ALU,जयपुर सेमेस्टर सेकंड BNS
पाठ्यक्रम
प्रश्न-पत्र संख्या 2.6, भारतीय न्याय संहिता, 2023
इकाई-I
भारतीय न्याय संहिता, 2023 : परिचय
1.1 अपराध का उद्गम, परिभाषा एवं आपराधिक दायित्व के सिद्धांत
अपराध का उद्गम
अपराध की परिभाषा
आपराधिक दायित्व के सिद्धांत
1.2 अपराध के आवश्यक तत्व
दोषपूर्ण मनःस्थिति (Mens Rea)
अपराधपूर्ण कृत्य (Actus Reus)
अपराध के चरण
उद्देश्य/प्रेरणा (Motive)
आशय (Intention)
प्रयास (Attempt)
तैयारी (Preparation)
धारा 62 के अंतर्गत प्रयास संबंधी प्रावधान
1.3 भारतीय न्याय संहिता, 2023 का परिचय
भारतीय न्याय संहिता, 2023 का परिचय
प्रकृति
क्षेत्र एवं विस्तार परिभाषाएँ एवं सामान्य स्पष्टीकरण
धारा 2 एवं 3
1.4 सामान्य आशय एवं सामान्य उद्देश्य
सामान्य आशय (Common Intention)
धारा 3(5)
सामान्य उद्देश्य (Common Object)
विधिविरुद्ध जमाव (Unlawful Assembly)
बलवा/दंगा (Riot)
उपद्रव/Affray
धारा 189 के संदर्भ में भीड़ द्वारा हत्या (Mob Lynching)
1.5 दंड
भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत दंड
विभिन्न प्रकार के दंड
सामुदायिक सेवा (Community Service)
धारा 4
इकाई-II
सामान्य अपवाद, प्रारंभिक/अपूर्ण अपराध एवं महिलाओं के विरुद्ध अपराध
2.1 सामान्य अपवाद एवं निजी प्रतिरक्षा का अधिकार
सामान्य अपवाद (General Exceptions)
निजी प्रतिरक्षा का अधिकार (Right of Private Defence)
धारा 14–44
2.2 दुष्प्रेरण एवं आपराधिक षड्यंत्र
दुष्प्रेरण (Abetment)
आपराधिक षड्यंत्र (Criminal Conspiracy)
धारा 45–61
2.3 महिलाओं के विरुद्ध लैंगिक अपराध, आपराधिक बल एवं हमला
महिलाओं के विरुद्ध लैंगिक/यौन अपराध
आपराधिक बल (Criminal Force)
हमला (Assault)
धारा 63–79
2.4 विवाह से संबंधित अपराध
विवाह से संबंधित विभिन्न अपराध
धारा 80–87
2.5 गर्भपात/गर्भस्राव कराने से संबंधित अपराध एवं बच्चों के विरुद्ध अपराध
गर्भपात/गर्भस्राव कराने से संबंधित अपराध
धारा 88–92
चिकित्सीय गर्भसमापन अधिनियम, 1971 में संशोधन संबंधी अधिनियम, 2021 की प्रमुख विशेषताएँ
बच्चों के विरुद्ध अपराध
धारा 93–99
इकाई- III
मानव शरीर के विरुद्ध अपराध, राज्य के विरुद्ध अपराध एवं लोक व्यवस्था के विरुद्ध अपराध
3.1 जीवन के विरुद्ध अपराध
जीवन को प्रभावित करने वाले अपराध
मानव वध (Homicide)
आपराधिक मानव वध (Culpable Homicide)
हत्या (Murder)
उपेक्षा/लापरवाही से मृत्यु कारित करना
धारा 100–110
3.2 चोट, गंभीर चोट एवं अम्ल हमला
चोट (Hurt)
गंभीर चोट (Grievous Hurt)
अम्ल हमला (Acid Attack)
धारा 114–120 एवं धारा 124
3.3 सदोष परिरोध एवं आपराधिक बल
सदोष अवरोध (Wrongful Restraint)
सदोष परिरोध (Wrongful Confinement)
आपराधिक बल (Criminal Force)
हमला (Assault)
धारा 126–131
3.4 अपहरण एवं व्यपहरण
अपहरण (Kidnapping)
व्यपहरण (Abduction)
संबंधित अपराध
धारा 137–143
3.5 संगठित अपराध एवं आतंकवादी कृत्य
संगठित अपराध (Organized Crime)
आतंकवादी कृत्य (Terrorist Acts)
धारा 111–113
3.6 राज्य, निर्वाचन एवं लोक सेवकों से संबंधित अपराध
राज्य के विरुद्ध अपराध
धारा 147–158
निर्वाचन से संबंधित अपराध
धारा 169–177
लोक सेवक द्वारा या लोक सेवक से संबंधित अपराध
धारा 198–205
मिथ्या साक्ष्य देना
धारा 227–229
इकाई-IV
संपत्ति एवं प्रतिष्ठा के विरुद्ध अपराध
4.1 चोरी, उद्दापन, लूट एवं डकैती
चोरी (Theft)
उद्दापन/जबरन वसूली (Extortion)
लूट (Robbery)
डकैती (Dacoity)
धारा 303–313
4.2 संपत्ति का आपराधिक दुर्विनियोग, आपराधिक न्यासभंग, चोरी की संपत्ति एवं छल
संपत्ति का आपराधिक दुर्विनियोग (Criminal Misappropriation of Property)
आपराधिक न्यासभंग (Criminal Breach of Trust)
धारा 314–316
चोरी की संपत्ति प्राप्त करना
छल/धोखाधड़ी (Cheating)
कपटपूर्ण विलेख एवं व्ययन
धारा 317–323
4.3 रिष्टि एवं आपराधिक अतिचार
रिष्टि (Mischief)
धारा 324–326
आपराधिक अतिचार (Criminal Trespass)
धारा 329–334
4.4 दस्तावेजों, संपत्ति-चिह्न एवं मुद्रा से संबंधित अपराध
दस्तावेजों से संबंधित अपराध
संपत्ति-चिह्न (Property Marks) से संबंधित अपराध
धारा 336, 340, 344, 345–350
सिक्कों, मुद्रा, करेंसी नोट, बैंक नोट एवं सरकारी स्टाम्प से संबंधित अपराध
धारा 178–182
4.5 आपराधिक अभित्रास एवं मानहानि
आपराधिक अभित्रास/धमकी (Criminal Intimidation)
संबंधित अपराध
धारा 351–355
मानहानि (Defamation)
धारा 356
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BNS एक परिचय - यह भारत की नई मूल दंड संहिता है, जिसने 164 वर्ष पुरानी भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) का स्थान लिया है। आपराधिक कानून की पुरानी किताब को नई परिस्थितियों के अनुसार नए ढाँचे में व्यवस्थित किया गया है। इसका पूरा नाम भारतीय न्याय संहिता, 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023) है। यह भारत में अपराध और उनके लिए निर्धारित दंड से संबंधित प्रमुख कानून है। इसमें 20 अध्याय, 357 (IPC है 511) धाराएं हैं। इसे राष्ट्रपति ने 25/12/2022 को मंजूरी दी एवं 01/07/2023 से लागू हुई।
अपराध का उदगम -
अपराध का उद्गम अपराधशास्त्र का मूलभूत विषय है। इसका अर्थ यह जानना है कि मनुष्य अपराध क्यों करता है, अपराध की प्रवृत्ति किन परिस्थितियों से जन्म लेती है और व्यक्ति के भीतर अपराधी व्यवहार का विकास कैसे होता है।
1. अपराध का अर्थ -
अपराध वह ऐसा कार्य या चूक है जिसे विधि द्वारा निषिद्ध किया गया हो और जिसके लिए राज्य द्वारा दण्ड निर्धारित किया गया हो।
अपराध के दो प्रमुख पक्ष माने जाते हैं -
Actus Reus (- अपराधात्मक कृत्य) – बाहरी आपराधिक कृत्य या चूक।
Mens Rea - (दोषपूर्ण मानसिकता) – अपराध करने की दोषपूर्ण मानसिक अवस्था या आशय।
सामान्यतः अपराध केवल बुरी इच्छा से नहीं बनता, बल्कि विधि द्वारा निषिद्ध कृत्य और आवश्यक मानसिक तत्वों के संयोग से अपराध बनता है।
2. अपराध का उद्गम क्या है?
अपराध का उद्गम से आशय उन कारणों, परिस्थितियों और प्रक्रियाओं से है जिनके परिणामस्वरूप व्यक्ति अपराध की ओर प्रवृत्त होता है।
अपराध का कोई एक सार्वभौमिक कारण नहीं है। आधुनिक अपराधशास्त्र अपराध को जैविक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक और परिस्थितिजन्य कारकों के संयुक्त परिणाम के रूप में देखता है।
इसे इस प्रकार समझ सकते हैं -
व्यक्ति की प्रकृति + परिवार + समाज + आर्थिक परिस्थितियाँ + वातावरण + मानसिक अवस्था + अवसर = अपराध की सम्भावना हालाँकि इनमें से कोई भी कारक अकेले किसी व्यक्ति को अपराधी बना देना आवश्यक नहीं है।
3. अपराध के उद्गम के प्रमुख सिद्धान्त
(क) दैवी या धार्मिक सिद्धान्त -
प्राचीन समाजों में अपराध को अक्सर पाप या दैवी व्यवस्था के उल्लंघन के रूप में देखा जाता था।
इस दृष्टिकोण के अनुसार अपराधी व्यक्ति ने धार्मिक या नैतिक नियमों का उल्लंघन किया है और इसलिए उसे दैवी या सामाजिक दण्ड मिलना चाहिए।
विशेषता - इस सिद्धान्त में अपराध के वास्तविक सामाजिक या मनोवैज्ञानिक कारणों की अपेक्षा पाप, धर्म और दैवी इच्छा को अधिक महत्व दिया गया। आधुनिक अपराधशास्त्र में इसका वैज्ञानिक महत्व सीमित है।
(ख). शास्त्रीय सिद्धान्त - अपराध के वैज्ञानिक अध्ययन की दिशा में जेरेमी बेंथम और सेज़ार बेकारिया के विचार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
इस सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य सामान्यतः तर्कशील और स्वतंत्र इच्छा वाला प्राणी है। वह लाभ और हानि का आकलन करके निर्णय लेता है।
यदि अपराध से मिलने वाला लाभ व्यक्ति को दण्ड के भय से अधिक आकर्षक दिखाई देता है, तो वह अपराध कर सकता है।
मुख्य आधार - स्वतंत्र इच्छा + लाभ की अपेक्षा + दण्ड का भय = अपराध संबंधी निर्णय। इसलिए शास्त्रीय विचारधारा ने निश्चित, शीघ्र और अनुपातिक दण्ड को अपराध रोकने का प्रमुख साधन माना।
(ग). प्रत्यक्षवादी सिद्धान्त - 19वीं शताब्दी में अपराधशास्त्र ने एक महत्वपूर्ण मोड़ लिया। सेज़ार लोम्ब्रोसो ने अपराधी के अध्ययन को वैज्ञानिक आधार देने का प्रयास किया।
लोम्ब्रोसो के अनुसार कुछ अपराधियों में ऐसी जन्मजात या जैविक विशेषताएँ हो सकती हैं जो उन्हें अपराध की ओर प्रवृत्त करती हैं। उसने ऐसे अपराधी को “जन्मजात अपराधी” (Born Criminal) कहा। उसने शारीरिक विशेषताओं के आधार पर अपराधी प्रवृत्ति समझाने का प्रयास किया।
आलोचना - आधुनिक विज्ञान ने लोम्ब्रोसो के अनेक निष्कर्षों को स्वीकार नहीं किया। केवल शारीरिक बनावट के आधार पर किसी व्यक्ति को अपराधी मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है। फिर भी लोम्ब्रोसो का ऐतिहासिक महत्व यह है कि उसने अपराध को केवल पाप या नैतिक बुराई मानने के बजाय अपराधी के वैज्ञानिक अध्ययन की दिशा में ध्यान आकर्षित किया।
(घ). मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त -
अपराध का उद्गम व्यक्ति की मानसिक संरचना और मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों में भी खोजा गया है।
फ्रायड का दृष्टिकोण -
सिगमंड फ्रायड के मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त में मानव व्यक्तित्व को मुख्यतः:
1. Id
2. Ego
3. Superego
के रूप में समझाया गया। यदि व्यक्ति की इच्छाओं, सामाजिक नियंत्रण और नैतिक चेतना के बीच संतुलन बिगड़ जाए, तो असामान्य व्यवहार उत्पन्न हो सकता है।
उदाहरण के लिए, अत्यधिक आक्रामकता, दबी हुई इच्छाएँ, बचपन के आघात या व्यक्तित्व संबंधी समस्याएँ कुछ परिस्थितियों में अपराधी व्यवहार से जुड़ सकती हैं। लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मानसिक समस्या होना और अपराध करना एक ही बात नहीं है।
(च). सामाजिक सिद्धान्त - आधुनिक अपराधशास्त्र में सामाजिक वातावरण को अपराध के उद्गम का अत्यंत महत्वपूर्ण कारण माना जाता है।
व्यक्ति समाज में रहकर व्यवहार सीखता है। यदि उसका सामाजिक वातावरण अपराध को स्वीकार या प्रोत्साहित करता है, तो अपराधी व्यवहार सीखने की सम्भावना बढ़ सकती है।
सामाजिक कारक -
1. खराब पारिवारिक वातावरण
2. अपराधी मित्रों का प्रभाव
3. सामाजिक असमानता
4. शिक्षा का अभाव
5. बेरोजगारी
6. गरीबी
7. नशे का वातावरण
8. अपराधी गिरोह
9. सामाजिक उपेक्षा
10. हिंसक वातावरण
(छ). सुदरलैंड का विभेदात्मक साहचर्य सिद्धान्त -
एडविन एच. सुदरलैंड ने अपराध के उद्गम को सामाजिक सीखने की प्रक्रिया से जोड़ा। उसके अनुसार अपराधी व्यवहार सीखा जाता है। व्यक्ति अपने निकट संबंधों और समूहों से यह सीख सकता है कि -
1. अपराध कैसे किया जाता है
2. अपराध करने के तरीके क्या हैं
3. अपराध को उचित कैसे ठहराया जाए
4. कानून का उल्लंघन क्यों स्वीकार्य माना जा सकता है।
इसलिए यदि किसी व्यक्ति के निकट संबंध अपराध समर्थक विचारों से प्रभावित हैं, तो उसके अपराध सीखने की सम्भावना बढ़ सकती है।
(ज). रॉबर्ट मर्टन का तनाव सिद्धान्त -
मर्टन ने अपराध को समाज में मौजूद लक्ष्यों और उन्हें प्राप्त करने के वैध साधनों के बीच तनाव से जोड़ा।
उदाहरण के लिए समाज व्यक्ति को धन, प्रतिष्ठा और सफलता प्राप्त करने के लक्ष्य देता है, लेकिन यदि किसी व्यक्ति के पास उन्हें प्राप्त करने के वैध साधन उपलब्ध नहीं हैं, तो वह अवैध साधनों की ओर जा सकता है।
सरल रूप में - सामाजिक लक्ष्य + वैध साधनों का अभाव → तनाव → अवैध साधनों की ओर सम्भावित झुकाव
हालाँकि यह प्रत्येक अपराधी पर लागू होने वाला नियम नहीं है।
(झ). सामाजिक विघटन सिद्धान्त -
इस दृष्टिकोण के अनुसार जब किसी क्षेत्र में सामाजिक संस्थाएँ कमजोर हो जाती हैं, तो अपराध की सम्भावना बढ़ सकती है।
जैसे -
1. परिवार का विघटन
2. समुदाय का कमजोर होना
3. बेरोजगारी
4. गरीबी
5. अत्यधिक सामाजिक अस्थिरता
6. अपराधी समूहों का प्रभाव
सामाजिक नियंत्रण का कमजोर होना
जब समाज व्यक्ति के व्यवहार को नियंत्रित और निर्देशित करने वाली संस्थाओं को प्रभावी रूप से संचालित नहीं कर पाता, तो अपराध के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा हो सकती हैं।
ट. पारिवारिक कारण - अपराध के उद्गम में परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण है। विशेषकर बचपन में -
1. माता-पिता की उपेक्षा
2. अत्यधिक हिंसा
3. घरेलू कलह
4. अनुशासन का पूर्ण अभाव
5. अत्यधिक कठोरता
6. भावनात्मक असुरक्षा
7. अपराधी परिवार का प्रभाव
8. बाल शोषण
9. माता-पिता से अलगाव
उक्त बिंदु व्यक्ति के व्यक्तित्व और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। परिवार अपराध का अनिवार्य कारण नहीं है, लेकिन स्वस्थ पारिवारिक वातावरण अपराध से बचाव का महत्वपूर्ण साधन हो सकता है।
(ठ). आर्थिक कारण - आर्थिक परिस्थितियाँ भी अपराध के उद्गम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
विशेष रूप से -
1. अत्यधिक गरीबी
2. बेरोजगारी
3. आर्थिक असमानता
4. ऋणग्रस्तता
5. आर्थिक अवसरों का अभाव
7. विलासिता की बढ़ती आकांक्षा
8. भ्रष्ट आर्थिक वातावरण
9. संपत्ति संबंधी विवाद
अपराधों को प्रभावित कर सकते हैं। परन्तु यह कहना गलत होगा कि गरीब व्यक्ति अपराधी होता है। अधिकांश गरीब लोग अपराध नहीं करते। इसलिए गरीबी को केवल एक जोखिम कारक के रूप में देखना चाहिए।
(ड). नशा और अपराध - शराब तथा अन्य नशीले पदार्थों का दुरुपयोग कुछ परिस्थितियों में अपराध से जुड़ सकता है।
नशा -
1. आत्म-नियंत्रण कम कर सकता है
2. आक्रामकता बढ़ा सकता है
3. निर्णय क्षमता को प्रभावित कर सकता है
4. व्यक्ति को जोखिमपूर्ण व्यवहार की ओर ले जा सकता है।
लेकिन नशा करने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपराधी नहीं होता और प्रत्येक अपराध नशे के कारण नहीं होता।
ढ. शिक्षा और अपराध - शिक्षा व्यक्ति में -
1. कानूनी चेतना,
2. नैतिक विवेक,
3. रोजगार के अवसर,
4. सामाजिक कौशल,
5. आत्मनियंत्रण
विकसित करने में सहायता करती है।
इसलिए शिक्षा का अभाव कुछ परिस्थितियों में अपराध के जोखिम को बढ़ा सकता है। हालाँकि शिक्षित व्यक्ति भी अपराध कर सकता है, विशेषकर आर्थिक, साइबर, कॉर्पोरेट और संगठित अपराधों में।
त. अपराध के उद्गम में व्यक्ति और वातावरण - आधुनिक दृष्टिकोण अपराध को केवल व्यक्ति के भीतर या केवल समाज के बाहर नहीं खोजता। इसे एक व्यक्ति-वातावरण अंतःक्रिया के रूप में समझना अधिक उचित है।
उदाहरण - एक व्यक्ति में आक्रामक प्रवृत्ति हो सकती है। यदि उसे प्रेमपूर्ण परिवार, अच्छी शिक्षा और सकारात्मक सामाजिक वातावरण मिलता है, तो वह प्रवृत्ति अपराध में परिवर्तित न हो। दूसरी ओर, यदि वही व्यक्ति हिंसक वातावरण, अपराधी मित्रों, नशे और सामाजिक उपेक्षा से घिर जाए, तो अपराध की सम्भावना बढ़ सकती है।
थ. अपराध के उद्गम का आधुनिक दृष्टिकोण - आज अपराधशास्त्र अपराध को बहु-कारकीय घटना (Multifactorial Phenomenon) मानता है। अर्थात अपराध का कारण सामान्यतः एक नहीं होता।
इसे इस प्रकार समझना उपयोगी है -
1. जैविक कारक
2. मनोवैज्ञानिक कारक
3. पारिवारिक वातावरण
4. सामाजिक परिस्थितियाँ
5. आर्थिक दबाव
6. साथियों का प्रभाव
7. अवसर और परिस्थिति
8. अपराधी व्यवहार
लेकिन यह कोई गणितीय सूत्र नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति इन परिस्थितियों पर अलग-अलग प्रतिक्रिया करता है।
17. अपराध के उद्गम और अपराधी दायित्व में अंतर - यह बहुत महत्वपूर्ण अंतर है।
अपराध का उद्गम यह पूछता है -
“व्यक्ति अपराध की ओर क्यों गया?”
जबकि आपराधिक दायित्व यह पूछता है:
“क्या विधि के अनुसार इस व्यक्ति को इस अपराध के लिए दोषी ठहराया जा सकता है?”अर्थात अपराधशास्त्र कारणों की खोज करता है, जबकि आपराधिक विधि दायित्व और दण्ड निर्धारित करती है।
निष्कर्ष - अपराध का उद्गम किसी एक कारण की उपज नहीं है। प्राचीन युग में इसे पाप और दैवी व्यवस्था के उल्लंघन से जोड़ा गया, शास्त्रीय विचारधारा ने स्वतंत्र इच्छा और दण्ड के भय को महत्व दिया, प्रत्यक्षवादी विचारधारा ने जैविक और मनोवैज्ञानिक कारणों की खोज की तथा आधुनिक अपराधशास्त्र ने सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक, मनोवैज्ञानिक और परिस्थितिजन्य कारकों के परस्पर संबंध को स्वीकार किया है।
इसलिए आधुनिक दृष्टि से कहा जा सकता है कि “अपराधी पैदा ही नहीं होता, बल्कि अनेक व्यक्तिगत और सामाजिक परिस्थितियाँ उसके अपराधी व्यवहार के विकास में भूमिका निभा सकती हैं।” साथ ही, किसी भी एक सामाजिक या व्यक्तिगत विशेषता के आधार पर किसी व्यक्ति को अपराधी मानना उचित नहीं है।
परीक्षा में याद रखने योग्य सूत्र -
अपराध = व्यक्ति की प्रवृत्ति + सामाजिक वातावरण + मानसिक अवस्था + परिस्थितियाँ + अवसर
BNS के अनुसार अपराध की परिभाषा -
भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) में अपराध की कोई एक स्वतंत्र, संक्षिप्त परिभाषा उस तरह नहीं दी गई है जैसी सामान्य विधिशास्त्र की पुस्तकों में मिलती है। BNS विभिन्न अपराधों और उनके दंड को निर्धारित करती है। इसलिए BNS के अनुसार अपराध को समझने के लिए उसकी वैधानिक संरचना + अपराध के आवश्यक तत्व दोनों को समझना जरूरी है।
1. अपराध का सामान्य अर्थ - अपराध (Crime/Offence) ऐसा कार्य या कार्य करने में विधि द्वारा अपेक्षित असफलता है, जिसे कानून निषिद्ध करता है और जिसके लिए राज्य द्वारा दंड निर्धारित किया गया है। सरल शब्दों में जो कार्य कानून द्वारा निषिद्ध है और जिसके करने पर कानून दंड निर्धारित करता है, वह अपराध है। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करने वाला ऐसा कृत्य जो BNS की हत्या संबंधी धाराओं के अंतर्गत आता है, अपराध है और उसके लिए दंड निर्धारित है।
2. BNS में अपराध की वैधानिक अवधारणा - BNS की धारा 2 में महत्वपूर्ण परिभाषाएँ दी गई हैं। इसमें offence (अपराध) की परिभाषा ऐसे कार्य को संदर्भित करती है जो संहिता के अंतर्गत दंडनीय है। इससे अपराध की मूल संरचना सामने आती है
कृत्य/चूक→कानून द्वारा निषिद्ध →दंडनीय→अपराध।
अर्थात केवल कोई गलत या अनैतिक काम अपने-आप में कानूनी अपराध नहीं बन जाता। उसके लिए यह आवश्यक है कि विधि ने उसे अपराध घोषित किया हो और उसके लिए दंड का प्रावधान किया हो।
3. अपराध के प्रमुख आवश्यक तत्व - किसी कृत्य को अपराध मानने के लिए निम्न तत्व महत्वपूर्ण होते हैं -
(1) मानव द्वारा किया गया कृत्य - अपराध का पहला आधार किसी व्यक्ति का कृत्य (Act) या कुछ परिस्थितियों में विधि द्वारा अपेक्षित कार्य न करना(Omission) है।
उदाहरण - A ने जानबूझकर B को चाकू मारा और उसकी मृत्यु हो गई। यहाँ A का कृत्य अपराध की आधारभूत घटना है।
(2) कृत्य विधि द्वारा निषिद्ध होना चाहिए - हर गलत कार्य अपराध नहीं है।
उदाहरण - किसी व्यक्ति से किया हुआ कोई सामान्य नैतिक दुर्व्यवहार निंदनीय हो सकता है, लेकिन जब तक किसी कानून के अंतर्गत वह दंडनीय नहीं है, उसे केवल उसी आधार पर अपराध नहीं कहा जा सकता। इसे Principle of Legality अर्थात वैधानिकता का सिद्धांत कहा जाता है - कोई कार्य कानून द्वारा अपराध घोषित किए बिना अपराध नहीं है।
(3) अपराध के लिए दोषपूर्ण मानसिक अवस्था - आपराधिक विधि का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है Mens Rea = दोषपूर्ण मानसिक अवस्था/अपराधी मन
अर्थात अनेक अपराधों में यह देखना आवश्यक होता है कि आरोपी के मन में अपराध करने की मंशा, ज्ञान, बेईमानी, कपट या लापरवाही जैसी मानसिक अवस्था थी या नहीं।
उदाहरण - A ने जानबूझकर B को मारने के उद्देश्य से गोली चलाई और B की मृत्यु हो गई। यहाँ A की जानबूझकर की गई मानसिक अवस्था अपराध के स्वरूप को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण होगी।
लेकिन ध्यान रहे कि हर अपराध में Mens Rea का स्वरूप समान नहीं होता। संबंधित अपराध की वैधानिक भाषा देखकर यह निर्धारित किया जाता है कि उसमें intention, knowledge, dishonesty, fraudulence, rashness, negligence आदि में से क्या आवश्यक है।
4. Actus Reus और Mens Rea - अपराध को समझने के लिए दो लैटिन सिद्धांत बहुत महत्वपूर्ण हैं:
Actus Reus इसका अर्थ है - अपराधपूर्ण कृत्य या आचरण।
Mens Rea इसका अर्थ है - अपराधपूर्ण मानसिक अवस्था। इसे सूत्र के रूप में समझें -
Crime = Actus Reus + आवश्यक Mens Rea + अन्य वैधानिक तत्व
हालाँकि यह एक सामान्य सिद्धांत है। प्रत्येक अपराध में दोनों तत्वों की बिल्कुल समान आवश्यकता हो, ऐसा आवश्यक नहीं है।
5. अपराध और नैतिक गलत कार्य में अंतर -
आधार - अपराध - नैतिक गलत कार्य
स्रोत - कानून - नैतिकता/समाज
दंड - राज्य द्वारा - सामाजिक निर्धारित नैतिक निंदा
न्यायालय - न्यायालय - आवश्यक
द्वारा विचारणीय नहीं
उदाहरण - चोरी, हत्या - झूठ बोलना
बलात्कार वचन न निभाना
परिणाम - कानूनी - सामाजिक
दंड निंदा
हर अपराध नैतिक रूप से गलत माना जा सकता है, लेकिन हर नैतिक रूप से गलत कार्य अपराध नहीं होता।
6. अपराध में चूक भी महत्वपूर्ण हो सकती है -
अपराध केवल कोई सकारात्मक कार्य करने से ही नहीं बनता। कुछ परिस्थितियों में कानून द्वारा अपेक्षित कर्तव्य का पालन न करना भी अपराध हो सकता है।
उदाहरण - जहाँ कानून किसी व्यक्ति पर कोई विशेष कानूनी कर्तव्य डालता है और वह व्यक्ति जानबूझकर या आवश्यक मानसिक अवस्था के साथ उस कर्तव्य का पालन नहीं करता, तो संबंधित वैधानिक प्रावधान के अनुसार वह आपराधिक दायित्व उत्पन्न कर सकता है। इसलिए अपराध = केवल करना ही नहीं, कुछ परिस्थितियों में कानूनी रूप से आवश्यक कार्य न करना भी हो सकता है।
7. अपराध के चरण -
आपराधिक विधि में सामान्यतः अपराध के विकास के चार चरण माने जाते हैं:
क. आशय (Intention) - अपराध करने का विचार मन में उत्पन्न होना पर केवल मन में अपराध का विचार आ जाना अपराध नहीं है।
ख. तैयारी (Preparation)- अपराध करने के लिए साधन या व्यवस्था करना।
उदाहरण - किसी व्यक्ति की हत्या करने के लिए हथियार खरीदना। परन्तु केवल तैयारी पर आपराधिक दायित्व नहीं बनता, लेकिन कानून कुछ विशेष तैयारियों को भी दंडनीय बना सकता है।
ग. प्रयास (Attempt) - अपराध को पूरा करने की दिशा में प्रत्यक्ष कदम उठाना।यहीं से आपराधिक दायित्व अधिक स्पष्ट रूप से उत्पन्न होता है।
घ.अपराध की पूर्णता (Commission)
जब अपराध के सभी आवश्यक तत्व पूरे हो जाते हैं, और कृत्य कारित होते ही अपराध पूर्ण हो जाता है।
आशय → तैयारी → प्रयास → अपराध की पूर्णता।
8.BNS में सामान्य अपवादों का महत्व-
किसी व्यक्ति द्वारा ऐसा कार्य किया गया है जो सामान्य परिस्थितियों में अपराध जैसा दिखाई देता है, फिर भी वह हर स्थिति में अपराध नहीं होगा। BNS में सामान्य अपवाद (General Exceptions) दिए गए हैं। उदाहरण के रूप में-
1.तथ्य की भूल की कुछ परिस्थितियाँ -
• दुर्घटना
• आवश्यकता से संबंधित परिस्थितियाँ
• बालक की आयु से संबंधित प्रावधान
• मानसिक असमर्थता से संबंधित परिस्थितियाँ
• अनैच्छिक नशे की कुछ परिस्थितियाँ
• सहमति से संबंधित कुछ परिस्थितियाँ
• निजी प्रतिरक्षा (Right of Private Defence)
इसलिए किसी घटना को देखकर केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि अपराध हो गया। न्यायालय को यह भी देखना होता है कि क्या आरोपी का कृत्य संबंधित अपराध के सभी तत्वों को पूरा करता है? और यदि करता है, तो क्या BNS का कोई सामान्य अपवाद उस व्यक्ति को आपराधिक दायित्व से मुक्त करता है?
9. अपराध के विषय में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत -
Actus non facit reum nisi mens sit rea. इसका सामान्य अर्थ है कि केवल कृत्य किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं बनाता, जब तक कि आवश्यक दोषपूर्ण मानसिक अवस्था भी न हो। लेकिन यह सिद्धांत पूर्ण और असीमित नहीं है। आधुनिक आपराधिक कानून में कुछ अपराध ऐसे भी हो सकते हैं जहाँ विशेष मानसिक तत्व की आवश्यकता कानून की भाषा के अनुसार अलग हो। इसलिए BNS की संबंधित धारा को पढ़ना हमेशा आवश्यक है।
10. अपराध के आवश्यक तत्वों को उदाहरण से समझिए -
मान लीजिए A ने B की हत्या कर दी।
न्यायालय को केवल यह नहीं देखना होगा कि B की मृत्यु हुई और A वहाँ मौजूद था।
बल्कि यह देखना होगा कि
1. B की मृत्यु हुई या नहीं?
2. मृत्यु A के कृत्य से हुई या नहीं?
3. A का कृत्य संबंधित अपराध की वैधानिक परिभाषा में आता है या नहीं?
4. A की मानसिक अवस्था क्या थी?
5. क्या A को B की मृत्यु का ज्ञान था?
6. क्या A का कोई वैधानिक बचाव उपलब्ध है?
7. क्या BNS का कोई सामान्य अपवाद लागू होता है?
8. अपराध के लिए निर्धारित अन्य आवश्यक तत्व पूरे होते हैं या नहीं?
तभी आपराधिक दायित्व निर्धारित होगा।
BNS के अनुसार अपराध की अवधारणा का सार - अपराध वह विधि-विरुद्ध मानव कृत्य या विधि द्वारा अपेक्षित कार्य का उल्लंघन है, जिसे कानून दंडनीय बनाता है और जिसके लिए संबंधित अपराध के वैधानिक तत्वों की पूर्ति आवश्यक है।
अपराध = मानव कृत्य/चूक ~ कानून द्वारा निषिद्ध ~आवश्यक मानसिक तत्व ~ अपराध के वैधानिक तत्वों की पूर्ति ~
कोई लागू सामान्य अपवाद नहीं ~ दंडनीय आपराधिक दायित्व।
निष्कर्ष - भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अंतर्गत अपराध को केवल गलत काम समझना उचित नहीं है। अपराध एक विधिक अवधारणा है। किसी कृत्य को अपराध मानने के लिए यह आवश्यक है कि वह कानून के अंतर्गत निषिद्ध एवं दंडनीय हो तथा संबंधित अपराध के आवश्यक वैधानिक तत्व सिद्ध हों। साथ ही, जहाँ आवश्यक हो वहाँ Mens Rea, Actus Reus, अपराध के चरण तथा General Exceptions का परीक्षण किया जाता है। BNS की दृष्टि से अपराध को समझने की कुंजी है - कृत्य + मानसिक तत्व + वैधानिक निषेध + दंडनीयता + अपवादों की जाँच।
आपराधिक दायित्व का सिद्धांत -
आपराधिक दायित्व (Criminal Liability) आपराधिक विधि का मूल सिद्धांत है। सरल शब्दों में, जब किसी व्यक्ति का आचरण कानून द्वारा निषिद्ध अपराध के सभी आवश्यक तत्वों को पूरा करता है, और कानून के अनुसार उस व्यक्ति को उस कृत्य के लिए दोषी ठहराया जा सकता है, तब उस पर आपराधिक दायित्व उत्पन्न होता है।
1. आपराधिक दायित्व का अर्थ
आपराधिक दायित्व से आशय उस कानूनी जिम्मेदारी से है जिसके कारण किसी व्यक्ति को अपराध करने के लिए राज्य द्वारा दण्डित किया जा सकता है।
उदाहरण यदि A जानबूझकर B की हत्या करता है, तो A का कृत्य केवल नैतिक रूप से गलत नहीं है, बल्कि कानून के अनुसार अपराध है। इसलिए A पर आपराधिक दायित्व उत्पन्न होगा और उसे कानून में निर्धारित दण्ड दिया जा सकता है।
आपराधिक दायित्व के पीछे मूल विचार है अपराध + आवश्यक मानसिक तत्व + निषिद्ध कृत्य + कानून द्वारा निर्धारित दण्ड = आपराधिक दायित्व
हालाँकि प्रत्येक अपराध में Mens Rea आवश्यक हो, ऐसा अनिवार्य नहीं है। कुछ अपराधों में कानून स्वयं बिना दोषपूर्ण मानसिक अवस्था के भी दायित्व निर्धारित कर सकता है।
2. आपराधिक दायित्व का मूल सिद्धांत
आपराधिक विधि का सामान्य सिद्धांत है:
Actus Non Facit Reum Nisi Mens Sit Rea इसका अर्थ है - किसी कृत्य को केवल तभी अपराध माना जाता है जब वह दोषपूर्ण मानसिक अवस्था के साथ किया गया हो। केवल किसी व्यक्ति का बाहरी कृत्य पर्याप्त नहीं होता, बल्कि यह भी देखा जाता है कि उस समय उसकी मानसिक अवस्था क्या थी।
उदाहरण - A के हाथ से गलती से B की मृत्यु हो जाती है, यदि A ने B को मारने का इरादा नहीं किया और न ही उसकी ओर से ऐसी आपराधिक लापरवाही थी जिसे कानून अपराध मानता है, तो केवल मृत्यु हो जाने से A हत्या का दोषी नहीं हो जाएगा।
3. आपराधिक दायित्व के प्रमुख तत्व
मानव द्वारा किया गया कृत्य अपराध किसी व्यक्ति के कृत्य या विधि द्वारा अपेक्षित कार्य न करने से उत्पन्न होता है। किसी विचार, कल्पना या इच्छा मात्र को सामान्यतः अपराध नहीं माना जाता।
उदाहरण - A मन में सोचता है कि वह B को मार देगा। सिर्फ सोचने से A हत्या का दोषी नहीं होगा। यदि A उस विचार को आगे बढ़ाकर हत्या की तैयारी, प्रयास अथवा हत्या करता है, तो परिस्थितियों के अनुसार आपराधिक दायित्व उत्पन्न हो सकता है।
4. Actus Reus अर्थात अपराध का बाहरी तत्व -
Actus Reus का अर्थ है अपराध का भौतिक या बाहरी तत्व। इसमें अपराध करने वाला कृत्य, अपराध का परिणाम, परिस्थितियाँ अथवा कानून द्वारा अपेक्षित कार्य को न करना शामिल हो सकता है।
उदाहरण - यदि किसी व्यक्ति ने किसी दूसरे व्यक्ति पर जानलेवा हमला किया, तो हमला करना अपराध का बाहरी तत्व हो सकता है।
Actus Reus के रूप -
(क) सकारात्मक कृत्य (Positive Act)
जैसे किसी व्यक्ति को गोली मारना।
(ख) चूक (omission) - जहाँ कानून किसी व्यक्ति पर कोई कर्तव्य डालता है और वह जानबूझकर उसका पालन नहीं करता।
(ग) निषिद्ध परिणाम - जैसे किसी कृत्य के कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु होना।
5. Mens Rea अर्थात दोषपूर्ण मानसिक अवस्था
Mens Rea का शाब्दिक अर्थ है दोषपूर्ण मन, यह अपराध करते समय अभियुक्त की मानसिक अवस्था को दर्शाता है।
Mens Rea के प्रमुख रूप हैं -
(1) आशय या Intention - जब व्यक्ति किसी परिणाम को उत्पन्न करने का उद्देश्य रखता है।
उदाहरण - A ने B की हत्या करने के उद्देश्य से B पर चाकू से हमला किया और B की मृत्यु हो गई। यहाँ A का आशय महत्वपूर्ण है।
(2) ज्ञान या Knowledge - व्यक्ति को यह ज्ञान हो कि उसके कृत्य से कोई विशेष परिणाम उत्पन्न हो सकता है।
(3) उतावलेपन या Recklessness - व्यक्ति जानता है कि उसके कार्य से नुकसान हो सकता है, फिर भी वह जोखिम उठाकर कार्य करता है।
(4) आपराधिक उपेक्षा या Criminal Negligence - व्यक्ति से ऐसी सावधानी अपेक्षित थी जो एक सामान्य विवेकशील व्यक्ति बरतता, लेकिन उसने गंभीर उपेक्षा की और उसके परिणामस्वरूप अपराध हुआ।
6. दोनों तत्वों का संबंध - आपराधिक दायित्व का सामान्य सिद्धांत यह है कि Actus Reus और Mens Rea का आवश्यक स्तर एक ही अपराध के संबंध में मौजूद होना चाहिए।
उदाहरण - A ने B को धक्का दिया। B गिर गया और उसकी मृत्यु हो गई। अब केवल मृत्यु से यह निष्कर्ष नहीं निकलेगा कि A हत्या का दोषी है। न्यायालय देखेगा कि -
• A ने क्या किया?
• A का उद्देश्य क्या था?
• उसे परिणाम का कितना ज्ञान था?
• क्या उसका कृत्य लापरवाहीपूर्ण था?
• क्या मृत्यु उसी कृत्य के कारण हुई?
• संबंधित अपराध की वैधानिक आवश्यकताएँ पूरी हुईं या नहीं?
यही प्रक्रिया आपराधिक दायित्व निर्धारित करती है।
7. आपराधिक दायित्व में कारण-सम्बन्ध
अपराध में कई बार यह स्थापित करना आवश्यक होता है कि अभियुक्त के कृत्य और उत्पन्न परिणाम के बीच प्रत्यक्ष कानूनी कारण-सम्बन्ध (Causation) है।
उदाहरण - A ने B को गंभीर रूप से घायल किया और उसी चोट के कारण B की मृत्यु हो गई। यहाँ A के कृत्य और B की मृत्यु के बीच कारण-सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है। लेकिन यदि A के कृत्य के बाद कोई बिल्कुल स्वतंत्र और असाधारण घटना हुई जिसके कारण परिणाम उत्पन्न हुआ, तो न्यायालय यह जाँच करेगा कि मूल कृत्य और परिणाम के बीच कानूनी संबंध अभी भी मौजूद है या नहीं।
8. अपराध के चरण और आपराधिक दायित्व - अपराध निम्न चरणों से गुजरता है - इरादा → तैयारी → प्रयास → अपराध की पूर्णता।
1. इरादा (Intention) - व्यक्ति अपराध करने का विचार करता है। केवल विचार या इरादा दण्डनीय नहीं होता।
2. तैयारी (Preparation) - अपराध करने के लिए साधन जुटाना या योजना बनाना। तैयारी भी दण्डनीय नहीं होती, लेकिन कानून कुछ विशेष प्रकार की तैयारियों को अपराध बना सकता है।
3. प्रयास (Attempt) - जब व्यक्ति अपराध की दिशा में ऐसा प्रत्यक्ष कदम उठा देता है जिससे अपराध की पूर्णता की ओर बढ़ना प्रारम्भ हो जाता है। प्रयास दण्डनीय होता है।
4. अपराध की पूर्णता -(Commission) - जब अपराध के सभी आवश्यक तत्व पूरे हो जाते हैं, तब पूर्ण अपराध का दायित्व उत्पन्न होता है।
9. आपराधिक दायित्व और ज्ञान/आशय में अंतर
आधार आशय (Intention) ज्ञान (Knowledge) - परिणाम उत्पन्न करने का उद्देश्य परिणाम होने की जानकारी
मानसिक अवस्था लक्ष्य-केन्द्रित परिणाम की जानकारी।
उदाहरण B को मारने के उद्देश्य से गोली चलाना ऐसा कार्य करना जिससे मृत्यु होने की जानकारी हो। किसी अपराध में आशय और ज्ञान का आवश्यक स्तर संबंधित वैधानिक प्रावधान पर निर्भर करता है।
10. Motive और Intention में अंतर -
Motive = उद्देश्य/प्रेरणा - व्यक्ति अपराध क्यों करना चाहता था?
Intention = आशय - वह वास्तव में क्या परिणाम उत्पन्न करना चाहता था?
उदाहरण - A, B से बदला लेना चाहता है। इसलिए वह B की हत्या करता है। यहाँ
बदला लेना = Motive, B की हत्या करना = Intention।
आपराधिक दायित्व निर्धारित करने में Intention अधिक प्रत्यक्ष महत्व रखता है, जबकि Motive परिस्थितियों और साक्ष्य को समझने में सहायक हो सकता है।
11. Strict Liability अर्थात कठोर दायित्व
कुछ अपराधों में अभियोजन पक्ष को Mens Rea सिद्ध करने की आवश्यकता कम या नहीं हो सकती है, यदि संबंधित कानून ने ऐसा दायित्व निर्धारित किया हो।
इसे Strict Liability कहा जाता है।अर्थात कानून कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति के दोषपूर्ण मानसिक इरादे के बिना भी दायित्व निर्धारित कर सकता है। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि हर अपराध में Mens Rea अनिवार्य रूप से सिद्ध करना ही पड़ेगा। यह अपराध की प्रकृति और संबंधित वैधानिक प्रावधान पर निर्भर करता है।
12. आपराधिक दायित्व में सामान्य अपवाद
यदि किसी व्यक्ति का कृत्य बाहरी रूप से अपराध जैसा दिखाई देता है, फिर भी कुछ परिस्थितियों में कानून उसे आपराधिक दायित्व से मुक्त कर सकता है। जैसे
(1) तथ्य की भूल (Mistake of Fact) - व्यक्ति ने तथ्य की ऐसी भूल की हो जिसे कानून निर्दिष्ट परिस्थितियों में मान्यता देता है।
(2) दुर्घटना (Accident) - कानून में निर्धारित परिस्थितियों में बिना आपराधिक आशय के दुर्घटनावश परिणाम उत्पन्न होना।
(3) बालक की आयु - कानून निश्चित आयु के बच्चों के संबंध में विशेष सुरक्षा प्रदान करता है।
(4) मानसिक असमर्थता - कुछ परिस्थितियों में ऐसी मानसिक अवस्था, जिसमें व्यक्ति अपने कृत्य की प्रकृति या उसके गलत होने को समझने में असमर्थ हो।
(5) नशे की अवस्था - नशे के संबंध में भी कानून परिस्थितियों और नशे की प्रकृति के आधार पर अलग-अलग नियम निर्धारित करता है।
(6) आत्मरक्षा/निजी प्रतिरक्षा - कानून द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर निजी प्रतिरक्षा में किया गया कृत्य अपराध नहीं माना जा सकता।
(7) आवश्यकता - कुछ विशेष परिस्थितियों में बड़े नुकसान को रोकने के लिए किया गया कृत्य कानून के अनुसार अपवाद के अंतर्गत आ सकता है।
13. सामूहिक आपराधिक दायित्व -
हर अपराध केवल एक व्यक्ति द्वारा ही किया जाए, यह आवश्यक नहीं है। कई बार कई व्यक्ति मिलकर अपराध करते हैं। ऐसी स्थिति में सामूहिक आपराधिक दायित्व के सिद्धांत लागू हो सकते हैं।
इसमें मुख्य प्रश्न होते हैं -
• किसने क्या किया?
• क्या सभी की कोई साझा योजना थी?
• क्या सभी ने अपराध में सहयोग किया?
• क्या किसी व्यक्ति की भूमिका अपराध के लिए वैधानिक रूप से पर्याप्त थी?
केवल घटनास्थल पर उपस्थित होना हर परिस्थिति में आपराधिक दायित्व उत्पन्न नहीं करता।
14. अभियोजन और प्रमाण का महत्व
आपराधिक मुकदमे में सामान्य सिद्धांत यह है कि अभियोजन को अभियुक्त के विरुद्ध अपराध के आवश्यक तत्वों को कानूनी प्रमाण के आधार पर स्थापित करना होता है। आपराधिक न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण सिद्धांत है -
Presumption of Innocence अर्थात अभियुक्त को तब तक दोषी नहीं माना जाता जब तक कानून के अनुसार उसका अपराध सिद्ध न हो जाए। इसी से जुड़ा महत्वपूर्ण सिद्धांत है
Benefit of Reasonable Doubt यदि अभियोजन के साक्ष्य में ऐसा युक्तिसंगत संदेह रह जाता है जो अपराध के आवश्यक तत्वों को प्रभावित करता है, तो उसका लाभ अभियुक्त को मिल सकता है।
15. आपराधिक दायित्व का सरल सूत्र
परीक्षा में याद रखने के लिए इसे इस प्रकार समझ सकते हैं -
मानव आचरण ~Actus Reus~Mens Rea ~जहाँ अपराध में अपेक्षित हो~ कारण-सम्बन्ध~अपराध के सभी वैधानिक तत्व~कोई लागू वैधानिक अपवाद नहीं~आपराधिक दायित्व।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 के संदर्भ में - वर्तमान में भारत में आपराधिक अपराधों के संबंध में प्रमुख दण्ड संहिता भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) है, जिसने भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (IPC) का स्थान लिया है। BNS में अपराधों के विभिन्न स्वरूपों, सामान्य अपवादों, दण्डनीय प्रयास, सहभागिता आदि से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं।
आपराधिक दायित्व के सिद्धांत को समझाइए। तो केवल Mens Rea लिखना पर्याप्त नहीं होगा। उत्तर में Actus Reus, Mens Rea, Intention, Knowledge, Motive, Causation, अपराध के चरण, Strict Liability, General Exceptions तथा सामूहिक दायित्व को क्रमबद्ध रूप से लिखना अधिक प्रभावी रहेगा।
भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) का अध्याय 3 (धारा 14 से धारा 44) सामान्य अपवादों (General Exceptions) का प्रावधान करता है। यह पूर्ववर्ती IPC के अध्याय 4 (धारा 76 से 106) की समतुल्य है। सामान्य अपवाद वे विशेष परिस्थितियां हैं जिनमें कोई कार्य प्रथम दृष्टया अपराध प्रतीत होने के बावजूद विधि की दृष्टि में अपराध नहीं माना जाता, क्योंकि इसमें आपराधिक मनःस्थिति (Mens Rea) का अभाव होता है। सामान्य अपवादों का वर्गीकरण
BNS के सामान्य अपवादों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है -
1. क्षम्य प्रतिरक्षा (Excusable Exceptions)- जहाँ कर्ता की कोई आपराधिक मंशा या मानसिक क्षमता नहीं होती।
2. न्यायोचित प्रतिरक्षा (Justified Exceptions) - जहाँ कार्य समाज या व्यक्ति की भलाई/रक्षा के लिए उचित माना जाता है।
3. तथ्य की भूल (Mistake of Fact) – धारा 14 व 17
धारा 14 (IPC 76) - विधि द्वारा आबद्ध या सद्भावपूर्वक तथ्य की भूल से स्वयं को आबद्ध मानने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य।
धारा 17 (IPC 79) - विधि द्वारा न्यायानुमत (Justified by Law) या तथ्य की भूल से स्वयं को समर्थ मानने वाले व्यक्ति का कार्य।
नियम - "Ignorantia facti excusat, ignorantia juris non excusat" (तथ्य की भूल क्षम्य है, लेकिन विधि/कानून की अज्ञानता क्षम्य नहीं है)।
4. न्यायिक कार्य (Judicial Acts) - धारा 15 व 16 -
धारा 15 (IPC 77)- न्यायाधीश द्वारा न्यायिक रूप से सद्भावपूर्वक कार्य करते हुए किया गया कोई कार्य अपराध नहीं है।
धारा 16 (IPC 78)- न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में किया गया कार्य (जैसे जल्लाद द्वारा फांसी देना)।
5. दुर्घटना (Accident) - धारा 18 (IPC 80) - विधिपूर्ण कार्य को विधिपूर्ण साधनों द्वारा, उचित सावधानी और सतर्कता के साथ करते समय यदि कोई अनहोनी या दुर्घटना हो जाती है, तो वह अपराध नहीं है।
4. आवश्यकता का सिद्धांत (Doctrine of Necessity) - धारा 19 (IPC 81) - किसी बड़ी हानि या आपदा को रोकने के लिए बिना किसी आपराधिक आशय के सद्भावपूर्वक किया गया ऐसा कार्य जिससे छोटी हानि संभावित हो, अपराध नहीं माना जाता।
5. शैशवता / बालपन (Infancy / Doli Incapax) - धारा 20 व 21-
धारा 20 (IPC 82) - पूर्ण अक्षमता (Doli Incapax) - 7 वर्ष से कम आयु के बालक द्वारा किया गया कोई भी कार्य अपराध नहीं होता।
धारा 21 (IPC 83) - अपरिपक्व समझ (Immature Understanding): 7 से 12 वर्ष की आयु के ऐसे बालक का कार्य जो अपने आचरण की प्रकृति और परिणामों को समझने के लिए पर्याप्त परिपक्व नहीं हुआ है।
6. चित्तविकृति / पागलपन (Insanity / Unsoundness of Mind) – धारा 22 (IPC 84) -
यदि कोई व्यक्ति कार्य करते समय मानसिक अस्वस्थता के कारण कार्य की प्रकृति या यह जानने में असमर्थ था कि वह जो कर रहा है वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है (मैकनॉटन का नियम / M'Naghten Rule)।
7. मत्तता / नशा (Intoxication) - धारा 23 व 24
धारा 23 (IPC 85) - अनैच्छिक नशा (Involuntary Intoxication)- जब व्यक्ति को उसकी जानकारी के बिना या उसकी इच्छा के विरुद्ध नशा दिया गया हो और वह निर्णय लेने में असमर्थ हो जाए।
धारा 24 (IPC 86) - ऐच्छिक नशा - (Voluntary Intoxication): व्यक्ति पर उसी ज्ञान का अनुमान लगाया जाएगा जो उसे सामान्य अवस्था में होता, यद्यपि विशिष्ट आशय का अभाव साबित किया जा सकता है।
8. सहमति (Consent) - धारा 25 से 30 -
धारा 25 (IPC 87)- 18 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति द्वारा मृत्यु या घोर उपहति के जोखिम के बिना दी गई सहमति से किया गया कार्य (उदा. खेलकूद)।
धारा 26 व 27 (IPC 88, 89)- किसी व्यक्ति के फायदे के लिए सद्भावपूर्वक दी गई सहमति से किया गया कार्य (उदाहरण - डॉक्टर द्वारा शल्य चिकित्सा/ऑपरेशन)।
धारा 29 (IPC 90) - भय, भ्रम या उन्माद के अधीन दी गई सहमति वैध सहमति नहीं मानी जाती।
9. विवशता / धमकी (Duress / Compulsion) - धारा 32 (IPC 94)
वह कार्य (मृत्यु और राज्य के विरुद्ध अपराधों को छोड़कर) जिसे करने के लिए व्यक्ति को तत्काल मृत्यु की युक्तिसंगत आशंका द्वारा विवश किया गया हो।
10. तुच्छ कार्य (Trivial Acts / De Minimis Non Curat Lex) - धारा 33 (IPC 95) -
इतने मामूली या तुच्छ नुकसान वाले कार्य जिनकी सामान्य समझ वाला व्यक्ति कोई शिकायत नहीं करेगा (जैसे भीड़ में हल्का धक्का लगना)।
11. व्यक्तिगत प्रतिरक्षा का अधिकार (Right of Private Defence) - धारा 34 से 44 -
यह अधिकार राज्य द्वारा प्रत्येक नागरिक को अपने शरीर और संपत्ति की रक्षा के लिए दिया गया है -
धारा 34 (IPC 96) - आत्मरक्षा में किया गया कोई भी कार्य अपराध नहीं है।
धारा 35 (IPC 97) - शरीर और संपत्ति (अपनी या किसी अन्य व्यक्ति की) की निजी प्रतिरक्षा का अधिकार।
धारा 37 (IPC 99) - सीमाएं - लोक सेवक द्वारा विधिसम्मत कार्य, लोक प्राधिकारियों की सहायता प्राप्त करने का समय होने पर, या आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग करने पर यह अधिकार उपलब्ध नहीं होता।
धारा 38 (IPC 100) - शरीर की रक्षा में मृत्यु कारित करना: मृत्यु, घोर उपहति, बलात्कार, अप्राकृतिक कामवासना, अपहरण या सदोष परिरोध की युक्तिसंगत आशंका होने पर हमलावर की मृत्यु तक कारित की जा सकती है।
धारा 41 (IPC 103) - संपत्ति की रक्षा में मृत्यु कारित करना: डकैती, रात्रि गृह-भेदन, अग्नि द्वारा दृष्टि (आगजनी), या ऐसी चोरी/रिष्टि/गृह-अतिचार जहाँ मृत्यु या घोर उपहति का भय हो।
निष्कर्ष - आपराधिक दायित्व का मूल आधार यह है कि व्यक्ति को उसके ऐसे आचरण के लिए उत्तरदायी ठहराया जाए जिसे कानून अपराध घोषित करता है और जिसके लिए संबंधित अपराध के आवश्यक मानसिक तथा भौतिक तत्व, जहाँ आवश्यक हों, विद्यमान हों। आपराधिक विधि का उद्देश्य केवल व्यक्ति को दण्ड देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि निर्दोष व्यक्ति दण्डित न हो और दोषी व्यक्ति कानून के अनुसार उत्तरदायी ठहराया जाए।
BNS की धारा 01 - भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 1 इस संपूर्ण संहिता का परिचयात्मक और प्रारंभिक आधार तय करती है। इसमें कानून का नाम, इसके लागू होने की तिथि और इसके क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) का विवरण दिया गया है।
1. संक्षिप्त नाम (Short Title) उपधारा (1) - इस अधिनियम का आधिकारिक नाम भारतीय न्याय संहिता, 2023 है।
2. प्रारंभ (Commencement) उपधारा (2) - यह कानून केंद्र सरकार द्वारा आधिकारिक राजपत्र (Official Gazette) में अधिसूचना जारी कर निर्धारित की गई तारीख 1 जुलाई 2024 से प्रभावी हुआ।
3. भारत के भीतर किए गए अपराध (Intra-Territorial Jurisdiction) उपधारा (3) - भारत की सीमा के भीतर किया गया कोई भी कार्य या लोप (Act or Omission) जो इस संहिता के प्रावधानों के विरुद्ध है, उसके लिए हर व्यक्ति (नागरिक अथवा विदेशी) इसी संहिता के तहत दंडनीय होगा।
4. भारत से बाहर किए गए अपराध (Extra-Territorial Jurisdiction) उपधारा (4) व (5) - यदि कोई अपराध भारत की सीमा से बाहर किया जाता है, तब भी BNS निम्नलिखित परिस्थितियों में लागू होगी मानो वह अपराध भारत में ही हुआ हो -
भारतीय नागरिक - भारत का कोई भी नागरिक यदि विदेश में कोई अपराध करता है।
पंजीकृत पोत या विमान - भारत में रजिस्टर्ड किसी भी जहाज (Ship) या विमान (Aircraft) पर मौजूद किसी भी व्यक्ति द्वारा किया गया अपराध, चाहे वह पोत या विमान दुनिया में कहीं भी हो।
कंप्यूटर संसाधन (Cyber Crime) - दुनिया के किसी भी कोने से कोई भी व्यक्ति यदि भारत में स्थित किसी कंप्यूटर सिस्टम या डेटा संसाधन को निशाना बनाकर अपराध करता है।
IPC से तुलना - पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता (IPC, 1860) की धारा 1, 2, 3 और 4 में जो बातें अलग-अलग धाराओं में वर्णित थीं, उन्हें BNS में एक ही जगह धारा 1 के तहत समाहित कर दिया गया है।
BNS की धारा 02 -
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 02 पूरी संहिता का परिभाषा खंड (Definitions Section) है।
IPC में जहाँ अलग-अलग धाराओं (धारा 6 से 52A) में परिभाषाएं बिखरी हुई थीं, वहीं BNS में उन्हें एक ही धारा (धारा 2) के तहत 39 उप-खंडों (Sub-clauses) में वर्णमाला क्रम (Alphabetical order) में संकलित किया गया है।
BNS की धारा 2 की प्रमुख और महत्वपूर्ण परिभाषाएं -
उप-धारा - पद (Term) - संक्षिप्त विवरण एवं कानूनी अर्थ |
2(1) - कार्य (Act) - केवल एक कार्य ही नहीं, बल्कि कार्यों की एक श्रृंखला (Series of acts) भी इसमें शामिल है।
2(3) - बालक (Child) - 18 वर्ष से कम आयु का कोई भी व्यक्ति। |
2(6) - कपटपूर्वक (Fraudulently) - यदि कोई कार्य धोखा देने के आशय से किया जाए (Intent to defraud)।
2(8) - लैंगिक पहचान (Gender) - पुल्लिंग सर्वनाम (He/His) का प्रयोग किसी भी व्यक्ति पर लागू माना जाएगा चाहे वह पुरुष, महिला या ट्रांसजेंडर हो।
2(10) - सद्भावपूर्वक (Good faith) - सम्यक सावधानी और ध्यान (Due care and attention) से किया गया कार्य।
2(12) - क्षति (Injury) - किसी व्यक्ति के शरीर, मन, ख्याति (Reputation) या संपत्ति को अवैध रूप से पहुंचाई गई कोई भी हानि।
2(14) - न्यायाधीश (Judge) - ऐसा व्यक्ति जो विधि द्वारा किसी न्यायिक कार्यवाही में निर्णायक निर्णय देने के लिए सशक्त हो।
2(21) - लोक सेवक (Public Servant) न्यायाधीश, सरकारी कर्मचारी, सशस्त्र बलों के अधिकारी, चुनावी अधिकारी आदि।
2(28) - सक्रिय या निष्क्रीय लोप (Omission) - कोई ऐसा वैध कर्तव्य जिसे करने के लिए व्यक्ति बाध्य था, पर उसने नहीं किया।
2(39) - दोषपूर्ण लाभ/हानि (Wrongful Gain/Loss) - विधि विरुद्ध साधनों द्वारा ऐसी संपत्ति का लाभ या हानि, जिस पर पाने/खोने वाले का विधिक अधिकार न हो।
धारा 2 में हुए प्रमुख आधुनिक बदलाव
• डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स दस्तावेज़ (Document) और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की परिभाषा को स्पष्ट रूप से जोड़ा गया है, जिससे डिजिटल साक्ष्य और साइबर अपराधों की कानूनी व्याख्या आसान हो गई है।
• ट्रांसजेंडर समावेशन - जेंडर (Gender) की परिभाषा में स्पष्ट रूप से ट्रांसजेंडर समुदाय को शामिल किया गया है।
• बालक (Child) का स्पष्ट मानक - 18 वर्ष से कम आयु वाले सभी व्यक्तियों को बालक की श्रेणी में परिभाषित किया गया है।
• समेकित ढांचा - IPC के विपरीत, सभी बुनियादी विधिक शब्दों (जैसे Dishonestly, Movable Property, Reason to believe, Voluntarily आदि) को एक ही सूची में व्यवस्थित कर दिया गया है।
धारा 03 -
भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 3 संहिता के सामान्य सिद्धांतों, व्याख्या (Interpretation), और सामान्य आशय (Common Intention) से जुड़े बुनियादी नियमों को स्पष्ट करती है।
IPC में जो प्रावधान अलग-अलग धाराओं (IPC की धारा 34, 35, 36, 37, 38 आदि) में बिखरे हुए थे, उन्हें BNS में एक ही जगह धारा 3 के तहत 6 उपधाराओं में संकलित किया गया है।
धारा 3 की सभी उपधाराओं का विस्तृत विश्लेषण -
धारा 3(1) - सामान्य स्पष्टीकरण (General Explanation) - इस संहिता के प्रत्येक भाग में दी गई हर परिभाषा, दंडात्मक उपबंध और दृष्टांत को BNS के अध्याय 3 (सामान्य अपवाद / General Exceptions) के अधीन समझा जाएगा।
धारा 3(2) - पदों की एकसमान व्याख्या (Sense of Expression once Explained)- जिस पद या शब्द को इस संहिता के किसी एक भाग में स्पष्ट कर दिया गया है, उसका वही अर्थ संहिता के अन्य सभी भागों में भी माना जाएगा।
धारा 3(3) - कार्य और लोप (Acts and Omissions) - जहाँ कहीं किसी कार्य (Act) का उल्लेख है, उसमें विधि द्वारा अपेक्षित कर्तव्य को न करना यानी लोप (Illegal Omission) भी शामिल माना जाएगा।
धारा 3(4) - सामान्य आशय (Common Intention - पूर्ववर्ती IPC धारा 34) - जब कोई आपराधिक कार्य कई व्यक्तियों द्वारा अपने सामान्य आशय को अग्रसर करने (In furtherance of the common intention) के उद्देश्य से किया जाता है, तो उनमें से प्रत्येक व्यक्ति उस कार्य के लिए उसी प्रकार उत्तरदायी होगा, मानो वह कार्य उसने अकेले ही किया हो।
धारा 3(5) - आपराधिक ज्ञान या आशय से किया गया कार्य (पूर्ववर्ती IPC धारा 35) - जब कोई कार्य केवल इस कारण आपराधिक माना जाता है कि वह किसी विशेष आपराधिक ज्ञान या आशय से किया गया है, और वह कार्य कई व्यक्तियों द्वारा किया जाता है, तो प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने विशिष्ट ज्ञान या आशय की सीमा तक ही उत्तरदायी होगा।
धारा 3(6) - विभिन्न अपराधों के दोषी (पूर्ववर्ती IPC धारा 38)- जहाँ कई व्यक्ति किसी आपराधिक कार्य को करने में लगे हुए हैं, वहाँ वे उस कार्य के आधार पर भिन्न-भिन्न अपराधों (Different offences) के दोषी हो सकते हैं (जैसे—एक व्यक्ति हत्या का दोषी हो सकता है जबकि दूसरा केवल गंभीर उपहति का)।
मुख्य बिंदु - धारा 3(4) संयुक्त दायित्व (Joint Liability) का प्रमुख आधार है। किसी अपराध में केवल घटनास्थल पर सक्रिय भूमिका न होने पर भी, यदि व्यक्ति पूर्व-नियोजित सामान्य आशय (Pre-arranged plan) में शामिल था, तो वह पूर्ण अपराध का दोषी माना जाता है।
धारा 04 -
धारा 4 में अपराधियों को दिए जाने वाले दंड (Punishments) के प्रकारों का वर्गीकरण किया गया है। BNS में दंडात्मक न्याय (Retributive Justice) के साथ-साथ सुधारात्मक न्याय (Reformative Justice) पर विशेष बल दिया गया है।
इसके तहत दंड के प्रकार -
BNS की धारा 4 में कुल 6 प्रकार के दंड निर्धारित किए गए हैं -
1. मृत्युदंड (Death Penalty)
2. आजीवन कारावास (Imprisonment for Life) - व्यक्ति के शेष प्राकृतिक जीवनकाल (Remainder of natural life) तक कारावास।
3. कारावास (Imprisonment) - यह दो प्रकार का होता है:
A. कठिन कारावास (Rigorous Imprisonment) - जिसमें कठोर श्रम कराया जाता है।
B. सादा कारावास (Simple Imprisonment) - बिना श्रम के कारावास।
4. संपत्ति का समपहरण (Forfeiture of Property)
5. जुर्माना (Fine)
6. सामुदायिक सेवा (Community Service) (नया प्रावधान) -
इसका प्रावधान सामुदायिक सेवा भारतीय आपराधिक कानून में पहली बार वैधानिक दंड के रूप में शामिल की गई है। इसका उद्देश्य छोटे-मोटे अपराधों में संलिप्त पहली बार के अपराधियों को जेल में बंद करने के बजाय समाज के लिए बिना वेतन उपयोगी सेवा करवाकर सुधारने का अवसर देना और जेलों में भीड़ कम करना है।
परिभाषा (धारा 23 का स्पष्टीकरण) - न्यायालय द्वारा दंड के रूप में सौंपा गया ऐसा कार्य जिससे समाज को लाभ हो, और जिसके बदले दोषी को कोई पारिश्रमिक/वेतन न दिया जाए।
BNS में वे 6 अपराध जिनमें सामुदायिक सेवा का दंड दिया जा सकता है -
धारा 202 - लोक सेवक द्वारा विधि-विरुद्ध रूप से व्यापार में शामिल होना।
धारा 209 - उद्घोषणा (Proclamation under BNSS) के उत्तर में न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष उपस्थित न होना।
धारा 226 - किसी वैध शक्ति का प्रयोग करने या रोकने के लिए आत्महत्या का प्रयास करना।
धारा 303(2) - 5,000 रुपये से कम मूल्य की संपत्ति की चोरी (यदि चोरी गई संपत्ति वापस लौटा दी गई हो और पहली बार अपराध हो)।
धारा 355 - नशे की हालत में सार्वजनिक स्थान पर अभद्र आचरण करना (Misconduct in public by a drunken person)।
धारा 356(2) - मानहानि (Defamation) के मामले।
सामुदायिक सेवा न करने पर परिणाम (Default Clause) - BNS की धारा 8 के अनुसार, यदि कोई दोषी न्यायालय द्वारा दी गई सामुदायिक सेवा को पूरा करने में विफल रहता है या इनकार करता है, तो न्यायालय उसे सादा कारावास (Simple Imprisonment) की सजा सुना सकता है।
धारा 07 -
भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 6 एकांत परिरोध (Solitary Confinement) के प्रावधानों से संबंधित है। यह पूर्ववर्ती IPC की धारा 73 का प्रतिरूप है। जब किसी अपराधी को ऐसे अपराध के लिए दोषी ठहराया जाता है जिसमें न्यायालय को उसे कठिन कारावास (Rigorous Imprisonment) देने की शक्ति है, तो न्यायालय अपने दंडादेश (Sentence) में यह आदेश दे सकता है कि दोषी को उसके कारावास के कुल समय के कुछ भाग के लिए एकांत में रखा जाए। एकांत परिरोध की अधिकतम सीमा (Scale of Solitary Confinement)
धारा 6 के अनुसार, एकांत परिरोध की कुल अवधि किसी भी दशा में 3 मास (3 Months) से अधिक नहीं हो सकती। इसे निम्नलिखित पैमाने के अनुसार तय किया जाता है -
यदि कारावास की कुल अवधि है तो एकांत परिरोध की अधिकतम सीमा।
6 मास तक पर1 मास से अधिक नहीं।
6 मास से अधिक और 1 वर्ष तक हो तो 2 मास से अधिक नहीं।
1 वर्ष से अधिक हो तो 3 मास से अधिक नहीं।
मुख्य शर्तें एवं कानूनी नियम -
केवल कठिन कारावास में लागू - एकांत परिरोध का दंडादेश केवल उन्हीं मामलों में दिया जा सकता है जहाँ कारावास कठिन (Rigorous) हो। सादा कारावास (Simple Imprisonment) में यह नहीं दिया जा सकता।
अंतिम सीमा - पूरी सजा के दौरान कुल एकांत परिरोध किसी भी स्थिति में 3 महीने से ज्यादा नहीं हो सकती।
धारा 7 से संबंध - धारा 6 में कुल समय सीमा दी गई है, जबकि इसके निष्पादन का तरीका और अंतराल (Execution & Limits) BNS की धारा 7 में तय किया गया है (जैसे एक बार में लगातार 14 दिन से अधिक नहीं)।
धारा 8 -
भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 8 मुख्य रूप से जुर्माने की रकम, जुर्माना न देने पर कारावास (Default of payment of fine), तथा सामुदायिक सेवा न करने पर दायित्व से संबंधित नियमों को निर्धारित करती है। IPC में जो प्रावधान धारा 63 से धारा 70 तक अलग-अलग धाराओं में फैले हुए थे, BNS में उन सभी को एक ही जगह धारा 8 की उप-धाराओं में समेकित कर दिया गया है।
BNS धारा 8 के प्रमुख बिंदु एवं उप-धाराएं
जुर्माने की रकम (Amount of Fine) उप-धारा (1) - जहाँ किसी अपराध के लिए जुर्माने की कोई निश्चित अधिकतम राशि नहीं बताई गई है, वहाँ जुर्माना असीमित (Unlimited) हो सकता है, परंतु वह अत्यधिक (Excessive) नहीं होना चाहिए।
जुर्माना न देने पर कारावास का आदेश उप-धारा (2) - यदि किसी अपराधी पर जुर्माना लगाया जाता है, तो न्यायालय यह निर्देश दे सकता है कि यदि अपराधी जुर्माना नहीं भरता है, तो उसे एक निश्चित अवधि का कारावास भुगतना होगा।
3. कारावास की अधिकतम सीमा (1/4th Rule) उप-धारा (3) - यदि कोई अपराध कारावास और जुर्माना दोनों से दंडनीय है, तो जुर्माना न चुकाने की स्थिति में दिया जाने वाला कारावास उस अपराध के लिए निर्धारित अधिकतम कारावास की अवधि के एक-चौथाई (One fourth /1/4) से अधिक नहीं होगा।
4. डिफ़ॉल्ट कारावास की प्रकृति – उप-धारा (4) - जुर्माना न देने या सामुदायिक सेवा न करने की दशा में दिया जाने वाला कारावास उसी प्रकार का (कठिन या सादा) हो सकता है, जिसके लिए उस अपराध में सजा दी जा सकती थी।
5. केवल जुर्माना या सामुदायिक सेवा से दंडनीय मामलों में पैमाना उप-धारा (5) -
यदि अपराध केवल जुर्माने या सामुदायिक सेवा से दंडनीय है, तो जुर्माना न देने पर कारावास सादा (Simple) होगा और उसकी अवधि निम्नलिखित होगी -
जुर्माने की राशि - डिफ़ॉल्ट कारावास की अधिकतम अवधि
₹5,000 तक - 2 मास तक
₹10,000 तक - 4 मास तक
₹10,000 से अधिक - 1 वर्ष तक
6. जुर्माना चुकाने पर कारावास का समापन – उप-धारा (6) व (7) -
• जैसे ही जुर्माना भर दिया जाता है या कानूनन वसूल कर लिया जाता है, डिफ़ॉल्ट कारावास समाप्त हो जाएगा।
• यदि जुर्माने का कुछ हिस्सा चुका दिया जाता है, तो कारावास की अवधि उसी अनुपात (Proportion) में घटा दी जाएगी और शेष राशि के बराबर समय पूरा होते ही कैदी को रिहा कर दिया जाएगा।
7. जुर्माना वसूली की समयावधि उप-धारा (8) -
• जुर्माना दंडादेश पारित होने की तिथि से 6 वर्ष के भीतर कभी भी वसूला जा सकता है। यदि मुख्य सजा 6 वर्ष से अधिक की है, तो उस पूरी अवधि के दौरान कभी भी वसूली की जा सकती है।
• अपराधी की मृत्यु होने पर भी उसकी संपत्ति जुर्माने की देयता से मुक्त नहीं होती।
धारा 09 -
भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 9 ऐसे मामलों में दंड की सीमा तय करती है जहाँ कोई अपराध कई छोटे-छोटे कार्यों से मिलकर बना हो, या जहाँ एक ही कृत्य से कई अपराध बनते हों। यह पूर्ववर्ती IPC की धारा 71 का प्रतिरूप है।
धारा 9 के प्रमुख सिद्धांत एवं नियम -
1. कई कार्यों से मिलकर बने अपराध के लिए दंड की सीमा - जहाँ कोई अपराध ऐसे कई भागों या कार्यों से मिलकर बनता है जिनमें से प्रत्येक भाग अपने आप में एक अलग अपराध है, वहाँ अपराधी को उन सभी भागों के लिए अलग-अलग जोड़कर दंड नहीं दिया जाएगा, जब तक कि विधि में स्पष्ट रूप से ऐसा उपबंध न हो।
दृष्टांत (Illustration) - यदि 'क' (A) लाठी से 'ख' (B) पर 50 प्रहार करता है, तो यद्यपि प्रत्येक प्रहार अपने आप में स्वेच्छापूर्वक उपहति (Hurt) पहुँचाने का अलग अपराध है, फिर भी 'क' को 50 अलग-अलग अपराधों की सजा नहीं दी जाएगी। उसे पूरे कृत्य के लिए केवल एक बार ही स्वेच्छापूर्वक उपहति का दंड दिया जाएगा।
2. विभिन्न परिभाषाओं या वैकल्पिक अपराधों के अंतर्गत आने वाले मामले
जहाँ कोई कार्य -
• दो या अधिक अलग-अलग अपराधों की परिभाषा के अंतर्गत आता है, अथवा
• कई कृत्यों से मिलकर बनता है, जिनमें से एक या कई कृत्य स्वतंत्र रूप से भी अपराध हैं,
वहाँ अपराधी को उस न्यायालय द्वारा विचारित अपराधों में से सबसे कठोर दंड (Heaviest punishment) वाले अपराध की निर्धारित सजा से अधिक दंडित नहीं किया जा सकता।
मुख्य उद्देश्य - धारा 9 का मूल उद्देश्य अपराधी को एक ही वास्तविक घटना या श्रृंखला के लिए अनुचित रूप से बार-बार (Multiple sentences) जोड़कर अत्यधिक दंड दिए जाने से बचाना है।
धारा 10 -
भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 10 उन मामलों में दिए जाने वाले दंड का निर्धारण करती है जहाँ न्यायालय के निर्णय में यह संदेह (Doubt) होता है कि अभियुक्त ने कई विनिर्दिष्ट अपराधों में से वास्तव में कौन-सा अपराध किया है।
यह पूर्ववर्ती IPC की धारा 72 का प्रतिरूप है।
धारा 10 का मूल सिद्धांत - जब किसी आपराधिक मामले के निर्णय (Judgment) में यह निष्कर्ष निकलता है कि अभियुक्त ने विनिर्दिष्ट अपराधों में से कोई एक अपराध अवश्य किया है, परंतु यह संदेह बना रहता है कि उसने उन अपराधों में से निश्चित रूप से कौन-सा अपराध किया है तो
नियम - ऐसे मामले में अभियुक्त को उन अपराधों में से उस अपराध के लिए दंडित किया जाएगा, जिसके लिए सबसे कम दंड (Lowest Punishment) का उपबंध किया गया है (बशर्ते उन सभी अपराधों के लिए समान दंड न हो)।
व्यावहारिक दृष्टांत (Illustration) - परिस्थिति - अभियुक्त 'क' (A) पर चोरी (Theft) अथवा चोरी की संपत्ति प्राप्त करने (Receiving Stolen Property) का वैकल्पिक आरोप है।
साक्ष्य की स्थिति - साक्ष्य से यह तो पूर्णतः सिद्ध हो जाता है कि उसने इन दोनों में से एक अपराध अवश्य किया है, परंतु यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि वह स्वयं चोरी करने वाला चोर है या केवल चोरी का माल खरीदने वाला।
दंडादेश - न्यायालय उसे उन दोनों अपराधों में से उस अपराध का दंड देगा जिसकी अधिकतम सजा कम (Lowest) होगी।
मुख्य कानूनी उद्देश्य - अभियुक्त के हित में संशय का लाभ - चूँकि यह निश्चित नहीं है कि गंभीर वाला अपराध हुआ है या कम गंभीर वाला, इसलिए कानून न्याय के सिद्धांत के तहत अभियुक्त को उस अपराध की सजा देता है जिसमें न्यूनतम दंड निर्धारित हो।
सामान्य आशय (Common Intention) -
भारतीय आपराधिक विधि (भारतीय दंड संहिता की धारा 34 / भारतीय न्याय संहिता की धारा 3(5)) का एक मूलभूत सिद्धांत है। यह कोई स्वतंत्र अपराध नहीं बनाता, बल्कि संयुक्त दायित्व (Joint Liability) का एक साक्ष्य संबंधी नियम प्रतिपादित करता है। इसके अनुसार, जब कोई आपराधिक कार्य कई व्यक्तियों द्वारा अपने सामान्य आशय को अग्रसर करने के लिए किया जाता है, तब उनमें से प्रत्येक व्यक्ति उस कार्य के लिए उसी प्रकार उत्तरदायी होता है मानो वह कार्य अकेले उसी ने किया हो।
सामान्य आशय के आवश्यक तत्व -
• दो या अधिक व्यक्तियों का होना - किसी कार्य को सामान्य आशय से करने के लिए कम से कम दो व्यक्तियों का शामिल होना अनिवार्य है।
• मस्तिष्क का पूर्व मिलन (Prior Meeting of Minds) - घटना घटित होने से पहले या घटना स्थल पर ही सभी अभियुक्तों के बीच एक पूर्व-नियोजित योजना या सहमति का होना जरूरी है।
• सामान्य आशय को अग्रसर करना - किया गया आपराधिक कृत्य उसी साझा योजना या सहमति के निष्पादन में होना चाहिए।
• सक्रिय भागीदारी (Active Participation) - अपराध के निष्पादन में प्रत्येक व्यक्ति की किसी न किसी रूप में भौतिक या प्रत्यक्ष भागीदारी होनी चाहिए (चाहे वह केवल बाहर पहरा देना ही क्यों न हो)।
प्रमुख ऐतिहासिक वाद (Leading Cases) -
बरेंद्र कुमार घोष बनाम किंग एम्परर (1925) - पोस्ट मास्टर वाद - प्रिवी काउंसिल ने स्पष्ट किया कि वे भी सेवा करते हैं जो केवल खड़े रहते हैं और प्रतीक्षा करते हैं। यदि कोई व्यक्ति अपराध स्थल पर केवल पहरा दे रहा था ताकि अन्य साथी हत्या कर सकें, तो वह भी धारा 34 के तहत समान रूप से हत्या का दोषी माना जाएगा।
महबूब शाह बनाम किंग एम्परर (1945) - सिंधु नदी वाद - इस वाद में अदालत ने सामान्य आशय (Common Intention) और समान आशय (Similar Intention) के बीच अंतर स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि केवल एक जैसा आशय होना पर्याप्त नहीं है, अभियुक्तों के बीच पूर्व-विचार-विमर्श या मस्तिष्क का मिलन सिद्ध होना अनिवार्य है।
तथ्य - सिंधु नदी के किनारे नरकट (Reeds) काटने को लेकर विवाद हुआ। जब पीड़ित पक्ष के लोगों ने हमला किया, तो बचाव में वली मोहम्मद और महबूब शाह दोनों बंदूकें लेकर आए और दोनों ने गोलियां चलाईं। वली मोहम्मद की गोली से एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई, जबकि महबूब शाह की गोली से दूसरा व्यक्ति घायल हुआ।
निर्णय - अदालत ने पाया कि यद्यपि दोनों का इरादा गोली चलाने का था (समान आशय), लेकिन उनके बीच पहले से कोई पूर्व-नियोजित योजना या साझा सहमति (सामान्य आशय) सिद्ध नहीं हुई थी। अतः महबूब शाह को हत्या के संयुक्त दायित्व (धारा 34) से मुक्त किया गया और केवल उसके अपने कृत्य (हत्या के प्रयास) के लिए दंडित किया गया।
समान आशय (Similar Intention) - का अर्थ है जब दो या दो से अधिक व्यक्तियों का आपराधिक इरादा या उद्देश्य एक जैसा (एक रूप) होता है, लेकिन उनके बीच आपसी सहमति, पूर्व-नियोजित योजना या मस्तिष्क का मिलन (Meeting of Minds) नहीं होता। समान आशय में प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने स्वतंत्र इरादे से कार्य करता है। वे एक ही समय पर एक ही व्यक्ति के विरुद्ध अपराध कर सकते हैं, किंतु उन्होंने पहले से मिलकर वह योजना नहीं बनाई होती।
मुख्य विशेषताएं -
स्वतंत्र इरादा (Independent Intention) - प्रत्येक अभियुक्त का अपना अलग विचार और मकसद होता है, जो संयोगवश दूसरे अभियुक्त के जैसा ही हो सकता है।
मस्तिष्क के मिलन का अभाव - अभियुक्तों के बीच कार्य से पहले या कार्य के दौरान किसी भी प्रकार का पूर्व-विचार-विमर्श या साझा सहमति नहीं होती।
व्यक्तिगत दायित्व (Individual Liability) - समान आशय के मामलों में संयुक्त दायित्व (धारा 34 IPC / धारा 3(5) BNS) लागू नहीं होता। प्रत्येक अभियुक्त केवल अपने द्वारा किए गए व्यक्तिगत कृत्य के लिए ही उत्तरदायी होता है।
सामान्य आशय बनाम समान आशय
आधार - सामान्य आशय - समान आशय
अंग्रेजी नाम -Common Intention - Similar Intention)
मस्तिष्क का मिलन - अनिवार्य (पूर्व योजना या मौके पर बनी सहमति) - अनुपस्थित (कोई साझा योजना नहीं होती)।
दायित्व का सिद्धांत - संयुक्त दायित्व (एक का किया कार्य सबका माना जाता है)। - व्यक्तिगत दायित्व (जिसने जितना किया, उतना ही उत्तरदायी)। |
लागू धारा - धारा 34 IPC / धारा 3(5) BNS लागू होती है - सामान्य अपराध की धारा लागू
पूर्व योजना - आवश्यक - आवश्यक नहीं
उद्देश्य - विधि विरुद्ध जमाव - अपराध के निष्पादन में जमाव।
सामान्य उद्देश्य (Common Object) - भारतीय आपराधिक विधि में प्रतिनिधिक/संयुक्त दायित्व (Constructive/Joint Liability) का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जिसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 149 (भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 190) में परिभाषित किया गया है।
इसका मूल नियम यह है कि यदि किसी विधि-विरुद्ध जमाव (Unlawful Assembly) द्वारा उसके सामान्य उद्देश्य को पूरा करने के दौरान कोई अपराध किया जाता है, तो उस जमाव का प्रत्येक सदस्य उस अपराध का दोषी माना जाता है।
सामान्य उद्देश्य के आवश्यक तत्व
• विधि-विरुद्ध जमाव (धारा 141 IPC / धारा 189 BNS) - कम से कम 5 या उससे अधिक व्यक्तियों का एक साथ होना अनिवार्य है।
• साझा उद्देश्य - सभी सदस्यों का उद्देश्य धारा 141 में निर्दिष्ट 5 विधिक श्रेणियों में से कोई एक होना चाहिए (जैसे - लोक सेवक पर बल प्रयोग, विधि के निष्पादन में बाधा, दृष्टि या आपराधिक अतिचार, किसी संपत्ति पर सदोष कब्जा, किसी को अवैध कार्य के लिए विवश करना)।
• अपराध का सामान्य उद्देश्य के अग्रसरण में होना - किया गया आपराधिक कृत्य सामान्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ हो, या ऐसा अपराध हो जिसके घटित होने की संभावना का ज्ञान सदस्यों को पहले से था।
• जमाव की सदस्यता - अभियुक्त को उस समय विधि-विरुद्ध जमाव का सक्रिय या सहमति प्राप्त सदस्य होना चाहिए जब वह अपराध हुआ।
मुख्य सिद्धांत एवं विशेषताएं -
• स्वतंत्र अपराध का सृजन - सामान्य आशय (धारा 34) की तरह यह केवल साक्ष्य का नियम नहीं है, धारा 149 अपने आप में एक विशिष्ट और स्वतंत्र अपराध बनाती है।
• सक्रिय शारीरिक भागीदारी अनिवार्य नहीं - यदि कोई व्यक्ति केवल एक विधि-विरुद्ध जमाव का सदस्य बना रहता है और जानता है कि जमाव का उद्देश्य क्या है, तो भले ही उसने स्वयं अपने हाथ से कोई चोट न पहुंचाई हो, वह मुख्य अपराध के लिए समान रूप से दंडनीय होगा।
• पूर्व-नियोजित योजना की आवश्यकता नहीं - सामान्य आशय के विपरीत यहाँ मस्तिष्क का पूर्व-मिलन आवश्यक नहीं है। सामान्य उद्देश्य मौके पर भी विकसित हो सकता है।
प्रमुख वाद (Leading Cases) -
कमता प्रसाद बनाम स्टेट ऑफ यूपी (1977) - न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 149 के तहत किसी अभियुक्त को दोषी ठहराने के लिए यह साबित करना जरूरी नहीं है कि उसने कोई विशेष घातक वार किया था, केवल उस विधि-विरुद्ध जमाव का हिस्सा होना और उसके उद्देश्य की जानकारी होना ही दायित्व के लिए पर्याप्त है।
मुजरिम खां बनाम स्टेट ऑफ यूपी - अदालत ने निर्णय दिया कि यदि 5 व्यक्तियों में से 2 या 3 बरी हो जाते हैं और सदस्यों की संख्या 5 से कम रह जाती है, तो धारा 149 लागू नहीं होगी, जब तक कि यह साबित न हो कि अज्ञात व्यक्ति भी उस जमाव में शामिल थे।
सामान्य आशय बनाम सामान्य उद्देश्य में संक्षिप्त अंतर -
आधार - सामान्य आशय - सामान्य उद्देश्य
अंग्रेजी नाम - Common Intention - Common Object
धारा IPC धारा 34 (BNS धारा 3(5)) - IPC धारा 149 (BNS धारा 190)
न्यूनतम संख्या - कम से कम 2 व्यक्ति - कम से कम 5 व्यक्ति (विधि-विरुद्ध जमाव)
मस्तिष्क का मिलन - पूर्व-नियोजित योजना अनिवार्य है - पूर्व-योजना जरूरी नहीं, उद्देश्य साझा होना चाहिए।
सक्रिय भागीदारी - अपराध के निष्पादन में भागीदारी अनिवार्य - केवल विधि-विरुद्ध जमाव का सदस्य होना पर्याप्त।
प्रकृति - केवल दायित्व का नियम (स्वतंत्र अपराध नहीं) - एक विशिष्ट एवं स्वतंत्र अपराध का सृजन करता है।
विधि विरुद्ध जमाव -
विधि-विरुद्ध जमाव (Unlawful Assembly) भारतीय दंड कानून में एक महत्वपूर्ण अपराध है। वर्तमान में इसका प्रावधान भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) में है, जिसने IPC को प्रतिस्थापित किया है।
विधि-विरुद्ध जमाव का अर्थ - BNS की धारा 187 के अनुसार, जब पाँच या पाँच से अधिक व्यक्तियों का ऐसा जमाव हो जिसका कोई सामान्य उद्देश्य (Common Object) कानून द्वारा निषिद्ध उद्देश्यों में से कोई हो, तो वह विधि-विरुद्ध जमाव कहलाता है। इसकी मूल अवधारणा 5 या अधिक व्यक्ति + सामान्य उद्देश्य + कानून द्वारा निषिद्ध उद्देश्य = विधि-विरुद्ध जमाव
केवल पाँच या अधिक लोगों का एकत्र होना अपराध नहीं है। उनके बीच ऐसा सामान्य उद्देश्य होना आवश्यक है जो कानून के विरुद्ध हो।
विधि-विरुद्ध जमाव के आवश्यक तत्व -
पाँच या अधिक व्यक्ति -
• जमाव में कम-से-कम पाँच व्यक्ति होने चाहिए।
• यदि केवल चार व्यक्ति हैं, तो इस विशेष अपराध के लिए unlawful assembly नहीं बनेगी।
जमाव होना - लोगों का किसी स्थान पर इस प्रकार एकत्र होना आवश्यक है कि उनके बीच कोई सामूहिक उद्देश्य हो। हर भीड़ विधि-विरुद्ध जमाव नहीं होती।
उदाहरण - पाँच लोग किसी सार्वजनिक स्थान पर बातचीत कर रहे हैं, तो मात्र इस कारण वे विधि-विरुद्ध जमाव नहीं हैं।
सामान्य उद्देश्य (Common Object) - यह सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। सभी सदस्यों का उद्देश्य एक जैसा या साझा होना चाहिए। यह आवश्यक नहीं कि सभी सदस्यों ने समान कार्य किया हो। यदि वे किसी साझा उद्देश्य की पूर्ति के लिए एकत्र हुए हैं, तो परिस्थितियों के अनुसार पूरा जमाव उत्तरदायी हो सकता है।
विधि-विरुद्ध सामान्य उद्देश्य - BNS में सामान्य उद्देश्य निम्न प्रकार का हो सकता है -
(1) सरकार या लोक सेवक को आपराधिक बल से भयभीत करना - यदि पाँच या अधिक व्यक्ति सरकार या किसी लोक सेवक को उसके वैध कार्य से रोकने के लिए आपराधिक बल या बल-प्रदर्शन का प्रयोग करने के उद्देश्य से एकत्र हों।
(2) कानून या कानूनी प्रक्रिया के निष्पादन का विरोध - यदि जमाव का उद्देश्य किसी कानून या कानूनी प्रक्रिया को लागू होने से रोकना हो।
(3) अपराध करना - यदि जमाव का सामान्य उद्देश्य किसी अपराध, आपराधिक अतिचार या अन्य अपराध को करना हो।
(4) किसी व्यक्ति की संपत्ति पर कब्जा करना - यदि जमाव का उद्देश्य किसी व्यक्ति को संपत्ति से वंचित करना, संपत्ति का कब्जा लेना, रास्ते या अन्य अधिकार से वंचित करना हो।
(5) किसी व्यक्ति को ऐसा काम करने या न करने के लिए मजबूर करना - यदि जमाव का उद्देश्य किसी व्यक्ति को कानूनन बाध्य न होने वाले कार्य को करने के लिए बलपूर्वक मजबूर करना, अथवा वह कार्य करने से रोकना हो जिसे वह कानूनी रूप से करने का अधिकार रखता है।
सामान्य उद्देश्य और सामान्य आशय में अंतर -
Common Object विधि-विरुद्ध जमाव में सामान्य उद्देश्य की अवधारणा लागू होती है।
Common Intention - यह आपराधिक षड्यंत्र/साझा आशय जैसी अन्य आपराधिक अवधारणाओं से संबंधित है।
Common Object के लिए पाँच या अधिक व्यक्तियों का होना आवश्यक है, जबकि common intention के संदर्भ में ऐसा पाँच व्यक्तियों वाला नियम नहीं है।
विधि-विरुद्ध जमाव के सदस्य - यदि कोई व्यक्ति जमाव के अस्तित्व में आने के समय उसका सदस्य बनता है, या बाद में जानबूझकर उसमें शामिल होता है और उसे उस जमाव के सामान्य उद्देश्य का ज्ञान है, तो वह परिस्थितियों के अनुसार उसका सदस्य माना जा सकता है।
सामान्य उद्देश्य के लिए सामूहिक दायित्व - विधि-विरुद्ध जमाव का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि जमाव के प्रत्येक सदस्य का दायित्व केवल उसके अपने व्यक्तिगत कृत्य तक सीमित नहीं रहता।
यदि किसी सदस्य द्वारा ऐसा अपराध किया जाता है -
1. जो उस जमाव के सामान्य उद्देश्य को पूरा करने के लिए किया गया हो, या
2. जिसे जमाव के सदस्यों को यह पता था कि उस सामान्य उद्देश्य की पूर्ति में किए जाने की संभावना है,
तो कानून के अनुसार उस समय जमाव का सदस्य रहा प्रत्येक व्यक्ति उस अपराध के लिए उत्तरदायी हो सकता है।
उदाहरण - पाँच लोग किसी व्यक्ति को उसकी जमीन से बलपूर्वक हटाने के सामान्य उद्देश्य से एकत्र होते हैं। उनमें से एक व्यक्ति हिंसा करता है और गंभीर अपराध कर देता है। यदि वह कृत्य उनके सामान्य उद्देश्य का हिस्सा था या सदस्यों को उसके होने की संभावना का ज्ञान था, तो अन्य सदस्य भी परिस्थितियों के अनुसार उस अपराध के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं।
क्या हर सदस्य को अपराध करना जरूरी है - नहीं। यही इस सिद्धांत की विशेषता है। पाँच लोग विधि-विरुद्ध जमाव में हैं और उनमें से केवल एक व्यक्ति वास्तविक हिंसा करता है। यदि सामूहिक दायित्व की आवश्यक शर्तें पूरी हैं, तो अन्य सदस्य भी उत्तरदायी हो सकते हैं। लेकिन सिर्फ भीड़ में मौजूद होना हर स्थिति में स्वतः दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को यह स्थापित करना होता है कि व्यक्ति जमाव का सदस्य था और संबंधित कानूनी शर्तें पूरी होती हैं।
विधि-विरुद्ध जमाव और दंगा -
विधि-विरुद्ध जमाव - 5 या अधिक व्यक्ति + निषिद्ध सामान्य उद्देश्य
दंगा - जब ऐसा विधि-विरुद्ध जमाव या उसका कोई सदस्य अपने सामान्य उद्देश्य की पूर्ति में बल या हिंसा का प्रयोग करता है, तो परिस्थितियों के अनुसार वह दंगा (Rioting) बन सकता है।
इसलिए हर दंगा = विधि-विरुद्ध जमाव से संबंधित हो सकता है, लेकिन हर विधि-विरुद्ध जमाव = दंगा नहीं होता है।
उदाहरण - मान लीजिए पाँच लोग किसी व्यक्ति को उसकी जमीन से बलपूर्वक हटाने के उद्देश्य से एकत्र होते हैं।
स्थिति 1 - वे केवल एकत्र हुए हैं, लेकिन अभी बल या हिंसा का प्रयोग नहीं हुआ।
➡️ परिस्थितियों के अनुसार विधि-विरुद्ध जमाव हो सकता है।
स्थिति 2 - वे व्यक्ति पर हमला करने लगते हैं।
➡️ दंगा का प्रश्न उत्पन्न हो सकता है।
स्थिति 3 - उनमें से एक सदस्य गंभीर अपराध करता है।
➡️ अन्य सदस्यों की भी सामूहिक आपराधिक जिम्मेदारी उत्पन्न हो सकती है, यदि BNS में निर्धारित सामान्य उद्देश्य/ज्ञान की शर्तें पूरी हों।
विधि-विरुद्ध जमाव और शांतिपूर्ण प्रदर्शन - यह बहुत महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलू है। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(b) नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्र होने का अधिकार देता है। इसलिए हर प्रदर्शन, जुलूस या सभा विधि-विरुद्ध जमाव नहीं होती। यदि लोग शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के अपने वैध अधिकारों के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं, तो केवल उनकी संख्या पाँच या उससे अधिक होने से वे unlawful assembly नहीं बन जाते। लेकिन यदि जमाव का उद्देश्य कानून द्वारा निषिद्ध है या परिस्थितियों में वह आवश्यक कानूनी सीमा पार कर देता है, तो आपराधिक दायित्व उत्पन्न हो सकता है।
यदि कोई सभा शांतिपूर्ण है और उसमें बल या हिंसा नहीं है, तो केवल लोगों की संख्या अधिक होने से वह दंगा नहीं बन जाती।
हाँ, यदि सभा का स्वरूप कानूनन निषिद्ध हो जाता है और सामान्य उद्देश्य की पूर्ति में बल या हिंसा का प्रयोग होता है, तो BNS के अंतर्गत दंगे का अपराध बन सकता है।
अतः - विधि-विरुद्ध जमाव वह जमाव है जिसमें पाँच या पाँच से अधिक व्यक्ति किसी ऐसे सामान्य उद्देश्य से एकत्र होते हैं जो कानून द्वारा निषिद्ध है। भारतीय न्याय संहिता, 2023 में इसके संबंध में प्रावधान किया गया है। इसके प्रमुख तत्व हैं: पाँच या अधिक व्यक्तियों का जमाव, सामान्य उद्देश्य तथा उस उद्देश्य का कानून द्वारा निषिद्ध होना। ऐसे जमाव के सदस्य कुछ परिस्थितियों में सामूहिक रूप से उन अपराधों के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं जो सामान्य उद्देश्य की पूर्ति में किए गए हों अथवा जिनके किए जाने की संभावना का सदस्यों को ज्ञान हो।
बलवा/दंगा -
बलवा/दंगा (Rioting) भारतीय दंड कानून में विधि-विरुद्ध जमाव से जुड़ा अपराध है। वर्तमान में इसका प्रावधान भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 191में है।
बलवा/दंगा की परिभाषा - BNS की धारा 191 के अनुसार, जब विधि-विरुद्ध जमाव (unlawful assembly) या उसका कोई सदस्य उस जमाव के सामान्य उद्देश्य की पूर्ति में बल या हिंसा का प्रयोग करता है, तो उस जमाव का प्रत्येक सदस्य बलवा/दंगा करने का दोषी होता है।
सूत्र - विधि-विरुद्ध जमाव + बल या हिंसा = बलवा/दंगा
बलवा/दंगे के आवश्यक तत्व -
• न्यूनतम 5 व्यक्तियों का जमाव - विधि-विरुद्ध कम-से-कम 5 व्यक्तियों का ऐसा जमाव होना चाहिए
• सामान्य उद्देश्य - जमाव का सामान्य उद्देश्य कानून द्वारा निषिद्ध हो। इसलिए केवल पाँच व्यक्तियों का एकत्र होना दंगा नहीं है।
• बल या हिंसा का प्रयोग - जमाव के किसी सदस्य द्वारा बल (Force) या हिंसा (Violence) का प्रयोग होना आवश्यक है। यह बल या हिंसा किसी व्यक्ति, संपत्ति
या परिस्थितियों के अनुसार सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली गतिविधि में हो सकती है।
सामान्य उद्देश्य की पूर्ति - बल या हिंसा का प्रयोग उस सामान्य उद्देश्य को पूरा करने के लिए होना चाहिए जिसके लिए जमाव हुआ था। यही दंगा और सामान्य विधि-विरुद्ध जमाव के बीच मुख्य अंतर है।
उदाहरण - मान लीजिए छह लोग किसी व्यक्ति को उसकी जमीन से जबरदस्ती हटाने के उद्देश्य से एकत्र होते हैं।
स्थिति 1 - छह लोग केवल वहाँ खड़े हैं और कोई बल या हिंसा नहीं हुई।
➡️ परिस्थितियों के अनुसार विधि-विरुद्ध जमाव हो सकता है, लेकिन दंगा आवश्यक रूप से नहीं।
स्थिति 2 - उनमें से एक व्यक्ति उस व्यक्ति को धक्का देता है और बाकी लोग भी उसी उद्देश्य से बल प्रयोग करते हैं।
➡️ बलवा/दंगा बन सकता है, महत्वपूर्ण बात यह है कि हर सदस्य को स्वयं हिंसा करना आवश्यक नहीं है। यदि कानूनी शर्तें पूरी हैं, तो जमाव का प्रत्येक सदस्य दंगे के लिए उत्तरदायी हो सकता है।
बलवा और विधि-विरुद्ध जमाव में अंतर
दंगे में सामूहिक दायित्व - दंगे का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि यदि विधि-विरुद्ध जमाव का कोई सदस्य सामान्य उद्देश्य की पूर्ति में बल या हिंसा करता है, तो जमाव के अन्य सदस्य भी दंगे के लिए उत्तरदायी हो सकते हैं, भले ही प्रत्येक व्यक्ति ने स्वयं बल का प्रयोग न किया हो।
इसका आधार यह है कि वे उस समय उस विधि-विरुद्ध जमाव के सदस्य थे।
दंगे के विभिन्न रूप - BNS में परिस्थितियों के अनुसार दंगे के लिए अलग-अलग दंडात्मक प्रावधान हैं। उदाहरणत -
• सामान्य रूप से दंगा करना।
• घातक हथियार या ऐसी वस्तु के साथ दंगा करना जिससे मृत्यु होने की संभावना हो।
• पुलिस या लोक सेवक आदि के संदर्भ में विशेष परिस्थितियाँ।
किसी मामले में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि “दंगा हुआ या नहीं”, बल्कि यह भी देखा जाता है कि हिंसा किस प्रकार हुई और कौन-से अतिरिक्त तत्व मौजूद थे।
दंगा और बलवा में अंतर - कानूनी भाषा में बलवा और दंगा प्रायः एक ही अंग्रेजी शब्द Rioting के लिए प्रयुक्त होते हैं।
अर्थात बलवा = दंगा = Rioting
तीनों को अलग-अलग अपराध समझना सामान्यतः उचित नहीं है।
निष्कर्ष - भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 191 के अनुसार, जब कोई विधि-विरुद्ध जमाव या उसका कोई सदस्य उस जमाव के सामान्य उद्देश्य की पूर्ति में बल या हिंसा का प्रयोग करता है, तो उस जमाव का प्रत्येक सदस्य दंगा/बलवा करने का दोषी होता है। अतः दंगे के मूल तत्व हैं: पाँच या अधिक व्यक्तियों का विधि-विरुद्ध जमाव, सामान्य उद्देश्य तथा उस उद्देश्य की पूर्ति में बल या हिंसा का प्रयोग।
ट्रिक - 5 parson + Common Object + Force/Violence = बलवा/दंगा।
BNS, 2023 में Affray (उपद्रव) -
धारा 194 उपद्रव एवं धारा 189 विधि विरुद्ध जमाव से संबंधित है। भीड़ द्वारा हत्या (mob lynching) के लिए BNS में विशेष प्रावधान धारा 103(2) में है। धारा 189 और भीड़ द्वारा हत्या को साथ समझना ज्यादा सही होगा।
उपद्रव/झगड़ा (Affray) का अर्थ - BNS की धारा 194 के अनुसार जब दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी सार्वजनिक स्थान पर लड़ते हैं और उससे सार्वजनिक शांति भंग होती है, तो वे उपद्रव (Affray) करते हैं।
इस अपराध के मुख्य तत्व हैं -
I. कम से कम दो व्यक्ति हों
II. उनके बीच लड़ाई (fight) हो।
III. लड़ाई सार्वजनिक स्थान पर हुई हो।
IV. उस लड़ाई के कारण सार्वजनिक शांति भंग हुई हो।
उदाहरण - दो व्यक्ति बाजार के बीच आपस में मारपीट करते हैं और उनकी लड़ाई के कारण वहां अफरा-तफरी तथा सार्वजनिक शांति भंग हो जाती है, तो यह Affray हो सकता है।
उपद्रव का दंड - धारा 194 के अंतर्गत Affray के लिए एक महीने तक का कारावास या ₹1,000 तक का जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
विधिविरुद्ध जमाव (Unlawful Assembly) - धारा 189 विधिविरुद्ध जमाव से संबंधित है। जब पाँच या अधिक व्यक्ति किसी ऐसे सामान्य उद्देश्य (common object) के साथ एकत्र होते हैं जो कानून द्वारा निर्धारित निषिद्ध उद्देश्यों में आता है, तो वह जमाव विधिविरुद्ध जमाव कहलाता है।
उदाहरण - पांच या अधिक व्यक्ति किसी व्यक्ति को बलपूर्वक उसकी संपत्ति से बेदखल करने, किसी अपराध को करने या कानून के विरुद्ध बल प्रयोग करने के सामान्य उद्देश्य से एकत्र होते हैं, तो परिस्थितियों के अनुसार यह धारा 189 के अंतर्गत विधिविरुद्ध जमाव हो सकता है।
उपद्रव/ झगड़ा एवं विधि विरुद्ध जमाव में अंतर - Affray में मुख्य बात लड़ाई है, जबकि Unlawful Assembly में मुख्य बात पाँच या अधिक व्यक्तियों का सामान्य उद्देश्य के साथ विधिविरुद्ध रूप से एकत्र होना है। इसलिए हर भीड़ Affray नहीं होती और हर Affray Unlawful Assembly भी नहीं होता।
भीड़ द्वारा हत्या (Mob Lynching) - भीड़ द्वारा हत्या को सामान्य भाषा में Mob Lynching कहा जाता है। इसका अर्थ है जब लोगों का समूह किसी व्यक्ति को कानून अपने हाथ में लेकर सामूहिक रूप से मार डालता है। BNS ने इस विषय को विशेष रूप से गंभीरता से लिया है।
धारा 103(2) - BNS की धारा 103(2) के अनुसार यदि पाँच या अधिक व्यक्तियों का समूह मिलकर किसी व्यक्ति की हत्या करता है और हत्या जाति, समुदाय, लिंग, जन्मस्थान, भाषा, व्यक्तिगत विश्वास या इसी प्रकार के किसी आधार पर की जाती है, तो समूह के प्रत्येक सदस्य के लिए कठोर दंड का प्रावधान है। ऐसे अपराध में दोषसिद्धि होने पर आजीवन कारावास या मृत्युदंड तक का दंड हो सकता है, साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है। यह प्रावधान महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अपराध को केवल सामान्य हत्या के रूप में देखने के बजाय समूह द्वारा लक्षित हत्या के रूप में विशेष रूप से संबोधित किया गया है।
धारा 189 और धारा 103(2) में संबंध - उदाहरण - मान लीजिए 10 लोग किसी व्यक्ति पर हमला करने के सामान्य उद्देश्य से एकत्र होते हैं। यह परिस्थितियों के अनुसार धारा 189 के तहत विधिविरुद्ध जमाव हो सकता है। अब वही समूह किसी व्यक्ति की हत्या कर देता है और हत्या जाति, समुदाय, भाषा, लिंग आदि किसी निर्दिष्ट आधार पर की गई है, तो परिस्थितियों के अनुसार धारा 103(2) का विशेष प्रावधान लागू हो सकता है। अर्थात्।5 या अधिक व्यक्ति + सामान्य उद्देश्य से अवैध जमाव = धारा 189 और 5 या अधिक व्यक्ति + निर्दिष्ट आधार पर समूह द्वारा हत्या = धारा 103(2)। दोनों अपराधों के तथ्य एक ही घटना में मौजूद हो सकते हैं, लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि धारा 189 स्वयं moblynching की धारा है।
सामान्य हत्या और भीड़ द्वारा हत्या में अंतर -
आधार - सामान्य हत्या - भीड़ द्वारा हत्या
धारा - धारा 103(1) - धारा 103(2)
आरोपी - एक या अधिक व्यक्ति - 5 या अधिक व्यक्तियों का समूह
सामूहिकता - आवश्यक नहीं - आवश्यक
विशेष आधार - आवश्यक नहीं - जाति, समुदाय, लिंग, जन्मस्थान, भाषा, व्यक्तिगत विश्वास आदि
दंड - मृत्यु या आजीवन कारावास और जुर्माना - आजीवन कारावास या मृत्युदंड और जुर्माना
धारा 189 की विशेषता - धारा 189 केवल भीड़ के अस्तित्व को अपराध नहीं बनाती। पाँच या अधिक व्यक्तियों का एकत्र होना अपने आप में अपराध नहीं है।
जरूरी है कि उनका सामान्य उद्देश्य कानून में बताए गए निषिद्ध उद्देश्यों में से कोई हो।
इसलिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले 100 लोग = अपने आप में विधिविरुद्ध जमाव नहीं। लेकिन पाँच या अधिक लोग किसी व्यक्ति पर बलपूर्वक हमला करने के सामान्य उद्देश्य से एकत्र हों = परिस्थितियों के अनुसार विधिविरुद्ध जमाव।
धारा 189 में सामूहिक दायित्व - धारा 189 का एक महत्वपूर्ण पहलू सामान्य उद्देश्य (Common Object) है। यदि किसी विधि विरुद्ध जमाव का कोई सदस्य उस सामान्य उद्देश्य को पूरा करने के लिए अपराध करता है, तो परिस्थितियों में उस जमाव के अन्य सदस्य भी कानून के अनुसार उत्तरदायी हो सकते हैं, यदि वे उस सामान्य उद्देश्य की प्रकृति जानते थे या जानते थे कि ऐसा अपराध किए जाने की संभावना है। इस सिद्धांत का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भीड़ में शामिल होकर कोई व्यक्ति केवल यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से बच न जाए कि मैंने स्वयं वार नहीं किया था। प्रत्येक मामले में अभियोजन को संबंधित कानूनी तत्वों और आरोपी की भूमिका/ज्ञान को सिद्ध करना होता है।
Affray और Unlawful Assembly में अंतर - Affray (धारा 194) और Unlawful Assembly (धारा 189) को भ्रमित नहीं करना चाहिए।
Affray - न्यूनतम 2 व्यक्तियों द्वारा सार्वजनिक स्थान वास्तविक लड़ाई करने पर सार्वजनिक शांति भंग करना।
Unlawful Assembly - कम से कम 5 व्यक्ति सामान्य उद्देश्य (कानून द्वारा निषिद्ध) वास्तविक लड़ाई होना आवश्यक नहीं, इसलिए पाँच लोग हथियार लेकर किसी व्यक्ति को धमकाने के उद्देश्य से एकत्र हों तो परिस्थितियों के अनुसार विधि विरुद्ध जमाव बन सकता है, भले ही अभी लड़ाई शुरू न हुई हो।
निष्कर्ष - उपद्रव (Affray) सार्वजनिक स्थान पर दो या अधिक व्यक्तियों के बीच ऐसी लड़ाई है जिससे सार्वजनिक शांति भंग होती है और यह BNS की धारा 194 के अंतर्गत आता है। इसके विपरीत धारा 189 विधिविरुद्ध जमाव से संबंधित है, जिसमें पाँच या अधिक व्यक्तियों का कानून द्वारा निषिद्ध सामान्य उद्देश्य से एकत्र होना आवश्यक है। भीड़ द्वारा हत्या (Mob Lynching) के लिए BNS ने धारा 103(2) में विशेष प्रावधान किया है, जिसके अनुसार पाँच या अधिक व्यक्तियों के समूह द्वारा जाति, समुदाय, लिंग, जन्मस्थान, भाषा, व्यक्तिगत विश्वास आदि निर्दिष्ट आधारों पर हत्या करने पर प्रत्येक सदस्य को आजीवन कारावास या मृत्युदंड तथा जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
सूत्र - धारा 189 = विधिविरुद्ध जमाव | धारा 194 = Affray | धारा 103(2) = समूह द्वारा विशेष आधार पर हत्या (Mob Lynching).
भारतीय न्याय संहिता में दंड व्यवस्था - भारतीय न्याय संहिता में दंड की व्यवस्था धारा 4 में दी गई है। BNS का उद्देश्य अपराधों को परिभाषित करने के साथ-साथ अपराधियों के लिए उपयुक्त दंड निर्धारित करना है। दंड का उद्देश्य केवल अपराधी को पीड़ा देना नहीं, बल्कि निवारण (Deterrence), प्रतिरोध, सुधार (Reformation), समाज की सुरक्षा तथा न्याय की स्थापना करना भी है। BNS की धारा 4 में अपराधों के लिए दिए जा सकने वाले विभिन्न प्रकार के दंडों का उल्लेख किया गया है।
धारा 4 के अंतर्गत दंड के प्रकार - BNS की धारा 4 के अनुसार निम्नलिखित दंड निर्धारित किए गए हैं:
1. मृत्यु दंड (Death)
2. आजीवन कारावास (Imprisonment for Life)
3. कारावास (Imprisonment), जो दो प्रकार का है:
कठोर कारावास (Rigorous Imprisonment)
साधारण कारावास (Simple Imprisonment)
4. संपत्ति का समपहरण (Forfeiture of Property)
5. जुर्माना (Fine)
6. सामुदायिक सेवा (Community Service) अर्थात् BNS ने दंडों की सूची में सामुदायिक सेवा (Community Service) को स्पष्ट रूप से शामिल करके एक महत्वपूर्ण परिवर्तन किया है।
1. मृत्यु दंड (Death panelty) - मृत्यु दंड सबसे कठोर दंड है। इसमें दोषी व्यक्ति के जीवन को विधि द्वारा समाप्त किया जाता है।
विशेषताएँ - यह केवल उन अपराधों में दिया जा सकता है जिनमें BNS या अन्य लागू कानून इसकी अनुमति देता है।न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि के बाद ही लगाया जा सकता है। यह सामान्य दंड नहीं बल्कि अत्यंत गंभीर अपराधों के लिए असाधारण दंड है। भारत में न्यायिक दृष्टिकोण के अनुसार मृत्यु दंड केवल रेयरेस्ट ऑफ रेयर (Rarest of Rare) मामलों में दिया जाना चाहिए।
उदाहरण - हत्या के कुछ अत्यंत गंभीर मामलों में मृत्यु दंड का प्रावधान हो सकता है।
संवैधानिक दृष्टिकोण - Bachan Singh v. State of Punjab (1980) में सर्वोच्च न्यायालय ने rarest of rare सिद्धांत को स्वीकार किया। इसलिए मृत्यु दंड देते समय अपराध की गंभीरता के साथ-साथ अपराधी की परिस्थितियों और सुधार की संभावना पर भी विचार किया जाता है।
2. आजीवन कारावास है - (Imprisonment for Life) - आजीवन कारावास का अर्थ दोषी व्यक्ति को उसके शेष प्राकृतिक जीवन के लिए कारावास में रखना है, हालांकि संबंधित कानूनों के अंतर्गत remission/commutation आदि की व्यवस्था लागू हो सकती है।
विशेषताएँ - यह मृत्यु दंड के बाद अत्यंत कठोर दंड है। इसका अर्थ 14 वर्ष का कारावास नहीं है। 14 वर्ष की अवधि से संबंधित नियम कुछ विशेष परिस्थितियों में remission/commutation के संदर्भ में लागू होते हैं।
उदाहरण - गंभीर हत्या आदि के अपराधों में, जहाँ संबंधित धारा इसकी अनुमति देती है, आजीवन कारावास दिया जा सकता है।
3. कारावास (Imprisonment) - BNS के अंतर्गत कारावास दो प्रकार का है -
(क) कठोर कारावास (Rigorous Imprisonment) - इसमें दोषी को कठिन श्रम (Hard Labour) करना पड़ता है। उदाहरण के रूप में ऐसा कार्य कराया जा सकता है जो जेल नियमों के अनुसार निर्धारित हो।
(ख) साधारण कारावास (Simple Imprisonment) - इसमें दोषी को कारावास में रखा जाता है, लेकिन उससे कठोर श्रम कराने की व्यवस्था नहीं होती।
दोनों में अंतर -
आधार - कठोर कारावास - साधारण कारावास
प्रकृति - कारावास + कठिन श्रम - केवल कारावास
कठोरता - अधिक - अपेक्षाकृत कम
श्रम - कराया जाता है - नहीं
उद्देश्य - दंडात्मक प्रभाव के साथ सुधार - स्वतंत्रता से वंचित करना एवं सुधार
4. संपत्ति का समपहरण (Forfeiture of Property) - समपहरण का अर्थ है विधि के अनुसार दोषी की संपत्ति को राज्य द्वारा जब्त/अधिग्रहित किया जाना। इसका उद्देश्य अपराध से संबंधित आर्थिक लाभ को समाप्त करना या अपराधी को उसकी संपत्ति से वंचित करना हो सकता है।
उदाहरण - यदि किसी अपराध के लिए संबंधित BNS प्रावधान संपत्ति के समपहरण की अनुमति देता है, तो न्यायालय कानून के अनुसार ऐसा आदेश दे सकता है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि हर अपराध में संपत्ति का समपहरण नहीं किया जा सकता। जिस अपराध में कानून इसकी अनुमति देता है, उसी स्थिति में यह दंड लागू होगा।
जुर्माना (Fine) - जुर्माना एक आर्थिक दंड है। इसमें दोषी व्यक्ति को निर्धारित धनराशि राज्य को अदा करनी होती है।
विशेषताएँ - यह अकेले भी लगाया जा सकता है। कई अपराधों में कारावास के साथ जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
जुर्माने की राशि अपराध की संबंधित धारा तथा न्यायालय के अधिकार के अनुसार निर्धारित होती है।
जुर्माना न देने का प्रभाव - जहाँ कानून अनुमति देता है, वहाँ जुर्माना अदा न करने की स्थिति में default imprisonment का प्रावधान हो सकता है। यह मूल दंड के अतिरिक्त कानून द्वारा निर्धारित परिणाम होता है।
सामुदायिक सेवा (Community Service) - यह BNS की महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है। सामुदायिक सेवा का अर्थ है दोषी व्यक्ति से समाज के हित में ऐसा कार्य करवाना जिसे कानून और न्यायालय द्वारा निर्धारित किया गया हो। इसका उद्देश्य अपराधी को केवल जेल भेजना नहीं बल्कि उसे समाज के प्रति उत्तरदायित्व का अनुभव कराना तथा सुधार की दिशा में ले जाना है।
विशेषताएँ -
I. यह सुधारात्मक दंड की प्रकृति रखता है।
II. अपेक्षाकृत कम गंभीर अपराधों में इसका उपयोग किया जा सकता है जहाँ संबंधित प्रावधान इसकी अनुमति देता है।
III. इससे जेलों पर अनावश्यक बोझ कम करने में सहायता हो सकती है।
IV. अपराधी को समाज से पूरी तरह अलग करने के बजाय समाजोपयोगी कार्य से जोड़ा जाता है।
महत्वपूर्ण - सामुदायिक सेवा हर अपराध के लिए उपलब्ध सामान्य दंड नहीं है। इसे केवल उन्हीं अपराधों में लगाया जा सकता है जहाँ संबंधित BNS प्रावधान इसकी अनुमति देता है।
BNS में सामुदायिक सेवा का महत्व - सामुदायिक सेवा BNS की दंड व्यवस्था में सुधारात्मक न्याय (Reformative Justice) की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है। परंपरागत दंड व्यवस्था में जेल + जुर्माना + कठोर दंड पर जोर था। BNS में सामुदायिक सेवा का नया आयाम जोड़ा गया है जिसमें अपराधी का सुधार + समाज को लाभ + पुनर्वास। इसलिए इसे आधुनिक दंडशास्त्र (Penology) में सुधारात्मक दृष्टिकोण से जोड़ा जा सकता है।
दंड के प्रमुख उद्देश्य - BNS में दंड व्यवस्था को समझने के लिए दंड के उद्देश्यों को समझना भी आवश्यक है।
(1) प्रतिशोधात्मक सिद्धांत (Retributive Theory) - अपराधी ने समाज या व्यक्ति को जो नुकसान पहुँचाया है, उसके लिए उसे दंड दिया जाता है।
(2) निवारक सिद्धांत (Deterrent Theory) - दंड का उद्देश्य अपराधी तथा अन्य लोगों को भविष्य में अपराध करने से रोकना है। अपराध करो और दंड भुगतो की निश्चितता अपराध को हतोत्साहित करती है।
(3) निरोधात्मक सिद्धांत (Preventive Theory) - अपराधी को कारावास आदि द्वारा समाज से अलग करके उसके द्वारा पुनः अपराध करने की संभावना को कम किया जाता है।
(4) सुधारात्मक सिद्धांत (Reformative Theory) - इसका उद्देश्य अपराधी को सुधारकर उसे समाज का उपयोगी सदस्य बनाना है। सामुदायिक सेवा इसी दृष्टिकोण का अच्छा उदाहरण है।
(5) प्रतिपूरक दृष्टिकोण (Compensatory Approach) -
आधुनिक आपराधिक न्याय में पीड़ित के हित और क्षतिपूर्ति का महत्व भी बढ़ा है। हालाँकि क्षतिपूर्ति को BNS की धारा 4 में अलग दंड के रूप में सूचीबद्ध नहीं किया गया है, पीड़ित-केंद्रित न्याय की व्यापक व्यवस्था में इसका महत्व है।
BNS की दंड व्यवस्था की विशेषताएँ -
I. दंडों की स्पष्ट सूची - धारा 4 ने दंड के प्रमुख प्रकारों को स्पष्ट रूप से निर्धारित किया है।
II. सामुदायिक सेवा का समावेश - यह BNS की सबसे चर्चित विशेषताओं में से एक है।
III. गंभीर अपराधों के लिए कठोर दंड - मृत्यु दंड और आजीवन कारावास जैसे कठोर दंड गंभीर अपराधों के लिए उपलब्ध हैं।
IV. आर्थिक दंड - जुर्माना अपराधी को आर्थिक रूप से उत्तरदायी बनाता है।
V. सुधारात्मक दृष्टिकोण - सामुदायिक सेवा जैसी व्यवस्था अपराधी के सुधार की दिशा को महत्व देती है।
दंडों का क्रम - मृत्यु → आजीवन कारावास → कठोर/साधारण कारावास → संपत्ति का समपहरण → जुर्माना → सामुदायिक सेवा।
दंड और अपराध की गंभीरता - दंड निर्धारित करते समय न्यायालय अपराध की प्रकृति, गंभीरता, परिस्थितियों, आरोपी की भूमिका, पीड़ित पर प्रभाव तथा लागू वैधानिक प्रावधानों को ध्यान में रखता है। अतः: गंभीर अपराध → कठोर दंड की संभावना कम गंभीर अपराध → अपेक्षाकृत हल्का/सुधारात्मक दंड लेकिन अंतिम दंड हमेशा संबंधित अपराध की वैधानिक धारा और न्यायिक विवेक पर निर्भर करता है।
महत्वपूर्ण न्यायिक संदर्भ -
(1) Bachan Singh v. State of Punjab, 1980 - मृत्यु दंड के संबंध में rarest of rare सिद्धांत का प्रमुख निर्णय।
(2) Mithu v. State of Punjab, 1983 - सर्वोच्च न्यायालय ने IPC की धारा 303 को असंवैधानिक घोषित किया। यह निर्णय इस व्यापक सिद्धांत के लिए महत्वपूर्ण है कि दंड व्यवस्था संविधान के मौलिक अधिकारों की कसौटी पर खरी उतरनी चाहिए।
(3) Machhi Singh v. State of Punjab, 1983 - इस मामले में rarest of rare सिद्धांत को लागू करने के लिए कुछ मार्गदर्शक परिस्थितियों पर चर्चा की गई।
दंडों का तुलनात्मक सार -
दंड - अर्थ - उद्देश्य
मृत्यु दंड - जीवन का विधिक अंत - अत्यंत गंभीर अपराधों में दंड
आजीवन कारावास - जीवनपर्यंत कारावास, कानून के अधीन remission आदि संभव - कठोर दंड एवं समाज की सुरक्षा
कठोर कारावास - कारावास + कठिन श्रम दंड एवं निरोध
साधारण कारावास - बिना कठोर श्रम का कारावास - दंड एवं सुधार
संपत्ति का समपहरण - संपत्ति को कानून के अनुसार राज्य के अधीन करना - आर्थिक दंड/अपराध से लाभ समाप्त करना
जुर्माना - धनराशि का भुगतान - आर्थिक दंड
सामुदायिक सेवा - समाजोपयोगी कार्य - सुधार एवं सामाजिक उत्तरदायित्व
सावधानी - BNS की धारा 4 केवल दंडों के प्रकार बताती है। किसी विशेष अपराध के लिए कौन-सा दंड दिया जा सकता है, यह उस अपराध की संबंधित धारा में देखना आवश्यक है। इसलिए यह कहना पर्याप्त नहीं है कि BNS में सामुदायिक सेवा का प्रावधान है, यह भी देखना चाहिए कि किस अपराध की संबंधित धारा में सामुदायिक सेवा को दंड के रूप में निर्धारित किया गया है।
निष्कर्ष - भारतीय न्याय संहिता, 2023 की दंड व्यवस्था में परंपरागत कठोर दंडों के साथ सुधारात्मक दृष्टिकोण को भी स्थान दिया गया है। मृत्यु दंड, आजीवन कारावास, कठोर एवं साधारण कारावास, संपत्ति का समपहरण, जुर्माना तथा सामुदायिक सेवा इसके प्रमुख दंड हैं। इनमें सामुदायिक सेवा का समावेश विशेष रूप से उल्लेखनीय है, क्योंकि यह दंड व्यवस्था को केवल दंडात्मक दृष्टिकोण से आगे ले जाकर सुधारात्मक एवं समाजोपयोगी न्याय की दिशा में ले जाता है।
सूत्र - दंड = मृत्यु – जीवन – कारावास – संपत्ति – जुर्माना – सेवा।
सामान्य अपवाद, प्रारंभिक/अपूर्ण अपराध एवं महिलाओं के विरुद्ध अपराध, सामान्य अपवाद एवं निजी प्रतिरक्षा का अधिकार धारा 14–92 -
BNS ने 1 जुलाई 2024 से IPC को प्रतिस्थापित किया है। आधिकारिक India Code में BNS, 2023 को अधिनियम संख्या 45, 2023 के रूप में दर्ज किया गया है।
सामान्य अपवाद एवं निजी प्रतिरक्षा का अधिकार - धारा 14–44 - सामान्य अपवाद (General Exceptions) का मूल सिद्धांत यह है कि प्रत्येक ऐसा कार्य, जो सामान्य परिस्थितियों में अपराध हो सकता है परन्तु परिस्थितिवश अपराध नहीं माना जाएगा यदि वह BNS द्वारा मान्य किसी अपवाद के अंतर्गत आता है तो।अर्थात् अपराध के लिए केवल बाहरी कार्य पर्याप्त नहीं है, बल्कि परिस्थितियाँ, मानसिक अवस्था, उद्देश्य और विधि द्वारा मान्य अपवाद भी देखे जाते हैं।
धारा 14 - विधि द्वारा आबद्ध व्यक्ति का कार्य - यदि कोई व्यक्ति ऐसा कार्य करता है जिसे करने के लिए वह कानून द्वारा बाध्य है, तो वह कार्य अपराध नहीं होगा।
उदाहरण: न्यायालय द्वारा विधि-सम्मत आदेश के पालन में किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करना आदि।
सिद्धांत - कानून के पालन में किया गया कार्य केवल इसलिए अपराध नहीं बन जाता कि उससे किसी व्यक्ति को नुकसान हुआ।
धारा 15 - न्यायिक कार्य करते हुए न्यायाधीश का कार्य - यदि कोई न्यायाधीश अपने न्यायिक कर्तव्य के निर्वहन में सद्भावपूर्वक कोई कार्य करता है, तो केवल उस आधार पर उसे अपराधी नहीं माना जाएगा। इसका उद्देश्य न्यायिक अधिकारियों को उनके वैधानिक कार्यों के लिए आवश्यक सुरक्षा प्रदान करना है।
धारा 16 - न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसार किया गया कार्य - यदि कोई व्यक्ति किसी न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसार कार्य करता है और वह कार्य उसे कानून द्वारा अधिकृत प्रतीत होता है, तो परिस्थितियों के अनुसार सामान्य अपवाद लागू होता है।
धारा 17 - कानून द्वारा न्यायोचित समझे गए कार्य - ऐसा कार्य जिसे व्यक्ति तथ्य की भूल (mistake of fact) के कारण कानून द्वारा न्यायोचित समझकर करता है, कुछ परिस्थितियों में अपराध नहीं होगा। यहाँ महत्वपूर्ण बात है कि।Mistake of fact ≠ Mistake of law अर्थात् तथ्य की वास्तविक भूल लाभ दे सकती है, लेकिन कानून की अज्ञानता बचाव नहीं है। अर्थात कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि उक्त कानून की मुझे जानकारी नहीं थी।
धारा 18 - दुर्घटना - यदि कोई व्यक्ति -
1. विधिपूर्वक कार्य कर रहा था
2. विधिपूर्वक साधन का प्रयोग कर रहा था
3. उचित सावधानी और सतर्कता बरत रहा था
4. और उसके बावजूद दुर्घटनावश नुकसान हो गया
तो वह कार्य सामान्यतः यह अपराध नहीं होगा।
उदाहरण - A लकड़ी काट रहा है। उसने सभी उचित सावधानियाँ बरतीं, लेकिन अचानक लकड़ी का टुकड़ा उछलकर B को लग गया और B घायल हो गया। यदि A की ओर से लापरवाही नहीं थी, तो दुर्घटना का अपवाद लागू हो सकता है।
धारा 19 - बड़ी हानि रोकने के लिए किया गया कार्य - यदि कोई कार्य बड़ी और गंभीर हानि को रोकने के उद्देश्य से किया गया है और परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि वह उचित था, तो वह सामान्य अपवाद के अंतर्गत आ सकता है। इसे necessity का सिद्धांत कहा जाता है।
उदाहरण - आग फैलने से रोकने के लिए किसी भवन का एक हिस्सा गिराना।
धारा 20 - 07 वर्ष से कम आयु के बच्चे का कार्य - 07 वर्ष से कम आयु के बच्चे द्वारा किया गया कार्य अपराध नहीं माना जाता। इसे doli incapax अर्थात् अपराध करने की क्षमता का अभाव कहा जाता है। इसका आधार यह है कि सात वर्ष से कम उम्र के बच्चे में अपराध की प्रकृति और परिणाम को समझने की पर्याप्त मानसिक क्षमता नहीं होती।
धारा 21 - 07 से 12 वर्ष के बच्चे का कार्य - 07 वर्ष से अधिक और 12 वर्ष से कम आयु का बच्चा तभी आपराधिक रूप से उत्तरदायी होगा जब उसने अपराध के समय
1. अपने कार्य की प्रकृति समझने की
2. उसके परिणाम को समझने की
3. और पर्याप्त परिपक्वता से निर्णय लेने की
क्षमता प्राप्त कर ली हो। इसलिए यह पूर्ण नहीं बल्कि सशर्त अपवाद है।
धारा 22 - अस्वस्थ मस्तिष्क (मानसिक अपरिपक्व/दोष वाले व्यक्ति का कार्य - यदि अपराध के समय व्यक्ति मानसिक अस्वस्थता के कारण यह समझने में असमर्थ था कि वह क्या कर रहा है, या उसका कार्य गलत / कानून के विरुद्ध है तो उसे इस अपवाद का लाभ मिल सकता है।
महत्वपूर्ण - केवल मानसिक बीमारी होना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि अपराध किए जाने के समय उसकी मानसिक अवस्था ऐसी थी या नहीं कि वह अपने कार्य की प्रकृति या उसकी दोषपूर्णता को समझने में असमर्थ था।
धारा 23 - इच्छा के विरुद्ध नशे में कराया गया कार्य - यदि किसी व्यक्ति को उसकी जानकारी या इच्छा के विरुद्ध नशीला पदार्थ दिया गया और नशे के कारण वह अपने कार्य की प्रकृति समझने में असमर्थ हो गया, तो परिस्थितियों के अनुसार उसे सामान्य अपवाद का लाभ मिल सकता है।
धारा 24 - स्वैच्छिक नशा - यदि व्यक्ति ने स्वेच्छा से शराब या नशीला पदार्थ लिया, तो वह केवल नशे का बहाना बनाकर आपराधिक दायित्व से बच नहीं सकता।विशेष रूप से जहाँ अपराध के लिए विशेष ज्ञान या आशय आवश्यक है, वहाँ कानून स्वैच्छिक नशे को सीमित परिस्थितियों में देखता है।
सहमति से किए गए कार्य धारा 25- 27
BNS कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति की सहमति (Consent) के आधार पर कार्य को अपराध से बाहर रखता है। लेकिन सहमति की भी सीमाएँ हैं। सहमति -
1. स्वतंत्र होनी चाहिए।
2. वास्तविक होनी चाहिए।
3. कानून द्वारा मान्य व्यक्ति से होनी चाहिए।
4. और ऐसा कार्य नहीं होना चाहिए जिसे कानून सार्वजनिक नीति के कारण अपराध मानता है।
महत्वपूर्ण - किसी व्यक्ति की सहमति प्रत्येक प्रकार के अपराध को वैध नहीं बना देती।
धारा 28 - भय या भ्रम में दी गई सहमति - यदि सहमति - भय के कारण,
गलत तथ्य के कारण, या ऐसी परिस्थितियों में प्राप्त की गई है जिनमें व्यक्ति वास्तविक स्थिति नहीं समझ रहा था तो वह वैध सहमति नहीं हो सकती।
धारा 29–30 - सद्भावना में किए गए कार्य - किसी व्यक्ति के हित में good faith में किया गया कार्य कुछ परिस्थितियों में अपराध नहीं माना जाता।विशेष रूप से आपातकालीन चिकित्सा जैसी परिस्थितियों में यह सिद्धांत महत्वपूर्ण हो सकता है।
उदाहरण - किसी व्यक्ति की जान बचाने के लिए तत्काल चिकित्सा प्रक्रिया करना जबकि उसकी स्पष्ट सहमति लेना संभव नहीं था।
धारा 31 - सद्भावना में संचार - किसी व्यक्ति के हित में सद्भावना से कोई सूचना देना, यदि वह सूचना उचित परिस्थिति में दी गई है, तो केवल उसके परिणाम के कारण अपराध नहीं बनती।
धारा 32 - धमकी के कारण किया गया कार्य - यदि किसी व्यक्ति को तत्काल मृत्यु की गंभीर धमकी के कारण कोई कार्य करना पड़ा, तो कुछ परिस्थितियों में उसे आपराधिक दायित्व से बचाया जा सकता है। लेकिन यह अपवाद हत्या और कुछ गंभीर अपराधों पर उसी प्रकार लागू नहीं होता।
धारा 33 - तुच्छ हानि - ऐसी मामूली हानि जिसे सामान्य व्यक्ति शिकायत योग्य नहीं समझेगा, कानून द्वारा अपराध नहीं मानी जा सकती। इसे triviality principle कहा जाता है।
निजी प्रतिरक्षा का अधिकार - धारा 34–44 - निजी प्रतिरक्षा (Right of Private Defence) का अर्थ है कि व्यक्ति को अपने शरीर, किसी अन्य व्यक्ति के शरीर, अपनी संपत्ति, किसी अन्य व्यक्ति की संपत्ति को कुछ अवैध आक्रमणों से बचाने का अधिकार है।
मूल सिद्धांत - कानून व्यक्ति से यह अपेक्षा नहीं करता कि वह खतरे के सामने निष्क्रिय खड़ा रहे। लेकिन निजी प्रतिरक्षा बदला लेने का अधिकार नहीं है।
निजी प्रतिरक्षा के आवश्यक तत्व -
1. वास्तविक या युक्तियुक्त खतरा होना चाहिए।
2. खतरा अवैध होना चाहिए।
3. खतरा शरीर या संपत्ति के विरुद्ध होना चाहिए।
4. प्रतिरक्षा की आवश्यकता होनी चाहिए।
5. बल का प्रयोग आवश्यकता से अधिक नहीं होना चाहिए।
6. खतरा समाप्त होने के बाद प्रतिशोध नहीं किया जा सकता।
शरीर की निजी प्रतिरक्षा - व्यक्ति अपने शरीर के साथ-साथ किसी अन्य व्यक्ति के शरीर की भी रक्षा कर सकता है।
उदाहरण - यदि A किसी B पर चाकू से हमला करता है तो C, B की रक्षा करने हेतु उचित बल का प्रयोग कर सकता है।
संपत्ति की निजी प्रतिरक्षा - निजी प्रतिरक्षा का अधिकार निम्न के विरुद्ध हो सकता है जिसमें चोरी, लूट, डकैती, आपराधिक अतिचार, संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वाले कुछ अपराध।
कब मृत्यु कारित करने तक का अधिकार हो सकता है? - कुछ गंभीर परिस्थितियों में निजी प्रतिरक्षा का अधिकार हमलावर की मृत्यु कारित करने तक विस्तृत हो सकता है।
उदाहरण - जब ऐसा हमला हो जिससे युक्तियुक्त रूप से आशंका हो कि मृत्यु होगी, गंभीर चोट होगी, बलात्कार होगा, अप्राकृतिक लैंगिक अपराध होगा, अपहरण/व्यपहरण होगा तो ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होगी जिसमें व्यक्ति को गंभीर खतरे का सामना करना पड़े। लेकिन ध्यान रखें निजी प्रतिरक्षा का अधिकार प्रतिशोध (revenge) नहीं है। खतरा समाप्त होने के बाद हमलावर को मारना निजी प्रतिरक्षा नहीं कहा जाएगा।
दुष्प्रेरण, आपराधिक षड्यंत्र एवं प्रयास - धारा 45 - 62 - BNS में अपराध केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं है जिसने अपराध स्वयं किया। जो व्यक्ति अपराध करवाने में उकसाता, सहायता करता या षड्यंत्र करता है, वह भी आपराधिक रूप से उत्तरदायी हो सकता है।
दुष्प्रेरण (Abetment) - धारा 45 - दुष्प्रेरण तीन प्रकार से होती है -
(क) उकसाना — Instigation - किसी व्यक्ति को अपराध करने के लिए प्रेरित करना, उकसाना, आदेश देना, जानबूझकर प्रोत्साहित करना।
उदाहरण - A, B से कहता है कि C को मार दो और उसे ऐसा करने के लिए लगातार उकसाता है।
(ख) षड्यंत्र में सम्मिलित होना - यदि दो या अधिक व्यक्ति किसी कार्य को करने के लिए योजना बनाते हैं और उस योजना के अनुसरण में कोई कार्य या अवैध omission होता है, तो दुष्प्रेरण का प्रश्न उत्पन्न हो सकता है।
(ग) जानबूझकर सहायता करना - अपराध करने वाले को हथियार देना, वाहन उपलब्ध कराना, अपराध की जानकारी छिपाना, आवश्यक साधन उपलब्ध कराना जैसी जानबूझकर की गई सहायता दुष्प्रेरण हो सकती है।
दुष्प्रेरक कौन है? - जो व्यक्ति स्वयं मुख्य अपराध नहीं करता लेकिन अपराध करवाने के लिए उकसाता, षड्यंत्र में सहभागी होता या जानबूझकर सहायता करता है वह Abettor / दुष्प्रेरक है।
दुष्प्रेरण और अपराध में अंतर -
आधार - दुष्प्रेरण - अपराध
भूमिका - अपराध करवाने/सहायता करने वाला - अपराध करने वाला
कार्य - उकसाना/सहायता - अपराध का प्रत्यक्ष निष्पादन
उत्तरदायित्व - परिस्थितियों के अनुसार - मुख्य अपराध के अनुसार
आपराधिक षड्यंत्र (Criminal Conspiracy) - धारा 61 - दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच किसी अवैध कार्य को करने या वैध कार्य को अवैध साधनों से करने का समझौता।
आवश्यक तत्व -
1. कम-से-कम दो व्यक्ति।
2. उनके बीच agreement।
3. उद्देश्य - अवैध कार्य करना, या वैध कार्य को अवैध साधनों से करना।
उदाहरण - A, B और C बैंक लूटने की योजना बनाते हैं। यदि आवश्यक कानूनी तत्व पूरे होते हैं तो यह आपराधिक षड्यंत्र हो सकता है।
षड्यंत्र की विशेषता - Agreement स्वयं अपराध का आधार बन सकता है, विशेषकर जहाँ षड्यंत्र किसी गंभीर अपराध को करने के लिए है।
प्रयास (Attempt) - धारा 62 - Attempt का अर्थ है अपराध करने की दिशा में ऐसा प्रत्यक्ष कदम उठाना जो अपराध की पूर्णता की ओर पर्याप्त रूप से आगे बढ़ चुका हो, लेकिन किसी कारण अपराध पूरा न हो पाए। अपराध के चरण इरादा → तैयारी → प्रयास → पूर्ण अपराध
उदाहरण - A ने B को मारने का इरादा बनाया। केवल विचार = अपराध नहीं।हथियार खरीदना = तैयारी। B पर गोली चलाना लेकिन गोली न लगना = प्रयास। B की मृत्यु = पूर्ण अपराध।
तैयारी और प्रयास में अंतर - Preparation - अपराध करने की व्यवस्था करना जबकि Attempt - अपराध के निष्पादन की दिशा में प्रत्यक्ष कदम उठाना।
महिलाओं के विरुद्ध अपराध - धारा 63–79 - BNS में महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध अपराधों के लिए पृथक अध्याय है। आधिकारिक पाठ में धारा 63 से rape का प्रावधान शुरू होता है।
बलात्कार (Rape) धारा 63 - धारा 63 के अनुसार पुरुष द्वारा महिला के साथ कुछ निर्धारित प्रकार की penetration/लैंगिक क्रिया करना, निर्धारित परिस्थितियों में, बलात्कार है। इनमें
1. इच्छा के विरुद्ध (जबरन)
2. सहमति के बिना
3. भय पैदा करके प्राप्त सहमति
4. धोखे से प्राप्त विशेष प्रकार की सहमति
5. मानसिक असमर्थता/नशे की स्थिति में
6. किसी 18 वर्ष से कम आयु की लड़की के साथ या जहाँ वह सहमति communicate करने में सक्षम नहीं है।जैसी परिस्थितियाँ शामिल हैं।
सहमति (Consent) का महत्व - सहमति केवल शारीरिक प्रतिरोध का अभाव नहीं है। स्वतंत्र और वास्तविक सहमति आवश्यक है।
बलात्कार की सजा - धारा 64 - बलात्कार के लिए कठोर दंड का प्रावधान है। विशेष परिस्थितियों में, जैसे -
• पुलिस अधिकारी द्वारा
• लोक सेवक द्वारा
• अस्पताल/संस्था से जुड़े व्यक्ति द्वारा
• गर्भवती महिला के साथ
• विशेष रूप से कमजोर स्थिति वाली महिला के साथ
• सामूहिक बलात्कार
आदि मामलों में अधिक कठोर दंड का प्रावधान है।
पीड़िता की मृत्यु या Persistent Vegetative State - धारा 66 - यदि बलात्कार के दौरान या उसके परिणामस्वरूप महिला की मृत्यु हो जाती है या वह persistent vegetative state में चली जाती है, तो अधिक गंभीर दंड का प्रावधान है।
अलग रह रही पत्नी के साथ यौन संबंध - धारा 67 - पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ, जब वे अलग रह रहे हों, उसकी सहमति के बिना यौन संबंध स्थापित करना अपराध के रूप में दंडनीय है, निर्धारित वैधानिक परिस्थितियों के अधीन। यह प्रावधान विशेष रूप से separation की स्थिति को संबोधित करता है।
अधिकार-पद का दुरुपयोग - धारा 68 - जो व्यक्ति अपनी अधिकारिता (authority), नैतिक जिम्मेदारी (fiduciary), सम्बंधता (relationship) के पद या प्रभाव का दुरुपयोग करके महिला के साथ यौन संबंध बनाता है, वह निर्धारित परिस्थितियों में अपराध करता है।
छलपूर्ण साधनों से यौन संबंध - धारा 69 - यदि कोई व्यक्ति छलपूर्ण साधनों या किसी ऐसे माध्यम से जो धारा में निर्धारित है, महिला से यौन संबंध स्थापित करता है और वह कृत्य बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता, तो धारा 69 लागू हो सकती है।
इसमें विशेष रूप से झूठे विवाह के वादे/रोजगार या पदोन्नति के झूठे आश्वासन अथवा पहचान छिपाने जैसी परिस्थितियों को कानून ने संबोधित किया है, जैसा कि धारा की शर्तों में निर्धारित है।
सामूहिक बलात्कार - धारा 70 - जब महिला के साथ सामूहिक रूप से बलात्कार किया जाता है, तो प्रत्येक सहभागी पर कठोर दंड लागू हो सकता है।
पुनरावर्ती अपराधी - धारा 71 - पहले गंभीर यौन अपराध में दोषसिद्ध व्यक्ति द्वारा पुनः संबंधित गंभीर अपराध किए जाने पर अधिक कठोर दंड का प्रावधान है।
पीड़िता की पहचान प्रकट करना - धारा 72 - यौन अपराध की पीड़िता की पहचान सार्वजनिक करना या प्रकाशित करना कानून द्वारा निर्धारित परिस्थितियों में अपराध है। इसका उद्देश्य पीड़िता की गरिमा, निजता, सामाजिक सुरक्षा की रक्षा करना है।
न्यायालय की कार्यवाही से संबंधित सामग्री का प्रकाशन - धारा 73 - कुछ परिस्थितियों में न्यायालय की कार्यवाही से संबंधित ऐसी सामग्री प्रकाशित करना, जिससे पीड़िता की पहचान या कानून द्वारा संरक्षित जानकारी उजागर हो, दंडनीय हो सकता है।
महिला की लज्जा भंग करने का आशय - धारा 74 - किसी महिला पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग इस आशय से करना कि उसकी modesty भंग हो, या ऐसी संभावना का ज्ञान होना, अपराध है।
उदाहरण - किसी महिला के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध ऐसा शारीरिक व्यवहार करना जिसका उद्देश्य उसकी गरिमा/लज्जा भंग करना हो।
यौन उत्पीड़न - धारा 75 - यौन उत्पीड़न में परिस्थितियों के अनुसार -
अवांछित शारीरिक संपर्क।
यौन अनुग्रह की मांग।
महिला की इच्छा के विरुद्ध pornography दिखाना।
sexually coloured remarks।
जैसे व्यवहार शामिल हो सकते हैं।
महिला को निर्वस्त्र करने के उद्देश्य से हमला - धारा 76 - किसी महिला को निर्वस्त्र करने या उसे निर्वस्त्र करने के उद्देश्य से आपराधिक बल/हमला करना गंभीर अपराध है।
ताकना (Voyeurism) - धारा 77 - किसी महिला की निजी गतिविधि को उसकी निजता के अधिकार के विरुद्ध। देखना, रिकॉर्ड करना या प्रसारित करना
निर्धारित परिस्थितियों में voyeurism है।
पीछा करना (Stalking) - धारा 78 -
किसी महिला का बार-बार पीछा करना, संपर्क करने का प्रयास करना या उसकी ऑनलाइन गतिविधियों की निगरानी करना, निर्धारित परिस्थितियों में stalking हो सकता है।
उदाहरण - महिला द्वारा स्पष्ट रूप से संपर्क से इनकार करने के बाद भी लगातार उसका पीछा करना।
महिला की मर्यादा का अपमान - धारा 79 - शब्द, संकेत, ध्वनि या किसी वस्तु के प्रदर्शन द्वारा महिला की modesty का अपमान करने के उद्देश्य से कार्य करना अपराध है।
विवाह से संबंधित अपराध धारा 80–87 -
दहेज मृत्यु - धारा 80 - यदि किसी विवाहित महिला की मृत्यु जलने, शारीरिक चोट या सामान्य परिस्थितियों से अलग परिस्थिति में विवाह के सात वर्ष के भीतर होती है और यह सिद्ध होता है कि मृत्यु से ठीक पहले उसे पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा दहेज की मांग के संबंध में क्रूरता या उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था, तो इसे dowry death कहा जाता है।
महत्वपूर्ण तत्व -
1. महिला की मृत्यु।
2. मृत्यु विवाह के सात वर्ष के भीतर।
3. मृत्यु असामान्य परिस्थितियों में।
4. पति/रिश्तेदार द्वारा क्रूरता या उत्पीड़न।
5. दहेज की मांग से संबंध।
6. मृत्यु से ठीक पहले ऐसा उत्पीड़न।
छलपूर्वक सहवास - धारा 81 - किसी महिला को यह विश्वास दिलाकर कि वह कानूनी रूप से उसकी पत्नी है, उसके साथ सहवास करना, जबकि वास्तव में वैध विवाह नहीं हुआ है, निर्धारित परिस्थितियों में अपराध हो सकता है।
पति या पत्नी के जीवित रहते पुनर्विवाह - धारा 82 - यदि पति या पत्नी जीवित है और पहला विवाह वैध रूप से अस्तित्व में है, तो दूसरा विवाह करना, निर्धारित अपवादों के अभाव में, द्विविवाह (marrying again during lifetime of husband or wife) का अपराध है।
मूल सिद्धांत - Valid first marriage + spouse living + second marriage = अपराध, यदि वैधानिक अपवाद लागू न हो।
धोखाधड़ी से विवाह की रस्म - धारा 83 - यदि कोई व्यक्ति यह जानते हुए कि उसके कारण वैध विवाह नहीं हो रहा है, धोखे से विवाह की रस्म पूरी करता है, तो वह अपराध कर सकता है।
विवाहित महिला को ले जाना/रोकना - धारा 84 - किसी महिला को, यह जानते हुए या विश्वास करने का कारण रखते हुए कि वह किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी है ले जाना, बहलाना, या रोककर रखना, इस उद्देश्य से कि वह किसी व्यक्ति के साथ अवैध यौन संबंध बनाए, अपराध हो सकता है।
पति या पति के रिश्तेदार द्वारा क्रूरता - धारा 85 - पति या पति का रिश्तेदार यदि महिला के साथ cruelty करता है तो धारा 85 के अंतर्गत दंडनीय है।
क्रूरता की परिभाषा - धारा 86 - क्रूरता का अर्थ केवल शारीरिक मारपीट नहीं है। यहां दो प्रकार की परिस्थितियाँ महत्वपूर्ण हैं -
(क) ऐसा जानबूझकर किया गया आचरण - जिससे महिला को आत्महत्या करने के लिए प्रेरित करने या उसके जीवन, अंग या स्वास्थ्य को गंभीर खतरा/हानि होने की संभावना हो।
(ख) अवैध संपत्ति/दहेज मांग से संबंधित उत्पीड़न - महिला या उसके रिश्तेदारों पर अवैध धन या संपत्ति की मांग पूरी करने के लिए दबाव डालना।
जबरन विवाह - धारा 87 - किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध - विवाह करने के लिए मजबूर करना या उसे विवाह के लिए प्रेरित/ले जाना गंभीर अपराध हो सकता है।
गर्भपात/गर्भस्राव कराने से संबंधित अपराध - धारा 88 से 92 - यह भाग गर्भवती महिला, गर्भस्थ शिशु और जन्म की प्रक्रिया से संबंधित आपराधिक संरक्षण प्रदान करता है।
गर्भपात कराने का अपराध - धारा 88 - यदि कोई व्यक्ति गर्भवती महिला का miscarriage कराता है, तो निर्धारित परिस्थितियों में अपराध बनता है। जिसमें
• महिला गर्भवती हो।
• miscarriage कराया गया हो।
• आरोपी ने जानबूझकर ऐसा कार्य किया हो।
• मामला वैधानिक अपवाद के अंतर्गत न आता हो।
महत्वपूर्ण - यह प्रावधान उन परिस्थितियों को अपराध बनाता है जहाँ गर्भस्राव कानून द्वारा अनुमत अपवाद के बाहर कराया जाता है।
महिला की सहमति के बिना गर्भपात - धारा 89 - यदि किसी महिला की सहमति के बिना miscarriage कराया जाता है तो अपराध अधिक गंभीर हो जाता है। यह महिला की शारीरिक स्वायत्तता, प्रजनन संबंधी स्वतंत्रता, स्वास्थ्य की रक्षा से संबंधित है।
गर्भपात कराने के उद्देश्य से किए गए कार्य से महिला की मृत्यु - धारा 90 -
यदि miscarriage कराने के उद्देश्य से किए गए कार्य के परिणामस्वरूप महिला की मृत्यु हो जाती है, तो कठोर दंड का प्रावधान है।
सहमति का प्रश्न - यदि महिला की सहमति के बिना ऐसा कार्य किया गया था, तो अपराध की गंभीरता और बढ़ जाती है।
बच्चे को जीवित जन्म लेने से रोकना - धारा 91 - ऐसा कार्य करना जिसका उद्देश्य बच्चे को जीवित जन्म लेने से रोकना या जन्म के बाद उसकी मृत्यु कारित करना हो, निर्धारित परिस्थितियों में अपराध है। यह प्रावधान गर्भस्थ/जन्म की अवस्था में बच्चे के जीवन की रक्षा से जुड़ा है।
गर्भस्थ विकसित शिशु की मृत्यु - धारा 92 - यदि कोई व्यक्ति ऐसा कार्य करता है जो परिस्थितियों के अनुसार culpable homicide की श्रेणी में आता, और उसके परिणामस्वरूप एक quick unborn child की मृत्यु होती है, तो धारा 92 लागू हो सकती है। यह miscarriage से अलग और अधिक गंभीर परिस्थिति है।
धारा - विषय -
14–17 विधि/न्यायालय/कानूनी औचित्य से संबंधित अपवाद
18–19 दुर्घटना एवं आवश्यकता
20–21 बाल अपराधियों से संबंधित अपवाद
22–24 अस्वस्थ मस्तिष्क एवं नशा
25–31 सहमति एवं सद्भावना से किए कार्य
32–33 धमकी एवं तुच्छ हानि
34–44 निजी प्रतिरक्षा
45–60 दुष्प्रेरण
61 आपराधिक षड्यंत्र
62 अपराध का प्रयास
63 बलात्कार
64 बलात्कार की सजा
65 विशेष परिस्थितियों में बलात्कार की सजा
66 बलात्कार से मृत्यु/Persistent Vegetative State
67 अलग रह रही पत्नी के साथ यौन संबंध
68 अधिकार/पद का दुरुपयोग कर यौन संबंध
69 छलपूर्ण साधनों से यौन संबंध
70 सामूहिक बलात्कार
71 पुनरावर्ती यौन अपराधी
72 पीड़िता की पहचान प्रकाशित करना
73 न्यायालय की कार्यवाही से संबंधित प्रकाशन
74 महिला की लज्जा भंग करने हेतु हमला/बल
75 यौन उत्पीड़न
76 निर्वस्त्र करने का प्रयास
77 Voyeurism
78 Stalking
79 महिला की मर्यादा का अपमान
80 दहेज मृत्यु
81 छलपूर्वक सहवास
82 पति/पत्नी के जीवित रहते पुनर्विवाह
83 धोखाधड़ीपूर्ण विवाह-समारोह
84 विवाहित महिला को बहलाना/ले जाना/रोकना
85 पति/रिश्तेदार द्वारा क्रूरता
86 क्रूरता की परिभाषा
87 महिला को विवाह के लिए मजबूर करना
88 गर्भपात/गर्भस्राव कराना
89 महिला की सहमति के बिना गर्भपात
90 गर्भपात कराने के कार्य से महिला की मृत्यु
91 बच्चे को जीवित जन्म लेने से रोकना
92 गर्भपात/गर्भस्थ शिशु से संबंधित अपराध
नोट - धारा 63–92 की सामग्री को मैंने BNS के आधिकारिक पाठ के आधार पर रखा है। India Code के अनुसार BNS 2023 का प्रवर्तन 1 जुलाई 2024 से हुआ।
बच्चों के विरुद्ध अपराध धारा 93–99 एवं चिकित्सीय गर्भसमापन अधिनियम, 1971 (Medical Termination of Pregnancy Act, 1971 में amendment 2021) -
चिकित्सीय गर्भसमापन अधिनियम, 1971 में संशोधन अधिनियम, 2021 - मूल अधिनियम - 1971 मे बनाया
लागू - 1 अप्रैल 1972
संशोधित - 25 मार्च 2021 को राष्ट्रपति की स्वीकृति
लागू - 24 सितंबर 2021
अधिसूचित - 12 अक्टूबर 202
चिकित्सीय गर्भसमापन अधिनियम, 1971 का उद्देश्य कुछ परिस्थितियों में पंजीकृत चिकित्सकों द्वारा गर्भ का सुरक्षित और कानूनी रूप से समापन करना है। समय के साथ चिकित्सा-विज्ञान, महिलाओं के प्रजनन अधिकारों और सुरक्षित गर्भसमापन की आवश्यकता को देखते हुए इसमें कुछ परिवर्तन किए गए। किए गए।
संशोधन के प्रमुख उद्देश्य -
1. महिलाओं को सुरक्षित एवं कानूनी गर्भसमापन की बेहतर सुविधा देना।
2. गर्भसमापन की अधिकतम अवधि का कुछ परिस्थितियों में विस्तार करना।
3. अवांछित गर्भधारण की स्थिति में महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करना।
4. भ्रूण में गंभीर विकृतियों की स्थिति में गर्भसमापन की सुविधा देना।
5. गर्भसमापन कराने वाली महिला की निजता और गोपनीयता की रक्षा करना।
6. गर्भनिरोधक साधनों की विफलता के आधार को अधिक व्यापक बनाना।
2021 संशोधन की प्रमुख विशेषताएँ -
(क) 20 सप्ताह तक गर्भसमापन - 20 सप्ताह तक के गर्भ के मामले में एक पंजीकृत चिकित्सा व्यवसायी (Registered Medical Practitioner) की राय के आधार पर गर्भसमापन किया जा सकता है, बशर्ते अधिनियम की अन्य आवश्यक शर्तें पूरी हों। अर्थात पहले जहाँ निर्धारित परिस्थितियों में चिकित्सकीय राय आवश्यक थी, संशोधन ने 20 सप्ताह तक की अवधि में प्रक्रिया को अपेक्षाकृत सरल बनाया।
(ख) 20 से 24 सप्ताह तक गर्भसमापन - 20 से 24 सप्ताह के गर्भ के लिए दो पंजीकृत चिकित्सा व्यवसायियों की राय आवश्यक की गई है। यह व्यवस्था विशेष रूप से नियमों में निर्धारित श्रेणियों की महिलाओं के लिए लागू होती है।
(ग) 24 सप्ताह तक की सीमा - संशोधन ने निर्धारित श्रेणियों की महिलाओं के लिए गर्भसमापन की अधिकतम सीमा को 20 सप्ताह से बढ़ाकर 24 सप्ताह कर दिया। नियमों में ऐसी श्रेणियों में बलात्कार से गर्भवती महिलाएँ, नाबालिग, विधवा या तलाकशुदा महिलाओं की कुछ परिस्थितियाँ आदि शामिल की गई हैं।
(घ) भ्रूण में गंभीर विकृति होने पर विशेष व्यवस्था - यदि भ्रूण में substantial foetal abnormalities अर्थात गंभीर भ्रूणीय असामान्यता का निदान होता है, तो सामान्य 24 सप्ताह की सीमा लागू नहीं होती। ऐसी स्थिति में Medical Board की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। इसका उद्देश्य यह है कि गंभीर और असाध्य भ्रूणीय विकृति के मामलों में महिला को केवल गर्भावस्था की समय-सीमा के कारण कानूनी गर्भसमापन से वंचित न होना पड़े।
(ङ) गर्भनिरोधक साधनों की विफलता।2021 संशोधन ने contraceptive failure के आधार को अधिक व्यापक बनाया। पहले यह आधार विवाहित महिला के संदर्भ में था। संशोधन ने इसे महिला और उसके साथी तक विस्तारित किया। इसलिए अवांछित गर्भधारण के संबंध में विवाह की स्थिति को लेकर पुरानी सीमा को हटाया गया।
(च) महिला की निजता की सुरक्षा - संशोधन ने गर्भसमापन कराने वाली महिला की गोपनीयता और निजता की रक्षा को मजबूत किया। किसी महिला की पहचान और उससे संबंधित जानकारी को अनधिकृत रूप से सार्वजनिक करना कानून के तहत दंडनीय हो सकता है। यह प्रावधान महिला को सामाजिक कलंक, भेदभाव और अनावश्यक सार्वजनिक हस्तक्षेप से बचाने के लिए महत्वपूर्ण है।
(छ) महिलाओं के प्रजनन अधिकारों की दृष्टि से महत्व - संशोधन का व्यापक उद्देश्य केवल गर्भसमापन की अवधि बढ़ाना नहीं था, बल्कि महिलाओं को सुरक्षित, कानूनी और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवा तक पहुँच प्रदान करना भी था। सरकार ने भी इसे महिलाओं की सुरक्षा और कल्याण तथा सुरक्षित एवं कानूनी गर्भसमापन की पहुँच बढ़ाने वाला संशोधन बताया है।
कुछ तथ्य -
20 सप्ताह → 1 डॉक्टर की राय
20–24 सप्ताह → 2 डॉक्टरों की राय
गंभीर भ्रूणीय असामान्यता → Medical Board की व्यवस्था
Contraceptive failure → महिला और उसका साथी
Privacy → महिला की पहचान की सुरक्षा
बच्चों के विरुद्ध अपराध - BNS की धारा 93–99 - BNS, 2023 के अध्याय V में महिलाओं और बच्चों से संबंधित अपराधों के प्रावधान हैं। धारा 93 से 99 Of Offences Against Child के अंतर्गत आती हैं।
इन धाराओं का उद्देश्य बच्चों को -
परित्याग जन्म छिपाने, अपराध में इस्तेमाल करने, यौन शोषण, अपहरण, वेश्यावृत्ति, अनैतिक उद्देश्यों तथा आर्थिक/यौन शोषण से बचाना है।
धारा 93 - 12 वर्ष से कम बच्चे का परित्याग -
अपराध का स्वरूप - यदि कोई माता-पिता या बच्चे की देखभाल करने वाला व्यक्ति, 12 वर्ष से कम आयु के बच्चे को इस उद्देश्य से किसी स्थान पर छोड़ देता है या छोड़कर चला जाता है कि उसका पूर्णत परित्याग कर दिया जाए, तो धारा 93 लागू होती है।
इस अपराध हेतु आवश्यक तत्व -
1. बच्चा 12 वर्ष से कम आयु का हो।
2. आरोपी बच्चे का पिता, माता या उसकी देखभाल करने वाला व्यक्ति हो।
3. बच्चे को किसी स्थान पर छोड़ा या वहाँ रहने दिया गया हो।
4. आरोपी का उद्देश्य बच्चे को पूरी तरह छोड़ देना/परित्याग करना हो।
दंड - अधिकतम 7 वर्ष का कारावास, या जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं।
महत्वपूर्ण बात - यदि बच्चे की मृत्यु इस परित्याग के कारण हो जाती है, तो केवल धारा 93 तक मामला सीमित नहीं रहेगा। परिस्थितियों के अनुसार आरोपी पर हत्या या आपराधिक मानव वध का आरोप भी लगाया जा सकता है।
उदाहरण - माता-पिता नवजात बच्चे को इस उद्देश्य से सुनसान स्थान पर छोड़ दें कि वे उसे कभी वापस नहीं लेंगे, तो धारा 93 लागू हो सकती है।
धारा 94 - जन्म छिपाने के लिए मृत बच्चे के शव का गुप्त निपटान
अपराध - यदि कोई व्यक्ति बच्चे के जन्म को छिपाने के उद्देश्य से उस बच्चे के मृत शरीर को गुप्त रूप से दफन करता है या अन्य प्रकार से उसका निपटान करता है, तो धारा 94 लागू होती है। यहाँ बच्चा -
1. जन्म से पहले मर सकता है
2. जन्म के दौरान मर सकता है
3. जन्म के बाद मर सकता है।
इसमें मुख्य बात है जन्म को छिपाने का जानबूझकर किया गया प्रयास।
दंड - अधिकतम 2 वर्ष का कारावास, या जुर्माना, या दोनों।
उदाहरण - कोई व्यक्ति बच्चे के जन्म की जानकारी छिपाने के लिए उसके शव को चोरी-छिपे दफना देता है, तो धारा 94 लागू हो सकती है।
धारा 95 बच्चे को अपराध करने के लिए नियुक्त करना - यह BNS की महत्वपूर्ण नई व्यवस्थाओं में से एक है। पूर्व IPC में इसका ऐसा पृथक प्रावधान नहीं था।
अपराध - जो व्यक्ति किसी बच्चे को अपराध करने के लिए hire, employ या engage करता है, वह धारा 95 के अंतर्गत अपराध करता है। इसमें विशेष रूप से बच्चे का उपयोग -
1. अपराध करवाने,
2. यौन शोषण,
3. pornography,
4. अन्य आपराधिक गतिविधियों
के लिए करना शामिल है।
दंड - कम से कम 3 वर्ष और अधिकतम 10 वर्ष का कारावास तथा जुर्माना और यदि बच्चे से वास्तव में वह अपराध करवाया गया है, तो बच्चे को अपराध में लगाने वाले व्यक्ति को उस अपराध के लिए भी वही दंड भुगतना पड़ सकता है, जैसे उसने स्वयं वह अपराध किया हो।
उदाहरण - A किसी 15 वर्षीय बच्चे को चोरी करने के लिए पैसे देता है और उसे चोरी करने भेजता है। A पर धारा 95 के साथ-साथ किए गए अपराध के अनुसार अन्य दायित्व भी हो सकता है।
विशेष महत्व - यह धारा बच्चों को अपराध के औजार के रूप में इस्तेमाल किए जाने से बचाती है।
धारा 96 - बच्चे को अवैध यौन संबंध के लिए प्रेरित करना -
अपराध - यदि कोई व्यक्ति किसी भी साधन से बच्चे को
1. किसी स्थान से जाने को प्रेरित करता है
2. या कोई कार्य करने हेतु प्रेरित करता है
3. या इस उद्देश्य से कि बच्चे को किसी अन्य व्यक्ति के साथ अवैध यौन संबंध (illicit intercourse) के लिए विवश या प्रेरित किया जाए, तो धारा 96 लागू होती है। इसमें महत्वपूर्ण परिवर्तन यह किया गया कि पुरानी IPC की धारा 366A में minor girl का उल्लेख था। BNS की धारा 96 में child का प्रयोग करके सुरक्षा को लैंगिक रूप से अधिक व्यापक और gender-neutral बनाया गया है।
दंड - अधिकतम 10 वर्ष का कारावास और जुर्माना। यह अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती है तथा इसका विचारण Court of Session द्वारा किया जाता है।
उदाहरण - कोई व्यक्ति बच्चे को बहला-फुसलाकर दूसरे शहर ले जाता है ताकि उसे किसी व्यक्ति के साथ यौन संबंध के लिए उपलब्ध कराया जा सके। ऐसी परिस्थिति धारा 96 के अंतर्गत आ सकती है।
धारा 97 - 10 वर्ष से कम बच्चे का अपहरण करके उसके शरीर से संपत्ति चोरी करना -
अपराध - यदि कोई व्यक्ति 10 वर्ष से कम आयु के बच्चे का अपहरण या व्यपहरण करता है और उसका उद्देश्य बच्चे के शरीर से कोई चल संपत्ति बेईमानी से लेना है, तो धारा 97 लागू होती है। इसके आवश्यक तत्व -
1. पीड़ित बच्चा 10 वर्ष से कम हो।
2. उसका kidnapping या abduction हुआ हो।
3. आरोपी का उद्देश्य बच्चे के शरीर से कोई चल संपत्ति लेना हो।
4. संपत्ति लेने का उद्देश्य dishonest होना चाहिए।
दंड - अधिकतम 7 वर्ष का कारावास और जुर्माना।
उदाहरण - किसी 8 वर्षीय बच्चे को उसके गले की सोने की चेन लेने के उद्देश्य से उठा ले जाना धारा 97 के अंतर्गत आ सकता है।
धारा 98 - बच्चे को वेश्यावृत्ति आदि के लिए बेचना
अपराध - जो व्यक्ति किसी बच्चे को बेचता है, किराए पर देता है, या किसी अन्य तरीके से उसके अधिकार/कब्जे को हस्तांतरित करता है या इस उद्देश्य से कि बच्चे का उपयोग
1. prostitution,
2. illicit intercourse,
3. unlawful या immoral purpose
के लिए किया जाए या ऐसा होने की संभावना का ज्ञान हो, तो धारा 98 लागू होती है।
दंड - अधिकतम 10 वर्ष का कारावास और जुर्माना। इसमें परिवर्तन IPC की धारा 372 में minor शब्द था, जबकि BNS में child शब्द का प्रयोग किया गया है।
उदाहरण - कोई व्यक्ति किसी बच्चे को पैसे लेकर ऐसे व्यक्ति को सौंप देता है जो बच्चे का इस्तेमाल वेश्यावृत्ति के लिए करने वाला है। धारा 98 लागू हो सकती है।
धारा 99 - बच्चे को वेश्यावृत्ति आदि के लिए खरीदना, धारा 98 का दूसरा पक्ष धारा 99 है।
अपराध - जो व्यक्ति किसी बच्चे को:खरीदता है hire करता है,या किसी अन्य तरीके से अपने कब्जे में लेता है, इस उद्देश्य से कि बच्चे का उपयोग
prostitution
illicit intercourse
unlawful या immoral purpose के लिए किया जाए या ऐसी संभावना का उसे ज्ञान हो, तो धारा 99 लागू होती है।
दंड - कम से कम 7 वर्ष और अधिकतम 14 वर्ष का कारावास तथा जुर्माना। यहाँ BNS ने IPC की तुलना में दंड को अधिक कठोर बनाया है। IPC में अधिकतम अवधि 10 वर्ष थी, जबकि BNS में न्यूनतम 7 वर्ष और अधिकतम 14 वर्ष किया गया है।
4. धारा 93–99 का सार -
धारा अपराध मुख्य बात दंड
93 बच्चे का exposure / abandonment 12 वर्ष से कम बच्चे को पूर्णतः छोड़ना 7 वर्ष तक/जुर्माना/दोनों
94 जन्म छिपाना मृत बच्चे के शव का गुप्त निपटान 2 वर्ष तक/जुर्माना/दोनों
95 बच्चे से अपराध करवाना बच्चे को अपराध के लिए hire/ employ/ engage करना 3–10 वर्ष + जुर्माना
96 बच्चे की procuration अवैध यौन संबंध के लिए बच्चे को प्रेरित करना 10 वर्ष तक + जुर्माना
97 बच्चे का अपहरण कर चोरी 10 वर्ष से कम बच्चे से संपत्ति चोरी करने हेतु kidnapping/abduction 7 वर्ष तक + जुर्माना
98 बच्चे को बेचना prostitution आदि के लिए 10 वर्ष तक + जुर्माना
99 बच्चे को खरीदना prostitution आदि के लिए 7–14 वर्ष + जुर्माना
धारा 93–99 के दंड और अपराध- वर्गीकरण का आधिकारिक अपराध-सारणी में भी यही स्वरूप दिया गया है।
निष्कर्ष - भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 93 से 99 बच्चों के विरुद्ध होने वाले विभिन्न प्रकार के शोषण और अपराधों को दंडित करती हैं। धारा 93 बच्चे के परित्याग, धारा 94 जन्म छिपाने, धारा 95 बच्चे को अपराध में लगाने, धारा 96 बच्चे को अवैध यौन संबंध के लिए प्रेरित करने, धारा 97 छोटे बच्चे के अपहरण द्वारा संपत्ति चोरी, तथा धाराएँ 98 और 99 क्रमशः बच्चे को वेश्यावृत्ति आदि के लिए बेचने और खरीदने से संबंधित हैं। इन प्रावधानों का मूल उद्देश्य बच्चे को परित्याग, अपराधीकरण, यौन शोषण, अपहरण और वाणिज्यिक शोषण से कानूनी सुरक्षा प्रदान करना है। विशेष रूप से धारा 95 का नया प्रावधान और धारा 96 में gender-neutral “child” का प्रयोग BNS के बाल-सुरक्षा दृष्टिकोण को अधिक व्यापक बनाता है।
ट्रिक - 93 छोड़ना → 94 जन्म छिपाना → 95 अपराध करवाना → 96 यौन शोषण के लिए बहलाना → 97 चोरी के लिए अपहरण → 98 बेचना → 99 खरीदना।
जीवन के विरुद्ध अपराध, BNS की धारा 100 से 110 -
जीवन के विरुद्ध अपराध - जीवन मनुष्य का सबसे मूलभूत और महत्वपूर्ण अधिकार है। भारतीय विधि में किसी व्यक्ति के जीवन को जानबूझकर या आपराधिक लापरवाही से समाप्त करना गंभीर अपराध है। BNS में जीवन के विरुद्ध प्रमुख अपराधों का प्रारंभ धारा 100 से होता है।
मानव वध (Homicide) - Homicide का सामान्य अर्थ है एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य की मृत्यु कारित करना। हर Homicide अपराध नहीं होता। उदाहरण के लिए, विधि द्वारा अधिकृत परिस्थितियों में किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित होना हमेशा अपराध नहीं माना जाएगा।
मानव वध मुख्यत - दो प्रकार का समझा जा सकता है:
(क) वैध मानव वध (Justifiable Homicide) - जब मृत्यु कानून द्वारा अनुमत परिस्थिति में कारित हो, जैसे वैध निजी प्रतिरक्षा में आवश्यक सीमा तक बल का प्रयोग।
(ख) अवैध मानव वध (Unlawful Homicide) - जब किसी व्यक्ति की मृत्यु कानून के विरुद्ध कारित की जाए। इसी अवैध मानव वध की गंभीर श्रेणियों में आपराधिक मानव वध और हत्या आती हैं।
आपराधिक मानव वध (Culpable Homicide) -
धारा 100 - BNS की धारा 100 के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति ऐसा कार्य करके मृत्यु कारित करता है जिसमें -
1. मृत्यु कारित करने का आशय (Intention) हो; या
2. ऐसी शारीरिक क्षति कारित करने का आशय हो जिससे मृत्यु होने की संभावना हो; या
3. उसे यह ज्ञान (Knowledge) हो कि उसके कार्य से मृत्यु होने की संभावना है,
तो परिस्थितियों के अनुसार वह आपराधिक मानव वध (Culpable Homicide) कर सकता है।
इसके आवश्यक तत्व -
1. मृत्यु हुई हो - किसी जीवित मनुष्य की मृत्यु होना आवश्यक है।
2. मृत्यु आरोपी के कार्य से हुई हो -
मृत्यु और आरोपी के कृत्य के बीच कारणात्मक संबंध होना चाहिए।
3. आशय या ज्ञान मौजूद हो - केवल दुर्घटना हो जाना पर्याप्त नहीं है। आरोपी की मानसिक अवस्था अर्थात intention या knowledge महत्वपूर्ण है।
उदाहरण - A, B को ऐसी चोट पहुँचाता है जिसके कारण B की मृत्यु हो जाती है और A को पता था कि इस प्रकार की चोट से मृत्यु होने की संभावना है तो यह परिस्थितियों के आधार पर Culpable Homicide हो सकता है।
3. हत्या (Murder) - धारा 101 - BNS की धारा 101 यह निर्धारित करती है कि किन परिस्थितियों में आपराधिक मानव वध हत्या (Murder) बन जाता है।
सरल भाषा में: हर हत्या आपराधिक मानव वध है, लेकिन हर आपराधिक मानव व हत्या नहीं है। यही इस पूरे अध्याय का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है।
कब Culpable Homicide, Murder बनता है? - जब मृत्यु कारित करने वाला कार्य ऐसी परिस्थितियों में किया जाए जिनमें कानून हत्या के लिए निर्धारित मानसिक तत्व और परिस्थितियाँ पूरी हों।मुख्य रूप से निम्न परिस्थितियाँ महत्वपूर्ण हैं -
(1) मृत्यु कारित करने का आशय - यदि आरोपी का स्पष्ट उद्देश्य किसी व्यक्ति की मृत्यु करना है, तो हत्या की श्रेणी बन सकती है।
उदाहरण - A जानबूझकर B को गोली मारकर उसकी मृत्यु कर देता है।
(2) ऐसी शारीरिक क्षति पहुँचाने का आशय जिससे मृत्यु होने की संभावना हो - यदि आरोपी को चोट पहुँचाने का उद्देश्य है और वह चोट मृत्यु कारित करने की प्रकृति की है, तो हत्या बन सकती है।
(3) विशेष रूप से खतरनाक कार्य - यदि आरोपी ऐसा कार्य करता है जो सामान्यतः अत्यंत खतरनाक है और उसे यह ज्ञान है कि उससे मृत्यु होने की बहुत अधिक संभावना है तथा फिर भी वह बिना किसी उचित कारण के ऐसा करता है, तो हत्या का प्रश्न उठ सकता है।
हत्या और आपराधिक मानव वध में अंतर -
आधार - आपराधिक - मानव वध हत्या
प्रकृति - व्यापक अवधारणा अधिक गंभीर श्रेणी
मानसिक तत्व - आशय/ज्ञान अधिक गंभीर स्तर का आशय/ज्ञान
संबंध - सभी हत्या इसमें आती हैं यह culpable homicide की गंभीर श्रेणी है
अपवाद - परिस्थितियों के अनुसार धारा 101 के अपवाद लागू हो सकते हैं
दंड - परिस्थितियों के अनुसार अधिक कठोर
सूत्र -
Culpable Homicide = व्यापक श्रेणी
Murder = उसी की अधिक गंभीर श्रेणी
हत्या के अपवाद - यह समझना बहुत जरूरी है कि हर ऐसा मामला जिसमें व्यक्ति ने दूसरे की मृत्यु कारित की है, स्वतः हत्या नहीं बन जाता।
धारा 101 के कुछ अपवाद (Exceptions) - कुछ शर्तें पूरी होने पर आपराधिक मानव वध को हत्या नहीं माना जा सकता।
अपवाद 1 - गंभीर और अचानक उकसावा - यदि व्यक्ति को अचानक और गंभीर उकसावा मिलता है और उसके कारण वह नियंत्रण खोकर मृत्यु कारित कर देता है, तो परिस्थितियों के अनुसार मामला हत्या के बजाय आपराधिक मानव वध की श्रेणी में आ सकता है।
अपवाद 2 - निजी प्रतिरक्षा की सीमा से अधिक बल - यदि व्यक्ति सद्भावना में निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करता है, लेकिन कानून द्वारा अनुमत सीमा से अधिक चला जाता है और मृत्यु हो जाती है, तो परिस्थितियों में अपराध की श्रेणी अलग हो सकती है।
अपवाद 3 - लोक सेवक द्वारा अधिकार का अतिक्रमण - यदि कोई लोक सेवक अपने कर्तव्य के निर्वहन में सद्भावना से कार्य करता है, लेकिन अपनी विधिक शक्ति की सीमा से आगे चला जाता है और मृत्यु हो जाती है, तो परिस्थितियों के अनुसार हत्या का अपराध न बनकर कम गंभीर अपराध बन सकता है।
अपवाद 4: अचानक लड़ाई यदि अचानक झगड़ा हुआ, कोई पूर्व-नियोजित योजना नहीं थी, अचानक लड़ाई हुई, आरोपी ने अनुचित लाभ नहीं उठाया, और क्रूर या असामान्य तरीके से कार्य नहीं किया, तो मृत्यु होने पर मामला परिस्थितियों के अनुसार हत्या के बजाय आपराधिक मानव वध हो सकता है।
अपवाद 5 - वयस्क व्यक्ति की सहमति-कुछ विशेष परिस्थितियों में 18 वर्ष से अधिक आयु का व्यक्ति अपनी मृत्यु के जोखिम को स्वीकार करता है और उसके संदर्भ में मृत्यु कारित होती है, तो कानून में निर्धारित अपवाद लागू हो सकता है।
5. हत्या के लिए दंड - धारा 103 - BNS की धारा 103 हत्या के दंड से संबंधित है। हत्या के लिए मृत्युदंड या आजीवन कारावास तथा जुर्माना का प्रावधान है। अर्थात न्यायालय मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर उपयुक्त दंड निर्धारित करता है।
विशेष स्थिति - यदि पाँच या अधिक व्यक्तियों का समूह, नस्ल, जाति या समुदाय, लिंग, जन्मस्थान, भाषा, व्यक्तिगत विश्वास या इसी प्रकार के आधार पर किसी व्यक्ति की हत्या करता है, तो प्रत्येक सदस्य के लिए कठोर दंड का विशेष प्रावधान है।
यह BNS की महत्वपूर्ण विशेषता है।
लापरवाही से मृत्यु कारित करना धारा 106 - BNS की धारा 106 लापरवाही या उपेक्षा से मृत्यु कारित करने से संबंधित है।यह हत्या या culpable homicide से अलग अपराध है क्योंकि इसमें मृत्यु कारित करने का आशय नहीं होता।
उदाहरण - A वाहन को अत्यंत लापरवाही से चलाता है और उसकी लापरवाही के कारण B की मृत्यु हो जाती है। यदि आवश्यक कानूनी तत्व सिद्ध होते हैं, तो यह लापरवाही से मृत्यु कारित करने का अपराध हो सकता है।
मुख्य तत्व -
1. किसी व्यक्ति की मृत्यु हुई।
2. मृत्यु आरोपी के कार्य से हुई।
3. आरोपी ने लापरवाहीपूर्ण या उपेक्षापूर्ण कार्य किया।
4. मृत्यु उस लापरवाही से पर्याप्त रूप से जुड़ी हुई है।
5. मृत्यु कारित करने का वह आशय/ज्ञान नहीं था जो culpable homicide या murder के लिए आवश्यक है।
हत्या आपराधिक मानव वध और लापरवाही से मृत्यु में अंतर -
हत्या - मृत्यु कारित करने का गंभीर आशय/ज्ञान।
आपराधिक मानव वध - मृत्यु कारित करने का आशय या मृत्यु की संभावना का ज्ञान।
लापरवाही से मृत्यु - मृत्यु का आशय नहीं, बल्कि आपराधिक स्तर की लापरवाही/उपेक्षा।
आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण (Abetment) - धारा 108 - BNS की धारा 108 आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण (Abetment of Suicide) से संबंधित है। यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरित करता है और विधि में आवश्यक तत्व सिद्ध होते हैं, तो वह अपराधी हो सकता है। यहाँ दुष्प्रेरण की अवधारणा महत्वपूर्ण है। दुष्प्रेरण में -
• उकसाना
• षड्यंत्र में सम्मिलित होना या
• जानबूझकर सहायता करना
जैसे तत्व आ सकते हैं, जैसा BNS की संबंधित धाराओं में निर्धारित है।
हत्या का प्रयास - धारा 109 - BNS की धारा 109 हत्या के प्रयास (Attempt to Murder) से संबंधित है। जब कोई व्यक्ति ऐसा कार्य करता है जो हत्या करने की दिशा में प्रत्यक्ष कदम है, लेकिन किसी कारण से मृत्यु नहीं होती, तो परिस्थितियों में यह हत्या का प्रयास हो सकता है।
उदाहरण - A, B को मारने के उद्देश्य से उस पर गोली चलाता है, लेकिन गोली B को नहीं लगती। यह परिस्थितियों के अनुसार हत्या का प्रयास हो सकता है।
आवश्यक तत्व -
1. हत्या करने का आवश्यक आशय/ज्ञान।
2. अपराध करने की दिशा में कोई प्रत्यक्ष कार्य।
3. कार्य केवल तैयारी तक सीमित न हो।
4. मृत्यु न हुई हो।
धारा 110: आपराधिक मानव वध का प्रयास - BNS की धारा 110 उस स्थिति से संबंधित है जब व्यक्ति ऐसा कार्य करता है जो आपराधिक मानव वध करने के प्रयास की श्रेणी में आता है। यह हत्या के प्रयास से अलग है।
अंतर -
धारा 109 → हत्या का प्रयास
धारा 110 → आपराधिक मानव वध का प्रयास
इस अंतर का आधार आरोपी का आशय/ज्ञान और परिस्थितियों की गंभीरता है।
धारा 100–110 चार्ट -
100 आपराधिक मानव वध की परिभाषा
101 हत्या
102 उस व्यक्ति के अलावा किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु कारित करना जिसके लिए मृत्यु कारित करने का आशय था
103 हत्या का दंड
104 आजीवन कारावास भुगत रहे व्यक्ति द्वारा हत्या
105 आपराधिक मानव वध, जो हत्या नहीं है, का दंड
106 उपेक्षा/लापरवाही से मृत्यु कारित करना
107 बालक या विकृतचित्त व्यक्ति की आत्महत्या का दुष्प्रेरण
108 आत्महत्या का दुष्प्रेरण
109 हत्या करने का प्रयास
110 आपराधिक मानव वध करने का प्रयास
तुलना -
मृत्यु हुई + आशय/ज्ञान → Culpable Homicide
Culpable Homicide + धारा 101 की आवश्यक परिस्थितियाँ → Murder
मृत्यु नहीं हुई + हत्या करने का आवश्यक आशय + प्रत्यक्ष कार्य → Attempt to Murder
मृत्यु हुई + आपराधिक लापरवाही + हत्या/मानव वध वाला आशय नहीं → धारा 106 - आत्महत्या + किसी अन्य का दुष्प्रेरण → धारा 107/108, परिस्थितियों के अनुसार
निष्कर्ष - जीवन के विरुद्ध अपराधों में BNS ने मृत्यु कारित करने वाले विभिन्न कृत्यों के बीच महत्वपूर्ण अंतर स्थापित किया है। आपराधिक मानव वध व्यापक अवधारणा है, जिसकी अधिक गंभीर श्रेणी हत्या है। दोनों के बीच अंतर मुख्यतः आरोपी के आशय, ज्ञान, परिस्थितियों और धारा 101 के अपवादों के आधार पर निर्धारित होता है। इसके विपरीत, लापरवाही से मृत्यु कारित करना ऐसी स्थिति है जिसमें मृत्यु का आवश्यक आपराधिक आशय नहीं होता, बल्कि आपराधिक लापरवाही या उपेक्षा के कारण मृत्यु होती है। इसी प्रकार हत्या और आपराधिक मानव वध के प्रयास से संबंधित धाराएँ यह सुनिश्चित करती हैं कि मृत्यु न होने पर भी गंभीर आपराधिक कृत्य दंड से मुक्त न रहे। इस प्रकार BNS जीवन की रक्षा के लिए मृत्यु, आशय, ज्ञान, लापरवाही और प्रयास के आधार पर अपराधों का क्रमबद्ध वर्गीकरण करता है।
धारा 114–120 एवं धारा 124 - चोट, गंभीर चोट एवं अम्ल हमला, चोट (Hurt) गंभीर चोट (Grievous Hurt)
अम्ल हमला (Acid Attack) -
यहाँ एक बात पहले साफ है कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) में चोट और गंभीर चोट से संबंधित धाराओं की numbering को लेकर अक्सर नोट्स में भ्रम हो जाता है। धारा 114 = Hurt (चोट) और धारा 115 = Voluntarily causing hurt or grievous hurt है। अम्ल हमले का प्रावधान धारा 124 है। धारा 116 में grievous hurt की श्रेणियाँ दी गई है।
1. चोट (Hurt) धारा 114 - जो कोई किसी व्यक्ति को शारीरिक पीड़ा (bodily pain), रोग (disease) या अशक्तता (infirmity) कारित करता है, वह hurt कारित करता है। अर्थात चोट के लिए आवश्यक नहीं कि शरीर पर खून निकले या दिखाई देने वाला घाव हो।
चोट के तीन आधार - किसी व्यक्ति को निम्न में से कोई एक चीज कारित होना पर्याप्त है -
(1) शारीरिक पीड़ा - मारना, थप्पड़ मारना, लात मारना, मुक्का मारना या शरीर के किसी अंग में दर्द पैदा करना।
(2) रोग - किसी व्यक्ति को जानबूझकर ऐसा रोग लगाना या फैलाना जिससे वह बीमार हो जाए।
(3) अशक्तता (Infirmity) - व्यक्ति की सामान्य शारीरिक या मानसिक कार्यक्षमता को अस्थायी या स्थायी रूप से प्रभावित करना।
उदाहरण - A ने B को थप्पड़ मारा। B के शरीर पर कोई निशान नहीं आया, लेकिन उसे शारीरिक पीड़ा हुई।
Hurt और Injury में अंतर - Injury का अर्थ शरीर या संपत्ति को हुई क्षति हो सकती है, लेकिन BNS में Hurt की विशेष वैधानिक परिभाषा है।
Hurt Injury - धारा 114 में परिभाषित अवधारणा Bodily pain, disease या infirmity व्यक्ति/संपत्ति को होने वाली क्षति का अर्थ शारीरिक पीड़ा होना पर्याप्त हो सकता है हर injury आवश्यक रूप से hurt नहीं होती
गंभीर चोट (Grievous Hurt) धारा 116 - इसमें गंभीर चोट की श्रेणियां दी गई हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि हर चोट grievous hurt नहीं होती। किसी चोट को grievous hurt तभी माना जाएगा जब वह कानून में दी गई निर्धारित श्रेणियों में आती हो।
गंभीर चोट की 8 श्रेणियां -
1. पुरुषत्व का स्थायी हरण - किसी पुरुष के पुरुषत्व (emasculation) का स्थायी रूप से हरण करना।
2. किसी आंख की दृष्टि का स्थायी हरण - यदि चोट के कारण किसी एक आंख की दृष्टि स्थायी रूप से चली जाती है।
3. किसी कान की श्रवण शक्ति का स्थायी हरण - यदि किसी एक कान से सुनने की शक्ति स्थायी रूप से समाप्त हो जाती है।
4. किसी अंग या जोड़ का हरण - किसी अंग या joint का स्थायी रूप से नष्ट होना या उसका उपयोग समाप्त हो जाना।
5. किसी अंग या जोड़ की शक्ति का नष्ट होना - अंग मौजूद है, लेकिन उसकी सामान्य कार्यक्षमता स्थायी रूप से समाप्त हो गई।
6. सिर या चेहरे का स्थायी विकृतिकरण - चेहरे या सिर को ऐसा नुकसान होना जिससे उसका स्थायी disfiguration हो जाए।
उदाहरण -
• चेहरे पर स्थायी गहरा निशान
• चेहरे की आकृति बिगाड़ देना
• ऐसी चोट जिससे स्थायी विकृति हो जाए
7. हड्डी या दांत का fracture/dislocation - किसी की हड्डी, दांत का fracture या dislocation होना।
महत्वपूर्ण बात यह है कि fracture केवल बड़ी हड्डी का होना आवश्यक नहीं है। कानून की दृष्टि से दांत का fracture भी grievous hurt हो सकता है।
8. ऐसी चोट जो जीवन को संकट में डाल दे - या 15 दिन तक severe bodily pain/सामान्य कार्य करने में असमर्थता पैदा करती है यदि चोट जीवन को संकट में डालती है, या व्यक्ति को 15 दिनों तक गंभीर शारीरिक पीड़ा में रखती है, या व्यक्ति को 15 दिनों तक अपने सामान्य काम करने में असमर्थ बनाती है, तो वह grievous hurt हो सकती है।
Hurt और Grievous Hurt में अंतर -
आधार - Hurt - Grievous Hurt
प्रावधान - धारा 114 - धारा 116
प्रकृति - सामान्य चोट - गंभीर चोट
शारीरिक पीड़ा - पर्याप्त हो सकती है - विशेष गंभीरता आवश्यक
Fracture - आवश्यक नहीं - fracture होने पर grievous
Permanent disfigurement - आवश्यक नहीं - होने पर grievous
Life endanger - आवश्यक नहीं - होने पर grievous
15 दिन severe pain/incapacity - आवश्यक नहीं - होने पर grievous
ट्रिक - पुरुषत्व - आंख - कान - अंग - शक्ति - चेहरा - हड्डी/दांत - 15 दिन
इन आठ चीजों में से कोई निर्धारित स्थिति मौजूद है तो Grievous Hurt की संभावना है।
स्वेच्छापूर्वक चोट कारित करना धारा 115 - धारा 114 केवल यह बताती है कि Hurt क्या है कि जब कोई व्यक्ति जानबूझकर/स्वेच्छा से किसी को hurt या grievous hurt करता है, तब धारा 115 का दंडात्मक प्रावधान लागू होता है।
इसमें दो स्थितियां हैं -
(A) Voluntarily causing hurt - यदि आरोपी
1. किसी व्यक्ति को hurt करता है, और
2. वह जानता या आशय रखता है कि उससे hurt होगी तो voluntarily causing hurt का अपराध बनता है।
(B) Voluntarily causing grievous hurt - यदि आरोपी के कार्य से grievous hurt होती है और वह ऐसी गंभीर चोट कारित करने के आशय/ज्ञान के साथ कार्य करता है, तो अधिक गंभीर दंड लागू होता है।
चोट कारित करने का आशय और ज्ञान - यहाँ mens rea महत्वपूर्ण है।
उदाहरण - A ने B को धक्का दिया। B गिर गया और उसके हाथ में fracture हो गया। अब केवल fracture हो जाना अपने-आप में हर परिस्थिति में voluntarily causing grievous hurt सिद्ध नहीं करता। न्यायालय को घटना के तथ्यों से यह देखना होगा कि आरोपी का आशय या ज्ञान क्या था। इसलिए आपराधिक दायित्व में: Act + Mens rea + Statutory requirements = Liability
खतरनाक हथियार/साधनों से चोट - यदि hurt या grievous hurt गोली/बंदूक, चाकू या काटने वाले उपकरण, आग, गर्म पदार्थ, विष, संक्षारक पदार्थ, विस्फोटक, शरीर के लिए खतरनाक किसी साधन से कारित की जाती है, तो सामान्य चोट की अपेक्षा अधिक गंभीर दंडात्मक प्रावधान लागू हो सकते हैं। यहाँ धारा 118 विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
अम्ल हमला (Acid Attack) : धारा 124 - BNS की धारा 124 अम्ल/acid से संबंधित गंभीर अपराध को नियंत्रित करती है। यह प्रावधान दो स्थितियों को संबोधित करता है -
धारा 124(1) - यदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति पर acid फेंकता है, acid डालता है, acid देने/डालने का प्रयास करता है, और उससे permanent या partial damage, deformity, burns, maiming, disfigurement, disability आदि होती है, तो गंभीर अपराध बनता है।इसमें आरोपी का आशय या ऐसा कार्य करने का ज्ञान महत्वपूर्ण है।
Acid Attack के आवश्यक तत्व - Acid attack के अपराध को समझने के लिए निम्न तत्व याद रखें
1. आरोपी का कार्य आरोपी ने acid फेंका, acid डाला या acid का प्रयोग किया/प्रयास किया।
2. पीड़ित व्यक्ति - हमला किसी व्यक्ति पर होना चाहिए।
3. आशय/ज्ञान - आरोपी के पास आवश्यक criminal intention या knowledge होना चाहिए।
4. परिणाम - इससे burns, disfigurement, disability, permanent/partial damage आदि होना आवश्यक है।
Acid Attack का दंड - धारा 124(1) के अंतर्गत acid से ऐसी चोट कारित करने पर कम से कम 10 वर्ष का कारावास, जो आजीवन कारावास तक हो सकता है के अतिरिक्त Fine भी लगाया जाता है। यह fine केवल सामान्य आर्थिक दंड के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि उसका उद्देश्य पीड़ित के medical expenses और rehabilitation को ध्यान में रखना भी है।
धारा 124(2) - यदि किसी व्यक्ति पर acid फेंकने या डालने का प्रयास किया जाता है, लेकिन वास्तविक गंभीर चोट/क्षति पूरी तरह कारित नहीं होती, तब भी कानून में अलग दंड का प्रावधान है। इस स्थिति में कम से कम 5 वर्ष का कारावास, जो 7 वर्ष तक हो सकता है, तथा fine हो सकता है। इसलिए
Actual attack ≠ केवल attempt
दोनों की अलग-अलग दंडात्मक व्यवस्था है।
Acid Attack को इतना गंभीर क्यों माना गया? - Acid attack में सामान्य चोट से अलग कई गंभीर परिणाम हो सकते हैं जिससे स्थायी चेहरे की विकृति, आंखों की दृष्टि की हानि, त्वचा एवं ऊतक का नष्ट होना, स्थायी disability, मानसिक आघात, सामाजिक एवं व्यावसायिक जीवन पर दीर्घकालिक प्रभाव इसीलिए कानून इसे अत्यंत गंभीर अपराध मानता है।
धारा 119 Hurt/Grievous Hurt द्वारा संपत्ति आदि के लिए दबाव - धारा 119 ऐसे मामलों से संबंधित है जहां किसी व्यक्ति को hurt या grievous hurt इस उद्देश्य से किया जाता है कि उससे संपत्ति, valuable security या कोई अवैध/अनुचित कार्य करवाया जाए या उसे किसी कार्य से रोक दिया जाए। अर्थात् यहाँ चोट स्वयं अंतिम उद्देश्य नहीं होती, बल्कि coercion/extortionary purpose से चोट का प्रयोग किया जाता है।
धारा 120 -Confession/ Property प्राप्त करने के लिए Hurt - धारा 120 उस स्थिति को संबोधित करती है जिसमें किसी व्यक्ति को hurt या grievous hurt इस उद्देश्य से किया जाता है कि confession प्राप्त किया जाए, कोई information प्राप्त की जाए, किसी अपराध या misconduct के संबंध में जानकारी मिले, property या valuable security वापस दिलवाई/प्राप्त की जाए, अथवा किसी claim/demand को satisfy कराया जाए।
उदाहरण - पुलिस या कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को मार-पीटकर यह स्वीकार करवाना चाहता है कि उसने चोरी की है।यह केवल सामान्य hurt नहीं है। यदि statutory ingredients पूरे होते हैं तो धारा 120 का विशेष अपराध बन सकता है।
धारा 117 Voluntarily causing grievous hurt से संबंधित विशेष परिस्थितियां - विशेष रूप से ऐसी स्थिति जहां grievous hurt किसी व्यक्ति या समूह को गंभीर रूप से प्रभावित करने वाली परिस्थिति में कारित की जाती है, धारा 117 के अंतर्गत प्रायोज्य है।
धारा 118 - Dangerous weapons or means द्वारा voluntarily causing hurt या grievous hurt अर्थात् साधारण मारपीट और खतरनाक हथियार से की गई मारपीट को कानून समान स्तर पर नहीं रखता।
धारा 114–120 : एक नजर में -
114 Hurt की परिभाषा
115 Voluntarily causing hurt or grievous hurt
116 Grievous hurt की परिभाषा
117 Voluntarily causing grievous hurt से संबंधित विशेष अपराध
118 Dangerous weapons/means से hurt या grievous hurt
119 Property/valuable security आदि के लिए hurt/grievous hurt
120 Confession/information/property आदि प्राप्त करने के लिए hurt/grievous hurt
121 Public servant को duty से रोकने आदि के संबंध में hurt/grievous hurt
122 Provocation पर hurt/grievous hurt
123 Poison आदि द्वारा hurt करने का विशेष अपराध
124 Acid attack एवं acid attack का attempt
उदाहरण 1 - A ने B को थप्पड़ मारा और B को दर्द हुआ = Hurt, धारा 114
उदाहरण 2 - यदि A ने जानबूझकर चोट पहुंचाई Voluntarily causing या
उदाहरण 3 - A ने B के दांत तोड़ दिए।
Grievous Hurt, क्योंकि tooth का fracture grievous hurt की श्रेणी में आता है
उदाहरण 4 - A ने B की आंख की दृष्टि स्थायी रूप से समाप्त कर दी = hurt धारा 115
उदाहरण 5 - A ने B के चेहरे पर acid फेंक दिया और चेहरे पर स्थायी disfigurement हुआ = धारा 124(1)
उदाहरण 6 - A ने B पर acid फेंकने की कोशिश की, लेकिन acid B को नहीं लगा = 124(2) का attempt
सदोष परिरोध एवं आपराधिक बल
सदोष अवरोध (Wrongful Restraint)
सदोष परिरोध (Wrongful Confinement)
आपराधिक बल (Criminal Force)
हमला (Assault)
धारा 126–131 -
BNS, 2023 Chapter VI, Offences Affecting the Human Body में धारा 126–131 के अंतर्गत पहले सदोष अवरोध, सदोष परिरोध, फिर बल, आपराधिक बल, हमला और उसकी सजा का प्रावधान है -
धारा 126 BNS सदोष अवरोध (Wrongful Restraint) - अर्थ जब कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी व्यक्ति के आने-जाने में इस प्रकार बाधा डालता है कि वह उस दिशा में आगे नहीं जा सकता, जिस दिशा में जाने का उसे कानूनी अधिकार है, तो इसे सदोष अवरोध कहते हैं। अर्थात किसी व्यक्ति की स्वतंत्र गति + किसी विशेष दिशा में बाधा = सदोष अवरोध हुआ।
धारा 126(1) के लिए निम्न तत्व आवश्यक हैं -
1. किसी व्यक्ति को रोका गया हो।
2. रोकना स्वेच्छापूर्वक किया गया हो।
3. बाधा डालने का परिणाम यह हो कि व्यक्ति किसी ऐसी दिशा में आगे न जा सके, जहाँ जाने का उसे अधिकार है।
4. बाधा डालने वाला व्यक्ति उस अधिकार के विरुद्ध कार्य कर रहा हो।
उदाहरण - A रास्ते में खड़ा होकर Z को रोक देता है और Z उस रास्ते से आगे नहीं जा पाता, जबकि Z को वहाँ से जाने का अधिकार है अतः A ने सदोष अवरोध किया।
अपवाद - यदि कोई व्यक्ति सद्भावना में यह विश्वास करता है कि उसे किसी निजी रास्ते को रोकने का वैध अधिकार है, तो ऐसी परिस्थिति धारा 126 के अपराध के अंतर्गत नहीं आती।
दण्ड - धारा 126(2) के अंतर्गत साधारण कारावास अधिकतम 1 माह, या जुर्माना अधिकतम ₹5,000, या दोनों।
ट्रिक - रास्ता रोकाने की सजा = एक माह जेल + 5000 जुर्माना।
धारा 127 BNS सदोष परिरोध - सदोष परिरोध, सदोष अवरोध का अधिक गंभीर रूप है।
परिभाषा - जब कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को इस प्रकार सदोष रूप से रोकता है कि वह कुछ निश्चित सीमाओं के बाहर नहीं जा सकता, तो उसे सदोष परिरोध कहते हैं अर्थात अवरोध = एक दिशा में रोकना व परिरोध = चारों/निर्धारित सीमाओं के भीतर बंद करना।
उदाहरण 1 - A व्यक्ति Z को कमरे में बंद कर देता है और Z कमरे से बाहर नहीं जा सकता यह सदोष परिरोध।
उदाहरण 2 - A व्यक्ति भवन के सभी निकास द्वारों पर हथियारबंद व्यक्तियों को खड़ा कर देता है और Z को धमकी देता है कि बाहर निकलने पर गोली मार दी जाएगी। यहाँ वास्तविक रूप से दरवाजा बंद न होने पर भी Z की स्वतंत्रता सीमित है, इसलिए सदोष परिरोध होता है। BNS में ऐसा उदाहरण स्पष्ट रूप से दिया गया है।
सदोष परिरोध के आवश्यक तत्व -
1. किसी व्यक्ति को रोकना।
2. रोकना सदोष होना चाहिए।
3. व्यक्ति की गति को निर्धारित सीमाओं के भीतर सीमित कर देना।
4. उस सीमा से बाहर जाने की स्वतंत्रता समाप्त हो जाना।
3. सदोष अवरोध और सदोष परिरोध में अंतर
आधार - सदोष अवरोध - सदोष परिरोध
धारा - 126 127 -
प्रकृति - किसी दिशा में जाने से रोकना निश्चित सीमा से बाहर जाने से रोकना।
क्षेत्र - सीमित - व्यापक।
उदाहरण - रास्ते में खड़े होकर आगे जाने से रोकना - कमरे में बंद करना।
गंभीरता - कम - अधिक
मुख्य तत्व - किसी दिशा में गति रोकना - सीमाबद्ध क्षेत्र से बाहर निकलना
नोट - हर सदोष परिरोध में अवरोध का तत्व है, लेकिन हर सदोष अवरोध सदोष परिरोध नहीं है।
धारा 127 के अंतर्गत सदोष परिरोध के विभिन्न रूप - BNS ने केवल सामान्य wrongful confinement ही नहीं बल्कि उसकी गंभीर परिस्थितियों के लिए अलग-अलग दण्ड निर्धारित किए हैं।
(1) सामान्य सदोष परिरोध - धारा 127(2) कारावास अधिकतम 1 वर्ष, या।जुर्माना अधिकतम ₹5,000, या दोनों।
(2) तीन दिन या उससे अधिक - धारा 127(3) कारावास अधिकतम 3 वर्ष, या।जुर्माना अधिकतम ₹10,000, या दोनों।
(3) दस दिन या उससे अधिक - धारा 127(4) कारावास अधिकतम 5 वर्ष, तथा जुर्माना कम से कम ₹10,000।
(4) मुक्ति का रिट जारी होने के बाद भी बंद रखना - यदि किसी व्यक्ति की मुक्ति के लिए विधिवत writ जारी हो चुकी है और फिर भी उसे बंद रखा जाता है अतिरिक्त कारावास अधिकतम 2 वर्ष, तथा जुर्माना।
(5) गुप्त परिरोध - यदि व्यक्ति को इस उद्देश्य से गुप्त रूप से बंद किया जाए कि उसके संबंध में रुचि रखने वाले व्यक्ति को पता न चले, या किसी लोक सेवक को पता न चले, या परिरोध का स्थान पता न चल सके, तो अतिरिक्त दण्ड कारावास अधिकतम 3 वर्ष, तथा जुर्माना।
(6) संपत्ति या अवैध कार्य के लिए दबाव - यदि किसी व्यक्ति को इसलिए बंद किया जाए कि संपत्ति/valuable security प्राप्त की जा सके, या उससे कोई अवैध कार्य कराया जाए, या अपराध करने में सहायक सूचना प्राप्त की जाए तो।कारावास अधिकतम 3 वर्ष, तथा जुर्माना।
(7) स्वीकारोक्ति/सूचना प्राप्त करने के लिए परिरोध - यदि व्यक्ति को confession प्राप्त करने, अपराध के पता लगाने में सहायक सूचना प्राप्त करने, misconduct की जानकारी प्राप्त करने, संपत्ति/valuable security वापस कराने के लिए बंद किया जाता है, तो यह भी विशेष रूप से दण्डनीय है।
धारा 128 BNS बल (Force) - यह धारा Criminal Force समझने की आधारशिला है। किसी व्यक्ति के शरीर पर इस प्रकार गति, परिवर्तन या संपर्क उत्पन्न करना कि वह उस व्यक्ति की सहमति के बिना हो, और किसी निश्चित उद्देश्य से हो, तो परिस्थितियों के अनुसार वह Force की श्रेणी में आ सकता है। इसलिए Force - Criminal Force - Assault, BNS में धारा 128 Force, धारा 129 Criminal Force और धारा 130 Assault को अलग-अलग रखा गया है।
धारा 129 BNS आपराधिक बल (Criminal Force) - जब कोई व्यक्ति बिना सहमति के किसी व्यक्ति पर बल का प्रयोग इस आशय से करता है कि उसे चोट पहुँचे, या भय उत्पन्न हो, या कष्ट/खीज उत्पन्न हो तो वह आपराधिक बल का प्रयोग करता है।
आवश्यक तत्व -
1. बल का प्रयोग हुआ हो।
2. बल किसी व्यक्ति के विरुद्ध हो।
3. वह उसकी सहमति के बिना हो।
4. उद्देश्य या ज्ञान हो कि इससे injury,
fear, या annoyance उत्पन्न होगा।
उदाहरण 1 - A, Z को धक्का देता है ताकि Z गिर जाए और उसे चोट लगे यह आपराधिक बल है।
उदाहरण 2 - A किसी व्यक्ति पर जानबूझकर पानी फेंक देता है ताकि उसे अपमानित/कष्ट हो तो criminal force हो सकता है।
महत्वपूर्ण - हर physical contact अपराध नहीं है। आपराधिक बल के लिए कानून द्वारा निर्धारित मानसिक तत्व और परिस्थितियाँ भी आवश्यक हैं।
धारा 130 BNS - हमला (Assault) - Assault में हमेशा वास्तविक physical contact आवश्यक नहीं होता। जब कोई व्यक्ति ऐसा gesture या preparation करता है, जिससे सामने उपस्थित व्यक्ति को यह आशंका हो जाए कि अभी उसके विरुद्ध criminal force का प्रयोग किया जाने वाला है, तो वह assault करता है।
आवश्यक तत्व -
1. Gesture या preparation होना चाहिए।
2. वह किसी व्यक्ति की ओर किया गया हो।
3. आरोपी का आशय हो या उसे ज्ञान हो कि इससे सामने वाले को यह apprehension होगा कि उस पर criminal force प्रयोग होने वाला है।
4. व्यक्ति वास्तव में उपस्थित होना चाहिए।
उदाहरण 1 - मुट्ठी दिखाना - A, Z की ओर मुट्ठी तानकर इस प्रकार बढ़ता है कि Z को लगता है कि A उसे मारने वाला है। यह Assault है।
उदाहरण 2 - खतरनाक कुत्ता छोड़ने की तैयारी - A हिंसक कुत्ते का मुंह खोलने लगता है और Z को आशंका होती है कि कुत्ता उस पर हमला करेगा। Assault का यह उदाहरण BNS में दिया गया है। यहां शब्द मात्र assault नहीं हैं। सिर्फ शब्द बोलना अपने-आप में assault नहीं है लेकिन शब्द किसी gesture या preparation को ऐसा अर्थ दे सकते हैं जिससे वह gesture assault बन जाए।
उदाहरण A - डंडा उठाकर कहता है, “मैं तुम्हें मार दूँगा। डंडा उठाने की gesture और शब्दों को साथ देखकर assault बन सकता है।
Assault और Criminal Force में अंतर -
आधार - Assault Criminal - Force
धारा - 130 129
वास्तविक शारीरिक बल - आवश्यक नहीं - आवश्यक है
मुख्य आधार - Gesture/preparation Force का प्रयोग
उद्देश्य - सामने वाले में apprehension पैदा करना - Injury/fear/annoyance उत्पन्न करना
Physical contact - आवश्यक नहीं - बल के प्रयोग का तत्व
उदाहरण 1- मुक्का मारने के लिए हाथ उठाना - वास्तव में मुक्का मार देना
उदाहरण 2 - A ने मुक्का मारने के लिए हाथ उठाया Z डर गया लेकिन मुक्का नहीं मारा = Assault - A ने मुक्का मारकर Z को चोट पहुँचाई = Criminal force, और facts के अनुसार अन्य अपराध भी।
धारा 131 BNS Assault या Criminal Force की सामान्य सजा - यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति पर grave and sudden provocation के बिना assault करता है या criminal force का प्रयोग करता है, तो धारा 131 लागू होती है।
दण्ड - कारावास अधिकतम 3 माह, या।जुर्माना अधिकतम ₹1,000, या दोनों। Grave and Sudden Provocation।यदि पीड़ित ने ऐसी गंभीर और अचानक उत्तेजना दी है जिसके कारण आरोपी ने assault/criminal force किया, तो धारा 131 के सामान्य दण्ड अलग तरीके से देखा जाता है। लेकिन निम्न स्थितियों में provocation का लाभ नहीं मिलेगा -
1. आरोपी ने स्वयं provocation उत्पन्न की हो।
2. कार्य कानून के पालन में किया गया हो।
3. कार्य किसी लोक सेवक द्वारा उसके वैध अधिकारों के प्रयोग में किया गया हो।
4. कार्य private defence के वैध प्रयोग में किया गया हो।
क्या provocation वास्तव में grave and sudden थी का निर्धारण परिस्थितियों एवं साक्ष्यों के अनुसार किया जाता है।
धाराएं एवं अपराध -
धारा 126 → सदोष अवरोध (रस्ता रोकना)
धारा 127 → सदोष परिरोध (सीमा के भीतर बंद करना)
धारा 128 → बल (व्यक्ति पर बल प्रयोग)
धारा 129 → आपराधिक बल (बिना सहमति बल + injury /fear/ annoyance का आशय/ज्ञान)
धारा 130 → हमला (ऐसा gesture/preparation जिससे तत्काल criminal force की आशंका पैदा हो)
धारा 131 → Assault/Criminal Force की सामान्य
धारा 131 - बिना grave and sudden provocation किए गए assault/criminal force की सामान्य सजा
Key -
BNS - IPC - अपराध
126 - (339/341) = रास्ता
127 - (340–348) = सीमा
128 - (339) = बल
129 - (350) = आपराधिक बल
130 - (351) = डर/आशंका (Assault)
131 = दण्ड (352) = हमला ओर अपराधिक बल की सजा।
अपहरण एवं व्यपहरण संबंधित अपराधधारा 137–143
धारा 137 — अपहरण (Kidnapping)
धारा 137 के अनुसार अपहरण दो प्रकार का है -
1. भारत से अपहरण - जब कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को उसकी सहमति के बिना भारत की सीमाओं से बाहर ले जाता है, तो यह भारत से अपहरण है।
अपहरण के आवश्यक तत्व -
• किसी व्यक्ति को ले जाना
• भारत से बाहर ले जाना
• उसकी सहमति के बिना ले जाना।
2. विधिपूर्ण संरक्षकता से अपहरण -
जब कोई व्यक्ति किसी बालक या किसी मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति को उसके विधिपूर्ण संरक्षक की अभिरक्षा से उसकी अनुमति के बिना ले जाता है या बहला-फुसलाकर ले जाता है, तो यह विधिपूर्ण संरक्षकता से अपहरण है। बालक की आयु: BNS में यहाँ 18 वर्ष से कम आयु का व्यक्ति महत्वपूर्ण है।
अपवाद - यदि कोई व्यक्ति सद्भावना में यह विश्वास करते हुए कि वह किसी बालक का पिता है, या विधिपूर्ण रूप से बालक की अभिरक्षा का अधिकारी है, बालक को ले जाता है, तो केवल इस आधार पर अपराध नहीं बनता, बशर्ते उसका उद्देश्य अनैतिक या अनुचित न हो।
दण्ड - धारा 137 के अंतर्गत अपहरण के लिए 7 वर्ष तक का कारावास और जुर्माना हो सकता है।
उदाहरण - A, 16 वर्षीय बालक को उसके माता-पिता की अनुमति के बिना अपने साथ ले जाता है। यदि वैधानिक शर्तें पूरी होती हैं, तो A द्वारा विधिपूर्ण संरक्षकता से अपहरण किया गया माना जा सकता है।
धारा 138 — व्यपहरण (Abduction) - व्यपहरण का अर्थ है किसी व्यक्ति को बलपूर्वक या कपटपूर्ण साधनों से किसी स्थान से जाने के लिए विवश करना, या उसे इस प्रकार प्रेरित करना कि वह उस स्थान से चला जाए।
व्यहरण के दो मुख्य तत्व -
(1) बल पूर्वक व्यहरण (Force)
(2) कपटपूर्ण साधन से व्यहरण (Deceitful means)
और उसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को किसी स्थान से जाने के लिए विवश किया जाए, या उस स्थान से जाने के लिए प्रेरित किया जाए।
उदाहरण - A, B को यह झूठ बताता है कि उसके पिता का गंभीर दुर्घटना हो गई है और उसे तत्काल दूसरे स्थान पर चलना होगा। B उस झूठ पर विश्वास करके A के साथ चला जाता है। परिस्थितियों के अनुसार यह कपटपूर्ण साधनों द्वारा व्यपहरण हो सकता है।
महत्वपूर्ण बात - व्यपहरण स्वयं में दण्डनीय अपराध नहीं है यह तब आपराधिक रूप लेता है जब BNS की किसी अन्य धारा में बताए गए विशिष्ट आपराधिक उद्देश्य के लिए व्यपहरण किया जाता है।
धारा 139 — भीख मांगने के लिए बच्चे का अपहरण या अंगभंग - यह धारा बच्चों के अपहरण/व्यपहरण को भीख मंगवाने के उद्देश्य से किए जाने पर लागू होती है। यदि कोई व्यक्ति किसी बच्चे का अपहरण करता है या बच्चे को भीख मांगने के लिए नियुक्त/प्रयुक्त करता है तो कठोर दण्ड का प्रावधान है।
बच्चे का अंगभंग - यदि किसी व्यक्ति ने बच्चे को भीख मंगवाने के उद्देश्य से अपंग बनाया, अंगभंग किया, या उसकी शारीरिक स्थिति को जानबूझकर बिगाड़ा तो अपराध अधिक गंभीर हो जाता है और अधिक कठोर दण्ड लागू होता है।
मुख्य बिंदु - उद्देश्य = भीख मंगवाना
धारा 140 — हत्या आदि के लिए अपहरण या व्यपहरण - यह धारा अपहरण/व्यपहरण के उद्देश्य को दण्डनीय बनाती है। यदि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति का अपहरण या व्यपहरण इस उद्देश्य से करता है कि उसकी हत्या की जाए उसे इस प्रकार रखा जाए कि उसकी हत्या हो सकती है उसे गंभीर चोट/गुलामी आदि के खतरे में डाला जाए या उसे किसी अन्य गंभीर अपराध के लिए विवश किया जाए।तो यह गंभीर अपराध है।
विशेष रूप से यदि अपहरण या व्यपहरण का उद्देश्य
• किसी व्यक्ति को हत्या के लिए ले जाना।
• हत्या के खतरे में डालना।
• गुप्त रूप से या गलत तरीके से कैद करना।
• गंभीर चोट या दासता के अधीन करना।
फिरौती के लिए अपहरण - यदि किसी व्यक्ति का अपहरण/व्यपहरण इस उद्देश्य से किया जाए कि
• किसी व्यक्ति को मृत्यु या चोट का भय दिखाया जाए।
• सरकार या किसी अन्य व्यक्ति को कोई कार्य करने या न करने के लिए मजबूर किया जाए।
• फिरौती (ransom) प्राप्त की जाए।
तो अत्यंत कठोर दण्ड का प्रावधान है।
दण्ड - परिस्थितियों के अनुसार आजीवन कारावास या मृत्युदण्ड तक हो सकता है।
उदाहरण - A ने B के बच्चे का अपहरण किया और कहा कि ₹50 लाख नहीं दिए तो बच्चे की हत्या कर देगा। यह सामान्य अपहरण से कहीं अधिक गंभीर अपराध है और फिरौती के लिए अपहरण की श्रेणी में आएगा।
धारा 141 — विदेश से लड़की/लड़के का आयात - यदि कोई व्यक्ति किसी विदेशी देश से किसी लड़की या लड़के को भारत में लाता है इस उद्देश्य से कि उसे किसी अन्य व्यक्ति के साथ अवैध यौन संबंध के लिए विवश या प्रलोभित किया जाए तो यह अपराध है।
आवश्यक तत्व -
1. लड़की/लड़के को भारत के बाहर से लाया गया हो।
2. भारत में लाया गया हो।
3. उद्देश्य अवैध यौन संबंध के लिए उसे मजबूर करना या बहकाना हो।
दण्ड - 10 वर्ष तक का कारावास और जुर्माना हो सकता है।
धारा 142 अपहृत या व्यपहृत व्यक्ति को छिपाना या बंदी रखना - यह धारा उस व्यक्ति पर लागू होती है जो स्वयं अपहरण/व्यपहरण न करके भी अपहृत या व्यपहृत व्यक्ति को जानबूझकर छिपाता या बंदी रखता है।
आवश्यक तत्व - कोई व्यक्ति अपहृत/व्यपहृत हुआ हो
• आरोपी को इस तथ्य का ज्ञान हो या उसके पास ऐसा विश्वास करने का कारण हो।
• आरोपी उस व्यक्ति को छिपाए या बंदी रखे।
दण्ड - दण्ड उस मूल अपहरण/व्यपहरण की प्रकृति के अनुसार निर्धारित होता है।
उदाहरण - A ने C का अपहरण किया। B को पता है कि C अपहृत है, फिर भी B उसे अपने घर के कमरे में छिपाकर रखता है। B पर धारा 142 लागू हो सकती है, भले ही B ने मूल रूप से C का अपहरण न किया हो।
धारा 143 मानव तस्करी (Trafficking of Person) - किसी व्यक्ति की तस्करी तब होती है जब उसे निम्न साधनों से प्राप्त/स्थानांतरित/ले जाया/छिपाया/स्वीकार किया जाता है:
धमकी, बल, जबरदस्ती, अपहरण, कपट,धोखा, शक्ति का दुरुपयोग, किसी व्यक्ति की कमजोर स्थिति का फायदा उठाना या किसी अन्य व्यक्ति को नियंत्रित करने वाले व्यक्ति की सहमति प्राप्त करने के लिए भुगतान/लाभ देना जिसका उद्देश्य व्यक्ति का शोषण (exploitation) हो।
शोषण - BNS में शोषण की अवधारणा व्यापक है। इसमें शारीरिक शोषण, यौन शोषण, दासता, दासता के समान व्यवहार, जबरन श्रम, अंगों का अवैध निष्कासन आदि शामिल हो सकते हैं।
महत्वपूर्ण सिद्धांत - पीड़ित की सहमति इसका बचाव नहीं है, यदि तस्करी के लिए ऊपर बताए गए साधनों का प्रयोग किया गया है। अर्थात् यदि किसी व्यक्ति को धोखे या धमकी से शोषण के उद्देश्य से ले जाया गया है, तो बाद में उसकी कथित सहमति आरोपी को अपराध से स्वतः मुक्त नहीं करती।
मानव तस्करी का दण्ड - धारा 143 में अपराध की गंभीरता के आधार पर अलग-अलग दण्ड हैं। एक व्यक्ति की तस्करी 7 वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक का कारावास + जुर्माना।
एक से अधिक व्यक्तियों की तस्करी पर।दण्ड अधिक कठोर हो जाता है।
बालक की तस्करी - यदि पीड़ित बालक है, तो अधिक कठोर दण्ड का प्रावधान है।एक से अधिक बच्चों की तस्करी - और अधिक गंभीर दण्ड।
बार-बार बालक की तस्करी - यदि आरोपी पहले भी बालक की तस्करी के अपराध में दोषसिद्ध हो चुका है और पुनः ऐसा अपराध करता है, तो आजीवन कारावास तक का प्रावधान है।
अपहरण और व्यपहरण में अंतर -
आधार - अपहरण - व्यपहरण।
धारा - 137- 138
आधार - व्यक्ति को भारत से बाहर या संरक्षकता से ले जाना - बल या कपट से किसी स्थान से ले जाना।
बल आवश्यक - नहीं - हाँ, या कपटपूर्ण साधन
सहमति - संरक्षक की सहमति महत्वपूर्ण - व्यक्ति की इच्छा को बल/कपट से प्रभावित किया जाता है
आयु - संरक्षकता वाले मामले में बालक/मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति - किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध हो सकता है।
स्वयं अपराध - हाँ - स्वयं में स्वतंत्र दण्डनीय अपराध नहीं।
आगे का उद्देश्य - आवश्यक नहीं - संबंधित उद्देश्य से किए जाने पर अपराध।
महत्वपूर्ण अंतर - ले जाना - बल या कपट से ले जाना।
सार - धारा 137–143 -
अपहरण - 137- अपहरण भारत से या विधिपूर्ण संरक्षकता से
व्यहरण - 138 - व्यपहरण बल या कपटपूर्ण साधन
बच्चा + भीख - 139 - बच्चे को भीख के लिए अपहरण/प्रयोग भीख मंगवाने का उद्देश्य
हत्या/फिरौती - 140 - हत्या आदि के लिए अपहरण/व्यपहरण हत्या, गंभीर खतरा, फिरौती आदि
विदेश से आयात - 141 - विदेश से लड़की/लड़के का आयात अवैध यौन संबंध हेतु
छिपाना/बंदी रखना - 142 - अपहृत/व्यपहृत व्यक्ति को छिपाना/बंदी रखना ज्ञान/विश्वास के साथ
मानव तस्करी - 143 - मानव तस्करी शोषण के उद्देश्य से तस्करी
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