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ALU Jaipur Semester Second paper 2.3 विशेष संविदाएँ √

ALU Jaipur Semester Second 
                  पाठ्यक्रम
  विशेष संविदाएँ प्रश्न-पत्र संख्या 2.3
इकाई-I
क्षतिपूर्ति एवं प्रत्याभूति की संविदाएँ
1.1 क्षतिपूर्ति का अर्थ एवं परिभाषा
A.प्रत्याभूति का अर्थ एवं परिभाषा
B.क्षतिपूर्ति और प्रत्याभूति में अंतर
प्रत्याभूति के प्रकार
1.2 क्षतिपूर्ति-धारक के अधिकार
A.जमानतदार/प्रत्याभूतिदाता (Surety) के अधिकार
1.3 जमानतदार के दायित्व की सीमा
जमानतदार के दायित्व से मुक्ति
जमानत/बेलमेंट (Bailment) एवं गिरवी/प्लेज (Pledge) की संविदाएँ
1.4 जमानत (Bailment) का अर्थ एवं प्रकार
बिना प्रतिफल के जमानत
जमानतदार (Bailor) के अधिकार एवं कर्तव्य
जमानतग्राही (Bailee) के अधिकार एवं कर्तव्य
1.5 जमानत की संविदा का समापन
गिरवी/प्लेज का अर्थ एवं परिभाषा
अनधिकृत व्यक्ति द्वारा गिरवी रखना
इकाई-II
अभिकरण की संविदा (Contract of Agency)
2.1 अभिकरण का अर्थ एवं परिभाषा
अभिकरण के प्रकार
2.2 अभिकरण के सृजन की विधियाँ
2.3 अभिकरण में निम्नलिखित पक्षों के बीच संबंध 
1. प्रधान (Principal) एवं अभिकर्ता (Agent) के बीच संबंध
2. प्रधान एवं तृतीय पक्ष के बीच संबंध
3. अभिकर्ता एवं तृतीय पक्ष के बीच संबंध
2.4 अभिकर्ता के प्राधिकार का निर्धारण:
1. पक्षकारों के कार्य द्वारा
2. विधि के संचालन द्वारा
2.5 अपरिवर्तनीय प्राधिकार/अभिकरण
(Irrevocable Authority)
इकाई-III माल की बिक्री की संविदा (Contract of Sale of Goods)
3.1 बिक्री का अर्थ एवं परिभाषा
बिक्री (Sale) एवं बिक्री के लिए करार (Agreement to Sell) में अंतर
3.2 किराया-क्रय करार (Hire-Purchase Agreement)
माल का अर्थ
विद्यमान माल (Existing Goods)
3.3 भावी माल (Future Goods)
आकस्मिक/सशर्त माल (Contingent Goods)
शर्तें एवं प्रत्याभूतियाँ (Conditions and Warranties)
3.4 विक्रेता से क्रेता को संपत्ति/स्वामित्व का अंतरण
अनधिकृत व्यक्ति द्वारा बिक्री
3.5 बिक्री के निष्पादन से संबंधित विधि
अदत्त विक्रेता (Unpaid Seller) के अधिकार
इकाई-IV
साझेदारी की संविदा (Contract of Partnership)
4.1 साझेदारी का अर्थ
साझेदारी की परिभाषा
साझेदारी की संविदा का सृजन
साझेदारी की संविदा की विशेषताएँ
साझेदारों के प्रकार
साझेदारी के प्रकार, निम्नलिखित में अंतर:
(i) सह-स्वामित्व और साझेदारी
(ii) संयुक्त हिन्दू परिवार फर्म और साझेदारी
(iii) कंपनी और साझेदारी
(iv) अवयस्क की स्थिति
4.4 साझेदारों के पारस्परिक संबंध
साझेदारों एवं तृतीय पक्ष के बीच संबंध
साझेदारी फर्म का पंजीकरण
साझेदारी फर्म के अपंजीकरण का प्रभाव
फर्म का विघटन
4.5 सीमित दायित्व वाली साझेदारी अधिनियम, 2008
(Limited Liability Partnership Act, 2008)
संशोधन अधिनियम, 2021 सहित
सीमित दायित्व वाली साझेदारी की आवश्यकता
महत्व
उद्देश्य
परिभाषा
अवधारणा
अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ
न्यायिक प्रतिक्रियाएँ/न्यायिक दृष्टिकोण
*********************************
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (Indian Contract Act, 1872) - 
धारा 72 — भूल या दबाव में प्राप्त धन/वस्तु लौटाने का दायित्व - यदि किसी व्यक्ति को भूल से या दबाव (coercion) के कारण धन दिया गया है या कोई वस्तु दी गई है, तो जिसे वह धन या वस्तु मिली है, उसका वापस करना अनिवार्य है। 
उदाहरण - A और B को C को ₹10,000 देने हैं। A ने पूरा ₹10,000 दे दिया। B को इसकी जानकारी नहीं थी और उसने भी ₹10,000 C को दे दिए। C को B के ₹10,000 वापस करने होंगे।
अध्याय VI - संविदा भंग के परिणाम
धारा 73 - संविदा भंग से हुई हानि की क्षतिपूर्ति - जब किसी संविदा का भंग (Breach of Contract) होता है, तो पीड़ित पक्ष उस हानि या नुकसान की क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी है - 
1. जो संविदा भंग से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न हुआ हो, या
2. जिसके होने की संभावना के बारे में संविदा करते समय दोनों पक्षों को जानकारी थी।
लेकिन दूरस्थ (remote) या अप्रत्यक्ष (indirect) हानि की क्षतिपूर्ति नहीं मिलती। 
उदाहरण - A ने B को 100 बोरी गेहूँ देने का अनुबंध किया, लेकिन A ने गेहूँ नहीं दिया। बाजार में गेहूँ की कीमत बढ़ गई। B सामान्यतः उस मूल्य-अंतर से हुई स्वाभाविक हानि की क्षतिपूर्ति मांग सकता है।
मुख्य सिद्धांत - धारा 74 - दंड निर्धारित होने पर क्षतिपूर्ति - यदि संविदा में पहले से यह राशि निर्धारित है कि संविदा भंग होने पर इतनी राशि देनी होगी, या कोई दंड (Penalty) निर्धारित है, तो पीड़ित पक्ष उचित क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी है। लेकिन क्षतिपूर्ति निर्धारित राशि/दंड से अधिक नहीं हो सकती। 
महत्वपूर्ण बात - धारा 74 में वास्तविक नुकसान सिद्ध करना प्रत्येक मामले में आवश्यक नहीं है, लेकिन न्यायालय केवल उचित क्षतिपूर्ति देगा और वह निर्धारित अधिकतम राशि से अधिक नहीं हो सकती। उदाहरण - A और B के बीच अनुबंध हुआ कि A समय पर काम पूरा नहीं करेगा तो ₹1 लाख देगा। काम में देरी हो गई। न्यायालय परिस्थितियों के अनुसार उचित क्षतिपूर्ति दे सकता है, लेकिन ₹1 लाख से अधिक नहीं।
धारा 75 — संविदा को विधिपूर्वक समाप्त करने वाले पक्ष को क्षतिपूर्ति - यदि किसी पक्ष ने दूसरे पक्ष के संविदा-भंग के कारण संविदा को उचित रूप से rescind (निरस्त/समाप्त) कर दिया है, तो वह पक्ष संविदा के पूरा न होने से हुई क्षति की क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी है। 
उदाहरण - A ने B को 1 जुलाई को माल देने का अनुबंध किया। B ने अनुबंध की महत्वपूर्ण शर्त का उल्लंघन कर दिया। A ने कानूनन संविदा समाप्त कर दी। ऐसी स्थिति में A, संविदा समाप्त करने से हुई उचित हानि की क्षतिपूर्ति मांग सकता है।
धारा 76 से 123 तक - धारा 76 से 123 तक के Sale of Goods संबंधी प्रावधान निरसित (Repealed) हो चुके हैं। माल की बिक्री से संबंधित कानून अब मुख्यतः Sale of Goods Act, 1930 में मिलता है। India Code में धारा 76 से आगे इन प्रावधानों को Repealed दिखाया गया है। इसलिए वर्तमान भारतीय संविदा अधिनियम में धारा 72 के बाद पढ़ने योग्य प्रभावी प्रावधान सीधे धारा 73, 74 और 75 हैं।
क्षतिपूर्ति का परिचय - 
क्षतिपूर्ति का सामान्य अर्थ है, किसी व्यक्ति को उसके अधिकार के उल्लंघन अथवा हुई हानि के बदले आर्थिक रूप से उस स्थिति के जितना संभव हो सके निकट पहुँचाना, जिसमें वह उल्लंघन न होने पर होता।
क्षतिपूर्ति(Damages/Compensation) विधि का बहुत महत्वपूर्ण विषय है। इसे समझने के लिए पहले यह अंतर ध्यान में रखें कि हर क्षतिपूर्ति damages होती है, लेकिन हर compensation का स्वरूप damages जैसा नहीं होता। अनुबंध विधि में विशेष रूप से Damages का अर्थ उस धनराशि से है जो अनुबंध के उल्लंघन से हुई विधिसम्मत हानि की भरपाई के लिए न्यायालय द्वारा दिलवाई जाती है। अनुबंध विधि में यदि एक पक्ष अनुबंध का पालन नहीं करता और दूसरे पक्ष को उससे हानि होती है, तो पीड़ित पक्ष कुछ परिस्थितियों में हर्जाने (Damages) की मांग कर सकता है।
उदाहरण - 
A ने B से ₹1,00,000 में माल खरीदने का अनुबंध किया। B ने माल देने से मना कर दिया। उस समय वही माल बाजार में ₹1,20,000 का था।
B के उल्लंघन से A को सामान्यतः ₹20,000 की हानि हुई। इसलिए परिस्थितियों के अनुसार A ₹20,000 के हर्जाने का दावा कर सकता है।
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 में क्षतिपूर्ति - 
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 73 और 74 क्षतिपूर्ति से संबंधित हैं।
इसके अतिरिक्त कुछ परिस्थितियों में धारा 75 भी महत्वपूर्ण है।
प्रमुख धाराएँ - 
धारा 73 - अनुबंध के उल्लंघन से होने वाली हानि या क्षति की क्षतिपूर्ति
अनुबंध भंग की क्षतिपूर्ति
भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 73 सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान है।
इसके अनुसार जब किसी अनुबंध का उल्लंघन होता है, तो पीड़ित पक्ष उस हानि या क्षति के लिए क्षतिपूर्ति प्राप्त कर सकता है - 
1. जो स्वाभाविक रूप से अनुबंध के उल्लंघन से उत्पन्न हुई हो; या
2. जिसके संबंध में अनुबंध करते समय पक्षकारों को यह जानकारी थी कि उल्लंघन होने पर ऐसी हानि होने की संभावना है।
लेकिन दूरस्थ और अप्रत्यक्ष हानि के लिए क्षतिपूर्ति नहीं मिलती।
धारा 74 - अनुबंध में पहले से निर्धारित राशि/दंड की स्थिति
धारा 75 - विधिपूर्वक अनुबंध समाप्त करने वाले पक्ष का क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार
क्षतिपूर्ति का उद्देश्य - 
क्षतिपूर्ति का उद्देश्य सामान्यतः उल्लंघन करने वाले पक्ष को दंडित करना नहीं, बल्कि पीड़ित पक्ष को हुई विधिसम्मत आर्थिक हानि की भरपाई करना है। इसका मूल सिद्धांत है - पीड़ित पक्ष को उस आर्थिक स्थिति के निकट पहुँचाना जिसमें वह अनुबंध का पालन होने पर होता।
इसे Restitutio in integrum की धारणा से भी जोड़ा जाता है।
5. क्षतिपूर्ति प्राप्त करने की आवश्यक शर्तें - 
क्षतिपूर्ति के दावे के लिए सामान्यतः निम्न बातें महत्वपूर्ण हैं - 
1. वैध अनुबंध होना चाहिए - सबसे पहले पक्षकारों के बीच वैध और प्रवर्तनीय अनुबंध होना चाहिए।
2. अनुबंध का उल्लंघन हुआ हो - एक पक्ष ने अपने संविदात्मक दायित्व का पालन न किया हो या गलत तरीके से किया हो।
3. उल्लंघन के कारण हानि हुई हो - पीड़ित पक्ष को वास्तविक आर्थिक या विधि द्वारा मान्य हानि हुई हो।
4. हानि और उल्लंघन के बीच संबंध हो - हानि का कारण अनुबंध का उल्लंघन होना चाहिए।
5. हानि अत्यधिक दूरस्थ न हो - दूरस्थ अथवा अप्रत्यक्ष हानि के लिए सामान्यतः क्षतिपूर्ति नहीं मिलती।
क्षतिपूर्ति के प्रमुख प्रकार - 
अनुबंध विधि में हर्जाने को समझने के लिए निम्न वर्गीकरण महत्वपूर्ण है।
(A) सामान्य क्षतिपूर्ति / General Damages - जो हानि अनुबंध के उल्लंघन से स्वाभाविक और सामान्य रूप से उत्पन्न होती है, उसके लिए सामान्य क्षतिपूर्ति मिलती है।
उदाहरण - A ने B को ₹50,000 में मशीन बेचने का अनुबंध किया। B ने मशीन देने से इनकार कर दिया। बाजार में उस समय मशीन की कीमत ₹60,000 थी। B के उल्लंघन के कारण A को सामान्यतः ₹10,000 का अंतर प्राप्त हो सकता है।
विशेष क्षतिपूर्ति/Special Damage - 
जब अनुबंध करते समय विशेष परिस्थितियाँ दूसरे पक्ष को बताई गई हों और उन्हीं परिस्थितियों के कारण अतिरिक्त हानि हुई हो, तो उस विशेष हानि की क्षतिपूर्ति कुछ परिस्थितियों में मिल सकती है।
उदाहरण - A ने B को एक मशीन भेजने का अनुबंध किया और B को स्पष्ट बताया कि मशीन समय पर न मिलने पर उसका कारखाना बंद हो जाएगा।
यदि B को यह जानकारी थी और उसने मशीन समय पर नहीं भेजी तथा कारखाना बंद हो गया, तो परिस्थितियों के अनुसार उस विशेष हानि का दावा किया जा सकता है। मुख्य बात: विशेष परिस्थितियों की जानकारी अनुबंध के समय दूसरे पक्ष को होनी चाहिए।
दूरस्थ क्षति / Remote Damages - 
ऐसी हानि जो अनुबंध के उल्लंघन से बहुत दूर की या अप्रत्यक्ष हो, उसके लिए क्षतिपूर्ति सामान्यतः नहीं मिलती।
उदाहरण - A ने B को माल भेजने का अनुबंध किया। B ने माल नहीं भेजा। A दावा करता है कि माल न मिलने के कारण उसके किसी तीसरे व्यापारिक सौदे में भी नुकसान हुआ। यदि यह हानि अनुबंध के समय B की जानकारी में नहीं थी और उल्लंघन का स्वाभाविक परिणाम भी नहीं थी, तो ऐसी हानि को दूरस्थ क्षति माना जा सकता है।
नाममात्र क्षतिपूर्ति / Nominal Damages - 
कभी-कभी किसी व्यक्ति के संविदात्मक अधिकार का उल्लंघन तो हुआ हो, लेकिन वास्तविक आर्थिक हानि सिद्ध न हो।
ऐसी स्थिति में न्यायालय परिस्थितियों के अनुसार नाममात्र की क्षतिपूर्ति दे सकता है। इसका उद्देश्य वास्तविक आर्थिक नुकसान की भरपाई से अधिक यह स्वीकार करना होता है कि किसी कानूनी अधिकार का उल्लंघन हुआ है।
दंडात्मक क्षतिपूर्ति / Exemplary or Punitive Damages - 
सामान्य अनुबंध मामलों में क्षतिपूर्ति का उद्देश्य दंड देना नहीं बल्कि हानि की भरपाई करना है। फिर भी कुछ असाधारण परिस्थितियों में न्यायालय का पुरस्कारात्मक/दंडात्मक दृष्टिकोण दिखाई दे सकता है, विशेषकर जहाँ आचरण अत्यंत अनुचित हो या कानून उसका विशेष उपचार करता हो। इसलिए damages और penalty को एक नहीं समझना चाहिए।
हानि कम करने का सिद्धांत - 
क्षतिपूर्ति का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है कि पीड़ित पक्ष को अपनी हानि को यथोचित रूप से कम करने का प्रयास करना चाहिए। इसे Duty to Mitigate Loss कहा जाता है।
उदाहरण - A को B से माल मिलना था। B ने माल नहीं दिया। A बाजार से उचित कीमत पर वही माल खरीद सकता था, लेकिन उसने जानबूझकर कई महीने इंतजार किया और बाद में बहुत अधिक कीमत पर माल खरीदा। ऐसी अतिरिक्त हानि के लिए A को पूरी क्षतिपूर्ति मिलना आवश्यक नहीं है।
क्षतिपूर्ति और दंड में अंतर - 
क्षतिपूर्ति- 
हानि की भरपाई के लिए होती है।
यह वास्तविक/विधिसम्मत हानि से जुड़ी होती है।
मुख्य उद्देश्य प्रतिपूर्ति है।
धारा 73 का प्रमुख क्षेत्र
दंड - 
• उल्लंघनकर्ता को दंडित करने के उद्देश्य से होती है।
• दंड की राशि हानि से बहुत अधिक भी हो सकती है।
• मुख्य उद्देश्य दंडात्मक प्रभाव है
• धारा 74 में stipulated sum और penalty दोनों का उपचार है।
धारा 74 : पूर्व निर्धारित क्षतिपूर्ति और दंड - 
कई अनुबंधों में पक्षकार पहले ही यह लिख देते हैं कि अनुबंध का उल्लंघन होने पर एक निश्चित राशि देनी होगी।
उदाहरण - यदि ठेकेदार समय पर काम पूरा नहीं करता तो उसे ₹5 लाख देने होंगे।” ऐसी स्थिति में धारा 74 लागू हो सकती है। धारा 74 के अंतर्गत अनुबंध में नामित राशि अथवा दंड की स्थिति में न्यायालय उचित क्षतिपूर्ति प्रदान कर सकता है, लेकिन वह निर्धारित राशि से अधिक नहीं हो सकती। इसका अर्थ यह नहीं है कि अनुबंध में लिखी पूरी राशि हर मामले में स्वतः मिल जाएगी।
14. प्रमुख न्यायिक निर्णय - 
(1) Fateh Chand v. Balkishan Das (1963) - सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 74 की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि अनुबंध में राशि निर्धारित होने मात्र से वह राशि स्वतः देय नहीं हो जाती। न्यायालय reasonable compensation पर विचार करेगा।
(2) Maula Bux v. Union of India (1969) - सर्वोच्च न्यायालय ने यह महत्वपूर्ण बात कही कि क्षतिपूर्ति निर्धारित करते समय वास्तविक हानि और उसकी सिद्धता की परिस्थितियों पर विचार किया जाना चाहिए।
(3) ONGC Ltd. v. Saw Pipes Ltd. (2003) - सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 74 के संबंध में महत्वपूर्ण सिद्धांत विकसित किए और परिस्थितियों में अनुबंध में निर्धारित राशि के आधार पर उचित क्षतिपूर्ति देने की संभावना को स्वीकार किया।
(4) Kailash Nath Associates v. DDA (2015) - यह धारा 74 का महत्वपूर्ण आधुनिक निर्णय है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि forfeiture या निर्धारित राशि की वसूली के लिए breach और compensation से संबंधित सिद्धांतों को ध्यान में रखना आवश्यक है। केवल अनुबंध में राशि लिखी होने से हर परिस्थिति में उसे वसूल नहीं किया जा सकता।
15. धारा 75 - अनुबंध समाप्त करने पर क्षतिपूर्ति - 
यदि किसी पक्ष ने कानून के अनुसार अनुबंध को समाप्त कर दिया है या संविदा का परित्याग विधिपूर्वक किया है, तो उसे उस अनुबंध के पूरा न होने से हुई क्षति के लिए क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार हो सकता है।
उदाहरण - यदि विक्रेता ने अनुबंध के अनुसार माल देने से इनकार कर दिया और खरीदार ने कानून के अनुसार अनुबंध समाप्त कर दिया, तो खरीदार परिस्थितियों के अनुसार क्षतिपूर्ति मांग सकता है।
निष्कर्ष - क्षतिपूर्ति का मूल उद्देश्य पीड़ित पक्ष को अनुबंध के उल्लंघन से हुई विधिसम्मत हानि की भरपाई करना है, न कि उल्लंघनकर्ता को केवल दंडित करना। भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 73, 74 और 75 इस विषय की आधारभूत धाराएँ हैं।

प्रत्याभूति का अर्थ - 
प्रत्याभूति (Guarantee) भारतीय संविदा विधि का एक बहुत महत्वपूर्ण विषय है। इसे मुख्यतः भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 126 से 147 में समझाया गया है।
प्रत्याभूति का अर्थ है किसी व्यक्ति के दायित्व को पूरा करने का आश्वासन देना।
जब एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति से यह वचन देता है कि यदि कोई तीसरा व्यक्ति अपना दायित्व पूरा नहीं करेगा, तो वह स्वयं उस दायित्व को पूरा करेगा या उसके भुगतान की जिम्मेदारी लेगा, तो इसे प्रत्याभूति (Guarantee) कहते हैं। अर्थात B, C से कहे कि A अपना कर्ज नहीं चुकाएगा, तो मैं चुकाऊँगा।
इसमें तीन प्रमुख व्यक्ति (पक्षकार) होते हैं - 
1. देनदार A (Principal Debtor) प्रधान ऋणी (जिसने ऋण लिया)
2. लेनदार B (Creditor) ऋण दाता (जिसने ऋण दिया)
3. जमानतदार C (प्रत्याभू (Surety) (जिसने ऋणी के ऋण नहीं चुकाने पर स्वयं ऋण चुकाने का वचन दिया है)
(A के ऋण नहीं चुकाने की दशा में B, C को ऋण का भुगतान करेगा।
प्रत्याभूति की परिभाषा - 
भारतीय संविदा अधिनियम 1872 की धारा 126 के अनुसार प्रत्याभूति की परिभाषा - प्रत्याभूति की संविदा वह संविदा है जिसमें किसी तीसरे व्यक्ति के व्यतिक्रम (default) की दशा में उसके वचन को पूरा करने या उसके दायित्व का निर्वहन करने का वचन दिया जाता है।
4. प्रत्याभूति की संविदा की मुख्य विशेषताएँ - 
1. तीन पक्षकार होना - प्रधान ऋणी >
> लेनदार > प्रत्याभू।
2. तीसरे व्यक्ति का व्यतिक्रम आवश्यक है।
3. प्रत्याभूति का दायित्व तब सक्रिय होता है जब प्रधान ऋणी अपने दायित्व का पालन करने में असफल रहता है।
उदाहरण - A ने B से ₹50,000 लिए और C ने गारंटी दी कि A के भुगतान न करने पर C भुगतान करेगा। परंतु यदि A समय पर ₹50,000 चुका देता है, तो C को भुगतान करने की आवश्यकता नहीं है।
पर यदि A भुगतान नहीं करता, तो C की प्रत्याभूति के अनुसार दायित्व उत्पन्न हो सकता है।
3. प्रत्याभू का दायित्व गौण होता है। प्रत्याभू का दायित्व (द्वितीयक) दायित्व माना जाता है। मूल दायित्व प्रधान ऋणी का है।
4. मूल दायित्व होना आवश्यक है।प्रत्याभूति के पीछे एक मूल दायित्व होना चाहिए।
उदाहरण - A ने B से ₹1 लाख का ऋण लिया। C ने A के ऋण की गारंटी दी। यहाँ A का ऋण मूल दायित्व है और C की जिम्मेदारी उससे जुड़ी है।
5. प्रत्याभूति और क्षतिपूर्ति में अंतर - 
            क्षतिपूर्ति     प्रत्याभूति 
पक्षकार     दो            तीन
दायित्व   प्राथमिक    द्वितीयक
            प्रत्याभू का  प्रत्याभू का
उद्देश्य    हानि से      व्यतिक्रम
             बचाना       दायित्व
तीसरे व्यक्ति आवश्यक आवश्यक 
का दायित्व      नहीं        है
उदाहरण - तुम्हें हानि हुई तो मैं भरूंगा।
             - वह पैसा नहीं देगा तो मैं दूँगा।
प्रत्याभूति का उद्देश्य - 
प्रत्याभूति का मुख्य उद्देश्य लेनदार को सुरक्षा प्रदान करना है। मान लीजिए बैंक किसी व्यक्ति को ऋण देना चाहता है लेकिन बैंक को संदेह है कि वह व्यक्ति समय पर ऋण वापस करेगा या नहीं। तब बैंक किसी तीसरे व्यक्ति से गारंटी ले सकता है। यदि ऋणी भुगतान नहीं करता, तो बैंक प्रत्याभू से अपने अधिकारों के अनुसार भुगतान की मांग कर सकता है।
इस प्रकार प्रत्याभूति व्यापार, बैंकिंग और ऋण व्यवस्था में विश्वास का आधार बनती है।
प्रत्याभूति के प्रकार - 
प्रत्याभूति दो प्रकार की होती जाती है - 
1 विशिष्ट प्रत्याभूति (Specific Guarantee) - जो किसी एक विशेष लेन-देन या एक निश्चित ऋण के लिए दी जाती है।
उदाहरण - A ने B से ₹1 लाख लिए और C ने केवल इसी ऋण की गारंटी दी। यह विशिष्ट प्रत्याभूति है।
2. सतत प्रत्याभूति (Continuing Guarantee) - धारा 129 के अनुसार, ऐसी प्रत्याभूति जो लेन-देन की एक श्रृंखला तक विस्तारित होती है, सतत प्रत्याभूति कहलाती है।
उदाहरण - C ने B से कहा कि A द्वारा समय-समय पर किए जाने वाले व्यापारिक लेन-देन में A के भुगतान की गारंटी C देगा। यह केवल एक लेन-देन तक सीमित नहीं है।
प्रत्याभूति का मूल सिद्धांत - 
प्रत्याभूति को एक सरल सूत्र से याद कर सकते हैं - 
प्रधान ऋणी का दायित्व + उसका व्यतिक्रम + प्रत्याभू का वचन = प्रत्याभूति
(पहले मूल दायित्व, फिर व्यतिक्रम और उसके बाद प्रत्याभू की जिम्मेदारी।)
निष्कर्ष - प्रत्याभूति वह संविदा है जिसमें प्रत्याभू किसी तीसरे व्यक्ति अर्थात् प्रधान ऋणी के व्यतिक्रम की स्थिति में उसके वचन को पूरा करने या उसके दायित्व का निर्वहन करने का आश्वासन देता है। भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 126 प्रत्याभूति की परिभाषा प्रदान करती है। इसमें प्रधान ऋणी, लेनदार और प्रत्याभू तीन प्रमुख पक्षकार होते हैं। प्रत्याभूति का प्रमुख उद्देश्य लेनदार को उसके धन या दावे की सुरक्षा प्रदान करना है। याद रखने की ट्रिक
P + C + S = Guarantee
P = Principal Debtor (प्रधान ऋणी), C = Creditor (लेनदार), S = Surety (प्रत्याभू)
मुख्य धाराएं - 
धारा 126 = प्रत्याभूति की परिभाषा
धारा 127 = प्रत्याभूति के लिए प्रतिफल
धारा 128 = प्रत्याभू का दायित्व
धारा 129 = सतत प्रत्याभूति।

क्षतिपूर्ति-धारक (Indemnity-holder) एवं उसके अधिकार - 
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के क्षतिपूर्ति की संविदा (Contract of Indemnity) से है। इसका मुख्य प्रावधान धारा 125 में दिया गया है। इसे परीक्षा की दृष्टि से विस्तार से समझते हैं।
क्षतिपूर्ति की संविदा का अर्थ - 
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 124 के अनुसार, क्षतिपूर्ति की संविदा वह संविदा है जिसमें एक पक्ष दूसरे पक्ष को स्वयं वचनदाता के आचरण या किसी अन्य व्यक्ति के आचरण से होने वाली हानि से बचाने का वचन देता है।
इसमें दो पक्ष होते हैं—
1. क्षतिपूर्तिकर्ता (Indemnifier) – जो हानि की भरपाई करने का वचन देता है।
2. क्षतिपूर्ति-धारक (Indemnity-holder) – जिसके हित की रक्षा की जाती है और जिसे हानि होने पर क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार होता है।
उदाहरण - क यह वचन देता है कि यदि 'ख' के विरुद्ध 'ग' कोई दावा करता है और 'ख' को उसके कारण कोई हानि होती है, तो 'क' उस हानि की भरपाई करेगा।
यहाँ— क = क्षतिपूर्तिकर्ता
         ख = क्षतिपूर्ति-धारक
          ग = तीसरा व्यक्ति
धारा 125 के अंतर्गत क्षतिपूर्ति-धारक के अधिकार - 
धारा 125 क्षतिपूर्ति-धारक को मुख्यतः तीन महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान करती है।
यदि क्षतिपूर्ति-धारक अपनी संविदा के दायरे में कार्य करता है, तो वह क्षतिपूर्तिकर्ता से निम्नलिखित राशि प्राप्त कर सकता है।
अधिकार 1 - वाद में भुगतान की गई क्षतिपूर्ति की वसूली - यदि क्षतिपूर्ति-धारक के विरुद्ध कोई मुकदमा किया जाता है और वह मुकदमा उस संविदा के अंतर्गत आता है, तो क्षतिपूर्ति-धारक द्वारा उस मुकदमे में भुगतान की गई सभी ऐसी रकम, जिनका भुगतान उचित रूप से आवश्यक था, वह क्षतिपूर्तिकर्ता से प्राप्त कर सकता है।
उदाहरण - अ ने ब को क्षतिपूर्ति देने का वचन दिया। ब के विरुद्ध स ने 1,00,000 का मुकदमा कर दिया। ब ने मुकदमा लड़कर ₹80,000 का भुगतान किया। यदि यह मुकदमा क्षतिपूर्ति की संविदा के अंतर्गत आता है और ₹80,000 का भुगतान उचित था, तो 'ब' यह रकम 'अ' से वसूल कर सकता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि क्षतिपूर्ति-धारक द्वारा किया गया भुगतान अनुचित या अनावश्यक नहीं होना चाहिए। उसे परिस्थितियों के अनुसार उचित रूप से कार्य करना चाहिए।
मुकदमे के खर्चों की वसूली - क्षतिपूर्ति-धारक को उस मुकदमे में खर्च की गई उचित लागत (Costs) भी क्षतिपूर्तिकर्ता से प्राप्त करने का अधिकार है। लेकिन इसके लिए दो प्रमुख शर्तें हैं—
01. क्षतिपूर्ति-धारक ने ऐसा कार्य नहीं किया हो जो क्षतिपूर्ति की संविदा के निर्देशों के विरुद्ध हो।
02. क्षतिपूर्ति-धारक ने मुकदमे में विवेकपूर्ण और उचित तरीके से कार्य किया हो।
उदाहरण - क ने ख को किसी दावे से होने वाली हानि की क्षतिपूर्ति का वचन दिया।
ख के विरुद्ध मुकदमा हुआ और उसने वकील की फीस, न्यायालय शुल्क आदि मिलाकर ₹20,000 खर्च किए।
यदि ख ने उचित तरीके से मुकदमा लड़ा और खर्च आवश्यक था, तो वह ₹20,000 की उचित लागत क से प्राप्त कर सकता है।
समझौते के अंतर्गत भुगतान की गई रकम की वसूली - यदि क्षतिपूर्ति-धारक ने किसी मुकदमे में समझौता किया है, तो समझौते के अंतर्गत भुगतान की गई राशि भी क्षतिपूर्तिकर्ता से प्राप्त की जा सकती है। इसके लिए आवश्यक है कि—
A. समझौता क्षतिपूर्तिकर्ता के निर्देशों के विरुद्ध न हो।
B. समझौता विवेकपूर्ण हो।
C. वह ऐसा हो जिसे एक सामान्य और समझदार व्यक्ति परिस्थितियों में उचित मान सके।
D. समझौता संविदा की शर्तों के अनुरूप हो।
उदाहरण - अ ने ब को एक दावे से होने वाली हानि से बचाने का वचन दिया। ब के विरुद्ध स ने ₹1,00,000 का दावा किया।
ब ने मुकदमा लंबा चलाने के बजाय ₹60,000 में उचित समझौता कर लिया।
यदि समझौता उचित था और क्षतिपूर्ति की संविदा के विरुद्ध नहीं था, तो ब ₹60,000 की राशि अ से प्राप्त कर सकता है।
धारा 125 का सार - अधिकार क्षतिपूर्ति-धारक क्या प्राप्त कर सकता है?
मुकदमे की राशि मुकदमे में उचित रूप से भुगतान की गई रकम मुकदमे की लागत उचित न्यायालय खर्च, वकील की फीस आदि। समझौते की राशि उचित एवं वैध समझौते के तहत भुगतान की गई रकम
क्षतिपूर्ति-धारक के अधिकारों की आवश्यक शर्तें - क्षतिपूर्ति-धारक को अधिकार तभी प्राप्त होंगे जब—
1. वह संविदा के दायरे में कार्य करे, उसका कार्य क्षतिपूर्ति की संविदा के अनुरूप होना चाहिए।
2. उसने उचित सावधानी बरती हो, वह जानबूझकर या लापरवाही से हानि उत्पन्न न करे।
3. उसने उचित खर्च किया हो, अनावश्यक या अत्यधिक खर्च की सामान्यतः क्षतिपूर्ति नहीं मिल सकती।
4. उसने क्षतिपूर्तिकर्ता के निर्देशों का उल्लंघन न किया हो, यदि संविदा में विशेष निर्देश दिए गए हैं तो उनका पालन आवश्यक है।
समझौता वास्तविक और उचित हो, क्षतिपूर्ति-धारक केवल क्षतिपूर्तिकर्ता से पैसा प्राप्त करने के लिए मनमाना समझौता नहीं कर सकता।
न्यायिक व्याख्या - भारतीय न्यायालयों ने समय-समय पर यह प्रश्न उठाया है कि क्षतिपूर्ति-धारक को क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के लिए पहले वास्तविक भुगतान करना आवश्यक है या केवल दायित्व उत्पन्न होना पर्याप्त है।
Gajanan Moreshwar Parelkar v. Moreshwar Madan Mantri - इस महत्वपूर्ण मामले में न्यायालय ने क्षतिपूर्ति की संविदा की व्याख्या करते हुए यह दृष्टिकोण अपनाया कि जहाँ क्षतिपूर्ति-धारक पर ऐसी देयता आ गई है जिसका निर्वहन आवश्यक है, वहाँ परिस्थितियों के अनुसार उसे क्षतिपूर्तिकर्ता से संरक्षण प्राप्त हो सकता है। अर्थात क्षतिपूर्ति को केवल उस स्थिति तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए जब क्षतिपूर्ति-धारक वास्तव में अपनी जेब से रकम चुका चुका हो। यह निर्णय भारतीय क्षतिपूर्ति विधि की व्यावहारिक व्याख्या में महत्वपूर्ण माना जाता है।
क्षतिपूर्ति-धारक और क्षतिपूर्तिकर्ता में अंतर - 
आधार = क्षतिपूर्ति-धारक - क्षतिपूर्तिकर्ता
अर्थ = जिसके हित की रक्षा की जाती है - जो हानि की भरपाई करने का वचन देता है
अंग्रेजी नाम = Indemnity - holder Indemnifier
भूमिका = हानि/दायित्व का सामना करता है - हानि की भरपाई करता है।
मुख्य प्रावधान = धारा 125 - धारा 124
प्रमुख अधिकार = भुगतान, खर्च और समझौते की उचित राशि प्राप्त करना - परिस्थितियों के अनुसार अपने दायित्व का निर्वहन करना।
महत्वपूर्ण बिंदु - भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की - 
धारा 124 → क्षतिपूर्ति की संविदा की परिभाषा।
धारा 125 → क्षतिपूर्ति-धारक के अधिकार।
धारा 125 के तीन मुख्य अधिकार - 
• भुगतान की गई रकम + मुकदमे की लागत + उचित समझौते की रकम अर्थात इसे रकम + लागत + समझौता के सूत्र से याद किया जा सकता है।
निष्कर्ष - क्षतिपूर्ति की संविदा का मूल उद्देश्य किसी व्यक्ति को ऐसी हानि से आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना है जो संविदा में वर्णित कारण से उत्पन्न हो सकती है। धारा 125 क्षतिपूर्ति-धारक को मुकदमे में उचित रूप से भुगतान की गई रकम, उचित मुकदमे की लागत तथा उचित समझौते के अंतर्गत भुगतान की गई रकम की वसूली का अधिकार देती है। साथ ही न्यायिक व्याख्या ने क्षतिपूर्ति को केवल वास्तविक भुगतान तक सीमित न रखकर, परिस्थितियों में उत्पन्न देयता से सुरक्षा के व्यापक सिद्धांत को भी मान्यता दी है।
Sale of Goods Act, 1930 की धारा 1 से 66 - माल विक्रय अधिनियम, 1930 - Sale of Goods Act, 1930 - धारा 1 से 66
नोट - यह अधिनियम माल के विक्रय, स्वामित्व के हस्तांतरण, डिलीवरी, जोखिम, unpaid seller और संविदा-भंग के उपचारों को नियंत्रित करता है।
अध्याय I - प्रारंभिक प्रावधान - 
धारा 1- संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ - इस अधिनियम का नाम Sale of Goods Act, 1930 है। यह अधिनियम माल के विक्रय से संबंधित कानून को व्यवस्थित करता है।
धारा 2 है परिभाषाएँ -
1. Buyer - क्रेता- वह व्यक्ति जो माल खरीदता है या खरीदने के लिए सहमत होता है।
2. Seller - विक्रेता - वह व्यक्ति जो माल बेचता है या बेचने के लिए सहमत होता है।
3. Goods - माल - माल से आशय हर प्रकार की चल संपत्ति (movable property) से है, लेकिन इसमें - 
Actionable claims, Money शामिल नहीं हैं। इसमें स्टॉक और शेयर, उगने वाली फसल, घास व भूमि से जुड़ी ऐसी वस्तुएँ जिन्हें विक्रय से पहले अलग किया जाना है।
4. Price - कीमत - माल केये विक्रय के बदले दी जाने वाली धनराशि।
5. Delivery - परिदान - एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को माल का स्वैच्छिक कब्जा हस्तांतरित करना।
6. Specific Goods - वे माल जो संविदा बनने के समय ही पहचान लिए गए और निश्चित हों।
7. Future Goods - वे माल जिन्हें विक्रेता संविदा बनने के बाद बनाएगा, उत्पादित करेगा या प्राप्त करेगा।
8. Document of Title to Goods - ऐसे दस्तावेज जिनसे माल पर अधिकार या कब्जे का अधिकार मिलता है, जैसे Bill of Lading, Railway Receipt, Warehouse Receipt आदि।
धारा 3 - भारतीय संविदा अधिनियम का अनुप्रयोग - जहाँ Sale of Goods Act में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, वहाँ जहाँ तक संभव हो, Indian Contract Act, 1872 के सिद्धांत लागू होंगे।
अध्याय II - संविदा का निर्माण - 
धारा 4 - Sale और Agreement to Sell - Sale जब विक्रेता माल का स्वामित्व क्रेता को तत्काल हस्तांतरित कर देता है, तो उसे Sale कहते हैं।
Agreement to Sell - जब स्वामित्व भविष्य में हस्तांतरित होना है, या किसी शर्त के पूरा होने पर हस्तांतरित होना है, तो वह Agreement to Sell है।
उदाहरण - A ने B को अपनी कार ₹5 लाख में बेच दी और उसी समय स्वामित्व B को मिल गया। यह Sale है।
यदि A ने कहा कि B को 5 लाख देने के बाद अगले महीने कार का स्वामित्व मिलेगा, तो यह Agreement to Sell है।
अंतर - Sale Agreement to Sell - 
स्वामित्व तत्काल भविष्य में जोखिम, क्रेता का विक्रेता का वस्तु पर proprietary interest, केवल संविदा विधि
धारा 5 - संविदा कैसे बनाई जाती है - 
Sale की संविदा - 
1. प्रस्ताव - Offer
2. प्रति प्रस्ताव
3. सहमति - Acceptance
कीमत - संविदा में तय हो सकती है, निर्धारित करने की विधि तय हो सकती है, पक्षकारों के व्यवहार से निर्धारित हो सकती है।
धारा 6 - विद्यमान और भावी माल, यह दो प्रकार का है - 
विद्यमान माल - जो विक्रय के समय मौजूद हैं।
भावी माल - जो भविष्य में बनाए या प्राप्त किए जाने हैं।
महत्वपूर्ण - Future goods का वर्तमान Sale Agreement to Sell के रूप में ही प्रभावी होगा।
धारा 7- माल का संविदा से पहले नष्ट होना - यदि specific goods संविदा बनने से पहले ही नष्ट हो गए थे और विक्रेता को इसकी जानकारी नहीं थी, तो संविदा void हो सकती है।
उदाहरण - A ने B को एक निश्चित मशीन बेचने का अनुबंध किया। लेकिन अनुबंध से पहले ही मशीन जलकर नष्ट हो चुकी थी तो संविदा प्रभावहीन हो सकती है।
धारा 8 - संविदा के बाद माल का नष्ट होना - यदि specific goods संविदा बनने के बाद लेकिन जोखिम buyer पर जाने से पहले बिना किसी पक्ष की गलती के नष्ट हो जाएँ, तो संविदा समाप्त हो सकती है।
धारा 9 - कीमत का निर्धारण - कीमत निम्न प्रकार निर्धारित हो सकती है - 
1. संविदा में स्पष्ट रूप से।
2. सहमत तरीके से।
3. पक्षकारों के व्यवहार से।
4. यदि कीमत निर्धारित नहीं है तो परिस्थितियों के अनुसार reasonable price।
धारा 10 - मूल्यांकन या तीसरे व्यक्ति द्वारा कीमत निर्धारण - यदि कीमत किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा निर्धारित होनी है और वह व्यक्ति कीमत निर्धारित नहीं करता, तो संविदा प्रभावित हो सकती है, कुछ परिस्थितियों में पहले से प्राप्त माल के संबंध में उचित भुगतान का प्रश्न उत्पन्न हो सकता है।
धारा 11 - समय की शर्त - कीमत के भुगतान का समय संविदा का मूल तत्व नहीं माना जाता, जब तक संविदा से विपरीत मंशा स्पष्ट न हो।
धारा 12 - Condition और Warranty
Condition - ऐसी शर्त जो संविदा के मुख्य उद्देश्य के लिए आवश्यक हो। इसके उल्लंघन पर बॉयर संविदा समाप्त कर सकता है, damages मांग सकता है।
Warranty - ऐसी शर्त जो संविदा के मुख्य उद्देश्य के लिए सहायक है। इसके उल्लंघन पर damages मिलते हैं, माल अस्वीकार करने का अधिकार नहीं मिलता।
धारा 13 - Condition को Warranty मानना - कुछ परिस्थितियों में buyer condition के breach को warranty के breach के रूप में treat कर सकता है। इसके बाद वह संविदा समाप्त करने के बजाय damages मांग सकता है।
धारा 14 - Title की निहित शर्त - विक्रेता के पास - 
1. माल बेचने का अधिकार होना चाहिए।
2. Sale के समय माल पर शांतिपूर्ण कब्जे का अधिकार buyer को मिलना चाहिए।
3. माल किसी undisclosed encumbrance से मुक्त होना चाहिए।
धारा 15 - Description द्वारा Sale - यदि माल description के आधार पर बेचा गया है तो माल description के अनुरूप होना चाहिए।
उदाहरण - शुद्ध कश्मीरी ऊन के नाम पर सामान्य ऊन बेच दी जाए तो buyer को remedy मिल सकती है।
धारा 16 - Quality और Fitness - 
सामान्य सिद्धांत - Caveat Emptor
अर्थ - क्रेता सावधान रहे, अर्थात buyer को स्वयं यह देखना चाहिए कि माल उसकी आवश्यकता के अनुरूप है या नहीं। प्रमुख अपवाद यदि buyer ने अपनी विशेष आवश्यकता बताई, seller की skill/judgment पर भरोसा किया, seller उसी प्रकार के माल का व्यापार करता है, माल description द्वारा खरीदा गया है, तो implied condition के प्रश्न उठ सकते हैं।
धारा 17 - Sale by Sample - यदि माल sample के आधार पर बेचा गया है तो - 
1. bulk sample के अनुरूप होना चाहिए।
2. buyer को sample से तुलना करने का उचित अवसर होना चाहिए।
3. माल hidden defects से मुक्त होना चाहिए।
अध्याय III संविदा का प्रभाव - 
धारा 18 - Unascertained Goods - जब तक माल ascertain नहीं होता, उसकी property buyer को transfer नहीं होती है।
धारा 19 - Property कब transfer होगी? - Property transfer होने का प्रश्न parties की intention पर निर्भर करता है। अर्थात न्यायालय - contract की शर्तें, parties का conduct और परिस्थितियाँ देखेगा।
धारा 20 - Specific Goods - यदि specific goods - deliverable state में हैं, unconditional contract है, तो property संविदा बनते ही buyer को transfer हो सकती है।
धारा 21 - Seller को माल तैयार करना - यदि seller को माल को deliverable state में लाने के लिए कोई कार्य करना है, तो वह कार्य पूरा होने और buyer को सूचना मिलने तक property transfer नहीं होती।
धारा 22 - कीमत निर्धारित करने का कार्य - यदि seller को माल की कीमत निर्धारित करने के लिए कोई कार्य करना है, तो property उस कार्य और buyer को सूचना आदि की शर्तों के अनुसार transfer होगी।
धारा 23 - Unascertained Goods  Appropriation - unascertaine/ future goods हैं, contract के अनुसार goods को निश्चित रूप से appropriation किया गया, buyer की सहमति express या implied है, तो property transfer हो सकती है।
धारा 24 - Approval या Sale or Return - यदि माल buyer को approval, trial, sale or return
के आधार पर दिया गया है, तो property तब transfer हो सकती है जब buyer acceptance का संकेत दे या निर्धारित अवधि के भीतर माल वापस न करे। 
धारा 25 - Reservation of Right of Disposal -Seller कुछ परिस्थितियों में माल का disposal right अपने पास रख सकता है। जब तक निर्धारित condition पूरी नहीं होती, property buyer को transfer नहीं होती।
धारा 26 - Risk - सामान्य नियम - Risk prima facie passes with property. अर्थात जिस व्यक्ति के पास property है, जोखिम भी उसी का होगा। उदाहरण - A ने B को कार बेच दी और ownership B को transfer हो गई। Delivery से पहले कार बिना किसी पक्ष की गलती से नष्ट हो गई। risk B का होगा। 
धारा 27 - Nemo Dat Quod Non Habet - इसका अर्थ है - कोई व्यक्ति उतना ही अच्छा title दे सकता है जितना स्वयं उसके पास है। यदि seller स्वयं owner नहीं है तो buyer को उससे अच्छा title नहीं मिलेगा।
उदाहरण - A ने चोरी की हुई बाइक B को बेच दी। B को बाइक का वैध title नहीं मिलेगा।
अपवाद - Act में bona fide purchaser की सुरक्षा के लिए कुछ अपवाद हैं।
धारा 28 - संयुक्त स्वामी द्वारा बिक्री - 
यदि कई joint owners में से एक व्यक्ति अन्य की अनुमति के बिना माल के possession में है और buyer ने good faith में तथा seller के अधिकार की जानकारी के बिना माल खरीदा है, तो कुछ परिस्थितियों में buyer को अच्छा title मिल सकता है।
धारा 29 - Voidable Contract - यदि seller ने माल किसी voidable contract के अंतर्गत प्राप्त किया और contract अभी rescind नहीं हुआ था, तो good faith buyer कुछ परिस्थितियों में अच्छा title प्राप्त कर सकता है।
धारा 30 - Seller/Buyer in Possession Seller in Possession - Seller ने माल बेच दिया, लेकिन माल उसके कब्जे में है। वह कुछ परिस्थितियों में दूसरे bona fide buyer को अच्छा title दे सकता है। Buyer in Possession
Buyer ने माल खरीद लिया लेकिन ownership संबंधी स्थिति में कुछ औपचारिकता बाकी है और वह माल के possession में है। कुछ परिस्थितियों में उसका subsequent transfer प्रभावी हो सकता है।
अध्याय IV - संविदा का निष्पादन - 
धारा 31- Seller और Buyer के कर्तव्य - 
Seller का कर्तव्य - माल deliver करना
Buyer का कर्तव्य - माल स्वीकार करना,
कीमत देना।
धारा 32 - Payment और Delivery Concurrent Conditions - Payment और delivery साथ-साथ होने चाहिए। Seller माल देने के लिए तैयार हो और buyer कीमत देने के लिए तैयार हो।
धारा 33 - Delivery - Delivery का अर्थ है माल का possession buyer को हस्तांतरित करना। Delivery हो सकती है - 
1. Actual 
2. Symbolic
3. Constructive
धारा 34 - Part Delivery माल के किसी भाग की delivery - कुछ परिस्थितियों में पूरे माल की delivery पर प्रभाव पड़ सकता है, लेकिन यह parties की intention पर निर्भर करेगा।
धारा 35 - Buyer द्वारा Delivery की मांग - Seller तब तक माल deliver करने के लिए बाध्य नहीं होता जब तक contract की शर्तों के अनुसार delivery का समय न आ जाए और आवश्यक परिस्थितियाँ पूरी न हों।
धारा 36 - Delivery के नियम - 
Delivery उचित समय, उचित स्थान पर हो एवं carrier को delivery, buyer द्वारा माल लेने की व्यवस्था आदि।
धारा 37 - Wrong Quantity - यदि seller, कम माल भेजता है, अधिक माल भेजता है, या contract से अलग माल भेजता है, तो buyer को Act के अनुसार माल स्वीकार/अस्वीकार करने के अधिकार मिल सकते हैं।
धारा 38 - Installment Delivery - यदि संविदा में installment delivery है तो हर installment का अलग treatment हो सकता है। एक installment का breach पूरी संविदा समाप्त करने के लिए पर्याप्त है या नहीं, यह परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
धारा 39 - Carrier को Delivery - 
यदि seller carrier को माल देता है, तो कुछ परिस्थितियों में यह buyer को delivery के बराबर माना जाता है।
लेकिन seller को उचित परिस्थितियों में carrier को आवश्यक निर्देश देने होते हैं।
धारा 40 - Transit में माल की जोखिम - यदि माल transport के दौरान स्वाभाविक रूप से खराब होने वाला है और buyer ने विशेष delivery method नहीं बताया है, तो कुछ परिस्थितियों में deterioration का risk buyer पर आ सकता है।
धारा 41 - Examination of Goods - Buyer को माल स्वीकार करने से पहले उसकी जाँच करने का उचित अवसर मिलना चाहिए।
धारा 42 - Acceptance - Buyer द्वारा माल accept माना जा सकता है जब - 
1. वह seller को acceptance की सूचना देता है।
2. ऐसा act करता है जो seller के ownership से inconsistent हो।
3. उचित समय तक माल retain करता है और reject नहीं करता।
धारा 43 - Buyer द्वारा माल लौटाना - 
यदि buyer माल reject करता है तो उसे माल वापस भेजना हमेशा आवश्यक नहीं होता, जब तक संविदा में ऐसा प्रावधान न हो।
धारा 44 - Buyer द्वारा माल लेने में उपेक्षा - यदि buyer माल लेने या स्वीकार करने में उपेक्षा करता है और इससे seller को नुकसान होता है, तो buyer को seller के नुकसान और custody expenses के लिए उत्तरदायी होना पड़ सकता है।
अध्याय V - Unpaid Seller
धारा 45 - Unpaid Seller की परिभाषा - Seller unpaid है यदि
1. पूरी कीमत नहीं मिली।
2. Negotiable instrument द्वारा मिली payment dishonour हो गई।
धारा 46 - Unpaid Seller के अधिकार - Unpaid seller को - 
माल के विरुद्ध - 
1. Lien
2. Stoppage in Transit
3. Resale का अधिकार मिलता है। Buyer के विरुद्ध - 
1. Price का suit
2. Damages
3. Interest आदि का अधिकार हो सकता है।
धारा 47 - Seller's Lien - Unpaid seller के पास माल का कब्जा है तो वह कीमत मिलने तक माल रोक सकता है, यदि - 
1. credit पर sale नहीं हुई है, या
2. credit की अवधि समाप्त हो गई है, या
3. buyer insolvent हो गया है।
इसे Seller's Lien कहते हैं।
धारा 48 - Part Delivery - Seller ने माल का कुछ भाग deliver कर दिया है, फिर भी परिस्थितियों के अनुसार बाकी माल पर lien का अधिकार बच सकता है।
धारा 49 - Lien कब समाप्त होता है? - जब seller माल carrier को बिना reservation के दे देता है, buyer या उसका agent माल को lawful possession में ले लेता है, seller lien को waive कर देता है।
धारा 50 - Stoppage in Transit - 
यदि - Seller unpaid है + Buyer insolvent है + Goods transit में हैं तो seller goods को transit में रोक सकता है।
उदाहरण - A ने B को माल भेजा।
माल रास्ते में है। B दिवालिया हो गया और A को कीमत नहीं मिली। A carrier को सूचना देकर माल रुकवा सकता है। इसे कहते हैं - Right of Stoppage in Transit.
धारा 51 - Transit की अवधि - Goods transit में माने जाते हैं जब तक वे buyer या उसके agent के possession में नहीं पहुँचते। कुछ परिस्थितियों में transit समाप्त हो जाता है, जैसे - buyer या उसका agent माल को carrier से प्राप्त कर ले, carrier buyer की ओर से माल रखने लगे।
धारा 52 - Stoppage का तरीका -Seller वास्तविक possession लेकर या carrier/bailee को सूचना देकर
stoppage कर सकता है।
धारा 53 Sub-sale या Pledge - Buyer द्वारा माल को आगे बेचने या pledge करने पर unpaid seller का अधिकार कुछ परिस्थितियों में प्रभावित हो सकता है। विशेष रूप से good faith और document of title का प्रश्न महत्वपूर्ण होता है।
धारा 54 Resale - Unpaid seller कुछ परिस्थितियों में माल को पुनः बेच सकता है। लेकिन buyer को उचित notice देना महत्वपूर्ण है। यदि माल perishable है तो परिस्थितियों के अनुसार notice का प्रश्न अलग हो सकता है।
अध्याय VI - संविदा भंग के परिणाम - 
धारा 55 - Price की वसूली - Seller कुछ परिस्थितियों में buyer के विरुद्ध price के लिए suit कर सकता है।
धारा 56 - Non-Acceptance के लिए Damages - यदि buyer माल को स्वीकार करने से गलत तरीके से मना करता है तो seller damages मांग सकता है।
धारा 57 - Non-Delivery के लिए Damages - यदि seller माल deliver नहीं करता तो buyer damages के लिए suit कर सकता है।
धारा 58 Specific Performance - 
Specific या ascertained goods के मामले में न्यायालय परिस्थितियों के अनुसार seller को माल deliver करने का आदेश दे सकता है।
यह विशेष रूप से तब महत्वपूर्ण होता है जब monetary compensation पर्याप्त remedy न हो।
धारा 59 - Breach of Warranty - Buyer कीमत में कमी कर सकता है,
damages मांग सकता है। केवल warranty breach होने पर goods reject नहीं किए जा सकते।
धारा 60 - Anticipatory Breach - 
यदि delivery की तारीख से पहले कोई पक्ष स्पष्ट रूप से संविदा का पालन करने से इनकार कर देता है, तो दूसरा पक्ष 
संविदा को समाप्त मान सकता है और damages मांग सकता है या निर्धारित समय तक प्रतीक्षा कर सकता है।
धारा 61 - Interest - कुछ परिस्थितियों में seller या buyer को interest प्राप्त हो सकता है।
अध्याय VII - विविध - 
धारा 62 - Implied Terms का Exclusion - जहाँ कानून अनुमति देता है, वहाँ implied condition या warranty को - express agreement, course of dealing,
usage of trade के माध्यम से exclude या modify किया जा सकता है।
धारा 63 - Reasonable Time - जहाँ Act में reasonable time का प्रश्न आता है, वहाँ reasonable time तथ्य और परिस्थितियों का प्रश्न है।
धारा 64 - Auction Sale - नीलामी के नियम - 
1. प्रत्येक lot अलग contract माना जा सकता है।
2. Sale पूर्ण होने से पहले bid वापस ली जा सकती है।
3. Seller यदि reserve price रखता है तो उसके अनुसार sale होगी।
4. Pretended bidding द्वारा कीमत बढ़ाना कानून के विरुद्ध हो सकता है।
5. Auctioneer द्वारा hammer गिराना या customary method से sale complete हो सकती है।
उदाहरण - नीलामी में A ने 1 लाख की बोली लगाई। Hammer गिरने से पहले A अपनी bid वापस ले सकता है, यदि लागू नियमों के अनुसार sale अभी पूर्ण नहीं हुई।
धारा 64A - करों में परिवर्तन - यदि माल पर tax में परिवर्तन होता है, तो परिस्थितियों और संविदा की शर्तों के अनुसार price में वृद्धि या कमी की जा सकती है।
धारा 65 - निरसित - यह धारा अब प्रभावी प्रावधान के रूप में लागू नहीं है।
धारा 66 - निरसित - यह धारा भी वर्तमान में प्रभावी नहीं है।
प्रमुख न्यायिक निर्णय - 
1. Rowland v. Divall (1923) - एक व्यक्ति ने चोरी की कार खरीद ली। बाद में असली मालिक ने कार वापस ले ली।
न्यायालय ने माना कि buyer को वह title मिला ही नहीं जिसकी उसने कीमत चुकाई थी।
सिद्धांत - Seller को अच्छा title देना चाहिए।
यह धारा 14 और Nemo Dat principle समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
2. Grant v. Australian Knitting Mills (1936) - अंडरगारमेंट्स में ऐसा defect था जिससे buyer को नुकसान हुआ। मामला fitness/quality के implied terms से संबंधित था।
सिद्धांत - परिस्थितियों के अनुसार buyer seller की skill/judgment पर भरोसा कर सकता है।
3. Arcos Ltd. v. Ronaasen (1933) - माल description के अनुसार होना चाहिए। थोड़ा-सा भी महत्वपूर्ण deviation description sale में समस्या पैदा कर सकता है।
संबंध धारा 15
4. Varley v. Whipp (1900) - माल description के आधार पर बेचा गया था, लेकिन वास्तविक माल description के अनुरूप नहीं था।
सिद्धांत - Sale by description में माल का description के अनुरूप होना आवश्यक है।

क्षतिपूर्ति-धारक के अधिकार - 
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (Indian Contract Act, 1872) की धारा 125 में क्षतिपूर्ति-धारक (Indemnity Holder) के अधिकारों का उल्लेख किया गया है।
क्षतिपूर्ति संविदा (Contract of Indemnity - धारा 124) के तहत जब क्षतिपूर्ति-धारक अपने अधिकार क्षेत्र (Scope of Authority) के भीतर कार्य करता है, तो उसे क्षतिपूर्तिकर्ता (Indemnifier) से निम्नलिखित राशियां वसूलने का विधिक अधिकार प्राप्त होता है:
1. सभी नुकसानी वसूलने का अधिकार (Right to Recover Damages) - 
धारा 125(1) के अनुसार, क्षतिपूर्ति-धारक वह समस्त नुकसानी (Damages) क्षतिपूर्तिकर्ता से वसूल सकता है, जिसे चुकाने के लिए वह किसी ऐसे वाद (Suit) में विवश किया गया हो, जो उस विषय से संबंधित है जिस पर क्षतिपूर्ति का वचन लागू होता है।
2. वाद के सभी खर्चे वसूलने का अधिकार - (Right to Recover Costs of Suit) - धारा 125(2) के अनुसार, क्षतिपूर्ति-धारक किसी वाद को लाने या उसका बचाव (Defence) करने में खर्च हुई समस्त विधिक लागत (Legal Costs) वसूल सकता है, बशर्ते 
• उसने वाद लाते या बचाव करते समय क्षतिपूर्तिकर्ता के आदेशों या निर्देशों का उल्लंघन न किया हो।
• उसने वैसे ही कार्य किया हो जैसे एक साधारण प्रज्ञा वाला व्यक्ति (Prudent Man) क्षतिपूर्ति की संविदा न होने पर अपने मामले में करता, अथवा क्षतिपूर्तिकर्ता ने उसे वाद लाने या बचाव करने का अधिकार दिया हो।
3. समझौते/राजीनामे में दी गई राशि वसूलने का अधिकार - (Right to Recover Sums Paid under Compromise) - धारा 125(3) के अनुसार, यदि क्षतिपूर्ति-धारक ने किसी ऐसे वाद में कोई समझौता (Compromise) किया है, तो समझौते की शर्तों के अधीन चुकाई गई समस्त राशि वसूलने का हकदार है, बशर्ते - 
• वह समझौता क्षतिपूर्तिकर्ता के आदेशों के विपरीत न हो।
• समझौता सद्भावनापूर्वक और एक प्रज्ञ व्यक्ति की तरह किया गया हो, या 
• क्षतिपूर्तिकर्ता ने उस समझौते के लिए स्पष्ट अनुमति दी हो।
क्षतिपूर्ति दायित्व का प्रारंभ (साम्या का नियम Rule of Equity) - मूल संविदा अधिनियम में यह स्पष्ट नहीं था कि क्षतिपूर्ति-धारक क्षतिपूर्तिकर्ता से क्लेम कब मांग सकता है—वास्तविक नुकसान चुकाने के बाद या देयता उत्पन्न होते ही?
गजानन मोरेश्वर बनाम मोरेश्वर मदन (1942) — बॉम्बे हाईकोर्ट - न्यायमूर्ति छागला ने ऐतिहासिक निर्णय देते हुए साम्या के सिद्धांत (Equity Rule) को लागू किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि क्षतिपूर्ति-धारक को क्षतिपूर्तिकर्ता के विरुद्ध वाद लाने के लिए पहले अपनी जेब से वास्तविक भुगतान करने तक प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है। जैसे ही क्षतिपूर्ति-धारक का दायित्व पूर्ण व निश्चित (Absolute Liability) हो जाता है, वह क्षतिपूर्तिकर्ता को सीधे उस देयता का भुगतान करने या स्वयं को दायित्वमुक्त कराने के लिए विवश कर सकता है।

क्षतिपूर्ति-धारक के अधिकार (Rights of Indemnity-holder) - भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 125 में मुख्य रूप से दिए गए हैं। पहले यह समझ लें कि क्षतिपूर्ति-धारक यानी वह व्यक्ति जिसके हित की क्षतिपूर्ति करने का वचन दिया गया है।
क्षतिपूर्ति-धारक कौन - भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 124 के अनुसार, क्षतिपूर्ति की संविदा वह संविदा है जिसमें एक पक्ष दूसरे पक्ष को स्वयं वचनदाता के आचरण या किसी अन्य व्यक्ति के आचरण से होने वाली हानि से बचाने का वचन देता है।
क्षतिपूर्तिकर्ता (Indemnifier) = जो हानि की भरपाई करने का वचन देता है।
क्षतिपूर्ति-धारक (Indemnity-holder) = जिसे हानि से बचाने का वचन दिया गया है। उदाहरण - A, B से कहता है कि यदि C के मुकदमे के कारण तुम्हें कोई हानि होती है, तो मैं उसकी भरपाई करूँगा। यहाँ A क्षतिपूर्तिकर्ता और B क्षतिपूर्ति-धारक है।
धारा 125 के अंतर्गत क्षतिपूर्ति-धारक के अधिकार - जब क्षतिपूर्ति-धारक के विरुद्ध उस विषय से संबंधित मुकदमा किया जाता है जिसकी क्षतिपूर्ति का वचन दिया गया है, तो उसे क्षतिपूर्तिकर्ता से निम्न अधिकार प्राप्त होते हैं।
हर्जाने की वसूली का अधिकार - क्षतिपूर्ति-धारक को उन सभी हर्जानों (damages) को वसूल करने का अधिकार है जिन्हें उसे ऐसे मुकदमे में भुगतान करने के लिए बाध्य किया गया है।
उदाहरण - A ने B को क्षतिपूर्ति देने का वचन दिया। C ने B पर मुकदमा किया और B को ₹50,000 का हर्जाना देना पड़ा। यदि यह मुकदमा उस क्षतिपूर्ति-संविदा के दायरे में आता है, तो B, A से ₹50,000 वसूल कर सकता है।
मुकदमे के खर्चों की वसूली का अधिकार - क्षतिपूर्ति-धारक को उस मुकदमे में किए गए उचित कानूनी खर्च (costs) भी क्षतिपूर्तिकर्ता से प्राप्त करने का अधिकार है। लेकिन इसके लिए दो बातें महत्वपूर्ण हैं - 
1. क्षतिपूर्ति-धारक ने मामले में विवेकपूर्ण ढंग से कार्य किया हो, और
2. उसने क्षतिपूर्तिकर्ता के निर्देशों के विपरीत कार्य न किया हो।
उदाहरण - B को अपना बचाव करने के लिए वकील करना पड़ा और ₹20,000 मुकदमे में खर्च हुए। यदि B ने उचित तरीके से मुकदमा लड़ा और क्षतिपूर्ति की शर्तों के अनुरूप कार्य किया, तो वह यह खर्च भी A से मांग सकता है।
3. समझौते के तहत भुगतान की गई राशि की वसूली - यदि क्षतिपूर्ति-धारक ने किसी मुकदमे में समझौता करके कोई राशि चुकाई है, तो कुछ शर्तों के अधीन वह राशि भी क्षतिपूर्तिकर्ता से वसूल कर सकता है।
इसके लिए समझौता - 
• क्षतिपूर्तिकर्ता के निर्देशों के विरुद्ध नहीं होना चाहिए
• परिस्थितियों में उचित होना चाहिए
• विवेकपूर्ण ढंग से किया गया होना चाहिए।
उदाहरण - C ने B के विरुद्ध ₹1,00,000 का दावा किया। B ने उचित समझौते के तहत ₹60,000 देकर विवाद समाप्त कर दिया। यदि B ने समझदारी से और क्षतिपूर्ति-संविदा की शर्तों के अनुरूप समझौता किया था, तो वह A से ₹60,000 की वसूली कर सकता है।
तीन प्रमुख अधिकार एक नजर में - 
क्रम अधिकार अर्थ
1. हर्जाने की वसूली - मुकदमे में दिए गए हर्जाने की राशि प्राप्त करना
2. मुकदमे के खर्च की वसूली - उचित कानूनी खर्च प्राप्त करना
3. समझौते की राशि की वसूली - उचित समझौते में भुगतान की गई राशि प्राप्त करना
महत्वपूर्ण - धारा 125 की भाषा - धारा 125 के अनुसार क्षतिपूर्ति-धारक को क्षतिपूर्तिकर्ता से तीन प्रकार की राशि प्राप्त हो सकती है - 
(i) वह हर्जाना जिसे वह भुगतान करने के लिए बाध्य हुआ हो।
(ii) मुकदमे के वे सभी खर्च जिन्हें उसने भुगतान किया हो, बशर्ते उसने विवेकपूर्वक कार्य किया हो और क्षतिपूर्तिकर्ता के निर्देशों के विपरीत कार्य न किया हो।
(iii) समझौते के तहत भुगतान की गई राशि, यदि समझौता विवेकपूर्ण था और क्षतिपूर्तिकर्ता के निर्देशों के विपरीत नहीं था।
क्या क्षतिपूर्ति-धारक मुकदमा होने से पहले ही क्षतिपूर्ति मांग सकता है? - 
भारतीय न्यायालयों ने समय के साथ क्षतिपूर्ति की संविदा की व्याख्या केवल इस आधार तक सीमित नहीं रखी कि पहले क्षतिपूर्ति-धारक वास्तविक रूप से भुगतान करे और उसके बाद ही वह क्षतिपूर्तिकर्ता से राशि मांगे। विशेष परिस्थितियों में, जब दायित्व निश्चित हो गया हो और क्षतिपूर्ति-धारक पर वास्तविक आर्थिक दायित्व आने वाला हो, न्यायालय ने क्षतिपूर्ति-धारक को संरक्षण देने की व्यापक दृष्टि अपनाई है।
इस संदर्भ में Gajanan Moreshwar Parelkar v. Moreshwar Madan Mantri (1942) का निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
निष्कर्ष - भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 125 क्षतिपूर्ति-धारक को तीन प्रमुख अधिकार प्रदान करती है:
1. मुकदमे में दिए गए हर्जाने की वसूली,
2. उचित मुकदमे के खर्चों की वसूली, तथा
3. उचित एवं विवेकपूर्ण समझौते के अंतर्गत भुगतान की गई राशि की वसूली।
इस प्रकार, क्षतिपूर्ति की संविदा का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जिस व्यक्ति को हानि से बचाने का वचन दिया गया है, वह उस संविदा के दायरे में आने वाली आर्थिक हानि का अंतिम भार स्वयं न उठाए।

जमानतदार/प्रत्याभूतिदाता (Surety) के अधिकार  - 
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के अध्याय VIII (धारा 126 से 147) के अंतर्गत जमानतदार एवं उसके अधिकार को बताया गया है। जमानतदार वह व्यक्ति है जो यह आश्वासन देता है कि मुख्य देनदार (Principal Debtor) अपने दायित्व का पालन करेगा और उसके चूक करने पर वह लेनदार (Creditor) के प्रति उत्तरदायी होगा।
जमानतदार के अधिकार
(क) मुख्य देनदार के विरुद्ध अधिकार
(ख) लेनदार के विरुद्ध अधिकार
(ग) सह-जमानतदारों के विरुद्ध अधिकार
I. मुख्य देनदार के विरुद्ध जमानतदार का अधिकार - 
(A) क्षतिपूर्ति का अधिकार - जब जमानतदार मुख्य देनदार की ओर से लेनदार को कोई राशि चुका देता है, तो उसे मुख्य देनदार से उस राशि की वापसी प्राप्त करने का अधिकार होता है। धारा 145 के अनुसार प्रत्येक प्रत्याभूति संविदा में मुख्य देनदार की ओर से जमानतदार को क्षतिपूर्ति करने का एक निहित वचन माना जाता है।
उदाहरण - अ ने ब के ऋण के लिए स को जमानत दी। ब ने ऋण नहीं चुकाया और स ने ब की ओर से ₹50,000 चुका दिए। स को ब से ₹50,000 वापस मांगने का अधिकार होगा।
(B) लेनदार के अधिकार प्राप्त करने का अधिकार - धारा 140 के अनुसार जब जमानतदार का दायित्व समाप्त हो जाता है और वह लेनदार की देय राशि चुका देता है, तो वह लेनदार के सभी अधिकारों (Rights of Creditor) में प्रवेश कर जाता है। इसे Subrogation का अधिकार कहते हैं। अर्थात् जमानतदार लेनदार को भुगतान करने के बाद मुख्य देनदार के विरुद्ध वही अधिकार प्रयोग कर सकता है जो लेनदार के पास थे।
लेनदार के विरुद्ध जमानतदार के अधिकार - 
(A) प्रतिभूतियों का लाभ प्राप्त करने का अधिकार - यदि लेनदार के पास मुख्य देनदार की कोई प्रतिभूति (Security) है और वह जमानतदार की जानकारी या सहमति के बिना उस प्रतिभूति को खो देता है या छोड़ देता है, तो जमानतदार की देयता उस प्रतिभूति के मूल्य की सीमा तक कम हो सकती है। यह सिद्धांत धारा 141 में दिया गया है।
उदाहरण - अ ने ब के ऋण के लिए स की जमानत ली और ब की संपत्ति को सुरक्षा के रूप में रखा। यदि स की सहमति के बिना अ उस सुरक्षा को छोड़ देता है और ब चूक करता है, तो स को उस सुरक्षा के मूल्य तक संरक्षण मिल सकता है।
(B) अनुबंध की शर्तों का पालन कराने का अधिकार - जमानतदार यह अपेक्षा कर सकता है कि लेनदार और मुख्य देनदार के बीच मूल संविदा की शर्तों में ऐसा परिवर्तन न किया जाए जिससे जमानतदार की जोखिम या देयता बढ़ जाए। धारा 133 के अनुसार जमानतदार की सहमति के बिना मूल संविदा में ऐसा परिवर्तन किया जाता है जिससे जमानतदार की देयता प्रभावित होती है, तो वह परिवर्तन के बाद होने वाले लेनदायित्व से मुक्त हो सकता है।
सह-जमानतदारों के विरुद्ध अधिकार - 
जब एक ही ऋण या दायित्व के लिए एक से अधिक जमानतदार होते हैं, तो उन्हें सह-जमानतदार (Co-sureties) कहा जाता है।
(A) योगदान का अधिकार - धारा 146 के अनुसार यदि सह-जमानतदारों ने समान दायित्व के लिए जमानत दी है, तो वे आपस में समान रूप से योगदान करने के लिए उत्तरदायी होते हैं।
उदाहरण - A, B और C ने D के ₹90,000 के ऋण की जमानत दी। यदि A ने पूरा ₹90,000 चुका दिया, तो परिस्थितियों के अनुसार A को B और C से उनका-अपना हिस्सा, अर्थात ₹30,000 - ₹30,000, प्राप्त करने का अधिकार होगा।
(B) अलग-अलग सीमाओं वाली जमानत में योगदान - यदि सह - जमानतदारों की देयता की सीमाएं अलग - अलग हैं, तो धारा 147 के अनुसार उनका योगदान उनकी संबंधित जमानत की सीमा के अनुसार निर्धारित किया जाएगा।
जमानतदार का प्रत्याभूति समाप्त करने का अधिकार - जमानतदार कुछ परिस्थितियों में अपनी भविष्य की देयताओं के संबंध में जमानत वापस (Revocation) ले सकता है। धारा 130 के अनुसार निरंतर प्रत्याभूति (Continuing Guarantee) को जमानतदार भविष्य के लेनदेन के संबंध में नोटिस देकर रद्द कर सकता है। लेकिन पहले से किए गए लेनदेन के लिए उसकी देयता बनी रहती है।
मुख्य देनदार के दायित्व में परिवर्तन से संरक्षण - यदि लेनदार और मुख्य देनदार जमानतदार की सहमति के बिना मूल संविदा में ऐसा परिवर्तन करते हैं जिससे जमानतदार का जोखिम बढ़ता है, तो धारा 133 के अनुसार जमानतदार उस परिवर्तन के बाद होने वाले दायित्व से मुक्त होता है।
यह जमानतदार के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा है।
लेनदार द्वारा मुख्य देनदार को मुक्त करने पर अधिकार - यदि लेनदार मुख्य देनदार को संविदात्मक रूप से मुक्त कर देता है या ऐसा कार्य करता है जिससे जमानतदार की स्थिति प्रभावित होती है, तो धारा 134 और संबंधित प्रावधानों के अनुसार जमानतदार की देयता समाप्त हो सकती है। हालांकि केवल लेनदार द्वारा मुख्य देनदार को समय देने मात्र से हर स्थिति में जमानतदार मुक्त नहीं होता। इसके लिए संविदा अधिनियम की संबंधित धाराओं की शर्तें देखनी होती हैं।
जमानतदार के अधिकारों का सार - 
• मुख्य देनदार से क्षतिपूर्ति - धारा 145
• लेनदार के अधिकारों में प्रवेश (Subrogation) - धारा 140
• लेनदार की प्रतिभूतियों का लाभ - धारा 141
• संविदा में अनधिकृत परिवर्तन से संरक्षण - धारा 133
• निरंतर प्रत्याभूति वापस लेने का अधिकार - धारा 130
• सह-जमानतदारों से योगदान - धारा 146
• अलग-अलग सीमा वाले सह-जमानतदारों से योगदान - धारा 147
निष्कर्ष - जमानतदार यद्यपि मुख्य देनदार की चूक पर लेनदार के प्रति उत्तरदायी होता है, लेकिन कानून उसे असुरक्षित नहीं छोड़ता। भुगतान करने के बाद मुख्य देनदार से राशि की वसूली, लेनदार के अधिकारों में प्रवेश, प्रतिभूतियों का लाभ, संविदा में प्रतिकूल परिवर्तन से संरक्षण तथा सह-जमानतदारों से योगदान उसके प्रमुख अधिकार हैं। इस प्रकार भारतीय संविदा अधिनियम जमानतदार और लेनदार के हितों के बीच संतुलन स्थापित करता है।

जमानत (बेलमेंट) और गिरवी (Pledge) - 
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 में जमानत और गिरवी दोनों विशेष संविदाएँ हैं। इनका मुख्य अंतर यह है कि जमानत में वस्तु किसी विशेष उद्देश्य से दूसरे व्यक्ति को सौंपी जाती है, जबकि गिरवी में वस्तु ऋण या वचन के लिए सुरक्षा के रूप में सौंपी जाती है। इन दोनों का वर्णन अधिनियम की धारा 148 से 181 के अंतर्गत किया गया है - 
जमानत/बेलमेंट (Bailment) का अर्थ - धारा 148 के अनुसार, जब एक व्यक्ति अपनी वस्तुएँ किसी दूसरे व्यक्ति को किसी उद्देश्य से इस शर्त पर देता है कि उद्देश्य पूरा होने पर वस्तुएँ वापस कर दी जाएंगी या वस्तु देने वाले के निर्देशानुसार उनका निपटारा किया जाएगा, तो इसे Bailment कहते हैं। वस्तु देने वाले को Bailor (बेलर) और वस्तु प्राप्त करने वाले को Bailee (बेली) कहा जाता है।
उदाहरण - A अपनी कार B को 10 दिनों के लिए मरम्मत हेतु देता है। B मरम्मत के बाद कार A को वापस करेगा। यह Bailment है।
बेलमेंट के आवश्यक तत्व - 
I. वस्तु का सुपुर्द किया जाना - Bailment में चल संपत्ति का कब्जा दूसरे व्यक्ति को दिया जाता है। केवल स्वामित्व का हस्तांतरण पर्याप्त नहीं है।
II. किसी उद्देश्य के लिए सुपुर्दगी - वस्तु किसी निश्चित उद्देश्य हेतु दी जाती है, जैसे मरम्मत, सुरक्षित रखना, परिवहन आदि।
III. वापस करने की शर्त - उद्देश्य पूरा होने पर वस्तु वापस करनी होती है या Bailor के निर्देश के अनुसार उसका निपटारा करना होता है।
IV. चल संपत्ति - Bailment goods/ chattels (जंगम) अर्थात चल वस्तुओं से संबंधित होता है।
V. स्वामित्व का हस्तांतरण नहीं -Bailment में वस्तु का स्वामित्व Bailor के पास रहता है, केवल उसका कब्जा Bailee को मिलता है।
Bailor के कर्तव्य - Bailor के प्रमुख कर्तव्य हैं - 
• वस्तु में मौजूद ज्ञात दोषों की जानकारी Bailee को देना।
• यदि Bailment के कारण Bailee को आवश्यक खर्च उठाना पड़े तो कानून के अनुसार उसका भुगतान करना।
• यदि Bailor वस्तु वापस लेने से इनकार करता है तो उत्पन्न होने वाले उचित खर्चों की जिम्मेदारी लेना।
• Bailment की शर्तों के अनुसार Bailee को वस्तु का उपयोग करने देना।
Bailee के कर्तव्य - Bailee के प्रमुख कर्तव्य हैं - 
(A) उचित सावधानी रखना - धारा 151 के अनुसार Bailee को वस्तु की उतनी ही सावधानी रखनी चाहिए जितनी सामान्य विवेक वाला व्यक्ति अपनी समान वस्तु की समान परिस्थितियों में रखता।
(ख) अनधिकृत उपयोग न करना - Bailee वस्तु का उपयोग Bailment की शर्तों के विपरीत नहीं कर सकता।
(ग) वस्तु को मिलाना नहीं - बिना Bailor की सहमति के वस्तु को अपनी वस्तुओं के साथ इस प्रकार नहीं मिलाया जा सकता कि उन्हें अलग करना कठिन हो।
(घ) समय पर वस्तु लौटाना - Bailment का उद्देश्य पूरा होने पर वस्तु Bailor को वापस करनी होती है।
(च) वस्तु से प्राप्त लाभ लौटाना - वस्तु से प्राप्त होने वाला कोई अतिरिक्त लाभ, वृद्धि या उपज, परिस्थितियों के अनुसार, Bailor को देनी होती है।
Bailor के अधिकार - Bailor को अधिकार है कि वह 
• शर्तों के अनुसार वस्तु वापस प्राप्त करे।
• Bailee द्वारा अनधिकृत उपयोग होने पर क्षतिपूर्ति मांगे।
• Bailee द्वारा वस्तु को नुकसान पहुंचाने पर हर्जाना मांगे।
• Bailment की शर्तों के उल्लंघन पर उचित कानूनी उपाय अपनाए।
Bailee के अधिकार - Bailee को भी कानून कुछ महत्वपूर्ण अधिकार देता है।
(A) खर्चों की प्रतिपूर्ति का अधिकार - आवश्यक परिस्थितियों में वस्तु की देखभाल या Bailment के उद्देश्य से किए गए खर्च की प्रतिपूर्ति प्राप्त करने का अधिकार हो सकता है।
(B) Lien का अधिकार - कुछ परिस्थितियों में Bailee वस्तु को तब तक अपने पास रख सकता है जब तक उसके वैध देय भुगतान का निपटारा न हो जाए।
(C) क्षतिपूर्ति का अधिकार - Bailor के दोषपूर्ण शीर्षक या निर्देशों के कारण Bailee को नुकसान होने पर वह क्षतिपूर्ति मांग सकता है।
प्लेज (Pledge) का अर्थ - धारा 172 के अनुसार जब किसी ऋण के भुगतान या किसी वचन के पालन की सुरक्षा के लिए वस्तुओं का कब्जा दूसरे व्यक्ति को दिया जाता है, तो उसे Pledge (गिरवी) कहते हैं। वस्तु देने वाले को Pawnor/ Pledgor (गिरवीकर्ता) और वस्तु प्राप्त करने वाले को Pawnee/ Pledgee (गिरवीदार) कहा जाता है।
उदाहरण - A बैंक से ₹1 लाख का ऋण लेता है और अपने सोने के आभूषण बैंक के पास सुरक्षा के रूप में रखता है। यह Pledge है।
Pledge के आवश्यक तत्व - 
I. वस्तु का कब्जा हस्तांतरित होना चाहिए।
II. वस्तु सुरक्षा के रूप में दी जानी चाहिए।
III. उद्देश्य ऋण या वचन की पूर्ति की सुरक्षा होना चाहिए।
IV. वस्तु का स्वामित्व Pawnor के पास रहता है।
V. ऋण या वचन पूरा होने पर वस्तु वापस की जाती है।
Pawnor के अधिकार - धारा 177 के अनुसार Pawnor को वास्तविक बिक्री से पहले गिरवी रखी वस्तु को छुड़ाने (Right of Redemption) का अधिकार है, 
बशर्ते वह ऋण और संबंधित देयताओं का भुगतान कर दे।
• ऋण चुकाकर वस्तु वापस लेना।
• Pawnee द्वारा वस्तु के अनुचित उपयोग पर आपत्ति करना।
• गिरवी वस्तु से संबंधित उचित लाभ प्राप्त करना।
• Pawnee द्वारा कानून के विरुद्ध बिक्री किए जाने पर उचित कानूनी उपाय करना।
Pawnee के अधिकार - Pawnee को महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त हैं:
(A) ऋण एवं ब्याज के लिए वस्तु रखने का अधिकार - धारा 173 के अंतर्गत Pawnee ऋण, ब्याज तथा आवश्यक खर्चों के लिए गिरवी वस्तु को अपने पास रख सकता है।
(B) असाधारण खर्चों की वसूली - धारा 175 के अनुसार गिरवी वस्तु की सुरक्षा या संरक्षण के लिए किए गए असाधारण खर्च की वसूली का अधिकार है।
(C) डिफॉल्ट होने पर बिक्री का अधिकार - धारा 176 के अनुसार यदि Pawnor ऋण या वचन पूरा करने में चूक करता है, तो Pawnee उचित नोटिस देकर गिरवी वस्तु को बेच सकता है और प्राप्त राशि से अपना ऋण व खर्च पूरा कर सकता है।
यदि बिक्री से प्राप्त राशि ऋण से अधिक है तो अतिरिक्त राशि Pawnor को लौटानी होगी। यदि राशि कम पड़ती है तो शेष राशि के लिए Pawnor उत्तरदायी रह सकता है।
Bailment और Pledge में अंतर - 
आधार - Bailment - Pledge
धारा - 148 - 172
उद्देश्य- किसी उद्देश्य से वस्तु सौंपना - ऋण/वचन की सुरक्षा।
पक्षकार - Bailor और Bailee - Pawnor और Pawnee
सुरक्षा - आवश्यक नहीं - आवश्यक तत्व
बिक्री का अधिकार - नहीं - चूक होने पर Pawnee को अधिकार
वस्तु वापस करना - उद्देश्य पूरा होने पर - ऋण/वचन पूरा होने पर
उदाहरण - मरम्मत के लिए कार देना - ऋण के लिए सोना गिरवी रखना
सबसे महत्वपूर्ण अंतर - हर Pledge, Bailment है, लेकिन हर Bailment, Pledge नहीं है। क्योंकि Pledge में भी वस्तु का कब्जा दूसरे व्यक्ति को दिया जाता है, इसलिए वह Bailment की एक विशेष अवस्था है। लेकिन Pledge में अतिरिक्त तत्व यह है कि वस्तु ऋण या वचन की सुरक्षा के रूप में दी जाती है।
सूत्र - 
Bailment = वस्तु + उद्देश्य + वापसी
Pledge = वस्तु + ऋण/वचन की सुरक्षा + चूक पर बिक्री का अधिकार
अतः Bailment का उद्देश्य वस्तु की सुरक्षित अभिरक्षा, उपयोग, मरम्मत आदि हो सकता है, जबकि Pledge का मूल उद्देश्य ऋण या वचन की पूर्ति के लिए सुरक्षा प्रदान करना है।

बिना प्रतिफल के जमानत - 
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 127 के अनुसार जमानत (Guarantee) के लिए प्रतिफल का नियम सामान्य संविदा से थोड़ा अलग है। सामान्यतः जमानतदार को स्वयं कोई प्रतिफल मिलना आवश्यक नहीं है। मुख्य ऋणी (Principal Debtor) के लाभ के लिए किया गया कोई कार्य या किया गया वचन ही जमानतदार के वचन का पर्याप्त प्रतिफल हो सकता है। 
जमानत का अर्थ - भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 126 के अनुसार, जमानत की संविदा वह संविदा है जिसमें कोई व्यक्ति किसी तीसरे व्यक्ति के वचन को पूरा करने या उसकी देयता का भुगतान करने का आश्वासन देता है, यदि वह तीसरा व्यक्ति अपने दायित्व में चूक करे। इसमें तीन पक्ष होते हैं - 
1. लेनदार (Creditor)
2. मुख्य ऋणी (Principal Debtor)
3. जमानतदार/प्रत्याभूतिदाता (Surety)
उदाहरण - A ने B को ₹1,00,000 का ऋण दिया। C ने A से कहा कि यदि B ऋण नहीं चुकाएगा तो C वह राशि चुका देगा। यहाँ A = लेनदार, B = मुख्य ऋणी
C = जमानतदार है।
धारा 126 के अनुसार जमानत मौखिक या लिखित दोनों हो सकती है। 
प्रतिफल (Consideration) का नियम - संविदा अधिनियम की सामान्य धारणा है कि बिना प्रतिफल के संविदा शून्य होती है, जिसका मूल सिद्धांत धारा 2(d) और धारा 25 से जुड़ा है। लेकिन जमानत की संविदा में धारा 127 एक विशेष नियम देती है  धारा 127 कहती है कि Anything done, or any promise made, for the benefit of the principal debtor, may be a sufficient consideration to the surety for giving the guarantee. अर्थात्, मुख्य ऋणी के लाभ के लिए किया गया कोई कार्य या किया गया कोई वचन जमानतदार द्वारा दी गई जमानत के लिए पर्याप्त प्रतिफल हो सकता है। यहीं से जमानत में प्रतिफल का अनोखा सिद्धांत सामने आता है।
बिना प्रतिफल के जमानत का वास्तविक अर्थ -
स्थिति 1: - जमानतदार को व्यक्तिगत लाभ नहीं मिला
मान लीजिए B ने A से ₹1 लाख उधार माँगा। A ने कहा यदि C तुम्हारी जमानत दे तो मैं तुम्हें ऋण दे दूँगा। C को स्वयं कोई पैसा, वस्तु या लाभ नहीं मिला। फिर भी C की जमानत वैध हो सकती है, क्योंकि A द्वारा B को ₹1 लाख का ऋण देना B के लाभ के लिए किया गया कार्य है। यह B के लिए लाभ है और C की जमानत के लिए पर्याप्त प्रतिफल है। अर्थात् जमानतदार को प्रत्यक्ष लाभ मिलना आवश्यक नहीं है।
प्रतिफल किसे मिलना चाहिए - यह जमानत की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।सामान्य संविदा में प्रतिफल प्राप्त करने वाला व्यक्ति और वचन देने वाला व्यक्ति संविदा के पक्षकार होते हैं, लेकिन जमानत में स्थिति अलग है। जमानत में प्रतिफल मुख्य ऋणी को मिलता है, लेकिन उसका लाभ जमानतदार के वचन के लिए पर्याप्त माना जाता है।
इसे एक सूत्र से समझ सकते हैं - 
लेनदार का कार्य → मुख्य ऋणी का लाभ → जमानतदार के वचन का प्रतिफल
उदाहरण - 
A → B को ₹50,000 देता है
C → B के ऋण की जमानत देता है
यहाँ ₹50,000 का ऋण B के लाभ के लिए है। इसलिए C की जमानत के लिए पर्याप्त प्रतिफल मौजूद है, भले ही C को ₹50,000 में से एक रुपया भी न मिला हो।
धारा 127 के तीन प्रमुख दृष्टांत - धारा 127 स्वयं तीन महत्वपूर्ण उदाहरण देती है। 
(A) ऋण देने का वचन, B, A से कहता है कि उसे उधार पर माल दे दिया जाए।
A कहता है, मैं B को उधार पर माल तभी दूँगा जब C भुगतान की जमानत देगा। C जमानत देने के लिए तैयार हो जाता है यहाँ A का B को उधार पर माल देने का वचन B के लाभ के लिए है। इसलिए यह C की जमानत का पर्याप्त प्रतिफल है।
निष्कर्ष - जमानतदार C को कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं मिला, फिर भी जमानत वैध है।
दूसरा उदाहरण - ऋण वसूली को कुछ समय के लिए रोकना - 
मान लीजिए A ने B को माल बेचा, लेकिन B ने उसका मूल्य नहीं चुकाया।
A अब B पर मुकदमा करना चाहता है।
C A से कहता है कि आप B पर एक वर्ष तक मुकदमा मत कीजिए। यदि B भुगतान नहीं करेगा तो मैं भुगतान कर दूँगा। A एक वर्ष तक मुकदमा न करने के लिए तैयार हो जाता है। यहाँ A द्वारा एक वर्ष तक मुकदमा न करना (forbearance) B के लिए लाभ है। इसलिए यह C के जमानती वचन का पर्याप्त प्रतिफल है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यहाँ भी C को कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं मिला। फिर भी जमानत वैध है।
तीसरा उदाहरण - वास्तविक बिना प्रतिफल की जमानत का उदाहरण - A ने B को माल बेच दिया और B पर पैसा बकाया है। इसके बाद C बिना किसी प्रतिफल के कहता है यदि B पैसा नहीं देगा तो मैं उसका पैसा चुका दूँगा। लेकिन A ने इसके बदले B को कोई नया ऋण नहीं दिया, कोई नया माल नहीं दिया, मुकदमा रोकने का वचन नहीं दिया और B के लाभ के लिए कोई नया कार्य नहीं किया। ऐसी स्थिति में C का जमानती वचन शून्य होगा, क्योंकि उसके वचन के लिए धारा 127 के अर्थ में प्रतिफल मौजूद नहीं है। धारा 127 का स्वयं का Illustration (c) यही परिणाम बताता है। 
महत्वपूर्ण अंतर - 
जमानत - जमानतदार को व्यक्तिगत लाभ नहीं मिला फिर भी वैध हो सकती है
मुख्य ऋणी को लाभ मिला जमानत के लिए पर्याप्त प्रतिफल हो सकता है
लेनदार ने मुख्य ऋणी को नया ऋण दिया पर्याप्त प्रतिफल - लेनदार ने मुख्य ऋणी को उधार पर माल दिया पर्याप्त प्रतिफल
लेनदार ने ऋण की वसूली कुछ समय के लिए रोक दी पर्याप्त प्रतिफल जमानतदार।ने बाद में बिना किसी प्रतिफल के पुराने ऋण की जमानत दी जमानत शून्य हो सकती है
बिना प्रतिफल जमानत और जमानतदार को प्रतिफल न मिलना एक बात नहीं है - 
I. जमानतदार को प्रतिफल नहीं मिला - इसका अर्थ यह नहीं कि जमानत अवैध है। क्योंकि मुख्य ऋणी के लाभ के लिए किया गया कार्य या वचन जमानतदार के लिए पर्याप्त प्रतिफल हो सकता है।
II. जमानत के पीछे कोई प्रतिफल ही नहीं है - यदि मुख्य ऋणी के लाभ के लिए कोई कार्य या वचन नहीं किया गया और जमानतदार ने केवल पुराने ऋण के लिए बिना किसी प्रतिफल के जमानत दी, तो धारा 127 के अनुसार वह जमानत शून्य हो सकती है। 
जमानत में प्रतिफल की विशेषता - जमानत की संविदा में प्रतिफल की व्यवस्था को इस प्रकार समझ सकते हैं कि - सामान्य संविदा -  वचन → प्रतिफल → वचनदाता के लिए संविदात्मक आधार
जमानत की संविदा -  लेनदार का कार्य/वचन → मुख्य ऋणी का लाभ → जमानतदार के वचन का पर्याप्त प्रतिफल
इसलिए जमानतदार और लेनदार के बीच प्रत्यक्ष प्रतिफल का होना आवश्यक नहीं है।
क्या प्रतिफल जमानतदार की इच्छा पर होना चाहिए - नहीं। धारा 127 की भाषा से यह स्पष्ट है कि मुख्य ऋणी के लाभ के लिए किया गया कार्य या वचन जमानतदार के लिए पर्याप्त प्रतिफल हो सकता है। अर्थात् यह आवश्यक नहीं कि लेनदार ने मुख्य ऋणी के लिए कार्य केवल जमानतदार के कहने पर किया हो। मुख्य बात यह है कि जमानत के संदर्भ में मुख्य ऋणी के लाभ के लिए कोई पर्याप्त कार्य या वचन मौजूद हो।
पूर्व कार्य (Past Act) भी महत्वपूर्ण हो सकता है - धारा 127 में anything done शब्दों का प्रयोग किया गया है। इसलिए केवल भविष्य में किया जाने वाला कार्य ही नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार पहले किया गया कार्य भी जमानत के प्रतिफल के रूप में प्रासंगिक हो सकता है। ICSI की अध्ययन सामग्री भी इसी आधार पर बताती है कि मुख्य ऋणी के लाभ के लिए किया गया कार्य जमानतदार के लिए पर्याप्त प्रतिफल हो सकता है। 
हालाँकि परीक्षा में उत्तर लिखते समय धारा 127 की वैधानिक भाषा और उसके तीन Illustrations को प्राथमिक आधार बनाना सबसे सुरक्षित तरीका है।
जमानत में प्रतिफल के संबंध में मुख्य सिद्धांत - 
सिद्धांत 1 - जमानत एक संविदा है, इसलिए प्रतिफल का होना आवश्यक है।
सिद्धांत 2 - लेकिन जमानतदार को स्वयं प्रतिफल मिलना आवश्यक नहीं है।
सिद्धांत 3 - मुख्य ऋणी के लाभ के लिए किया गया कार्य या किया गया वचन जमानतदार के वचन का पर्याप्त प्रतिफल हो सकता है।
सिद्धांत 4 - यदि जमानतदार केवल पुराने ऋण के भुगतान की जिम्मेदारी लेता है और उसके वचन के बदले कोई प्रतिफल नहीं है, तो जमानत शून्य हो सकती है।
सिद्धांत 5 - इसलिए जमानतदार को प्रतिफल नहीं मिला और जमानत के लिए प्रतिफल नहीं था, दोनों अलग-अलग बातें हैं।
निष्कर्ष - भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 127 जमानत की संविदा में प्रतिफल के संबंध में विशेष नियम निर्धारित करती है। जमानतदार को व्यक्तिगत रूप से कोई लाभ प्राप्त होना आवश्यक नहीं है। मुख्य ऋणी के लाभ के लिए लेनदार द्वारा किया गया कोई कार्य या किया गया कोई वचन जमानतदार के वचन के लिए पर्याप्त प्रतिफल हो सकता है। उदाहरणतः मुख्य ऋणी को ऋण देना, उधार पर माल देना अथवा उसके विरुद्ध मुकदमा कुछ समय के लिए रोकना जमानत के लिए पर्याप्त प्रतिफल हो सकता है। इसके विपरीत, यदि जमानतदार बिना किसी प्रतिफल के केवल पहले से विद्यमान ऋण का भुगतान करने का वचन देता है, तो धारा 127 के Illustration (c) के अनुसार ऐसा समझौता शून्य होगा।
एक लाइन में - जमानत में प्रतिफल जमानतदार की जेब में आना जरूरी नहीं, मुख्य ऋणी के लाभ में दिखाई देना पर्याप्त हो सकता है और धारा 127 का मूल मंत्र है Benefit to Principal Debtor = Sufficient Consideration for Surety.

जमानत की संविदा का समापन
गिरवी/प्लेज का अर्थ एवं परिभाषा
अनधिकृत व्यक्ति द्वारा गिरवी रखना - 
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 के अनुसार जमानत की संविदा का अर्थ है जब कोई व्यक्ति किसी तीसरे व्यक्ति के ऋण या दायित्व को पूरा करने का वचन देता है और तीसरा व्यक्ति अपने दायित्व को पूरा करने में असफल होने पर वह वचन देने वाला व्यक्ति दायित्व पूरा करता है, तो इसे जमानत की संविदा (Contract of Guarantee) कहते हैं।
इसमें तीन पक्ष होते हैं - 
1. लेनदार (Creditor)
2. देनदार (Principal Debtor)
3. जमानतदार/प्रत्याभूतिदाता (Surety)
उदाहरण - A ने B से ₹1,00,000 उधार लिए। C ने B से कहा कि यदि A ऋण नहीं चुकाएगा तो C भुगतान करेगा। यहाँ:
A = मुख्य देनदार, B = लेनदार, C = जमानतदार
जमानतदार कब मुक्त होता है? - जमानतदार का दायित्व स्थायी नहीं होता। कुछ परिस्थितियों में उसकी जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है।
(A) जमानतदार द्वारा निरस्तीकरण - धारा 130 के अनुसार, यदि जमानत निरंतर जमानत (Continuing Guarantee) है, तो जमानतदार लेनदार को सूचना देकर भविष्य के लेन-देन के संबंध में अपनी जमानत वापस ले सकता है।
उदाहरण: - C ने B से कहा कि वह A के ₹10,000 तक के लगातार होने वाले ऋणों की जमानत देता है। बाद में C लिखित सूचना देकर कहता है कि अब से वह भविष्य के लेन-देन के लिए जमानतदार नहीं रहेगा। पुराने लेन-देन प्रभावित नहीं होंगे, लेकिन भविष्य के लेन-देन के लिए C मुक्त हो जाएगा।
(B) जमानतदार की मृत्यु - धारा 131 के अनुसार, जमानतदार की मृत्यु होने पर सामान्यतः निरंतर जमानत भविष्य के लेन-देन के लिए समाप्त हो जाती है, जब तक संविदा में इसके विपरीत व्यवस्था न हो।महत्वपूर्ण बात: मृत्यु से पहले उत्पन्न दायित्व समाप्त नहीं होता।
(C) संविदा की शर्तों में परिवर्तन - धारा 133 के अनुसार, यदि लेनदार और मुख्य देनदार जमानतदार की सहमति के बिना मूल संविदा की शर्तों में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन करते हैं, तो जमानतदार भविष्य के लेन-देन के संबंध में मुक्त हो जाता है।
उदाहरण - A ने B से ₹50,000 ऋण लिया और C जमानतदार बना। बाद में B और A ने C की सहमति के बिना ऋण की महत्वपूर्ण शर्त बदल दी। ऐसी स्थिति में C की जमानत समाप्त हो सकती है।
(D) मुख्य देनदार की मुक्ति - धारा 134 के अनुसार, यदि लेनदार और मुख्य देनदार के बीच ऐसी संविदा हो जाती है जिससे मुख्य देनदार मुक्त हो जाता है, तो जमानतदार भी मुक्त हो जाता है।
(E) लेनदार द्वारा मुख्य देनदार को मुक्त करना - यदि लेनदार मुख्य देनदार को उसके दायित्व से मुक्त कर देता है, तो जमानतदार का दायित्व भी समाप्त हो जाता है।
(F) लेनदार द्वारा मुख्य देनदार को समय देना - धारा 135 के अनुसार, यदि लेनदार मुख्य देनदार के साथ ऐसी व्यवस्था करता है जिसमें उसे समय दिया जाता है या उसके विरुद्ध कार्यवाही न करने का समझौता किया जाता है, तो कुछ परिस्थितियों में जमानतदार मुक्त हो सकता है। लेकिन केवल इतना कि लेनदार ने कुछ समय के लिए मुकदमा नहीं किया, हर स्थिति में जमानतदार को मुक्त नहीं करता।
(G) लेनदार का कार्य या चूक जिससे जमानतदार का उपचार प्रभावित हो - धारा 139 के अनुसार, यदि लेनदार कोई ऐसा कार्य करता है या ऐसी चूक करता है जिससे जमानतदार के पास मुख्य देनदार के विरुद्ध उपलब्ध उपाय कम हो जाते हैं, तो जमानतदार मुक्त हो सकता है।
उदाहरण - A का ऋण C ने गारंटी किया है। B के पास A की कुछ प्रतिभूतियाँ हैं। B उन प्रतिभूतियों को लापरवाही से नष्ट कर देता है। इससे C के अधिकार प्रभावित होते हैं। ऐसी स्थिति में C अपने दायित्व से मुक्त हो सकता है, उस सीमा तक जिस तक उसका संरक्षण प्रभावित हुआ है।
(H) लेनदार द्वारा प्रतिभूति खो देना - धारा 141 के अनुसार, जमानतदार उस प्रतिभूति का लाभ पाने का अधिकारी है जो लेनदार के पास मुख्य देनदार के विरुद्ध है। यदि लेनदार उस प्रतिभूति को खो देता है या जमानतदार की सहमति के बिना उसे छोड़ देता है, तो जमानतदार उस प्रतिभूति के मूल्य की सीमा तक मुक्त हो जाता है।
सार - जमानतदार की मुक्ति के प्रमुख आधार निरंतर जमानत का निरस्तीकरण, जमानतदार की मृत्यु, संविदा की शर्तों में बिना सहमति परिवर्तन, मुख्य देनदार की मुक्ति, लेनदार द्वारा मुख्य देनदार को मुक्त करना, मुख्य देनदार को समय देने संबंधी कुछ व्यवस्थाएँ,  लेनदार की ऐसी चूक जिससे जमानतदार के अधिकार प्रभावित हों, प्रतिभूति का खो जाना या छोड़ देना
गिरवी/प्लेज का अर्थ एवं परिभाषा - गिरवी (Pledge) वस्तुओं के संबंध में Bailment का एक विशेष रूप है। जब कोई व्यक्ति अपने माल/चल वस्तुओं का कब्जा किसी दूसरे व्यक्ति को इस उद्देश्य से देता है कि वह माल ऋण के भुगतान या किसी वचन के पालन की सुरक्षा के रूप में रखा जाए, तो इसे गिरवी कहते हैं।
1. गिरवी रखने वाला = Pawnor (गिरवीकर्ता)
2. गिरवी प्राप्त करने वाला = Pawnee (गिरवीदार)
धारा 172 की परिभाषा के अनुसार किसी ऋण के भुगतान या किसी वचन के पालन की प्रतिभूति के रूप में माल का निक्षेप (bailment) ही pledge कहलाता है।अर्थात Pledge = Goods का Bailment + Debt/Promise की Security
उदाहरण - A ने B से ₹50,000 ऋण लिया और अपनी सोने की घड़ी B के पास सुरक्षा के रूप में रख दी। यहाँ 
A = Pawnor
B = Pawnee
घड़ी = Pledged Goods
Secured Debt = ₹50,000
यदि A ऋण चुका देता है तो B को घड़ी वापस करनी होगी।
गिरवी की विशेषताएँ - 
1. माल का होना आवश्यक है - गिरवी केवल Goods के संबंध में होती है।
2. कब्जे का हस्तांतरण - गिरवी में माल का कब्जा गिरवीदार को दिया जाता है। यह वास्तविक कब्जा या परिस्थितियों के अनुसार रचनात्मक कब्जा हो सकता है।
3. सुरक्षा के उद्देश्य से - गिरवी का उद्देश्य किसी ऋण के भुगतान, या वचन के पालन की सुरक्षा करना होता है।
4. स्वामित्व का पूर्ण हस्तांतरण नहीं - गिरवी में माल का स्वामित्व गिरवीदार को नहीं मिलता, बल्कि उसका कब्जा सुरक्षा के रूप में दिया जाता है।
5. ऋण/दायित्व की पूर्ति पर वापसी - ऋण या सुरक्षित दायित्व पूरा होने पर गिरवीदार को वस्तु वापस करनी होती है।
6. गिरवीदार को विशेष अधिकार - गिरवीदार को कुछ परिस्थितियों में माल अपने पास रखने और कानून के अनुसार उसका विक्रय करने का अधिकार भी मिल सकता है।
अनधिकृत व्यक्ति द्वारा गिरवी रखना - (Pledge by Non-Owner) सामान्य नियम यह है कि जिस व्यक्ति के पास वस्तु का स्वामित्व नहीं है, वह उस वस्तु का वैध गिरवी नहीं कर सकता, क्योंकि कोई व्यक्ति दूसरे से बेहतर title हस्तांतरित नहीं कर सकता। इसे सिद्धांत रूप में कहा जाता है - Nemo dat quod non habet अर्थात् जिसके पास अधिकार नहीं है, वह उससे अधिक अधिकार दूसरे को नहीं दे सकता।लेकिन भारतीय संविदा अधिनियम में इस सामान्य नियम के कुछ महत्वपूर्ण अपवाद हैं।
मर्केंटाइल एजेंट द्वारा गिरवी - धारा 178 यदि कोई Mercantile Agent अपने कब्जे में माल या उसके title documents रखता है और वह माल के स्वामी की सहमति से उस स्थिति में है कि वह माल का विक्रय कर सकता है, तो उसके द्वारा किया गया pledge कुछ शर्तों के अधीन वैध हो सकता है।
इस हेतु आवश्यक शर्तें - 
1. व्यक्ति Mercantile Agent होना चाहिए।
2. उसके पास माल या उसके title documents का वैध कब्जा होना चाहिए।
3. कब्जा स्वामी की सहमति से मिला होना चाहिए।
4. वह सामान्य व्यापारिक कार्य के दौरान pledge करे।
5. Pawnee को सद्भावना में कार्य करना चाहिए।
6. Pawnee को यह जानकारी नहीं होनी चाहिए कि pledge करने वाले के पास अधिकार नहीं है।
उदाहरण - A ने अपने माल का कब्जा एक मर्केंटाइल एजेंट B को बेचने के लिए दिया। B ने व्यापार के सामान्य क्रम में वह माल C के पास गिरवी रख दिया। यदि C ने सद्भावना से और B के अधिकार की कमी की जानकारी के बिना माल स्वीकार किया है, तो धारा 178 के अंतर्गत pledge वैध हो सकता है।
वैध कब्जे वाला व्यक्ति द्वारा गिरवी - धारा 178A यदि किसी व्यक्ति ने माल को voidable contract के अंतर्गत प्राप्त किया है, लेकिन वह contract अभी तक rescind नहीं किया गया है, और वह व्यक्ति माल को गिरवी रख देता है, तो कुछ शर्तों के अधीन pledge वैध हो सकता है।
इस हेतु आवश्यक शर्तें - 
1. माल कब्जे में लेने वाला व्यक्ति उसे voidable contract के अंतर्गत प्राप्त करता है।
2. वह contract अभी तक rescind नहीं हुआ है।
3. Pawnee सद्भावना से कार्य करता है।
4. Pawnee को pledge करने वाले के title में defect की जानकारी नहीं है।
उदाहरण - A ने धोखे से B से कोई वस्तु प्राप्त की। B ने अभी तक उस संविदा को rescind नहीं किया था। A ने वस्तु C के पास गिरवी रख दी। यदि C ने सद्भावना से और धोखे की जानकारी के बिना वस्तु स्वीकार की, तो धारा 178A के अंतर्गत C के हित सुरक्षित हो सकते हैं।
विक्रेता द्वारा कब्जा बनाए रखने की स्थिति - धारा 30(1), Sale of Goods Act, 1930 यदि कोई व्यक्ति माल बेच देता है लेकिन माल का कब्जा उसके पास ही रहता है और बाद में वह उसी माल को किसी तीसरे व्यक्ति को गिरवी रख देता है, तो कुछ शर्तों के अधीन बाद के pledge को संरक्षण मिल सकता है।
इस हेतु मुख्य शर्त - Pawnee को सद्भावना में कार्य करना चाहिए और उसे पूर्व बिक्री की जानकारी नहीं होनी चाहिए।
खरीददार द्वारा कब्जा प्राप्त करने के बाद गिरवी - धारा 30(2), Sale of Goods Act, 1930 यदि किसी व्यक्ति ने माल खरीद लिया है या खरीदने का समझौता किया है और स्वामी की सहमति से माल का कब्जा प्राप्त कर लिया है, फिर वह व्यक्ति उस माल को किसी अन्य व्यक्ति के पास pledge करता है, तो कुछ परिस्थितियों में Pawnee का अधिकार सुरक्षित हो सकता है।
इसके लिए Pawnee का - सद्भावना में कार्य करना, और पूर्व विक्रेता के lien या अन्य अधिकार की जानकारी न होना जरूरी है।
सह-स्वामी द्वारा गिरवी - यदि कई व्यक्तियों के पास किसी माल का संयुक्त स्वामित्व है और उनमें से एक व्यक्ति अन्य सह-स्वामियों की सहमति से माल का एकमात्र कब्जा प्राप्त कर लेता है, तो कुछ परिस्थितियों में उसके द्वारा किया गया pledge वैध हो सकता है। यह भी इस बात पर निर्भर करेगा कि Pawnee ने सद्भावना से कार्य किया या नहीं।
Pawnor के अधिकार और Pawnee के अधिकार का संबंध - 
1. ऋण चुकाकर माल वापस लेने का अधिकार।
2. Redemption का अधिकार।
3. माल की वृद्धि/प्राकृतिक उपज का लाभ, जहाँ लागू हो।
4. गिरवीदार द्वारा अनुचित व्यवहार किए जाने पर कानूनी उपचार।
Pawnee के प्रमुख अधिकार - 
1. माल को अपने पास रखने का अधिकार।
2. ऋण और आवश्यक खर्चों के लिए security बनाए रखने का अधिकार।
3. कुछ परिस्थितियों में आगे के advances के लिए माल रोकने का अधिकार।
4. Pawnor के default पर कानून के अनुसार माल बेचने का अधिकार।
5. कमी होने पर Pawnor से शेष राशि की मांग करना।
11. Bailment (जमानत) Pledge (गिरवी) और में अंतर - 
आधार - Bailment - Pledge
अर्थ - किसी उद्देश्य से वस्तु का कब्जा देना - ऋण/वचन की सुरक्षा के लिए वस्तु का कब्जा देना
उद्देश्य - विभिन्न उद्देश्य हो सकते हैं - Security।
पक्ष - Bailor और Bailee - Pawnor और Pawnee।
बिक्री का अधिकार - नहीं Default पर कानून के अनुसार है।
स्वामित्व हस्तांतरित - नहीं - नहीं।
उदाहरण मरम्मत के लिए घड़ी देना ऋण के बदले घड़ी गिरवी रखना।
निष्कर्ष - अनधिकृत व्यक्ति द्वारा गिरवी का मूल सिद्धांत यह है कि गैर-स्वामी सामान्यतः वैध title नहीं दे सकता, लेकिन कानून ने व्यापारिक व्यवहार और bona fide third parties की सुरक्षा के लिए कुछ अपवाद बनाए हैं।
सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान - 
धारा 172 → Pledge की परिभाषा
धारा 173 → Pawnee का lien
धारा 174 → आगे के advances के लिए retention
धारा 175 → extraordinary expenses
धारा 176 → Pawnor के default पर अधिकार
धारा 177 → Pawnor का redemption का अधिकार
धारा 178 → Mercantile Agent द्वारा pledge
धारा 178A → Voidable contract के अंतर्गत कब्जा पाने वाले द्वारा pledge
Sale of Goods Act, धारा 30 → Seller/Buyer in possession द्वारा बाद का disposition
एक पंक्ति में याद रखें योग्य - Pledge में वस्तु सुरक्षा के लिए जाती है, ownership नहीं; और Non-owner का pledge सामान्यतः अमान्य है, लेकिन कानून bona fide Pawnee की सुरक्षा के लिए विशेष अपवाद प्रदान करता है।

अभिकरण की संविदा (Contract of Agency) - 
अभिकरण का अर्थ एवं परिभाषा
अभिकरण के प्रकार, सृजन की विधियाँ,  अभिकरण में निम्नलिखित पक्षों के बीच संबंध, प्रधान (Principal) एवं अभिकर्ता (Agent) के बीच संबंध, प्रधान एवं तृतीय पक्ष के बीच संबंध, अभिकर्ता एवं तृतीय पक्ष के बीच संबंधअभिकर्ता के प्राधिकार का निर्धारण 
1. पक्षकारों के कार्य द्वारा
2. विधि के संचालन द्वारा
2.5 अपरिवर्तनीय प्राधिकार/अभिकरण
(Irrevocable Authority) - 
अभिकरण की संविदा (Contract of Agency) - 
अभिकरण का अर्थ एवं परिभाषा - Agency का अर्थ है किसी व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति की ओर से कार्य करना।अभिकरण में तीन व्यक्ति होते हैं - 
1. प्रधान (Principal) – जिसके लिए कार्य किया जाता है।
2. अभिकर्ता (Agent) – जो प्रधान की ओर से कार्य करता है।
3. तृतीय पक्ष (Third Party) – जिसके साथ अभिकर्ता प्रधान की ओर से व्यवहार करता है।
उदाहरण - A ने B को अपनी ओर से C से ₹5 लाख में मशीन खरीदने के लिए अधिकृत किया। यहाँ A = प्रधान, B = अभिकर्ता और C = तृतीय पक्ष है। यदि B ने A के अधिकार के भीतर C से मशीन खरीद ली, तो ऐसा लेन-देन A और C के बीच कानूनी संबंध उत्पन्न करेगा।
वैधानिक परिभाषा - भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 182 के अनुसार वह व्यक्ति जो किसी अन्य के लिए कोई कार्य करने या तीसरे व्यक्तियों के साथ व्यवहार में उसका प्रतिनिधित्व करने के लिए नियोजित किया जाता है, अभिकर्ता (Agent) कहलाता है और जिसके लिए ऐसा कार्य किया जाता है, वह प्रधान (Principal) कहलाता है। इस प्रकार Agency का मूल आधार है प्रतिनिधित्व (Representation) है।
अभिकरण की मुख्य विशेषताएँ - 
(i) प्रधान और अभिकर्ता का संबंध - 
अभिकरण में एक व्यक्ति दूसरे को अपनी ओर से कार्य करने का अधिकार देता है।
(ii) प्रतिनिधित्व - अभिकर्ता प्रधान का प्रतिनिधित्व करता है।
(iii) तृतीय पक्ष से संबंध - अभिकर्ता द्वारा अपने प्राधिकार के अंतर्गत किया गया कार्य प्रधान और तृतीय पक्ष के बीच कानूनी संबंध उत्पन्न कर सकता है।
(iv) विश्वास का संबंध - Agency एक fiduciary relationship है। Agent को प्रधान के हित में ईमानदारी और निष्ठा से कार्य करना चाहिए।
(v) प्रतिफल आवश्यक नहीं - धारा 185 के अनुसार अभिकरण के सृजन के लिए consideration आवश्यक नहीं है।
अभिकरण के प्रकार - Agency को विभिन्न आधारों पर वर्गीकृत किया जा सकता है।
1. स्पष्ट अभिकरण (Express Agency) - जब अभिकरण का अधिकार स्पष्ट शब्दों में दिया जाता है, तो उसे Express Agency कहते हैं। यह मौखिक या लिखित दोनों हो सकता है।
उदाहरण - A लिखित रूप से B को अपनी जमीन बेचने का अधिकार देता है।
यह स्पष्ट अभिकरण है।
2. निहित अभिकरण (Implied Agency) - जब परिस्थितियों, पक्षकारों के आचरण या व्यवहार से अभिकरण का अस्तित्व समझ में आता है, तो इसे Implied Agency कहते हैं।
उदाहरण - किसी दुकान का प्रबंधक नियमित रूप से मालिक की ओर से माल खरीदता है। मालिक लगातार उसके कार्यों को स्वीकार करता रहा है। परिस्थितियों से उसका प्राधिकार निहित माना जा सकता है।
3. आवश्यकता द्वारा अभिकरण।(Agency by Necessity) - कुछ असाधारण परिस्थितियों में बिना पूर्व अनुमति के किसी दूसरे के हित की रक्षा के लिए कार्य करना आवश्यक हो जाए, तो कानून आवश्यकता के आधार पर अभिकरण को मान्यता दे सकता है।
उदाहरण - वाहक के पास माल खराब होने वाला है और मालिक से संपर्क संभव नहीं है। माल को बचाने के लिए उसे बेचने की वास्तविक आवश्यकता उत्पन्न हो सकती है।
4. प्रतिषेध/Estoppel द्वारा अभिकरण - यदि प्रधान अपने व्यवहार से तृतीय पक्ष को यह विश्वास दिलाता है कि कोई व्यक्ति उसका Agent है और तृतीय पक्ष उस विश्वास पर कार्य करता है, तो बाद में प्रधान उस व्यक्ति के अभिकर्ता होने से सामान्यतः इनकार नहीं कर सकता।
5. अनुमोदन द्वारा अभिकरण (Agency by Ratification) - यदि कोई व्यक्ति बिना अधिकार के दूसरे की ओर से कार्य करता है और बाद में प्रधान उस कार्य को स्वीकार/अनुमोदित कर देता है, तो वह कार्य प्रधान द्वारा किया हुआ माना जा सकता है। इसे Ratification कहते हैं।
6. कानून द्वारा अभिकरण (Agency by Operation of Law) - कुछ परिस्थितियों में कानून स्वयं अभिकरण का संबंध उत्पन्न करता है।
उदाहरण - साझेदारी में प्रत्येक Partner फर्म और अन्य साझेदारों का Agent माना जाता है, जहाँ कानून ऐसा प्रावधान करता है।
अभिकरण के सृजन की विधियाँ - अभिकरण निम्नलिखित तरीकों से उत्पन्न हो सकता है - 
1. स्पष्ट नियुक्ति द्वारा - प्रधान स्पष्ट रूप से Agent नियुक्त करता है। धारा 186
अभिकरण स्पष्ट या निहित रूप से बनाया जा सकता है।
2. निहित नियुक्ति द्वारा - पक्षकारों के आचरण, परिस्थितियों और व्यवहार से अभिकरण का अनुमान लगाया जाता है।
3. आवश्यकता द्वारा - असाधारण परिस्थितियों में दूसरे के हित की रक्षा के लिए तत्काल कार्य करना आवश्यक हो।
4. Estoppel द्वारा - प्रधान के आचरण के कारण तीसरा व्यक्ति किसी व्यक्ति को उसका Agent मानकर कार्य करता है।
5. Ratification द्वारा - बिना अधिकार किए गए कार्य को प्रधान बाद में स्वीकार कर ले।
6. कानून के संचालन द्वारा - किसी विशेष कानूनी संबंध के कारण Agency स्वतः उत्पन्न हो सकती है।
7. Holding Out द्वारा - यदि प्रधान किसी व्यक्ति को लगातार अपने Agent के रूप में प्रस्तुत होने देता है और तृतीय पक्ष उस प्रस्तुतीकरण पर विश्वास करके व्यवहार करता है, तो Principal कुछ परिस्थितियों में उस कार्य से बंध सकता है।
अभिकरण में पक्षकारों के बीच संबंध - 
प्रधान एवं अभिकर्ता के बीच संबंध - Principal और Agent के बीच विश्वास, प्रतिनिधित्व और fiduciary obligation का संबंध होता है।
Agent के प्रमुख कर्तव्य - 
(क) प्रधान के निर्देशों का पालन - धारा 211 के अनुसार Agent को Principal के निर्देशों के अनुसार कार्य करना चाहिए,  यदि कोई निर्देश नहीं है, तो उसे उस प्रकार कार्य करना चाहिए जैसा समान परिस्थितियों में व्यवसाय में किया जाता है।
(ख) उचित कौशल और परिश्रम - Agent को अपने कार्य में उचित कौशल और diligence का प्रयोग करना चाहिए।
(ग) लेखा प्रस्तुत करना - Agent को Principal को उचित accounts देना चाहिए।
(घ) कठिनाई की स्थिति में संपर्क - जब कठिन परिस्थिति उत्पन्न हो और प्रधान से संपर्क संभव हो, तो Agent को उचित रूप से उसके निर्देश लेने चाहिए।
(ङ) हितों के टकराव से बचना - Agent को Principal के हित के विरुद्ध स्वयं लाभ प्राप्त नहीं करना चाहिए।
(च) गुप्त लाभ न लेना - Agent Principal की जानकारी और सहमति के बिना secret profit नहीं ले सकता।
(छ) Principal की संपत्ति की रक्षा - Agent को Principal के माल और संपत्ति की उचित देखभाल करनी चाहिए।
Agent के अधिकार - 
1. पारिश्रमिक प्राप्त करने का अधिकार
2. Lien का अधिकार
3. Indemnity का अधिकार
4. Compensation प्राप्त करने का अधिकार
5. कुछ परिस्थितियों में transmission/ retention से संबंधित अधिकार।
प्रधान एवं तृतीय पक्ष के बीच संबंध - 
Agent द्वारा अपने प्राधिकार के भीतर किया गया कार्य Principal को उसी प्रकार बाध्य कर सकता है जैसे Principal ने स्वयं कार्य किया हो।
उदाहरण - A ने B को अपनी ओर से C से ₹1 लाख तक माल खरीदने का अधिकार दिया। B ने C से ₹80,000 का माल खरीदा। यह लेन-देन सामान्यतः A और C के बीच कानूनी संबंध पैदा करेगा।
Agent के अधिकार की सीमा - यदि Agent अपने अधिकार की सीमा के भीतर कार्य करता है, Principal उस कार्य से बंधता है। लेकिन यदि Agent प्राधिकार से बाहर चला जाता है, तो स्थिति धारा 227 और 228 के अनुसार निर्धारित होगी। 
जब Agent अधिकार से बाहर जाता है - यदि Agent का अधिकृत और अनधिकृत भाग अलग-अलग किया जा सकता है, तो Principal केवल अधिकृत भाग से बंध सकता है। यदि दोनों भाग अलग नहीं किए जा सकते, तो Principal पूरे लेन-देन को स्वीकार करने या अस्वीकार करने की स्थिति में हो सकता है।
अभिकर्ता एवं तृतीय पक्ष के बीच संबंध - सामान्य नियम यह है कि Agent Principal का प्रतिनिधि होता है। इसलिए
Principal ↔ Third Party के बीच संबंध उत्पन्न होता है, न कि Agent ↔ Third Party के बीच व्यक्तिगत संविदात्मक दायित्व। लेकिन इसके कई अपवाद हैं। 
Agent का व्यक्तिगत उत्तरदायी होना -
(i) Principal का अस्तित्व अज्ञात हो
(ii) Agent ने स्वयं व्यक्तिगत दायित्व स्वीकार किया हो
(iii) Principal विदेश में रहता हो
(iv) व्यापारिक प्रथा के अनुसार Agent व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी हो
(v) Agent ने अपने अधिकार से बाहर जाकर कार्य किया हो
(vi) Agent ने धोखाधड़ी या गलत प्रस्तुतीकरण किया हो
अभिकर्ता के प्राधिकार का निर्धारण - 
 Agent का Authority वह कानूनी शक्ति है जिसके आधार पर वह Principal की ओर से कार्य करता है। Authority दो तरीकों से निर्धारित होती है - 
पक्षकारों के कार्य द्वारा - इसे Actual Authority कहा जाता है। 
Actual Authority दो प्रकार की होती है - 
(क) Express Authority - जब Principal स्पष्ट रूप से Agent को अधिकार देता है।
उदाहरण - A ने B को अपनी कार ₹5 लाख से कम में न बेचने का निर्देश दिया।
B को कार बेचने का Express Authority है।
(ख) Implied Authority - जो अधिकार स्पष्ट रूप से नहीं दिया गया है, लेकिन मुख्य कार्य को पूरा करने के लिए आवश्यक या सामान्य रूप से उससे जुड़ा हुआ है।
उदाहरण - A ने B को अपने होटल का Manager नियुक्त किया। होटल के सामान्य संचालन के लिए आवश्यक सामान खरीदना B के implied authority में आ सकता है। धारा 187।जब Agency का authority शब्दों में दिया जाता है तो वह express है और परिस्थितियों या आचरण से अनुमानित होता है तो implied है।
विधि के संचालन द्वारा - कभी-कभी Agent की Authority केवल Principal के निर्देशों से नहीं बल्कि कानून से निर्धारित होती है। इसे Authority by operation of law कहा जा सकता है। इसमें विशेष रूप से निम्न सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं - 
(क) Apparent/Ostensible Authority - जब Principal के व्यवहार से तृतीय पक्ष को यह उचित विश्वास हो कि Agent के पास कोई अधिकार है, तो Principal उस apparent authority से बंध सकता है।
(ख) Agency by Necessity - आवश्यकता की परिस्थितियों में कानून Agent को सीमित अधिकार प्रदान कर सकता है।
(ग) Agency by Ratification - Principal बाद में बिना अधिकार किए गए कार्य को स्वीकार कर ले तो वह कार्य प्रभावी हो सकता है।
अपरिवर्तनीय प्राधिकार/अभिकरण। (Irrevocable Authority / Irrevocable Agency) - यह इस पूरे विषय का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है।सामान्य नियम है कि Principal अपने Agent का authority समाप्त या revoke कर सकता है। लेकिन कुछ परिस्थितियों में Principal का यह अधिकार सीमित हो जाता है। ऐसे अभिकरण को Irrevocable Agency कहा जाता है।
 वैधानिक आधार - भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 202 इस विषय का मुख्य प्रावधान है। धारा 202 का मूल सिद्धांत है, - जहाँ Agent का स्वयं उस विषय-वस्तु में हित है जो Agency का विषय है, वहाँ उस हित को प्रभावित किए बिना Agency को समाप्त नहीं किया जा सकता। अर्थात यदि Agent का interest in the subject-matter है, तो Principal केवल अपनी इच्छा से Agency समाप्त करके Agent के हित को नष्ट नहीं कर सकता।
अपरिवर्तनीय अभिकरण के आवश्यक तत्व - 
(1) वैध Agency होनी चाहिए - पहले Principal और Agent के बीच Agency का संबंध होना चाहिए।
(2) Agent का subject-matter में हित होना चाहिए - सिर्फ Agent को commission मिलना या remuneration मिलना पर्याप्त नहीं है।Agent का ऐसा हित (interest) होना चाहिए जो Agency के विषय-वस्तु से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हो।
(3) Agency उस हित की सुरक्षा के लिए हो - Agency ऐसी होनी चाहिए जिसका उद्देश्य Agent के हित की रक्षा या उसे प्रभावी बनाना हो।
(4) Principal unilateral revocation नहीं कर सकता - Principal ऐसा कदम नहीं उठा सकता जिससे Agent का मौजूदा हित समाप्त हो जाए।
उदाहरण - A ने B से ₹10 लाख उधार लिए और B को यह अधिकार दिया कि A की एक विशेष संपत्ति बेचकर B अपने ₹10 लाख वसूल कर सकता है। यहाँ B का संपत्ति और बिक्री से संबंधित हित है।यदि A बाद में केवल अपनी इच्छा से B का authority समाप्त कर दे और B के हित को समाप्त कर दे, तो धारा 202 के सिद्धांत के कारण ऐसी revocation प्रभावी नहीं हो सकती। यही Irrevocable Agency का मूल विचार है।
केवल पारिश्रमिक मिलने से Agency Irrevocable नहीं होती - यदि Agent को केवल commission मिलता है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि Agency irrevocable हो गई।
उदाहरण - A ने B को अपनी जमीन बेचने के लिए नियुक्त किया और B को 5% commission देने का वादा किया। केवल commission मिलने के कारण B का जमीन में proprietary interest पैदा नहीं हो जाता। इसलिए केवल commission के आधार पर Agency को irrevocable नहीं कहा जाएगा।
धारा 202 और धारा 203 में अंतर
आधार - धारा 202 धारा 203
विषय - Agent के हित वाली Agency - सामान्य Agency की revocation
सिद्धांत - Agent के हित को प्रभावित करके Agency समाप्त नहीं की जा सकती - Principal कुछ परिस्थितियों में authority revoke कर सकता है
Agent का interest - आवश्यक - आवश्यक नहीं
स्वरूप - Irrevocable - Agency की स्थिति Revocation का सामान्य नियम
धारा 201 से संबंध - धारा 201 Agency के समाप्त होने के तरीके बताती है - 
1. Principal द्वारा authority revoke करना।
2. Agent द्वारा renunciation।
3. कार्य पूरा होना।
4. Principal या Agent की मृत्यु।
5. Principal या Agent का unsound mind होना।
6. Principal का दिवालिया होना, कुछ परिस्थितियों में।
लेकिन यदि धारा 202 लागू होती है, तो Agent के हित को प्रभावित करने वाली revocation पर रोक लग सकती है।
अपरिवर्तनीय Agency और Power of Attorney - दोनों को एक समझना उचित नहीं है। Power of Attorney एक दस्तावेज/अधिकार प्रदान करने का साधन हो सकता है, जबकि Agency Principal-Agent का कानूनी संबंध है।यदि Power of Attorney के पीछे Agent का ऐसा हित है जो Agency के subject-matter में निहित है, तो परिस्थितियों के अनुसार धारा 202 का सिद्धांत लागू हो सकता है।
अपरिवर्तनीय अभिकरण का महत्व - rrevocable Agency का उद्देश्य Agent को उस स्थिति से बचाना है जिसमें Principal पहले Agent को कोई अधिकार देकर उससे संबंधित हित पैदा करे और बाद में केवल उस हित को समाप्त करने के लिए authority वापस ले ले। इसका मूल सिद्धांत है जिस अधिकार में Agent का स्वयं का हित निहित है, Principal उस हित को नष्ट करने के लिए केवल एकतरफा रूप से Agency समाप्त नहीं कर सकता।
सार - 
अभिकरण = Principal + Agent + Third Party
धारा 182 → Agent और Principal की परिभाषा
धारा 185 → Agency बनाने के लिए consideration आवश्यक नहीं
धारा 186 → Agency express या implied हो सकती है
धारा 187 → Express और implied authority
धारा 201 → Agency का termination
धारा 202 → Agent के interest वाली Agency का irrevocable होना
धारा 203 → Principal द्वारा Agent का authority revoke करना
धारा 204 → कुछ परिस्थितियों में revocation पर सीमा
धारा 205 → निर्धारित अवधि से पहले termination पर compensation
धारा 206 → Revocation/renunciation की notice
धारा 207 → Express या implied revocation/renunciation
धारा 208 → Termination कब प्रभावी होती है
एक पंक्ति में - अभिकरण वह संबंध है जिसमें Agent Principal की ओर से कार्य करता है और उसके प्राधिकार के भीतर किए गए कार्यों का कानूनी प्रभाव Principal और Third Party के बीच पड़ता है; लेकिन जहाँ Agent का स्वयं Agency की subject-matter में हित निहित हो, वहाँ धारा 202 के अधीन Agency उस हित को प्रभावित करने की सीमा तक अपरिवर्तनीय हो सकती है।

माल बिक्री एवं बिक्री की संविदा (Contract of Sale of Goods) - 
माल की बिक्री की संविदा (Contract of Sale of Goods) Sale of Goods Act, 1930 का विषय है। 
माल की बिक्री की संविदा का अर्थ - माल की बिक्री की संविदा वह संविदा है जिसमें विक्रेता (Seller) किसी माल (Goods) की संपत्ति (Property in Goods) को खरीदार (Buyer) को किसी मूल्य (Price) के बदले हस्तांतरित करता है या हस्तांतरित करने का वचन देता है।
सरल शब्दों में माल + कीमत + स्वामित्व का हस्तांतरण = माल की बिक्री की संविदा होती है।
उदाहरण - A ने B को ₹50,000 में अपनी मोटरसाइकिल बेचने का समझौता किया। यदि संविदा के अनुसार मोटरसाइकिल का स्वामित्व B को उसी समय मिल जाता है, तो यह Sale है। यदि स्वामित्व भविष्य में किसी निश्चित समय या शर्त पूरी होने पर मिलेगा, तो यह Agreement to Sell हो सकता है।
वैधानिक परिभाषा - माल की बिक्री अधिनियम, 1930 (Sale of Goods Act, 1930) की धारा 4(1) के अनुसार  जब विक्रेता माल में संपत्ति को खरीदार को मूल्य के लिए हस्तांतरित करता है या हस्तांतरित करने के लिए सहमत होता है, तब यह Contract of Sale कहलाता है।इस प्रकार Contract of Sale में दो मुख्य स्थितियां होती हैं - 
(1) Sale (बिक्री)
(2) Agreement to Sell (बिक्री के लिए करार)
Contract of Sale के आवश्यक तत्व।किसी संविदा को माल की बिक्री की संविदा मानने के लिए आवश्यक हैं कि - 
I. दो पक्ष होने चाहिए
II. एक पक्ष Seller (विक्रेता) और दूसरा Buyer (क्रेता) होना चाहिए।
एक ही व्यक्ति स्वयं से माल खरीदने वाला और बेचने वाला नहीं हो सकता।
उदाहरण - A अपनी कार B को बेचता है।
A = Seller, B = Buyer, 
• विषय-वस्तु Goods होनी चाहिए
• संविदा का विषय Goods होना चाहिए - • Goods में चल संपत्ति शामिल होती है, जैसे कार, फर्नीचर, कपड़े, मशीन, अनाजमोबाइल, सोना आदि।
अचल संपत्ति जैसे जमीन और भवन की बिक्री Sale of Goods Act के अंतर्गत नहीं आती।
Price होना चाहिए - माल का हस्तांतरण मूल्य (Price) के बदले होना चाहिए।Price का अर्थ धनराशि है। यदि A अपनी घड़ी के बदले B से मोबाइल लेता है, तो यह Sale नहीं बल्कि Exchange/ Barter होगा, क्योंकि धन के रूप में price नहीं है।
संपत्ति का हस्तांतरण या हस्तांतरण का करार - Contract में माल की Property, अर्थात स्वामित्व, खरीदार को हस्तांतरित होना चाहिए या भविष्य में हस्तांतरित करने का agreement होना चाहिए।
वैध संविदा के आवश्यक तत्व - Contract of Sale भी एक contract है। इसलिए भारतीय संविदा अधिनियम के सामान्य सिद्धांत लागू होते हैं, जैसे:
स्वतंत्र सहमति 
सक्षम पक्षकार
वैध प्रतिफल
वैध उद्देश्य
पक्षकारों की क्षमता आदि।
Sale और Agreement to Sell क्या हैं? - यह Contract of Sale के दो रूप हैं।
Sale अर्थात बिक्री - जब माल में स्वामित्व तुरंत विक्रेता से खरीदार को हस्तांतरित हो जाता है, तो इसे Sale कहते हैं।
उदाहरण - A ने B को अपनी कार ₹5 लाख में बेच दी और संविदा के अनुसार उसी समय कार का स्वामित्व B को मिल गया। यह Sale है।
सूत्र - Ownership अभी Transfer = Sell 
Agreement to Sell अर्थात बिक्री के लिए करार - जब पक्षकार इस बात पर सहमत होते हैं कि स्वामित्व भविष्य में किसी निश्चित समय पर या किसी शर्त के पूरा होने पर हस्तांतरित होगा, तो इसे Agreement to Sell कहते हैं।
उदाहरण - A ने B से कहा कि मैं अपनी कार तुम्हें ₹5 लाख में बेचूंगा, लेकिन कार का स्वामित्व अगले महीने 1 तारीख को तुम्हें मिलेगा। यह Agreement to Sell है। याद रहे Ownership बाद में Transfer = Agreement to Sell
Sale और Agreement to Sell में अंतर
आधार - Sale (बिक्री)- Agreement to Sell (बिक्री के लिए करार)
1. स्वामित्व - माल का स्वामित्व तुरंत खरीदार को मिल जाता है - स्वामित्व भविष्य में मिलता है।
2. संविदा की प्रकृति - Executed Contract की प्रकृति रखती है - Executory Contract की प्रकृति रखती है।
3. जोखिम - माल का जोखिम खरीदार पर आ जाता है - जोखिम विक्रेता पर रहता है, जब तक स्वामित्व हस्तांतरित न हो।
4. अधिकार - खरीदार को माल पर वास्तविक स्वामित्व प्राप्त हो जाता है - खरीदार को विक्रेता के विरुद्ध संविदात्मक अधिकार मिलता है।
5. विक्रेता का अधिकार - विक्रेता का स्वामित्व समाप्त हो जाता है - विक्रेता तब तक मालिक रहता है जब तक स्वामित्व हस्तांतरित न हो।
6. माल के नष्ट होने का प्रभाव - जोखिम खरीददार पर - जोखिम विक्रेता पर रहता है।
7. विक्रेता की insolvency खरीददार मालिक होने के कारण माल वापस मांग सकता है। खरीददार केवल damages का दावा कर सकता है।
8. खरीददार की insolvency - विक्रेता मालिक न होने के कारण माल को रोक नहीं सकता, परिस्थितियों के अनुसार उसके अन्य अधिकार हो सकते हैं - विक्रेता माल रोक सकता है क्योंकि स्वामित्व अभी उसके पास है।
9. Third party को transfer - खरीददार को स्वामित्व प्राप्त होने से उसके अधिकार मजबूत होते हैं - खरीदार को अभी स्वामित्व प्राप्त नहीं होता।
10. आगे की स्थिति Agreement to Sell के पूरा होने पर Sale बन चुकी होती है - शर्त पूरी होने पर Agreement to Sell, Sale में बदल सकता है।
8. Sale और Agreement to Sell का संबंध - धारा 4 के अनुसार दोनों को अलग-अलग समझना चाहिए, लेकिन दोनों एक ही Contract of Sale के अंतर्गत आते हैं।
जोखिम (Risk) का सिद्धांत - सामान्य नियम है कि Risk prima facie follows ownership. अर्थात जो व्यक्ति मालिक है, माल के नष्ट होने का जोखिम उसी पर होता है।
उदाहरण - A ने B को कार बेच दी और स्वामित्व B को हस्तांतरित हो गया। कार की delivery अभी बाकी है। यदि परिस्थितियों के अनुसार जोखिम B पर आ चुका है और कार दुर्घटना में नष्ट हो जाती है, तो उसका नुकसान B को होता है। इसके विपरीत, यदि केवल Agreement to Sell हुआ है और स्वामित्व अभी A के पास है, तो सामान्यतः जोखिम A पर रहेगा, subject to the terms and circumstances of the contract.
Insolvency में अंतर - Sale और Agreement to Sell का महत्वपूर्ण व्यावहारिक अंतर है।
A. Seller insolvent हो जाए - यदि Sale हो चुकी है, तो माल का स्वामित्व खरीददार को मिल चुका है। इसलिए केवल विक्रेता के insolvent होने से खरीदार का स्वामित्व समाप्त नहीं होता। लेकिन यदि केवल Agreement to Sell हुआ था और स्वामित्व अभी विक्रेता के पास था, तो खरीदार का दावा contractual claim के रूप में रहेगा।
B. Buyer insolvent हो जाए - यदि Sale हो चुकी है, तो खरीदार मालिक बन चुका है लेकिन Agreement to Sell में स्वामित्व अभी विक्रेता के पास है, इसलिए विक्रेता की स्थिति अधिक सुरक्षित होती है।
Sale से पहले माल नष्ट होने की स्थिति - यदि specific goods की Sale/Agreement to Sell हुई है और माल बिना किसी पक्ष की गलती के संविदा से पहले ही नष्ट हो चुका था, तो धारा 7 के सिद्धांत लागू होते हैं। यदि संविदा के बाद माल नष्ट होता है, तो धारा 8 का सिद्धांत महत्वपूर्ण होता है।  सही बात यह है कि risk ownership के साथ जाता है, लेकिन Act और contract की विशेष परिस्थितियां परिणाम बदल सकती हैं।
Sale को Agreement to Sell में बदलना - धारा 4(4) के अनुसार - Agreement to Sell, निर्धारित समय बीतने पर या वह condition पूरी होने पर जिसके अधीन property transfer होनी है, Sale बन जाता है।
उदाहरण - A ने B को 100 बोरी गेहूं बेचने का agreement किया, लेकिन यह तय हुआ कि स्वामित्व 1 अक्टूबर को हस्तांतरित होगा तो 1 अक्टूबर को निर्धारित शर्त पूरी हो गई Agreement to Sell अब Sale में बदल गया।
निष्कर्ष - माल की बिक्री की संविदा वह संविदा है जिसमें विक्रेता माल में संपत्ति को खरीदार को मूल्य के बदले हस्तांतरित करता है या हस्तांतरित करने का करार करता है। इसके दो प्रमुख रूप हैं, Sale और Agreement to Sell। दोनों के बीच मूलभूत अंतर स्वामित्व के हस्तांतरण के समय का है। Sale में स्वामित्व तत्काल हस्तांतरित हो जाता है, जबकि Agreement to Sell में स्वामित्व भविष्य में किसी निश्चित समय या शर्त पूरी होने पर हस्तांतरित होता है। इसलिए कहा जा सकता है Sale में अधिकार वर्तमान में हस्तांतरित होता है, जबकि Agreement to Sell में अधिकार के भविष्य में हस्तांतरण का वचन होता है।

किराया-क्रय करार, माल का अर्थ विद्यमान माल (Existing Goods), भावी माल (Future Goods) एवं आकस्मिक/सशर्त माल (Contingent Goods)
शर्तें एवं प्रत्याभूतियाँ (Conditions and Warranties) -
भाई, इसे Sale of Goods Act, 1930 के अनुसार परीक्षा की दृष्टि से समझते हैं। यहाँ एक महत्वपूर्ण बात पहले स्पष्ट कर लें: किराया-क्रय करार (Hire-Purchase) और माल की बिक्री (Sale of Goods) अलग अवधारणाएँ हैं। इसी तरह Existing, Future और Contingent Goods का अंतर भी बहुत महत्वपूर्ण है।
किराया-क्रय करार (Hire-Purchase Agreement) - किराया-क्रय करार वह व्यवस्था है जिसमें किसी वस्तु का मालिक उस वस्तु को दूसरे व्यक्ति को किराये पर उपयोग करने के लिए देता है, और यह शर्त रहती है कि किरायेदार निश्चित अवधि तक निर्धारित किस्तें चुकाने के बाद वस्तु को खरीदने का विकल्प प्राप्त करेगा। Hire-Purchase में कब्जा पहले और स्वामित्व बाद में आती है, जबकि Sale में स्वामित्व का हस्तांतरण बिक्री का मूल तत्व है।इसमें दो बातें अलग-अलग रहती हैं - 
1. वस्तु का कब्जा (possession) ग्राहक को मिल जाता है।
2. वस्तु का स्वामित्व (ownership) अंतिम किस्त या खरीद के विकल्प का प्रयोग करने तक मालिक के पास रहता है।
उदाहरण - A ने B को ₹1,20,000 की मोटरसाइकिल किराया-क्रय आधार पर दी। B ₹10,000 की 12 किस्तें देगा। पूरी किस्तें देने के बाद मोटरसाइकिल का स्वामित्व B को मिलेगा। यदि B बीच में भुगतान बंद कर देता है और करार इसकी अनुमति देता है, तो A मोटरसाइकिल वापस ले सकता है।
किराया-क्रय की प्रमुख विशेषताएँ - 
1. कब्जा तत्काल मिलता है, स्वामित्व तत्काल नहीं।
2. कीमत का भुगतान किस्तों में होता है।
3. अंतिम स्वामित्व प्राप्त करने के लिए निर्धारित शर्त पूरी करनी होती है।
4. किराया-क्रेता के पास वस्तु खरीदने का विकल्प हो सकता है।
5. स्वामित्व हस्तांतरण तक वस्तु का मालिक मूल स्वामी रहता है।
6. किस्तों का भुगतान न होने पर करार की शर्तों के अनुसार वस्तु वापस ली जा सकती है।
7. प्रत्येक किराया-क्रय व्यवस्था बिक्री नहीं होती, क्योंकि बिक्री में स्वामित्व का हस्तांतरण आवश्यक तत्व है।
Hire-Purchase और Sale में अंतर
आधार - Hire-Purchase - Sale
स्वामित्व - अंतिम शर्त पूरी होने तक विक्रेता के पास - बिक्री के अनुसार खरीदार को हस्तांतरित
कब्जा - तुरंत मिलता है - खरीददार को मिलता है
भुगतान - किस्तों में - एकमुश्त या किस्तों में
खरीदने का विकल्प होता है - बिक्री में खरीद का विकल्प नहीं - बिक्री हो चुकी होती है
भुगतान न करने पर - करार के अनुसार वस्तु वापस ली जा सकती है - विक्रेता के अधिकार अलग होंगे
कानूनी प्रकृति - किराया + खरीद का विकल्प - बिक्री की संविदा
माल (Goods) का वर्गीकरण - Sale of Goods Act, 1930 की धारा 2(7) के अनुसार Goods से आशय हर प्रकार की चल संपति से है, सिवाय धन और actionable claims के। इसमें stock, shares, growing crops, grass और भूमि से जुड़ी ऐसी वस्तुएँ भी शामिल हो सकती हैं जिन्हें बिक्री से पहले अलग करने पर सहमति हो। माल को समय और उपलब्धता के आधार पर तीन वर्गों में समझा जाता है - 
1. विद्यमान माल (Existing Goods)
2. भावी माल (Future Goods)
3. आकस्मिक/सशर्त माल (Contingen Goods)
विद्यमान माल (Existing Goods) - 
 जो माल बिक्री की संविदा बनाते समय अस्तित्व में है और विक्रेता के स्वामित्व या कब्जे में है, वह Existing Goods कहलाता है।
उदाहरण - A के गोदाम में 500 बोरी गेहूँ हैं। A उनमें से 100 बोरी B को बेचने का करार करता है। ये 100 बोरी Existing Goods हैं।
Existing Goods के दो प्रकार - 
(A) Specific Goods - धारा 2(14) के अनुसार, ऐसा माल जो संविदा बनाते समय पहचान लिया गया और निश्चित कर दिया गया हो।
उदाहरण - मेरे गोदाम में रखी मशीन नंबर 25 मैं B को ₹2 लाख में बेचता हूँ। यह निश्चित मशीन है, इसलिए Specific Goods हैं।
(B) Ascertained Goods - ऐसा माल जो प्रारंभ में अनिश्चित हो सकता है, लेकिन बाद में संविदा के अनुसार निश्चित/पहचान योग्य बना दिया जाता है।
उदाहरण - A के पास 1,000 बोरी चावल हैं। B को उनमें से 100 बोरी बेचने का करार होता है। बाद में 100 बोरी अलग कर दी जाती हैं। अब वे Ascertained Goods हैं।
नोट - Specific Goods और Ascertained Goods में सूक्ष्म अंतर है। Specific Goods संविदा बनते समय ही निश्चित होते हैं, जबकि Ascertained Goods बाद में पहचान/निश्चित किए जाते हैं।
भावी माल (Future Goods) - धारा 2(6) के अनुसार Future Goods वे माल हैं जिन्हें विक्रेता बिक्री की संविदा करने के बाद निर्मित, उत्पादित या प्राप्त करने वाला है।
उदाहरण - A कहता है कि मैं अगले महीने तैयार होने वाली अपनी फैक्ट्री की 100 कुर्सियाँ B को ₹50,000 में बेचूँगा। ये Future Goods हैं क्योंकि संविदा के समय कुर्सियाँ अभी अस्तित्व में नहीं आई हैं।
Future Goods की विशेषताएँ - 
1. संविदा के समय माल अस्तित्व में नहीं होता।
2. विक्रेता भविष्य में माल बनाएगा, उत्पादित करेगा या प्राप्त करेगा।
3. Future Goods की वर्तमान बिक्री नहीं हो सकती।
4. Future Goods के संबंध में किया गया करार Agreement to Sell होता है।
5. माल अस्तित्व में आने और संविदा की शर्तें पूरी होने पर बिक्री में परिवर्तित हो सकता है।
नोट - Future Goods की sale वास्तव में तत्काल sale नहीं होती, बल्कि agreement to sell होती है।
आकस्मिक/सशर्त माल (Contingent Goods) - यह Future Goods का एक विशेष रूप है। जब माल की बिक्री इस बात पर निर्भर करती है कि कोई अनिश्चित आकस्मिक घटना (uncertain event) घटित होगी या नहीं, तो ऐसे माल को Contingent Goods कहा जाता है।
उदाहरण - A कहता है: यदि जहाज मुंबई बंदरगाह पर सुरक्षित पहुँच गया, तो उसमें आने वाला 500 टन माल मैं B को बेच दूँगा।
यहाँ बिक्री जहाज के सुरक्षित पहुँचने की अनिश्चित घटना पर निर्भर है। इसलिए यह Contingent Goods का उदाहरण है।
Future Goods और Contingent Goods में संबंध - हर Contingent Goods, Future Goods की प्रकृति रखता है, लेकिन हर Future Goods Contingent Goods नहीं होता।
उदाहरण - 
• अगले महीने बनने वाली 100 कुर्सियाँ → Future Goods
• अगले महीने आने वाले जहाज पर निर्भर 100 मशीनें → Contingent Goods
Contingent Goods की विशेषताएँ - 
1. माल वर्तमान में उपलब्ध नहीं होता है।
2. उसका अस्तित्व या उपलब्धता किसी अनिश्चित घटना पर निर्भर करती है।
3. घटना घटने पर ही संविदा प्रभावी हो सकती है।
4. घटना न होने पर संविदा समाप्त/निष्फल हो सकती है, करार की प्रकृति के अनुसार।
5. यह conditional agreement की प्रकृति रखता है।
6. Existing, Future और Contingent Goods में अंतर
आधार - Existing Goods - Future Goods - Contingent Goods
अस्तित्व - संविदा के समय मौजूद - भविष्य में अस्तित्व में आएगा - अनिश्चित घटना पर निर्भर
विक्रेता की स्थिति - माल मौजूद है - माल बनाना/प्राप्त करना है - घटना पर उपलब्धता निर्भर
पहचान - हो सकती है - बाद में होगी - घटना के बाद निश्चित होती है
कानूनी स्वरूप - Sale हो सकती है Agreement to Sell - शर्त/आकस्मिकता पर निर्भर Agreement
उदाहरण - गोदाम की मशीन - अगले महीने बनने वाली मशीन - जहाज के सुरक्षित आने पर मिलने वाला माल
शर्तें एवं प्रत्याभूतियाँ (Conditions and Warranties) - Sale of Goods Act, 1930, धारा 12 Conditions और Warranties का मूल प्रावधान है।
Condition वह शर्त है जो संविदा के मुख्य उद्देश्य के लिए आवश्यक होती है।यदि Condition का उल्लंघन होता है तो खरीदार को संविदा को अस्वीकार/समाप्त करने का अधिकार हो सकता है, और  क्षतिपूर्ति मांगने का अधिकार भी होता है।
उदाहरण - A ने B को कहा कि वह “नया और बिल्कुल सही हालत वाला लैपटॉप” बेचेगा। लैपटॉप पहले से इस्तेमाल किया हुआ निकला। यदि “नया” होना संविदा की मूल शर्त थी, तो यह Condition का उल्लंघन है।
Warranty का अर्थ - Warranty ऐसी शर्त है जो संविदा के मुख्य उद्देश्य के लिए सहायक या गौण होती है। Warranty के उल्लंघन पर खरीदार को वस्तु अस्वीकार करने का अधिकार नहीं होता लेकिन वह हर्जाना/क्षतिपूर्ति (damages) मांग सकता है।
उदाहरण - A ने B को कार बेची और करार में कहा कि कार के साथ अतिरिक्त टूल-किट दी जाएगी। कार सही है लेकिन टूल-किट नहीं दी गई। यदि टूल-किट की शर्त warranty है, तो B कार वापस नहीं कर सकता, लेकिन नुकसान की क्षतिपूर्ति मांग सकता है।
Condition और Warranty में अंतर - 
आधार - Condition - Warranty
प्रकृति - मूलभूत शर्त - सहायक/गौण शर्त
उद्देश्य - संविदा के मुख्य उद्देश्य से जुड़ी - मुख्य उद्देश्य से सहायक रूप में जुड़ी
उल्लंघन का परिणाम - संविदा अस्वीकार/समाप्त करने का अधिकार + damages - केवल damages
महत्त्व - अधिक - अपेक्षाकृत कम
उदाहरण - वस्तु का निर्धारित प्रकार होना - पैकिंग या अतिरिक्त सुविधा की शर्त 
ट्रिक - 
• Condition टूटी तो Contract छोड़कर नुकसान की भरपाई ले।
• Warranty टूटी तो Contract मत छोड़ केवल Damages ले।
Condition को Warranty कब माना जाता है? - धारा 13 के अनुसार, कुछ परिस्थितियों में Condition का उल्लंघन होने पर खरीदार उसे Warranty के उल्लंघन के रूप में मान सकता है।
मुख्य परिस्थितियाँ - 
1. खरीदार स्वयं Condition को waive कर देता है।
2. खरीदार Condition के उल्लंघन को Warranty के उल्लंघन के रूप में मानने का विकल्प चुनता है।
3. यदि संविदा divisible नहीं है और खरीदार ने माल स्वीकार कर लिया है, तो परिस्थितियों के अनुसार Condition का उल्लंघन Warranty के रूप में माना जा सकता है।
उदाहरण - B ने ऐसी वस्तु स्वीकार कर ली जिसमें Condition का उल्लंघन था। B वस्तु लौटाने के बजाय केवल नुकसान की क्षतिपूर्ति मांगना चुन सकता है, यदि कानून और परिस्थितियाँ इसकी अनुमति दें।
निहित शर्तें (Implied Conditions) - 
Sale of Goods Act में कुछ Conditions कानून द्वारा स्वतः मानी जाती हैं, जब तक कि पक्षकारों ने वैध रूप से उनका अपवर्जन न किया हो।
(1) Title की निहित Condition, धारा 14 - विक्रेता के पास माल बेचने का अधिकार होना चाहिए। 
उदाहरण - यदि A चोरी की वस्तु B को बेचता है और वास्तविक मालिक वस्तु वापस ले लेता है, तो B के पास विक्रेता के विरुद्ध उचित उपचार हो सकता है।
(2) Description के अनुसार माल, धारा 15 - जहाँ बिक्री Description द्वारा होती है, माल उस Description के अनुरूप होना चाहिए।
उदाहरण - Pure cotton shirt के नाम पर polyester shirt देना Description की Condition का उल्लंघन हो सकता है।
(3) Fitness for Purpose, धारा 16(1) - यदि - 
1. खरीदार विक्रेता को अपना विशेष उद्देश्य बताता है।
2. वह विक्रेता के कौशल/निर्णय पर भरोसा करता है।
3. विक्रेता उस प्रकार के माल का व्यापार करता है तो माल उस उद्देश्य के लिए reasonably fit होना चाहिए, कानून में दिए अपवादों के अधीन।
(4) Merchantable Quality, धारा 16(2) - जहाँ माल Description से ऐसे विक्रेता से खरीदा जाता है जो उस प्रकार के माल का व्यापार करता है, वहाँ माल में ऐसी गुणवत्ता होनी चाहिए जो उस प्रकार के माल के लिए व्यापारिक रूप से स्वीकार्य हो, लागू अपवादों के अधीन।
(5) Sample द्वारा बिक्री, धारा 17 - Sample द्वारा बिक्री में  
• bulk माल sample के अनुरूप होना चाहिए,  
• खरीदार को bulk और sample की तुलना का उचित अवसर मिलना चाहिए
• माल में ऐसा छिपा दोष नहीं होना चाहिए जो sample की सामान्य जाँच से स्पष्ट न हो और व्यापार की प्रकृति में अनुचित हो।
निहित प्रत्याभूतियाँ (Implied Warranties) - 
(1) Quiet Possession - खरीदार को माल का शांतिपूर्ण कब्जा प्राप्त होना चाहिए।
(2) Freedom from Encumbrance - माल किसी तीसरे व्यक्ति के ऐसे अधिकार/charge से मुक्त होना चाहिए जो खरीदार को ज्ञात न हो।
उदाहरण - A ने B को ऐसी मशीन बेच दी जिस पर बैंक का charge था और B को इसकी जानकारी नहीं थी। यह implied warranty का प्रश्न उत्पन्न कर सकता है।
Condition और Warranty का व्यावहारिक महत्व - बिक्री की संविदा में यह निर्धारित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि कोई शर्त Condition है या Warranty, क्योंकि उपचार अलग-अलग होंगे।
सार - माल - 
→ Existing Goods - उपलब्ध स्टॉक
→ Future Goods - भविष्य में स्टॉक 
→ Contingent Goods - शर्त अधीन
Existing Goods 
→ Specific Goods विशेष माल
→ Ascertained Goods 
Conditions & Warranties -
• Condition = मुख्य शर्त
• Warranty = सहायक शर्त
मुख्य धाराएँ - 
धारा 2(6) Future Goods
धारा 2(7) Goods
धारा 2(14) Specific Goods
धारा 12 Condition और Warranty
धारा 13 Condition को Warranty मानना
धारा 14 Implied Conditions/Warranties as to Title
धारा 15 Sale by Description
धारा 16 Implied Conditions as to Quality/Fitness
धारा 17 Sale by Sample
निष्कर्ष - Sale of Goods Act, 1930 में माल का वर्गीकरण बिक्री की प्रकृति और स्वामित्व के हस्तांतरण को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण है। Existing Goods वर्तमान में अस्तित्व में होते हैं, Future Goods भविष्य में अस्तित्व में आने वाले होते हैं तथा Contingent Goods किसी अनिश्चित घटना पर निर्भर होते हैं। इसी प्रकार Condition संविदा के मुख्य उद्देश्य से संबंधित मूलभूत शर्त है, जबकि Warranty सहायक शर्त है। दोनों के उल्लंघन के विधिक परिणाम अलग-अलग हैं।

विक्रेता से क्रेता को संपत्ति/स्वामित्व का अंतरण, अनधिकृत व्यक्ति द्वारा बिक्री, बिक्री के निष्पादन से संबंधित विधि एवं अदत्त विक्रेता (Unpaid Seller) के अधिकार -
विक्रेता से क्रेता को संपत्ति/स्वामित्व का अंतरण - वस्तु-विक्रय अधिनियम में Property in goods का अर्थ वस्तु में स्वामित्व (general property) से है। इसका अर्थ केवल वस्तु का कब्जा प्राप्त होना नहीं है।
उदाहरण - A ने B को एक मशीन बेच दी, लेकिन मशीन A के गोदाम में ही रखी है। यदि पक्षकारों की मंशा के अनुसार स्वामित्व B को हस्तांतरित हो चुका है, तो मशीन की property B की हो गई, भले ही कब्जा A के पास हो।
स्वामित्व के अंतरण का मूल नियम - धारा 18 - जब तक वस्तु निश्चित (specific/ascertained) न हो, उसमें संपत्ति क्रेता को हस्तांतरित नहीं होती।
धारा 19 - निश्चित वस्तुओं के संबंध में संपत्ति उसी समय हस्तांतरित होती है जब पक्षकारों की मंशा (intention of parties) उसे हस्तांतरित करने की हो।
पक्षकारों की मंशा क्या हो कि स्वामित्व किस समय हस्तांतरित हो? तो मंशा निर्धारित करने के लिए अनुबंध की शर्तें, पक्षकारों का आचरण तथा परिस्थितियाँ देखी जाती हैं।
निश्चित वस्तुओं के स्वामित्व का हस्तांतरण - 
धारा 20 नियम 1 बिना शर्त अनुबंध - यदि निश्चित वस्तु की बिक्री का अनुबंध बिना शर्त है और वस्तु ऐसी स्थिति में है कि विक्रेता उसे तुरंत क्रेता को दे सकता है, तो अनुबंध होते ही स्वामित्व क्रेता को हस्तांतरित हो जाता है।
उदाहरण - A ने अपनी दुकान में रखी एक निश्चित कार B को बेच दी। कार तत्काल डिलीवरी के लिए तैयार है। अनुबंध होते ही स्वामित्व B को चला जाएगा, भले ही कार की वास्तविक डिलीवरी बाद में हो।
धारा 21 नियम 2 वस्तु को तैयार करने की आवश्यकता - यदि विक्रेता को वस्तु को ऐसी अवस्था में लाने के लिए कोई कार्य करना है जिससे वह डिलीवरी के योग्य हो जाए, तो जब तक वह कार्य पूरा नहीं होता और क्रेता को इसकी सूचना नहीं दी जाती, स्वामित्व हस्तांतरित नहीं होता।
उदाहरण - A ने B को एक मशीन बेचने का अनुबंध किया, लेकिन मशीन में कुछ पुर्जे लगाना बाकी हैं। पुर्जे लगाने और B को सूचना देने से पहले स्वामित्व B को नहीं जाएगा।
धारा 22 नियम 3 कीमत निर्धारित करने के लिए तौल/माप/परीक्षण - यदि निश्चित वस्तु की कीमत वस्तु के वजन, माप या परीक्षण द्वारा निर्धारित होनी है, तो ऐसा कार्य पूरा होने तथा क्रेता को इसकी सूचना दिए जाने के बाद संपत्ति हस्तांतरित होती है।
उदाहरण - 100 किलो गेहूँ ₹50 प्रति किलो की दर से बेचा गया, लेकिन वास्तविक कीमत तौल के बाद तय होनी है। तौल और सूचना से पहले स्वामित्व का अंतरण नहीं होगा।
अनिश्चित वस्तुओं (Unascertained Goods) का स्वामित्व (धारा 18 और 23) - अनिश्चित वस्तुओं में स्वामित्व तब तक हस्तांतरित नहीं होता जब तक वस्तुएँ
1. निश्चित/अभिज्ञात न कर दी जाएँ।
2. अनुबंध के लिए उपयुक्त रूप से अलग न कर दी जाएँ।
3. विक्रेता और क्रेता की सहमति से उस अनुबंध को unconditionally appropriated न कर दी जाए।
उदाहरण - A के गोदाम में 1,000 बोरी गेहूँ है। A ने B को 100 बोरी बेचने का अनुबंध किया, लेकिन अभी यह तय नहीं किया कि कौन-सी 100 बोरियाँ B की हैं।इस अवस्था में B को स्वामित्व नहीं मिला।जब A और B की सहमति से 100 बोरियाँ अलग कर दी जाती हैं और उन्हें B के लिए निश्चित कर दिया जाता है, तो स्वामित्व हस्तांतरित हो सकता है।
धारा 24 अनुमोदन/प्रयोग के आधार पर बिक्री - जब वस्तु क्रेता को  approval के बाद रsale or return के आधार पर या किसी अन्य समान शर्त पर।दी जाती है, तो संपत्ति तब हस्तांतरित होती है जब - 
1. क्रेता स्पष्ट रूप से वस्तु को स्वीकार कर ले।
2. क्रेता ऐसा कार्य करे जिससे वह लेन-देन को अपनाता हुआ प्रतीत हो।
3. क्रेता वस्तु को वापस करने का निश्चित समय समाप्त होने दे या ऐसा कोई समय निर्धारित न हो तो उचित समय समाप्त हो जाए।
उदाहरण - A ने B को एक मोबाइल sale or return के आधार पर दिया। B ने उसे बेच दिया। B का यह कार्य वस्तु को स्वीकार करने का संकेत है और स्वामित्व B को हस्तांतरित माना जाएगा।
धारा 26 जोखिम और स्वामित्व का संबंध - मूल सिद्धांत -  Risk prima facie passes with property.अर्थात जिस समय वस्तु का स्वामित्व क्रेता को मिलता है, उसी समय से वस्तु का जोखिम भी क्रेता का हो जाता है।
उदाहरण - A ने B को निश्चित मशीन बेच दी और स्वामित्व B को हस्तांतरित हो गया। डिलीवरी से पहले मशीन आकस्मिक रूप से नष्ट हो जाती है। नियमांनुसार नुकसान B का होगा।
अपवाद - यदि पक्षकारों ने अलग व्यवस्था की है या डिलीवरी में किसी पक्ष की गलती के कारण नुकसान हुआ है, तो परिणाम अलग हो सकता है।
अनधिकृत व्यक्ति द्वारा बिक्री - (Sale by a person who is not the owner) Nemo dat quod non habet सिद्धांत पर आधारित है। अर्थात  कोई व्यक्ति उससे अधिक अच्छा स्वामित्व दूसरे को नहीं दे सकता जितना स्वयं उसके पास है। यदि विक्रेता स्वयं वस्तु का मालिक नहीं है, तो वह क्रेता को अच्छा title नहीं दे सकता।
उदाहरण - A ने B की कार बिना अधिकार के C को बेच दी। नियमानुसार C को A से बेहतर title नहीं मिलेगा। लेकिन यह नियम पूर्ण नहीं है। अधिनियम में कई अपवाद हैं।
अनधिकृत विक्रेता द्वारा बिक्री के प्रमुख अपवाद - 
Estoppel द्वारा मालिक की सहमति - यदि वास्तविक मालिक अपने आचरण से यह दिखाता है कि विक्रेता को वस्तु बेचने का अधिकार है और क्रेता उस प्रतिनिधित्व पर विश्वास करके वस्तु खरीदता है, तो मालिक बाद में बिक्री को चुनौती नहीं दे सकता।
धारा 27 Mercantile Agent द्वारा बिक्री - यदि कोई mercantile agent - 
1. मालिक की सहमति से वस्तु के कब्जे में है।
2. अपने व्यवसाय के दौरान वस्तु बेचता है।
3. क्रेता सद्भावना से खरीदता है।
4. और क्रेता को यह पता नहीं है कि agent के पास बिक्री का अधिकार नहीं है।
तो बिक्री वैध होती है।
उदाहरण - A ने अपने agent B को माल बिक्री के लिए दिया। B ने माल C को बेच दिया। C ने सद्भावना से खरीदा और उसे B के अधिकार की कमी का ज्ञान नहीं था। C को अच्छा title मिल सकता है।
धारा 28 संयुक्त मालिकों में से एक द्वारा बिक्री - यदि कई व्यक्तियों के पास वस्तु का संयुक्त स्वामित्व है और उनमें से एक व्यक्ति अन्य सह-मालिकों की अनुमति से वस्तु के एकमात्र कब्जे में है और वह वस्तु किसी सद्भावी क्रेता को बेच देता है  तो परिस्थितियों के अनुसार क्रेता को अच्छा title मिलता है।
धारा 29 Voidable Contract के अंतर्गत कब्जे वाला व्यक्ति - यदि किसी व्यक्ति ने fraud या misrepresentation आदि से वस्तु का कब्जा प्राप्त किया लेकिन अनुबंध अभी तक rescind नहीं किया गया है और वह व्यक्ति वस्तु किसी सद्भावी क्रेता को बेच देता है, तो सद्भावी क्रेता को अच्छा title मिलता है।
महत्वपूर्ण - यदि मूल मालिक ने पहले ही अनुबंध rescind कर दिया था, तो यह अपवाद लागू नहीं होगा।
धारा 30(1) विक्रेता द्वारा बिक्री के बाद पुनः कब्जा - यदि कोई व्यक्ति वस्तु बेचने के बाद भी वस्तु या title documents अपने कब्जे में रखता है और बाद में उसे किसी सद्भावी व्यक्ति को बेच देता है, तो परिस्थितियों में बाद वाले क्रेता को अच्छा title मिलता है।
उदाहरण - A ने कार B को बेच दी, लेकिन कार A के कब्जे में रही। A ने बाद में वही कार C को बेच दी। यदि C ने सद्भावना से और बिना पहले बिक्री की जानकारी के खरीदा है, तो C को वैधानिक संरक्षण मिल सकता है।
धारा 30(2) क्रेता द्वारा बिक्री के बाद पुनः बिक्री - यदि क्रेता ने वस्तु या title documents प्राप्त कर लिए हैं और वह उन्हें किसी अन्य व्यक्ति को बेच देता है/हस्तांतरित कर देता है, तो सद्भावी दूसरे क्रेता को कुछ परिस्थितियों में अच्छा title मिल सकता है। इसका उद्देश्य व्यापारिक लेन-देन में bona fide purchasers की रक्षा करना है।
भुगतान रोकने का अधिकार और Lien आदि से संबंधित विशेष स्थिति - कुछ परिस्थितियों में विक्रेता को वस्तु पर lien या possession संबंधी अधिकार प्राप्त होते हैं। इनका संबंध विशेष रूप से अदत्त विक्रेता के अधिकारों से है।
धारा 45 अदत्त विक्रेता (Unpaid Seller) - विक्रेता को अदत्त विक्रेता (Unpaid Seller) कहा जाता है जब 
1. वस्तु की पूरी कीमत का भुगतान नहीं किया गया हो या tender नहीं किया गया हो।
2. विक्रेता को bill of exchange, cheque या अन्य negotiable instrument के रूप में भुगतान मिला हो, लेकिन वह instrument dishonour हो गया हो। 
पूरी कीमत नहीं मिली = Unpaid Seller
या Cheque/Bill मिला लेकिन dishonour = Unpaid Seller
अदत्त विक्रेता के अधिकार - अदत्त विक्रेता के अधिकार दो वर्गों में बाँटे जाते हैं
A. वस्तु के विरुद्ध अधिकार - 
1. Lien
2. Stoppage in Transit
3. Resale
क्रेता के विरुद्ध व्यक्तिगत अधिकार - 
1. कीमत के लिए वाद
2. हर्जाने के लिए वाद
3. ब्याज का दावा
धारा 47 अदत्त विक्रेता का Lien - Lien का अर्थ है कीमत का भुगतान होने तक अपने कब्जे में मौजूद वस्तु को रोककर रखने का अधिकार। अदत्त विक्रेता को lien प्राप्त होता है जब - 
1. माल credit के बिना बेचा गया हो
2. credit की अवधि समाप्त हो गई हो
3. क्रेता insolvent हो गया हो।
उदाहरण - A ने B को माल बेचा। B ने कीमत नहीं दी और माल अभी A के कब्जे में है। A माल को अपने पास रोक सकता है। 
Lien की महत्वपूर्ण बात - Lien के लिए विक्रेता के पास वस्तु का कब्जा होना आवश्यक है।

धारा 49 Lien का समाप्त होना - Lien समाप्त हो सकता है जब - 
1. विक्रेता माल carrier को क्रेता तक भेजने के लिए सौंप देता है और अपने lien का अधिकार सुरक्षित नहीं रखता।
2. क्रेता या उसका agent वैध रूप से माल का कब्जा प्राप्त कर लेता है।
3. विक्रेता ने अपने lien का स्पष्ट त्याग कर दिया हो।
नोट - केवल विक्रेता द्वारा मुकदमा दायर करने से lien समाप्त नहीं होता।
धारा 50 Stoppage in Transit - यदि
1. विक्रेता अदत्त है।
2. क्रेता insolvent हो गया है।
3. माल transit में है।
तो विक्रेता carrier को माल रोकने का निर्देश देकर माल को अपने नियंत्रण में वापस ले सकता है। इसे Right of Stoppage in Transit कहते हैं।
उदाहरण - A ने B को माल भेजा। माल रास्ते में है। B insolvent हो गया और कीमत भी नहीं दी। A carrier को माल रोकने का निर्देश दे सकता है।
Lien और Stoppage in Transit में अंतर - 
आधार - Lien - Stoppage in Transit
कब्जा - विक्रेता के पास - माल का कब्जा माल carrier/transit में।
स्थिति - माल विक्रेता के कब्जे में - माल रास्ते में।
कारण - कीमत का भुगतान न होना - क्रेता का insolvent होना।
उद्देश्य - माल रोककर कीमत सुरक्षित करना - transit से माल वापस रोकना।
धाराएँ - 47 से 49 - 50 से 52
ट्रिक - Seller के पास = Lien, रास्ते में = Stoppage.
धारा 53 Stoppage in Transit का समाप्त होना - यदि
1. क्रेता या उसका agent माल का कब्जा प्राप्त कर लेता है।
2. carrier क्रेता के agent के रूप में माल रखने लगता है।
3. transit समाप्त हो जाता है।
तो stoppage का अधिकार समाप्त हो सकता है।
क्रेता द्वारा माल का पुनर्विक्रय - यदि क्रेता ने वस्तु को किसी तीसरे व्यक्ति को बेच दिया है, तो कुछ परिस्थितियों में अदत्त विक्रेता के stoppage के अधिकार पर इसका प्रभाव पड़ सकता है। यदि तीसरे व्यक्ति ने सद्भावना से और बिना notice के title documents प्राप्त कर लिए हैं, तो कानून उसके हितों की रक्षा करता है।
धारा 54 अदत्त विक्रेता का पुनर्विक्रय का अधिकार - अदत्त विक्रेता कुछ परिस्थितियों में माल को पुनः बेच सकता है।
1. माल नाशवान हो - यदि वस्तु perishable है, तो बिना अधिक औपचारिकता के पुनर्विक्रय किया जा सकता है।
2. विक्रेता ने notice दिया हो - विक्रेता क्रेता को उचित notice देकर पुनर्विक्रय कर सकता है और उचित समय में क्रेता भुगतान न करे तो माल पुनः बेच सकता है।
3. अनुबंध में पुनर्विक्रय का अधिकार सुरक्षित हो - यदि अनुबंध में विक्रेता ने resale का अधिकार सुरक्षित रखा है, तो वह उसका प्रयोग कर सकता है।
महत्वपूर्ण - यदि resale कानून के अनुसार किया गया है, तो मूल विक्रेता नए क्रेता से कीमत प्राप्त कर सकता है या मूल क्रेता से नुकसान की भरपाई मांग सकता है।
धारा 55 कीमत के लिए वाद - यदि
• संपत्ति क्रेता को हस्तांतरित हो चुकी है
• क्रेता कीमत देने से इंकार करता है
तो विक्रेता कीमत की वसूली के लिए वाद कर सकता है।
उदाहरण - A ने B को ₹1 लाख की मशीन बेच दी। स्वामित्व B को हस्तांतरित हो गया लेकिन B कीमत नहीं देता। A ₹1 लाख की कीमत के लिए वाद कर सकता है।
भविष्य में देय कीमत के लिए वाद - यदि अनुबंध के अनुसार कीमत किसी निश्चित तारीख को देय थी और क्रेता कीमत नहीं देता, तो परिस्थितियों के अनुसार विक्रेता कीमत की वसूली के लिए कार्रवाई कर सकता है।
धारा 56 अनुबंध के उल्लंघन पर हर्जाने का वाद - यदि क्रेता गलत तरीके से माल स्वीकार करने या कीमत देने से इंकार करता है, तो विक्रेता damages for non-acceptance के लिए वाद कर सकता है।
उदाहरण - A ने B को 500 कुर्सियाँ बेचने का अनुबंध किया। B बिना उचित कारण कुर्सियाँ लेने से इंकार कर देता है। A बाजार मूल्य और अनुबंध मूल्य के अंतर आदि के आधार पर हर्जाना मांग सकता है।
धारा 61ब्याज का दावा - विक्रेता कुछ परिस्थितियों में कीमत पर ब्याज का दावा कर सकता है। न्यायालय - कीमत की वसूली, ब्याज और उचित हर्जाना देने का आदेश कर सकता है।
अदत्त विक्रेता के अधिकारों का पूरा ढाँचा - अदत्त विक्रेता
       ┌────┴─────┐
       │                            │
वस्तु के विरुद्ध            क्रेता के विरुद्ध
   अधिकार                    अधिकार
┌──l─┐          l────l--------─l
Lien                 Resale Price  Stoppage        Damages  
                        Interest inTransit
बिक्री के निष्पादन से संबंधित विधि - विक्रय अनुबंध केवल स्वामित्व हस्तांतरण तक सीमित नहीं है। उसके निष्पादन (Performance of Contract of Sale) में - 
धारा 31 विक्रेता का कर्तव्य - वस्तु की डिलीवरी करना, और क्रेता का कर्तव्य है  वस्तु स्वीकार करना तथा कीमत देना।
धारा 32 भुगतान और डिलीवरी - जब तक विपरीत अनुबंध न हो Payment and delivery are concurrent conditions. अर्थात विक्रेता को माल देने के बदले क्रेता को कीमत देने के लिए तैयार रहना चाहिए और क्रेता को कीमत देने के बदले माल स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
डिलीवरी के प्रकार - 
1. वास्तविक डिलीवरी - वस्तु वास्तव में क्रेता को सौंप दी जाती है।
2. सांकेतिक/प्रतीकात्मक डिलीवरी - वस्तु स्वयं नहीं दी जाती, बल्कि उसका नियंत्रण दर्शाने वाली वस्तु दी जाती है।
उदाहरण - गोदाम की चाबी देना।
3. रचनात्मक डिलीवरी - बिना वास्तविक कब्जा बदले, कानूनन या पक्षकारों की सहमति से वस्तु का कब्जा क्रेता के पक्ष में माना जाता है।
धारा 37 गलत मात्रा में माल की डिलीवरी - यदि विक्रेता अनुबंध से कम या अधिक मात्रा में माल भेजता है, तो क्रेता को कुछ परिस्थितियों में माल अस्वीकार करने,पूरी मात्रा स्वीकार करने या अनुबंध के अनुसार उचित विकल्प अपनाने का अधिकार होता है। विशेष रूप से कम मात्रा की डिलीवरी पर क्रेता उसे स्वीकार कर सकता है, लेकिन भुगतान अनुबंध की दर के अनुसार करेगा।
धारा 38 किस्तों में डिलीवरी - जब अनुबंध में instalments द्वारा delivery का प्रावधान हो और किसी एक किस्त में दोष या उल्लंघन हो, तो किस्त अस्वीकार करना या पूरा अनुबंध समाप्त करना।अनुबंध की शर्तों तथा breach की गंभीरता पर निर्भर करता है।
धारा 39 Carrier को माल देना - विक्रेता यदि माल को carrier को क्रेता तक पहुँचाने के लिए देता है, तो कुछ परिस्थितियों में carrier को माल देना क्रेता को delivery माना जा सकता है।विक्रेता को उचित रूप से माल भेजना तथा आवश्यक परिस्थितियों में insurance आदि की व्यवस्था करना आवश्यक होता है।
धारा 42 क्रेता द्वारा माल स्वीकार करना - क्रेता द्वारा माल स्वीकार किया गया माना जा सकता है जब - 
1. वह विक्रेता को यह बता दे कि उसने माल स्वीकार कर लिया।
2. वह ऐसा कार्य करे जो विक्रेता के स्वामित्व के प्रतिकूल हो।
3. उचित समय तक माल अपने पास रखे और उसे अस्वीकार न करे।
धाराएँ - 
स्वामित्व का अंतरण - धारा 18–25
जोखिम - धारा 26
अनधिकृत व्यक्ति की बिक्री -धारा 27- 30
बिक्री का निष्पादन - धारा 31–44
अदत्त विक्रेता - धारा 45–54
विक्रेता के उपचार - धारा 55–61
18 - अनिश्चित वस्तु में स्वामित्व का अंतरण नहीं
19 - पक्षकारों की मंशा
20 - बिना शर्त निश्चित वस्तु
21 - वस्तु को डिलीवरी योग्य बनाने का कार्य
22 - तौल/माप/परीक्षण
23 - अनिश्चित वस्तुओं का appropriation
24 - Approval/Sale or Return
26 - Risk follows property
27 - Non-owner द्वारा बिक्री एवं exceptions
28 - Joint owner द्वारा बिक्री
29 - Voidable contract
30 - Seller/Buyer in possession
31- Seller एवं buyer के कर्तव्य
32 - Payment and delivery
37 - गलत मात्रा
38 - Instalment delivery
39 - Carrier को delivery
42 - Acceptance
45 Unpaid Seller
47 - Seller's lien
49 - Lien का समाप्त होना
50 - Stoppage in transit
52 - Stoppage की प्रक्रिया
54 - Resale
55 - Price के लिए suit
56 - Non-acceptance पर damages
61 - Interest
महत्वपूर्ण प्रश्न - 
(1) Nemo dat quod non habet के सिद्धांत और उसके अपवाद
(2) Lien तथा Stoppage in Transit में अंतर
(3) Unpaid Seller के अधिकार

साझेदारी का अर्थ, परिभाषा, साझेदारी की संविदा का सृजन, साझेदारी की संविदा विशेषताएँ, साझेदारों के प्रकार, साझेदारी के प्रकार, निम्नलिखित में अंतर:
(i) सह-स्वामित्व और साझेदारी
(ii) संयुक्त हिन्दू परिवार फर्म और साझेदारी
(iii) कंपनी और साझेदारी
(iv) अवयस्क की स्थिति
साझेदारों के पारस्परिक संबंध
साझेदारों एवं तृतीय पक्ष के बीच संबंध
साझेदारी फर्म का पंजीकरण
साझेदारी फर्म के अपंजीकरण का प्रभाव
फर्म का विघटन - 
साझेदारी (Partnership) - साझेदारी दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच ऐसा संविदात्मक संबंध है जिसमें वे किसी व्यवसाय के लाभ को आपस में बाँटने के लिए सहमत होते हैं और व्यवसाय सभी द्वारा या उनमें से किसी एक द्वारा सबके लिए चलाया जाता है। भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 की धारा 4 साझेदारी के अनुसार परिभाषा - साझेदारी उन व्यक्तियों के बीच संबंध है जिन्होंने किसी व्यवसाय के लाभों को बाँटने के लिए सहमति की है, जिसे सभी या उनमें से कोई एक, सभी के लिए कार्य करते हुए, चलाते हैं। इससे तीन मुख्य तत्व निकलते हैं - 
समझौता (Agreement) + व्यवसाय (Business) + पारस्परिक       अभिकरण (Mutual Agency) = साझेदारी (Partnership)।
साझेदारी की आवश्यक विशेषताएँ - 
(1) दो या अधिक व्यक्ति - साझेदारी के लिए कम-से-कम दो व्यक्ति आवश्यक हैं। वे व्यक्ति किसी व्यवसाय को साझेदारी के रूप में चलाने के लिए सक्षम होने चाहिए।
(2) साझेदारी संविदा से उत्पन्न होती है - धारा 5 के अनुसार साझेदारी स्थिति (status) से नहीं, बल्कि संविदा से उत्पन्न होती है। इसलिए केवल पारिवारिक संबंध के कारण साझेदारी नहीं बनती।
उदाहरण - दो भाई एक व्यवसाय में लगे हैं, लेकिन उन्होंने साझेदारी की संविदा नहीं की है, तो केवल भाई होने से वे साझेदार नहीं बन जाएंगे।
(3) व्यवसाय होना चाहिए - साझेदारी के लिए कोई व्यवसाय होना आवश्यक है।व्यवसाय में व्यापार, पेशा या occupation शामिल हो सकता है।
(4) लाभ बाँटने का समझौता - साझेदार व्यवसाय के लाभ को बाँटने के लिए सहमत होते हैं। लाभ बाँटने का अनुपात बराबर होना आवश्यक नहीं है।
उदाहरण - A = 50%, B = 30%, C = 20% फिर भी साझेदारी हो सकती है।
(5) Mutual Agency अर्थात पारस्परिक अभिकरण - यह साझेदारी का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक तत्व है। प्रत्येक साझेदार स्वयं व्यवसाय का agent है तथा अन्य साझेदारों का principal भी है। अर्थात् एक साझेदार द्वारा व्यवसाय के सामान्य क्रम में किया गया कार्य पूरी फर्म को बाध्य कर सकता है। इसमें Profit Sharing अकेले पर्याप्त नहीं है; Mutual Agency साझेदारी की असली पहचान है।
महत्वपूर्ण मामला - Cox v. Hickman (1860) में न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि केवल लाभ में हिस्सा लेना साझेदारी का निर्णायक प्रमाण नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या पारस्परिक अभिकरण मौजूद है।
साझेदारी की संविदा का सृजन - साझेदारी संविदा द्वारा बनती है। धारा 5 के अनुसार साझेदारी किसी status से उत्पन्न नहीं होती। आवश्यक शर्तें साझेदारी संविदा के लिए - 
1. सक्षम पक्षकार
2. स्वतंत्र सहमति
3. वैध प्रतिफल
4. वैध उद्देश्य
5. व्यवसाय
6. लाभ बाँटने की सहमति
7. Mutual Agency होना आवश्यक है।
लिखित या मौखिक साझेदारी की संविदा - मौखिक या लिखित हो सकती है। लेकिन व्यावहारिक रूप से लिखित Partnership Deed रखना अधिक सुरक्षित है।
Partnership Deed - साझेदारों के बीच लिखित समझौते को साझेदारी विलेख (Partnership Deed) कहते हैं। इसमें निम्न बातें होती हैं - 
1. फर्म का नाम
2. व्यवसाय का स्वरूप
3. व्यवसाय का स्थान
4. साझेदारों के नाम
5. पूंजी का योगदान
6. लाभ-हानि का अनुपात
7. साझेदारों का वेतन/पारिश्रमिक
8. पूंजी पर ब्याज
9. आहरण पर ब्याज
10. ऋण पर ब्याज
11. खातों का रखरखाव
12. नए साझेदार का प्रवेश
13. साझेदार के अवकाश/निवृत्ति की व्यवस्था
14. विवाद समाधान
15. विघटन की प्रक्रिया
साझेदारों के प्रकार - 
(1) सक्रिय साझेदार (Active Partner) - जो व्यवसाय के संचालन में सक्रिय रूप से भाग लेता है। इसे Working Partner भी कहा जाता है।
(2) सुप्त/निष्क्रिय साझेदार (Sleeping/Dormant Partner) - जो फर्म में पूंजी लगाता है और लाभ में हिस्सा लेता है, लेकिन दैनिक व्यवसाय में सक्रिय भाग नहीं लेता। फिर भी वह तृतीय पक्ष के प्रति साझेदारी की देयताओं के लिए उत्तरदायी होता है।
(3) नाममात्र साझेदार (Nominal Partner) - जो वास्तव में फर्म में व्यवसाय नहीं करता और लाभ में हिस्सा भी आवश्यक रूप से नहीं लेता, लेकिन अपना नाम फर्म को उपयोग करने देता है। वह तृतीय पक्ष के प्रति साझेदारी के दायित्वों के लिए उत्तरदायी हो सकता है।
(4) केवल लाभ का साझेदार - ऐसा साझेदार जो समझौते के अनुसार केवल लाभ में हिस्सा लेता है और हानि के संबंध में अलग व्यवस्था हो सकती है।
महत्वपूर्ण - बाहरी तृतीय पक्षों के प्रति दायित्व केवल आंतरिक समझौते से समाप्त नहीं हो जाता।
(5) उपांत साझेदार (Sub-partner) - धारा 29 के संदर्भ में यदि कोई साझेदार अपने साझेदारी हित में किसी तीसरे व्यक्ति को हिस्सा देता है, तो वह व्यक्ति Sub-partner हो सकता है। Sub-partner स्वतः फर्म का साझेदार नहीं बनता।
(6) आने वाला साझेदार (Incoming Partner) - नए व्यक्ति को मौजूदा साझेदारों की सहमति से फर्म में प्रवेश कराया जाता है।
(7) बाहर जाने वाला साझेदार (Outgoing Partner) - जो साझेदार  सेवानिवृत्त होता है, त्यागपत्र देता है या अन्य वैध तरीके से फर्म से निकलता है।
(8) Holding Out वाला व्यक्ति - धारा 28 के अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति अपने शब्दों या आचरण से स्वयं को साझेदार के रूप में प्रस्तुत करता है या ऐसा प्रतिनिधित्व होने देता है और कोई तृतीय पक्ष उस विश्वास पर कार्य करता है, तो वह उस तृतीय पक्ष के प्रति साझेदार के समान उत्तरदायी हो सकता है। इसे Doctrine of Holding Out कहते हैं।
साझेदारी के प्रकार - भारतीय साझेदारी अधिनियम में साझेदारी को मुख्यतः अवधि के आधार पर समझा जाता है।
(1) Partnership at Will धारा 7 - 
जहाँ साझेदारी की अवधि निर्धारित नहीं है और विघटन के संबंध में कोई निश्चित व्यवस्था नहीं है, वहाँ इसे Partnership at Will कहते हैं। ऐसी फर्म को कोई साझेदार लिखित नोटिस देकर भंग कर सकता है।
(2) Particular Partnership धारा 8 - जब साझेदारी किसी विशिष्ट कार्य या उपक्रम के लिए बनाई जाती है, तो उसे Particular Partnership कहते हैं।
उदाहरण - A और B किसी पुल के निर्माण का ठेका पूरा करने के लिए साझेदारी बनाते हैं। कार्य पूरा होने पर साझेदारी समाप्त हो सकती है।
(3) Fixed-Term Partnership - यदि साझेदारी निश्चित अवधि के लिए बनाई गई है, तो वह अवधि समाप्त होने पर साझेदारी समाप्त हो सकती है, जब तक साझेदारों की सहमति से आगे जारी न रखी जाए।
सह-स्वामित्व और साझेदारी में अंतर- 
आधार - सह-स्वामित्व - साझेदारी
आधार - विभिन्न तरीकों से उत्पन्न हो सकता है - संविदा से उत्पन्न
व्यवसाय - आवश्यक नहीं - व्यवसाय आवश्यक
लाभ - लाभ कमाना आवश्यक नहीं - लाभ बाँटना आवश्यक
Mutual Agency - नहीं - आवश्यक
प्रतिनिधित्व - प्रत्येक - सह-स्वामी आवश्यक रूप से दूसरे का agent नहीं प्रत्येक साझेदार दूसरे का agent
हस्तांतरण - सह-स्वामी अपना हित हस्तांतरित कर सकता है - साझेदारी हित के हस्तांतरण पर विशेष नियम
मृत्यु  - स्वतः साझेदारी जैसी व्यवस्था नहीं - साझेदारी पर प्रभाव पड़ सकता है
संबंध - संपत्ति का संयुक्त स्वामित्व - संविदात्मक संबंध
मुख्य अंतर - Co-ownership = Joint ownership
Partnership = Business + Profit + Mutual Agency
संयुक्त हिन्दू परिवार फर्म और साझेदारी में अंतर - 
आधार - संयुक्त हिन्दू परिवार - व्यवसाय साझेदारी
आधार - व्यक्तिगत विधि/पारिवारिक स्थिति - संविदा
सदस्यता - जन्म से - समझौते से
कर्ता - व्यवसाय चलाता है - साझेदार व्यवसाय चलाते हैं
Mutual Agency -  नहीं - आवश्यक
सदस्य बनने का तरीका - जन्म/पारिवारिक स्थिति - संविदा
महिला सदस्य - वर्तमान कानून के अनुसार coparcenary अधिकार संभव - संविदा के अनुसार साझेदार
नाबालिग - जन्म से coparcener हो सकता है - नाबालिग पूर्ण साझेदार नहीं
उत्तरदायित्व - कर्ता का दायित्व - विशेष प्रकृति का साझेदारों का दायित्व व्यापक
विघटन - HUF के नियमों के अनुसार - Partnership Act/Agreement के अनुसार 
मुख्य अंतर - HUF = Status से संबंध
Partnership = Contract से संबंध
कंपनी और साझेदारी में अंतर - 
आधार - कंपनी - साझेदारी
कानून - Companies Act - Partnership Act, 1932
पृथक विधिक व्यक्तित्व - कंपनी का अलग legal personality  - पारंपरिक साझेदारी में फर्म और साझेदारों का संबंध अलग प्रकृति का
निर्माण- incorporation द्वारा - agreement द्वारा
सदस्य - shareholders - partners
प्रबंधन - Board of Directors - साझेदार
उत्तरदायित्व - limited - unlimited
संपत्ति - कंपनी की अपनी संपत्ति - फर्म की संपत्ति साझेदारी व्यवस्था के अधीन
हित का हस्तांतरण - shares का हस्तांतरण संभव - नियमों के अधीन partnership interest का हस्तांतरण सीमित
मृत्यु - कंपनी समाप्त नहीं होती - मृत्यु से साझेदारी प्रभावित हो सकती है
निरंतरता - perpetual succession स्वतः - perpetual succession नहीं
पंजीकरण अनिवार्य - incorporation registration - वैकल्पिक, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण
संख्या - Companies Act के अनुसार - Partnership Act की सीमा/अन्य लागू कानूनों के अधीन
अवयस्क की स्थिति (Minor in Partnership) - धारा 30 के अनुसार -  अवयस्क स्वयं साझेदारी का पूर्ण साझेदार नहीं बन सकता। लेकिन सभी साझेदारों की सहमति से उसे partnership के benefits में admit किया जा सकता है।
अवयस्क के अधिकार - वह
1. फर्म के लाभ में हिस्सा ले सकता है।
2. फर्म की संपत्ति में अपने agreed share का अधिकार रखता है।
3. फर्म के खातों का निरीक्षण कर सकता है।
4. खातों की प्रतिलिपि प्राप्त कर सकता है।
5. निर्धारित समय पर वयस्क होने के बाद तय कर सकता है कि वह साझेदार बनना चाहता है या नहीं।
अवयस्क की देयता - अवयस्क की व्यक्तिगत संपत्ति साझेदारी के कार्यों के लिए उत्तरदायी नहीं होती। उसका केवल फर्म में हित उत्तरदायित्व के अधीन हो सकता है।
वयस्क होने के बाद - वयस्क होने के बाद उसे निर्धारित अवधि के भीतर सार्वजनिक सूचना देकर यह तय करना होता है कि वह साझेदार बनेगा या नहीं। यदि वह साझेदार बनने का चुनाव करता है तो वह अन्य साझेदारों के समान अधिकार एवं दायित्व प्राप्त करता है।
साझेदारों के पारस्परिक संबंध -  धारा 9 से 17 - 
(1) सद्भावना - धारा 9 के अनुसार साझेदारों को एक-दूसरे के प्रति सद्भावना रखनी चाहिए। फर्म के अधिकतम सामान्य लाभ के लिए कार्य करना चाहिए। सही खाते और पूरी जानकारी देनी चाहिए।
(2) फर्म का संचालन - प्रत्येक साझेदार को व्यवसाय के संचालन में भाग लेने का अधिकार है, जब तक संविदा में अन्यथा व्यवस्था न हो।
(3) बहुमत का निर्णय - सामान्य मामलों में साझेदारों के बीच निर्णय बहुमत से हो सकता है। लेकिन: व्यवसाय के स्वरूप में परिवर्तन के लिए सभी साझेदारों की सहमति आवश्यक है।
(4) पुस्तकों का निरीक्षण - प्रत्येक साझेदार को फर्म की पुस्तकों को देखने और उनकी प्रतिलिपि लेने का अधिकार है।
(5) पारिश्रमिक - सामान्य नियम के अनुसार साझेदार को व्यवसाय चलाने के लिए अलग से remuneration पाने का अधिकार नहीं होता, जब तक संविदा या प्रचलित व्यवहार में ऐसा प्रावधान न हो।
(6) लाभ और हानि - यदि साझेदारी संविदा में अन्यथा व्यवस्था नहीं है तो साझेदार लाभ बराबर बाँटेंगे।
(7) पूंजी पर ब्याज - साझेदार को पूंजी पर ब्याज केवल संविदा/प्रचलित व्यवस्था के अनुसार मिल सकता है और लाभ में से भुगतान से संबंधित वैधानिक नियम लागू होते हैं।
(8) फर्म को हुई क्षति - यदि कोई साझेदार जानबूझकर अपने कृत्य से फर्म को नुकसान पहुंचाता है तो उसे फर्म को क्षतिपूर्ति करनी पड़ सकती है।
(9) फर्म के अवसर का निजी लाभ - साझेदार फर्म के व्यवसाय, संपत्ति या व्यावसायिक संबंधों का उपयोग करके गुप्त व्यक्तिगत लाभ नहीं कमा सकता। यदि ऐसा करता है तो उसे वह लाभ फर्म को देना पड़ सकता है।
साझेदारों के अधिकार - 
1. व्यवसाय में भाग लेने का अधिकार।
2. व्यवसाय के संबंध में परामर्श का अधिकार।
3. फर्म की पुस्तकों का निरीक्षण।
4. लाभ में हिस्सा।
5. फर्म के लिए किए गए उचित खर्च की प्रतिपूर्ति।
6. फर्म के धन का उचित उपयोग।
7. साझेदारी संविदा के अनुसार पारिश्रमिक।
8. फर्म के विघटन के बाद संपत्ति के वितरण में हिस्सा।
साझेदारों के कर्तव्य - 
1. सद्भावना से कार्य करना।
2. फर्म का पूरा हिसाब देना।
3. सही जानकारी देना।
4. फर्म को नुकसान न पहुंचाना।
5. फर्म के हित के विरुद्ध गुप्त लाभ न कमाना।
6. फर्म की संपत्ति का निजी उपयोग न करना।
7. साझेदारी संविदा का पालन करना।
साझेदार एवं तृतीय पक्ष के बीच संबंध धारा 18 से 30 - साझेदार = फर्म का Agent, धारा 18 के अनुसार प्रत्येक साझेदार फर्म के व्यवसाय के प्रयोजन के लिए फर्म का agent है। यही Mutual Agency का सिद्धांत है।
साझेदार का implied authority - साझेदार के पास व्यवसाय के सामान्य क्रम में फर्म को बाध्य करने की निहित शक्ति होती है।
उदाहरण - A और B कपड़े का व्यवसाय करते हैं। A फर्म की ओर से कपड़े खरीदता है। सामान्य व्यापारिक परिस्थितियों में यह कार्य फर्म को बाध्य कर सकता है। लेकिन यदि A ऐसा कार्य करता है जो व्यवसाय के सामान्य क्रम से बाहर है, तो उसकी implied authority का प्रश्न अलग होगा।
साझेदार की व्यक्तिगत देयता धारा 25 - प्रत्येक साझेदार फर्म के कार्यों के लिए अन्य साझेदारों के साथ संयुक्त रूप से और उनके साथ पृथक रूप से भी उत्तरदायी होता है। अर्थात् partnership में सामान्यतः unlimited liability होती है।
फर्म के कार्यों के लिए उत्तरदायित्व - यदि साझेदार ने फर्म के सामान्य व्यवसाय के दौरान ऐसा कार्य किया जिससे तृतीय पक्ष को नुकसान हुआ, तो परिस्थितियों के अनुसार फर्म और साझेदार उत्तरदायी हो सकते हैं।
उदाहरण - A, B और C साझेदार हैं। A ने फर्म के व्यवसाय के दौरान लापरवाही की जिससे X को नुकसान हुआ। X परिस्थितियों के अनुसार फर्म और संबंधित साझेदारों के विरुद्ध दावा कर सकता है।
18. Holding Out धारा 28 - यदि कोई व्यक्ति स्वयं को साझेदार बताता है, या।अपने आचरण से दूसरों को ऐसा विश्वास होने देता है और कोई व्यक्ति उस विश्वास पर फर्म को credit देता है, तो वह व्यक्ति उस तृतीय पक्ष के प्रति साझेदार की तरह उत्तरदायी हो सकता है। इसे Holding Out कहते हैं।
साझेदार के अवकाश के बाद दायित्व - कोई साझेदार फर्म से निकलने के बाद भी तृतीय पक्ष के प्रति कुछ परिस्थितियों में उत्तरदायी रह सकता है, जब तक उसकी सेवानिवृत्ति की उचित सार्वजनिक सूचना न दी गई हो। यह नियम तृतीय पक्ष को भ्रम से बचाने के लिए है।
20. फर्म का पंजीकरण - भारतीय साझेदारी अधिनियम के अंतर्गत फर्म का registration अनिवार्य नहीं बल्कि वैकल्पिक है। लेकिन अपंजीकृत फर्म पर धारा 69 के कारण महत्वपूर्ण प्रतिबंध लगते हैं। इसलिए व्यवहार में पंजीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पंजीकरण की प्रक्रिया - धारा 58 के अनुसार Registrar of Firms के पास prescribed particulars और fee के साथ आवेदन किया जाता है। आवेदन में
1. फर्म का नाम
2. व्यवसाय का मुख्य स्थान
3. अन्य व्यवसायिक स्थान
4. प्रत्येक साझेदार का नाम और पता
5. प्रत्येक साझेदार के फर्म में शामिल होने की तारीख
6. फर्म की अवधि, यदि निश्चित हो आदि दिए जाते हैं।
Registrar संतुष्ट होने पर फर्म को Register of Firms में दर्ज करता है।
फर्म के पंजीकरण का महत्व - पंजीकरण से 
• फर्म अपने संविदात्मक अधिकारों के प्रवर्तन में अधिक सक्षम होती है।
• साझेदार अपने अधिकारों के लिए न्यायालय जा सकते हैं।
• तृतीय पक्षों के दावों का सामना करने और अधिकारों के enforcement में सुविधा होती है।
• फर्म की वैधानिक पहचान संबंधी रिकॉर्ड उपलब्ध रहता है।
अपंजीकृत फर्म के प्रभाव – धारा 69 - के अनुसार अपंजीकृत फर्म और उसके साझेदारों पर कुछ महत्वपूर्ण procedural restrictions लगते हैं।
(1) साझेदार द्वारा फर्म के विरुद्ध मुकदमा - अपंजीकृत फर्म का साझेदार सामान्यतः फर्म या किसी साझेदार के विरुद्ध संविदा से उत्पन्न अधिकार को लागू कराने के लिए न्यायालय में suit नहीं ला सकता।
(2) फर्म द्वारा तृतीय पक्ष के विरुद्ध मुकदमा - अपंजीकृत फर्म किसी तृतीय पक्ष के विरुद्ध संविदा से उत्पन्न अधिकार को लागू करने के लिए suit नहीं ला सकती।
(3) कुछ अपवाद - धारा 69 के प्रतिबंध पूर्ण नहीं हैं।
उदाहरण - 
• फर्म के विघटन के लिए suit
• dissolved firm के accounts के लिए
• dissolved firm की संपत्ति realization के लिए
• Insolvency संबंधी कुछ अधिकार
आदि मामलों में statutory exceptions लागू हो सकते हैं।
नोट - Unregistered Firm = अस्तित्व समाप्त नहीं, लेकिन Court में contractual rights enforce करने की क्षमता पर प्रतिबंध।
साझेदारी फर्म का विघटन (Dissolution of Firm) - धारा 39 के अनुसार सभी साझेदारों के बीच साझेदारी का संबंध समाप्त होना फर्म का विघटन कहलाता है। Dissolution of Partnership ≠ हमेशा Dissolution of Firm. एक साझेदार के retirement से साझेदारी का पुनर्गठन हो सकता है, जबकि पूरी फर्म का dissolution अलग घटना है।
फर्म के विघटन के प्रकार - 
(1) समझौते द्वारा विघटन - धारा 40  सभी साझेदारों की सहमति से फर्म को भंग किया जा सकता है।
(2) अनिवार्य विघटन - धारा 41- कुछ परिस्थितियों में फर्म का dissolution अनिवार्य हो सकता है। जैसे सभी साझेदार या सभी को छोड़कर एक दिवालिया हो जाएँ। ऐसा घटना घटे जिससे व्यवसाय करना गैर-कानूनी हो जाए।
कुछ घटनाओं पर विघटन – धारा 42 - निश्चित परिस्थितियों में, संविदा के अधीन रहते हुए, फर्म का विघटन हो सकता है - 
1. निश्चित अवधि समाप्त होना।
2. निश्चित undertaking पूरा होना।
3. किसी साझेदार की मृत्यु।
4. किसी साझेदार को insolvent घोषित किया जाना।
यदि partnership agreement में विपरीत व्यवस्था हो तो उसका प्रभाव देखा जाएगा।
Partnership at Will का विघटन – धारा 43 - Partnership at Will में कोई साझेदार अन्य सभी साझेदारों को लिखित नोटिस देकर फर्म भंग कर सकता है। नोटिस की तारीख से या उसमें निर्दिष्ट तारीख से dissolution प्रभावी होगा।
न्यायालय द्वारा विघटन – धारा 44 - न्यायालय निम्न परिस्थितियों में फर्म को भंग कर सकता है - 
(1) मानसिक अस्वस्थता - कोई साझेदार मानसिक रूप से अस्वस्थ हो जाए।
(2) स्थायी अक्षमता - कोई साझेदार स्थायी रूप से व्यवसाय करने में असमर्थ हो जाए।
(3) कदाचार - कोई साझेदार ऐसा आचरण करे जिससे व्यवसाय प्रभावित हो।
(4) समझौते का लगातार उल्लंघन - कोई साझेदार लगातार साझेदारी समझौते का उल्लंघन करे।
(5) हिस्से का हस्तांतरण - किसी साझेदार ने अपने पूरे हित को तीसरे व्यक्ति को हस्तांतरित कर दिया हो या ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई हो जो न्यायालय के हस्तक्षेप को उचित बनाए।
(6) व्यवसाय लगातार घाटे में हो - फर्म का व्यवसाय लगातार घाटे में चल रहा हो और उसके लाभ में चलने की संभावना न हो।
(7) न्यायसंगत और साम्यपूर्ण आधार - जहाँ परिस्थितियों में फर्म को भंग करना just and equitable हो।
विघटन के बाद फर्म की संपत्ति का निपटारा - धारा 46 के अनुसार dissolution के बाद प्रत्येक साझेदार को यह अधिकार है कि फर्म की संपत्ति का उपयोग - 
1. फर्म के ऋण चुकाने में
2. साझेदारों के दायित्व निपटाने में
3. बची हुई राशि साझेदारों में बाँटने में  किया जाए।
संपत्ति वितरण का क्रम - विघटन के बाद सामान्य क्रम - 
फर्म की संपत्ति → बाहरी ऋणदाता → साझेदारों के advances → पूंजी → बची राशि लाभ-विभाजन अनुपात में
धाराएँ - 
धारा 4 साझेदारी की परिभाषा
धारा 5 Partnership by contract, not status
धारा 6 साझेदारी के अस्तित्व का निर्धारण
धारा 7 Partnership at Will
धारा 8 Particular Partnership
धारा 9 साझेदारों के सामान्य कर्तव्य
धारा 10 धोखाधड़ी से हुई क्षति की क्षतिपूर्ति
धारा 11 साझेदारों के अधिकार/कर्तव्य संविदा द्वारा
धारा 12 व्यवसाय के संचालन में साझेदारों के अधिकार
धारा 13 लाभ-हानि, ब्याज आदि
धारा 14 Firm Property
धारा 16 निजी लाभ के लिए जवाबदेही
धारा 18 साझेदार फर्म का agent
धारा 19 Implied Authority
धारा 25 साझेदारों की liability
धारा 27 Firm के कार्यों के लिए liability
धारा 28 Holding Out
धारा 29 Transfer of partner's interest
धारा 30 Minor admitted to benefits
धारा 31 Incoming Partner
धारा 32 Retirement of Partner
धारा 33 Expulsion
धारा 34 Insolvency
धारा 35 Death
धारा 36 Outgoing Partner के अधिकार
धारा 39 Dissolution of Firm
धारा 40 Dissolution by agreement
धारा 41 Compulsory dissolution
धारा 42 Certain contingencies
धारा 43 Partnership at Will
धारा 44 Dissolution by Court
धारा 46 Dissolution के बाद अधिकार
धारा 48 Accounts settlement
धारा 58 Registration
धारा 59 Registration का प्रभाव
धारा 69 Non-registration का प्रभाव
निष्कर्ष - साझेदारी मूलतः संविदात्मक व्यवसायिक संबंध है। इसकी पहचान केवल लाभ बाँटने से नहीं बल्कि Mutual Agency से होती है। साझेदार एक-दूसरे के agent होते हैं और फर्म के सामान्य व्यवसाय में किए गए कार्यों से तृतीय पक्षों के प्रति फर्म तथा साझेदारों पर दायित्व उत्पन्न हो सकता है।
भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 साझेदारों के पारस्परिक अधिकार एवं कर्तव्य, तृतीय पक्षों के प्रति दायित्व, नाबालिग की स्थिति, फर्म के पंजीकरण तथा विघटन को व्यवस्थित करता है।
संविदा → व्यवसाय → लाभ → Mutual Agency → साझेदार → तृतीय पक्ष → पंजीकरण → विघटन

सीमित दायित्व वाली साझेदारी अधिनियम, (Limited Liability Partnership Act, 2008) संशोधन अधिनियम, 2021 सहित सीमित दायित्व वाली साझेदारी की आवश्यकता, महत्व, उद्देश्य, परिभाषा, अवधारणा, अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ एवं न्यायिक प्रतिक्रियाएँ/न्यायिक दृष्टिकोण -
सीमित दायित्व वाली साझेदारी परिचय - Limited Liability Partnership (LLP) व्यापारिक संगठन का ऐसा रूप है जिसमें साझेदारी की लचीलापन और कंपनी की सीमित दायित्व व्यवस्था दोनों का समन्वय होता है। पारंपरिक साझेदारी में प्रत्येक साझेदार का दायित्व व्यापक हो सकता है, जबकि LLP में साझेदार का दायित्व उसके सहमति किए गए योगदान (contribution) तक सीमित रहता है।भारत में LLP को विधिक रूप देने के लिए Limited Liability Partnership Act, 2008 बनाया गया। यह अधिनियम 31 मार्च 2009 से प्रभावी हुआ।
सरल सूत्र - LLP = Partnership का Flexibility + Company की Limited Liability
LLP की आवश्यकता - 
(1) साझेदारी की सीमाओं को दूर करना - पारंपरिक साझेदारी में साझेदारों की व्यक्तिगत संपत्ति पर भी व्यावसायिक दायित्व का प्रभाव पड़ सकता था। LLP ने इस जोखिम को काफी हद तक सीमित किया।
(2) छोटे एवं मध्यम व्यवसायों के लिए उपयुक्त संरचना - हर व्यवसाय को कंपनी के रूप में स्थापित करना आवश्यक या सुविधाजनक नहीं होता। LLP ने व्यवसायों को एक अपेक्षाकृत सरल वैधानिक संरचना दी।
(3) पेशेवर संस्थाओं की आवश्यकता - वकील, चार्टर्ड अकाउंटेंट, कंपनी सचिव, सलाहकार आदि पेशेवरों के लिए ऐसी संरचना उपयोगी थी जिसमें साझेदारी का लचीलापन और सीमित दायित्व दोनों हों।
(4) अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक व्यवस्था के अनुरूप बनना - विश्व के अनेक देशों में LLP जैसी संस्थाएँ पहले से प्रचलित थीं। भारत में भी आधुनिक व्यावसायिक आवश्यकताओं के अनुरूप ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता थी।
(5) साझेदारों के व्यक्तिगत जोखिम को सीमित करना - व्यवसाय में होने वाले सामान्य ऋण एवं दायित्वों के लिए प्रत्येक साझेदार की व्यक्तिगत संपत्ति को स्वतः जोखिम में डालना उचित नहीं माना गया।
LLP का महत्व - 
(A) सीमित दायित्व - LLP की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि साझेदार का दायित्व उसके agreed contribution तक सीमित रहता है।
(B) पृथक विधिक व्यक्तित्व - LLP अपने साझेदारों से अलग एक separate legal entity है। इसलिए LLP - 
• अपने नाम से संपत्ति रख सकती है।
• अपने नाम से अनुबंध कर सकती है।
• मुकदमा कर सकती है।
• उसके विरुद्ध मुकदमा किया जा सकता है।
(C) निरंतर उत्तराधिकार - साझेदार की मृत्यु, सेवानिवृत्ति या परिवर्तन से LLP स्वतः समाप्त नहीं होती। इसे perpetual succession कहते हैं।
(D) प्रबंधन में लचीलापन - कंपनी की तुलना में LLP का आंतरिक प्रबंधन अधिक लचीला होता है।
(E) साझेदारी और कंपनी का मिश्रित स्वरूप - LLP ने दो अलग-अलग व्यापारिक मॉडलों को जोड़ा 
साझेदारी - कंपनी - 
लचीलापन - सीमित दायित्व
संविदात्मक संबंध - पृथक विधिक व्यक्तित्व
सरल आंतरिक प्रबंधन - perpetual succession
साझेदार आधारित व्यवस्था - संगठनात्मक स्वतंत्रता
LLP इन दोनों की उपयोगी विशेषताओं का संयोजन है।
LLP Act, 2008 के उद्देश्य - 
1. व्यापार के लिए वैकल्पिक संगठनात्मक संरचना प्रदान करना।
2. साझेदारों को सीमित दायित्व उपलब्ध कराना।
3. व्यवसाय के प्रबंधन में लचीलापन बनाए रखना।
4. LLP को पृथक विधिक व्यक्तित्व देना।
5. पेशेवर सेवाओं और छोटे-मध्यम उद्यमों के लिए उपयुक्त संरचना उपलब्ध कराना।
6. साझेदारी व्यवसाय को आधुनिक कॉर्पोरेट व्यवस्था के अनुरूप बनाना।
7. व्यवसाय में उद्यमिता एवं निवेश को प्रोत्साहित करना।
8. पारंपरिक साझेदारी और कंपनी के बीच एक वैकल्पिक मॉडल उपलब्ध कराना।
LLP Act, 2008 की धारा 2(1)(n) के अनुसार परिभाषा - Limited Liability Partnership” का अर्थ है इस अधिनियम के अधीन गठित और registered limited liability partnership अर्थात LLP वह विधिक व्यावसायिक इकाई है जो LLP Act के अनुसार गठित एवं पंजीकृत होती है।
Partnership की परिभाषा से संबंध - भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 की धारा 4 के अनुसार साझेदारी उन व्यक्तियों के बीच संबंध है जिन्होंने किसी व्यवसाय के लाभ को बाँटने के लिए सहमति दी हो और व्यवसाय सभी या उनमें से किसी एक द्वारा सभी के लिए चलाया जाता हो। 
LLP में भी साझेदारों के बीच संविदात्मक संबंध रहता है, लेकिन LLP स्वयं एक अलग विधिक व्यक्ति होती है।
LLP की अवधारणा - LLP की अवधारणा को समझने के लिए तीन तत्व महत्वपूर्ण हैं - 
1. Separate Legal Entity - LLP साझेदारों से अलग है।
2. Limited Liability - साझेदार LLP के दायित्वों के लिए व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी नहीं होते।
3. Mutual Agency - का सीमित प्रभाव
पारंपरिक साझेदारी में प्रत्येक साझेदार अन्य साझेदारों का agent होता है। LLP में किसी साझेदार का कार्य दूसरे साझेदारों को केवल साझेदार होने के आधार पर व्यक्तिगत रूप से बाध्य नहीं करता। यही LLP और पारंपरिक partnership के बीच मूल अंतर है।
7. LLP की विशेषताएं - 
अ. पृथक विधिक व्यक्तित्व - धारा 3 के अनुसार LLP एक body corporate है।
• अपने partners से पृथक legal entity है।
• perpetual succession रखती है।
अर्थात साझेदार बदलने से LLP का अस्तित्व समाप्त नहीं होता।
ब. (A)न्यूनतम साझेदार - LLP बनाने के लिए कम से कम दो साझेदार आवश्यक हैं। यदि साझेदारों की संख्या घटकर एक हो जाए तो अधिनियम में निर्धारित अवधि एवं परिस्थितियों के अनुसार उसके परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं।
(B) Designated Partners - LLP में कम से कम दो designated partners होने चाहिए। उनमें से कम से कम एक ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो अधिनियम में निर्धारित residence requirement के अनुसार भारत में resident हो।
Designated partners LLP की statutory compliance के लिए विशेष रूप से उत्तरदायी होते हैं।
LLP Agreement - LLP के साझेदारों के पारस्परिक अधिकार और कर्तव्य LLP Agreement द्वारा निर्धारित होते हैं।Agreement में  - 
• लाभ का विभाजन
• पूंजी योगदान
• प्रबंधन
• साझेदारों के अधिकार
• साझेदारों के कर्तव्य
• निर्णय लेने की प्रक्रिया
• नए साझेदार के प्रवेश की व्यवस्था
• साझेदार की retirement
• विवाद समाधान
यदि किसी विषय पर agreement में व्यवस्था नहीं है तो First Schedule लागू होती है।
सीमित दायित्व के सामान्य नियम - किसी साझेदार की liability केवल इसलिए व्यक्तिगत नहीं हो जाती कि वह LLP का साझेदार है।
उदाहरण - A और B LLP के साझेदार हैं। LLP पर ₹20 लाख का व्यावसायिक ऋण है। सिर्फ साझेदार होने के कारण A की व्यक्तिगत संपत्ति से उस ऋण की वसूली नहीं की जाएगी। लेकिन यदि A ने स्वयं कोई व्यक्तिगत guarantee दी है, तो परिस्थितियों के अनुसार उसका व्यक्तिगत दायित्व उत्पन्न हो सकता है।
साझेदार का wrongful act - LLP में प्रत्येक साझेदार LLP का agent होता है, लेकिन दूसरे साझेदारों का agent नहीं।यदि कोई साझेदार अपने wrongful act या omission से किसी व्यक्ति को नुकसान पहुँचाता है तो परिस्थितियों के अनुसार LLP की liability उत्पन्न हो सकती है। लेकिन केवल साझेदार होने के कारण अन्य साझेदार व्यक्तिगत रूप से liable नहीं होते।
Fraud की स्थिति में सीमित दायित्व समाप्त हो सकता है - यदि किसी साझेदार ने fraud किया या fraud के उद्देश्य से कार्य किया, तो सीमित दायित्व का संरक्षण उपलब्ध नहीं रहेगा।
सिद्धांत - Limited Liability ≠ Protection for Fraud अर्थात कानून ईमानदार व्यावसायिक जोखिम को सीमित करता है, धोखाधड़ी को नहीं।
LLP में संपत्ति - LLP अपने नाम से
• movable property
• immovable property
• tangible property
• intangible property रख सकती है।
परन्तु यह संपत्ति LLP की संपत्ति होगी, साझेदारों की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं।इसलिए LLP की संपत्ति और साझेदारों की व्यक्तिगत संपत्ति अलग रहती है।
Perpetual Succession - LLP में साझेदार के मृत्यु, retirement,  resignation, insolvency, admission से LLP स्वतः समाप्त नहीं होती। यह perpetual succession का सिद्धांत है।
LLP और Partnership में अंतर

आधार - Partnership Firm - LLP
कानून - Partnership Act, 1932 - LLP Act, 2008
विधिक व्यक्तित्व - पृथक legal entity नहीं - पृथक legal entity
दायित्व - साझेदारों का दायित्व व्यापक हो सकता है - सीमित दायित्व 
Perpetual succession - नहीं - हाँ
संपत्ति - फर्म की अवधारणा अलग - LLP की अपनी संपत्ति
Compliance - अपेक्षाकृत कम वैधानिक - compliance अधिक
Agency - प्रत्येक partner firm तथा partners का agent - partner LLP का agent, दूसरे partners का नहीं
Fraud - सामान्य partnership principles - fraud पर limited liability protection समाप्त हो सकती है
LLP और Company में अंतर - 
आधार - LLP - Company
कानून - LLP Act, 2008 - Companies Act, 2013
स्वामित्व - Partners Members/shareholders
- प्रबंधन Partners/Agreement Board of Directors
आंतरिक संरचना - अधिक लचीली - अधिक statutory
पूंजी व्यवस्था - contribution share capital आदि
compliance - अपेक्षाकृत कम - अधिक
लाभ वितरण Agreement के अनुसार - corporate rules के अनुसार
उपयुक्तता - professional/small-medium businesses - बड़े corporate ventures
LLP में साझेदार की स्थिति - LLP में साझेदार 
1. LLP का agent होता है।
2. दूसरे partners का agent नहीं होता।
3. LLP Agreement के अनुसार अधिकार एवं दायित्व रखता है।
4. LLP के व्यवसाय में योगदान करता है।
5. निर्धारित statutory duties का पालन करता है।
LLP में contribution - साझेदार LLP में contribution कर सकते हैं - 
• money
• tangible property
• movable/immovable property
• intangible property
• अन्य लाभ या services
अर्थात contribution केवल नकद धन तक सीमित नहीं है।
विदेशी निवेश और LLP - LLP आधुनिक निवेश व्यवस्था का हिस्सा है। निर्धारित कानूनों एवं विदेशी निवेश नीति के अधीन विदेशी निवेश LLP में किया जा सकता है। इससे LLP का उपयोग अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं निवेश के लिए भी संभव हुआ है।
LLP Act, 2008 की प्रमुख संरचना - अधिनियम में मुख्यतः निम्न विषयों की व्यवस्था है  - 
1. LLP का गठन
2. Partners
3. Designated Partners
4. Partners के संबंध
5. Contribution
6. Financial disclosures
7. Accounts एवं audit
8. Annual Return
9. Investigation
10. Conversion
11. Compromise/arrangement
12. Winding up
13. Penalties
14. Offences
15. Adjudication
LLP (Amendment) Act, 2021 - 
Limited Liability Partnership (Amendment) Act, 2021 ने LLP व्यवस्था में कुछ सुधार किए। इसका प्रमुख उद्देश्य LLP को अधिक business-friendly, compliance-friendly और छोटे व्यवसायों हेतु उपयोगी बनाना था।
प्रमुख संशोधन - 
(1) Small LLP की अवधारणा - 2021 संशोधन ने Small Limited Liability Partnership की अवधारणा को मजबूत किया। इसका उद्देश्य छोटे व्यवसायों को अपेक्षाकृत सरल regulatory framework देना था।
(2) Start-up LLP की अवधारणा - 2021 संशोधन में Start-up LLP की अवधारणा से संबंधित व्यवस्था लाई गई। इसका उद्देश्य नए एवं उभरते व्यवसायों को regulatory burden कम करके प्रोत्साहित करना था।
(3) अपराधों का Decriminalisation - 2021 Amendment का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य था कम गंभीर procedural/compliance defaults को criminal offences के रूप में देखने की बजाय civil penalties/adjudication की दिशा में ले जाना। इससे व्यापार करने की सरलता अर्थात Ease of Doing Business को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया।
(4). Compounding of offences  संशोधन ने कुछ अपराधों के compounding की व्यवस्था को अधिक व्यावहारिक बनाया। इसका अर्थ है कि निर्धारित परिस्थितियों में मुकदमे की लंबी प्रक्रिया के स्थान पर कानून के अनुसार निर्धारित राशि/प्रक्रिया द्वारा अपराध का निपटारा किया जा सके।
(5). Special Courts - 2021 संशोधन के अंतर्गत LLP Act से संबंधित कुछ मामलों के त्वरित निपटारे के लिए Special Courts की व्यवस्था की गई।इसका उद्देश्य था 
• litigation कम करना
• compliance disputes का शीघ्र निपटारा
• न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावी बनाना
(6). Adjudicating Officers - कुछ contraventions के लिए adjudicating officers की व्यवस्था महत्वपूर्ण बनाई गई। इससे प्रत्येक procedural default को criminal prosecution में ले जाने की आवश्यकता कम होती है।
(7). Penalties का पुनर्गठन - 2021 Amendment ने कई compliance-related offences एवं penalties की संरचना में परिवर्तन किया।
विशेष रूप से उद्देश्य था छोटे procedural defaults के लिए अत्यधिक criminal consequences को कम करना।
(8). Conversion को सरल बनाना - संशोधन के बाद LLP structure को छोटे व्यवसायों एवं start-ups के लिए अधिक आकर्षक बनाने का प्रयास किया गया। LLP में विभिन्न organizational forms से conversion की व्यवस्था पहले से मौजूद थी, जिसे व्यावसायिक सुविधा के दृष्टिकोण से आगे विकसित किया गया।
न्यायिक दृष्टिकोण - LLP पर भारतीय न्यायपालिका का दृष्टिकोण मुख्यतः निम्न सिद्धांतों के आसपास विकसित हुआ है - 
(1) LLP एक अलग विधिक व्यक्ति है - न्यायालय LLP की पहचान उसके साझेदारों से अलग मानते हैं। इसलिए LLP की संपत्ति और साझेदार की व्यक्तिगत संपत्ति अलग-अलग मानी जाती है।
(2) Limited Liability का सम्मान - सिर्फ LLP का साझेदार होने के आधार पर किसी व्यक्ति को LLP के प्रत्येक ऋण के लिए व्यक्तिगत रूप से liable नहीं बनाया जा सकता।
(3) Fraud exception - जहाँ साझेदार व्यक्तिगत रूप से fraud करता है, वहाँ limited liability की आड़ उपलब्ध नहीं हो सकती।
(4) LLP Agreement का महत्व -  न्यायिक दृष्टिकोण में partners के आपसी अधिकार एवं दायित्व निर्धारित करने में LLP Agreement का प्रमुख महत्व है।
(5) Corporate personality के सिद्धांतों का प्रभाव - यद्यपि LLP कंपनी नहीं है, फिर भी इसकी separate legal personality और perpetual succession जैसी विशेषताएँ corporate law के सिद्धांतों से साम्य रखती हैं।
(6). Judicial Approach का मूल सिद्धांत - LLP के संबंध में न्यायिक दृष्टिकोण यह साझेदारों से पृथक विधिक व्यक्ति है, लेकिन साझेदार अपने स्वयं के दोषपूर्ण कार्य एवं धोखाधड़ी के लिए उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं होते।
LLP की सीमाएँ - LLP के अनेक लाभ हैं, लेकिन कुछ सीमाएँ भी हैं - 
1. प्रत्येक व्यवसाय के लिए LLP उपयुक्त नहीं।
2. statutory compliance आवश्यक है।
3. public company की तरह व्यापक public capital raising व्यवस्था नहीं।
4. कुछ क्षेत्रों में sector-specific restrictions हो सकती हैं।
5. साझेदारों के बीच विवाद LLP के संचालन को प्रभावित कर सकते हैं।
6. fraud की स्थिति में limited liability protection कमजोर पड़ती है।
7. बड़े पूंजी-आधारित corporate ventures के लिए company structure अधिक उपयुक्त हो सकता है।
LLP का व्यावहारिक महत्व - यह विशेष रूप से उपयोगी है - 
• Law firms
• CA/CS/CMA firms
• Consultancy
• Professional services
• Start-ups
• Small businesses
• Family businesses
• Technology ventures
• Joint professional ventures
अर्थात जहाँ लचीलापन + सीमित दायित्व दोनों आवश्यक हों, वहाँ LLP प्रभावी विकल्प बनती है।
निष्कर्ष - सीमित दायित्व वाली साझेदारी अधिनियम, 2008 ने भारतीय व्यापारिक विधि में एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक संगठनात्मक संरचना प्रस्तुत की। LLP ने पारंपरिक साझेदारी की contractual flexibility को limited liability तथा separate legal personality जैसी विशेषताओं के साथ जोड़ा। इसके कारण छोटे एवं मध्यम उद्यमों तथा पेशेवर संस्थाओं के लिए यह महत्वपूर्ण संगठनात्मक विकल्प बना। 2021 का संशोधन विशेष रूप से ease of doing business, छोटे LLP एवं start-ups को प्रोत्साहन, procedural defaults के decriminalisation, adjudication और compliance burden को तर्कसंगत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था।
LLP = 5 मुख्य बातें SLFPA 
S – Separate Legal Entity
L – Limited Liability
F – Flexibility
P – Perpetual Succession
A – Agreement-based Management
और 2021 Amendment = 
Small LLP + Start-up + Decriminalisation + Adjudication + Special Courts + Ease of Doing Business
*********************************
शमशेर भालू खां 
विधि छात्र सेमेस्टर द्वितीय 
राजकीय विधि महाविद्यालय, चूरू 
9587243963

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शायर का ताअरूफ -  नाम - शमशेर खान  उपनाम - प्रेम, शमशेर गांधी तखल्लुस - पहले परवाना नाम से लिखना शुरू किया। पत्नी अख्तर बानो (सदफ) के सुझाव पर जिगर चूरूवी नाम से लिखना शुरू किया। पैदाइश - 18.04.1978 सहजूसर, चूरू (राजस्थान) पिता का नाम - श्री भालू खां (पूर्व विधायक (1980 से 1985), चूरू। माता का नाम - सलामन बानो (गृहणी) ताअलिम -  1. रामावि सहजूसर में पहली कक्षा में दाखिला 10.07.1984 से 1993 में मेट्रिक तक। 2. राउमावि बागला, चूरू से हेयर सेकंडरी 1993 से 1995 तक 3. राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय भाषाई अल्पसंख्यक अजमेर से BSTC, 1995 से 1997 4. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में स्नातक 1998 से 2001 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय, अजमेर) 5. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में अधिस्नातक 2004 से 2005 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय बीकानेर से गोल्ड मेडलिस्ट - 2005 उर्दू साहित्य) 6. कश्मीर विश्वविद्याल, श्रीनगर के नंद ऋषि शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय से B.Ed.- (2007 - 8) 7. इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय से विशेष आवश्यकता विद्यार्...

महाराज पृथ्वीराज चौहान की वंशावली

चौहान वंश के महान सम्राट पृथ्वीराज चौहान को अन्य जातियों द्वारा उनके वंशज होने का अनेक क्षेत्रों में विवाद पैदा कर रहे है। अतः पृथ्वीराज चौहान की वंशावलि राजस्थान के महान लेखक इतिहासकार संत श्री कान्हाराम की पुस्तक पेज संख्या 76,77,78 व दशरथ शर्मा की पुस्तक Early Chauhan Dynasties", pp.109 का संदर्भ लिया गया है। संत श्री कान्हाराम[4] ने लिखा है कि.... [पृष्ठ-76]: ईसा की दसवीं सदी में प्रतिहारों के कमजोर पड़ने पर प्राचीन क्षत्रिय नागवंश की चौहान शाखा शक्तिशाली बनकर उभरी। अहिच्छत्रपुर (नागौर) तथा शाकंभरी (सांभर) चौहनों के मुख्य स्थान थे। चौहनों ने 200 वर्ष तक अरबों, तुर्कों, गौरी, गजनवी को भारत में नहीं घुसने दिया। चौहनों की ददरेवा (चुरू) शाखा के शासक जीवराज चौहान के पुत्र गोगा ने नवीं सदी के अंत में महमूद गजनवी की फौजों के छक्के छुड़ा दिये थे। गोगा का युद्ध कौशल देखकर महमूद गजनवी के मुंह से सहसा निकल पड़ा कि यह तो जाहरपीर (अचानक गायब और प्रकट होने वाला) है। महमूद गजनवी की फौजें समाप्त हुई और उसको उल्टे पैर लौटना पड़ा। दुर्भाग्यवश गोगा का बलिदान हो गया। गोगाजी के बलिदान दिवस भाद्रपद...

👤 शमशेर भालू खान

📍 कायमखानी बस्ती सहजुसर ,चूरू राजस्थान Pin :-331001

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