि होगा। इसमें मुख्यतः निम्न विषय आते हैं -
1. विवाह (निकाह)
2. विवाह - विच्छेद (तलाक, खुला)
3. इला - इला उस स्थिति को कहते हैं जब सक्षम एवं बालिग पति शपथ लेकर अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध न रखने की प्रतिज्ञा करता है।
4. ज़िहार - पति अपनी पत्नी की तुलना ऐसी महिला से करता है जो उसके लिए स्थायी रूप से विवाह-निषिद्ध (मह्रम) है, विशेष रूप से अपनी माँ से, और इस तुलना से पत्नी के साथ वैवाहिक संबंध को अपने लिए निषिद्ध बताता है। मुस्लिम विधि में ज़िहार के बाद पति के लिए पत्नी के साथ सहवास करना तब तक उचित नहीं माना जाता जब तक वह निर्धारित कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) न करे।
5. लिआन - लिआन का शाब्दिक अर्थ है लानत/धिक्कार करना। मुस्लिम विधि में जब पति अपनी पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाता है, लेकिन उसके पास आरोप को सिद्ध करने के लिए आवश्यक प्रमाण नहीं होते, और पति-पत्नी के बीच शपथ की विशेष प्रक्रिया होती है, तो इसे लिआन कहा जाता है। इसका आधार क़ुरआन की सूरह अन-नूर (24:6-9) में वर्णित प्रक्रिया है।
6. खुला - पत्नी द्वारा पति से मांगा गया तलाक।
7. मुबारात - जब पति और पत्नी दोनों विवाह समाप्त करने के इच्छुक हों और दोनों की सहमति से वैवाहिक संबंध समाप्त किया जाए, तो इसे मुबारात कहते हैं।
8. भरण-पोषण - पत्नी व संतान के जीवन यापन हेतु धनराशि।
9. मेहर - पत्नी द्वारा पति से प्राप्त किया जाने वाला स्त्री धन।
10. संरक्षकता
11. उपहार (हिबा)
12. न्यास और न्यास-संपत्ति
13. वक्फ
14. intestate succession अर्थात बिना वसीयत उत्तराधिकार
15. अन्य संबंधित व्यक्तिगत विधि के विषय
जब विवाद इन विषयों से संबंधित हो और पक्षकार मुस्लिम हों, तो मुस्लिम व्यक्तिगत विधि लागू होती है, बशर्ते किसी विशेष कानून ने उस विषय को अलग ढंग से विनियमित न किया हो।
3. विवाह और तलाक के मामलों में -
मुस्लिम विधि का महत्वपूर्ण क्षेत्र विवाह एवं विवाह-विच्छेद है। मुस्लिम विवाह को एक सिविल संविदा के रूप में समझा जाता है। इसलिए निकाह की वैधता, मेहर, तलाक, खुला, मुबारात आदि प्रश्नों में मुस्लिम विधि के सिद्धांत लागू होते हैं।लेकिन आधुनिक भारत में तलाक संबंधी कई मामलों को वैधानिक कानूनों ने प्रभावित किया है। उदाहरण के लिए, Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Act, 2019 ने तत्काल और अपरिवर्तनीय तलाक-ए-बिद्दत को लेकर विशेष वैधानिक व्यवस्था की है।
4. उत्तराधिकार के मामलों में -
मुस्लिम व्यक्ति की बिना वसीयत मृत्यु होने पर उसकी संपत्ति के उत्तराधिकार का प्रश्न उठता है तो मुस्लिम उत्तराधिकार विधि महत्वपूर्ण हो जाती है। मुस्लिम विधि में उत्तराधिकार के प्रमुख वर्ग हैं -
Sharers (हिस्सेदार)
Residuaries (अवशेषग्राही)
Distant kindred (दूर के संबंधी)
मुस्लिम उत्तराधिकार व्यवस्था में पुत्र, पुत्री, पति, पत्नी, माता, पिता आदि के हिस्से निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार तय किए जाते हैं।
5. वसीयत के मामलों में -
मुस्लिम व्यक्ति द्वारा की गई वसीयत के संबंध में भी मुस्लिम विधि के सिद्धांत लागू हो सकते हैं। मुस्लिम विधि का महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि मुस्लिम व्यक्ति सामान्यतः अपनी संपत्ति के एक-तिहाई तक की वसीयत स्वतंत्र रूप से कर सकता है, जबकि उससे अधिक के लिए संबंधित उत्तराधिकारियों की सहमति आवश्यक है।
इसलिए वसीयत के मामले में यह देखना आवश्यक है कि -
1. वसीयतकर्ता मुस्लिम है या नहीं,
2. वसीयत की प्रकृति क्या है,
3. संपत्ति किस प्रकार की है,
4. और संबंधित वैधानिक कानून क्या कहता है।
6. हिबा अर्थात मुस्लिम उपहार -
मुस्लिम विधि में हिबा (Gift) का विशेष स्थान है, मुस्लिम व्यक्ति द्वारा किए गए उपहार की वैधता पर मुस्लिम विधि लागू होती है। जिसके लिए तीन आवश्यक तत्व माने जाते हैं -
1. दाता द्वारा घोषणा,
2. प्राप्तकर्ता द्वारा स्वीकृति,
3. कब्जे का हस्तांतरण।
7. वक्फ के मामलों में -
वक्फ मुस्लिम विधि का महत्वपूर्ण संस्थान है। जब कोई मुस्लिम व्यक्ति धार्मिक, पवित्र या परोपकारी उद्देश्य के लिए अपनी संपत्ति को स्थायी रूप से समर्पित करता है, तो वक्फ संबंधी मुस्लिम विधि लागू होती है।
भारत में वक्फ के संबंध में विशेष वैधानिक कानून भी हैं। इसलिए किसी विवाद में मुस्लिम विधि के साथ-साथ संबंधित वक्फ कानून को भी देखना आवश्यक है।
8. मुस्लिम द्वारा धर्म परिवर्तन करने की स्थिति -
यदि कोई व्यक्ति मुस्लिम धर्म स्वीकार करता है, तो उसके बाद उसके व्यक्तिगत विधि संबंधी अधिकारों पर मुस्लिम विधि के प्रभाव से प्रभावित होता है। इसी प्रकार से यदि कोई मुस्लिम व्यक्ति धर्म परिवर्तन करता है, तो उसके विवाह, उत्तराधिकार आदि अधिकारों पर अलग-अलग वैधानिक प्रावधान लागू होते हैं। धर्म परिवर्तन मात्र से प्रत्येक पूर्व अधिकार या कानूनी संबंध स्वतः समाप्त हो जाता है, ऐसा सामान्य नियम नहीं माना जा सकता। प्रत्येक मामले में लागू कानून और परिस्थितियों को देखना पड़ता है।
9. पक्षकारों की सहमति या संविदा के कारण नहीं, बल्कि विधि के कारण -
मुस्लिम व्यक्तिगत विधि का अनुप्रयोग केवल इसलिए नहीं होता कि दोनों पक्षकार मुस्लिम हैं और उन्होंने मुस्लिम विधि को चुन लिया है। जहाँ किसी विषय पर मुस्लिम पर्सनल लॉ लागू करने का विधिक आधार है, वहाँ वह कानून के आधार पर लागू होता है। इसके विपरीत यदि संसद ने किसी विषय के संबंध में विशेष कानून बना दिया है, तो उस विशेष कानून को प्राथमिकता दी जाएगी।
10. विशेष अधिनियम होने पर उसकी प्रधानता -
यदि किसी विषय को संसद ने विशेष कानून द्वारा विनियमित कर दिया है, तो उस विषय पर संबंधित विशेष अधिनियम लागू होगा।
उदाहरण के लिए विवाह और तलाक से संबंधित विशेष कानून, मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से संबंधित विशेष कानून, वक्फ से संबंधित कानून, संपत्ति और उत्तराधिकार से संबंधित लागू वैधानिक कानून, मुस्लिम व्यक्तिगत विधि के सामान्य सिद्धांतों को प्रभावित करते हैं। अर्थात मुस्लिम विधि को हमेशा अकेले नहीं पढ़ा जा सकता; उसे वर्तमान वैधानिक कानून के साथ पढ़ना आवश्यक है।
मुस्लिम विधि लागू होने के लिए आवश्यक प्रमुख आधार
इसे चार शब्दों में समझ सकते हैं
व्यक्ति + विषय + कानून + अपवाद।
(1) व्यक्ति - क्या संबंधित व्यक्ति मुस्लिम है?
(2) विषय - क्या विवाद व्यक्तिगत विधि के ऐसे विषय से संबंधित है जिस पर मुस्लिम विधि लागू होती है?
(3) कानून - क्या किसी अधिनियम ने उस विषय के लिए विशेष व्यवस्था की है?
(4) अपवाद - क्या कोई वैधानिक अपवाद, विशेष कानून या न्यायिक निर्णय मुस्लिम विधि के सामान्य नियम को प्रभावित करता है?
प्रमुख न्यायिक दृष्टिकोण
मुस्लिम विधि के अनुप्रयोग में भारतीय न्यायालयों ने यह स्पष्ट किया है कि मुस्लिम व्यक्तिगत विधि का अध्ययन केवल धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं है। भारत में उसका अनुप्रयोग वैधानिक कानून, न्यायिक निर्णय और व्यक्तिगत विधि के मान्य सिद्धांतों के समन्वय से होता है। विशेष रूप से Shah Bano मामला, Shamim Ara v. State of U.P. तथा Shayara Bano v. Union of India जैसे निर्णय मुस्लिम विवाह-विच्छेद एवं व्यक्तिगत विधि के आधुनिक भारतीय स्वरूप को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
निष्कर्ष - अतः कहा जा सकता है कि भारत में मुस्लिम विधि मुख्यतः मुस्लिम व्यक्तियों के व्यक्तिगत एवं पारिवारिक मामलों में लागू होती है। विवाह, तलाक, मेहर, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, वसीयत, हिबा, वक्फ आदि इसके प्रमुख क्षेत्र हैं। इसका वैधानिक आधार विशेष रूप से मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 है। परंतु जहाँ किसी विषय पर संसद द्वारा विशेष कानून बनाया गया है, वहाँ उस विशेष कानून की व्यवस्था को प्राथमिकता दी जाती है।
भारत में मुस्लिम विधि का विकास एवं न्यायिक व्याख्या -
मुस्लिम विधि के इतिहास का बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न है। इसे परीक्षा की दृष्टि से क्रमबद्ध रूप में समझना उपयोगी रहेगा।
भारत में मुस्लिम विधि का विकास मुख्यतः इस्लामी विधि, मुस्लिम शासकों की प्रशासनिक व्यवस्था, ब्रिटिश न्याय-व्यवस्था तथा स्वतंत्र भारत के न्यायालयों के निर्णयों के माध्यम से हुआ। मुस्लिम विधि का प्रमुख आधार कुरआन, हदीस/सुन्नत, इज्मा और कियास हैं। भारत में इसके साथ-साथ प्रथा, न्यायिक निर्णय और विधायन ने भी इसके स्वरूप को प्रभावित किया। मुस्लिम विधि को समझने के लिए इसके विकास को विभिन्न ऐतिहासिक चरणों में बाँटना उचित है।
1. भारत में मुस्लिम विधि के विकास के प्रमुख चरण -
(क) मुस्लिम शासन से पूर्व की स्थिति -
मुस्लिम शासन से पहले भारत में मुख्यतः हिन्दू विधि और स्थानीय प्रथाएँ लागू थीं। मुस्लिम समुदाय के व्यक्तिगत मामलों में मुस्लिम विधि का कोई व्यापक न्यायिक प्रयोग नहीं था। भारत में मुस्लिम विधि का व्यवस्थित प्रवेश मुस्लिम शासकों के आगमन के साथ हुआ।
(ख) दिल्ली सल्तनत के काल में विकास - भारत में मुस्लिम शासन स्थापित होने के बाद मुस्लिम विधि को प्रशासन और न्याय व्यवस्था में स्थान मिला। दिल्ली सल्तनत के दौरान काजी न्यायिक अधिकारी होते थे। वे मुस्लिमों के व्यक्तिगत एवं धार्मिक मामलों में इस्लामी विधि के सिद्धांतों को लागू करते थे। इस काल में मुख्यतः हनफी मत का प्रभाव रहा, क्योंकि भारत के अधिकांश मुस्लिम शासक सुन्नी और विशेषतः हनफी परंपरा से प्रभावित थे। इस समय मुस्लिम विधि का प्रयोग मुख्यतः निम्न मामलों में हुआ—
विवाह, तलाक, मेहर, उत्तराधिकार, वक्फ, संरक्षकता, दान आदि।
(ग). मुगल काल में मुस्लिम विधि का विकास - मुगल काल में मुस्लिम विधि को अधिक व्यवस्थित रूप प्राप्त हुआ।
फतावा-ए-आलमगीरी - औरंगजेब के शासनकाल में मुस्लिम विधि के हनफी सिद्धांतों को संकलित करने का महत्वपूर्ण प्रयास किया गया। इसके परिणामस्वरूप फतावा-ए-आलमगीरी का निर्माण हुआ।
इसमें हनफी विधि के विभिन्न सिद्धांतों और नियमों का संकलन किया गया। इसका भारतीय मुस्लिम विधि के विकास में विशेष महत्व है क्योंकि इसने न्यायाधीशों और काजियों को मुस्लिम विधि के नियमों का व्यवस्थित स्रोत प्रदान किया।
(घ). ब्रिटिश काल में मुस्लिम विधि का विकास - ब्रिटिश शासन भारत में मुस्लिम विधि के विकास का अत्यंत महत्वपूर्ण चरण था। सन 1772 में वॉरेन हेस्टिंग्स की न्यायिक योजना के अंतर्गत यह व्यवस्था की गई कि हिन्दू और मुसलमानों के व्यक्तिगत मामलों में क्रमशः हिन्दू और मुस्लिम विधि के सिद्धांतों का पालन किया जाएगा। मुसलमानों के निम्न मामलों में मुस्लिम विधि को विशेष रूप से लागू किया गया— विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, वसीयत, मेहर, धार्मिक संस्थाएँ, वक्फ आदि।
इस काल में अंग्रेज न्यायाधीशों ने मुस्लिम विधि की व्याख्या करने के लिए मुस्लिम विधिशास्त्रियों की पुस्तकों तथा अनुवादों का सहारा लिया।
(च). मुस्लिम विधि के प्रमुख अंग्रेजी ग्रंथ - ब्रिटिश काल में मुस्लिम विधि को समझने और न्यायालयों में लागू करने के लिए कई महत्वपूर्ण ग्रंथ तैयार हुए।
विशेष रूप से—
• Sir William Jones द्वारा मुस्लिम विधि के अध्ययन और अनुवाद का महत्वपूर्ण कार्य हुआ।
• Hamilton ने Hedaya का अंग्रेजी अनुवाद किया।
• Baillie ने मुस्लिम विधि पर महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे।
• बाद में D.F. Mulla की Principles of Mahomedan Law अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ बनी।
इन पुस्तकों ने भारतीय न्यायालयों में मुस्लिम विधि की व्याख्या को व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
(ज). मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 - मुस्लिम विधि के आधुनिक विकास में Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937 का विशेष महत्व है। इस अधिनियम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि मुसलमानों के कुछ व्यक्तिगत मामलों में मुस्लिम पर्सनल लॉ अर्थात शरीयत लागू हो। इसके अंतर्गत प्रमुख विषय थे—विवाह, तलाक, भरण-पोषण, मेहर, उत्तराधिकार, वसीयत, उपहार, वक्फ आदि। इस अधिनियम ने प्रथागत कानून के स्थान पर मुस्लिम व्यक्तिगत विधि को अधिक स्पष्ट आधार प्रदान किया।
(झ). स्वतंत्रता के बाद मुस्लिम विधि का विकास - स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान लागू हुआ। मुस्लिम विधि को अब संविधान के मौलिक अधिकारों, समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक सुधार के संदर्भ में देखा जाने लगा। मुस्लिम विधि का विकास तीन माध्यमों से हुआ—
1. न्यायिक निर्णय - सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों ने मुस्लिम विधि की व्याख्या की।
2. विधायन - संसद द्वारा बनाए गए कानूनों ने मुस्लिम व्यक्तिगत विधि के कुछ क्षेत्रों को प्रभावित किया।
3. संवैधानिक सिद्धांत - मौलिक अधिकारों तथा संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों ने मुस्लिम विधि की न्यायिक व्याख्या को प्रभावित किया।
भारत में मुस्लिम विधि की न्यायिक व्याख्या -
भारतीय न्यायालयों ने मुस्लिम विधि को स्थिर एवं अपरिवर्तनीय नियमों के रूप में नहीं देखा, बल्कि बदलती सामाजिक और संवैधानिक परिस्थितियों के संदर्भ में उसकी व्याख्या की है। कुछ महत्वपूर्ण निर्णय इस प्रकार हैं -
(1) Abdul Kadir v. Salima - इस मामले में मुस्लिम विवाह की प्रकृति पर विचार किया गया। न्यायालय ने मुस्लिम विवाह को एक सिविल कॉन्ट्रैक्ट (अनुबंध) के रूप में समझाया, जिसमें प्रस्ताव, स्वीकृति और अन्य आवश्यक तत्व महत्वपूर्ण होते हैं। इस निर्णय ने मुस्लिम विवाह की कानूनी प्रकृति को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
(2) Mohd. Ahmed Khan v. Shah Bano Begum, 1985 - यह भारतीय मुस्लिम विधि से संबंधित सबसे प्रसिद्ध मामलों में से एक है। शाह बानो के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत तलाकशुदा मुस्लिम महिला के भरण-पोषण के अधिकार पर विचार किया।
न्यायालय ने माना कि यदि तलाकशुदा मुस्लिम महिला स्वयं अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है, तो लागू वैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत उसे भरण-पोषण मिल सकता है। इस निर्णय के बाद संसद ने Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act, 1986 बनाया।
महत्व - यह निर्णय व्यक्तिगत विधि और सामान्य वैधानिक कानून के बीच संबंध तथा महिलाओं के अधिकारों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
(3). Danial Latifi v. Union of India, 2001 - यह मामला 1986 के अधिनियम की संवैधानिक वैधता से संबंधित था। सर्वोच्च न्यायालय ने अधिनियम की ऐसी व्याख्या की जिससे तलाकशुदा मुस्लिम महिला के लिए पति द्वारा उचित और न्यायसंगत प्रावधान एवं भरण-पोषण सुनिश्चित किया जा सके।न्यायालय ने इस कानून की व्याख्या संविधान के समानता और गरिमा संबंधी मूल्यों के अनुरूप की।
महत्व - इस निर्णय ने मुस्लिम महिला के आर्थिक अधिकारों की सुरक्षा को मजबूत किया।
(4). Shamim Ara v. State of U.P., 2002 - सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल यह कह देना कि पति ने तलाक दे दिया है, अपने-आप में पर्याप्त नहीं है।
तलाक के लिए मुस्लिम विधि के आवश्यक सिद्धांतों का पालन होना चाहिए तथा तलाक का वास्तविक और उचित आधार होना आवश्यक है।
महत्व - इस निर्णय ने मनमाने तलाक के विरुद्ध न्यायिक नियंत्रण को मजबूत किया।
11. Shayara Bano v. Union of India, 2017 - यह आधुनिक मुस्लिम विधि का ऐतिहासिक निर्णय है। मामला तलाक-ए-बिद्दत अर्थात तीन तलाक से संबंधित था। सर्वोच्च न्यायालय ने बहुमत से तलाक-ए-बिद्दत को असंवैधानिक/अमान्य ठहराते हुए इसे समाप्त कर दिया।
इस निर्णय के बाद संसद ने Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Act, 2019 बनाया, जिसने तत्काल तीन तलाक की घोषणा को दंडनीय अपराध बनाया।
महत्व - इस निर्णय ने मुस्लिम व्यक्तिगत विधि, लैंगिक समानता और संवैधानिक अधिकारों के बीच संबंध को नई दिशा दी।
न्यायिक व्याख्या की विशेषताएँ -
भारत में मुस्लिम विधि की न्यायिक व्याख्या की प्रमुख विशेषताएँ हैं—
(1) व्यक्तिगत विधि और संविधान का समन्वय - न्यायालय मुस्लिम व्यक्तिगत विधि की व्याख्या करते समय संविधान के मूल्यों को भी ध्यान में रखते हैं।
(2) महिलाओं के अधिकारों पर जोर -
भरण-पोषण, तलाक और विवाह संबंधी मामलों में न्यायालयों ने महिलाओं की गरिमा एवं आर्थिक सुरक्षा को महत्वपूर्ण माना है।
(3) मनमानी प्रथाओं पर नियंत्रण - न्यायालयों ने ऐसी प्रथाओं को स्वीकार नहीं किया जो कानून या संवैधानिक सिद्धांतों से टकराती हों।
(4) प्रगतिशील व्याख्या - न्यायालयों ने मुस्लिम विधि के पारंपरिक सिद्धांतों की व्याख्या आधुनिक सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप करने का प्रयास किया है।
मुस्लिम विधि के आधुनिक स्रोत -
आज भारत में मुस्लिम विधि केवल धार्मिक ग्रंथों पर आधारित नहीं है। इसके प्रमुख स्रोत हैं—
1. कुरआन
2. सुन्नत/हदीस
3. इज्मा
4. कियास
5. प्रथा व रूढ़ि, जहाँ विधि द्वारा मान्य हो
6. न्यायिक निर्णय
7. विधायन
8. न्याय, समता और सद्विवेक के सिद्धांत
निष्कर्ष - इस प्रकार भारत में मुस्लिम विधि का विकास एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है। इसका प्रारंभ मुस्लिम शासन के दौरान इस्लामी विधि के प्रयोग से हुआ, मुगल काल में इसे अधिक व्यवस्थित स्वरूप मिला, ब्रिटिश काल में न्यायालयों तथा विधि-ग्रंथों द्वारा इसका संहिताबद्ध एवं न्यायिक रूप विकसित हुआ और स्वतंत्र भारत में इसका विकास संविधान, संसद के कानूनों और न्यायिक व्याख्याओं के माध्यम से हुआ।
विशेष रूप से Shah Bano, Danial Latifi, Shamim Ara और Shayara Bano जैसे निर्णयों ने यह स्पष्ट किया कि भारत में मुस्लिम विधि की व्याख्या अब केवल पारंपरिक धार्मिक सिद्धांतों तक सीमित नहीं है, बल्कि न्याय, समानता, गरिमा और संवैधानिक मूल्यों के संदर्भ में भी की जाती है।
भारतीय मुस्लिम विधि का वर्तमान स्वरूप परम्परा और आधुनिक संवैधानिक न्यायशास्त्र के निरंतर संवाद का परिणाम है।
मुस्लिम विधि में धर्म परिवर्तन -
मुस्लिम विधि (Muslim Law) में धर्म परिवर्तन (Conversion) से तात्पर्य किसी गैर-मुस्लिम द्वारा इस्लाम स्वीकार करने (इस्लाम में प्रवेश) या किसी मुस्लिम द्वारा इस्लाम त्यागने (मूर्तद) (इरतिदाद / Apostasy) से है। व्यक्तिगत विधि (Personal Law) होने के कारण धर्म परिवर्तन का व्यक्ति के विवाह, उत्तराधिकार, संरक्षकता और संपत्ति अधिकारों पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
• इस्लाम में धर्म परिवर्तन -किसी गैर-मुस्लिम व्यक्ति का इस्लाम स्वीकार करना दो प्रकार से मान्य होता है -
1.सच्चे विश्वास द्वारा (Profession of Faith) - व्यक्ति केवल औपचारिक रूप से कलमा पढ़े और अल्लाह की एकता तथा पैगंबर मोहम्मद साहब के अंतिम पैगंबर होने पर आस्था व्यक्त करे।
2. धार्मिक संस्कारों द्वारा (Ceremony) - मस्जिद में जाकर काजी या गवाहों के समक्ष विधिवत घोषणा करे और नया मुस्लिम नाम अपनाए।
न्यायालय के अनुसार, धर्म परिवर्तन वास्तविक और सद्भावनापूर्ण (Bona fide) होना चाहिए, न कि केवल किसी व्यक्तिगत कानून के दायित्वों से बचने के लिए किया गया दिखावा।
विवाह पर प्रभाव - यदि कोई गैर-मुस्लिम पुरुष इस्लाम स्वीकार करता है, तो उसका पूर्व विवाह स्वतः समाप्त नहीं होता।
सरला मुद्गल बनाम भारत संघ (1995) & लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2000) - सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई हिंदू पुरुष पहली शादी के रहते केवल दूसरी शादी करने के उद्देश्य से इस्लाम अपनाता है, तो दूसरा विवाह शून्य (Void) होगा और वह धारा 494 IPC (द्विविवाह/Bigamy) का दोषी होगा।
उत्तराधिकार पर प्रभाव - इस्लाम अपनाने के बाद उस व्यक्ति की संपत्ति के उत्तराधिकार पर मुस्लिम विधि लागू होगी, जब तक कि किसी विशेष अधिनियम (जैसे कास्ट डिसेबिलिटीज रिमूवल एक्ट) द्वारा पिछले अधिकारों का संरक्षण न हो।
2. इस्लाम का परित्याग (मूर्तद होना) (Apostasy / इरतिदाद) -
शब्द मूर्तद का अर्थ है वचन से पलटना, जब कोई मुस्लिम व्यक्ति इस्लाम छोड़कर कोई अन्य धर्म अपना लेता है, तो उसे 'मुर्तद' (Apostate) कहा जाता है। आधुनिक भारतीय विधि में इसके प्रभाव निम्नलिखित हैं -
पति द्वारा धर्म परिवर्तन - यदि मुस्लिम पति इस्लाम त्यागकर दूसरा धर्म अपना लेता है, तो उसका निकाह उसी क्षण तत्काल स्वतः समाप्त (Ipso facto dissolved) हो जाता है।
पत्नी द्वारा धर्म परिवर्तन (मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939 की धारा 4) - सामान्य नियम - यदि एक विवाहित मुस्लिम महिला इस्लाम का त्याग करती है, तो उसका विवाह स्वतः समाप्त नहीं होता। उसे विवाह समाप्त कराने के लिए अदालत से डिक्री लेनी होगी।
अपवाद - यदि वह महिला मूलतः किसी अन्य धर्म की थी और शादी के लिए इस्लाम अपनाया था, और बाद में पुनः अपने मूल धर्म में लौटती है, तो निकाह स्वतः समाप्त हो जाता है।
उत्तराधिकार पर प्रभाव -
जाति-अक्षमता निष्कासन अधिनियम, 1850 (Caste Disabilities Removal Act) - इस कानून के तहत यदि कोई व्यक्ति इस्लाम त्यागता है, तो भी वह अपने मुस्लिम पूर्वजों या रिश्तेदारों की संपत्ति में उत्तराधिकार पाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
यद्यपि स्वयं उस परित्यागी व्यक्ति की मृत्यु पर उसकी संपत्ति का वितरण उसके नए धर्म के व्यक्तिगत कानून के अनुसार तय होता है।
संतानों की संरक्षकता - (Guardianship) - केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर किसी माता-पिता से बच्चे की अभिरक्षा (Custody) स्वतः नहीं छीनी जा सकती। अदालत हमेशा नाबालिग के सर्वोत्तम हित (Welfare of the Child) को सर्वोपरि मानकर निर्णय करती है।
मुस्लिम विधि में विवाह की आवश्यक शर्तें -
मुस्लिम विधि में विवाह (निकाह) एक सिविल संविदा (Civil Contract) है
जिसका उद्देश्य पति-पत्नी के बीच वैधानिक वैवाहिक संबंध स्थापित करना है। मुस्लिम विधि में विवाह की वैधता के लिए कुछ आवश्यक शर्तों का पूरा होना जरूरी है -
प्रस्ताव (इजाब)
स्वीकृति (कबूल)
स्वतंत्र सहमति
पक्षकारों की क्षमता
गवाह
वैधता में बाधक परिस्थितियों का नहीं होना।
I. प्रस्ताव और स्वीकृति (इजाब और कबूल) - मुस्लिम विवाह के लिए एक पक्ष द्वारा इजाब (प्रस्ताव) और दूसरे पक्ष द्वारा कबूल (स्वीकृति) किया जाना आवश्यक है। प्रस्ताव और स्वीकृति एक ही बैठक में तथा एक-दूसरे के अनुरूप होनी चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि पुरुष ₹1 लाख मेहर पर विवाह का प्रस्ताव करता है और महिला उसी प्रस्ताव को स्वीकार कर लेती है, तो इजाब और कबूल की आवश्यक शर्त पूरी होती है।
II. स्वतंत्र एवं वास्तविक सहमति - विवाह दोनों पक्षों की स्वतंत्र इच्छा और सहमति से होना चाहिए। दबाव, बल या अनुचित प्रभाव से प्राप्त सहमति विवाह की वैधता को प्रभावित कर सकती है। बालिग और स्वस्थ मस्तिष्क वाले व्यक्ति की सहमति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
III. विवाह के समय पक्षकारों की क्षमता - मुस्लिम विधि में विवाह के लिए पक्षकारों का बालिग और स्वस्थ मस्तिष्क होना महत्वपूर्ण है। पारंपरिक मुस्लिम विधि में नाबालिग का विवाह उसके संरक्षक द्वारा किया जा सकता है, लेकिन वर्तमान कानून में बाल विवाह पर अलग वैधानिक प्रतिबंध लागू होते हैं। इसलिए मुस्लिम विधि के पारंपरिक सिद्धांत और वर्तमान वैधानिक स्थिति को अलग-अलग हैं।
IV. गवाहों की उपस्थिति - सुन्नी विधि में निकाह के लिए गवाहों की उपस्थिति आवश्यक मानी जाती है। दो पुरुष गवाह या एक पुरुष और दो महिला गवाहों की उपस्थिति आवश्यक मानी जाती है। शिया विधि में विवाह के लिए गवाहों की उपस्थिति अनिवार्य नहीं मानी जाती, हालांकि तलाक के संबंध में गवाहों की विशेष आवश्यकता होती है।
V. निषिद्ध संबंधों का अभाव - ऐसे व्यक्तियों के बीच विवाह नहीं हो सकता जिनके बीच मुस्लिम विधि के अनुसार स्थायी निषिद्ध संबंध हो। यह तीन प्रकार के होते हैं -
(क) रक्त-संबंध (Consanguinity) जैसे माता-पिता, संतान, भाई-बहन आदि।
(ख) विवाह-संबंध (Affinity) - जैसे सास, सौतेली माँ आदि से संबंधित कुछ निषिद्ध संबंध।
(ग) दूध का संबंध (Fosterage) - दूध पिलाने से उत्पन्न कुछ रिश्तों में भी विवाह निषिद्ध होता है।
VI. बहुविवाह से संबंधित सीमा - मुस्लिम विधि के नियमों के अनुसार मुस्लिम पुरुष एक समय में अधिकतम चार पत्नियां रख सकता है। पांचवीं पत्नी से किया गया विवाह सुन्नी विधि में अनियमित (Irregular) होता है, जबकि परिस्थितियों के अनुसार शिया विधि में अलग परिणाम हो सकते हैं। मुस्लिम महिला एक समय में एक से अधिक पति से विवाह नहीं कर सकती।
VII. इद्दत के दौरान विवाह - मुस्लिम विधि में किसी तलाकशुदा या विधवा महिला की इद्दत पूरी होने से पहले विवाह करने पर वैधानिक समस्या उत्पन्न होती है। सुन्नी विधि में इद्दत के दौरान किया गया विवाह सामान्यतः अनियमित (फासिद) माना जाता है, जबकि शिया विधि में इसके संबंध में अधिक कठोर दृष्टिकोण पाया जाता है।
VIII. धर्म से संबंधित प्रतिबंध - मुस्लिम विधि में पक्षकारों के धर्म का भी महत्व है। मुस्लिम पुरुष का विवाह किसी मुस्लिम महिला से वैध हो सकता है और सुन्नी विधि में किताबिया (Christian या Jewish) महिला से विवाह को भी कुछ परिस्थितियों में वैध माना जाता है। मुस्लिम महिला का गैर-मुस्लिम पुरुष से विवाह मुस्लिम विधि में वैध नहीं माना जाता है। हालांकि भारत में Special Marriage Act, 1954 के अंतर्गत अलग धार्मिक व्यवस्था के तहत विवाह किया जा सकता है।
IX. मेहर (Dower) - मेहर विवाह का महत्वपूर्ण परिणाम है। यह वह धन या संपत्ति है जिसे पति विवाह के कारण पत्नी को देने के लिए बाध्य होता है। मेहर का निर्धारण विवाह के समय किया जा सकता है, लेकिन मेहर की राशि निर्धारित न होने से विवाह अवैध नहीं हो जाता। ऐसी स्थिति में पत्नी को उचित मेहर का अधिकार प्राप्त होता है।
विवाह का उद्देश्य एवं वैधता - मुस्लिम विवाह केवल धार्मिक संस्कार नहीं, बल्कि एक वैधानिक संविदा है। इसलिए इजाब और कबूल, पक्षकारों की क्षमता, सहमति तथा विवाह में कोई वैधानिक बाधा न होना इसकी वैधता के प्रमुख आधार हैं।
वैध, अनियमित और शून्य विवाह - मुस्लिम विधि में विवाह को तीन श्रेणियों में समझाया जाता है -
(1) सहीह (Sahih) विवाह - जब विवाह की सभी आवश्यक शर्तें पूरी हों और कोई वैधानिक बाधा न हो, तो विवाह सहीह अर्थात वैध होता है।
(2) फासिद (Fasid) विवाह - जब विवाह में कोई ऐसी अस्थायी या दूर की जा सकने वाली बाधा हो जिसे हटाया जा सकता है, तो सुन्नी विधि में विवाह फासिद अर्थात अनियमित माना जा सकता है। उदाहरण - कुछ परिस्थितियों में पांचवीं पत्नी से विवाह या इद्दत के दौरान विवाह।
(3) बातिल (Batil) विवाह - जहां विवाह में ऐसी मूलभूत और स्थायी बाधा हो जिसके कारण विवाह कानून की दृष्टि से अस्तित्वहीन हो, वहां विवाह बातिल अर्थात शून्य माना जाता है। जैसे निषिद्ध रक्त-संबंध में विवाह।
सूत्र - इजाब + कबूल + स्वतंत्र सहमति + क्षमता + आवश्यक गवाह + निषिद्ध संबंध का अभाव + अन्य वैधानिक बाधाओं का अभाव = वैध (सहीह) मुस्लिम विवाह।
नोट - मुस्लिम विवाह के पारंपरिक नियमों के साथ भारत के वर्तमान कानून, विशेषकर बाल विवाह, बहुविवाह, विवाह-पंजीकरण और Special Marriage Act से संबंधित नियमों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
मुस्लिम विधि में मेहर की संकल्पना -
मुस्लिम विधि में मेहर (Dower/Mahr) विवाह विधि का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। इसे केवल विवाह के समय दी जाने वाली रकम समझना ठीक नहीं है। मेहर पत्नी का वैधानिक एवं वित्तीय अधिकार है, जो विवाह के कारण पति पर उत्पन्न होता है।
मुस्लिम विधि में मेहर की संकल्पना -
मेहर का अर्थ - मेहर या दहेज (Dower) वह धन, संपत्ति या अन्य मूल्यवान वस्तु है जिसे मुस्लिम विवाह के संबंध में पति द्वारा पत्नी को देना या देने का वचन देना होता है। सरल शब्दों में मेहर वह धन या संपत्ति है जिस पर पत्नी को विवाह के कारण अधिकार प्राप्त होता है और जिसे पति पत्नी को देने के लिए उत्तरदायी होता है।अरबी में इसे महर कहा जाता है।
मेहर की प्रकृति - मेहर की प्रकृति को समझने के लिए ये बातें महत्वपूर्ण हैं -
यह पत्नी का अधिकार है - मेहर पति की ओर से पत्नी को दिया जाने वाला कानूनी अधिकार है। पत्नी स्वयं मेहर की स्वामिनी होती है और पति उस पर अपना अधिकार नहीं जता सकता।
यह विवाह का मूल्य नहीं है - मेहर को पत्नी को “खरीदने की कीमत” या विवाह की कीमत समझना गलत है। यह विवाह से उत्पन्न होने वाला वैधानिक वित्तीय अधिकार है।
मेहर विवाह के कारण उत्पन्न होता है - यदि वैध मुस्लिम विवाह हुआ है, तो मेहर का अधिकार उत्पन्न होता है, भले ही विवाह के समय उसकी राशि स्पष्ट रूप से तय न की गई हो।
मेहर का उद्देश्य - मेहर के कई उद्देश्य हैं -
• पत्नी को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना।• विवाह में पत्नी के वित्तीय अधिकार को सुनिश्चित करना।
• पति पर वैधानिक आर्थिक दायित्व स्थापित करना।
• विवाह संबंध में पत्नी की स्थिति को सुरक्षित करना।
• तलाक या पति की मृत्यु जैसी परिस्थितियों में आर्थिक संरक्षण प्रदान करना।
4. मेहर के प्रकार - मुस्लिम विधि में मेहर को निम्न प्रकारों में समझा जाता है -
(1) निर्दिष्ट मेहर (Specified Dower) - जब विवाह के समय या विवाह के बाद मेहर की राशि या संपत्ति स्पष्ट रूप से निर्धारित कर दी जाती है, तो इसे निर्दिष्ट मेहर कहा जाता है।
उदाहरण - पति और पत्नी यह तय करते हैं कि मेहर ₹1,00,000 होगा। यह निर्दिष्ट मेहर है।
(2) उचित मेहर / मेहर-ए-मिस्ल (Proper Dower) - यदि विवाह के समय मेहर की राशि निर्धारित नहीं की गई है, तब भी पत्नी मेहर से वंचित नहीं होती।
ऐसी स्थिति में परिस्थितियों के आधार पर उचित मेहर निर्धारित किया जा सकता है।
इसे मेहर-ए-मिस्ल (Mahr-i-Misl) कहा जाता है। इसका निर्धारण करते समय पत्नी के पारिवारिक स्तर, सामाजिक स्थिति और उसके समान परिस्थितियों वाली महिला के मेहर आदि को ध्यान में रखा जाता है।
भुगतान के समय के आधार पर मेहर -
समय के आधार पर मेहर के दो प्रमुख प्रकार हैं -
(A) तत्काल मेहर (मेहर-ए-मुअज्जल) (Prompt Dower) - यह मेहर तुरंत देय होता है। पत्नी, परिस्थितियों के अनुसार, पति से इसके भुगतान की मांग कर सकती है।
(B) स्थगित मेहर (मेहर-ए-मुवज्जल) (Deferred Dower) - इसका भुगतान भविष्य के लिए स्थगित रहता है। यह विवाह-विच्छेद, पति की मृत्यु जैसी परिस्थितियों में देय हो सकता है, यदि संविदा या लागू मुस्लिम विधि के अनुसार ऐसा हो।
मेहर की राशि - मेहर की राशि विवाह के समय पति-पत्नी / उनके प्रतिनिधियों द्वारा निर्धारित की जा सकती है। कुछ परिस्थितियों में यह बाद में भी निर्धारित हो सकती है। यदि राशि निर्धारित नहीं हुई हो, तो उचित मेहर (मेहर-ए-मिस्ल) का का भुगतान होता है।
मेहर में - मेहर के रूप में केवल नकद धन ही आवश्यक नहीं है। परिस्थितियों के अनुसार इसमें धन, आभूषण, संपत्ति या अन्य मूल्यवान वस्तु शामिल हो सकती है, बशर्ते वह वैध रूप से मेहर का विषय बन सकती हो।
पत्नी का मेहर पर अधिकार - मेहर पत्नी की व्यक्तिगत संपत्ति होती है। पति उसे अपनी संपत्ति नहीं मान सकता। यदि मेहर का भुगतान नहीं किया गया है, तो पत्नी उसके भुगतान का कानूनी दावा कर सकती है। इस अर्थ में अवैतनिक मेहर पति के ऊपर एक ऋण (debt) की तरह माना जा सकता है।
पति की मृत्यु के बाद मेहर - यदि पति की मृत्यु हो जाती है और मेहर की राशि अभी बकाया है, तो पत्नी उसका दावा पति की संपत्ति के विरुद्ध कर सकती है, subject to applicable succession and estate rules.
महत्वपूर्ण - पहले पति की देनदारियों का निपटारा होता है और उसके बाद उत्तराधिकारियों के अधिकार निर्धारित होते हैं। इसलिए मेहर को पति की संपत्ति से संबंधित एक महत्वपूर्ण देयता के रूप में देखा जाता है।
मेहर और दहेज में अंतर -
आधार - मेहर - दहेज
किसका अधिकार - पत्नी का - दहेज की मांग वर-पक्ष द्वारा की जाती है।
आधार - मुस्लिम विवाह विधि - सामाजिक प्रथा/दहेज कानून।
भुगतान - पति से पत्नी को - विवाह में वधू-पक्ष द्वारा।
प्रकृति - पत्नी का वैधानिक अधिकार - दहेज मांगना कानूनन प्रतिबंधित हो सकता है।
उद्देश्य - पत्नी की आर्थिक सुरक्षा - मेहर का उद्देश्य दहेज से अलग है
इसलिए मेहर और दहेज को एक समझना गलत है।
मेहर और विवाह का संबंध - मेहर मुस्लिम विवाह की महत्वपूर्ण विशेषता है, लेकिन यह कहना कि मेहर की राशि तय नहीं हुई तो विवाह अवैध है, सही नहीं है।यदि विवाह की अन्य आवश्यक शर्तें पूरी हैं और मेहर निर्धारित नहीं किया गया, तो परिस्थितियों में पत्नी को उचित मेहर का अधिकार हो सकता है।
तलाक की स्थिति में मेहर - तलाक की स्थिति में मेहर का अधिकार इस बात पर निर्भर कर सकता है कि
• मेहर तत्काल था या स्थगित
• विवाह consummated हुआ था या नहीं,
• तलाक किस परिस्थिति में हुआ,
• कोई विशेष समझौता था या नहीं,
• लागू व्यक्तिगत कानून/वैधानिक कानून क्या कहता है।
इसलिए तलाक के हर मामले में मेहर का परिणाम समान नहीं होता।
महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टिकोण - भारतीय न्यायालयों ने कई मामलों में यह माना है कि मेहर केवल धार्मिक रस्म नहीं बल्कि पत्नी का प्रवर्तनीय आर्थिक अधिकार है।
विशेष रूप से Abdul Kadir v. Salima (1886) को मुस्लिम विवाह की संविदात्मक प्रकृति और मेहर के संदर्भ में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक निर्णय माना जाता है।
मेहर के दो आधार -
राशि निर्धारित है या नहीं - निर्दिष्ट मेहर मेहर ए मुअज्जल या उचित मेहर /मेहर-ए-मिस्ल
भुगतान कब होना है - तत्काल मेहर/स्थगित मेहर
निष्कर्ष - मुस्लिम विधि में मेहर विवाह से उत्पन्न होने वाला पत्नी का महत्वपूर्ण वैधानिक अधिकार है। यह पति द्वारा पत्नी को दिया जाने वाला धन, संपत्ति या अन्य मूल्यवान वस्तु हो सकती है। मेहर निर्दिष्ट या उचित तथा तत्काल या स्थगित हो सकता है। इसका उद्देश्य पत्नी को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना तथा पति पर वैधानिक आर्थिक दायित्व स्थापित करना है। अवैतनिक मेहर पत्नी के लिए कानूनी रूप से वसूल योग्य दावा हो सकता है।
मुस्लिम विधि में शून्य या अमान्य विवाह - मुस्लिम विधि में विवाह के तीन प्रमुख प्रकार माने जाते हैं -
1. वैध (Sahih)
2= शून्य/अवैध (Batil)
3. अनियमित (Fasid)
इनके कानूनी प्रभाव अलग-अलग होते हैं।
1. वैध विवाह (Valid/Sahih Marriage) - जब विवाह की सभी आवश्यक शर्तें पूरी हों और कोई वैधानिक निषेध न हो, तो विवाह सहीह (Sahih) कहलाता है।
वैध विवाह के प्रभाव -
पति-पत्नी के बीच वैध वैवाहिक संबंध - दोनों के बीच पूर्ण वैधानिक वैवाहिक संबंध स्थापित होते हैं।
संतान की वैधता - ऐसे विवाह से उत्पन्न संतान वैध मानी जाती है।
मेहर का अधिकार - पत्नी को पूर्ण मेहर प्राप्त करने का अधिकार होता है।
भरण-पोषण - पत्नी को लागू मुस्लिम विधि और वर्तमान वैधानिक कानून के अनुसार भरण-पोषण का अधिकार प्राप्त हो सकता है।
पारस्परिक उत्तराधिकार - पति और पत्नी एक-दूसरे के कानूनी उत्तराधिकारी बनते हैं।
वैवाहिक सहवास - दोनों को वैध वैवाहिक सहवास का अधिकार प्राप्त होता है।
विवाह से उत्पन्न अन्य अधिकार - विवाह के कारण पति-पत्नी के बीच अन्य वैधानिक अधिकार और दायित्व उत्पन्न होते हैं।
शून्य विवाह (Void/Batil Marriage) - बातिल विवाह वह विवाह है जिसमें ऐसा मूलभूत और स्थायी निषेध मौजूद हो कि विवाह मुस्लिम विधि के अनुसार प्रारंभ से ही वैध नहीं हो सकता। उदाहरण के रूप में ऐसी स्थिति जहाँ विवाह ऐसे निकट संबंध के बीच हो जिससे विवाह स्थायी रूप से निषिद्ध है।
बातिल विवाह के प्रभाव -
विवाह से वैध वैवाहिक अधिकार - उत्पन्न नहीं होते। ऐसा विवाह कानून की दृष्टि में प्रारंभ से ही शून्य माना जाता है।
पति-पत्नी का वैध दर्जा नहीं - दोनों को इस विवाह के आधार पर सामान्य पति-पत्नी वाले अधिकार प्राप्त नहीं होते।
पारस्परिक उत्तराधिकार नहीं - ऐसे विवाह के आधार पर पति और पत्नी एक-दूसरे के उत्तराधिकारी नहीं बनते।
मेहर का अधिकार नहीं - बातिल विवाह से सामान्यतः पत्नी को वैध विवाह के समान मेहर का अधिकार नहीं मिलता।
वैध संतान का प्रश्न - यह महत्वपूर्ण अंतर है। विवाह बातिल होने के बावजूद बच्चे की स्थिति को स्वतः माता-पिता के विवाह की तरह नहीं माना जाना चाहिए। मुस्लिम विधि में void marriage से उत्पन्न संतान के संबंध में विशेष नियम और न्यायिक दृष्टिकोण लागू होते हैं।
3. अनियमित विवाह (Irregular/Fasid Marriage) - फासिद विवाह सुन्नी मुस्लिम विधि की अवधारणा है। इसमें विवाह ऐसा नहीं होता कि हमेशा के लिए निषिद्ध हो, बल्कि उसमें कोई अस्थायी या उपचार योग्य दोष (Irregularity) होता है। अर्थात दोष दूर कर दिया जाए तो विवाह वैध हो सकता है।
उदाहरण - कुछ परिस्थितियों में ऐसे विवाह जिनमें अस्थायी निषेध मौजूद हो, फासिद माने जा सकते हैं।
फासिद विवाह के प्रभाव - यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात है कि विवाह consummated हुआ है या नहीं।
(A) सहवास से पहले - यदि फासिद विवाह में सहवास नहीं हुआ है, तो
• वैवाहिक अधिकारों के पूर्ण परिणाम उत्पन्न नहीं होते।
• विवाह को समाप्त करने पर वैध विवाह जैसी स्थिति नहीं बनती।
• पूर्ण मेहर का अधिकार उत्पन्न नहीं होता।
(B) सहवास के बाद - यदि फासिद विवाह में सहवास (consummation) हो चुका है, तो कुछ कानूनी परिणाम उत्पन्न होते हैं -
पत्नी को उचित मेहर - पत्नी को उचित मेहर (Proper Dower) का अधिकार प्राप्त होता है।
इद्दत - पत्नी को इद्दत का पालन करना पड़ सकता है।
संतान की वैधता - फासिद विवाह से सहवास के बाद उत्पन्न संतान को वैध माना जाता है।
पारस्परिक उत्तराधिकार - फासिद विवाह में सहवास के बाद भी पति-पत्नी के बीच पारस्परिक उत्तराधिकार का अधिकार उत्पन्न नहीं होता। यह सहीह विवाह से महत्वपूर्ण अंतर है।
तीनों विवाहों की तुलना -
प्रभाव - सहीह (Valid) - फासिद (Irregular) - बातिल (Void)
विवाह की स्थिति - पूर्णतः वैध - दोषपूर्ण/अनियमित - प्रारंभ से शून्य
सहवास- वैध - सहवास के बाद कुछ प्रभाव - वैध वैवाहिक संबंध नहीं
मेहर - पूर्ण मेहर - सहवास के बाद उचित मेहर - मेहर नहीं
संतान - वैध सहवास के बाद वैध स्थिति - विशेष नियमों पर निर्भर
इद्दत - लागू हो सकती है - सहवास के बाद लागू - वैवाहिक आधार पर नहीं
पति-पत्नी उत्तराधिकार - हाँ - नहीं - नहीं
दोष दूर किया जा सकता है? - दोष रहित - हाँ - नहीं
मुख्य अवधारणा - पूर्ण वैधता - उपचार योग्य दोष- स्थायी निषेध
7. महत्वपूर्ण बिंदु - फासिद विवाह की अवधारणा सुन्नी विधि में स्वीकार की जाती है। शिया विधि में विवाह को सहीह या बातिल के रूप में देखा जाता है। फासिद की स्वतंत्र श्रेणी को उसी प्रकार मान्यता नहीं दी जाती।
निष्कर्ष - मुस्लिम विधि में सहीह विवाह पूर्णतः वैध होता है और इससे पति-पत्नी के सभी वैधानिक अधिकार एवं दायित्व उत्पन्न होते हैं। बातिल विवाह प्रारंभ से ही शून्य होता है और सामान्य वैवाहिक अधिकार उत्पन्न नहीं करता। फासिद विवाह में कोई अस्थायी या उपचार योग्य दोष होता है और विशेषतः सहवास के बाद मेहर, इद्दत तथा संतान की वैधता जैसे सीमित कानूनी परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं।
ट्रिक -
सहीह = सब अधिकार।
फासिद = दोष है, पर सुधर सकता है।
बातिल = जड़ से शून्य।
मुस्लिम विधि में मेहर केवल विवाह के समय दी जाने वाली धनराशि नहीं है, बल्कि यह पत्नी का कानूनी अधिकार और पति पर ऋण (debt) है। जब पति मेहर का भुगतान नहीं करता और उसके कब्जे में पत्नी की कोई ऐसी संपत्ति आ जाती है जिस पर पत्नी का वैध कब्जा है, तो कुछ परिस्थितियों में पत्नी को उस संपत्ति को मेहर की अदायगी तक अपने कब्जे में बनाए रखने का अधिकार प्राप्त होता है। इसे मेहर के बदले संपत्ति पर पत्नी का प्रतिधारण अधिकार (Right of Retention) कहते हैं।
मेहर का अर्थ - मेहर वह धन या संपत्ति है जिसे मुस्लिम विवाह में पति द्वारा पत्नी को देना या देने का वचन देना होता है। यह विवाह की आवश्यक विधिक परिणति है और पत्नी इसका दावा कर सकती है।
मेहर की मुख्य विशेषताएँ -
1. यह पत्नी का निजी एवं विधिक अधिकार है।
2. मेहर पति पर ऋण (debt) के रूप में देय हो सकता है।
3. इसका भुगतान तत्काल अथवा स्थगित रूप में हो सकता है।
4. पत्नी मेहर की वसूली के लिए न्यायालय की सहायता ले सकती है।
5. पति की मृत्यु होने पर भी स्थगित मेहर समाप्त नहीं होता, बल्कि उसके उत्तराधिकारियों के विरुद्ध उसकी संपत्ति से वसूल किया जा सकता है।
मेहर के बदले संपत्ति पर पत्नी का प्रतिधारण अधिकार - यदि पति ने पत्नी का मेहर अदा नहीं किया है और पत्नी के पास पति की कोई संपत्ति वैध रूप से और उसकी सहमति से कब्जे में है, तो पत्नी कुछ परिस्थितियों में उस संपत्ति को तब तक अपने कब्जे में रख सकती है जब तक उसका मेहर चुका नहीं दिया जाता। इसे अंग्रेजी में Right of Retention for Unpaid Dower कहा जाता है। यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पत्नी को संपत्ति पर स्वामित्व (ownership) प्राप्त नहीं होता। उसे केवल कब्जा बनाए रखने का अधिकार प्राप्त होता है।
उदाहरण - मान लीजिए, A का विवाह B से हुआ। B पर A का ₹5 लाख मेहर देय है। B ने मेहर का भुगतान नहीं किया और उसकी सहमति से उसका मकान A के कब्जे में है। A यह कह सकती है कि जब तक मेरा ₹5 लाख मेहर अदा नहीं किया जाता, मैं इस मकान का कब्जा नहीं छोड़ूँगी। लेकिन A मकान की मालिक नहीं बन जाती। वह केवल मेहर की सुरक्षा के लिए कब्जा बनाए रख सकती है।
इस अधिकार का ऐतिहासिक आधार - इस अधिकार को मुस्लिम विधि में न्यायिक निर्णयों के माध्यम से विकसित किया गया है। इसका उद्देश्य पत्नी को स्थगित मेहर की स्थिति में एक व्यावहारिक सुरक्षा प्रदान करना है।
प्रमुख निर्णय -
(1) Hamira Bibi v. Zubaida Bibi - इस मामले में Privy Council ने मेहर की प्रकृति को स्पष्ट करते हुए माना कि मेहर पति पर एक ऋण के रूप में देय होता है। इससे यह सिद्धांत मजबूत हुआ कि मेहर कोई मात्र धार्मिक या नैतिक दायित्व नहीं है, बल्कि विधि द्वारा प्रवर्तनीय अधिकार है।
(2) Mst. Bibi v. Abdul - न्यायालयों ने इस बात को स्वीकार किया कि यदि पत्नी के पास पति की संपत्ति का वैध कब्जा है, तो कुछ शर्तों के अधीन वह अपने अवैतनिक मेहर की सुरक्षा के लिए उस कब्जे को बनाए रख सकती है।
प्रतिधारण अधिकार की आवश्यक शर्तें - पत्नी के प्रतिधारण अधिकार के लिए
(i) मेहर देय होना चाहिए - पत्नी का मेहर वास्तव में पति से देय होना चाहिए।
यदि मेहर स्थगित (deferred) है और उसके भुगतान का समय अभी नहीं आया है, तो केवल इस आधार पर पत्नी प्रतिधारण का दावा नहीं कर सकती।
(ii) पति द्वारा मेहर का भुगतान नहीं किया गया हो - यदि पति ने पूरा मेहर चुका दिया है, तो पत्नी के पास मेहर की सुरक्षा के लिए संपत्ति रोककर रखने का आधार समाप्त हो जाता है।
(iii) संपत्ति पर पत्नी का वैध कब्जा होना चाहिए - यह सबसे महत्वपूर्ण शर्तों में से एक है। पत्नी ने संपत्ति पर कब्जा वैध रूप से प्राप्त किया होना चाहिए।
उदाहरण - पति ने स्वयं पत्नी को मकान का कब्जा दिया। पति की अनुमति से पत्नी संपत्ति में रह रही थी। संपत्ति विवाह के बाद पत्नी के वैध कब्जे में आई। लेकिन यदि पत्नी ने संपत्ति पर जबरदस्ती, चोरी या अवैध रूप से कब्जा किया है, तो प्रतिधारण का अधिकार उत्पन्न नहीं होगा।
(iv) कब्जा पति की सहमति से प्राप्त हुआ हो - संपत्ति पर पत्नी का कब्जा पति की सहमति से या किसी वैध प्रक्रिया से होना चाहिए।
(v) कब्जा लगातार बना रहना चाहिए - यदि पत्नी ने वैध कब्जा प्राप्त करने के बाद स्वेच्छा से उसे छोड़ दिया, तो सामान्यतः केवल पुराने कब्जे के आधार पर वह पुनः प्रतिधारण अधिकार का दावा नहीं कर सकती।
क्या पत्नी संपत्ति की मालिक बन जाती है? - नहीं। यह प्रतिधारण अधिकार की सबसे महत्वपूर्ण सीमा है। पत्नी को केवल
Possession + Security मिलती है, न कि Ownership + Sale Power. अर्थात पत्नी संपत्ति को अपने पास रख सकती है, लेकिन केवल मेहर न मिलने के कारण वह संपत्ति की मालिक नहीं बन जाती।
उदाहरण - पति का ₹10 लाख मेहर बाकी है और पत्नी के कब्जे में पति की ₹20 लाख की जमीन है तो पत्नी,
• जमीन अपने कब्जे में रख सकती है, यदि प्रतिधारण की आवश्यक शर्तें पूरी हैं।
• लेकिन जमीन को अपनी संपत्ति घोषित नहीं कर सकती;
• उसे जमीन बेचकर ₹10 लाख अपने पास रखने का स्वतः अधिकार नहीं है।
6. क्या पत्नी संपत्ति बेच सकती है? - नहीं। प्रतिधारण का अधिकार केवल कब्जा बनाए रखने का अधिकार है। यह पत्नी को संपत्ति बेचने या उसका स्वामित्व हस्तांतरित करने का अधिकार नहीं देता। यदि पत्नी अपना मेहर वसूल करना चाहती है, तो उसे विधिक रूप से -
1. मेहर की वसूली के लिए दावा करना चाहिए; या
2. उपलब्ध कानूनी उपायों के माध्यम से पति की संपत्ति के विरुद्ध कार्रवाई करनी चाहिए।
क्या पत्नी को संपत्ति से प्राप्त लाभ का होगा? - नहीं, यदि पत्नी पति की संपत्ति को अपने कब्जे में रखती है, तो वह संपत्ति की मालकिन नहीं होती। इसलिए संपत्ति से होने वाली आय, किराया लाभ के संबंध में पत्नी की स्थिति स्वामी जैसी नहीं होती। उसे संपत्ति को सुरक्षित रखना और उसके प्रति उचित सावधानी बरतना अपेक्षित है।
प्रतिधारण अधिकार और ऋण का संबंध - मेहर पत्नी का पति पर ऋण (debt) है और प्रतिधारण अधिकार पत्नी को उस ऋण की वसूली के लिए संपत्ति पर सुरक्षा (security) प्रदान करता है। अर्थात मेहर = ऋण - पति भुगतान नहीं करता - पत्नी के पास पति की संपत्ति का वैध कब्जा है - पत्नी कब्जा बनाए रख सकती है - लेकिन संपत्ति की मालिक नहीं बनती।
पत्नी का प्रतिधारण अधिकार कब समाप्त होता है? - निम्न परिस्थितियों में यह अधिकार समाप्त हो सकता है -
1. मेहर का पूरा भुगतान - पति ने पूरा मेहर चुका दिया तो संपत्ति को रोककर रखने का आधार समाप्त हो जाता है।
2. पत्नी द्वारा कब्जा स्वेच्छा से छोड़ देना - यदि पत्नी ने अपना वैध कब्जा स्वेच्छा से छोड़ दिया, तो केवल उस पुराने कब्जे के आधार पर वह प्रतिधारण का दावा सामान्यतः नहीं कर सकती।
3. न्यायालय का आदेश - यदि सक्षम न्यायालय संपत्ति के कब्जे या अधिकार के संबंध में आदेश देता है, तो पत्नी को उसका पालन करना होगा।
4. संपत्ति पर पत्नी का कब्जा ही वैध न हो - यदि यह सिद्ध हो जाए कि पत्नी का कब्जा प्रारंभ से ही अवैध था, तो प्रतिधारण अधिकार का दावा नहीं किया जा सकता।
मेहर के भुगतान न किए जाने के प्रभाव - अब दूसरी स्थिति यह आती है कि पति ने मेहर का भुगतान नहीं किया है तो इसके कई विधिक प्रभाव होते हैं।
(A) पत्नी को मेहर की वसूली का अधिकार - स्थगित मेहर पत्नी के लिए विधिक रूप से वसूल योग्य ऋण है। पत्नी न्यायालय में मेहर की वसूली के लिए दावा कर सकती है।
(B) मेहर पति पर ऋण बन जाता है - मेहर की देयता पति की व्यक्तिगत देयता होती है अर्थात पति केवल इसलिए मेहर से मुक्त नहीं हो जाता कि उसने विवाह के दौरान भुगतान नहीं किया।
(C) पति की मृत्यु के बाद भी मेहर समाप्त नहीं होता - यदि पति की मृत्यु हो जाती है और मेहर अभी भी बकाया है, तो पत्नी का मेहर का दावा समाप्त नहीं होता।पति की संपत्ति से उसके ऋणों का भुगतान किया जाएगा और उसके बाद उत्तराधिकार का प्रश्न आएगा। अर्थात - पति की मृत्यु → स्थगित मेहर समाप्त नहीं → पत्नी का दावा बना रहता है।
पत्नी अन्य लेनदारों की तरह दावा कर सकती है - मेहर के संबंध में पत्नी की स्थिति एक creditor की होती है। इसलिए पति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति से उसके वैध ऋणों का भुगतान किया जाना आवश्यक है। हालाँकि यह कहना सही नहीं होगा कि पत्नी को हर परिस्थिति में सभी अन्य creditors पर स्वतः सर्वोच्च प्राथमिकता मिलती है। उसकी प्राथमिकता संबंधित कानून और परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
तलाक होने पर मेहर का प्रभाव - तलाक की स्थिति में भी मेहर का प्रश्न महत्वपूर्ण रहता है। यदि मेहर अभी तक अदा नहीं किया गया है, तो पत्नी परिस्थितियों के अनुसार उसके भुगतान का दावा कर सकती है। विशेष रूप से विधिवत देय स्थगित मेहर तलाक या विवाह-विच्छेद की स्थिति में देय हो सकता है। इसलिए = तलाक ≠ मेहर की समाप्ति, बल्कि कई परिस्थितियों में तलाक स्थगित मेहर को तत्काल देय बना देता है।
मेहर न देने पर पत्नी का वैवाहिक अधिकार - मेहर का भुगतान न करना केवल आर्थिक प्रश्न नहीं है। इसका प्रभाव पत्नी के वैधानिक अधिकारों पर भी पड़ सकता है। मुस्लिम विधि में पत्नी को मेहर की वसूली के लिए स्वतंत्र कानूनी उपाय उपलब्ध हैं। भारतीय न्यायव्यवस्था में विवाह, तलाक, भरण-पोषण और मेहर के प्रश्नों को संबंधित व्यक्तिगत विधि तथा लागू वैधानिक कानूनों के साथ अपनाया जाना आवश्यक है।
प्रतिधारण अधिकार और मेहर की वसूली में अंतर -
आधार - प्रतिधारण अधिकार - मेहर की वसूली
प्रकृति - संपत्ति का कब्जा बनाए रखने का अधिकार - धन/मेहर प्राप्त करने का दावा
उद्देश्य - मेहर की सुरक्षा - मेहर की वास्तविक अदायगी
स्वामित्व - पत्नी को नहीं मिलता - संपत्ति का स्वामित्व प्रश्न अलग
बिक्री का अधिकार - नहीं - न्यायालयी प्रक्रिया से वसूली संभव
आधार - वैध कब्जा + स्थगित मेहर - मेहर की देयता
अधिकार का स्वरूप - सुरक्षा का अधिकार - ऋण की वसूली का अधिकार
उदाहरण - मान लीजिए कि A ने B से विवाह किया। इस विवाह में निश्चित की गई मेहर = ₹8 लाख में से ₹2 लाख तत्काल दे दिए गए और ₹6 लाख स्थगित मेहर है।
A ने ₹2 लाख भी नहीं दिए। B के पास A का मकान वैध रूप से उसके कब्जे में है तो
1. B ₹2 लाख की वसूली का दावा कर सकती है।
2. यदि स्थगित मेहर की देयता भी उत्पन्न हो गई है, तो ₹6 लाख का दावा भी किया जा सकता है।
3. आवश्यक शर्तें पूरी होने पर B मकान का वैध कब्जा बनाए रख सकती है।
4. लेकिन वह मकान की मालिक नहीं बन जाती।
5. B प्रतिधारण के आधार पर मकान बेचकर मेहर स्वयं वसूल नहीं कर सकती।
6. यदि A की मृत्यु हो जाए, तो स्थगित मेहर का उसकी संपत्ति के विरुद्ध ऋण के रूप में दावा किया जा सकता है।
प्रमुख न्यायिक सिद्धांत -
Hamira Bibi v. Zubaida Bibi - इस निर्णय का मुख्य महत्व यह है कि मेहर को एक वास्तविक ऋण (debt) के रूप में समझने में सहायता मिलती है। मेहर पत्नी का प्रवर्तनीय अधिकार है, मात्र धार्मिक या नैतिक दायित्व नहीं।
Abdul Kadir v. Salima - इस निर्णय में मुस्लिम विवाह की संविदात्मक प्रकृति और मेहर से जुड़े अधिकारों के संबंध में महत्वपूर्ण सिद्धांत विकसित हुए। मुस्लिम विवाह को केवल धार्मिक संस्कार न मानकर विधिक अधिकारों और दायित्वों वाली संस्था के रूप में समझने में यह निर्णय महत्वपूर्ण है।
संक्षिप्त रूप में - स्थगित मेहर पत्नी का ऋण है। यदि पति की कोई संपत्ति पत्नी के वैध और सहमति से प्राप्त कब्जे में है, तो आवश्यक परिस्थितियों में पत्नी मेहर की सुरक्षा के लिए उस संपत्ति का कब्जा बनाए रख सकती है। इसे मेहर के बदले प्रतिधारण का अधिकार कहते हैं। यह अधिकार केवल कब्जे तक सीमित है, इससे पत्नी संपत्ति की स्वामिनी नहीं बनती और उसे स्वतः बेचने का अधिकार नहीं मिलता। मेहर का भुगतान न होने पर पत्नी न्यायालय के माध्यम से उसकी वसूली कर सकती है तथा पति की मृत्यु के बाद भी अवैतनिक मेहर का दावा उसकी संपत्ति के विरुद्ध बना रहता है।
निष्कर्ष - मेहर मुस्लिम विवाह में पत्नी की आर्थिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण साधन है। इसका भुगतान न होने पर पत्नी असहाय नहीं रहती। उसे मेहर की वसूली का विधिक अधिकार प्राप्त है और, निर्धारित शर्तों के अधीन, पति की ऐसी संपत्ति पर प्रतिधारण का अधिकार भी मिल सकता है जो उसके वैध कब्जे में है। लेकिन प्रतिधारण का अर्थ स्वामित्व नहीं है। यही इस पूरे विषय का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है।
मुस्लिम विधि में भरण पोषण -
मुस्लिम विधि में पत्नी के भरण-पोषण से संबंधित प्रावधान, अन्य आश्रितों के भरण-पोषण से संबंधित प्रावधान, तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के अधिकार, मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 के निहितार्थ, दंड प्रक्रिया संहिता के धारा 125–128 के प्रावधान, न्यायिक दृष्टिकोण -
मुस्लिम विधि में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125–128, मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986, और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
भरण-पोषण (Maintenance / Nafaqa) - मुस्लिम विधि में पत्नी के भरण-पोषण को ना नू नफ़क़ा (Nafaqa) कहा जाता है। इसका अर्थ है ऐसी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, जो किसी व्यक्ति के जीवन-निर्वाह के लिए आवश्यक हैं। इसमें सामान्यतः शामिल हैं -
1. भोजन
2. वस्त्र
3. निवास
4. शिक्षा
5. चिकित्सा
6. जीवन-निर्वाह की अन्य वस्तुएँ
7. परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक खर्च
मुस्लिम विधि में विवाह केवल व्यक्तिगत संबंध नहीं है, बल्कि इससे पति पर पत्नी के भरण-पोषण का कानूनी दायित्व भी उत्पन्न होता है।
A. मुस्लिम विधि में पत्नी के भरण-पोषण से संबंधित प्रावधान - निकाह में मेहर के साथ मय ना नू नक़्फ़ा शब्द काम में लिया जाता है जिसका अर्थ होता है पूर्ण भरण पोषण सहित इजाब ओ कुबूल (प्रस्ताव एवं स्वीकृति)। इस आधार पर पति द्वारा पत्नी एवं उसकी वैध संतान का पूर्ण भरण पोषण जिसमें खर्च ए पानदान भी शामिल है, पति की पूर्ण जिम्मेदारी है यदि पत्नी स्वयं के साधनों से भरन पोषण करने में असमर्थ है तो।
पत्नी के भरण-पोषण का सिद्धांत - वैध मुस्लिम विवाह होने पर नियम यह है कि पति अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य है। पत्नी का भरण-पोषण पति की आर्थिक स्थिति, सामाजिक स्थिति तथा वैवाहिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर निर्धारित किया जा सकता है। प्रमुख आवश्यकताएँ पति द्वारा पत्नी को भोजन, कपड़े, आवास, संतान की शिक्षा, चिकित्सा एवं आवश्यक घरेलू एवं जीवन-निर्वाह संबंधी खर्च उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
पत्नी के भरण-पोषण की शर्तें - मुस्लिम विधि में पत्नी का अधिकार पूर्णत निरपेक्ष नहीं है। पारंपरिक मुस्लिम विधि के अनुसार कुछ परिस्थितियों में पत्नी का भरण-पोषण प्रभावित हो सकता है।
(i) विवाह वैध हो।
(ii) पत्नी द्वारा वैवाहिक दायित्व निभाना।
(iii) पत्नी का अनुचित रूप से अलग न रहना।
यदि पत्नी बिना उचित कारण पति से अलग रहती है, तो मुस्लिम विधि के अंतर्गत उसके भरण-पोषण के अधिकार पर प्रभाव पड़ सकता है। लेकिन यदि अलग रहने का उचित और वैधानिक कारण हो, तो स्थिति अलग होगी।
उदाहरण -
पति द्वारा क्रूरता।
पति का दूसरा अनुचित आचरण।
पत्नी की सुरक्षा का खतरा।
पति द्वारा वैवाहिक दायित्वों का निर्वहन न करना।
पत्नी कब भरण-पोषण की हकदार नहीं हो सकती? - मुस्लिम विधि में कुछ परिस्थितियों में पत्नी का नफ़क़ा समाप्त या प्रभावित हो सकता है, जैसे -
1. वह बिना उचित कारण पति से अलग रहती है।
2. वह वैवाहिक दायित्वों को अनुचित रूप से अस्वीकार करती है।
3. विवाह विधि की दृष्टि से समाप्त हो चुका है, तो मुस्लिम विधि के अनुसार तलाक के बाद की स्थिति अलग होगी।
लेकिन आधुनिक भारतीय कानून में इस विषय को केवल मुस्लिम विधि से नहीं देखा जाता। धारा 125 CrPC और 1986 के अधिनियम की न्यायिक व्याख्या ने तलाकशुदा मुस्लिम महिला के अधिकारों को काफी विस्तृत किया है।
पत्नी की आर्थिक स्थिति और पति की क्षमता - भरण-पोषण निर्धारित करते समय न्यायालय इन बातों पर विचार करता है -
• पति की आय
• पति की संपत्ति
• पत्नी की आवश्यकताएँ
• दोनों की सामाजिक स्थिति
• जीवन-स्तर
• आश्रित बच्चों की स्थिति
• अन्य प्रासंगिक परिस्थितियाँ
अर्थात् भरण-पोषण का उद्देश्य पत्नी को केवल जीवित रखना नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार सम्मानजनक जीवन-निर्वाह सुनिश्चित करना है।
B. अन्य आश्रितों के भरण-पोषण से संबंधित प्रावधान - मुस्लिम विधि में भरण-पोषण का दायित्व केवल पत्नी तक सीमित नहीं है। कुछ परिस्थितियों में बच्चों और अन्य आश्रित संबंधियों के प्रति भी दायित्व उत्पन्न हो सकता है।
बच्चों का भरण-पोषण -
(i) पुत्र - पिता अपने नाबालिग पुत्र के भरण-पोषण के लिए जिम्मेदार होता है। पुत्र के सक्षम और आत्मनिर्भर होने तक, परिस्थितियों के अनुसार पिता पर दायित्व रह सकता है।
(ii) पुत्री - पिता अपनी नाबालिग पुत्री के भरण-पोषण के लिए जिम्मेदार होता है।
मुस्लिम विधि में पुत्री के संबंध में विवाह और उसकी आर्थिक स्थिति भी प्रासंगिक हो सकती है।
(iii) बालिग संतान - नियमों के अनुसार बालिग और स्वयं पत्नी के अपना निर्वाह करने में सक्षम संतान के प्रति पिता का दायित्व सीमित हो सकता है। लेकिन विशेष परिस्थितियाँ, जैसे असमर्थता या विकलांगता, अलग परिणाम उत्पन्न कर सकती हैं।
माता-पिता का भरण-पोषण - मुस्लिम विधि में सक्षम और आर्थिक रूप से समर्थ संतान पर आवश्यकता पड़ने पर अपने निर्धन माता-पिता के भरण-पोषण का दायित्व आ सकता है। इसका आधार यह है कि जो व्यक्ति स्वयं अपना निर्वाह नहीं कर सकता और जिसके पास पर्याप्त साधन नहीं हैं, उसके निकट संबंधियों पर परिस्थितियों के अनुसार सहायता का दायित्व उत्पन्न हो सकता है।
अन्य संबंधियों का भरण-पोषण - मुस्लिम विधि में अन्य निर्धन संबंधियों के संबंध में भरण-पोषण का दायित्व रक्त-संबंध, आर्थिक क्षमता और आवश्यकता जैसे तत्वों से निर्धारित होता है। यहाँ यह महत्वपूर्ण है कि प्रत्येक रिश्तेदार को स्वतः भरण-पोषण का अधिकार नहीं मिलता। कानून में निर्धारित शर्तें पूरी होना आवश्यक है।
तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के अधिकार - मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 के निहितार्थ -
अधिनियम की पृष्ठभूमि - तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण का प्रश्न भारत में विशेष रूप से Mohd. Ahmed Khan v. Shah Bano Begum (1985) के कारण प्रकाश में आया।
सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 125 CrPC के अंतर्गत शाह बानो को राहत दी। इसके बाद संसद ने Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act, 1986 बनाया। इस अधिनियम का उद्देश्य तलाकशुदा मुस्लिम महिला के अधिकारों का संरक्षण करना था।
अधिनियम में "तलाकशुदा महिला" का अर्थ - अधिनियम के अंतर्गत तलाकशुदा मुस्लिम महिला वह महिला है जिसका विवाह मुस्लिम विधि के अनुसार हुआ था और जिसे उसके पति ने मुस्लिम विधि के अनुसार तलाक दिया है।
धारा 3: तलाकशुदा मुस्लिम महिला के अधिकार - धारा 3 इस अधिनियम का केंद्रीय प्रावधान है। तलाकशुदा मुस्लिम महिला को अपने पूर्व पति से निम्न अधिकार प्राप्त होते हैं -
(i) उचित और युक्तियुक्त प्रावधान एवं भरण-पोषण - पूर्व पति को तलाकशुदा महिला के लिए reasonable and fair provision and maintenance करना है। इस संबंध में न्यायिक व्याख्या के अनुसार यह केवल इद्दत अवधि के भीतर दिए जाने वाले मासिक खर्च तक सीमित नहीं है।
(ii) मेहर/दहेज - महिला को विवाह के समय निर्धारित मेहर की पूरी राशि प्राप्त करने का अधिकार है। यदि मेहर का भुगतान नहीं हुआ है, तो वह उसकी वसूली कर सकती है।
(iii) विवाह के समय या उसके बाद दी गई संपत्ति - महिला को विवाह से पहले, विवाह के समय या विवाह के बाद उसके रिश्तेदारों, मित्रों, पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा दी गई संपत्ति वापस प्राप्त करने का अधिकार है, यदि वह उसके अधिकार में नहीं है।
इद्दत (Iddat) की अवधि - इद्दत तलाक या पति की मृत्यु के बाद मुस्लिम महिला द्वारा प्रतीक्षा की जाने वाली निर्धारित अवधि है। तलाक की स्थिति में
• यदि महिला मासिक धर्म करती है, तो तीन मासिक धर्म चक्र (90 दिन)
• तक और यदि मासिक धर्म नहीं होता, तो तीन चंद्र महीने (90 दिन)
• यदि महिला गर्भवती है, तो गर्भावस्था समाप्त होने तक।
1986 के इस अधिनियम में इद्दत की अवधि की अवधारणा को विशेष महत्व दिया गया है।
धारा 4 - रिश्तेदारों और वक्फ बोर्ड की भूमिका - यदि तलाकशुदा महिला इद्दत की अवधि समाप्त होने के बाद भी अपना निर्वाह नहीं कर सकती है और उसने पुनर्विवाह नहीं किया है तो कुछ परिस्थितियों में उसके ऐसे रिश्तेदार जो उसकी मृत्यु के बाद मुस्लिम विधि के अनुसार उसकी संपत्ति के वारिस होते, उसके भरण-पोषण में योगदान के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं। यदि ऐसे रिश्तेदार उपलब्ध नहीं हैं या पर्याप्त रूप से योगदान नहीं कर सकते, तो कानून में State Wakf Board की भूमिका का प्रावधान किया गया है।
धारा 5 - CrPC के प्रावधान लागू कराने का विकल्प - अधिनियम की धारा 5 एक महत्वपूर्ण विकल्प प्रदान करती थी।पक्षकार निर्धारित तरीके से यह घोषणा कर सकते थे कि वे CrPC की धारा 125 –128 के प्रावधानों द्वारा शासित होना चाहते हैं। इससे मुस्लिम महिला के भरण-पोषण के प्रश्न को आपराधिक प्रक्रिया कानून (CrPC) के अंतर्गत भी उठाया जा सकता था।
Danial Latif v. Union of India (2001) का महत्व - सर्वोच्च न्यायालय ने 1986 के अधिनियम की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखते हुए इसकी व्याख्या इस प्रकार की कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला के अधिकारों को सीमित न किया जाए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पति का दायित्व केवल इद्दत अवधि तक भुगतान करने तक सीमित नहीं है। पति को इद्दत अवधि के भीतर ऐसा उचित एवं युक्तियुक्त प्रावधान करना होगा जो महिला के भविष्य के निर्वाह को ध्यान में रखता हो।
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125–128 के प्रावधान - (वर्तमान में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 - BNSS) ने ले लिया है।
धारा 125 CrPC - धारा 125 का उद्देश्य किसी व्यक्ति को दंड देना नहीं, बल्कि उन आश्रितों को त्वरित सामाजिक न्याय प्रदान करना है जो स्वयं अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हैं। इसके अंतर्गत पर्याप्त साधन रखने वाला व्यक्ति, यदि उपेक्षा या इंकार करता है, तो निम्न व्यक्तियों के भरण-पोषण के लिए आदेशित किया जा सकता है -
1. पत्नी
2. तलाकशुदा पत्नी, यदि उसने पुनर्विवाह नहीं किया है
3. नाबालिग संतान
4. ऐसी संतान जो शारीरिक या मानसिक असामान्यता के कारण अपना भरण-पोषण नहीं कर सकती
5. पिता या माता
तलाकशुदा मुस्लिम महिला और धारा 125 - धारा 125 में wife की व्याख्या के अंतर्गत तलाकशुदा महिला जिसने पुनर्विवाह नहीं किया है को कहा गया है।इसलिए मुस्लिम महिला केवल मुस्लिम होने के कारण धारा 125 के संरक्षण से बाहर नहीं होती। यह एक धर्म-निरपेक्ष सामाजिक न्याय का प्रावधान है।
धारा - 126 CrPC - धारा 126 भरण-पोषण की कार्यवाही की प्रक्रिया और क्षेत्राधिकार से संबंधित है। यह कार्यवाही उस स्थान पर की जा सकती है जहाँ
I. पति/व्यक्ति है।
II. पत्नी रहती है।
III. या पक्षकारों से संबंधित निर्धारित क्षेत्राधिकार उपलब्ध है, इससे महिला या अन्य आश्रित को न्यायालय तक पहुँचने में सुविधा मिलती है।
धारा - 127 CrPC - धारा 127 के अंतर्गत भरण-पोषण की राशि में परिवर्तन किया जा सकता है। यदि परिस्थितियों में परिवर्तन हो जाए, जैसे -
I. आय में परिवर्तन।
II. पुनर्विवाह।
III. तलाकशुदा महिला का पुनर्विवाह।
IV. अन्य महत्वपूर्ण परिस्थितियाँ।
हों तो न्यायालय भरण-पोषण की राशि में परिवर्तन या आदेश में आवश्यक संशोधन कर सकता है।
धारा 128 CrPC - धारा 128 भरण-पोषण के आदेश के प्रवर्तन/क्रियान्वयन से संबंधित है। यदि न्यायालय ने भरण-पोषण का आदेश दिया है, तो पात्र व्यक्ति उस आदेश को लागू कराने के लिए न्यायालय की सहायता ले सकता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भरण-पोषण का आदेश केवल कागज पर न रह जाए।
C. न्यायिक दृष्टिकोण -
Mohd. Ahmed Khan v. Shah Bano Begum, 1985 -
तथ्य - शाह बानो को उनके पति ने तलाक दे दिया था। उन्होंने धारा 125 CrPC के अंतर्गत भरण-पोषण की मांग की। न्यायालय ने माना कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला, यदि स्वयं अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है और अन्य आवश्यक शर्तें पूरी करती है, तो धारा 125 CrPC के अंतर्गत भरण-पोषण मांग सकती है। इस निर्णय ने स्पष्ट किया कि धारा 125 CrPC धर्म-विशेष का कानून नहीं बल्कि सामाजिक न्याय का धर्मनिरपेक्ष उपाय है।इस निर्णय के बाद ही 1986 का अधिनियम अस्तित्व में आया।
Danial Latifi v. Union of India, 2001 - यह 1986 अधिनियम की व्याख्या का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय है।सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उचित और युक्तियुक्त प्रावधान एवं भरण-पोषण केवल इद्दत की अवधि तक सीमित नहीं है। पति को इद्दत की अवधि के भीतर तलाकशुदा पत्नी के भविष्य को ध्यान में रखते हुए उचित एवं युक्तियुक्त प्रावधान करना होगा।इस के परिणाम यह हुआ कि इद्दत की अवधि = भुगतान/प्रावधान करने की समय-सीमा लेकिन भरण-पोषण का आर्थिक प्रभाव = केवल इद्दत अवधि तक सीमित नहीं।
Shabana Bano v. Imran Khan, 2010 - सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला, जिसने पुनर्विवाह नहीं किया है, धारा 125 CrPC के अंतर्गत भरण-पोषण का दावा कर सकती है, यदि वह निर्धारित कानूनी शर्तें पूरी करती है। इससे शाह बानो के सिद्धांत को और मजबूती मिली।
मुस्लिम महिला के अधिकारों का आधुनिक दृष्टिकोण - न्यायपालिका ने समय के साथ मुस्लिम तलाकशुदा महिला के अधिकारों की व्याख्या अधिक संरक्षणात्मक और अधिकार-आधारित तरीके से की है। मुख्य विचार यह है कि व्यक्तिगत विधि का सम्मान किया जाए, लेकिन उसका उपयोग किसी महिला को आर्थिक असुरक्षा और निराश्रयता में धकेलने के लिए नहीं किया जा सकता।
Abdul Samad v. State of Telangana - 2024 - सर्वोच्च न्यायालय ने 2024 में फिर स्पष्ट किया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला धारा 125 CrPC के अंतर्गत भरण-पोषण की मांग कर सकती है। न्यायालय ने यह भी माना कि 1986 का अधिनियम मुस्लिम महिला के अधिकारों को इस प्रकार नहीं काटता कि वह CrPC के धर्मनिरपेक्ष उपचार से पूरी तरह वंचित हो जाए। यह निर्णय आधुनिक न्यायिक दृष्टिकोण के लिए बहुत उपयोगी है।
तुलनात्मक सार -
आधार - मुस्लिम विधि अधिनियम 1986 - - धारा 125 CrPC।
पत्नी - पति पर भरण-पोषण का दायित्व - तलाकशुदा महिला के लिए प्रावधान पत्नी के लिए भरण-पोषण।
तलाक के बाद - पारंपरिक नियमों में इद्दत महत्वपूर्ण - उचित एवं युक्तियुक्त प्रावधान। पुनर्विवाह न करने वाली तलाकशुदा पत्नी - मेहर पत्नी का अधिकार धारा 3 में - संरक्षण धारा 125 का अलग विषय नहीं।
विवाह में मिली संपत्ति पत्नी का अधिकार - धारा 3 में वापसी का प्रावधान - धारा 125 का विषय नहीं।
बच्चे - पिता का दायित्व - विशेष परिस्थितियों में प्रावधान नाबालिग/असमर्थ बच्चों के लिए।
माता-पिता - आवश्यकता और क्षमता के आधार पर सीमित भूमिका - माता-पिता भी धारा 125 के अंतर्गत।
रिश्तेदार - मुस्लिम विधि के अनुसार धारा 4 में विशेष व्यवस्था - धारा 125 में केवल निर्धारित श्रेणियाँ।
वक्फ बोर्ड - पारंपरिक व्यक्तिगत दायित्व नहीं धारा 4 में विशेष भूमिका - कोई सामान्य भूमिका नहीं।
पांच विशेष सूत्र -
विवाह → पति का नफ़क़ा का दायित्व
तलाक → मेहर + संपत्ति + उचित एवं युक्तियुक्त प्रावधान
इद्दत → प्रावधान करने की महत्वपूर्ण अवधि, अधिकार की अंतिम सीमा नहीं
धारा 125 CrPC → धर्मनिरपेक्ष सामाजिक न्याय का उपाय
शाह बानो → दानियल लतीफी → शबाना बानो → अब्दुल समद
निष्कर्ष - मुस्लिम विधि में भरण-पोषण की मूल अवधारणा नफ़क़ा है, जिसके अंतर्गत पति पर पत्नी और परिस्थितियों के अनुसार अन्य आश्रितों के प्रति आर्थिक दायित्व उत्पन्न होता है। तलाकशुदा मुस्लिम महिला के संदर्भ में शाह बानो मामला एक ऐतिहासिक मोड़ था। 1986 के अधिनियम ने उसके अधिकारों को एक विशेष वैधानिक ढाँचा दिया, जबकि Danial Latifi ने उचित और युक्तियुक्त प्रावधान एवं भरण-पोषण की ऐसी व्याख्या की जिससे महिला का अधिकार केवल इद्दत तक सीमित नहीं रहा। बाद के निर्णयों, विशेषकर Shabana Bano और Abdul Samad, ने यह रेखांकित किया कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला को परिस्थितियों के अनुसार धारा 125 CrPC के सामाजिक न्याय संबंधी उपचार से भी वंचित नहीं किया जा सकता।
इस प्रकार आधुनिक भारतीय विधि में दृष्टिकोण केवल इद्दत तक भरण-पोषण का नहीं, बल्कि तलाकशुदा महिला को आर्थिक सुरक्षा, सम्मान और प्रभावी कानूनी उपचार देने का है।
मुस्लिम विधि में वैवाहिक उपचार, संरक्षकता, पितृत्व एवं दत्तक ग्रहण -
इस भाग में में केवल तलाक नहीं, बल्कि वैवाहिक उपचार, मुस्लिम तलाक की पूरी व्यवस्था, अभिभावकत्व/संरक्षकता, बच्चे की अभिरक्षा, वैधता, पितृत्व की स्वीकृति और दत्तक ग्रहण के बिंदु आपस में जुड़े हुए हैं।
मुस्लिम विधि में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं है, बल्कि इससे पति-पत्नी के अधिकार, संतान की स्थिति, भरण-पोषण, संरक्षकता, पितृत्व और संपत्ति संबंधी अनेक कानूनी प्रश्न उत्पन्न होते हैं। जब वैवाहिक संबंध में गंभीर समस्या उत्पन्न होती है तो कानून विभिन्न वैवाहिक उपचार (Matrimonial Remedies) उपलब्ध कराता है।
मुस्लिम विधि में विवाह को निकाह कहा जाता है और इसे एक विधिक संविदात्मक संबंध के रूप में देखा जाता है। इसलिए विवाह के विघटन के लिए तलाक, खुला, मुबारात, तलाक-ए-तफवीज तथा न्यायिक विघटन जैसे उपाय विकसित हुए हैं।
भारत में मुस्लिम वैवाहिक मामलों पर मुस्लिम व्यक्तिगत विधि के साथ-साथ अनेक केंद्रीय कानून भी लागू होते हैं, विशेष रूप से
• Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937, • Dissolution of Muslim Marriages Act, 1939,
• Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act, 1986,
• Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Act, 2019,
• Guardians and Wards Act, 1890, Family Courts Act, 1984
तथा बच्चों के दत्तक ग्रहण के संदर्भ में - • Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015।
तलाक के सिद्धांत - तलाक (Divorce) का अर्थ वैवाहिक संबंध का विधि द्वारा मान्य विघटन है। विभिन्न विधि-व्यवस्थाओं में तलाक के संबंध में निम्न सिद्धांत पाए जाते हैं -
1. दोष सिद्धांत (Fault Theory) - इस सिद्धांत के अनुसार विवाह तभी समाप्त किया जाना चाहिए जब एक पक्ष ने ऐसा वैवाहिक दोष किया हो जिससे दूसरे पक्ष को विवाह समाप्त करने का अधिकार प्राप्त हो। इसके अनुसार मुख्य दोष -
I. व्यभिचार
II. क्रूरता
III. परित्याग
IV. धर्म परिवर्तन
V. गंभीर मानसिक विकार आदि।
उदाहरण - यदि पति पत्नी के साथ लगातार क्रूर व्यवहार करता है, तो पत्नी दोष सिद्धांत के आधार पर विवाह-विच्छेद की मांग कर सकती है।
पारस्परिक सहमति सिद्धांत (Mutual Consent Theory) - इस सिद्धांत में पति-पत्नी दोनों इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि वे साथ नहीं रह सकते और विवाह समाप्त करने के लिए सहमत होते हैं। मुस्लिम विधि में से मुबारत कहते हैं। इसका आधार है - जब वैवाहिक संबंध दोनों की स्वतंत्र इच्छा से समाप्त किया जाना स्वीकार्य हो, तो कानून उन्हें वैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से अलग होने का अवसर देता है।
हिंदू विवाह अधिनियम में धारा 13-B पारस्परिक सहमति से तलाक की व्यवस्था करती है।
विवाह-विच्छेद/अपरिवर्तनीय विघटन सिद्धांत (Irretrievable Breakdown Theory) - इस सिद्धांत में मुख्य प्रश्न यह होता है कि क्या विवाह वास्तव में और स्थायी रूप से टूट चुका है?
यदि पति-पत्नी लंबे समय से अलग रह रहे हों, संबंध पूरी तरह समाप्त हो चुका हो और पुनर्मिलन की वास्तविक संभावना न हो, तो विवाह को केवल नाममात्र बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं माना जाता।
भारतीय न्यायपालिका ने उपयुक्त मामलों में Article 142 के माध्यम से विवाह के अपरिवर्तनीय विघटन को ध्यान में रखकर राहत दी है, हालांकि यह हर मामले में स्वतः लागू होने वाला वैधानिक तलाक का सामान्य आधार नहीं है।
4. सहमति/अनुबंध सिद्धांत - मुस्लिम विधि में निकाह की संविदात्मक प्रकृति के कारण विवाह-विघटन की अवधारणा अन्य कई व्यक्तिगत विधियों से अलग विकसित हुई है। मुस्लिम विधि में
• पति द्वारा तलाक
• पत्नी द्वारा खुला
• पारस्परिक मुबारात
• तलाक-ए-तफवीज
• न्यायिक विघटन
जैसे उपाय उपलब्ध हैं। इसलिए मुस्लिम विधि में विवाह-विघटन के कई रूप पक्षकारों की इच्छा और संविदात्मक प्रकृति से जुड़े हुए हैं।
तलाक के विधिक आधार - यहाँ दो स्तरों को अलग-अलग समझना चाहिए -
1. सामान्य वैवाहिक कानूनों में तलाक के आधार - हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 में, उदाहरण के लिए, व्यभिचार, क्रूरता, परित्याग, धर्म परिवर्तन, मानसिक विकार, कुछ वैधानिक परिस्थितियों में संन्यास तथा सात वर्ष तक जीवित होने की जानकारी न होना आदि आधार दिए गए हैं।
लेकिन मुस्लिम विवाह के लिए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 को लागू नहीं किया जाता। मुस्लिम विवाह के विघटन के लिए मुस्लिम विधि और विशेष रूप से Dissolution of Muslim Marriages Act, 1939 महत्वपूर्ण है।
2. मुस्लिम विधि के अंतर्गत तलाक के आधार एवं प्रकार - मुस्लिम विधि में विवाह-विघटन के आधार को मुख्यतः तीन भागों में समझ सकते हैं:
1. पति द्वारा तलाक - पति मुस्लिम विधि के अनुसार तलाक दे सकता है, हालांकि आधुनिक भारतीय कानून में इसका प्रयोग संवैधानिक और वैधानिक सीमाओं के अधीन है।
I. तलाक ए अहसन
II. तलाक ए हसन
III. तलाक ए बिद्दत
2. पत्नी द्वारा तलाक/विवाह-विघटन (खुला) - पत्नी को विभिन्न परिस्थितियों में
I. खुला
II. तलाक-ए-तफवीज
III. न्यायिक विघटन
का अधिकार होता है।
3. पारस्परिक सहमति (तलाक ए मुबारत) - पति-पत्नी मुबारात के माध्यम से वैवाहिक संबंध समाप्त कर सकते हैं।
तलाक के विभिन्न प्रकार -
I. तलाक-ए-अहसन - इसे तलाक का सबसे उचित और मान्य रूप माना जाता है। इसमें
1. पति एक बार तलाक की घोषणा करता है
2. घोषणा पत्नी की तुहर की अवस्था में होती है
3. उस तुहर में सहवास नहीं किया गया हो
4. इसके बाद इद्दत की अवधि रहती है
5. इद्दत पूरी होने तक पति तलाक वापस ले सकता है।
यदि इद्दत समाप्त हो जाती है और तलाक वापस नहीं लिया जाता, तो तलाक प्रभावी हो जाता है।
विशेषता - यह तलाक पति को पुनर्विचार और सुलह का अवसर देता है।
II. तलाक-ए-हसन - इसमें तलाक की घोषणा तीन अलग-अलग तुहरों में की जाती है।
प्रत्येक तुहर में एक घोषणा की जाती है।यदि तीसरी घोषणा के बाद आवश्यक परिस्थितियां पूरी हो जाती हैं, तो तलाक अंतिम हो जाता है।
विशेषता - इसमें भी पति-पत्नी को बीच में संबंध सुधारने का अवसर मिलता है।
III. तलाक-ए-बिदअत - इसे तीन तलाक के रूप में जाना जाता है। इसमें पति एक ही अवसर पर तीन बार तलाक की घोषणा करता है या ऐसा रूप अपनाया जाता था जिससे तत्काल और अपरिवर्तनीय तलाक माना जाए यह तलाक का सबसे अप्रिय रूप है जो भारत में Shayara Bano v. Union of India (2017) में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार तलाक ए बिदअत/तत्काल तीन तलाक को Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Act, 2019 द्वारा असंवैधानिक घोषित कर दिया है।
इसके बाद आया। इस कानून के अनुसार
• तलाक की ऐसी घोषणा शून्य और अवैध है
• वह किसी वैधानिक तलाक का प्रभाव उत्पन्न नहीं करती
• ऐसी घोषणा के संबंध में अधिनियम में दंडात्मक प्रावधान भी हैं।
IV. खुला (Khula) - खुला वह तलाक है जिसमें पत्नी विवाह समाप्त करने की इच्छा व्यक्त करती है और सामान्यतः पति की सहमति के आधार पर वैवाहिक संबंध समाप्त होता है। इसे पत्नी द्वारा खरीदा गया तलाक भी कहते हैं। इसमें पत्नी मेहर या किसी अन्य वैवाहिक लाभ को वापस करने/त्यागने के लिए तैयार हो सकती है, लेकिन इसका स्वरूप परिस्थितियों और संबंधित विधि पर निर्भर करता है।
उदाहरण - पत्नी कहती है कि मैं इस वैवाहिक संबंध को आगे नहीं रखना चाहती और पति सहमत हो जाता है और दोनों वैवाहिक संबंध समाप्त करने की प्रक्रिया पूरी करते हैं। यह खुला होता है।
V. मुबारात - मुबारात का अर्थ है पारस्परिक रूप से अलग होने की इच्छा। इसमें
√पति अलग होना चाहता है
√पत्नी भी अलग होना चाहती है तो दोनों
पारस्परिक सहमति से विवाह समाप्त करते हैं।
खुला और मुबारत में अंतर -
खुला - पहल पत्नी की ओर से।
मुबारात - दोनों पक्षों की पारस्परिक इच्छा
VI. तलाक-ए-तफवीज - यह प्रत्यायोजित तलाक (Delegated Divorce) है। पति अपने तलाक देने के अधिकार को पत्नी या किसी अन्य व्यक्ति को कुछ शर्तों के अधीन प्रत्यायोजित कर सकता है। यह अधिकार
विवाह के समय या विवाह के बाद निकाहनामा की शर्तों के माध्यम से दिया जाता है।
उदाहरण - निकाहनामे में शर्त रखी गई कि यदि पति दूसरी शादी करे तो पत्नी को स्वयं को तलाक देने का अधिकार होगा।यह परिस्थितियों के अनुसार तलाक-ए-तफवीज होता है।
VII. इला (Ila) - इला में पति शपथ लेता है कि वह पत्नी के साथ वैवाहिक संबंध नहीं रखेगा। परंपरागत मुस्लिम विधि में इसकी विशिष्ट विधिक परिणतियां थीं।आधुनिक भारतीय न्यायालयों में इसका व्यावहारिक महत्व बहुत सीमित है।
VIII. जिहार (Zihar) - जिहार में पति पत्नी की तुलना ऐसी महिला से करता है जो उसके लिए स्थायी रूप से निषिद्ध रिश्ते में हो। इसका संबंध प्राचीन मुस्लिम विधि में प्रायश्चित और वैवाहिक संबंध से था। यह भी आज ऐतिहासिक/पारंपरिक मुस्लिम विधि की अवधारणा के रूप में पढ़ाया जाता है।
IX. लिआन (Lian) - जब पति अपनी पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाता है और आरोप सिद्ध नहीं कर पाता, तो पत्नी को न्यायिक उपाय प्राप्त हो सकता है। ऐसे मामले में पत्नी विवाह-विघटन की मांग कर सकती है।
X. न्यायिक विवाह-विघटन - मुस्लिम पत्नी के लिए सबसे महत्वपूर्ण वैधानिक उपायों में से एक Dissolution of Muslim Marriages Act, 1939 है।धारा 2 के अंतर्गत पत्नी के आधार - मुस्लिम पत्नी निम्न में से एक या अधिक आधार पर विवाह-विघटन की डिक्री मांग सकती है -
1. पति का चार वर्ष से पता न होना - यदि पति के बारे में चार वर्ष तक कोई जानकारी नहीं है, तो पत्नी विवाह-विघटन मांग सकती है।
2. दो वर्ष तक भरण-पोषण न देना - यदि पति ने बिना उचित कारण पत्नी का भरण-पोषण दो वर्ष तक नहीं किया है।
3. सात वर्ष या उससे अधिक का कारावास - यदि पति को सात वर्ष या उससे अधिक की सजा दी गई है।
4. तीन वर्ष तक वैवाहिक दायित्वों का निर्वहन न करना - यदि पति बिना उचित कारण अपने वैवाहिक दायित्वों का पालन नहीं करता।
5. नपुंसकता - यदि पति विवाह के समय नपुंसक था और अभी भी ऐसा है।
6. पागलपन/गंभीर मानसिक स्थिति - अधिनियम में मानसिक अस्वस्थता से संबंधित आधार भी है।
7. अल्पायु में विवाह और अस्वीकृति - यदि लड़की का विवाह उसके 15 वर्ष की आयु से पहले अभिभावक ने कराया था, तो वह 18 वर्ष की आयु से पहले विवाह को अस्वीकार कर सकती है, बशर्ते विवाह consummate न हुआ हो।
इस अधिनियम में अन्य वैधानिक प्रावधान भी हैं और 2019 के संशोधन से कुष्ठ रोग संबंधी पुराना आधार हटा दिया गया है।
संरक्षकता (हिज़ानत) (मुतावल्ली) के विधि-संबंधी प्रावधान - संरक्षकता की संकल्पना एवं अर्थ है नाबालिग के व्यक्ति या किसी संपत्ति या दोनों की देखभाल और कानूनी हितों की रक्षा के लिए कानून द्वारा मान्यता प्राप्त अधिकार एवं दायित्व।
संरक्षक और अभिरक्षक में अंतर -
संरक्षक = Guardian - वह नाबालिग के व्यक्ति/संपत्ति के संबंध में कानूनी अधिकार और दायित्व एवं नियंत्रण रखता है।
हाज़िन/अभिरक्षक = Custodian - वह नाबालिग/संपत्ति की वास्तविक देखभाल और शारीरिक अभिरक्षा करता है।
संरक्षकता से संबंधित कानून - भारत में मुस्लिम नाबालिगों की संरक्षकता के संबंध में प्रमुख कानून है Guardians and Wards Act, 1890, यह कानून संरक्षक की नियुक्ति और नाबालिग के हितों की रक्षा की प्रक्रिया निर्धारित करता है। इसके अतिरिक्त मुस्लिम व्यक्तिगत विधि के
• Family Courts Act, 1984, • Juvenile Justice Act, 2015
भी परिस्थितियों के अनुसार प्रासंगिक हो सकते हैं।
Family Courts Act, 1984 की धारा 7 के अंतर्गत Family Court को विवाह - विघटन, वैवाहिक स्थिति, वैधता, भरण-पोषण और नाबालिग की guardianship/custody/access जैसे मामलों पर अधिकारिता प्राप्त है।
नाबालिगों के संरक्षण से संबंधित नियम
1. कल्याण सर्वोपरि सिद्धांत - नाबालिग से संबंधित मामलों में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है - Welfare of the minor is the paramount consideration.
Guardians and Wards Act की धारा 17 में न्यायालय को संरक्षक नियुक्त करते समय नाबालिग के कल्याण को ध्यान में रखने का निर्देश है। न्यायालय उम्र, लिंग, धर्म, प्रस्तावित संरक्षक का चरित्र और क्षमता, नाबालिग से निकटता तथा नाबालिग की बुद्धिसंगत पसंद आदि को देख सकता है।
2. बच्चे की इच्छा - यदि बच्चा इतना बड़ा है कि वह बुद्धिसंगत पसंद व्यक्त कर सकता है, तो न्यायालय उसकी इच्छा पर भी विचार कर सकता है।
3. संरक्षक की योग्यता - न्यायालय यह देखता है कि प्रस्तावित
• संरक्षक बच्चे की देखभाल कर सकता है या नहीं
• उसका चरित्र कैसा है
• उसकी आर्थिक और मानसिक क्षमता कैसी है;
• बच्चे के साथ उसका संबंध कैसा है।
4. बच्चे की सुरक्षा - यदि कोई अभिभावक बच्चे के हितों के प्रतिकूल है, तो केवल प्राकृतिक अभिभावक होने से उसे अंतिम अधिकार नहीं मिल जाता। बच्चे का कल्याण अंतिम कसौटी है।
सर्वोच्च न्यायालय ने Athar Hussain v. Syed Siraj Ahmed में custody और guardianship के बीच अंतर तथा बच्चे के कल्याण के महत्व पर विचार किया।
संरक्षक के प्रकार - मुस्लिम विधि में संरक्षकता को विभिन्न आधारों पर वर्गीकृत किया जाता है।
1. प्राकृतिक/कानूनी संरक्षक (Natural/Legal Guardian) - मुस्लिम विधि में नाबालिग के व्यक्तिगत और संपत्ति के संबंध में पिता को प्रमुख प्राकृतिक/कानूनी संरक्षक माना जाता है। पिता के बाद कुछ परिस्थितियों में दादा का पैतृक स्थान आता है।
2. वसीयती संरक्षक (Testamentary Guardian) - पिता या उपयुक्त व्यक्ति वसीयत द्वारा किसी व्यक्ति को नाबालिग का संरक्षक नियुक्त कर सकता है, जिसे वसीयती संरक्षक कहा जाता है।
3. न्यायालय द्वारा नियुक्त संरक्षक (Court-appointed Guardian) - यदि प्राकृतिक या वसीयती संरक्षक उपलब्ध नहीं है या नाबालिग के हित में न्यायालयीय हस्तक्षेप आवश्यक है, तो न्यायालय Guardians and Wards Act, 1890 के तहत संरक्षक नियुक्त कर सकता है।
4. वास्तविक/De facto Guardian - ऐसा व्यक्ति जो व्यवहार में बच्चे या उसकी संपत्ति की देखभाल करता है, लेकिन कानून ने उसे वैध संरक्षक के रूप में नियुक्त नहीं किया है, उसे पारंपरिक मुस्लिम विधि में de facto guardian कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति को केवल वास्तविक देखभाल के आधार पर प्राकृतिक/कानूनी संरक्षक के समान अधिकार प्राप्त नहीं होते।
B. संरक्षक के अधिकार एवं कर्तव्य -
1. बच्चे की देखभाल - संरक्षक का पहला कर्तव्य नाबालिग के स्वास्थ्य, शिक्षा
सुरक्षा, पालन-पोषण का ध्यान रखना है।
2. संपत्ति की रक्षा - यदि संरक्षक नाबालिग की संपत्ति का संरक्षक है, तो उसे संपत्ति की सुरक्षा करनी चाहिए।
3. संपत्ति का दुरुपयोग नहीं करन - संरक्षक नाबालिग की संपत्ति को अपने निजी लाभ के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकता।
4. संपत्ति का हस्तांतरण - नाबालिग की अचल संपत्ति को बेचने या अन्य महत्वपूर्ण तरीके से हस्तांतरित करने पर कानून विशेष सीमाएं लगाता है।
5. न्यायालय की अनुमति - जहाँ कानून न्यायालय की अनुमति आवश्यक करता है, वहां संरक्षक को बिना अनुमति संपत्ति का महत्वपूर्ण हस्तांतरण नहीं करना चाहिए।
6. बच्चे के हित को प्राथमिकता - संरक्षक का हर निर्णय नाबालिग के सर्वोत्तम हित में होना चाहिए।
मुस्लिम विधि में हिज़ानत/अभिरक्षा - यह guardianship से अलग अवधारणा है।हिज़ानत का अर्थ बच्चे की वास्तविक शारीरिक देखभाल है। पारंपरिक मुस्लिम विधि में छोटे बच्चों की अभिरक्षा के संबंध में माता को प्राथमिकता दी गई है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण और निरपेक्ष नहीं है।
सुन्नी विधि में पारंपरिक नियम -
• पुत्र की हिज़ानत माँ को लगभग 7 वर्ष तक
• पुत्री की हिज़ानत माँ को यौवन तक मानी जाती रही है।
शिया विधि में पारंपरिक नियम - पुत्र के लिए लगभग 2 वर्ष, पुत्री के लिए लगभग 7 वर्ष तक माँ की हिज़ानत का उल्लेख मिलता है।
लेकिन आधुनिक न्यायिक व्यवस्था में केवल उम्र का पारंपरिक नियम निर्णायक नहीं है। आज न्यायालय का प्रमुख प्रश्न है कि बच्चे का वास्तविक कल्याण किस व्यवस्था में है?
वैधता एवं वैधीकरण, पुत्रत्व की स्वीकृति तथा दत्तक ग्रहण -
वैधता (Legitimacy) - वैधता का अर्थ है कि बच्चे का जन्म ऐसा वैवाहिक संबंध स्थापित करने वाली परिस्थितियों में हुआ है जिसे कानून वैध मानता है। मुस्लिम विधि में वैधता वैध विवाह और उससे उत्पन्न पितृत्व से जुड़ी है।
वैध विवाह से उत्पन्न बच्चा - यदि विवाह वैध है और विवाह के दौरान बच्चा पैदा होता है, तो बच्चे की वैधता और पितृत्व को मान्यता मिलती है।
वैधता का महत्व - वैधता से जुड़े प्रश्नों का प्रभाव - पितृत्व, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, पारिवारिक संबंध एवं
संरक्षकता पर पड़ता है।
वैधीकरण (Legitimation) - वैधीकरण का अर्थ ऐसी विधिक प्रक्रिया से है जिसके द्वारा विवाह के बाहर जन्मे बच्चे को बाद में कानून वैध संतान का दर्जा देता है। यहाँ मुस्लिम विधि की स्थिति हिंदू विधि से अलग है। मुस्लिम विधि में कोई ऐसा व्यापक सिद्धांत नहीं है कि बाद में माता - पिता के विवाह कर लेने मात्र से पूर्व में जन्मा बच्चा स्वतः वैध हो जाए। इसलिए।Legitimacy और Legitimation को एक नहीं समझना चाहिए।
Legitimacy - बच्चा प्रारंभ से वैध विवाह से उत्पन्न होने के कारण वैध है।
Legitimation - बाद की किसी वैधानिक प्रक्रिया से बच्चे को वैध स्थिति देने की अवधारणा।
मुस्लिम विधि के अंतर्गत पुत्रत्व की स्वीकृति (इकरार ए नशब) - इसे Acknowledgment of Paternity कहा जाता है। यह मुस्लिम विधि की महत्वपूर्ण अवधारणा है। यदि किसी व्यक्ति का पितृत्व पहले से निश्चित नहीं है, तो वह उचित परिस्थितियों में किसी बच्चे को अपना पुत्र मानकर उसकी पितृत्व - स्वीकृति कर सकता है। लेकिन यह समझना बहुत जरूरी है कि Acknowledgment स्वयं बच्चे को अवैध से वैध बनाने का जादुई उपकरण नहीं है। यह तभी प्रभावी होगा जब बच्चे का जन्म ऐसे संबंध से हुआ हो जिसे कानून वैध संतान के रूप में स्वीकार कर सकता है और किसी अन्य व्यक्ति का पितृत्व पहले से स्थापित न हो।
पुत्रत्व की स्वीकृति की आवश्यक शर्तें -
1. बच्चा ऐसा हो कि स्वीकर्ता का पुत्र माना जा सके - यदि उम्र या अन्य परिस्थितियों के कारण ऐसा होना संभव ही नहीं है, तो स्वीकृति प्रभावी नहीं होगी।
2. पितृत्व पहले से किसी अन्य व्यक्ति का स्थापित न हो - यदि बच्चे का वैध पितृत्व पहले से किसी अन्य व्यक्ति के पक्ष में निश्चित है, तो बाद की स्वीकृति उसे आसानी से बदल नहीं सकती।
3. स्वीकृति वास्तविक हो - स्वीकृति केवल संपत्ति प्राप्त करने या उत्तराधिकार बदलने के उद्देश्य से कृत्रिम नहीं होनी चाहिए।
4. वैधता की संभावना हो - यदि परिस्थितियां स्पष्ट रूप से दिखाती हैं कि बच्चा स्वीकर्ता की वैध संतान हो ही नहीं सकता, तो केवल “यह मेरा पुत्र है” कह देने से पितृत्व स्थापित नहीं हो जाता।
मुस्लिम विधि में दत्तक ग्रहण - क्या मुस्लिम विधि में Adoption है? परंपरागत मुस्लिम व्यक्तिगत विधि में हिंदू विधि जैसा पूर्ण दत्तक ग्रहण (Adoption) का सिद्धांत नहीं है।मुस्लिम विधि में किसी अनाथ या दूसरे बच्चे को अपने परिवार में लेकर उसका पालन-पोषण करना निश्चित रूप से संभव है, लेकिन इससे वह बच्चा जैविक संतान के समान स्वतः वंश और उत्तराधिकार संबंध स्थापित नहीं करता।
इस व्यवस्था को व्यापक रूप से कफ़ाला की अवधारणा से समझा जाता है।
कफ़ाला और दत्तक ग्रहण में अंतर -
आधार - कफ़ाला - दत्तक ग्रहण
अर्थ - पालन-पोषण - संतान के जैसा
मूल संबंध - देखभाल - कानूनी पुत्र/पुत्री
जैविक वंश - नहीं बदलता - कानून द्वारा नया पारिवारिक संबंध
उत्तराधिकार - स्वतः जैविक संतान जैसा लागू नहीं - adoption law के अनुसार अधिकार
नाम/वंश - मूल पहचान बनी रहती है - लागू कानून के अनुसार स्थिति बदल सकती है
मान्यता - मुस्लिम व्यक्तिगत विधि मान्य देखभाल की अवधारणा पारंपरिक रूप में पूर्ण - नहीं
मुस्लिम विधि में दत्तक ग्रहण की मान्यता -
1. मुस्लिम व्यक्तिगत विधि के अंतर्गत - पूर्ण कानूनी adoption का पारंपरिक मुस्लिम व्यक्तिगत विधि में सिद्धांत नहीं है।अर्थात् कोई मुस्लिम व्यक्ति केवल मुस्लिम personal law के आधार पर किसी बच्चे को गोद लेकर उसे स्वतः अपनी जैविक संतान के समान उत्तराधिकारी नहीं बना सकता।
भारतीय कानून के अंतर्गत - यहाँ स्थिति बदल जाती है। Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015 एक धर्म-निरपेक्ष एक वैधानिक दत्तक ग्रहण प्रारूप प्रदान करता है। इस अधिनियम की धारा 56 adoption की व्यवस्था करती है और धारा 58 के अनुसार भारत में रहने वाले दायक ग्रहण के इच्छुक दंपति अपने धर्म की परवाह किए बिना
अनाथाश्रम (orphan),
लावारिश (abandoned) या
सुपुर्दगी (surrendered) बच्चे का वैधानिक प्रक्रिया के अनुसार दत्तक ग्रहण कर सकते हैं। इसलिए मुस्लिम personal law में पूर्ण adoption का सिद्धांत नहीं है, लेकिन मुस्लिम व्यक्ति JJ Act, 2015 के तहत वैधानिक adoption कर सकता है। यही आधुनिक भारतीय कानून की महत्वपूर्ण स्थिति है।
न्यायिक निर्णय - (Shabnam Hashmi) - Shabnam Hashmi v. Union of India (2014) इस विषय का अत्यंत महत्वपूर्ण मामला है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि JJ Act जैसे धर्म-निरपेक्ष वैधानिक कानून के तहत adoption का रास्ता किसी व्यक्ति के personal law से अलग उपलब्ध हो सकता है। बाद के न्यायिक निर्णयों में भी Shabnam Hashmi को इसी संदर्भ में उद्धृत किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि adoption को स्वयं एक मौलिक अधिकार के रूप में घोषित करना अलग प्रश्न है, लेकिन विधायिका द्वारा बनाया गया वैधानिक adoption framework प्रभावी है।
JJ Act के अंतर्गत मुस्लिम व्यक्ति द्वारा Adoption -
धारा 56 - Adoption का उद्देश्य orphan, abandoned और surrendered children को परिवार का अधिकार उपलब्ध कराना है। साथ ही relative adoption भी धर्म से परे कानून के अनुसार संभव है।
धारा 57 - Prospective adoptive parents शारीरिक रूप से स्वस्थ, आर्थिक रूप से सक्षम, मानसिक रूप से सजग, बच्चे के अच्छे पालन-पोषण के लिए इच्छुक होने चाहिए। विवाहित दंपति के मामले में दोनों की सहमति आवश्यक है। Single या divorced person भी निर्धारित शर्तों के अधीन adopt कर सकता है। Single male को girl child adopt करने की अनुमति नहीं है।
धारा 58 - भारत में रहने वाले भारतीय prospective adoptive parents किसी भी धर्म के हों, वे orphan, abandoned या surrendered child के adoption के लिए आवेदन कर सकते हैं। वर्तमान प्रक्रिया में adoption order District Magistrate से संबंधित है, जो 2021 के संशोधन के बाद व्यवस्था में आया।
धारा 61 - Adoption proceedings के निपटारे की प्रक्रिया निर्धारित करती है।
धारा 63 - वैधानिक adoption order के बाद बच्चे की कानूनी स्थिति
मुस्लिम विधि में उपहार (हिबा) परिभाषा, प्रकृति एवं प्रक्रिया -
मुस्लिम विधि में हिबा संपत्ति के अंतरण का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
हिबा का सामान्य परिचय - हिबा अरबी शब्द है, जिसका अर्थ है (उपहार) किसी वस्तु को बिना किसी प्रतिफल के स्वेच्छापूर्वक किसी अन्य व्यक्ति को दे देना। मुस्लिम विधि में हिबा वह अंतरण है जिसमें कोई व्यक्ति अपने जीवनकाल में अपनी संपत्ति को बिना किसी प्रतिफल के, स्वेच्छा से दूसरे व्यक्ति के स्वामित्व में हस्तांतरित करता है और दूसरा व्यक्ति उसे स्वीकार करता है। सरल शब्दों में जीवनकाल में बिना प्रतिफल संपत्ति का स्वैच्छिक अंतरण, जिसे प्राप्तकर्ता स्वीकार करे और जिसका कब्जा भी विधि के अनुसार हस्तांतरित हो, हिबा कहलाता है।
हिबा का उद्देश्य - संपत्ति का तत्काल और स्वैच्छिक अंतरण है। यह वसीयत से अलग है, क्योंकि वसीयत मृत्यु के बाद प्रभावी होती है, जबकि हिबा दाता के जीवनकाल में प्रभावी होता है।
लेकिन मुस्लिम विधि में प्रत्येक उपहार को तकनीकी अर्थ में हिबा नहीं माना जाता। वैध हिबा के लिए मुस्लिम विधि द्वारा निर्धारित आवश्यक तत्वों का होना आवश्यक है।
हिबा की विधिक परिभाषा - मुस्लिम विधि के अनुसार हिबा का मूल तत्व बिना प्रतिफल के संपत्ति का तत्काल और पूर्ण अंतरण है। अर्थात् दाता केवल यह वादा नहीं करता कि वह भविष्य में संपत्ति देगा, बल्कि वैध हिबा के द्वारा संपत्ति में अधिकार उसी समय प्राप्तकर्ता को हस्तांतरित किया जाता है।
प्रमुख विधिक तत्व - हिबा में तीन पक्ष (तत्व) होते हैं -
1. उपहार - Gifter (Donor/Waqif नहीं) बल्कि उपहार (हिबा) देने वाला।
2. प्राप्तकर्ता (Reciver)
3. उपहार की गई संपत्ति (Subject Matter)
इसके अतिरिक्त तीन आवश्यक क्रियाएँ -
घोषणा → स्वीकृति → कब्जे का हस्तांतरण हैं।
हिबा की आवश्यक शर्तें - वैध हिबा के लिए निम्नलिखित आवश्यक शर्तें हैं -
वैध हिबा का मूल ढांचा - घोषणा + स्वीकृति + कब्जे का हस्तांतरण = वैध हिबा का मूल ढाँचा
1. उपहारकर्ता का सक्षम होना - हिबा करने वाला व्यक्ति
• मुस्लिम होना चाहिए, क्योंकि हिबा का मूल सिद्धांत मुस्लिम विधि से उत्पन्न हुआ है।
• बालिग होना चाहिए।
• स्वस्थ मस्तिष्क का होना चाहिए।
• संपत्ति का वैध स्वामी होना चाहिए।
• अपनी स्वतंत्र इच्छा से हिबा करना चाहिए।
उदाहरण - यदि A किसी संपत्ति का वैध मालिक है और वह बालिग तथा स्वस्थ मस्तिष्क का है, तो वह अपनी संपत्ति B को हिबा कर सकता है। लेकिन यदि A स्वयं उस संपत्ति का मालिक ही नहीं है, तो वह वैध हिबा नहीं कर सकता।
2. दाता की स्वतंत्र इच्छा
2. हिबा स्वैच्छिक (free consent) होना चाहिए - यदि हिबा दबाव, धोखा, अनुचित प्रभाव, जबरदस्ती, या ऐसी परिस्थिति में किया गया हो जिसमें उपहारकर्ता की स्वतंत्र इच्छा समाप्त हो गई हो तो उसकी वैधता प्रभावित होती है।
3. हिबा की घोषणा (Declaration) - दाता को स्पष्ट रूप से यह व्यक्त करना आवश्यक है कि वह अपनी संपत्ति प्राप्तकर्ता को देना चाहता है। इसे Declaration of Gift कहते हैं।
घोषणा मौखिक/लिखित/परिस्थितियों से स्पष्ट रूप से व्यक्त हो सकती है,
मुस्लिम विधि में पारंपरिक रूप से हिबा के लिए किसी विशेष औपचारिक शब्द का प्रयोग अनिवार्य नहीं है। मुख्य बात यह है कि उपहारकर्ता की इच्छा स्पष्ट होनी चाहिए कि वह संपत्ति का स्वामित्व दूसरे व्यक्ति को देना चाहता है।
उदाहरण - A कहता है मैं यह मकान B को हिबा करता हूँ। यह हिबा की स्पष्ट घोषणा होती है, यदि अन्य आवश्यक शर्तें भी पूरी हों।
4. प्राप्तकर्ता द्वारा स्वीकृति (Acceptance) - केवल उपहारकर्ता द्वारा घोषणा कर देना पर्याप्त नहीं है। जिस व्यक्ति के पक्ष में हिबा किया गया है, उसे हिबा स्वीकार करना आवश्यक है। इसे Acceptance by Donee कहा जाता है। यह स्वीकृति स्पष्ट रूप से मौखिक/लिखित या परिस्थितियों से निहित रूप में हो सकती है।
नाबालिग के मामले में - यदि प्राप्तकर्ता नाबालिग है, तो उसका अभिभावक परिस्थितियों के अनुसार उसकी ओर से हिबा स्वीकार कर सकता है।
5. कब्जे का हस्तांतरण (Delivery of Possession) - यह मुस्लिम विधि में हिबा की महत्वपूर्ण विशेषताओं में से है।
उपहारकर्ता द्वारा घोषणा और प्राप्तकर्ता द्वारा स्वीकृति के बाद कब्जे का हस्तांतरण (Delivery of Possession) आवश्यक है। अर्थात् उपहारकर्ता ने प्राप्तकर्ता के लिए संपत्ति पर अपना कब्जा छोड़कर प्राप्तकर्ता को उसका कब्जा देना चाहिए, जहाँ परिस्थितियों में वास्तविक कब्जे का हस्तांतरण संभव हो।
कब्जे के प्रकार -
• वास्तविक - जब संपत्ति का वास्तविक भौतिक कब्जा प्राप्तकर्ता को दे दिया जाए।
उदाहरण - A ने B को एक मकान हिबा किया और मकान की चाबी तथा वास्तविक कब्जा B को दे दिया।
• रचनात्मक कब्जा - कुछ परिस्थितियों में भौतिक रूप से कब्जा देना संभव नहीं होता। ऐसी स्थिति में ऐसा कार्य किया जा सकता है जिससे यह स्पष्ट हो कि संपत्ति का नियंत्रण अब प्राप्तकर्ता को दे दिया गया है।
उदाहरण - ऐसी संपत्ति जिसमें तत्काल भौतिक कब्जे का हस्तांतरण संभव नहीं है, वहाँ परिस्थितियों के अनुसार नियंत्रण और अधिकार का हस्तांतरण महत्वपूर्ण हो सकता है।
6. संपत्ति का अस्तित्व में होना - हिबा की विषय-वस्तु ऐसी संपत्ति होनी चाहिए जो हिबा के समय अस्तित्व में हो। भविष्य में अस्तित्व में आने वाली संपत्ति का वर्तमान हिबा वैध नहीं होगा।
उदाहरण - A कहता है मेरी भविष्य की फसल B की होगी। यह वर्तमान हिबा के रूप में समस्याग्रस्त होगा, क्योंकि संपत्ति हिबा के समय अस्तित्व में नहीं है।
7. संपत्ति का निश्चित होना - हिबा की गई संपत्ति पर्याप्त रूप से निश्चित और पहचान योग्य होनी चाहिए। उपहार दाता को ऐसी संपत्ति का हिबा नहीं करना चाहिए जिसकी पहचान ही स्पष्ट न हो।
उदाहरण - यदि A कहता है कि मेरी किसी भी संपत्ति में से कुछ संपत्ति B को देता हूँ। यहां यह पता ही नहीं चलता कि कौन-सी संपत्ति में से कितनी दी गई है।
8. संपत्ति हस्तांतरण योग्य हो - जिस संपत्ति का हिबा किया जा रहा है, उसमें उपहार दाता का ऐसा अधिकार होना चाहिए जिसे कानून के अनुसार दूसरे व्यक्ति को हस्तांतरित किया जा सके अर्थात् उपहार दाता के पास संपत्ति पर वैध अधिकार/स्वामित्व होना चाहिए।
9. बिना प्रतिफल (consideration) होना - परंपरागत हिबा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है कि यह बिना प्रतिफल के होता है। यदि संपत्ति देने के बदले कोई प्रतिफल निर्धारित किया गया है, तो वह हिबा नहीं रहता और मुस्लिम विधि में हिबा-बिल-एवज़ जैसी अलग अवधारणा सामने आती है।
10. तत्काल प्रभाव - हिबा तत्काल प्रभाव से लागू होता है। उपहार दाता यह नहीं कह सकता कि मैं अभी हिबा करता हूँ, जिसका स्वामित्व मेरी मृत्यु के बाद मिलेगा। ऐसी व्यवस्था हिबा के स्थान पर वसीयत बन जाती है।
मर्ज उल मौत (मृत्यु की संभावना) पर हिबा - यदि कोई व्यक्ति ऐसी बीमारी में हिबा करता है जिसमें उसकी मृत्यु की आशंका हो तो हिबा के नियमों के साथ-साथ मुस्लिम विधि में मृत्यु-रोग से संबंधित विशेष प्रतिबंध लागू होते हैं। विशेषकर उत्तराधिकारियों के अधिकारों को प्रभावित करने वाले हिबा के मामलों में न्यायालय सावधानी से परीक्षण करता है।
C. हिबा की विधिक प्रकृति - हिबा की वैधानिकता -
1. हिबा एक स्वैच्छिक अंतरण है - हिबा उपहारदाता की इच्छा से संपत्ति के स्वामित्व का अंतरण है।
2. हिबा एक जीवित व्यक्ति द्वारा किया गया अंतरण है - हिबा inter vivos transfer है। अर्थात् यह जीवित व्यक्ति द्वारा दूसरे जीवित व्यक्ति के पक्ष में किया जाने वाला संपत्ति अंतरण है।
3. हिबा तत्काल प्रभाव वाला अंतरण है - हिबा का उद्देश्य भविष्य के लिए केवल वादा करना नहीं है। यदि वैध रूप से पूर्ण हो गया है, तो प्राप्तकर्ता को संपत्ति में अधिकार प्राप्त हो जाता है।
4. हिबा बिना प्रतिफल का अंतरण है - हिबा में उपहारदाता को बदले में कोई प्रतिफल प्राप्त नहीं होता। इसी कारण यह gratuitous transfer है।
5. हिबा के लिए कब्जे का विशेष महत्व - मुस्लिम विधि की विशिष्ट विशेषता यह है कि केवल घोषणा और स्वीकृति को पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि तुरंत कब्जे का हस्तांतरण होता है।
इसलिए - Declaration + Acceptance + Delivery of Possession
6. हिबा मौखिक/लिखित/परिस्थितिजन्य हो सकता है - मुस्लिम विधि का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि वैध हिबा केवल लिखित दस्तावेज द्वारा ही किया जाए, ऐसा आवश्यक नहीं है। मुस्लिम विधि में oral gift भी वैध हो सकता है, यदि आवश्यक तत्व मौजूद हों। अर्थात्
घोषणा + स्वीकृति + कब्जे का हस्तांतरण पूरा होने पर मौखिक हिबा भी वैध हो सकता है। हालाँकि, आधुनिक विधि में संपत्ति के प्रकार, दस्तावेज के स्वरूप और पंजीकरण से संबंधित प्रश्नों को अलग से देखना पड़ता है। विशेष परिस्थितियों में Transfer of Property Act, 1882 तथा Registration Act, 1908 के प्रावधानों का प्रभाव भी विचारणीय है।
7. हिबा का आधार धार्मिक विधि है - हिबा की अवधारणा मुस्लिम विधि के धार्मिक और न्यायशास्त्रीय स्रोतों से विकसित हुई है। इसका विकास कुरआन, हदीस, इज्मा, कियास तथा मुस्लिम विधि के न्यायिक विकास से जुड़ा है।
भारत में इसके सिद्धांतों को न्यायालयों ने विभिन्न निर्णयों के माध्यम से विकसित और स्पष्ट किया है।
8. हिबा पूर्ण एवं अपूर्ण हो सकता है - जब तक हिबा की आवश्यक शर्तें पूरी नहीं होतीं, तब तक केवल घोषणा से पूर्ण स्वामित्व का अंतरण नहीं माना जाएगा।विशेषकर जहाँ कब्जा हस्तांतरित नहीं हुआ है, वहाँ हिबा पूर्ण नहीं होता है। A declaration of gift by itself does not ordinarily complete a Hiba, acceptance by the donee and delivery of possession are also essential, subject to recognized exceptions.
9. हिबा और उपहार (Gift) में अंतर - भारतीय संपत्ति विधि में Gift और मुस्लिम विधि के Hiba को समान मान लेना उचित नहीं है।
आधार - हिबा - Gift
स्रोत - मुस्लिम विधि - Transfer of Property Act आदि
प्रतिफल - नहीं - नहीं
प्रभाव - तत्काल - तत्काल
स्वीकृति - आवश्यक आवश्यक
कब्जा - मुस्लिम विधि में महत्वपूर्ण - सामान्य Gift की वैधता के लिए यही विशिष्ट केंद्रीय शर्त नहीं
मौखिक रूप - मुस्लिम विधि में संभव - संपति के प्रकार के अनुसार लिखित/पंजीकरण संबंधी नियम
विशेषता - मुस्लिम विधि के विशिष्ट सिद्धांत वैधानिक संपत्ति अंतरण
किस के पक्ष में - किसी को भी - रक्त संबंध में (सहोदर, संतान, पैतृकता) के आधार पर।
निष्कर्ष - मुस्लिम विधि में हिबा संपत्ति के स्वैच्छिक एवं बिना प्रतिफल अंतरण की एक विशिष्ट संस्था है। इसका प्रभाव दाता के जीवनकाल में होता है। वैध हिबा के लिए दाता की स्पष्ट घोषणा, प्राप्तकर्ता की स्वीकृति तथा सामान्यतः कब्जे का हस्तांतरण आवश्यक है। हिबा की यही विशिष्टता इसे वसीयत तथा सामान्य वैधानिक Gift से अलग पहचान देती है।
वसीयत -
कोई भी सक्षम मुस्लिम अपने जीवित रहते अपनी मृत्यु के बाद अपनी संपत्ति के अंतरण से संबंधित घोषणा करता है। कुल संपत्ति के 33% भाग का अंतरण बिना किसी उत्तराधिकारी की सलाह के स्वतंत्र रूप से किया जा सकता है, इस से अधिक अंतरण हेतु सभी उत्तराधिकारियों की सहमति आवश्यक है। वसीयत में अंतरण से पहले समस्त देनदारियों का चुकारा किया जाना आवश्यक है, इसके बाद ही शेष संपत्ति के संबंध में वसीयत की जा सकती है।
हिबा और वसीयत में अंतर -
आधार - हिबा - वसीयत
प्रभाव - जीवनकाल में - मृत्यु के बाद
प्रकृति तत्काल - भविष्य में प्रभावी
अंतरण/कब्जा - तत्काल - मृत्यु के बाद
सीमा - पूरी संपत्ति भी दी जा सकती है - 1/3 की भाग
प्राप्तकर्ता - कोई भी सक्षम व्यक्ति - वसीयत के नियम लागू
वक्फ की अवधारणा, महत्व,, प्रकार एवं सिद्धांत -
मुस्लिम विधि के अंतर्गत वक्फ की संकल्पना - वक्फ मुस्लिम विधि की एक महत्वपूर्ण संस्था है। सामान्य अर्थ में वक्फ का अर्थ है किसी संपत्ति को स्थायी रूप से धार्मिक, पवित्र या परोपकारी उद्देश्य के लिए समर्पित करना, ताकि उस संपत्ति का मूल स्वरूप सुरक्षित रहे और उससे प्राप्त लाभ निर्धारित उद्देश्य में लगाया जाए। मुस्लिम विधि में वक्फ की मूल धारणा यह है कि संपत्ति को सांसारिक निजी स्वामित्व के सामान्य उपयोग से निकालकर अल्लाह के नाम पर स्थायी रूप से समर्पित कर दिया जाता है। वक्फ बनने के बाद वाकिफ (Waqif) स्वयं उस संपत्ति का सामान्य मालिक नहीं रहता और संपत्ति का प्रबंधन मुतवल्ली करता है।
वक्फ की प्रमुख परिभाषाएँ - सर डाइज सैयद अमीर अली के अनुसार वक्फ ऐसी संपत्ति का स्थायी समर्पण है जिसका लाभ धार्मिक, पवित्र या परोपकारी उद्देश्य के लिए लगाया जाता है। मुल्ला के अनुसार, वक्फ किसी संपत्ति के स्थायी समर्पण को कहते हैं जो मुस्लिम विधि द्वारा धार्मिक, पवित्र या परोपकारी उद्देश्य के रूप में मान्य हो।
वक्फ की मूल विशेषताएँ -
1. स्थायी समर्पण आवश्यक है।
2. वक्फ का उद्देश्य धार्मिक, पवित्र या परोपकारी होना चाहिए।
3. वक्फ संपत्ति का मूल स्वरूप सामान्यतः सुरक्षित रहता है।
4. वक्फ के निर्माण के बाद वाकिफ संपत्ति का सामान्य स्वामी नहीं रहता।
5. संपत्ति से प्राप्त आय या लाभ निर्धारित उद्देश्य के लिए प्रयोग किया जाता है।
6. वक्फ का प्रशासन सामान्यतः मुतवल्ली द्वारा किया जाता है।
7. वक्फ सामान्यतः अपरिवर्तनीय होता है।
वक्फ में प्रमुख पक्ष -
(1) वाकिफ (Waqif) - जो व्यक्ति संपत्ति को वक्फ करता है।
(2) वक्फ संपत्ति - जिसे धार्मिक, पवित्र या परोपकारी उद्देश्य के लिए समर्पित किया गया है।
(3) मुतावल्ली (प्रशासक) (केयर टेकर)- वक्फ का प्रबंधक या प्रशासक।
(4) लाभार्थी - वे व्यक्ति या संस्थाएँ जिन्हें वक्फ से लाभ प्राप्त होता है।
वक्फ का उद्देश्य - वक्फ का मूल उद्देश्य अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करना तथा धार्मिक, पवित्र और सामाजिक कल्याण के कार्यों को स्थायी आधार प्रदान करना है। वक्फ निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है:
1. मस्जिदों का निर्माण एवं रखरखाव।
2. मदरसे एवं शैक्षणिक संस्थाएँ चलाना।
3. गरीब एवं जरूरतमंद व्यक्तियों की सहायता।
4. अनाथों तथा विधवाओं की सहायता।
5. अस्पताल एवं चिकित्सा सेवाएँ।
6. कब्रिस्तान एवं धार्मिक स्थलों का रखरखाव।
7. धार्मिक शिक्षा एवं प्रचार।
8. सार्वजनिक उपयोग के कार्य।
9. परिवार के जरूरतमंद सदस्यों का कल्याण, यदि वह मुस्लिम विधि के अंतर्गत वैध वक्फ के रूप में संरचित हो। इस प्रकार वक्फ केवल धार्मिक संस्था नहीं है, बल्कि धार्मिक एवं सामाजिक कल्याण की स्थायी व्यवस्था भी है।
वक्फ की आवश्यक शर्तें - वक्फ के वैध निर्माण के लिए कुछ आवश्यक शर्तें पूरी होना जरूरी है।
1. वाकिफ की क्षमता - वक्फ करने वाला व्यक्ति
• बालिग होना चाहिए
• स्वस्थ मस्तिष्क का होना चाहिए
• संपत्ति पर वैध अधिकार रखता हो
• ऐसी संपत्ति का समर्पण कर सकता हो जो उसके अधिकार में हो।
2. वक्फ करने की स्पष्ट इच्छा - वाकिफ की इच्छा संपत्ति को वक्फ करने की स्पष्ट होनी चाहिए। घोषणा से यह स्पष्ट होना चाहिए कि संपत्ति का समर्पण किस उद्देश्य से किया जा रहा है।
3. स्थायित्व - वक्फ स्थायी (Permanent) होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति कहे कि संपत्ति केवल पाँच वर्ष के लिए वक्फ है और उसके बाद वापस उसकी हो जाएगी, तो ऐसा समर्पण सामान्यतः वैध वक्फ नहीं होगा।
4. अपरिवर्तनीयता - वक्फ बनने के बाद वाकिफ सामान्यतः एकतरफा रूप से उसे वापस नहीं ले सकता।
5. संपत्ति का अस्तित्व - वक्फ की जाने वाली संपत्ति विधि द्वारा मान्य संपत्ति होनी चाहिए और वाकिफ के अधिकार में होनी चाहिए।
6. उद्देश्य वैध होना चाहिए - वक्फ का उद्देश्य धार्मिक, पवित्र या परोपकारी होना चाहिए। अवैध या कानून-विरुद्ध उद्देश्य के लिए वक्फ मान्य नहीं होगा।
7. संपत्ति का निश्चित होना - वक्फ की गई संपत्ति की पहचान पर्याप्त रूप से निश्चित होनी चाहिए।
8. पूर्ण समर्पण - वक्फ में संपत्ति का ऐसा समर्पण होना चाहिए जिससे वाकिफ का निजी स्वामित्व समाप्त हो जाए और संपत्ति वक्फ के उद्देश्य के लिए समर्पित हो जाए।
9. लाभ का उद्देश्य - वक्फ संपत्ति से प्राप्त लाभ निर्धारित धार्मिक, परोपकारी या अन्य वैध उद्देश्य के लिए उपयोग किया जाना चाहिए।
10. वक्फ का उद्देश्य अनिश्चित नहीं होना चाहिए - यदि वक्फ के उद्देश्य इतने अस्पष्ट हों कि यह निर्धारित ही न किया जा सके कि संपत्ति का उपयोग किस प्रकार होगा, तो वैधता का प्रश्न उत्पन्न हो सकता है।
वक्फ के प्रकार - वक्फ को विभिन्न आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है।
1. वक्फ-ए-खैर - यह सार्वजनिक धार्मिक या परोपकारी उद्देश्य के लिए किया गया वक्फ है। उदाहरण: मस्जिद, मदरसा, अस्पताल, गरीबों की सहायता आदि।
2. वक्फ-ए-अलल-औलाद - यह परिवार या वंश के लाभ के लिए बनाया गया वक्फ है। इसे पारिवारिक वक्फ कहा जाता है। इसमें वाकिफ अपने परिवार या वंश के सदस्यों को लाभार्थी बना सकता है, लेकिन वैधता के लिए धार्मिक/परोपकारी तत्व की विधिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखना पड़ता है। भारत में इस संबंध में Musalman Wakf Validating Act, 1913 ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है।
3. सार्वजनिक वक्फ - जिसमें जनता या किसी व्यापक धार्मिक/परोपकारी वर्ग को लाभ मिलता है।
4 निजी/पारिवारिक वक्फ - जिसमें लाभ वाकिफ के परिवार या वंश को मिलता है, जिसे वक्फ-अलल-औलाद कहा जाता है।
5. मिश्रित वक्फ - जिसमें पहले परिवार या कुछ व्यक्तियों को लाभ दिया जाता है और अंततः लाभ धार्मिक या परोपकारी उद्देश्य को प्राप्त होता है।
मुशा (अविभाजित संयुक्त संपत्ति को का सिद्धांत - मुशा का अर्थ है ऐसी संपत्ति में अविभाजित हिस्सा (Undivided Share), जिसका भौतिक रूप से अलग कब्जा या विभाजन नहीं हुआ है। उदाहरण के लिए, A और B किसी मकान के संयुक्त मालिक हैं। A के पास मकान में 1/2 अविभाजित हिस्सा है। यदि A अपने उस हिस्से को वक्फ करना चाहता है, तो प्रश्न उठता है कि क्या अविभाजित हिस्से का वक्फ वैध है? यही Doctrine of Musha से संबंधित प्रश्न है।
मूल नियम - हनफी मुस्लिम विधि में सिद्धांत यह था कि मुशा (अविभाजित हिस्से) का वक्फ, कुछ परिस्थितियों में अमान्य हो सकता है, विशेषकर जब संपत्ति ऐसी हो जिसे आसानी से विभाजित किया जा सकता हो और अलग कब्जा दिया जा सकता हो। इसका आधार यह विचार था कि वक्फ में संपत्ति का समर्पण और कब्जे की स्पष्टता आवश्यक है।
अपवाद - मुस्लिम विधि में इस सिद्धांत के कई अपवाद स्वीकार किए गए हैं। विशेष रूप से ऐसी संपत्ति जिसमें वास्तविक विभाजन व्यावहारिक या विधिक रूप से कठिन हो, वहाँ अविभाजित हिस्से का वक्फ मान्य हो सकता है।
उदाहरण - मस्जिद, कब्रिस्तान, सार्वजनिक धार्मिक उद्देश्य, ऐसी संपत्ति जिसे वास्तव में विभाजित करना कठिन हो।
भारतीय विधि में स्थिति - भारतीय न्यायालयों ने Doctrine of Musha को कठोर तकनीकी नियम के रूप में लागू करने के बजाय परिस्थितियों और वक्फ की प्रकृति को ध्यान में रखा है। आधुनिक भारतीय विधि में वक्फ की वैधता का निर्धारण करते समय लागू वैधानिक प्रावधान भी महत्वपूर्ण हैं।
Musha = अविभाजित हिस्सा + वक्फ का प्रश्न + परंपरागत हनफी नियम + अनेक अपवाद।
F. मुतवल्ली (केयर टेकर) - मुतवल्ली वक्फ संपत्ति का प्रबंधक (Manager/Administrator) होता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मुतवल्ली वक्फ संपत्ति का मालिक नहीं होता। वह केवल वक्फ के उद्देश्य के अनुसार संपत्ति का प्रशासन करता है।
मुतवल्ली की नियुक्ति - मुतवल्ली की नियुक्ति निम्न प्रकार से हो सकती है:
1. वाकिफ द्वारा।
2. वक्फ-नामा में निर्धारित तरीके से।
3. वाकिफ की मृत्यु के बाद उसके द्वारा निर्धारित उत्तराधिकार व्यवस्था के अनुसार।
4. न्यायालय द्वारा, उपयुक्त परिस्थितियों में।
5. लागू वक्फ कानून के अनुसार संबंधित वक्फ प्राधिकरण द्वारा।
मुतवल्ली के प्रमुख कर्तव्य -
1. वक्फ संपत्ति की रक्षा करना।
2. संपत्ति का उचित प्रबंधन करना।
3. वक्फ की आय का सही उपयोग करना।
4. लाभार्थियों के हितों की रक्षा करना।
5. वक्फ-नामा की शर्तों का पालन करना।
6. संपत्ति को नुकसान या अवैध कब्जे से बचाना।
7. आवश्यक लेखा-जोखा रखना।
8. कानून द्वारा आवश्यक रिपोर्ट/विवरण प्रस्तुत करना।
मुतवल्ली की शक्तियाँ - मुतवल्ली को वक्फ संपत्ति के सामान्य प्रशासन की शक्ति होती है, लेकिन उसकी शक्तियाँ असीमित नहीं होतीं। वह वक्फ संपत्ति को अपनी निजी संपत्ति की तरह बेच, दान या हस्तांतरित नहीं कर सकता। वक्फ संपत्ति के हस्तांतरण, बिक्री, पट्टे आदि के संबंध में लागू वक्फ कानून तथा सक्षम प्राधिकारी की अनुमति की आवश्यकता हो सकती है।
मुतवल्ली की स्थिति - मुतवल्ली मालिक नहीं है देखरेख करने वाला है। ट्रस्टी के समान कुछ प्रशासनिक दायित्व निभाता है, लेकिन तकनीकी रूप से हर स्थिति में अंग्रेजी कानून के ट्रस्टी के बराबर नहीं माना जाता वक्फ के उद्देश्य का प्रशासक है।
वक्फ एवं सदका में अंतर -
आधार वक्फ सदका
अर्थ - संपत्ति का स्थायी धार्मिक/परोपकारी समर्पण - अल्लाह की प्रसन्नता के लिए दान
प्रकृति - स्थायी - तत्काल दान
संपत्ति - मूल संपत्ति को वक्फ के उद्देश्य के लिए स्थायी रूप से समर्पित किया जाता है - दान की गई वस्तु/धन सामान्यतः प्राप्तकर्ता को हस्तांतरित हो जाता है
स्वामित्व - वाकिफ का निजी स्वामित्व समाप्त होता है दान प्राप्तकर्ता को स्वामित्व मिल सकता है
प्रबंधन - मुतवल्ली द्वारा प्रबंधन हो सकता है - किसी मुतवल्ली की आवश्यकता नहीं
आय - वक्फ संपत्ति से प्राप्त आय निर्धारित उद्देश्य में लगती है - सदका प्राप्तकर्ता के उपयोग में आ सकता है
स्थायित्व - स्थायी होना आवश्यक स्थायित्व - आवश्यक नहीं
वापसी - वापस नहीं लिया जा सकता - पूर्ण दान के बाद वापस लेना कठिन/अमान्य हो सकता है
उदाहरण - यदि A अपनी जमीन स्थायी रूप से मस्जिद के लिए समर्पित करता है और जमीन की आय मस्जिद के रखरखाव में लगती है, तो यह वक्फ है। यदि A किसी गरीब व्यक्ति को ₹10,000 दान कर देता है, तो यह सदका है।
नोट - वक्फ = स्थायी समर्पण + धार्मिक/पवित्र/परोपकारी उद्देश्य + संपत्ति का वक्फ में समर्पण + मुतवल्ली द्वारा प्रबंधन। वाकिफ = वक्फ बनाने वाला।
मुतवल्ली = वक्फ का प्रबंधक, मालिक नहीं।
Musha = अविभाजित हिस्से से संबंधित सिद्धांत।
वक्फ-अलल-औलाद = पारिवारिक वक्फ।
सदका = दान; वक्फ = स्थायी समर्पण।
एक पंक्ति में - वाकिफ अपनी संपत्ति को वैध धार्मिक, पवित्र या परोपकारी उद्देश्य के लिए स्थायी रूप से वक्फ करता है; उसका प्रशासन मुतवल्ली करता है और संपत्ति से प्राप्त लाभ निर्धारित उद्देश्य में लगाया जाता है।
मुस्लिम विधि एवं उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के अंतर्गत वसीयत एवं मुस्लिम विधि के अंतर्गत उत्तराधिकार व उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के अंतर्गत निर्वसीयती उत्तराधिकार -
वसीयती उत्तराधिकार (Testamentary Succession) - में व्यक्ति अपनी मृत्यु के बाद संपत्ति के हस्तांतरण के लिए वसीयत करता है।
निर्वसीयती उत्तराधिकार (Intestate Succession) - में व्यक्ति बिना वैध वसीयत छोड़े मरता है और संपत्ति उत्तराधिकार के लागू नियमों के अनुसार जाती है।
वसीयती एवं निर्वसीयती उत्तराधिकार में अंतर -
आधार - वसीयती उत्तराधिकार - निर्वसीयती उत्तराधिकार
अर्थ - वसीयत के आधार पर संपत्ति का उत्तराधिकार - बिना वैध वसीयत के कानून के अनुसार उत्तराधिकार
आधार - मृतक की इच्छा + लागू कानून - उत्तराधिकार संबंधी वैधानिक नियम
प्रमुख दस्तावेज - वसीयत (Will) - कोई वसीयत नहीं
मुस्लिम विधि वसीयत पर विशेष सीमाएँ - कुरआन, सुन्नत एवं मुस्लिम व्यक्तिगत विधि के नियम
भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम Part VI आदि Part V आदि
उद्देश्य - मृत्यु के बाद संपत्ति के वितरण की इच्छा व्यक्त करना - कानून द्वारा उत्तराधिकारियों का निर्धारण
मुस्लिम विधि के अंतर्गत वसीयत - मुस्लिम विधि में वसीयत का अर्थ है वह घोषणा है जिसके द्वारा कोई मुस्लिम व्यक्ति अपनी मृत्यु के बाद अपनी संपत्ति अथवा उसके किसी हित को किसी व्यक्ति के पक्ष में देने की इच्छा व्यक्त करता है। अर्थात कोई यह लिखता है या कहता है कि मैं अपनी मृत्यु के बाद अपनी संपत्ति का यह हिस्सा अमुक व्यक्ति को देना चाहता हूँ। यह इच्छा मृत्यु के बाद प्रभावी होती है।
मुस्लिम विधि में वसीयत की विशेषताएँ
• मृत्यु के बाद प्रभावी होती है।
• वसीयतकर्ता अपने जीवनकाल में उसे वापस ले सकता है।
• वसीयतकर्ता की संपत्ति पर उसके ऋण और अंतिम संस्कार के खर्च आदि का प्रभाव पड़ता है।
• मुस्लिम व्यक्ति की वसीयती शक्ति पूर्णतः असीमित नहीं है किल्क संपत्ति के 1/3 तक वसीयत कर सकता है।
• 1/3 से अधिक की वसीयत के लिए वारिसों की सहमति आवश्यक होती है।
• किसी वैधानिक वारिस के पक्ष में वसीयत के लिए भी Sunni/Shia नियमों के अनुसार वारिसों की सहमति होती है।
वसीयतकर्ता की योग्यता - वैध वसीयत के लिए वसीयतकर्ता -
• मुस्लिम होना चाहिए।
• बालिग होना चाहिए।
• स्वस्थ मस्तिष्क का होना चाहिए।
• संपत्ति पर वैध अधिकार होना चाहिए।
• वसीयत स्वेच्छा से की गई होनी चाहिए।
वसीयत का लाभार्थी - जिस व्यक्ति के पक्ष में वसीयत की जाती है उसे Legatee (वसीयत-लाभार्थी) कहा जाता है। वह कोई व्यक्ति, संस्था, धार्मिक/परोपकारी उद्देश्य (वक्फ), अथवा अन्य वैध हितधारक हो सकता है, बशर्ते वसीयत कानून के विरुद्ध न हो।
मुस्लिम विधि का 1/3 नियम - मृतक की संपत्ति में से पहले -
• अंतिम संस्कार के उचित खर्च,
• ऋण,
• वैध दायित्व का भुगतान किया जाता है।
इसके बाद बची हुई शुद्ध संपत्ति (Net Estate) में से अधिकतम 1/3 की वसीयत बिना वारिसों की अतिरिक्त सहमति के की जाती है।
उदाहरण - यदि ऋण और अंतिम खर्च काटने के बाद शुद्ध संपत्ति ₹9 लाख है, तो ₹3 लाख तक वसीयत की जा सकती है।₹3 लाख से अधिक की वसीयत के लिए वारिसों की सहमति आवश्यक है।
वारिस के पक्ष में वसीयत - मुस्लिम विधि में No bequest to an heir अर्थात् किसी वारिस के पक्ष में वसीयत करने के लिए अन्य वारिसों की सहमति आवश्यक होती है। यहाँ Sunni और Shia विधि में अंतर है।
वसीयत की स्वीकृति - जहाँ वारिसों की सहमति आवश्यक हो, वहाँ केवल वसीयतकर्ता की घोषणा पर्याप्त नहीं होती। संबंधित वारिसों की सहमति का विधिक महत्व होता है।
वसीयत का निरसन - मुस्लिम व्यक्ति अपनी वसीयत को जीवनकाल में स्पष्ट रूप से नई वसीयत द्वारा अथवा ऐसे कार्य द्वारा जो पूर्व वसीयत के विपरीत हो निरस्त कर सकता है।
मौखिक वसीयत - मुस्लिम विधि में वसीयत के लिए लिखित दस्तावेज हमेशा अनिवार्य नहीं हैं। परिस्थितियों के अनुसार मौखिक वसीयत भी वैध होती है, लेकिन उसके अस्तित्व और शर्तों को प्रमाणित करना आवश्यक होता है।
भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के अंतर्गत वसीयत - Indian Succession Act, 1925 भारत में वसीयत तथा उत्तराधिकार से संबंधित एक प्रमुख अधिनियम है। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण परीक्षा-बिंदु है कि मुसलमानों की वसीयत मुस्लिम व्यक्तिगत विधि द्वारा नियंत्रित होती है, इसलिए Indian Succession Act को मुस्लिम वसीयत पर यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता।
अधिनियम में वसीयत की परिभाषा - अधिनियम की धारा 2(h) के अनुसार Will वह विधिक घोषणा है जिसमें वसीयतकर्ता अपनी संपत्ति के संबंध में अपनी इच्छा व्यक्त करता है, जिसे वह अपनी मृत्यु के बाद प्रभावी करना चाहता है।
वसीयत की प्रकृति - वसीयत मृत्यु के बाद प्रभावी होती है जो वसीयतकर्ता के जीवनकाल में बदली या निरस्त की जा सकती है। वसीयतकर्ता की मृत्यु के समय उसके अधिकार और संपत्ति के संबंध में प्रभाव उत्पन्न करती है।
कौन वसीयत कर सकता है? - धारा 59 के अनुसार स्वस्थ मस्तिष्क वाला व्यक्ति, जो नाबालिग नहीं है, वसीयत कर सकता है। अर्थात् Testamentary capacity,
Majority, Sound mind आवश्यक हैं।
स्वस्थ मस्तिष्क का अर्थ - व्यक्ति को वसीयत बनाते समय यह समझने में सक्षम होना चाहिए कि वह क्या कर रहा है, उसकी संपत्ति क्या है, उसके निकट संबंधी/संभावित लाभार्थी कौन हैं, और वह संपत्ति किसे दे रहा है।
वसीयत का निष्पादन - धारा 63 unprivileged Will के execution से संबंधित है -
1. वसीयतकर्ता दस्तावेज पर हस्ताक्षर/चिह्न करता है।
2. उसका उद्देश्य वसीयत को प्रभावी करना होना चाहिए।
3. वसीयत को कम-से-कम दो गवाहों द्वारा attest किया जाना चाहिए।
वसीयत में गवाहों की भूमिका - गवाह का काम यह प्रमाणित करना है कि वसीयतकर्ता ने विधि के अनुसार वसीयत पर हस्ताक्षर या चिह्न किया था।
वसीयत का निरसन - वसीयतकर्ता अपने जीवनकाल में वसीयत को नई वसीयत बनाकर, बाद की घोषणा द्वारा अथवा कानून में मान्य अन्य तरीके से निरस्त कर सकता है।
Probate - Probate न्यायालय द्वारा वसीयत की प्रमाणित प्रति के रूप में दिया गया प्राधिकार है, जिससे वसीयत के निष्पादक को मृतक की संपत्ति के संबंध में कार्य करने का अधिकार मिलता है।
ध्यान रहे Probate और Will की validity एक ही चीज नहीं हैं। Probate एक न्यायिक प्रक्रिया है; वसीयत की वास्तविक वैधता अलग होती है।
मुस्लिम विधि के अंतर्गत उत्तराधिकार का कानून - यह निर्वसीयती उत्तराधिकार का मुख्य भाग है। यदि कोई मुस्लिम व्यक्ति बिना वैध वसीयत के मृत्यु को प्राप्त करता है, तो उसकी संपत्ति का उत्तराधिकार मुस्लिम व्यक्तिगत विधि के अनुसार निर्धारित होता है।
1. मुस्लिम उत्तराधिकार की विशेषता - मुस्लिम उत्तराधिकार में व्यक्ति की मृत्यु के साथ उसके उत्तराधिकारियों के अधिकार उत्पन्न होते हैं। इसके मुख्य स्रोत कुरआन, सुन्नत/हदीस, इज्मा, कियास तथा न्यायिक निर्णय हैं। भारत में Sunni मुसलमानों के लिए Hanafi law का प्रभाव रहा है, जबकि Shia मुसलमानों के लिए अलग नियम लागू होते हैं।
2. मुस्लिम उत्तराधिकार के वर्ग - मुस्लिम उत्तराधिकारियों को तीन प्रमुख वर्गों में समझा जाता है:
(i) Sharers (हितधारक/हिस्सेदार) - वे उत्तराधिकारी जिनके हिस्से कानून द्वारा निश्चित किए गए हैं।
उदाहरण - पति, पत्नी, माता, पिता, पुत्री आदि, परिस्थितियों के अनुसार। इनके हिस्से निश्चित अंशों में होते हैं जैसे बेटियों का 1/3 भाग।
(ii) Residuaries - (निकट संबंधी) - वे उत्तराधिकारी जो Sharers को उनके निश्चित हिस्से देने के बाद बची संपत्ति प्राप्त करते हैं। इन्हें असबा (Agnatic/Residuary heirs) भी कहा जाता है।
उदाहरण - पुत्र, पुत्र का पुत्र, पिता का पिता आदि, परिस्थितियों के अनुसार।
(iii) Distant Kindred (नातेदार) - वे रिश्तेदार जिन्हें Sharers और Residuaries के अभाव में उत्तराधिकार प्राप्त होता है। इन्हें दूरस्थ संबंधी कहा जाता है।
मुस्लिम उत्तराधिकार में Representation (प्रतिनिधिक उत्तराधिकार का अभाव - सुन्नी मुस्लिम विधि में Doctrine of Representation को उसी रूप में स्वीकार नहीं किया जाता जिस रूप में कुछ अन्य उत्तराधिकार प्रणालियों में किया जाता है।
उदाहरण - यदि पुत्र अपने पिता से पहले मर जाता है, तो उस पुत्र के बच्चे अपने पिता का पूरा हिस्सा स्वतः प्रतिनिधित्व के आधार पर नहीं ले लेते। हालाँकि भारतीय कानून में कुछ विशेष वैधानिक व्यवस्थाएँ अलग होती हैं, इसलिए व्यक्तिगत विधि और कानून में अंतर समझना जरूरी है।
पुरुष और महिला उत्तराधिकारी - मुस्लिम उत्तराधिकार का प्रसिद्ध सिद्धांत है कि समान श्रेणी की कुछ परिस्थितियों में पुरुष को महिला की तुलना में दोगुना हिस्सा मिल सकता है।
उदाहरण - यदि केवल एक पुत्र और एक पुत्री वारिस हैं, तो संपत्ति को 2 : 1 के अनुपात में बाँटा जाएगा। लेकिन यह कहना गलत होगा कि हर परिस्थिति में पुरुष को महिला से दोगुना मिलता है। हिस्से उत्तराधिकारियों की पूरी संरचना पर निर्भर करते हैं।
विरासत खुलने का समय - मुस्लिम विधि में उत्तराधिकार मृत्यु के साथ खुलता है।मृतक की मृत्यु से पहले किसी संभावित वारिस का केवल भविष्य का अधिकार सामान्यतः vested inheritance नहीं माना जाता।
भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 के अंतर्गत निर्वसीयती उत्तराधिकार - जब कोई व्यक्ति बिना वैध वसीयत के मरता है, तो उसकी संपत्ति निर्वसीयती उत्तराधिकार के नियमों के अनुसार वितरित होती है। Indian Succession Act, 1925 में निर्वसीयती उत्तराधिकार Part V में मिलता है।
Indian Succession Act -
Will → Part VI,
Intestacy → Part V
प्रमुख धाराएँ -
Section 2(h) → Will की परिभाषा
Section 30 → Intestate
Section 59 → कौन वसीयत कर सकता है
Section 63 → Unprivileged Will का execution
Part V → Intestate Succession
Part VI → Testamentary Succession
Intestate का अर्थ - धारा 30 में intestate की अवधारणा दी गई है। यदि कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति के संबंध में वैध और प्रभावी वसीयत किए बिना मरता है, तो वह संपत्ति के संबंध में intestate माना जा सकता है। यह पूर्ण या आंशिक भी हो सकता है।
उदाहरण - A ने अपनी आधी संपत्ति की वैध वसीयत की लेकिन आधी संपत्ति के बारे में कोई वसीयत नहीं की तो आधी संपत्ति = testamentary succession, बाकी आधी = intestate succession.
निर्वसीयती उत्तराधिकार में उत्तराधिकारी - Indian Succession Act के अंतर्गत उत्तराधिकारियों की व्यवस्था मृतक की व्यक्तिगत स्थिति और लागू statutory scheme के अनुसार होती है। विशेष रूप से Christian/Parsi आदि के लिए अधिनियम में विस्तृत नियम हैं।
विधवा, बच्चे और वंशज - जहाँ अधिनियम की संबंधित व्यवस्था लागू होती है, वहाँ widow, children, lineal descendants के हिस्से कानून द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।
उदाहरण - यदि मृतक के पीछे पत्नी और बच्चे हैं, तो संपत्ति का विभाजन अधिनियम में निर्धारित नियमों के अनुसार होगा।
Kindred और Consanguinity - Indian Succession Act में kindred और रक्त-संबंध की अवधारणा महत्वपूर्ण है। Consanguinity (रक्त-संबंध) को consanguinity कहा जाता है। यह lineal, collateralहो सकता है।
Lineal relationship - सीधा वंश संबंध - दादा → पिता → पुत्र → पौत्र
Collateral relationship - समान पूर्वज से जुड़े संबंध भाई, बहन, चाचा, भतीजा आदि।
पारसी निर्वसीयती उत्तराधिकार - Indian Succession Act में Parsis के निर्वसीयती उत्तराधिकार के लिए विशेष प्रावधान हैं। पारसी उत्तराधिकार में पति/पत्नी, बच्चे, माता-पिता, अन्य निकट संबंधी के हिस्से विशेष वैधानिक नियमों से निर्धारित होते हैं। इसलिए सामान्य intestacy और Parsi intestacy में अंतर पाया जाता है।
उत्तराधिकार का सामान्य क्रम - निर्वसीयती उत्तराधिकार में सामान्यतः यह देखा जाता है कि मृतक के पीछे कौन-कौन से निकट संबंधी जीवित हैं।
पति/पत्नी एवं संतान → माता-पिता/निकट संबंधी → दूरस्थ संबंधी
लेकिन वास्तविक हिस्सा और प्राथमिकता मृतक की personal law category तथा अधिनियम की संबंधित धाराओं पर निर्भर करेगी।
मुस्लिम वसीयत और Indian Succession Act की वसीयत में अंतर -
आधार - मुस्लिम विधि - Indian Succession Act
आधार - व्यक्तिगत विधि- वैधानिक कानून
सामान्य वसीयती सीमा - शुद्ध संपत्ति का 1/3 भाग - 1/3 भाग की सीमा नहीं
वारिस के पक्ष में वसीयत - विशेष प्रतिबंध/सहमति के नियम - वैधानिक व्यवस्था के अधीन संभव
मौखिक वसीयत - मान्य हो सकती है - सामान्य Will के लिए statutory execution requirements महत्वपूर्ण
गवाह - मुस्लिम विधि के नियम - Will में धारा 63 के अनुसार दो गवाहों द्वारा attestation
निरसन - जीवनकाल में संभव - जीवनकाल में संभव
निर्वसीयती उत्तराधिकार - मुस्लिम व्यक्तिगत विधि - अधिनियम की संबंधित धाराएँ
निष्कर्ष - मुस्लिम विधि में वसीयत व्यक्ति की मृत्यु के बाद प्रभावी होने वाली सीमित testamentary power है, जिसमें शुद्ध संपत्ति के 1/3 तक वसीयत का सिद्धांत महत्वपूर्ण है, जबकि बिना वैध वसीयत मृत्यु होने पर मुस्लिम व्यक्तिगत विधि के Sharers, Residuaries और Distant Kindred के नियम लागू होते हैं। Indian Succession Act, 1925 में वसीयत और निर्वसीयती उत्तराधिकार के लिए पृथक वैधानिक व्यवस्थाएँ हैं, लेकिन मुसलमानों पर इसकी प्रयोज्यता उनके personal law और अधिनियम की विशेष धाराओं पर निर्भर करती है।
पूर्वक्रय का अधिकार/शुफा (Right of Pre-emption/Shufa), संकल्पना, मुस्लिम विधि के अंतर्गत पूर्वक्रय/शुफा का कानून, पूर्वक्रय के अधिकार की संवैधानिक वैधता -
पूर्वक्रय का अधिकार (शुफ़ा) मुस्लिम विधि के संपत्ति-विधि का महत्वपूर्ण विषय है।
पूर्वक्रय का अधिकार शुफा (Right of Pre-emption / Shufa)
1. पूर्वक्रय (शुफा) का अर्थ एवं संकल्पना - पूर्वक्रय (Pre-emption) का अर्थ है किसी अचल संपत्ति के स्वामी द्वारा संपत्ति किसी तीसरे व्यक्ति को बेच दिए जाने पर, कानून द्वारा मान्य व्यक्ति का यह अधिकार कि वह उसी कीमत और उन्हीं शर्तों पर उस संपत्ति को स्वयं खरीदने का दावा कर सके। मुस्लिम विधि में इसे शुफा कहते हैं।
सरल शब्दों में यदि A अपनी जमीन B को बेच देता है और C को कानून के अनुसार उस जमीन पर शुफा का अधिकार प्राप्त है, तो C यह कह सकता है कि मैं B से पहले या उसके स्थान पर इस संपत्ति को उसी मूल्य और शर्तों पर लेना चाहता हूँ।
इस प्रकार शुफा का उद्देश्य किसी व्यक्ति को संपत्ति खरीदने में मनमाना प्राथमिक अधिकार देना नहीं, बल्कि कुछ विशेष संबंधों के कारण उसे अनिवार्य प्रतिस्थापन का अधिकार देना है।
मुस्लिम विधि में शुफा की परिभाषा - मुस्लिम विधि में शुफा का मूल सिद्धांत यह है कि किसी अचल संपत्ति के हस्तांतरण के समय विशेष रूप से योग्य व्यक्ति, खरीदार के स्थान पर स्वयं आकर संपत्ति प्राप्त कर सकता है।
हदाया के अनुसार, शुफा का आशय उस अधिकार से है जिसके द्वारा सह-स्वामी या संबंधित व्यक्ति किसी अचल संपत्ति के खरीदार को हटाकर स्वयं उसके स्थान पर आ सकता है।
शुफ़ा के प्रमुख तत्व - शुफा में तीन पक्ष होते हैं -
1. विक्रेता (Vendor)
2. क्रेता (Vendee)
3. पूर्वक्रय का अधिकार रखने वाला व्यक्ति (Pre-emptor / Shafi)
शुफा का उद्देश्य - मुस्लिम विधि में शुफा का मुख्य उद्देश्य सह-स्वामित्व या पड़ोसी संबंधों में किसी बाहरी व्यक्ति के प्रवेश से उत्पन्न संभावित असुविधा को रोकना है।
इसके पीछे प्रमुख विचार हैं कि
• सह-स्वामियों के बीच संपत्ति का शांतिपूर्ण उपयोग बनाए रखना।
• संपत्ति में अनजान व्यक्ति के प्रवेश से होने वाली असुविधा को रोकना।
• पड़ोसी को अनुचित कठिनाई से बचाना।
• संयुक्त संपत्ति के विखंडन को रोकना।
• संपत्ति के उपयोग और उपभोग में सुविधा बनाए रखना।
महत्वपूर्ण - शुफा स्वयं संपत्ति खरीदने का पहला अवसर नहीं है। यह एक कानूनी अधिकार है जो संपत्ति के हस्तांतरण के बाद खरीददार के स्थान पर आने की अनुमति देता है।
शुफा का अधिकार - शुफा का अधिकार अचल संपत्ति से संबंधित अधिकार है। यह अधिकार
• व्यक्तिगत पसंद या केवल अनुबंध पर आधारित नहीं है।
• संपत्ति के हस्तांतरण से संबंधित है।
• केवल उस व्यक्ति को मिलता है जो मुस्लिम विधि द्वारा निर्धारित श्रेणी में आता है।
इसका प्रयोग कानूनी आवश्यकताओं के अनुसार किया जाना चाहिए।
महत्वपूर्ण बात - पूर्वक्रय का अधिकार होने का अर्थ यह नहीं है कि पूर्वक्रेता को विक्रेता से संपत्ति खरीदने के लिए बाध्य करने का स्वतंत्र अधिकार मिल गया।
उसका वास्तविक अधिकार है - खरीदार के स्थान पर स्वयं को प्रतिस्थापित करना।
मुस्लिम विधि में पूर्वक्रय के अधिकारी - मुस्लिम विधि में परंपरागत रूप से शुफा के अधिकारी को शफी कहा जाता है।
पूर्वक्रय के अधिकार की तीन श्रेणियां मानी जाती हैं -
(1) शफी-ए-शरीक (Shafi-i-Sharik) - यह वह व्यक्ति है जो बेची जा रही संपत्ति में सह-स्वामी है।
उदाहरण - A और B एक मकान के सह-स्वामी हैं। A अपना हिस्सा C को बेच देता है। B को शुफा का अधिकार प्राप्त हो सकता है। यह सबसे मजबूत श्रेणी है।
(2) शफी-ए-खलीत (Shafi-i-Khalit) - यह वह व्यक्ति है जिसका विक्रय की जा रही संपत्ति के उपयोग से संबंधित कोई साझा अधिकार है, जैसे -
• रास्ते का साझा अधिकार
• पानी/बिजली का साझा अधिकार
• अन्य सुविधाओं में साझेदारी।
(3) शफी-ए-जार (Shafi-i-Jar) यह पड़ोसी (neighbour) है। मुस्लिम विधि में कुछ परिस्थितियों में पड़ोसी को भी शुफा का अधिकार प्राप्त था। हालांकि आधुनिक भारतीय न्यायिक व्यवस्था में इस अधिकार की सीमा और वैधता पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है, क्योंकि संवैधानिक और संपत्ति-विधि के विकास के कारण केवल पड़ोसी होने के आधार पर शुफा का दावा कई परिस्थितियों में कमजोर हो सकता है।
अधिकारों की प्राथमिकता - परंपरागत मुस्लिम विधि में प्राथमिकता का क्रम इस प्रकार समझा जा सकता है - सह-स्वामी → साझा अधिकार वाला व्यक्ति → पड़ोसी अर्थात शफी ए शरीक - शफी ए खलित - शफी ए जार।
यदि पहली श्रेणी का योग्य व्यक्ति मौजूद है तो बाद वाली श्रेणी का व्यक्ति उससे पीछे रहेगा।
7. शुफा के लिए आवश्यक शर्तें - पूर्वक्रय के अधिकार के लिए प्रमुख शर्तें निम्न हैं -
1. अचल संपत्ति होनी चाहिए - मुस्लिम विधि में शुफा immovable property के संबंध में है। जैसे भूमि, मकान, भवन, स्थायी रूप से भूमि से जुड़ी संपत्ति।
2. वैध विक्रय होना चाहिए - शुफा का अधिकार सामान्यतः वास्तविक बिक्री (sale) से उत्पन्न होता है। इसलिए यह देखना आवश्यक है कि वास्तव में संपत्ति का विक्रय हुआ है या नहीं।
3. पूर्वक्रेता पात्र होना चाहिए - दावा करने वाला व्यक्ति मुस्लिम विधि के अनुसार शुफा की श्रेणी में होना चाहिए।
4. पूर्वक्रेता का अधिकार विक्रय के समय मौजूद होना चाहिए - व्यक्ति को ऐसा अधिकार प्राप्त होना चाहिए जो उसे शुफा का दावा करने योग्य बनाता हो।
शुफा के अधिकार के प्रयोग की प्रक्रिया - मुस्लिम विधि में शुफा के दावे को स्थापित करने के लिए तीन मांगों/कार्यों की चर्चा की जाती है -
(A) तलब-ए-मोवासिबत - (तुरंत मांग करना/जानकारी मिलते ही अधिकार जताना) जब पूर्वक्रेता को बिक्री की जानकारी मिलती है, तो उसे बिना अनावश्यक देरी के यह घोषणा करनी चाहिए कि वह शुफा के अधिकार का प्रयोग करना चाहता है।
उद्देश्य - इससे यह प्रमाणित होता है कि व्यक्ति ने अपने अधिकार को त्यागा नहीं है।
(B) तलब-ए-इशहाद - (पुष्टि की मांग गवाहों के सामने मांग करना) इसमें पूर्वक्रेता अपनी मांग को विक्रेता, खरीदार, या संबंधित व्यक्तियों के समक्ष औपचारिक रूप से व्यक्त करता है और गवाहों की उपस्थिति में अपने दावे की पुष्टि करता है।इसका उद्देश्य है पहली मांग के बाद यह स्पष्ट करना कि व्यक्ति वास्तव में संपत्ति पर शुफा का दावा कर रहा है।
(C) तलब ए तमलिक/ तलब ए ख़ुसुमत - (न्यायिक मांग न्यायालय में दावा) तीसरा चरण न्यायालय में दावा करने से संबंधित है। यदि खरीदार संपत्ति देने से इंकार करता है तो पूर्वक्रेता न्यायालय में जाकर यह दावा कर सकता है कि उसे खरीदार के स्थान पर रखकर संपत्ति प्रदान की जाए। इस प्रकार विवाद न्यायिक प्रक्रिया में प्रवेश करता है।
शुफा का उत्पन्न होना - यह समझना जरूरी है कि शुफा का अधिकार वास्तविक बिक्री (sale) से जुड़ा है।
उदाहरण - A ने अपनी जमीन B को ₹10 लाख में बेच दी। C, A और B के बीच बिक्री की जानकारी प्राप्त करता है और वह योग्य पूर्वक्रेता है। वह C को -
1. तुरंत अपना शुफा अधिकार जताना होगा,
2. निर्धारित तरीके से मांग की पुष्टि करनी होगी,
3. आवश्यकता पड़ने पर न्यायालय में दावा करना होगा।
यदि C सफल होता है तो वह B के स्थान पर आ सकता है और बिक्री की समान कीमत एवं शर्तों पर संपत्ति प्राप्त कर सकता है।
पूर्वक्रेता का अधिकार और खरीदार का अधिकार - यहां एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है - पूर्वक्रेता को संपत्ति का मुफ्त हस्तांतरण नहीं मिलता। उसे वही कीमत, शर्तें, दायित्व स्वीकार करने होते हैं जो मूल खरीदार ने स्वीकार किए थे अर्थात Buyer हटता है → Pre-emptor उसकी जगह आता है।
शुफा का अधिकार समाप्त होना - पूर्वक्रेता अपना अधिकार खो सकता है, यदि -
1. उसने आवश्यक मांग समय पर नहीं की।
2. उसने अपने आचरण से अधिकार छोड़ दिया।
3. उसने बिक्री को स्वीकार कर लिया।
4. उसने निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
5. वह स्वयं पूर्वक्रय के लिए योग्य नहीं था।
6. जिस आधार पर शुफा का दावा था, वह समाप्त हो गया।
शुफा और सामान्य क्रय-विक्रय में अंतर आधार - सामान्य खरीद - शुफा
आधार - स्वैच्छिक खरीद - कानूनी अधिकार
व्यक्ति - कोई भी पात्र खरीदार - विशेष रूप से योग्य व्यक्ति
उद्देश्य - संपत्ति प्राप्त करना - खरीदार के स्थान पर आना
कीमत - आपसी सहमति - मूल बिक्री की कीमत/शर्तें
अधिकार - स्वतंत्र खरीद - प्रतिस्थापन का अधिकार
प्रकृति - सामान्य संविदात्मक - लेन-देन वैधानिक/कानूनी दावा
14. शुफा का अधिकार और संपत्ति का हस्तांतरण - शुफा के मामले में पूर्वक्रेता खरीदार के स्थान पर खड़ा होता है।इसलिए सफल शुफा दावे के बाद वह संपत्ति ऐसे प्राप्त करता है जैसे वह मूल खरीदार के स्थान पर हो। इसीलिए इसे केवल पहले खरीदने का अवसर कहना पूर्णतः सही नहीं है।
पूर्वक्रय का अधिकार - संवैधानिक वैधता - पूर्वक्रय के अधिकार पर संवैधानिक प्रश्न यह है कि क्या किसी व्यक्ति को केवल सह-स्वामी, साझा अधिकारधारी या पड़ोसी होने के आधार पर दूसरे व्यक्ति द्वारा खरीदी गई संपत्ति अपने पक्ष में लेने का अधिकार देना संविधान के अनुरूप है?
यह प्रश्न विशेष रूप से अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19(1)(f) के संदर्भ में उठा था।
16. अनुच्छेद 19(1)(f) का ऐतिहासिक महत्व - संविधान में नागरिकों को अनुच्छेद 19(1)(f) के अंतर्गत संपत्ति रखने और अर्जित करने का मौलिक अधिकार प्राप्त था। लेकिन 44वें संविधान संशोधन, 1978 के बाद अनुच्छेद 19(1)(f) को हटा दिया गया। अब संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। वर्तमान में अनुच्छेद 300A कहता है किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से विधि के प्राधिकार के बिना वंचित नहीं किया जाएगा। इसलिए आज पूर्वक्रय की संवैधानिक वैधता अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 300A और संबंधित वैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में देखी जाती है।
अनुच्छेद 14 और पूर्वक्रय - अनुच्छेद 14 का मूल है कानून के समक्ष समानता तथा कानूनों का समान संरक्षण। यदि कानून कुछ व्यक्तियों को पूर्वक्रय का अधिकार देता है तो प्रश्न उठता है कि क्या यह वर्गीकरण मनमाना है? यदि वर्गीकरण -
1. बुद्धिसंगत भेद (Intelligible Differentia) पर आधारित है और
2. उस भेद का कानून के उद्देश्य से तर्कसंगत संबंध (Rational Nexus) है
तो वह अनुच्छेद 14 के विरुद्ध आवश्यक रूप से नहीं होगा।
उदाहरण - सह-स्वामी को शुफा देना इसलिए उचित ठहराया जा सकता है कि सह-स्वामी और बाहरी खरीदार की स्थिति समान नहीं है।
इसलिए सह-स्वामी बनाम बाहरी व्यक्ति।एक वास्तविक और तर्कसंगत वर्गीकरण हो सकता है।
पड़ोसी के पूर्वक्रय अधिकार की संवैधानिक समस्या - केवल पड़ोसी होने के आधार पर पूर्वक्रय का अधिकार अधिक विवादास्पद रहा है। क्यों? क्योंकि यदि A अपनी संपत्ति B को बेचना चाहता है, तो केवल इस आधार पर कि C उसका पड़ोसी है तो
C को B की जगह संपत्ति प्राप्त करने का अधिकार देना
विक्रेता की पसंद को सीमित करता है,
खरीदार के संपत्ति-अधिकार को प्रभावित करता है,
निजी संपत्ति के स्वतंत्र हस्तांतरण में हस्तक्षेप करता है।
इसी कारण आधुनिक संवैधानिक दृष्टिकोण में सह-स्वामित्व आधारित पूर्वक्रय और मात्र पड़ोसी होने पर आधारित पूर्वक्रय के बीच अंतर महत्वपूर्ण है।
महत्वपूर्ण निर्णय -
Bhau Ram v. Baij Nath Singh -
Bhau Ram v. Baij Nath Singh, AIR 1962 SC 1476 पूर्वक्रय की संवैधानिक वैधता के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय है। सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्वक्रय के ऐसे अधिकार पर विचार किया जो केवल पड़ोसी होने के आधार पर लागू होता था। न्यायालय ने संपत्ति के स्वतंत्र हस्तांतरण पर इस प्रकार के प्रतिबंध को संवैधानिक दृष्टि से स्वीकार नहीं किया।
मुख्य सिद्धांत - मात्र पड़ोसी होने के आधार पर पूर्वक्रय का अधिकार संवैधानिक रूप से संदिग्ध/अवैध हो सकता है, जबकि सह-स्वामित्व जैसे मजबूत संबंध पर आधारित पूर्वक्रय का औचित्य अधिक मजबूत है।
Sant Ram v. Labh Singh -
Sant Ram v. Labh Singh, AIR 1965 SC 314 में पूर्वक्रय के अधिकार और उसके सामाजिक/कानूनी आधार पर विचार किया गया। न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि पूर्वक्रय का अधिकार पूर्णतः मनमाना नहीं माना जा सकता और इसके औचित्य को उस संबंध तथा कानून के उद्देश्य के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
Atam Prakash v. State of Haryana (1986) 2 SCC 249 - यह पूर्वक्रय की संवैधानिक वैधता का अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्वक्रय के अधिकार की संवैधानिकता पर महत्वपूर्ण विचार किया।न्यायालय ने विशेष रूप से ऐसे पूर्वक्रय अधिकारों की आलोचना की जो केवल सामाजिक/पारंपरिक आधारों पर संपत्ति के हस्तांतरण को प्रतिबंधित करते थे।
मुख्य सिद्धांत - आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था में केवल पड़ोसी होने जैसे कमजोर आधार पर पूर्वक्रय का अधिकार उचित ठहराना कठिन है। लेकिन सह-स्वामी का अधिकार संपत्ति में उसके वास्तविक और प्रत्यक्ष हित के कारण अधिक मजबूत आधार रखता है।
वर्तमान संवैधानिक स्थिति - 44वें संविधान संशोधन के बाद संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है, फिर भी वह संवैधानिक अधिकार है। इसलिए पूर्वक्रय कानून की जांच करते समय मुख्यतः देखा जाएगा कि
1. क्या कानून के प्राधिकार से संपत्ति का हस्तांतरण/वंचन हो रहा है?→ अनुच्छेद 300A
2. क्या कानून मनमाना या भेदभावपूर्ण है? → अनुच्छेद 14
3. क्या पूर्वक्रय का वर्गीकरण किसी वास्तविक संपत्ति-संबंध पर आधारित है?→ सह-स्वामी का मामला मजबूत।
4. क्या केवल पड़ोसी होने का आधार पर्याप्त है?→ आधुनिक संवैधानिक दृष्टिकोण में अत्यंत कमजोर आधार।
23. मुस्लिम विधि के शुफा और आधुनिक संविधान का संबंध -
मुस्लिम विधि शुफा ↓
संपत्ति के हस्तांतरण पर विशेष व्यक्ति को प्राथमिकता ↓
विक्रेता की पसंद और खरीदार के अधिकार पर प्रतिबंध ↓
संवैधानिक परीक्षण ↓
अनुच्छेद 14 + अनुच्छेद 300A ↓
मजबूत संपत्ति-संबंध = अधिक औचित्य
कमजोर आधार/मात्र पड़ोसी = अधिक संवैधानिक समस्या
निष्कर्ष - पूर्वक्रय का अधिकार (शुफा) वह अधिकार है जिसके द्वारा कानून द्वारा योग्य व्यक्ति किसी अचल संपत्ति के खरीदार को हटाकर उसी कीमत और शर्तों पर स्वयं उसके स्थान पर आ सकता है।
मुस्लिम विधि में इसके प्रमुख अधिकारी हैं:
1. Shafi-i-Sharik → सह-स्वामी
2. Shafi-i-Khalit → साझा अधिकार वाला व्यक्ति
3. Shafi-i-Jar → पड़ोसी
शुफा के प्रयोग की पारंपरिक प्रक्रिया -
Talab-i-Mowasibat → Talab-i-Ishhad → Talab-i-Khusumat।संवैधानिक दृष्टि से Bhau Ram और Atam Prakash अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। आधुनिक व्यवस्था में केवल पड़ोसी होने पर आधारित पूर्वक्रय की तुलना में सह-स्वामी आधारित पूर्वक्रय का औचित्य अधिक मजबूत है।
ट्रिक - शुफा = खरीदार को हटाना नहीं, बल्कि योग्य पूर्वक्रेता को खरीदार के स्थान पर बैठाना।”
15 अंक के उत्तर का ढांचा
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शमशेर भालू खां
विधि छात्र सेमेस्टर द्वितीय
राजकीय विधि महाविद्यालय, चूरू
9587243963
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