डॉ.भीमराव अम्बेडकर विधि विश्वविद्यालय,
अनुच्छेद 243P से 243ZG नगरपालिकाएँ -
अनुच्छेद 244 से 244A अनुसूचित एवं जनजातीय क्षेत्र -
अनुच्छेद 245 से 255: संघ और राज्यों के विधायी संबंध -
अनुच्छेद 256 से 263 संघ और राज्यों के प्रशासनिक संबंध -
अनुच्छेद 264 से 300A वित्त, संपत्ति, संविदाएँ और वाद -
जयपुर
पाठ्यक्रम
संवैधानिक विधि-(Constitutional Law-II)
(प्रश्न-पत्र संख्या 2.2)
इकाई-I
संघ एवं राज्य की कार्यपालिका
1.1 कार्यपालिका की शक्तियों की प्रकृति, क्षेत्र एवं विस्तार -
A.कार्यपालिका शक्ति की प्रकृति
B.कार्यपालिका शक्ति का क्षेत्र
C.कार्यपालिका शक्तियों का विस्तार
1.2 भारत के राष्ट्रपति -
A.राष्ट्रपति की योग्यताएँ
B.राष्ट्रपति का निर्वाचन
C.राष्ट्रपति पर महाभियोग
D.राष्ट्रपति की शक्तियाँ
1.3 राष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति एवं मंत्रिपरिषद से संबंध -
A.राष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति
B.राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद के बीच संबंध
C.मंत्रिपरिषद की सलाह की संवैधानिक स्थिति
1.4 राज्यपाल -
A.राज्यपाल की योग्यताएँ
B.राज्यपाल की शक्तियाँ
C.राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति
E.राज्यपाल और मंत्रिपरिषद के बीच संबंध
1.5 भारत के उपराष्ट्रपति एवं भारत के महान्यायवादी है -
A.उपराष्ट्रपति का पद एवं कार्य
B.उपराष्ट्रपति का निर्वाचन एवं कार्यकाल
भारत के महान्यायवादी का पद
C.महान्यायवादी की नियुक्ति, शक्तियाँ एवं कर्तव्य
इकाई-II
संसद एवं राज्य विधानमंडल -
2.1 संसद का गठन, योग्यताएँ एवं विधायी प्रक्रिया
A.संसद की संरचना एवं गठन
B.संसद के सदस्यों की योग्यताएँ
C.संसद की विधायी प्रक्रिया
D.विधेयकों का निर्माण एवं पारित किया जाना
2.2 राज्य विधानमंडल
A.राज्य विधानमंडल की संरचना
B.सदस्यों की योग्यताएँ
C.राज्य विधानमंडल की विधायी प्रक्रिया
2.3 कार्य-संचालन एवं वित्तीय मामलों की प्रक्रिया
A.संसद एवं राज्य विधानमंडल में कार्य-संचालन
B.सदन की कार्यवाही
C.वित्तीय मामलों से संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया
D.धन विधेयक एवं वित्त विधेयक
2.4 सदस्यों की निरर्हता एवं दसवीं अनुसूची
A.संसद एवं राज्य विधानमंडल के सदस्यों की निरर्हता
B.दलबदल विरोधी कानून
C.संविधान की दसवीं अनुसूची
D.दलबदल के आधार पर सदस्यता की समाप्ति
2.5 विधायी विशेषाधिकार -
A.संसद के विशेषाधिकार
B.राज्य विधानमंडल के विशेषाधिकार
C.सदस्यों के विशेषाधिकार
D.विशेषाधिकारों का उद्देश्य एवं सीमा
इकाई-III
संघ न्यायपालिका, उच्च न्यायालय एवं अधीनस्थ न्यायालय
3.1 संघ न्यायपालिका एवं उच्च न्यायालय
A.संघ न्यायपालिका की संरचना
B.उच्च न्यायालयों की संरचना
C.संघ न्यायपालिका एवं उच्च न्यायालयों की संवैधानिक स्थिति
3.2 सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों की स्थापना, गठन तथा न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं पद से हटाना
A.सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना
B.सर्वोच्च न्यायालय का गठन
C.उच्च न्यायालयों की स्थापना एवं गठन
न्यायाधीशों की नियुक्ति
D.न्यायाधीशों की पदावधि
E.न्यायाधीशों को पद से हटाने की प्रक्रिया
3.3 सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों का क्षेत्राधिकार
A.सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार
B.उच्च न्यायालयों का क्षेत्राधिकार
C.मूल क्षेत्राधिकार
D.अपीलीय क्षेत्राधिकार
E.रिट क्षेत्राधिकार
F.परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार
G.न्यायिक पुनरावलोकन का क्षेत्र
3.4 न्यायपालिका की स्वतंत्रता
A.न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ
B.न्यायिक स्वतंत्रता के संवैधानिक आधार
C.न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं पद की सुरक्षा
D.न्यायिक स्वतंत्रता की आवश्यकता एवं महत्व
3.5 अधीनस्थ न्यायालय
A.अधीनस्थ न्यायालयों की संरचना
B.जिला एवं अधीनस्थ न्यायालय
C.अधीनस्थ न्यायालयों पर उच्च न्यायालय का नियंत्रण
D.अधीनस्थ न्यायपालिका की संवैधानिक स्थिति
इकाई-III
3.6 न्यायिक सक्रियता, न्यायिक अतिक्रमण, न्यायिक आत्म-संयम एवं जनहित याचिका
A.न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism)
B.न्यायिक अतिक्रमण (Judicial Overreach)
C.न्यायिक आत्म-संयम (Judicial Self-Restraint)
D.जनहित याचिका (Public Interest Litigation - PIL)
इकाई-IV
संघीय संबंध एवं सेवाएँ
(Federal Relations and Services)
4.1 संघ एवं राज्यों के बीच विधायी, प्रशासनिक एवं वित्तीय संबंध
A.विधायी संबंध (Legislative Relations)
B.प्रशासनिक संबंध (Administrative Relations)
C.वित्तीय संबंध (Financial Relations)
D.संघ एवं राज्य विधानमंडलों के बीच शक्तियों का विभाजन
E.संघ एवं राज्यों के बीच प्रशासनिक शक्तियों का वितरण
F.संघ एवं राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों एवं दायित्वों का विभाजन
4.2 आपातकालीन उपबंध
(Emergency Provisions)
A.राष्ट्रीय आपातकाल
B.राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता से C.संबंधित आपातकाल
D.वित्तीय आपातकाल
E.आपातकाल का मौलिक अधिकारों एवं G.संघ-राज्य संबंधों पर प्रभाव
4.3 संविधान का संशोधन
(Amendment of Constitution)
A.संविधान संशोधन की आवश्यकता एवं महत्व
B.संविधान संशोधन की प्रक्रिया
C.संसद की संविधान संशोधन शक्ति
D.संविधान संशोधन की सीमाएँ
E.मूल संरचना का सिद्धांत (Basic Structure Doctrine)
F.संविधान संशोधन एवं न्यायिक पुनरावलोकन
*********************************
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 52 से आगे संघ की कार्यपालिका से संबंधित प्रावधान शुरू होते हैं।
भाग V — संघ (The Union) -
अनुच्छेद - विषय
52 भारत का राष्ट्रपति
53 संघ की कार्यपालिका शक्ति
54 राष्ट्रपति का निर्वाचन
55 राष्ट्रपति के निर्वाचन की रीति
56 राष्ट्रपति की पदावधि
57 राष्ट्रपति पुनर्निर्वाचन हेतु पात्रता
58 राष्ट्रपति निर्वाचित होने की योग्यताएँ
59 राष्ट्रपति पद की शर्तें
60 राष्ट्रपति द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
61 राष्ट्रपति पर महाभियोग प्रक्रिया
62 राष्ट्रपति पद की रिक्ति भरने हेतु निर्वाचन का समय
63 भारत का उपराष्ट्रपति
64 उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति
65 राष्ट्रपति के पद की रिक्ति/अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति का कार्य
66 उपराष्ट्रपति का निर्वाचन
67 उपराष्ट्रपति की पदावधि
68 उपराष्ट्रपति पद की रिक्ति भरने के लिए निर्वाचन
69 उपराष्ट्रपति की शपथ या प्रतिज्ञान
70 अन्य आकस्मिकताओं में राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन
71 राष्ट्रपति/उपराष्ट्रपति के निर्वाचन संबंधी विवाद
72 राष्ट्रपति की क्षमादान आदि की शक्ति
73 संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार
74 राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद
75 मंत्रियों के संबंध में अन्य उपबंध
76 भारत का महान्यायवादी
77 भारत सरकार के कार्यों का संचालन
78 राष्ट्रपति को सूचना देने आदि के संबंध में प्रधानमंत्री के कर्तव्य
संसद से संबंधित अनुच्छेद -
79 संसद का गठन
80 राज्यसभा की संरचना
81 लोकसभा की संरचना
82 प्रत्येक जनगणना के बाद पुनः समायोजन
83 संसद के सदनों की अवधि
84 संसद की सदस्यता के लिए योग्यता
85 संसद के सत्र, सत्रावसान और विघटन
86 राष्ट्रपति का सदनों को संबोधित/संदेश भेजने का अधिकार
87 राष्ट्रपति का विशेष अभिभाषण
88 मंत्रियों और महान्यायवादी के सदनों में अधिकार
अनुच्छेद 89 से 123 तक: संसद -
89 राज्यसभा के सभापति और उपसभापति
90 उपसभापति का पद रिक्त होना, त्यागपत्र और पद से हटाया जाना
91 उपसभापति या अन्य व्यक्ति द्वारा सभापति के कर्तव्यों का निर्वहन
92 सभापति/उपसभापति को पद से हटाने के प्रस्ताव पर पीठासीन न होना
93 लोकसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष
94 अध्यक्ष/उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना, त्यागपत्र और पद से हटाया जाना
95 उपाध्यक्ष या अन्य व्यक्ति द्वारा अध्यक्ष के कर्तव्यों का निर्वहन
96 अध्यक्ष/उपाध्यक्ष को हटाने के प्रस्ताव पर पीठासीन न होना
97 सभापति, उपसभापति, अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वेतन एवं भत्ते
98 संसद का सचिवालय
99 संसद सदस्यों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान
100 सदनों में मतदान, रिक्तियों के बावजूद कार्य करने की शक्ति और गणपूर्ति
101 संसद के सदनों की सदस्यता से निरर्हता/स्थान रिक्त होना
102 संसद की सदस्यता के लिए निरर्हताएँ
103 सदस्यों की निरर्हता संबंधी प्रश्नों पर निर्णय
104 शपथ से पहले या निरर्हित होने पर बैठने और मतदान करने का दंड
105 संसद के सदनों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ
106 संसद सदस्यों के वेतन और भत्ते
107 विधेयकों के पुरःस्थापन और पारित करने के संबंध में उपबंध
108 दोनों सदनों की संयुक्त बैठक
109 धन विधेयक के संबंध में विशेष प्रक्रिया
110 धन विधेयक की परिभाषा
111 विधेयकों पर राष्ट्रपति की अनुमति
112 वार्षिक वित्तीय विवरण यानी बजट
113 प्राक्कलनों के संबंध में संसद की प्रक्रिया
114 विनियोग विधेयक
115 अनुपूरक, अतिरिक्त या अधिक अनुदान
116 लेखानुदान, प्रत्ययानुदान और अपवादानुदान
117 वित्त विधेयकों के संबंध में विशेष उपबंध
118 संसद की प्रक्रिया के नियम
119 वित्तीय कार्य संबंधी संसद की प्रक्रिया का विधि द्वारा विनियमन
120 संसद में प्रयोग की जाने वाली भाषा
121 संसद में न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा की सीमा
122 संसद की कार्यवाहियों की न्यायालयों द्वारा जाँच न किया जाना
123 संसद के अवकाश में राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति
अनुच्छेद 124 -147 सर्वोच्च न्यायालय
124 सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना और गठन
125 न्यायाधीशों के वेतन आदि
126 कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति
127 तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति
128 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की सर्वोच्च न्यायालय में बैठने की व्यवस्था
129 सर्वोच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय होगा
130 सर्वोच्च न्यायालय का स्थान
131 सर्वोच्च न्यायालय की मूल अधिकारिता
132 संवैधानिक मामलों में उच्च न्यायालय से अपील
133 दीवानी मामलों में अपील
134 आपराधिक मामलों में अपील
134A सर्वोच्च न्यायालय में अपील के लिए प्रमाण-पत्र
135 फेडरल कोर्ट की अधिकारिता का प्रयोग
136 विशेष अनुमति से अपील
137 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने निर्णयों/आदेशों का पुनर्विलोकन
138 सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तार
139 कुछ रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करना
139A कुछ मामलों का अंतरण
140 सर्वोच्च न्यायालय की सहायक शक्तियाँ
141 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी
142 पूर्ण न्याय करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति
143 राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय से परामर्श
144 सभी प्राधिकारी सर्वोच्च न्यायालय की सहायता में कार्य करेंगे
145 न्यायालय के नियम
146 सर्वोच्च न्यायालय के अधिकारी एवं सेवक तथा व्यय
147 व्याख्या
उच्च न्यायालय
अनुच्छेद 148 से 151 CAG -
148. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG)
149 CAG के कर्तव्य और शक्तियाँ
150 संघ और राज्यों के लेखाओं का प्रारूप
151 CAG की रिपोर्ट
अनुच्छेद 152 से 167: राज्य की कार्यपालिका -
152 परिभाषा
153 राज्यों के राज्यपाल
154 राज्य की कार्यपालिका शक्ति
155 राज्यपाल की नियुक्ति
156 राज्यपाल की पदावधि
157 राज्यपाल बनने की योग्यताएँ
158 राज्यपाल के पद की शर्तें
159 राज्यपाल की शपथ/प्रतिज्ञान
160 आकस्मिक परिस्थितियों में राज्यपाल के कार्यों का निर्वहन
161 राज्यपाल की क्षमादान आदि की शक्ति
162 राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार
163 राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद
164 मंत्रियों के संबंध में अन्य उपबंध
165 राज्य का महाधिवक्ता
166 राज्य सरकार के कार्यों का संचालन
167 राज्यपाल को सूचना देने आदि के संबंध में मुख्यमंत्री के कर्तव्य
अनुच्छेद 168 से 213 तक राज्य विधानमंडल -
168 राज्यों के विधानमंडलों का गठन
169 विधान परिषद का सृजन या उन्मूलन
170 विधानसभा की संरचना
171 विधान परिषद की संरचना
172 राज्य विधानमंडल की अवधि
173 सदस्य बनने की योग्यता
174 सत्र, सत्रावसान और विधानसभा का विघटन
175 राज्यपाल का सदनों को संबोधित/संदेश भेजने का अधिकार
176 राज्यपाल का विशेष अभिभाषण
177 मंत्रियों और महाधिवक्ता के सदनों में अधिकार
178 विधानसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष
179 अध्यक्ष/उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना, त्यागपत्र और हटाया जाना
180 उपाध्यक्ष द्वारा अध्यक्ष के कर्तव्यों का निर्वहन
181 अध्यक्ष/उपाध्यक्ष को हटाने के प्रस्ताव पर पीठासीन न होना
182 विधान परिषद के सभापति और उपसभापति
183 सभापति/उपसभापति का पद रिक्त होना, त्यागपत्र और हटाया जाना
184 उपसभापति द्वारा सभापति के कर्तव्यों का निर्वहन
185 सभापति/उपसभापति को हटाने के प्रस्ताव पर पीठासीन न होना
186 अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सभापति और उपसभापति के वेतन-भत्ते
187 राज्य विधानमंडल का सचिवालय
188 सदस्यों की शपथ/प्रतिज्ञान
189 मतदान, रिक्तियों के बावजूद कार्य करने की शक्ति और गणपूर्ति
190 स्थान रिक्त होना
191 सदस्यता के लिए निरर्हताएँ
192 निरर्हता संबंधी प्रश्नों पर निर्णय
193 शपथ से पहले या निरर्हित होने पर बैठने/मतदान का दंड
194 राज्य विधानमंडल के विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ
195 सदस्यों के वेतन-भत्ते
196 विधेयकों के पुरःस्थापन और पारित करने की प्रक्रिया
197 धन विधेयक से अलग विधेयकों पर विधान परिषद की शक्तियों की सीमा
198 धन विधेयकों की विशेष प्रक्रिया
199 धन विधेयक की परिभाषा
200 विधेयकों पर राज्यपाल की अनुमति
201 राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित विधेयक
202 वार्षिक वित्तीय विवरण यानी राज्य का बजट
203 प्राक्कलनों के संबंध में प्रक्रिया
204 विनियोग विधेयक
205 अनुपूरक, अतिरिक्त या अधिक अनुदान
206 लेखानुदान, प्रत्ययानुदान और अपवादानुदान
207 वित्त विधेयकों के संबंध में विशेष उपबंध
208 विधानमंडल की प्रक्रिया के नियम
209 वित्तीय कार्य संबंधी प्रक्रिया का विधि द्वारा विनियमन
210 विधानमंडल में प्रयोग की जाने वाली भाषा
211 न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा की सीमा
212 विधानमंडल की कार्यवाहियों में न्यायालय का हस्तक्षेप नहीं
213 विधानमंडल के अवकाश में राज्यपाल की अध्यादेश जारी करने की शक्ति
अनुच्छेद 214 से 231- उच्च न्यायालय
214 राज्यों के लिए उच्च न्यायालय
215 उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय
216 उच्च न्यायालय का गठन
217 उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति और सेवा की शर्तें
218 सर्वोच्च न्यायालय संबंधी कुछ प्रावधानों का उच्च न्यायालयों पर लागू होना
219 उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की शपथ
220 स्थायी न्यायाधीश रहने के बाद वकालत पर प्रतिबंध
221 न्यायाधीशों के वेतन आदि
222 एक उच्च न्यायालय से दूसरे में न्यायाधीश का स्थानांतरण
223 कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति
224 अतिरिक्त और कार्यकारी न्यायाधीश
224A सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की बैठकों में नियुक्ति
225 विद्यमान उच्च न्यायालयों की अधिकारिता
226 उच्च न्यायालय की रिट जारी करने की शक्ति
227 सभी न्यायालयों पर उच्च न्यायालय का अधीक्षण
228 कुछ मामलों का उच्च न्यायालय को अंतरण
229 उच्च न्यायालयों के अधिकारी और सेवक
230 उच्च न्यायालय की अधिकारिता का संघ राज्य क्षेत्रों तक विस्तार
231 दो या अधिक राज्यों के लिए साझा उच्च न्यायालय
अनुच्छेद 233 से 237: अधीनस्थ न्यायालय -
232 का संबंध दो या अधिक राज्यों के लिए एक ही उच्च न्यायालय से संबंधित प्रावधान से था। (लोपित)
233 – जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति
234 – जिला न्यायाधीशों से भिन्न न्यायिक सेवा में नियुक्ति
235 – अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण
236 – व्याख्या
237 – कुछ मजिस्ट्रेटों पर इस अध्याय के प्रावधान लागू करना
अनुच्छेद 238 से 242 संघ राज्य-क्षेत्रों (Union Territories) से संबंधित हैं। 238 व 242 लोपित (Omitted) हैं।
238 भाग C के राज्यों हेतु उपबंध (सातवाँ संशोधन) अधिनियम, 1956 द्वारा लोपित किया गया)
239 संघ राज्य-क्षेत्रों का प्रशासन
239A कुछ संघ राज्य-क्षेत्रों के लिए स्थानीय विधानमंडल या मंत्रिपरिषद का गठन
239AA दिल्ली के संबंध में विशेष उपबंध
239AB संवैधानिक तंत्र विफल होने की दशा में उपबंध
239B संघ राज्य-क्षेत्र के विधानमंडल के अवकाश में प्रशासक की अध्यादेश शक्ति
240 कुछ संघ राज्य-क्षेत्रों के लिए राष्ट्रपति की विनियम बनाने की शक्ति
241 संघ राज्य-क्षेत्रों के लिए उच्च न्यायालय
242 कूर्ग के संबंध में उपबंध (सातवाँ संशोधन अधिनियम, 1956 द्वारा लोपित कर दिया गया)
अनुच्छेद 243 पंचायती राज, नगरपालिकाएँ, सहकारी समितियाँ, अनुसूचित/जनजातीय क्षेत्र, संघ-राज्य संबंध -
अनुच्छेद 243 से 243-O: पंचायतें
| 243 | परिभाषाएँ |
| 243A | ग्राम सभा |
| 243B | पंचायतों का गठन |
| 243C | पंचायतों की संरचना |
| 243D | सीटों का आरक्षण |
| 243E | पंचायतों की अवधि |
| 243F | सदस्यता के लिए निरर्हताएँ |
| 243G | पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व |
| 243H | पंचायतों द्वारा कर लगाने की शक्ति और निधियाँ |
| 243-I | वित्त आयोग द्वारा पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा |
| 243J | पंचायतों के लेखाओं की लेखापरीक्षा |
| 243K | पंचायतों के चुनाव |
| 243L | संघ राज्य-क्षेत्रों पर लागू होना |
| 243M | कुछ क्षेत्रों पर यह भाग लागू नहीं होगा |
| 243N | विद्यमान कानूनों और पंचायतों का बने रहना |
| 243-O | निर्वाचन मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप पर रोक |
| 243P | परिभाषाएँ |
| 243Q | नगरपालिकाओं का गठन |
| 243R | नगरपालिकाओं की संरचना |
| 243S | वार्ड समितियों आदि का गठन |
| 243T | सीटों का आरक्षण |
| 243U | नगरपालिकाओं की अवधि |
| 243V | सदस्यता के लिए निरर्हताएँ |
| 243W | नगरपालिकाओं की शक्तियाँ और उत्तरदायित्व |
| 243X | कर लगाने की शक्ति और नगरपालिका निधियाँ |
| 243Y | वित्त आयोग |
| 243Z | नगरपालिकाओं के लेखाओं की लेखापरीक्षा |
| 243ZA | नगरपालिकाओं के चुनाव |
| 243ZB | संघ राज्य-क्षेत्रों पर लागू होना |
| 243ZC | कुछ क्षेत्रों पर यह भाग लागू नहीं होगा |
| 243ZD | जिला योजना समिति |
| 243ZE | महानगर योजना समिति |
| 243ZF | विद्यमान कानूनों और नगरपालिकाओं का बने रहना |
| 243ZG | निर्वाचन मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप पर रोक |
| अनुच्छेद 243ZH से 243ZT - सहकारी समितियाँ | |
|---|---|
| 243ZH | परिभाषाएँ |
| 243ZI | सहकारी समितियों का निगमन |
| 243ZJ | बोर्ड के सदस्यों और पदाधिकारियों की संख्या एवं कार्यकाल |
| 243ZK | बोर्ड के सदस्यों का निर्वाचन |
| 243ZL | बोर्ड का अधिक्रमण/निलंबन और अंतरिम प्रबंधन |
| 243ZM | सहकारी समितियों के लेखाओं की लेखापरीक्षा |
| 243ZN | साधारण निकाय की बैठकों का आयोजन |
| 243ZO | सदस्य को सूचना प्राप्त करने का अधिकार |
| 243ZP | विवरणियाँ |
| 243ZQ | अपराध और दंड |
| 243ZR | बहु-राज्य सहकारी समितियों पर लागू होना |
| 243ZS | संघ राज्य-क्षेत्रों पर लागू होना |
| 243ZT | विद्यमान कानूनों का बने रहना |
| 244 | अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन |
| 244A | असम के कुछ जनजातीय क्षेत्रों को मिलाकर स्वायत्त राज्य का गठन तथा स्थानीय विधानमंडल/मंत्रिपरिषद का निर्माण |
| 245 | संसद और राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाए गए कानूनों का विस्तार |
| 246 | कानून बनाने के विषय |
| 246A | GST के संबंध में विशेष प्रावधान |
| 247 | अतिरिक्त न्यायालयों की स्थापना |
| 248 | अवशिष्ट विधायी शक्तियाँ |
| 249 | राष्ट्रीय हित में राज्य सूची के विषय पर संसद की शक्ति |
| 250 | आपातकाल के दौरान राज्य सूची पर संसद की शक्ति |
| 251 | अनुच्छेद 249/250 के कानूनों और राज्य कानूनों में असंगति |
| 252 | दो या अधिक राज्यों की सहमति से संसद द्वारा कानून |
| 253 | अंतरराष्ट्रीय समझौतों को लागू करने के लिए कानून |
| 254 | संसद और राज्य कानूनों में असंगति |
| 255 | सिफारिशों और पूर्व मंजूरी को केवल प्रक्रिया का विषय माना जाना |
| अनुच्छेद | विषय |
|---|---|
| 256 | राज्यों और संघ का दायित्व |
| 257 | कुछ मामलों में राज्यों पर संघ का नियंत्रण |
| 258 | संघ द्वारा राज्यों को शक्तियाँ प्रदान करना |
| 258A | राज्यों द्वारा संघ को कार्य सौंपना |
| 259 | लोपित |
| 260 | भारत के बाहर के क्षेत्रों के संबंध में संघ की अधिकारिता |
| 261 | सार्वजनिक कृत्य, अभिलेख और न्यायिक कार्यवाहियाँ |
| 262 | अंतरराज्यीय नदियों के जल संबंधी विवाद |
| 263 | अंतरराज्यीय परिषद |
| 264 | व्याख्या |
| 265 | विधि के प्राधिकार के बिना कर नहीं |
| 266 | संचित निधि और लोक लेखा |
| 267 | आकस्मिकता निधि |
| 268 | संघ द्वारा लगाए गए लेकिन राज्यों द्वारा संगृहीत/विनियोजित शुल्क |
| 269 | संघ द्वारा लगाए और संगृहीत करों का राज्यों को सौंपना |
| 269A | अंतरराज्यीय व्यापार/वाणिज्य में GST |
| 270 | संघ द्वारा लगाए गए करों का संघ और राज्यों के बीच वितरण |
| 271 | संघ के प्रयोजनों के लिए अधिभार |
| 272 | लोपित |
| 273 | जूट और जूट उत्पादों पर निर्यात शुल्क के बदले अनुदान |
| 274 | राज्यों के हित वाले कराधान संबंधी विधेयकों के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश |
| 275 | कुछ राज्यों को संघ से अनुदान |
| 276 | व्यवसाय, व्यापार, आजीविका और नियोजन पर कर |
| 277 | बचत |
| 278 | लोपित |
| 279 | शुद्ध आगम आदि की गणना |
| 279A | GST परिषद |
| 280 | वित्त आयोग |
| 281 | वित्त आयोग की सिफारिशें |
| 282 | संघ या राज्य द्वारा अपने राजस्व से व्यय |
| 283 | निधियों और लोक लेखाओं की अभिरक्षा |
| 284 | वादकर्ताओं की जमा राशि और अन्य धन की अभिरक्षा |
| 285 | संघ की संपत्ति को राज्य कर से छूट |
| 286 | माल के विक्रय/क्रय पर कर लगाने की सीमाएँ |
| 287 | विद्युत पर कर से छूट |
| 288 | कुछ मामलों में जल या बिजली पर राज्य कर से छूट |
| 289 | राज्य की संपत्ति और आय को संघीय कर से छूट |
| 290 | कुछ व्ययों और पेंशनों का समायोजन |
| 290A | कुछ देवस्वम निधियों को वार्षिक भुगतान |
| 291 | लोपित |
| 292 | भारत सरकार द्वारा उधार लेना |
| 293 | राज्यों द्वारा उधार लेना |
| 294 | कुछ मामलों में संपत्ति, परिसंपत्तियों और दायित्वों का उत्तराधिकार |
| 295 | अन्य मामलों में संपत्ति, परिसंपत्तियों और दायित्वों का उत्तराधिकार |
| 296 | राजगामी/लावारिस संपत्ति |
| 297 | समुद्री क्षेत्र की मूल्यवान वस्तुएँ संघ में निहित |
| 298 | व्यापार आदि करने की शक्ति |
| 299 | सरकारी संविदाएँ |
| 300 | सरकार के विरुद्ध और सरकार द्वारा वाद |
| 300A | संपत्ति का अधिकार: विधि के प्राधिकार के बिना किसी व्यक्ति को संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा। भाई, अनुच्छेद 301 से 395 तक संविधान का काफी बड़ा हिस्सा है। इसे परीक्षा के लिए अध्यायवार और अनुच्छेदवार समझना सबसे आसान रहेगा। नीचे वर्तमान संविधान के अनुसार क्रम दिया है, जिसमें लोपित (Omitted) अनुच्छेद भी शामिल हैं। अनुच्छेद 301–307: व्यापार, वाणिज्य और समागम 301 भारत के राज्यक्षेत्र में व्यापार, वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता 302 संसद द्वारा प्रतिबंध लगाने की शक्ति 303 व्यापार और वाणिज्य के संबंध में संघ एवं राज्यों की विधायी शक्तियों पर प्रतिबंध 304 राज्यों के बीच व्यापार, वाणिज्य और समागम पर प्रतिबंध 305 विद्यमान कानूनों और राज्य के एकाधिकार संबंधी कानूनों की सुरक्षा 306 कुछ भाग B राज्यों की व्यापार संबंधी शक्ति 307 अनुच्छेद 301–304 के उद्देश्यों को लागू करने के लिए प्राधिकरण की नियुक्ति अनुच्छेद 308–323: संघ और राज्यों के अधीन सेवाएँ - 308 व्याख्या 309 संघ या राज्य की सेवा में नियुक्ति और सेवा की शर्तें 310 संघ और राज्य की सेवा करने वाले व्यक्तियों का पद धारण 311 संघ या राज्य के अधीन सिविल पदों पर नियुक्त व्यक्तियों की बर्खास्तगी, पद से हटाना या पदावनति 312 अखिल भारतीय सेवाएँ 312A कुछ सेवाओं के अधिकारियों की सेवा-शर्तों में परिवर्तन या निरसन 313 संक्रमणकालीन उपबंध 314 कुछ अधिकारियों की सुरक्षा संबंधी उपबंध 315 संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोग 316 सदस्यों की नियुक्ति और पदावधि 317 लोक सेवा आयोग के सदस्य को हटाना और निलंबित करना 318 आयोग के सदस्यों और कर्मचारियों की सेवा-शर्तों के संबंध में विनियम 319 आयोग के सदस्यों द्वारा अन्य पद धारण करने पर प्रतिबंध 320 लोक सेवा आयोग के कार्य 321 लोक सेवा आयोग के कार्यों का विस्तार 322 लोक सेवा आयोग के व्यय 323 लोक सेवा आयोग की रिपोर्ट अनुच्छेद 323A–323B अधिकरण - 323A प्रशासनिक अधिकरण 323B अन्य विषयों के लिए अधिकरण अनुच्छेद 324–329 निर्वाचन 324 निर्वाचन आयोग में निर्वाचन का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण 325 धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर निर्वाचक नामावली में शामिल होने से वंचित न करना 326 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर 327 संसद की निर्वाचन संबंधी विधि बनाने की शक्ति 328 राज्य विधानमंडल की निर्वाचन संबंधी विधि बनाने की शक्ति 329 निर्वाचन मामलों में न्यायालय के हस्तक्षेप पर रोक 329A प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष के निर्वाचन संबंधी विशेष उपबंध अनुच्छेद 330–342A विशेष वर्गों के लिए उपबंध - 330 लोकसभा में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सीटों का आरक्षण 330A लोकसभा में महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण 331 लोकसभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व 332 राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए सीटों का आरक्षण 332A राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए सीटों का आरक्षण 333 राज्य विधानसभाओं में आंग्ल-भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व 334 आरक्षण और विशेष प्रतिनिधित्व की अवधि 334A महिलाओं के आरक्षण के प्रभावी होने का प्रावधान 335 सेवाओं और पदों में SC/ST के दावे 336 कुछ सेवाओं में आंग्ल-भारतीय समुदाय के लिए विशेष उपबंध 337 आंग्ल-भारतीय समुदाय के लाभ के लिए शैक्षिक अनुदान 338 राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग 338A राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग 338B राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग 339 अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातियों के प्रशासन पर संघ का नियंत्रण 340 पिछड़े वर्गों की दशा की जाँच के लिए आयोग 341 अनुसूचित जातियाँ 342 अनुसूचित जनजातियाँ 342A सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग नोट: 330A, 332A और 334A को संविधान (106वाँ संशोधन) अधिनियम, 2023 द्वारा जोड़ा गया है। अनुच्छेद 343–351 राजभाषा 343 संघ की राजभाषा 344 राजभाषा संबंधी आयोग और संसद की समिति 345 राज्य की राजभाषा 346 राज्यों और संघ के बीच संचार की राजभाषा 347 किसी राज्य की जनसंख्या के किसी वर्ग द्वारा बोली जाने वाली भाषा के संबंध में विशेष उपबंध 348 सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय और विधियों में प्रयोग की जाने वाली भाषा 349 भाषा संबंधी कुछ विधियों के अधिनियमन की विशेष प्रक्रिया 350 शिकायतों के निवारण के लिए अभ्यावेदन में भाषा 350A प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधाएँ 350B भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकारी 351 हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश अनुच्छेद 352–360 आपातकालीन उपबंध 352 राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा 353 आपातकाल की उद्घोषणा का प्रभाव 354 आपातकाल के दौरान राजस्व के वितरण संबंधी उपबंध 355 बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से राज्यों की रक्षा करना संघ का कर्तव्य 356 राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल होने पर उपबंध, अर्थात राष्ट्रपति शासन 357 अनुच्छेद 356 के अधीन विधायी शक्तियों का प्रयोग 358 आपातकाल में अनुच्छेद 19 के उपबंधों का निलंबन 359 आपातकाल में मूल अधिकारों के प्रवर्तन का निलंबन 359A पंजाब के संबंध में विशेष उपबंध 360 वित्तीय आपातकल अनुच्छेद 361–367 विविध 361 राष्ट्रपति और राज्यपालों को संरक्षण 361A संसद और राज्य विधानमंडलों की कार्यवाही के प्रकाशन का संरक्षण 361B लाभकारी राजनीतिक पद पर नियुक्ति के लिए निरर्हता 362 देशी राज्यों के शासकों के अधिकार और विशेषाधिकार 363 कुछ संधियों, करारों आदि से उत्पन्न विवादों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर रोक 363A देशी राज्यों के शासकों की मान्यता समाप्त और प्रिवी पर्स समाप्त 364 प्रमुख बंदरगाहों और विमानक्षेत्रों के संबंध में विशेष उपबंध 365 संघ द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन न करने का प्रभाव 366 परिभाषाएँ 367 व्याख्या 368 संसद की संविधान संशोधन करने की शक्ति और उसकी प्रक्रिया अनुच्छेद 369–392 अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबंध 369 कुछ राज्य सूची के विषयों पर संसद की अस्थायी शक्ति 370 जम्मू-कश्मीर के संबंध में अस्थायी उपबंध 371 महाराष्ट्र और गुजरात के संबंध में विशेष उपबंध 371A नागालैंड 371B असम 371C मणिपुर 371D आंध्र प्रदेश और तेलंगाना 371E आंध्र प्रदेश में केंद्रीय विश्वविद्यालय 371F सिक्किम 371G मिजोरम 371H अरुणाचल प्रदेश 371-I गोवा 371J कर्नाटक 372 विद्यमान कानूनों का प्रवर्तन जारी रहना 372A राष्ट्रपति की कानूनों को अनुकूलित करने की शक्ति 373 निवारक निरोध के संबंध में राष्ट्रपति की शक्ति 374 फेडरल कोर्ट के न्यायाधीश और लंबित कार्यवाहियाँ 375 न्यायालय, प्राधिकारी और अधिकारी संविधान के अधीन कार्य करते रहेंगे 376 उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के संबंध में उपबंध 377 CAG के संबंध में उपबंध 378 लोक सेवा आयोगों के संबंध में उपबंध 378A आंध्र प्रदेश विधानसभा की अवधि संबंधी विशेष उपबंध 379–391 संविधान के प्रारंभ के समय संक्रमणकालीन व्यवस्था से संबंधित विभिन्न उपबंध 392 कठिनाइयाँ दूर करने की राष्ट्रपति की शक्ति अनुच्छेद 393–395 अंतिम उपबंध 393 संक्षिप्त नाम 394 प्रारंभ 394A हिंदी भाषा में प्राधिकृत पाठ 395 निरसन |
Unit I -
संघ एवं राज्य -
संघ एवं राज्य भारतीय संविधान के संघीय ढाँचे का बहुत महत्वपूर्ण विषय है। परीक्षा की दृष्टि से इसे केवल केंद्र और राज्य की परिभाषा के रूप में नहीं, बल्कि संघ की स्थापना, राज्यों का गठन, विधायी एवं प्रशासनिक संबंध, वित्तीय संबंध और संवैधानिक स्थिति के रूप में समझना चाहिए।
1. संघ का अर्थ -
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 में कहा गया है कि भारत (इंडिया) राज्यों का संघ होगा।
यहाँ संविधान निर्माताओं ने Federation of States के स्थान पर Union of States शब्द का प्रयोग किया। इसका अर्थ है कि भारत का संघ किसी स्वतंत्र राज्यों के आपसी समझौते से निर्मित संघ नहीं है। भारतीय संघ की एकता को संविधान ने सर्वोच्च महत्व दिया है।
भारत राज्यों का संघ है; शक्तियों का संवैधानिक विभाजन है, लेकिन राष्ट्रीय एकता और प्रशासनिक समन्वय के लिए संघ को अपेक्षाकृत अधिक शक्तियाँ प्रदान की गई हैं। अनुच्छेद 1 के अनुसार भारत का क्षेत्र तीन भागों में विभाजित है -
1. राज्यों के क्षेत्र
2. संघ राज्य-क्षेत्र
3. ऐसे अन्य क्षेत्र जो भारत द्वारा अर्जित किए जाएँ।
2. भारत को राज्यों का संघ क्यों कहा गया? -
भारतीय संविधान में संघीय और एकात्मक दोनों प्रकार की विशेषताएँ हैं।
संविधान की संघीय विशेषताएँ -
(1) केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का (2) विभाजन
(3) लिखित संविधान
(4) संविधान की सर्वोच्चता
(5) स्वतंत्र न्यायपालिका
(6) द्विसदनीय संसद
(7) संविधान में कुछ प्रावधानों के संशोधन के लिए राज्यों की सहमति
संविधान की एकात्मक विशेषताएँ -
(1) अधिक शक्तिशाली केन्द्र
(2) एकल संविधान
(3) एकल नागरिकता
(4) अखिल भारतीय सेवाएँ
(5) आपातकाल में केंद्र की शक्ति अत्यधिक बढ़ जाती है
(6 )राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा
(7) संसद को कुछ परिस्थितियों में राज्य की सीमाओं में परिवर्तन की शक्ति
इसलिए भारत को अक्सर संघात्मक व्यवस्था वाला मजबूत केंद्र कहा जाता है।
3. नए राज्यों का गठन : अनुच्छेद 2 और 3 -
संघ एवं राज्य के अध्ययन में अनुच्छेद 2 और 3 अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
अनुच्छेद 2 - संसद कानून द्वारा नए राज्यों को संघ में प्रवेश या स्थापना कर सकती है।
अनुच्छेद 3 - संसद कानून द्वारा -
()किसी राज्य से क्षेत्र अलग करके नया राज्य बना सकती है।
(1) दो या अधिक राज्यों को मिलाकर नया राज्य बना सकती है।
(2) किसी राज्य के क्षेत्र को बढ़ा सकती है।
किसी राज्य के क्षेत्र को घटा सकती है।
(3) राज्य की सीमाओं में परिवर्तन कर सकती है।
(4) राज्य का नाम बदल सकती है। इस हेतु महत्वपूर्ण बात, राज्य की सीमाओं या नाम में परिवर्तन के लिए संबंधित राज्य विधानमंडल से उसकी राय मांगी जाती है, लेकिन उसकी सहमति संसद के लिए बाध्यकारी नहीं है।
यही भारत के संघीय ढाँचे में केंद्र की मजबूत स्थिति को दिखाता है।
4. अनुच्छेद 4 -
अनुच्छेद 2 और 3 के अंतर्गत बनाए गए कानूनों को संविधान संशोधन की तरह अनुच्छेद 368 की प्रक्रिया से पारित करना आवश्यक नहीं होता। अर्थात संसद साधारण विधायी प्रक्रिया से राज्यों के गठन या पुनर्गठन से संबंधित कानून बना सकती है।
5. राज्यों का पुनर्गठन -
स्वतंत्रता के बाद भारत में राज्यों की सीमाओं का पुनर्गठन एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रक्रिया रही।
अब तक के राज्य पुनर्गठन आयोग -
(1)1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग गठित किया गया।
(2) States Reorganisation Act, 1956 के माध्यम से राज्यों का व्यापक पुनर्गठन किया गया।
इस प्रक्रिया में भाषा, प्रशासनिक सुविधा और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखा गया। बाद के वर्षों में भी अनेक नए राज्यों का निर्माण हुआ।
उदाहरण -
(1) महाराष्ट्र
(2) गुजरात
(3) हरियाणा
(4) हिमाचल प्रदेश
(5) मेघालय
(6) मणिपुर
(7) त्रिपुरा
(8) सिक्किम
(9) मिजोरम
(10) अरुणाचल प्रदेश
(11) गोवा
(12) छत्तीसगढ़
(13) उत्तराखंड
(14) झारखंड
(15) दिल्ली
(16) तेलंगाना
(17) जम्मू कश्मीर राज्य को विघटित कर केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया।
6. संघ और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन -
भारतीय संविधान का सबसे महत्वपूर्ण संघीय तत्व है शक्तियों का विभाजन। यह मुख्यतः अनुच्छेद 245 से 255 तथा सातवीं अनुसूची में दिखाई देता है। सातवीं अनुसूची में तीन सूचियाँ हैं -
1. संघ सूची - इस पर मुख्यतः संसद कानून बनाती है।
उदाहरण -
रक्षा
विदेश मामले
नागरिकता
मुद्रा
परमाणु ऊर्जा
रेलवे
डाक एवं तार आदि।
2. राज्य सूची - इस पर सामान्यतः राज्य विधानमंडल कानून बनाता है।
उदाहरण -
पुलिस
लोक व्यवस्था
सार्वजनिक स्वास्थ्य
कृषि
स्थानीय शासन आदि।
3. समवर्ती सूची - इस पर संसद और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।
उदाहरण -
आपराधिक कानून
विवाह और तलाक
शिक्षा
वन
श्रम कल्याण
उत्तराधिकार आदि।
7. अवशिष्ट शक्तियाँ -
जो विषय संघ, राज्य या समवर्ती सूची में नहीं हैं, उन पर कानून बनाने की शक्ति संसद के पास है। यह व्यवस्था भारत में केंद्र की मजबूत स्थिति को दर्शाती है। यह शक्ति अनुच्छेद 248 तथा संघ सूची की प्रविष्टि 97 से संबंधित है।
8. समवर्ती सूची में संघर्ष -
यदि समवर्ती सूची के किसी विषय पर केंद्र और राज्य के कानून में संघर्ष हो जाए, तो सामान्यतः अनुच्छेद 254 के अनुसार संसद का कानून प्रभावी होता है। लेकिन यदि राज्य का कानून राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखा गया हो और राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त कर चुका हो, तो वह राज्य में प्रभावी रह सकता है। फिर भी संसद बाद में उसी विषय पर कानून बनाकर उस राज्य कानून को बदल सकती है।
9. राज्य की विधायी शक्ति -
राज्य विधानमंडल अपने राज्य की सीमा के भीतर राज्य सूची और समवर्ती सूची के विषयों पर कानून बना सकता है।
लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में संसद राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है। यह भारतीय संघीय व्यवस्था की विशिष्ट विशेषता है।
10. संसद राज्य सूची पर कब कानून बना सकती है? -
(1) राष्ट्रीय हित में अनुच्छेद 249 - यदि राज्यसभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करती है कि राष्ट्रीय हित में राज्य सूची के किसी विषय पर संसद का कानून बनाना आवश्यक है, तो संसद उस विषय पर कानून बना सकती है।
(2) आपातकाल में अनुच्छेद 250 - राष्ट्रीय आपातकाल लागू होने पर संसद राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है। आपातकाल समाप्त होने के बाद भी ऐसा कानून एक निश्चित अवधि तक प्रभावी रह सकता है।
(3) राज्यों की सहमति से अनुच्छेद 252 - यदि दो या अधिक राज्य विधानमंडल प्रस्ताव पारित करके संसद से किसी राज्य सूची के विषय पर कानून बनाने का अनुरोध करते हैं, तो संसद उस विषय पर कानून बना सकती है। बाद में अन्य राज्य भी उस कानून को अपनाने के लिए प्रस्ताव पारित कर सकते हैं।
(4) अंतरराष्ट्रीय समझौते के कार्यान्वयन के लिए अनुच्छेद 253 - संसद किसी अंतरराष्ट्रीय संधि, समझौते या सम्मेलन को लागू करने के लिए आवश्यकता पड़ने पर राज्य सूची के विषय पर भी कानून बना सकती है।
11. संघ और राज्य के प्रशासनिक संबंध -
संघ एवं राज्य के बीच केवल विधायी शक्तियों का ही विभाजन नहीं है, बल्कि प्रशासनिक संबंध भी निर्धारित हैं। अनुच्छेद 256 से 263 इस विषय में महत्वपूर्ण हैं। राज्य को संसद द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन सुनिश्चित करना होता है। केंद्र कुछ परिस्थितियों में राज्यों को निर्देश भी दे सकता है।
12. राज्यपाल की भूमिका -
राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है जो उसके प्रसादपर्यंत तक पद पर बना रह सकता है। राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है जो -
(1) मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है।
(2) राज्य विधानमंडल को बुलाता और स्थगित करता है।
(3) कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकता है।
(4) संवैधानिक संकट की स्थिति में राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेज सकता है।
(5) केंद्र और राज्य के संवैधानिक संबंधों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
13. अखिल भारतीय सेवाएँ -
भारतीय संघीय व्यवस्था में अखिल भारतीय सेवाएँ भी महत्वपूर्ण हैं, जैसेIAS, IPS,IFS, IRS इन अधिकारियों की नियुक्ति और सेवा-संबंधी व्यवस्था केंद्र तथा राज्य दोनों से जुड़ी होती है। इससे प्रशासन में राष्ट्रीय एकरूपता बनाए रखने का प्रयास होता है।
14. वित्तीय संबंध -
संघ एवं राज्यों के बीच राजस्व और वित्त का वितरण भी संविधान द्वारा निर्धारित है।
प्रमुख संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 268 से 281-
वित्त आयोग - अनुच्छेद 280 - राष्ट्रपति समय-समय पर वित्त आयोग का गठन करता है। इसका प्रमुख कार्य संघ और राज्यों के बीच करों के वितरण तथा राज्यों को अनुदान आदि से संबंधित सिफारिश करना है।
करों का वितरण अनुच्छेद 246A, 269A और 279A - GST ने संघ एवं राज्यों के वित्तीय संबंधों को नया स्वरूप दिया है।
GST से संबंधित प्रमुख संवैधानिक प्रावधानों में अनुच्छेद महत्वपूर्ण हैं।
GST परिषद - अनुच्छेद 279A के अंतर्गत GST परिषद का गठन किया गया। इसमें केंद्र और राज्यों के प्रतिनिधित्व के माध्यम से अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था में सहकारी संघवाद को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया है।
अनुदान - केन्द्र सरकार समय समय पर राज्यों को विभिन्न अनुदान एवं सहायता देती है।
16. संघ और राज्य के बीच विवाद -
यदि संघ और राज्य या दो राज्यों के बीच किसी संवैधानिक/कानूनी प्रश्न पर विवाद हो, तो न्यायपालिका महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अनुच्छेद 131 सर्वोच्च न्यायालय को कुछ संघ-राज्य तथा अंतर-राज्यीय विवादों में मूल अधिकारिता प्रदान करता है।
17. अंतर्राज्यीय जल विवाद -
दो या अधिक राज्यों के बीच नदी के पानी को लेकर विवाद उत्पन्न हो सकता है।
संविधान का अनुच्छेद 262 संसद को ऐसे विवादों के निपटारे के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है।
18. अंतर्राज्यीय परिषद -
अनुच्छेद 263 के अंतर्गत अंतर्राज्यीय परिषद की व्यवस्था है। इसका उद्देश्य संघ और राज्यों के बीच तथा राज्यों के आपसी संबंधों में - समन्वय, सहयोग, विचार-विमर्श को बढ़ावा देना है।
19. आपातकाल और संघ-राज्य संबंध -
भारतीय संघीय व्यवस्था में आपातकाल का विशेष महत्व है।
∆ राष्ट्रीय आपातकाल अनुच्छेद 352 - में राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति में केंद्र की शक्तियाँ काफी बढ़ जाती हैं।
∆ राष्ट्रपति शासन अनुच्छेद 356 -
∆ यदि किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाता है, तो राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है।
इन स्थितियों में राज्य की कार्यपालिका और विधायी शक्तियों पर केंद्र का प्रभाव बहुत बढ़ जाता है।
∆ वित्तीय आपातकाल अनुच्छेद 360 -
वित्तीय आपातकाल की स्थिति में भी संघ और राज्यों के वित्तीय संबंधों पर केंद्र का प्रभाव बढ़ सकता है।
20. सहकारी संघवाद -
आधुनिक भारतीय संविधान में Cooperative Federalism यानी सहकारी संघवाद की अवधारणा महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि केंद्र और राज्य एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि शासन के दो स्तर हैं जो राष्ट्रीय विकास के लिए सहयोग करते हैं।
उदाहरण - GST परिषद, नीति आयोग, अंतर्राज्यीय परिषद, वित्त आयोग, केंद्र-राज्य योजनाएँ आदि हैं।
महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय -
(1) State of West Bengal v. Union of India (1963) - सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय संघीय व्यवस्था की प्रकृति पर विचार किया और स्पष्ट किया कि भारतीय राज्यों की स्थिति ऐसी नहीं है कि वे संघ से पूर्णतः स्वतंत्र संप्रभु इकाइयाँ हों।
(2) S.R. Bommai v. Union of India (1994) - यह संघ एवं राज्य संबंधों का अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय है।
सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 356 के प्रयोग पर न्यायिक समीक्षा को स्वीकार किया और संघीयता को संविधान की मूल संरचना से जोड़ा।
(3) Kesavananda Bharati v. State of Kerala (1973) - इस ऐतिहासिक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने Basic Structure Doctrine स्थापित किया। संघीयता को संविधान की मूल संरचना से संबंधित संवैधानिक विशेषताओं में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
भारतीय संघीय व्यवस्था की विशेषता -
भारत को न तो पूर्णतः अमेरिकी शैली का संघ कहा जा सकता है और न ही पूर्णतः एकात्मक राज्य।
भारतीय व्यवस्था में - संघवाद + मजबूत केंद्र + राज्यों की संवैधानिक स्वायत्तता + सहकारी संघवाद का मिश्रण दिखाई देता है। इसीलिए भारतीय संविधान को अक्सर संघात्मक व्यवस्था जिसमें एकात्मक झुकाव है के रूप में समझाया जाता है।
संघ एवं राज्य की कार्यपालिका भारतीय संविधान में संघ और राज्य की कार्यपालिका का प्रावधान भाग V (अनुच्छेद 52–78) में संघ की कार्यपालिका तथा भाग VI (अनुच्छेद 153–167) में राज्य की कार्यपालिका के संबंध में किया गया है। परीक्षा की दृष्टि से इसे इस प्रकार समझिए।
कार्यपालिका का अर्थ -
कार्यपालिका शासन का वह अंग है जो कानूनों को लागू करता है, प्रशासन चलाता है और राज्य की नीतियों को कार्यरूप देता है। भारत में कार्यपालिका दो स्तरों पर है - 1. संघ की कार्यपालिका
2. राज्य की कार्यपालिका
भारत ने संसदीय शासन प्रणाली अपनाई है। इसलिए राष्ट्रपति और राज्यपाल संवैधानिक/नाममात्र के प्रमुख हैं, जबकि वास्तविक कार्यपालिका शक्ति क्रमश प्रधानमंत्री के नेतृत्व में संघ की मंत्रिपरिषद और मुख्यमंत्री के नेतृत्व में राज्य मंत्रिपरिषद के माध्यम से प्रयोग होती है।
संघ की कार्यपालिका -
संघ की कार्यपालिका से संबंधित प्रमुख अनुच्छेद 52 से 78 तक हैं। संघ की कार्यपालिका में
क. राष्ट्रपति
ख. उपराष्ट्रपति
ग. प्रधानमंत्री
घ. मंत्रिपरिषद
ट. भारत के महान्यायवादी
(क) राष्ट्रपति
अनुच्छेद 52 - संविधान में कहा गया है कि भारत का एक राष्ट्रपति होगा।राष्ट्रपति भारत का अकेला प्रशासक नहीं है वह संवैधानिक प्रमुख है तथा संघ की कार्यपालिका शक्ति उसके अंदर निहित होती है।
अनुच्छेद 53 -संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित है और वह उसका प्रयोग संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि राष्ट्रपति अपनी व्यक्तिगत इच्छा से शासन नहीं चलाता है। संसदीय व्यवस्था में वह अनुच्छेद 74 के अंतर्गत प्रधानमंत्री एवं मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करता है।
3. राष्ट्रपति का निर्वाचन -
राष्ट्रपति का निर्वाचन जनता द्वारा सीधे नहीं किया जाता।
अनुच्छेद 54 - राष्ट्रपति का चुनाव निर्वाचक मंडल द्वारा होता है, जिसमें शामिल होते हैं:
• संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य
• राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य
संविधान में बाद के संशोधनों के कारण दिल्ली और पुडुचेरी की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य भी राष्ट्रपति के निर्वाचन में भाग लेते हैं।
राष्ट्रपति के चुनाव -
आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली एकल संक्रमणीय मत गुप्त मतदान प्रणाली के
द्वारा होता है।
4. राष्ट्रपति बनने की योग्यताएँ (अनुच्छेद 58)
राष्ट्रपति बनने के लिए व्यक्ति -
• भारत का नागरिक हो।
• उसकी आयु 35 वर्ष पूर्ण हो चुकी हो।
• लोकसभा का सदस्य बनने के योग्य हो।
• भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन लाभ का पद धारण न करता हो।
5. राष्ट्रपति का कार्यकाल - (अनुच्छेद 58)
• राष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष होता है।
• वह अपना उत्तराधिकारी पद ग्रहण करने तक पद पर बना रहता है।
• राष्ट्रपति अपना त्यागपत्र उपराष्ट्रपति को देता है।
• राष्ट्रपति का पुनर्निर्वाचन भी हो सकता है।
2. विधायी अधिकार
3. वित्तीय अधिकार
4. न्यायिक अधिकार
5. आपातकालीन अधिकार
6. सैन्य अधिकार
7. कूटनीतिक अधिकार
8. नियुक्ति संबंधी अधिकार
राष्ट्रपति की शक्तियां - राष्ट्रपति की शक्तियों को कई भागों में समझा जा सकता है।
(1) कार्यपालिका शक्तियाँ -
राष्ट्रपति -
• अनुच्छेद 74 के अनुसार लोकसभा में बहुमत दल के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है। बहुमत दल के नेता के अभाव में उस दल के नेता को जो लोकसभा में बहुमत साबित कर सके।
• अनुच्छेद 75 के अनुसार वह प्रधानमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है।
• महान्यायवादी की नियुक्ति करता है।
• राज्यपालों की नियुक्ति करता है।
• नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, वित्त आयोग, संघ लोक सेवा आयोग, निर्वाचन आयोग आदि के आदि संवैधानिक पदों पर अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्तियाँ करता है।
• संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति करता है।
• विदेशों में भारत के राजदूतों एवं उच्चायुक्तों की नियुक्ति करता है।
विधाई शक्तियों -
राष्ट्रपति -
• अनुच्छेद 79 के अनुसार संसद का अधिवेशन बुलाता और स्थगित करता है एवं सत्रावसान करता है। दो सदनों की बैठक में छ माह से अधिक का अंतराल नहीं होना चाहिए।
• मंत्रिपरिषद् की अनुशंसा पर लोकसभा को भंग कर सकता है।
• संसद में प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र तथा आम चुनाव के बाद प्रथम सत्र में राष्ट्रपति का विशेष अभिभाषण होता है। राष्ट्रपति दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुला सकते हैं।
• संसद को संदेश भेज सकता है।
• संसद द्वारा पारित विधेयक पर अपनी स्वीकृति देता है। इस हेतु राष्ट्रपति के पास सामान्यतः तीन विकल्प होते हैं -
1. स्वीकृति देना
2. स्वीकृति रोकना
3. धन विधेयक को छोड़कर किसी विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस भेजना यदि संसद पुनर्विचार के बाद विधेयक को फिर से पारित कर देती है, तो राष्ट्रपति को उस पर स्वीकृति देनी होती है।
• संसद के दोनों सदनों के बीच गतिरोध होने पर संयुक्त बैठक बुला सकता है।अध्यादेश जारी करने की शक्ति -
अनुच्छेद 123 के अंतर्गत जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों और तत्काल कार्रवाई आवश्यक हो, तो राष्ट्रपति अध्यादेश जारी कर सकता है। लेकिन अध्यादेश अस्थायी कानून होता है जिसकी अवधि छः माह या संसद के पुनः बैठक में आने के बाद संविधान द्वारा निर्धारित अवधि में उसे संसद की स्वीकृति प्राप्त करनी होती है।
राष्ट्रपति की वीटो शक्ति -
राष्ट्रपति की विधायी शक्तियों में वीटो शक्ति महत्वपूर्ण है।
1. पूर्ण वीटो - राष्ट्रपति किसी विधेयक पर स्वीकृति देने से इंकार कर सकता है। इसे पूर्ण वीटो कहते हैं।
2. निलंबनकारी वीटो - राष्ट्रपति किसी साधारण विधेयक को पुनर्विचार के लिए संसद को लौटा सकता है। इसे निलंबनकारी वीटो कहा जाता है।
3. पॉकेट वीटो - राष्ट्रपति किसी विधेयक पर तत्काल निर्णय न लेकर उसे अनिश्चित अवधि तक अपने पास रख सकता है।भारत में राष्ट्रपति के लिए अमेरिकी संविधान की तरह कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं है।
महत्वपूर्ण - धन विधेयक को राष्ट्रपति पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकता।
7. राष्ट्रपति की वित्तीय शक्तियाँ अनुच्छेद 112 -
• वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट) अर्थात बजट राष्ट्रपति के नाम से संसद के समक्ष रखा जाता है।
• धन विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व अनुशंसा के बिना लोकसभा में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
• भारत की आकस्मिक निधि राष्ट्रपति के नियंत्रण में रहती है।
• अनुच्छेद 280 के अनुसार वित्त आयोग का गठन राष्ट्रपति करता है जो केंद्र और राज्यों के बीच करों के वितरण आदि से संबंधित महत्वपूर्ण सिफारिशें करता है।
8. राष्ट्रपति की न्यायिक शक्तियाँ
अनुच्छेद 72 - राष्ट्रपति को कुछ मामलों में क्षमादान की शक्ति प्राप्त है। वह
• क्षमा
• दण्ड में कमी
• दण्ड का स्थगन
• दण्ड का परिवर्तन कर सकता है।
विशेष रूप से -
• कोर्ट मार्शल के मामलों में
• संघीय कानून से संबंधित अपराधों में
• मृत्यु-दण्ड के मामलों में
• राष्ट्रपति को क्षमादान की शक्ति प्राप्त है।
विशेष रूप से राष्ट्रपति को - कोर्ट मार्शल के मामलों में, संघीय कानून से संबंधित अपराधों में, तथा मृत्युदंड के मामलों में क्षमादान आदि की शक्ति प्राप्त है।
9. राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियाँ
संविधान राष्ट्रपति को तीन प्रकार की आपात शक्तियाँ प्रदान करता है -
अनुच्छेद 352 - राष्ट्रीय आपातकाल - जब भारत की सुरक्षा को युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह से खतरा हो।
अनुच्छेद 356 - राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल होने पर राष्ट्रपति शासन
अनुच्छेद 360 - वित्तीय आपातकाल - इस प्रकार आपातकालीन शक्तियाँ राष्ट्रपति के पद को अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती हैं।
राष्ट्रपति के सैन्य अधिकार -
राष्ट्रपति भारतीय संघ की सशस्त्र सेनाओं का सर्वोच्च सेनापति (Supreme Commander) है। वह - थल सेना, नौसेना, वायु सेना से संबंधित सर्वोच्च संवैधानिक भूमिका रखता है। लेकिन राष्ट्रपति व्यक्तिगत रूप से युद्ध संचालित नहीं करता। सैन्य शक्ति का प्रयोग संवैधानिक और वैधानिक व्यवस्था तथा मंत्रिपरिषद की सलाह के अधीन होता है।
राष्ट्रपति के कूटनीतिक अधिकार -
राष्ट्रपति भारत का संवैधानिक प्रतिनिधि भी है। वह विदेशों में भारत के राजदूतों/उच्चायुक्तों की नियुक्ति करता है, भारत में विदेशी राजनयिक प्रतिनिधियों के प्रत्यय-पत्र स्वीकार करता है, अंतरराष्ट्रीय संधियों एवं समझौतों के संबंध में संवैधानिक कार्य करता है।
10. राष्ट्रपति की वास्तविक स्थिति - भारतीय संविधान के अनुसार राष्ट्रपति संघ का संवैधानिक प्रमुख है, लेकिन संसदीय शासन प्रणाली में वह सामान्यतः प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करता है। अनुच्छेद 74 राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद होगी।राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह को एक बार पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकता है, लेकिन पुनर्विचार के बाद दी गई सलाह के अनुसार कार्य करना होता है।
42वें संविधान संशोधन के बाद यह स्पष्ट किया गया कि राष्ट्रपति को सलाह देने वाला निर्णय केवल प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत सलाह नहीं, बल्कि केंद्रीय मंत्रिमंडल के लिखित निर्णय पर आधारित होना चाहिए। 44 वें संविधान संशोधन के बाद राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद को अपनी सलाह पर पुनर्विचार हेतु लौटा सकता है जिसे पुनः प्रस्तुत करने पर मानना अनिवार्य है।
राष्ट्रपति की सीमाएं -
1. राज्य की उच्च न्यायपालिका की शक्तियाँ राष्ट्रपति अपने अधीन नहीं कर सकता।
2. संसद -राष्ट्रपति की विधायी शक्तियाँ संसद की संवैधानिक भूमिका से नियंत्रित होती हैं। राष्ट्रपति संसद के कानूनों के स्थान पर अपनी इच्छा से स्थायी कानून नहीं बना सकता।अध्यादेश भी अंततः संसदीय नियंत्रण के अधीन है।
3. न्यायिक समीक्षा - राष्ट्रपति के कार्य पूरी तरह न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं हैं।विशेष रूप से आपातकालीन शक्तियों और राष्ट्रपति शासन के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने संवैधानिक समीक्षा की शक्ति का प्रयोग किया है।
4. संविधान - राष्ट्रपति का प्रत्येक कार्य संविधान के अधीन है।राष्ट्रपति संविधान से ऊपर नहीं है।
न्यायिक निर्णय -
D.C. Wadhwa v. State of Bihar (1987) में सर्वोच्च न्यायालय ने अध्यादेश शक्ति के बार-बार और नियमित पुनर्प्रख्यापन की प्रवृत्ति की आलोचना की।
Krishna Kumar Singh v. State of Bihar (2017) में सर्वोच्च न्यायालय ने अध्यादेश शक्ति के संबंध में महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत निर्धारित किए।
Maru Ram v. Union of India (1980) तथा Kehar Singh v. Union of India (1989) जैसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति की संवैधानिक प्रकृति पर महत्वपूर्ण विचार दिए।
S.R. Bommai v. Union of India (1994) - इस ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 356 के प्रयोग पर न्यायिक समीक्षा को स्वीकार किया और राष्ट्रपति शासन की शक्ति को संवैधानिक सीमाओं के अधीन माना।
राष्ट्रपति के प्रमुख कर्तव्य -
राष्ट्रपति केवल अधिकारों का धारक नहीं है। संविधान उस पद को कुछ महत्वपूर्ण संवैधानिक दायित्व भी देता है।
1. संविधान और कानून की रक्षा करना।
2. संघ की कार्यपालिका को संविधान के अनुसार संचालित करना।
3. मंत्रिपरिषद की संवैधानिक सलाह के अनुसार कार्य करना।
4. संसद की संवैधानिक प्रक्रिया को बनाए रखना।
5. आवश्यक संवैधानिक नियुक्तियाँ करना।
6. संघ और राज्यों के बीच संवैधानिक संतुलन बनाए रखने में भूमिका निभाना।
7. संविधान के अंतर्गत प्रदत्त आपातकालीन शक्तियों का विवेकपूर्ण प्रयोग करना।
8. राष्ट्र की एकता, अखंडता और संवैधानिक शासन की रक्षा करना।
राष्ट्रपति की विवेकाधीन शक्ति -
भारतीय राष्ट्रपति की विवेकाधीन शक्ति बहुत सीमित है। विशेष परिस्थितियों में राष्ट्रपति को कुछ वास्तविक विकल्प प्राप्त हो सकते हैं, जैसे -
त्रिशंकु लोकसभा- यदि किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री की नियुक्ति में कुछ संवैधानिक विवेक का प्रयोग करना पड़ सकता है।
प्रधानमंत्री की मृत्यु या इस्तीफा - ऐसी स्थिति में राष्ट्रपति को अंतरिम व्यवस्था और बहुमत प्राप्त करने की संभावना वाले नेता के संबंध में निर्णय करना पड़ सकता है।
लोकसभा में बहुमत पर संदेह - यदि प्रधानमंत्री के बहुमत पर गंभीर संदेह हो, तो राष्ट्रपति संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार बहुमत परीक्षण की आवश्यकता उत्पन्न कर सकता है।
लेकिन राष्ट्रपति का विवेक व्यक्तिगत राजनीतिक पसंद नहीं हो सकता। वह संविधान, संसदीय परंपरा और लोकतांत्रिक बहुमत के सिद्धांत से बंधा है
11. उपराष्ट्रपति अनुच्छेद 63 - भारत में एक उपराष्ट्रपति होगा। उपराष्ट्रपति संघ की कार्यपालिका का महत्वपूर्ण अंग है।
उपराष्ट्रपति के मुख्य कार्य -
• राज्यसभा का पदेन सभापति होता है।
• राष्ट्रपति का पद रिक्त होने पर कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर सकता है।
• राष्ट्रपति के कार्य करने में असमर्थ होने पर उसके कार्यों का निर्वहन कर सकता है।
उपराष्ट्रपति का कार्यकाल - उपराष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष होता है।
12. प्रधानमंत्री अनुच्छेद (74 - 75)-
प्रधानमंत्री भारतीय संसदीय शासन व्यवस्था में वास्तविक कार्यपालिका का केंद्र है, लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन के नेता की नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के रूप में करता है।
प्रधानमंत्री के कार्य एवं शक्तियां -
• मंत्रियों का चयन करता है।
• मंत्रियों के विभागों का निर्धारण करता है।
• मंत्रिपरिषद का नेतृत्व करता है।
• राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद के बीच संपर्क स्थापित करता है।
• सरकार की नीतियों का नेतृत्व करता है।
• संसद में सरकार का प्रमुख राजनीतिक प्रतिनिधि होता है।
13. संघ की मंत्रिपरिषद (अनुच्छेद 74)-
प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देती है।
मंत्री परिषद की शक्तियां एवं कार्य - अनुच्छेद 75 -
मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर करता है जोक लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है। यह संसदीय शासन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है।
सामूहिक उत्तरदायित्व का अर्थ -
यदि लोकसभा में सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो पूरी मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना पड़ता है। अर्थात मंत्रिपरिषद साथ शासन करती है और साथ ही उत्तरदायित्व भी स्वीकार करती है।
14. भारत के महान्यायवादी (अनुच्छेद 76) -
भारत का महान्यायवादी संघ सरकार का सर्वोच्च विधि अधिकारी होता है। यह न्यायालय में सरकार का पक्ष रखता है।
उसका मुख्य कार्य -
• भारत सरकार को कानूनी सलाह देना।
• राष्ट्रपति द्वारा सौंपे गए कानूनी कार्य करना।
• संविधान और कानून से संबंधित मामलों में सरकार का पक्ष रखना।
15. राज्य की कार्यपालिका -
राज्य कार्यपालिका से संबंधित प्रावधान संविधान के भाग VI, अनुच्छेद 153 से 167 में हैं। इसके के मुख्य अंग हैं -
• राज्यपाल
• मुख्यमंत्री
• राज्य मंत्रिपरिषद
• राज्य का महाधिवक्ता
16. राज्यपाल अनुच्छेद 153 -
प्रत्येक राज्य में एक राज्यपाल होगा। एक ही व्यक्ति को दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल भी नियुक्त किया जा सकता है।राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है।
17. राज्यपाल की नियुक्ति अनुच्छेद 155 -
राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।इसलिए राज्यपाल का निर्वाचन जनता द्वारा नहीं होता। राज्यपाल अन्य राज्य का नागरिक होता है।
कार्यकाल अनुच्छेद 156 -
राज्यपाल सामान्यतः 5 वर्ष के लिए पद धारण करता है। लेकिन वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद पर रहता है।
18. राज्यपाल की योग्यताएँ अनुच्छेद 157 -
राज्यपाल बनने के लिए व्यक्ति -
• भारत का नागरिक हो।
• उसकी आयु 35 वर्ष पूरी हो चुकी हो।
• वह राष्ट्रपति की दृष्टि में इस पद के योग्य हो।
राज्यपाल के कार्यों एवं शक्तियों की सीमाएं अनुच्छेद 158 -
राज्यपाल संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं हो सकता और कोई लाभ का पद धारण नहीं कर सकता। वह राष्ट्रपति के प्रसाद समाप्ति पर पद से हट जाता है।
19. राज्यपाल की कार्यपालिका शक्तियाँ -
• मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है।
• मुख्यमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है।
• राज्य के महाधिवक्ता की नियुक्ति करता है।
• राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति करता है।
• राज्य प्रशासन के संबंध में संवैधानिक कार्य करता है।
• राज्य सरकार के कार्य राज्यपाल के नाम से किए जाते हैं।
20. राज्यपाल की विधायी शक्तियाँ -
• विधानसभा का अधिवेशन बुलाता है।
• विधानसभा को स्थगित कर सकता है।
• विधानसभा को भंग कर सकता है।
• विधानमंडल को संबोधित कर सकता है।
• विधेयकों को स्वीकृति दे सकता है।
• किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख सकता है।
• अनुच्छेद 213 के अंतर्गत अध्यादेश - जब राज्य विधानमंडल का सत्र नहीं चल रहा हो और तत्काल कार्रवाई आवश्यक हो, तो राज्यपाल अध्यादेश जारी कर सकता है।
21. राज्यपाल की वित्तीय शक्तियाँ -
• राज्य का बजट राज्यपाल के नाम से विधानमंडल में प्रस्तुत किया जाता है।
• धन विधेयक राज्यपाल की पूर्व अनुशंसा के बिना प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
• राज्य की आकस्मिक निधि राज्यपाल के नियंत्रण में रहती है।
22. राज्यपाल की न्यायिक शक्तियाँ अनुच्छेद 161-
राज्यपाल को राज्य की कार्यपालिका शक्ति के अंतर्गत आने वाले कानूनों से संबंधित अपराधों में दण्ड को -
• क्षमा करने
• स्थगित करने
• कम करने
• बदलने की शक्ति प्राप्त है।
नोट - राष्ट्रपति और राज्यपाल की क्षमादान शक्ति समान नहीं है। राष्ट्रपति की शक्ति का क्षेत्र व्यापक है।
23. मुख्यमंत्री (अनुच्छेद 164) -
मुख्यमंत्री राज्य की वास्तविक कार्यपालिका का प्रमुख
मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करता है। विधानसभा में बहुमत प्राप्त दल या गठबंधन के नेता को मुख्यमंत्री बनाया जाता है।
मुख्यमंत्री की शक्तियां एवं कार्य -
• मंत्रियों का चयन करता है।
• राज्यपाल को मंत्रियों की नियुक्ति की सलाह देता है।
• मंत्रियों के विभागों का निर्धारण करता है।
• राज्य मंत्रिपरिषद का नेतृत्व करता है।
• राज्य सरकार की नीतियों का संचालन करता है।
• राज्यपाल को मंत्रिपरिषद के निर्णयों की जानकारी देता है।
24. राज्य मंत्रिपरिषद -
राज्य में मुख्यमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद होती है। यह राज्यपाल को सहायता और सलाह देती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।यदि विधानसभा में सरकार बहुमत खो देती है तो मुख्यमंत्री सहित पूरी मंत्रिपरिषद को पद छोड़ना पड़ सकता है।
25. राज्य का महाधिवक्ता (अनुच्छेद 165) -
राज्य का महाधिवक्ता राज्य का सर्वोच्च विधि अधिकारी होता है जिसकी नियुक्ति राज्यपाल करता है। उसका कार्य राज्य सरकार को कानूनी मामलों में सलाह देना तथा राज्य की ओर से न्यायालयों में विधिक कार्य करना है।
26. संघ और राज्य की कार्यपालिका में अंतर -
आधार संघ राज्य
संवैधानिक राष्ट्रपति राज्यपाल
प्रमुख
वास्तविक प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री
प्रमुख
संविधान। भाग V भाग VI
का भाग
प्रमुख 52–78 153–167
अनुच्छेद
संवैधानिक राष्ट्रपति का। राज्यपाल की
प्रमुख की निर्वाचन राष्ट्रपति द्वारा
नियुक्ति
मंत्रिपरिषद प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री
का संचालन का नेतृत्व का नेतृत्व
उत्तरदायित्व लोकसभा विधानसभा
विधि महान्यायवादी महाधिवक्ता
अधिकारी
अध्यादेश अनुच्छेद 123 अनुच्छेद 213
क्षमादान अनुच्छेद 72 अनुच्छेद 161
राज्य की कार्यपालिकाएँ पूरी तरह अलग-अलग नहीं हैं। संविधान ने इनके बीच समन्वय की व्यवस्था की है।
राज्य की कार्यपालिकाएँ पूरी तरह अलग-अलग नहीं हैं। संविधान ने इनके बीच समन्वय की व्यवस्था की है।
अनुच्छेद 256 - राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार किया जाना चाहिए कि संसद द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन सुनिश्चित हो।
अनुच्छेद 257 - कुछ मामलों में राज्य की कार्यपालिका पर संघ की कार्यपालिका का नियंत्रण भी हो सकता है।
अनुच्छेद 355 - संघ का कर्तव्य है कि वह राज्यों को बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से सुरक्षा प्रदान करे तथा यह सुनिश्चित करे कि प्रत्येक राज्य की सरकार संविधान के अनुसार चलाई जाए।
इस प्रकार भारतीय संघवाद में राष्ट्रीय एकता और राज्यीय स्वायत्तता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया गया है।
27. संघ और राज्य की कार्यपालिका का संबंध -
भारतीय संघात्मक व्यवस्था में संघ और एक दूसरे के पूरक एवं सहयोगी है।
28. परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण बिंदु इसे याद रखने का आसान सूत्र है -
संघ अनुच्छेद 52–78 - राष्ट्रपति→प्रधानमंत्री→मंत्रिपरिषद→महान्यायवादी
राज्य अनुच्छेद 153–167 - राज्यपाल →मुख्यमंत्री→मंत्रिपरिषद→ महाधिवक्ता
चार अत्यंत महत्वपूर्ण अनुच्छेद -
अनुच्छेद 74 → संघ में मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह।
अनुच्छेद 163 → राज्य में मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह।
अनुच्छेद 75(3) → संघ की मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी।
अनुच्छेद 164(2) → राज्य की मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी
निष्कर्ष - भारतीय संविधान ने संघ और राज्य दोनों स्तरों पर संसदीय कार्यपालिका की स्थापना की है। राष्ट्रपति और राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख हैं, जबकि वास्तविक शासन प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद करती है। इस व्यवस्था का मूल आधार संसदीय उत्तरदायित्व, सामूहिक उत्तरदायित्व और संविधान की सर्वोच्चता है।
राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद की वास्तविक स्थिति - भारतीय व्यवस्था में राष्ट्रपति नाममात्र की कार्यपालिका तथा मंत्रिपरिषद वास्तविक कार्यपालिका मानी जाती है। इसे सरल रूप में ऐसे समझ सकते हैं: राष्ट्रपति = संवैधानिक प्रमुख
प्रधानमंत्री + मंत्रिपरिषद = वास्तविक शासन संचालन
हालाँकि राष्ट्रपति केवल औपचारिक पद नहीं है। संविधान उसे कुछ महत्वपूर्ण संवैधानिक विवेक और प्रक्रियात्मक भूमिकाएँ देता है, विशेषकर ऐसी परिस्थितियों में जहाँ स्पष्ट बहुमत उपलब्ध न हो या संवैधानिक स्थिति असाधारण हो।
मंत्रिपरिषद की सामूहिक उत्तरदायित्व - अनुच्छेद 75(3) के अनुसार मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है। इसका अर्थ है कि मंत्रिपरिषद को राष्ट्रपति के प्रति नहीं बल्कि लोकसभा के प्रति राजनीतिक रूप से उत्तरदायी होना पड़ता है। यदि लोकसभा में मंत्रिपरिषद अपना बहुमत खो देती है, तो उसे पद छोड़ना पड़ सकता है। इससे स्पष्ट होता है कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद का राजनीतिक स्वामी नहीं है। वह संविधान के अनुसार कार्य करने वाला राष्ट्राध्यक्ष है।
राष्ट्रपति की सलाह को पुनर्विचार के लिए लौटाने की शक्ति -
राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद द्वारा दी गई सलाह पर एक बार पुनर्विचार का अनुरोध करने का अधिकार है। उदाहरण के लिए यदि मंत्रिपरिषद किसी विषय पर राष्ट्रपति को सलाह देती है, तो राष्ट्रपति कह सकता है कि इस विषय पर पुनर्विचार किया जाए।लेकिन यदि मंत्रिपरिषद पुनर्विचार के बाद वही सलाह दोबारा देती है, तो राष्ट्रपति उस सलाह के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य है। इससे राष्ट्रपति की भूमिका और मंत्रिपरिषद की वास्तविक कार्यपालिका शक्ति के बीच संतुलन दिखाई देता है।
राष्ट्रपति मंत्रियों की नियुक्ति करता है, लेकिन स्वतंत्र रूप से नहीं -
अनुच्छेद 75 के अनुसार प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है। अन्य मंत्रियों की नियुक्ति भी राष्ट्रपति करता है, लेकिन प्रधानमंत्री की सलाह पर। इसलिए राष्ट्रपति मंत्रियों की नियुक्ति में संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन सामान्य परिस्थितियों में वह अपनी पसंद से मंत्रियों का चयन नहीं करता।
8. राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच विशेष संबंधराष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद के संबंध को समझने के लिए प्रधानमंत्री की स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है।राष्ट्रपति → मंत्रिपरिषद → संसदइन तीनों के बीच समन्वय स्थापित करता है।राष्ट्रपति को सरकार के निर्णयों की जानकारी देना प्रधानमंत्री का संवैधानिक दायित्व है। इसलिए प्रधानमंत्री केवल मंत्रिपरिषद का नेता ही नहीं, बल्कि राष्ट्रपति और सरकार के बीच मुख्य संपर्क-सूत्र भी है।
9. न्यायिक दृष्टिकोण
भारतीय न्यायपालिका ने भी राष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट किया है।Shamsher Singh v. State of Punjab (1974) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति और राज्यपाल सामान्यतः अपनी संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के आधार पर करते हैं।इस निर्णय ने संसदीय शासन व्यवस्था के उस सिद्धांत को मजबूत किया कि वास्तविक कार्यपालिका शक्ति निर्वाचित सरकार के पास होती है।
निष्कर्ष - राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद का संबंध सहयोग, सलाह और संवैधानिक उत्तरदायित्व पर आधारित है।राष्ट्रपति संविधान का संरक्षक और राष्ट्र का संवैधानिक प्रमुख है, जबकि प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद वास्तविक कार्यपालिका है। राष्ट्रपति सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करता है, सलाह को एक बार पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है, लेकिन पुनर्विचार के बाद दी गई सलाह को मानना उसके लिए अनिवार्य है। इसलिए भारतीय संविधान में राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद के संबंध को “संवैधानिक प्रमुख और वास्तविक कार्यपालिका के बीच संबंध” के रूप में समझना सबसे उपयुक्त है।
भारतीय संविधान में राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद का संबंध संसदीय शासन प्रणाली की मूल आधारशिला है। राष्ट्रपति राज्य का संवैधानिक प्रमुख है, जबकि वास्तविक कार्यपालिका शक्ति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद के माध्यम से संचालित होती है।
भारत में उपराष्ट्रपति -
भारत के उपराष्ट्रपति का संवैधानिक पद है। उपराष्ट्रपति के दो प्रमुख संवैधानिक रूप हैं -
1. राज्यसभा के पदेन सभापति के रूप में
2. राष्ट्रपति के पद में आकस्मिक रिक्ति होने पर कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में
उपराष्ट्रपति पद के संवैधानिक आधार - संविधान के अनुच्छेद 63 में उपराष्ट्रपति के पद का प्रावधान भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा है।
उपराष्ट्रपति से संबंधित प्रमुख अनुच्छेद-
• 63 उपराष्ट्रपति का पद
• 64 राज्यसभा का पदेन सभापति
• 65 राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन
• 66 उपराष्ट्रपति का निर्वाचन
• 67 कार्यकाल
• 68 रिक्ति भरने का समय
• 69 शपथ या प्रतिज्ञान
• 70 अन्य आकस्मिकताओं में राष्ट्रपति के कार्य
• 71 राष्ट्रपति/उपराष्ट्रपति के निर्वाचन संबंधी विवाद
उपराष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति -
उपराष्ट्रपति भारत का दूसरा सर्वोच्च संवैधानिक पद है। लेकिन -
• उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति का अधीनस्थ नहीं है।
• वह स्वतंत्र संवैधानिक पदाधिकारी है। उसका मुख्य नियमित कार्य राज्यसभा के सभापति के रूप में होता है।
उपराष्ट्रपति का निर्वाचन - उपराष्ट्रपति का निर्वाचन अनुच्छेद 66 के अंतर्गत होता है। निर्वाचन मंडल में संसद (लोकसभा एवं राज्य सभा के सभी निर्वाचित एवं मनोनीत सदस्य) के दोनों सदनों के सदस्य होते हैं।
निर्वाचन की पद्धति - उपराष्ट्रपति का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली द्वारा एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) तथा गुप्त मतदान से होता है। इसमें प्रत्येक सांसद अपने पसंद के उम्मीदवारों को क्रम देता है 1, 2, 3, 4...यदि प्रथम वरीयता के मतों से कोई उम्मीदवार आवश्यक कोटा प्राप्त नहीं करता, तो मतों का स्थानांतरण द्वितीय वरीयता प्राप्त को किया जाता है।
उपराष्ट्रपति बनने की योग्यताएँ - अनुच्छेद 66(3) के अनुसार व्यक्ति में निम्न योग्यताएँ होनी चाहिए
• भारत का नागरिक हो
• न्यूनतम आयु 35 वर्ष
• राज्यसभा का सदस्य बनने की योग्यता
• लाभ का पद नहीं
नोट - राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल तथा मंत्री आदि को इस उद्देश्य से लाभ का पद नहीं माना जाता।
पद की शपथ - अनुच्छेद 69 के अनुसार उपराष्ट्रपति पद ग्रहण करने से पहले राष्ट्रपति या राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त व्यक्ति के माध्यम से शपथ या प्रतिज्ञान करता है कि वह -
• संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखेगा।
• अपने पद के कर्तव्यों का विधिवत निर्वहन करेगा।
7. उपराष्ट्रपति का कार्यकाल - अनुच्छेद 67 के अनुसार उपराष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष होता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पाँच वर्ष पूरे होते ही वह तुरंत पद से हट जाता है। नया उपराष्ट्रपति पद ग्रहण करने तक वह अपने पद पर बना रह सकता है। वह अपने पद से नीचे की गरिमा का कोई पद धारण नहीं कर सकता।
पुनर्निर्वाचन - उपराष्ट्रपति पुनः निर्वाचित हो सकता है। संविधान में उसके पुनर्निर्वाचन पर कोई सीमा नहीं लगाई गई है।
उपराष्ट्रपति को पद से हटाना - उपराष्ट्रपति को राष्ट्रपति की तरह महाभियोग द्वारा नहीं हटाया जाता। उसे हटाने की विशेष प्रक्रिया है जिसके अनुसार -
1. राज्यसभा में उपराष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया जाता है।
2. प्रस्ताव को राज्यसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित किया जाना चाहिए।
3. इसके बाद लोकसभा को उस प्रस्ताव से सहमत होना होता है।
4. प्रस्ताव प्रस्तुत करने के लिए कम से कम 14 दिन का नोटिस देना आवश्यक है।
उपराष्ट्रपति के निष्कासन हेतु राज्यसभा प्रस्ताव + लोकसभा की सहमति आवश्यक है।
उपराष्ट्रपति का पद रिक्त होना -
उपराष्ट्रपति का पद निम्न परिस्थितियों में रिक्त हो सकता है -
• कार्यकाल समाप्त होने पर
• त्यागपत्र देने पर
• पद से हटाए जाने पर
• मृत्यु होने पर
• निर्वाचन अमान्य घोषित होने पर आदि
यदि पद रिक्त हो जाता है, तो संविधान के अनुसार नए उपराष्ट्रपति का निर्वाचन यथाशीघ्र कराया जाता है। ससंद को उपराष्ट्रपति के पद का कार्यकाल समाप्त होने के कारण रिक्त होने से पहले चुनाव प्रक्रिया पूर्ण कर लेनी चाहिए।
उपराष्ट्रपति का सबसे महत्वपूर्ण कार्य -
राज्यसभा का सभापति - अनुच्छेद 64 के अनुसार उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति (Ex-officio Chairman) होता है। इसका अर्थ है कि उपराष्ट्रपति राज्यसभा का सदस्य बने बिना उसका सभापति होता है। वह राज्यसभा का सदस्य नहीं होता फिर भी राज्यसभा की कार्यवाही का संचालन करता है।
राज्यसभा के सभापति के रूप में उपराष्ट्रपति के कार्य -
(1) सदन की कार्यवाही का संचालन -
वह सदन में -
कार्यवाही संचालित करता है।
सदस्यों को बोलने की अनुमति देता है।
व्यवस्था बनाए रखता है।
नियमों के अनुसार बहस को आगे बढ़ाता है।
(2) सदन में अनुशासन बनाए रखना -
यदि कोई सदस्य सदन की कार्यवाही में बाधा डालता है या नियमों का उल्लंघन करता है, तो सभापति उसे नियमों के अनुसार नियंत्रित कर सकता है।
(3) नियमों की व्याख्या - राज्यसभा के नियमों से संबंधित प्रश्नों पर सभापति निर्णय देता है। उसका निर्णय सदन की कार्यवाही के संचालन में महत्वपूर्ण होता है।
(4) मतदान का अधिकार - उपराष्ट्रपति सामान्य स्थिति में राज्यसभा में मतदान नहीं करता। लेकिन यदि किसी प्रश्न पर मत बराबर हो जाएँ, तो सभापति निर्णायक मत (Casting Vote) देता है। अर्थात् सामान्य मतदान = में मत नहीं
मत बराबर होने पर = निर्णायक मत
विधेयकों के संबंध में भूमिका - राज्यसभा के सभापति के रूप में उपराष्ट्रपति सदन में विधेयकों पर होने वाली कार्यवाही का संचालन करता है।लेकिन उपराष्ट्रपति स्वयं विधेयक को राष्ट्रपति की तरह स्वीकृति नहीं देता। वह सदन की कार्यवाही को संवैधानिक एवं संसदीय नियमों के अनुसार संचालित करता है।
संसदीय समितियों से संबंधित भूमिका - राज्यसभा के सभापति के रूप में उपराष्ट्रपति विभिन्न संसदीय समितियों के संबंध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वह निर्धारित नियमों के अनुसार समितियों का गठन या सदस्यों के नामांकन से संबंधित कार्य करता है।
राष्ट्रपति के रूप में कार्य करना - उपराष्ट्रपति की दूसरी अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अनुच्छेद 65 में है। यदि राष्ट्रपति का पद किसी कारण से रिक्त हो जाता है, तो उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है। उदाहरण के लिए -
• राष्ट्रपति की मृत्यु
• राष्ट्रपति का त्यागपत्र
• राष्ट्रपति को पद से हटाया जाना
• राष्ट्रपति का निर्वाचन निरस्त होना
आदि परिस्थितियों में राष्ट्रपति का पद रिक्त हो सकता है। ऐसी स्थिति में उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन करता है।
राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन -
यदि राष्ट्रपति किसी कारण से अपने कार्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है, जैसे
बीमारी, विदेश यात्रा, अस्थायी अनुपस्थिति अन्य परिस्थितियाँ तो उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन कर सकता है। इस स्थिति में वह राष्ट्रपति के सभी आवश्यक संवैधानिक कार्य कर सकता है।
जब उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है तो संवैधानिक व्यवस्था के तहत जब उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है या राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन करता है, तब वह राज्यसभा के सभापति के रूप में अपने पद के कर्तव्यों का पालन नहीं करता। उस अवधि में राज्यसभा के उपसभापति सदन की अध्यक्षता करता है।
राष्ट्रपति के रूप में कार्य करने पर वेतन - जब उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है, तब उसे उस अवधि के लिए राष्ट्रपति के पद से संबंधित वेतन एवं भत्ते प्राप्त होते हैं। उस अवधि में वह उपराष्ट्रपति के रूप में मिलने वाले वेतन का दावा नहीं करता।
18. उपराष्ट्रपति की शक्तियां -
उपराष्ट्रपति की शक्तियों को दो भागों में बाँटा जा सकता है -
सभापति के रूप में शक्तियाँ -
• राज्यसभा की अध्यक्षता
• कार्यवाही का संचालन
• अनुशासन बनाए रखना
• नियमों की व्याख्या
• निर्णायक मत देना
• संसदीय समितियों से संबंधित भूमिका
राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते समय -
• राष्ट्रपति के संवैधानिक कार्यों का निर्वहन
• राष्ट्रपति के पद की शक्तियों का प्रयोग
• राष्ट्रपति की अनुपस्थिति/असमर्थता में संवैधानिक निरंतरता बनाए रखना
उपराष्ट्रपति और राष्ट्रपति में अंतर -
आधार - राष्ट्रपति - उपराष्ट्रपति
संवैधानिक अनुच्छेद - 52 - 63
पद - राष्ट्राध्यक्ष - दूसरा सर्वोच्च संवैधानिक पद
निर्वाचन - निर्वाचित निर्वाचन मंडल संसद के दोनों सदनों के सदस्य एवं राज्य विधानसभाओं की भूमिका होती है - जबकि उपराष्ट्रपति में केवल सासंद में मत ही पड़ते हैं।
कार्यकाल - 5 वर्ष - 5 वर्ष
संसद से संबंध - संसद का अंग राज्यसभा का पदेन सभापति
सामान्य भूमिका - संघ की कार्यपालिका का संवैधानिक प्रमुख - राज्यसभा का सभापति
हटाने की प्रक्रिया - महाभियोग - राज्यसभा प्रस्ताव + लोकसभा की सहमति
पुनर्निर्वाचन - संभव - संभव नहीं
20. उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति में संबंध - यह प्रश्न परीक्षा में बहुत अच्छा उत्तर बन सकता है। उपराष्ट्रपति राज्यसभा का सभापति अपने उपराष्ट्रपति पद के कारण होता है। अर्थात् राज्यसभा द्वारा अलग से सभापति निर्वाचित नहीं किया जाता। इसीलिए इसे - Ex-officio Chairman of Rajya Sabha अर्थात् पदेन सभापति कहा जाता है।
उपराष्ट्रपति की संवैधानिक महत्ता -
उपराष्ट्रपति का पद भारतीय लोकतंत्र में कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है -
1. संसदीय लोकतंत्र का संरक्षण - वह राज्यसभा की कार्यवाही को निष्पक्ष और व्यवस्थित ढंग से संचालित करता है।
2. संघीय व्यवस्था में योगदान - राज्यसभा राज्यों के प्रतिनिधित्व का सदन है। उसके सभापति के रूप में उपराष्ट्रपति संघीय संसदीय व्यवस्था के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
3. संवैधानिक निरंतरता - राष्ट्रपति के पद में आकस्मिक रिक्ति या राष्ट्रपति की असमर्थता की स्थिति में उपराष्ट्रपति संवैधानिक व्यवस्था को टूटने से बचाता है।
4. निष्पक्षता - सभापति के रूप में उससे अपेक्षा की जाती है कि वह राजनीतिक दलगत हितों से ऊपर उठकर सदन की कार्यवाही संचालित करे।
22. एक विशेषता - भारत में उपराष्ट्रपति का पद कुछ हद तक अमेरिकी उपराष्ट्रपति के पद से मिलता-जुलता दिखाई देता है क्योंकि दोनों ही ऊपरी सदन की अध्यक्षता करते हैं। लेकिन दोनों की संवैधानिक स्थिति पूरी तरह समान नहीं है। भारत में उपराष्ट्रपति मुख्यतः राज्यसभा का सभापति है, जबकि राष्ट्रपति के पद की रिक्ति अथवा राष्ट्रपति की असमर्थता की स्थिति में वह राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन करता है।
सूत्र - 63 से पद, 64 से सभापति, 65 से राष्ट्रपति, 66 से चुनाव, 67 से कार्यकाल, 68 से रिक्ति, 69 से शपथ, 70 से आकस्मिकता, 71 से निर्वाचन विवाद।
निष्कर्ष - भारतीय संविधान में उपराष्ट्रपति का पद द्वैध संवैधानिक भूमिका वाला पद है। उसकी नियमित भूमिका राज्यसभा के पदेन सभापति की है, जबकि राष्ट्रपति के पद में रिक्ति या राष्ट्रपति की असमर्थता की स्थिति में वह राष्ट्रपति के रूप में कार्य करके संवैधानिक निरंतरता बनाए रखता है। इस प्रकार उपराष्ट्रपति केवल राष्ट्रपति का सहायक नहीं है, बल्कि वह संसदीय व्यवस्था और कार्यपालिका के बीच संवैधानिक सेतु की महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
भाई, भारत में महान्यायवादी (Attorney General for India) का पद संविधान में स्थापित एक महत्वपूर्ण संवैधानिक पद है। इसे भारत सरकार का सर्वोच्च विधि अधिकारी (Chief Legal Adviser) माना जाता है। इसका मुख्य काम केंद्र सरकार को कानूनी मामलों में सलाह देना और आवश्यकता पड़ने पर न्यायालयों के सामने भारत सरकार का पक्ष रखना है।
भारत में महान्यायवादी का पद -
महान्यायवादी का संवैधानिक आधार -
महान्यायवादी का पद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 76 के अनुसार राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति को भारत का महान्यायवादी नियुक्त करेगा जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए योग्य हो। इसलिए महान्यायवादी का पद कोई साधारण सरकारी पद नहीं, बल्कि संवैधानिक पद है।
महान्यायवादी की नियुक्ति - महान्यायवादी की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। लेकिन व्यवहार में राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करते हैं। इसलिए महान्यायवादी की नियुक्ति केंद्र की सरकार के साथ निकटता से जुड़ी होती है।
महान्यायवादी की योग्यता - महान्यायवादी बनने के लिए व्यक्ति में वही योग्यता होनी चाहिए जो सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनने के लिए आवश्यक है।
संविधान के अनुच्छेद 124(3) के अनुसार व्यक्ति -
1. भारत का नागरिक हो और कम-से-कम 5 वर्ष तक किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा हो, या
2. कम-से-कम 10 वर्ष तक किसी उच्च न्यायालय में अधिवक्ता रहा हो, या
3. राष्ट्रपति की राय में विशिष्ट विधिवेत्ता (distinguished jurist) हो।
महान्यायवादी का कार्यकाल - महान्यायवादी का संविधान में कोई निश्चित कार्यकाल निर्धारित नहीं है। वह
राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (during the pleasure of the President) पद पर रहता है। इसका अर्थ है कि वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है और राष्ट्रपति उसे पद से हटा सकते हैं। महान्यायवादी स्वयं भी अपने पद से इस्तीफा दे सकता है।
महान्यायवादी के प्रमुख कार्य - महान्यायवादी के कार्यों को निम्न भागों में समझ सकते हैं -
(क) भारत सरकार को कानूनी सलाह देना - सरकार जब किसी जटिल संवैधानिक या कानूनी प्रश्न पर राय चाहती है, तो महान्यायवादी से कानूनी सलाह ली जा सकती है।
(ख) राष्ट्रपति द्वारा सौंपे गए कानूनी कार्य - राष्ट्रपति महान्यायवादी को समय-समय पर ऐसे अन्य कानूनी कार्य सौंप सकते हैं जो उनके पास भेजे जाएँ।
(ग) संविधान या कानून द्वारा दिए गए कार्य - महान्यायवादी उन कार्यों का भी निर्वहन करता है जो उसे संविधान या किसी अन्य विधि द्वारा सौंपे गए हों।
न्यायालयों में महान्यायवादी की भूमिका - महान्यायवादी को भारत के सभी न्यायालयों में उपस्थित होने का अधिकार है। इसका अर्थ है कि वह सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों, तथा भारत के अन्य न्यायालयों में केंद्र सरकार की ओर से उपस्थित हो सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह प्रत्येक मामले में अनिवार्य रूप से सरकार का प्रतिनिधित्व करता है।
संसद में महान्यायवादी के अधिकार -
अनुच्छेद 88 के अनुसार महान्यायवादी को लोकसभा/राज्यसभा या संसद की संयुक्त बैठक में बोलने का अधिकार है,
लेकिन उसे मतदान का अधिकार नहीं है।
अर्थात वह संसद में बोल सकता है, लेकिन वोट नहीं दे सकता।
7. संसद की समितियों में भूमिका -
महान्यायवादी को संसद की उन समितियों में भाग लेने का अधिकार है जिनका वह सदस्य नामित किया गया हो या जिनमें संविधान/नियमों के अनुसार उसे भाग लेने का अधिकार हो। लेकिन यहाँ भी महत्वपूर्ण बात है कि उसे मतदान का अधिकार नहीं मिलता।
क्या महान्यायवादी संसद का सदस्य होता है - नहीं, महान्यायवादी का संसद में बोलने का अधिकार होने का अर्थ यह नहीं है कि वह लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य है।
महान्यायवादी और मंत्रिपरिषद -
महान्यायवादी केंद्रीय मंत्रिपरिषद का सदस्य नहीं होता। वह केंद्र सरकार का सर्वोच्च विधि अधिकारी है। इसलिए मंत्री ≠ महान्यायवादी। महान्यायवादी सरकार को कानूनी सलाह देता है, लेकिन राजनीतिक नीति-निर्माण करने वाला मंत्री नहीं होता।
क्या महान्यायवादी सरकारी कर्मचारी है - नहीं, महान्यायवादी का पद संवैधानिक पद है, लेकिन वह सामान्य अर्थ में नियमित सरकारी कर्मचारी नहीं माना जाता। उसका पद विशेष संवैधानिक प्रकृति का है और वह सरकार को विधिक मामलों में सहायता प्रदान करता है।
निजी वकालत का अधिकार - महान्यायवादी को निजी प्रैक्टिस करने की अनुमति होती है, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण प्रतिबंधों के साथ -
• वह भारत सरकार के विरुद्ध किसी मामले में पेश नहीं हो सकता।
• भारत सरकार के विरुद्ध किसी पक्ष को कानूनी सलाह नहीं दे सकता।
• सरकार की अनुमति के बिना किसी आपराधिक मामले में अभियुक्त का बचाव नहीं कर सकता।
• किसी कंपनी में सरकार की अनुमति के बिना निदेशक का पद नहीं ले सकता।
• ऐसे मामलों में निजी कार्य नहीं कर सकता जिनमें भारत सरकार के हितों से टकराव हो।
इसका उद्देश्य हितों के टकराव (Conflict of Interest) को रोकना है।
महान्यायवादी को सुविधाएँ - महान्यायवादी को अपने पद के कार्यों के लिए निर्धारित पारिश्रमिक मिलता है, संविधान में महान्यायवादी का कोई निश्चित वेतन निर्धारित नहीं है। उसका पारिश्रमिक राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित किया जाता है।
महान्यायवादी और सॉलिसिटर जनरल में अंतर -
आधार - महान्यायवादी - सॉलिसिटर जनरल
संवैधानिक आधार - अनुच्छेद 76 - संविधान में सीधे उल्लेख नहीं
स्थिति - सर्वोच्च विधि अधिकारी - भारत सरकार के प्रमुख विधि अधिकारी समूह का वरिष्ठ सदस्य
नियुक्ति - राष्ट्रपति - केंद्र सरकार
संवैधानिक पद - हाँ - नहीं
संसद में बोलने का अधिकार - अनुच्छेद 88 के तहत - ऐसा संवैधानिक अधिकार नहीं
मतदान - नहीं लागू - नहीं
सरकार को कानूनी सलाह - हाँ - हाँ
महान्यायवादी और राज्य के महाधिवक्ता में अंतर -
आधार - महान्यायवादी - महाधिवक्ता
स्तर - केंद्र - राज्य
संविधान - अनुच्छेद 76- अनुच्छेद 165
नियुक्ति - राष्ट्रपति - राज्यपाल
मुख्य कार्य - केंद्र सरकार को विधिक सलाह - राज्य सरकार को विधिक सलाह
न्यायालय में अधिकार - सभी न्यायालयों में उपस्थित हो सकता है - राज्य के न्यायालयों में महत्वपूर्ण भूमिका
संसद/विधानमंडल - संसद में बोल सकता है, वोट नहीं - राज्य विधानमंडल में बोल सकता है, वोट नहीं
महान्यायवादी का संवैधानिक महत्व -
महान्यायवादी केवल सरकार का वकील नहीं है। उसके पद का संवैधानिक महत्व इसलिए है क्योंकि वह -
• संविधान की व्याख्या में सरकार की सहायता करता है, संवैधानिक प्रश्नों पर सरकार को विधिक राय देता है।
• न्यायपालिका के सामने सरकार का पक्ष रखता है, विशेषकर महत्वपूर्ण संवैधानिक और राष्ट्रीय महत्व के मामलों में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
• सरकार और न्यायपालिका के बीच विधिक सेतु का कार्य करता है, वह सरकार की नीतियों और कार्यों को संवैधानिक तथा कानूनी कसौटी पर परखने में सहायता करता है।
महत्वपूर्ण बात - महान्यायवादी सरकार का कानूनी सलाहकार है, लेकिन वह सरकार का नौकर मात्र नहीं है। उससे अपेक्षा की जाती है कि वह कानून और संविधान के अनुरूप स्वतंत्र एवं निष्पक्ष कानूनी राय दे। यही कारण है कि उसके पद में दो पहलू दिखाई देते हैं -
सरकार के प्रति विधिक उत्तरदायित्व + संविधान एवं विधि के प्रति पेशेवर दायित्व।
निष्कर्ष - भारत का महान्यायवादी संविधान के अनुच्छेद 76 के अधीन स्थापित भारत का सर्वोच्च विधि अधिकारी है। उसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा ऐसे व्यक्ति में से की जाती है जो सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने की योग्यता रखता हो। उसका कोई निश्चित कार्यकाल नहीं है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है। उसका प्रमुख कार्य भारत सरकार को विधिक मामलों में सलाह देना तथा आवश्यकतानुसार न्यायालयों में सरकार का पक्ष रखना है। उसे भारत के सभी न्यायालयों में उपस्थित होने का अधिकार है। अनुच्छेद 88 के अनुसार उसे संसद के दोनों सदनों तथा उनकी समितियों में बोलने और कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार है, किंतु उसे मतदान का अधिकार नहीं है। महान्यायवादी का पद भारतीय शासन व्यवस्था में विधि, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच एक महत्वपूर्ण संवैधानिक कड़ी का कार्य करता है।
Unit II -
संसद - गठन संरचना एवं शक्तियां -
भारतीय संसद का गठन, उसकी संरचना और शक्तियाँ भारतीय संविधान के संघीय शासन की रीढ़ हैं। इसे परीक्षा की दृष्टि से समझने के लिए संविधान के अनुच्छेद 79 से 122 तक के प्रावधान विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
संसद का अर्थ एवं संवैधानिक आधार - भारतीय संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार संघ के लिए एक संसद होगी, जो तीन अंगों से मिलकर बनेगी -
1. राष्ट्रपति
2. राज्यसभा
3. लोकसभा
अर्थात् भारतीय संसद केवल लोकसभा और राज्यसभा का नाम नहीं है। राष्ट्रपति भी संसद का संवैधानिक अंग हैं।
अनुच्छेद 79 = राष्ट्रपति + राज्यसभा + लोकसभा = संसद
2. संसद की संरचना -
(क) राष्ट्रपति - राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग हैं, लेकिन राष्ट्रपति संसद के किसी सदन के सदस्य नहीं होते।
राष्ट्रपति के प्रमुख संसदीय कार्य हैं।
संसद के अधिवेशन को बुलाना।
संसद के दोनों सदनों को स्थगित करना।
लोकसभा को भंग करना।
संसद के दोनों सदनों को संबोधित करना।
संसद को संदेश भेजना।
संसद द्वारा पारित विधेयकों पर स्वीकृति देना।
कुछ परिस्थितियों में अध्यादेश जारी करना।
राज्यसभा में 12 सदस्यों को मनोनीत करना।
राज्यसभा में मनोनीत सदस्य साहित्य, विज्ञान, कला तथा समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्तियों में से चुने जाते हैं।
(ख) राज्यसभा - राज्यसभा को राज्यों की परिषद (Council of States) कहा जाता है। यह संसद का उच्च सदन है।
संवैधानिक आधार - राज्यसभा से संबंधित प्रमुख प्रावधान अनुच्छेद 80 में हैं।
सदस्य संख्या - संविधान के अनुसार राज्यसभा की अधिकतम सदस्य संख्या 250 हो सकती है। 238 तक सदस्य राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधि हो सकते हैं। 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं। वर्तमान व्यवस्था में निर्वाचित सदस्यों की संख्या संविधान द्वारा निर्धारित अधिकतम सीमा से कम है।
निर्वाचन - राज्यों के प्रतिनिधियों का चुनाव संबंधित राज्य की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली तथा एकल संक्रमणीय मत द्वारा किया जाता है।
राज्यसभा की विशेषता -
• राज्यसभा एक स्थायी सदन है।
• इसे कभी भंग नहीं किया जाता।
• इसके लगभग एक-तिहाई सदस्य प्रत्येक दो वर्ष में सेवानिवृत्त होते हैं और एक सदस्य का सामान्य कार्यकाल 6 वर्ष होता है।
(ग) लोकसभा - लोकसभा को जनता का सदन (House of the People) कहा जाता है। यह संसद का निम्न सदन है।
लोकसभा के सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन से चुने जाते हैं।
कार्यकाल - लोकसभा का सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष है। लेकिन राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद इसे पहले भी भंग कर सकते हैं। राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति में संसद कानून द्वारा इसके कार्यकाल को एक बार में अधिकतम एक वर्ष तक बढ़ा सकती है।
आपातकाल समाप्त होने के बाद यह विस्तार छह महीने से अधिक जारी नहीं रह सकता।
सदस्य बनने की न्यूनतम आयु - लोकसभा सदस्य बनने के लिए न्यूनतम आयु 25 वर्ष है। राज्यसभा के लिए न्यूनतम आयु 30 वर्ष है।
संसद की सदस्यता की योग्यताएँ -
अनुच्छेद 84 के अनुसार संसद सदस्य बनने के लिए व्यक्ति -
1. भारत का नागरिक हो।
2. राज्यसभा के लिए कम से कम 30 वर्ष तथा लोकसभा के लिए कम से कम 25 वर्ष का हो।
3. संसद द्वारा निर्धारित अन्य योग्यताओं को पूरा करता हो।
इसके अतिरिक्त निर्वाचन कानूनों में भी कुछ योग्यताएँ और अयोग्यताएँ निर्धारित हैं।
संसद के पदाधिकारी -
राज्यसभा के सभापति - भारत के उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं। उनका मुख्य कार्य सदन की कार्यवाही का संचालन करना है।
उपसभापति - राज्यसभा अपने सदस्यों में से एक उपसभापति का चुनाव करती है।
लोकसभा के अध्यक्ष - लोकसभा अपने सदस्यों में से अध्यक्ष (Speaker) और उपाध्यक्ष (Deputy Speaker) का चुनाव करती है।
लोकसभा अध्यक्ष के प्रमुख कार्य हैं -
सदन की कार्यवाही चलाना।
अनुशासन बनाए रखना।
नियमों की व्याख्या करना।
धन विधेयक के संबंध में प्रमाणन करना।
मत बराबर होने पर निर्णायक मत देना।
संसदीय समितियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना।
संसद का अधिवेशन - अनुच्छेद 85 के अनुसार राष्ट्रपति संसद के अधिवेशन को बुलाते हैं। दो संसदीय अधिवेशनों के बीच छह महीने से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए।
संसद के प्रमुख सत्र -
• बजट सत्र
• मानसून सत्र
• शीतकालीन सत्र होते हैं।
संविधान में इन तीन नामों से सत्रों का अनिवार्य उल्लेख नहीं है।
संसद की प्रमुख शक्तियाँ - भारतीय संसद को अनेक प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त हैं। इन्हें निम्न प्रकार से समझ सकते हैं:
1. विधायी शक्ति - संसद का सबसे प्रमुख कार्य कानून बनाना है। संघ सूची के विषयों पर संसद को कानून बनाने की विशेष शक्ति प्राप्त है। इसके अतिरिक्त समवर्ती सूची के विषयों पर भी संसद कानून बना सकती है। विशेष परिस्थितियों में संसद राज्य सूची के विषयों पर भी कानून बना सकती है।
राज्य सूची पर संसद की शक्ति - कुछ महत्वपूर्ण परिस्थितियाँ -
अनुच्छेद 249 - राज्यसभा राष्ट्रीय हित में प्रस्ताव पारित करे।
अनुच्छेद 250 - राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान।
अनुच्छेद 252 - दो या अधिक राज्यों के अनुरोध पर।
अनुच्छेद 253 - अंतरराष्ट्रीय संधियों या समझौतों को लागू करने के लिए।
अनुच्छेद 356 - राष्ट्रपति शासन के दौरान संबंधित राज्य की विधायी शक्तियों का प्रयोग।
वित्तीय शक्तियाँ - संसद को देश की वित्तीय व्यवस्था पर व्यापक नियंत्रण प्राप्त है।
प्रमुख वित्तीय कार्य -
• बजट को स्वीकृति देना।
• कर लगाने या समाप्त करने संबंधी कानून बनाना।
• सरकार के खर्च को मंजूरी देना।
• विनियोग विधेयक पारित करना।
• वित्त विधेयक पारित करना।
• सार्वजनिक धन के उपयोग पर नियंत्रण रखना।
धन विधेयक - अनुच्छेद 110 में धन विधेयक की व्यवस्था है। धन विधेयक केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है। राज्यसभा धन विधेयक को अस्वीकार या संशोधित नहीं कर सकती। वह केवल अपनी सिफारिशें दे सकती है और उसे 14 दिनों के भीतर वापस करना होता है। धन विधेयक है या नहीं, इसका अंतिम निर्णय लोकसभा अध्यक्ष करते हैं।
कार्यपालिका पर नियंत्रण - भारत में संसदीय शासन व्यवस्था है। इसलिए मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है। संसद विभिन्न तरीकों से सरकार पर नियंत्रण रखती है -
(क) प्रश्नकाल - सांसद मंत्रियों से सरकारी नीतियों और कार्यों के संबंध में प्रश्न पूछते हैं।
(ख) शून्यकाल - सांसद तत्काल सार्वजनिक महत्व के विषय सदन में उठाते हैं।
(ग) ध्यानाकर्षण - महत्वपूर्ण सार्वजनिक विषयों की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया जाता है।
(घ) अविश्वास प्रस्ताव - लोकसभा में सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है। यदि सरकार लोकसभा का विश्वास खो देती है तो उसे इस्तीफा देना पड़ सकता है।
संवैधानिक संशोधन की शक्ति - अनुच्छेद 368 संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्ति देता है।
संविधान संशोधन की विभिन्न प्रक्रियाएँ हैं - साधारण बहुमत से संशोधन - कुछ विषयों में साधारण बहुमत से परिवर्तन किया जा सकता है।
विशेष बहुमत - अधिकांश संवैधानिक संशोधनों के लिए -
सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत, तथा उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई बहुमत
आवश्यक होता है।
बहुमत + राज्यों की स्वीकृति - संघीय प्रकृति के कुछ महत्वपूर्ण प्रावधानों में संसद के विशेष बहुमत के साथ कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं द्वारा अनुमोदन भी आवश्यक होता है।
निर्वाचन संबंधी शक्तियाँ - संसद के सदस्य विभिन्न संवैधानिक पदों के निर्वाचन में भी भूमिका निभाते हैं।
उदाहरण -
• राष्ट्रपति के निर्वाचन में संसद के निर्वाचित सदस्य भाग लेते हैं।
• उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों के सदस्य करते हैं।
• संसद अपने सभापति, उपसभापति, अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का निर्वाचन करती है।
न्यायिक शक्तियाँ - संसद को कुछ मामलों में न्यायिक प्रकृति की शक्तियाँ भी प्राप्त हैं।
राष्ट्रपति का महाभियोग - अनुच्छेद 61 के अंतर्गत राष्ट्रपति पर संविधान के उल्लंघन के आरोप में महाभियोग की प्रक्रिया संसद के माध्यम से होती है।
उपराष्ट्रपति को हटाना - राज्यसभा उपराष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव प्रारंभ कर सकती है और लोकसभा उस पर सहमति देती है।
न्यायाधीशों को हटाना - सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार संसद की भूमिका से हटाया जा सकता है।
संसद की निर्वाचन क्षेत्र एवं प्रतिनिधित्व संबंधी शक्ति - संसद जनप्रतिनिधित्व की व्यवस्था को नियंत्रित करने वाले कानून बना सकती है।
उदाहरण -
• निर्वाचन प्रक्रिया
• निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन
• मतदाता सूची
राजनीतिक दलों से संबंधित निर्वाचन नियम -
• चुनाव संबंधी विवादों और प्रक्रियाओं के लिए कानून
• संसद की विशेषाधिकार संबंधी शक्ति
• अनुच्छेद 105 संसद और उसके सदस्यों के विशेषाधिकारों से संबंधित है।
सांसदों को संसद में बोलने की स्वतंत्रता प्राप्त है, लेकिन यह संविधान और संसदीय नियमों के अधीन है। संसद को अपनी कार्यवाही और गरिमा बनाए रखने के लिए विशेषाधिकार प्राप्त हैं।
संसद की समितियाँ - संसद का अधिकांश विस्तृत कार्य संसदीय समितियों के माध्यम से होता है।
प्रमुख समितियाँ -
1. लोक लेखा समिति (PAC) - सरकारी खर्च और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्टों की जांच करती है।
2. प्राक्कलन समिति - सरकारी व्यय और अनुमानित खर्चों की जांच करती है।
3. सार्वजनिक उपक्रम समिति - सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के कामकाज की समीक्षा करती है।
इसके अतिरिक्त अनेक विभागीय स्थायी समितियाँ और अन्य समितियाँ भी हैं।
संसद की सीमाएँ - संसद शक्तिशाली है, लेकिन उसकी शक्तियाँ असीमित नहीं हैं।
(1) संविधान की सर्वोच्चता - संसद संविधान के अधीन है।
(2) न्यायिक पुनरावलोकन - संसद द्वारा बनाया गया कानून यदि संविधान के विरुद्ध है तो न्यायालय उसे असंवैधानिक घोषित कर सकता है।
(3) मूल संरचना सिद्धांत - संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती। यह सिद्धांत प्रसिद्ध केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्थापित किया।
मूल संरचना के उदाहरणों में -
• संविधान की सर्वोच्चता
• लोकतंत्र
• गणराज्यात्मक व्यवस्था
• धर्मनिरपेक्षता
• संघवाद
• न्यायिक समीक्षा
• विधि का शासन
• शक्तियों का संतुलन आदि शामिल माने गए हैं।
लोकसभा और राज्यसभा में प्रमुख अंतर -
आधार - लोकसभा - राज्यसभा
दूसरा नाम - जनता का सदन - राज्यों की परिषद
स्थिति - निम्न सदन - उच्च सदन
निर्वाचन - प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष
कार्यकाल - 5 वर्ष - स्थायी सदन
सदस्य की न्यूनतम - आयु 25 वर्ष - 30 वर्ष
विघटन - हो सकती है - नहीं होती
धन विधेयक - प्रमुख भूमिका सीमित भूमिका
मंत्रिपरिषद का उत्तरदायित्व - सीधे लोकसभा के प्रति - नहीं
विशेष - शक्ति सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव - अनुच्छेद 249 के तहत राष्ट्रीय हित में राज्य सूची पर संसद को कानून बनाने की अनुमति देने की विशेष शक्ति
19. संसद का महत्व - भारतीय लोकतंत्र में संसद के प्रमुख महत्व को इस प्रकार समझा जा सकता है:
जनता - प्रतिनिधि - संसद - कानून - शासन
संसद -
• जनता की इच्छा को कानून में बदलती है।
• सरकार को उत्तरदायी बनाती है।
• सार्वजनिक धन पर नियंत्रण रखती है।
• राष्ट्रीय नीतियों पर चर्चा करती है।
• संविधान में आवश्यक संशोधन करती है।
• संघ और राज्यों के बीच संवैधानिक संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
• लोकतांत्रिक बहस का राष्ट्रीय मंच प्रदान करती है।
निष्कर्ष - संसद केवल कानून बनाने वाली संस्था नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की केंद्रीय प्रतिनिधि संस्था है। राष्ट्रपति, राज्यसभा और लोकसभा मिलकर संसद का निर्माण करते हैं। संसद की विधायी, वित्तीय, निर्वाचन, संवैधानिक, न्यायिक तथा कार्यपालिका पर नियंत्रण संबंधी शक्तियाँ उसे शासन व्यवस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण अंग बनाती हैं। फिर भी संसद संविधान, न्यायिक समीक्षा और मूल संरचना सिद्धांत की सीमाओं के अधीन कार्य करती है।
सूत्र - संसद = गठन + कानून + पैसा + सरकार पर नियंत्रण + संविधान संशोधन + प्रतिनिधित्व।
अनुच्छेदों -
79 - संसद का गठन
80 - राज्यसभा
81 - लोकसभा
83 - सदनों की अवधि
84 - सदस्यता की योग्यता
85 - अधिवेशन
105 - संसदीय विशेषाधिकार
107 से 111 - विधेयक
110 - धन विधेयक
112 - वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट)
123 - राष्ट्रपति की अध्यादेश शक्ति
368 - संविधान संशोधन
भाई, “विधेयकों का निर्माण एवं प्रक्रिया” भारतीय संविधान के संसदीय शासन और विधि-निर्माण प्रक्रिया का महत्वपूर्ण विषय है। इसे परीक्षा की दृष्टि से क्रमबद्ध तरीके से समझिए।
विधेयकों का निर्माण एवं प्रक्रिया
विधेयक का अर्थ - विधेयक (Bill) किसी नए कानून को बनाने या वर्तमान कानून में परिवर्तन करने के लिए संसद में प्रस्तुत किया गया प्रस्तावित कानून है। जब कोई विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित होकर राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त कर लेता है, तब वह अधिनियम (Act) बन जाता है।
क्रम विधेयक → संसद में विचार → दोनों सदनों से पारित → राष्ट्रपति की स्वीकृति → अधिनियम
विधेयकों के प्रमुख प्रकार - भारतीय संसद में विधेयकों को निम्न प्रकारों में बाँटा जाता है -
साधारण विधेयक - जो धन विधेयक या संविधान संशोधन विधेयक नहीं है, वह सामान्यतः साधारण विधेयक होता है। इसे लोकसभा या राज्यसभा, किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है।
धन विधेयक - संविधान के अनुच्छेद 110 में धन विधेयक की परिभाषा दी गई है, इसमें करों, भारत की संचित निधि, आकस्मिकता निधि आदि से संबंधित विषय आते हैं। धन विधेयक केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है और इसे राष्ट्रपति की सिफारिश पर ही प्रस्तुत किया जाता है।
वित्त विधेयक - वित्त विधेयक मुख्यतः सरकारी आय-व्यय तथा वित्तीय विषयों से संबंधित होता है। वित्त विधेयक के भी विभिन्न प्रकार हैं और उन पर अलग-अलग संवैधानिक प्रक्रियाएँ लागू होती हैं।
संविधान संशोधन विधेयक - संविधान में संशोधन करने के लिए अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संविधान संशोधन विधेयक प्रस्तुत किया जाता है। यह सामान्य विधेयक से अलग प्रक्रिया के अधीन होता है।
साधारण विधेयक बनाने की प्रक्रिया - साधारण विधेयक की संसदीय यात्रा को निम्न चरणों में समझा जा सकता है।
1. विधेयक का प्रारूप तैयार करना - किसी कानून की आवश्यकता महसूस होने पर संबंधित मंत्रालय या विभाग विधेयक का प्रारूप तैयार करता है। प्रारूप तैयार करते समय संबंधित कानून, न्यायिक निर्णय, प्रशासनिक आवश्यकताओं तथा नीति संबंधी विषयों का अध्ययन किया जाता है। इसके बाद विधेयक को आवश्यक सरकारी प्रक्रिया से गुजारा जाता है।
2. संसद में विधेयक की प्रस्तुति - विधेयक संसद के किसी सदन में प्रस्तुत किया जाता है। इसे प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति को प्रस्तावक/पुरःस्थापक (Mover) कहा जाता है। सरकारी विधेयक संबंधित मंत्री द्वारा प्रस्तुत किया जाता है, जबकि गैर-सरकारी सदस्य विधेयक (Private Member's Bill) किसी ऐसे सांसद द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है जो मंत्री नहीं है।
3. प्रथम वाचन - विधेयक को सदन में प्रस्तुत करने की अवस्था को प्रथम वाचन (First Reading) कहा जाता है। इस चरण में विधेयक का परिचय कराया जाता है। इस चरण में विधेयक के विस्तृत प्रावधानों पर व्यापक चर्चा नहीं होती। इसके बाद विधेयक को आगे की प्रक्रिया के लिए रखा जाता है।
द्वितीय वाचन
4. द्वितीय वाचन - विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण अवस्थाओं में से एक है। इसमें विधेयक के मूल सिद्धांतों और प्रावधानों पर विस्तार से विचार किया जाता है।द्वितीय वाचन को व्यापक रूप से दो चरणों में समझा जा सकता है -
(क) सामान्य चर्चा - सदस्य विधेयक के मूल उद्देश्य, सिद्धांत और आवश्यकता पर चर्चा करते हैं। इस चरण में यह विचार किया जाता है कि विधेयक को स्वीकार किया जाना चाहिए या नहीं।
(ख) समिति को भेजना - विधेयक को आवश्यकतानुसार -
• संबंधित विभाग-संबंधी स्थायी समिति,
• चयन समिति (Select Committee),
• संयुक्त समिति (Joint Committee)
को भेजा जा सकता है। समिति विधेयक के प्रावधानों की सूक्ष्म जाँच करती है और अपनी रिपोर्ट सदन को प्रस्तुत कर सकती है।
खंडवार विचार और संशोधन - इसके बाद विधेयक की प्रत्येक धारा या प्रावधान पर विचार किया जाता है। सांसद विधेयक में संशोधन (Amendments) प्रस्तावित कर सकते हैं। सदन मतदान के माध्यम से इन संशोधनों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है। इसे विधेयक का खंडवार विचार (Clause-by-Clause Consideration) कहा जाता है।
5. तृतीय वाचन - जब विधेयक के सभी प्रावधानों पर विचार हो जाता है, तब उसका तृतीय वाचन (Third Reading) होता है। इस चरण में मुख्य प्रश्न यह होता है कि विधेयक को अंतिम रूप से पारित किया जाए या नहीं। यदि सदन में आवश्यक बहुमत से विधेयक पारित हो जाता है, तो उसे दूसरे सदन में भेज दिया जाता है।
6. दूसरे सदन में प्रक्रिया - दूसरे सदन में भी विधेयक लगभग इसी प्रक्रिया से गुजरता है - प्रस्तुति → प्रथम वाचन → द्वितीय वाचन → समिति/विचार → संशोधन → तृतीय वाचन → मतदान
दूसरा सदन विधेयक को -
1. उसी रूप में पारित कर सकता है,
2. संशोधनों के साथ पारित कर सकता है, या
3. अस्वीकार कर सकता है।
दोनों सदनों में मतभेद - यदि साधारण विधेयक के संबंध में लोकसभा और राज्यसभा के बीच मतभेद उत्पन्न हो जाए और संवैधानिक परिस्थितियाँ पूरी हों, तो अनुच्छेद 108 के अंतर्गत राष्ट्रपति दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुला सकते हैं।
संयुक्त बैठक में दोनों सदनों के सदस्य एक साथ विधेयक पर विचार और मतदान करते हैं।
महत्वपूर्ण - धन विधेयक के संबंध में संयुक्त बैठक का प्रावधान लागू नहीं होता।
राष्ट्रपति की स्वीकृति - जब विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित हो जाता है, तब उसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है।
अनुच्छेद 111 के अनुसार राष्ट्रपति - विधेयक को स्वीकृति दे सकते हैं, धन विधेयक के अतिरिक्त किसी विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं जिसे पुनः पारित होकर आने पर राष्ट्रपति उस विधेयक को स्वीकृति देने से रोक नहीं सकते। धन विधेयक को राष्ट्रपति पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकते।
विधेयक का अधिनियम बनना - राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त होने के बाद विधेयक अधिनियम (Act) बन जाता है। इसके बाद अधिनियम का प्रकाशन किया जाता है और उसमें निर्धारित तिथि से वह कानून के रूप में लागू हो सकता है।
धन विधेयक की विशेष प्रक्रिया - धन विधेयक की प्रक्रिया साधारण विधेयक से अलग है।
मुख्य विशेषताएँ -
1. धन विधेयक केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जाता है।
2. इसे राष्ट्रपति की सिफारिश पर प्रस्तुत किया जाता है।
3. राज्यसभा इसे अस्वीकार नहीं कर सकती।
4. राज्यसभा धन विधेयक पर केवल सिफारिशें कर सकती है।
5. राज्यसभा को धन विधेयक प्राप्त होने के 14 दिनों के भीतर उसे लोकसभा को वापस करना होता है।
6. लोकसभा राज्यसभा की सिफारिशों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है।
7. 14 दिनों के भीतर राज्यसभा द्वारा वापस न किए जाने पर विधेयक लोकसभा द्वारा पारित रूप में दोनों सदनों द्वारा पारित माना जाता है।
8. धन विधेयक पर लोकसभा अध्यक्ष का निर्णय कि वह धन विधेयक है या नहीं, संवैधानिक रूप से विशेष महत्व रखता है।
संविधान संशोधन विधेयक की प्रक्रिया - संविधान संशोधन विधेयक की प्रक्रिया भी विशेष है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ -
• इसे संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है।
• राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति आवश्यक नहीं होती।
•इसे प्रत्येक सदन में विशेष बहुमत से पारित होना आवश्यक है।
• कुछ संशोधनों के लिए संसद के साथ-साथ कम-से-कम आधे राज्यों के
• विधानमंडलों द्वारा अनुसमर्थन भी आवश्यक होता है।
• संविधान संशोधन विधेयक के संबंध में संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है।
सरकारी और गैर-सरकारी विधेयक -
सरकारी विधेयक - मंत्री द्वारा संसद में प्रस्तुत विधेयक को सरकारी विधेयक कहा जाता है।
गैर-सरकारी सदस्य विधेयक - ऐसा विधेयक जो किसी ऐसे संसद सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया जाता है जो मंत्री नहीं है, गैर-सरकारी सदस्य विधेयक कहलाता है।
इन दोनों के लिए संसदीय प्रक्रिया में कुछ व्यावहारिक अंतर होते हैं, लेकिन विधेयक के कानून बनने के लिए निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
विधेयक और अधिनियम में अंतर -
आधार - विधेयक - अधिनियम
अर्थ - प्रस्तावित कानून - स्वीकृत कानून
स्थिति - निर्माणाधीन - कानून के रूप में स्वीकृत
संसद में स्थिति - विचाराधीन हो सकता है संसदीय प्रक्रिया पूरी
राष्ट्रपति की स्वीकृति अभी आवश्यक हो सकती है प्राप्त हो चुकी होती है
कानूनी प्रभाव सामान्यतः कानून का प्रभाव नहीं कानून के रूप में प्रभावी
संपूर्ण प्रक्रिया एक नजर में - प्रस्तुति → प्रथम वाचन→द्वितीय वाचन→ समिति→ खंडवार विचार→ तृतीय वाचन→ दूसरा सदन→ राष्ट्रपति→ अधिनियम।
निष्कर्ष - विधेयक का निर्माण केवल संसद में प्रस्ताव रखने तक सीमित नहीं है। यह एक क्रमबद्ध संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य प्रस्तावित कानून पर चर्चा, परीक्षण, संशोधन, लोकतांत्रिक विचार-विमर्श और अंततः राष्ट्रपति की स्वीकृति के माध्यम से उसे अधिनियम का रूप देना है।
राज्य विधानमंडल -
भारतीय संविधान के भाग VI में राज्यों के शासन से संबंधित प्रावधान किए गए हैं। अनुच्छेद 168 के अनुसार प्रत्येक राज्य में एक विधानमंडल होगा। राज्य विधानमंडल एकसदनीय या द्विसदनीय हो सकता है। एकसदनीय व्यवस्था में केवल विधानसभा होती है, जबकि द्विसदनीय व्यवस्था में विधानसभा तथा विधान परिषद दोनों होते हैं। राज्यपाल भी राज्य विधानमंडल का एक अंग है। वर्तमान में आंध्र प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में विधान परिषद विद्यमान है।
राज्य विधानमंडल की संरचना -
विधानसभा - अनुच्छेद 170 के अनुसार राज्य विधानसभा के सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन से चुने जाते हैं। विधानसभा में न्यूनतम 60 और अधिकतम 500 सदस्य हो सकते हैं, हालांकि कुछ छोटे राज्यों के लिए संविधान में अपवाद की व्यवस्था है। विधानसभा का कार्यकाल 5 वर्ष होता है, परंतु इसे इससे पहले भी भंग किया जा सकता है और छः माह के लिए बढ़ाया भी जा सकता है। विधानसभा राज्य की जनता की प्रत्यक्ष प्रतिनिधि संस्था है और राज्य की विधायी तथा वित्तीय व्यवस्था में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
विधान परिषद - अनुच्छेद 169 के अनुसार किसी राज्य में विधान परिषद का गठन या उसका उन्मूलन किया जा सकता है। इसके लिए पहले राज्य विधानसभा को विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित करना होता है और उसके बाद संसद कानून बनाती है। विधान परिषद राज्य विधानमंडल का उच्च सदन है। अनुच्छेद 171 के अनुसार विधान परिषद के सदस्यों की संख्या विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती, लेकिन 40 से कम भी नहीं हो सकती। इसके सदस्यों का निर्वाचन कई निर्वाचन मंडलों द्वारा किया जाता है इसमें
• एक-तिहाई सदस्य स्थानीय निकायों द्वारा,
• एक-तिहाई विधानसभा के सदस्यों द्वारा
• 1/12 स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों द्वारा
• 1/12 शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों द्वारा
• 1/6 सदस्यों को राज्यपाल साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारी आंदोलन और समाज सेवा आदि क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्तियों में से मनोनीत करता है।
विधान परिषद स्थायी सदन है और इसे विधानसभा की तरह भंग नहीं किया जाता। इसके प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष होता है तथा प्रत्येक दो वर्ष में लगभग एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं।
राज्य विधानमंडल के सदस्यों की योग्यताएँ - अनुच्छेद 173 में राज्य विधानमंडल की सदस्यता के लिए योग्यताएँ निर्धारित की गई हैं। सदस्य बनने वाला व्यक्ति भारत का नागरिक होना चाहिए। विधानसभा का सदस्य बनने के लिए उसकी आयु कम से कम 25 वर्ष तथा विधान परिषद का सदस्य बनने के लिए कम से कम 30 वर्ष होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त संसद द्वारा बनाए गए कानूनों में निर्धारित अन्य योग्यताओं को भी पूरा करना आवश्यक है। सदस्यता के लिए व्यक्ति को संविधान तथा कानून द्वारा निर्धारित अयोग्यताओं से मुक्त होना चाहिए। अनुच्छेद 191 के अनुसार
• लाभ का पद
• सक्षम न्यायालय द्वारा विकृतचित्त घोषित • अनुन्मोचित दिवालिया होने
• विदेशी नागरिकता प्राप्त करने
• अथवा संसद द्वारा बनाए गए कानून के अंतर्गत अयोग्य घोषित होने पर व्यक्ति
राज्य विधानमंडल की सदस्यता हेतु अयोग्य होता है।
राज्य विधानमंडल की विधायी प्रक्रिया - राज्य विधानमंडल में कानून बनाने की प्रक्रिया को विधायी प्रक्रिया कहा जाता है। साधारण विधेयक विधानसभा या विधान परिषद, दोनों में से किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। विधेयक पर पहले वाचन में उसका परिचय कराया जाता है। दूसरे वाचन में उसके सिद्धांतों तथा प्रावधानों पर विस्तृत चर्चा की जाती है और आवश्यकता होने पर उसे समिति को भेजा जा सकता है। इसके बाद संशोधनों पर विचार किया जाता है। तीसरे वाचन में विधेयक पर अंतिम चर्चा और मतदान होता है। द्विसदनीय राज्य में विधानसभा द्वारा पारित साधारण विधेयक, विधान परिषद के पास भेजा जाता है। परिषद उसे स्वीकार कर सकती है, संशोधन सुझा सकती है या उसे रोक सकती है, लेकिन वह विधानसभा को स्थायी रूप से रोक नहीं सकती। इस कारण साधारण विधेयकों के संबंध में विधानसभा को विधान परिषद की अपेक्षा अधिक प्रभावी स्थिति प्राप्त है।
धन विधेयक - धन विधेयक केवल विधानसभा में ही प्रस्तुत किया जा सकता है। विधान परिषद में इसे प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। विधानसभा द्वारा पारित धन विधेयक विधान परिषद को भेजा जाता है और परिषद को 14 दिनों के भीतर अपनी सिफारिशों सहित उसे वापस करना होता है। विधानसभा परिषद की सिफारिशों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है। यदि परिषद 14 दिनों में विधेयक वापस नहीं करती, तो वह विधानसभा द्वारा पारित रूप में दोनों सदनों से पारित माना जाता है। धन विधेयक के संबंध में विधानसभा की प्रधानता स्पष्ट है। अनुच्छेद 199 के अनुसार किसी विधेयक के धन विधेयक होने या न होने का अंतिम निर्णय विधानसभा अध्यक्ष का होता है।
राज्यपाल की भूमिका - दोनों सदनों द्वारा विधेयक पारित होने के बाद उसे अनुच्छेद 200 के अंतर्गत राज्यपाल के पास भेजा जाता है। राज्यपाल विधेयक को स्वीकृति दे सकता है, स्वीकृति रोक सकता है या गैर-धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए विधानमंडल को लौटा सकता है। कुछ विधेयकों को राज्यपाल राष्ट्रपति के विचार के लिए भी सुरक्षित रख सकता है। यदि कोई विधेयक राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखा जाता है तो अनुच्छेद 201 के अनुसार राष्ट्रपति उस पर स्वीकृति दे सकता है, स्वीकृति रोक सकता है अथवा गैर-धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटाने का निर्देश दे सकता है। इस प्रकार राज्य विधानमंडल राज्य की लोकतांत्रिक इच्छा को कानून का रूप देने वाली संस्था है। विधानसभा जनता की प्रत्यक्ष प्रतिनिधि होने के कारण विधायी एवं वित्तीय मामलों में प्रमुख भूमिका निभाती है, जबकि विधान परिषद विधायी कार्य में पुनर्विचार, विशेषज्ञता और निरंतरता प्रदान करती है।
भारतीय संविधान के संसदीय कार्य-संचालन तथा वित्तीय प्रक्रिया -
भारत में शासन की संसदीय प्रणाली है। संघ स्तर पर संसद और राज्य स्तर पर राज्य विधानमंडल कानून बनाने, सरकार को उत्तरदायी बनाने तथा सार्वजनिक धन के उपयोग को नियंत्रित करने का कार्य करते हैं। भारतीय संविधान ने विधायिका के कार्य-संचालन तथा वित्तीय मामलों के लिए विस्तृत संवैधानिक व्यवस्था की है। संसद के संबंध में मुख्य प्रावधान अनुच्छेद 79 से 122 तथा राज्यों के विधानमंडल के संबंध में अनुच्छेद 168 से 212 में मिलते हैं। वित्तीय मामलों के लिए संघ स्तर पर विशेष रूप से अनुच्छेद 112 से 117 और राज्य स्तर पर अनुच्छेद 202 से 207 हैं।
इसे हम चार भागों में समझ सकते हैं -
A. संसद एवं राज्य विधानमंडल में कार्य-संचालन
B. सदन की कार्यवाही
C. वित्तीय मामलों से संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया
D. धन विधेयक एवं वित्त विधेयक
A. संसद एवं राज्य विधानमंडल में कार्य-संचालन -
संसद का गठन - संविधान के अनुच्छेद 79 के अनुसार संघ के लिए एक संसद होगी जिसमें राष्ट्रपति राज्यसभाव लोकसभा नाम से तीन अंग हैं। राष्ट्रपति संसद का अंग है, यद्यपि वह किसी सदन का सदस्य नहीं होता।
राज्य विधानमंडल - अनुच्छेद 168 के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए विधानमंडल होगा। राज्य विधानमंडल में राज्यपाल तथा
एक या दो सदन हो सकते हैं। जहाँ केवल एक सदन है वहाँ विधानसभा होती है। जहाँ दो सदन हैं वहाँ विधानसभा व विधान परिषद होते हैं।
सदनों के अधिवेशन बुलाना -
संसद - अनुच्छेद 85 के अनुसार राष्ट्रपति संसद के प्रत्येक सदन को समय-समय पर आहूत करता है। दो अधिवेशनों के बीच छह महीने से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए। राष्ट्रपति संसद को बुला सकता है,
सत्रावसान कर सकता है व लोकसभा को भंग कर सकता है।
राज्य विधानमंडल - अनुच्छेद 174 के अनुसार राज्यपाल विधानमंडल के सदन या सदनों को आहूत करता है। यहाँ भी दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए। राज्यपाल विधान सभा को बुलाता है, सत्रावसान करता है, वह वहविधानसभा को भंग कर सकता है।
सदन के पीठासीन अधिकारी -
लोकसभा - लोकसभा अपने सदस्यों में से अध्यक्ष (Speaker), उपाध्यक्ष (Deputy Speaker) का चुनाव करती है जो सदन की कार्यवाही का संचालन करता है।
उसके प्रमुख कार्य हैं
1. सदन में व्यवस्था बनाए रखना।
2. सदस्यों को बोलने की अनुमति देना।
3. नियमों की व्याख्या करना।
4. धन विधेयक के संबंध में प्रमाणन करना।
5. बराबर मत होने पर निर्णायक मत देना।
6. सदन की कार्यवाही को नियंत्रित करना।
राज्यसभा - भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है।राज्यसभा अपने सदस्यों में से उपसभापति चुनती है।
विधानसभा - विधानसभा अपने सदस्यों में से अध्यक्ष, उपाध्यक्ष का चुनाव करती है।
विधान परिषद - विधान परिषद अपने सदस्यों में से सभापति उपसभापति का चुनाव करती है।
सदन में कार्य-संचालन के नियम - प्रत्येक सदन अपने कार्य-संचालन के लिए नियम बनाता है। संसद के लिए संविधान का अनुच्छेद 118 महत्वपूर्ण है। राज्य विधानमंडल के लिए अनुच्छेद 208 लागू होता है। इन नियमों के माध्यम से निर्धारित किया जाता है कि -
• प्रश्न कैसे पूछे जाएंगे
• विधेयक कैसे प्रस्तुत होंगे
• चर्चा किस प्रकार होगी
• मतदान कैसे होगा
• प्रस्ताव कैसे लाए जाएंगे
• कार्यवाही कैसे संचालित होगी।
5. सदन में भाषा - अनुच्छेद 120 के अनुसार संसद में कार्य हिंदी या अंग्रेजी में किया जा सकता है। विशेष अनुमति से सदस्य अपनी मातृभाषा में भी सदन को संबोधित कर सकता है। राज्य विधानमंडल में अनुच्छेद 210 के अंतर्गत हिंदी, अंग्रेजी या राज्य की विधि द्वारा निर्धारित भाषा का प्रयोग किया जा सकता है।
संसदीय विशेषाधिकार - संसद के सदस्यों तथा राज्य विधानमंडल के सदस्यों को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त हैं।
• अनुच्छेद 105 संसद के सदस्यों के विशेषाधिकार से संबंधित है।
• अनुच्छेद 194 राज्य विधानमंडल के सदस्यों के विशेषाधिकार से संबंधित है।
प्रमुख विशेषाधिकार -
1. सदन में भाषण की स्वतंत्रता।
2. सदन में कही गई बात के लिए न्यायालयी कार्यवाही से संरक्षण, संविधान और लागू नियमों के अधीन।
3. सदन की कार्यवाही में कुछ मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप से संरक्षण।
4. सदन की गरिमा एवं अधिकारों की रक्षा।
सदन की कार्यवाही - सदन के भीतर वास्तविक काम कैसे होता है।
प्रश्नकाल - प्रश्नकाल संसदीय नियंत्रण का अत्यंत महत्वपूर्ण साधन है। सदस्य मंत्रियों से सरकारी कार्यों के बारे में प्रश्न पूछते हैं।
इसके माध्यम से सरकार
• जानकारी देनी पड़ती है
• अपनी नीतियों को स्पष्ट करना पड़ता है
• प्रशासनिक कमियों का उत्तर देना पड़ता है।
प्रश्नों के प्रमुख प्रकार -
(i) तारांकित प्रश्न - जिसका उत्तर मंत्री सदन में मौखिक रूप से देता है। इसके बाद पूरक प्रश्न पूछे जा सकते हैं।
(ii) अतारांकित प्रश्न - इसका उत्तर लिखित रूप में दिया जाता है इसके बाद पूरक प्रश्न नहीं पूछे जाते।
(iii) अल्पसूचना प्रश्न - तात्कालिक सार्वजनिक महत्व के विषय पर सामान्य सूचना अवधि से कम समय में पूछा जाने वाला प्रश्न।
शून्यकाल - प्रश्नकाल के बाद उठाए जाने वाले तत्काल सार्वजनिक महत्व के मुद्दों को शून्यकाल से जोड़ा जाता है। हालांकि
शून्यकाल संविधान में उल्लिखित शब्द नहीं है। यह संसदीय व्यवहार और परंपरा से विकसित हुआ है।
प्रस्ताव - सदन में विभिन्न प्रकार के प्रस्ताव लाए जा सकते हैं। जैसे
I. सामान्य प्रस्ताव
II. स्थगन प्रस्ताव
III. ध्यानाकर्षण संबंधी प्रक्रियाएँ
IV. अविश्वास प्रस्ताव
V. निंदा प्रस्ताव
VI. विशेषाधिकार प्रस्ताव
इनका उद्देश्य सरकार के किसी निर्णय या कार्य को सदन के सामने लाना और उस पर चर्चा कराना होता है।
अविश्वास प्रस्ताव - अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा में मंत्रिपरिषद की सामूहिक उत्तरदायित्व की जाँच का महत्वपूर्ण साधन है। अनुच्छेद 75(3) के अनुसार संघ की मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है। यदि सरकार लोकसभा का विश्वास खो देती है, तो सभी मंत्रियों को पद छोड़ना पड़ता है।
राज्य में अनुच्छेद 164(2) के अनुसार मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है।
विधेयक की प्रस्तुति - किसी कानून के निर्माण की प्रक्रिया सामान्यतः विधेयक से शुरू होती है। विधेयक के चरण
• प्रथम वाचन (प्रस्तुतीकरण) - (विधेयक का सामान्य परिचय।
• द्वितीय वाचन (प्रथम वाचन के बाद आवश्यक सुधार के बाद) में इसके सिद्धांतों और प्रावधानों पर विस्तृत चर्चा होती है। चर्चा के बाद आवश्यकता होने पर इसे समिति को भेजा जा सकता है।
• समिति में भेजना -
समिति स्तर - विधेयक की विस्तृत जाँच की जा सकती है। समिति की सिफारिशों के बाद यदि कोई है तो के बाद
• तृतीय वाचन - विधेयक के अंतिम रूप पर चर्चा और मतदान होता है।
• दूसरे सदन की स्वीकृति - जहाँ आवश्यक हो, विधेयक दूसरे सदन में जाता है।
• राष्ट्रपति/राज्यपाल की स्वीकृति - दोनों सदनों से पारित होने के बाद संघीय विधेयक राष्ट्रपति के समक्ष और राज्य विधेयक राज्यपाल के समक्ष जाता है, संविधान के अनुसार।
• मतदान - सदन में निर्णय बहुमत से लिया जाता है। यदि मत बराबर हो जाएँ, तो पीठासीन अधिकारी को संविधान के अधीन निर्णायक मत (Casting Vote) करने की शक्ति हो सकती है।
• गणपूर्ति (Quorum) - गणपूर्ति (Quorum) का अर्थ है सदन की कार्यवाही चलाने के लिए आवश्यक न्यूनतम सदस्य संख्या। संविधान के अनुच्छेद 100(3) के अनुसार संसद के प्रत्येक सदन की गणपूर्ति सदन की कुल सदस्य संख्या का दसवाँ भाग है। राज्य विधानमंडल के लिए अनुच्छेद 189(3) में इसी प्रकार की व्यवस्था है।
वित्तीय मामलों से संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया - यह मामला भारतीय संसदीय व्यवस्था का आर्थिक मेरुदंड है। सरकार जनता से कर वसूलती है और सार्वजनिक धन खर्च करती है। इसलिए संविधान ने सरकारी धन के संबंध में विधायिका को महत्वपूर्ण नियंत्रण दिया है। वित्तीय प्रक्रिया के प्रमुख अंग हैं -
1. वार्षिक वित्तीय विवरण
2. अनुदानों की माँग
3. विनियोग विधेयक
4. वित्त विधेयक
5. लेखानुदान
6. अनुपूरक, अतिरिक्त और अधिक अनुदान
7. आकस्मिकता निधि आदि।
वार्षिक वित्तीय विवरण - अनुच्छेद 112 के अंतर्गत राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए संसद के दोनों सदनों के समक्ष सरकार की अनुमानित प्राप्तियों और व्यय का विवरण रखवाता है। इसे बजट (Budget) कहा जाता है। राज्य स्तर पर यही व्यवस्था अनुच्छेद 202 में है।
बजट में क्या होता है? - बजट में दो पक्ष होते हैं प्राप्तियाँ जिनमें कर राजस्व, गैर-कर राजस्व, ऋण अन्य प्राप्तियाँ तथा व्यय में प्रशासन, रक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, आधारभूत संरचना, कल्याणकारी योजनाएँ आदि।
संचित निधि - अनुच्छेद 266 के अंतर्गत भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) की स्थापना की गई है।
राज्य में Consolidated Fund of the State होता है। सरकार के अधिकांश महत्वपूर्ण राजस्व और ऋण आदि इसी व्यवस्था से संबंधित होते हैं। संसद की अनुमति के बिना भारत की संचित निधि से धन का विनियोग नहीं किया जा सकता, संविधान में निर्धारित अपवादों और प्रक्रियाओं के अधीन।
भारत की आकस्मिकता निधि - अनुच्छेद 267 के अंतर्गत भारत की आकस्मिकता निधि (Contingency Fund) की व्यवस्था है। इसका उद्देश्य अप्रत्याशित और तत्काल व्यय की स्थिति में धन उपलब्ध कराना है। राज्य के लिए भी आकस्मिकता निधि की व्यवस्था है।
संचित निधि पर भारित व्यय - कुछ व्यय ऐसे होते हैं जिन्हें संविधान के अनुसार संचित निधि पर Charged Expenditure माना जाता है।
उदाहरण - राष्ट्रपति के पद से संबंधित कुछ व्यय, लोकसभा अध्यक्ष/उपाध्यक्ष तथा राज्यसभा सभापति/उपसभापति से संबंधित कुछ व्यय, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन आदि, भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) से संबंधित कुछ व्यय, न्यायालय के आदेश से देय कुछ राशियाँ, सार्वजनिक ऋण से संबंधित कुछ व्यय ऐसे व्यय पर संसद में चर्चा हो सकती है, लेकिन उस पर मतदान नहीं होता।
अनुदानों की माँग - अनुच्छेद 113 के अंतर्गत संचित निधि से किए जाने वाले ऐसे व्यय, जो Charged Expenditure नहीं हैं, उनके लिए अनुदानों की माँग (Demands for Grants) प्रस्तुत की जाती है। अनुदानों की माँग केवल लोकसभा में प्रस्तुत की जाती है। राज्य में ये माँगें विधानसभा में प्रस्तुत की जाती हैं।
कटौती प्रस्ताव - लोकसभा सदस्य अनुदानों की माँग पर कटौती प्रस्ताव ला सकते हैं। मुख्य प्रकार
(i) नीति कटौती - सरकार की नीति को अस्वीकार करने के उद्देश्य से माँग को ₹1 तक घटाने का प्रस्ताव।
(ii) मितव्ययिता कटौती - किसी माँग की राशि को एक निश्चित राशि तक कम करने का प्रस्ताव।
(iii) सांकेतिक कटौती - किसी विशिष्ट शिकायत को सामने लाने के लिए माँग में ₹100 की कटौती का प्रस्ताव।
कटौती प्रस्ताव सरकार को राजनीतिक और वित्तीय रूप से उत्तरदायी बनाने का महत्वपूर्ण संसदीय उपकरण है।
विनियोग विधेयक - अनुदानों की माँगों पर लोकसभा की स्वीकृति के बाद विनियोग विधेयक (Appropriation Bill) लाया जाता है। अनुच्छेद 114 इसका संवैधानिक आधार है। इसका उद्देश्य भारत की संचित निधि से - स्वीकृत अनुदानों की राशि तथा संचित निधि पर भारित व्यय के लिए धन निकालने का कानूनी अधिकार प्रदान करना है। विनियोग अधिनियम के बिना संचित निधि से धन निकालना संभव नहीं है, संविधान द्वारा निर्धारित व्यवस्था के अधीन।
लेखानुदान (Vote on Account) - जब पूरा बजट पारित होने में समय लगता है, तब सरकार अल्प अवधि हेतु खर्च चलाने बाबत लेखानुदान की मांग करती है जो नियमित बजट प्रक्रिया का विकल्प नहीं है।
अनुपूरक अनुदान - अनुच्छेद 115 के अंतर्गत यदि किसी वित्तीय वर्ष में किसी सेवा पर स्वीकृत राशि पर्याप्त नहीं पड़ती, तो अतिरिक्त धन की आवश्यकता हो सकती है। इसके लिए अनुपूरक अनुदान (Supplementary Grant) लिया जाता है।
अतिरिक्त अनुदान - यदि किसी सेवा के लिए ऐसा व्यय हो गया जिसके लिए उस वर्ष बजट में पर्याप्त राशि स्वीकृत ही नहीं थी, तो अतिरिक्त अनुदान (Additional Grant) की व्यवस्था की जाती है।
अधिक अनुदान - यदि किसी वित्तीय वर्ष में किसी सेवा पर स्वीकृत राशि से अधिक खर्च हो गया है, तो उसे नियमित करने के लिए Excess Grant की प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसकी जाँच में नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
धन विधेयक एवं वित्त विधेयक -
1. धन विधेयक (Money Bill) - संविधान का अनुच्छेद 110 धन विधेयक की परिभाषा देता है। कोई विधेयक धन विधेयक तभी होगा जब उसमें केवल अनुच्छेद 110(1) में निर्दिष्ट विषयों से संबंधित प्रावधान हों।
मुख्य विषय हैं -
1. कर का अधिरोपण, उन्मूलन, छूट, परिवर्तन या विनियमन।
2. भारत सरकार द्वारा धन उधार लेने का विनियमन।
3. भारत की संचित निधि या आकस्मिकता निधि की अभिरक्षा।
4. संचित निधि में धन डालना या वहाँ से धन निकालना।
5. भारत की संचित निधि से धन का विनियोग।
6. किसी व्यय को भारत की संचित निधि पर भारित घोषित करना या उसकी राशि बढ़ाना।
7. भारत की संचित निधि या लोक लेखा से संबंधित प्राप्तियों/व्यय का लेखा-परीक्षण।
8. उपर्युक्त विषयों से संबंधित आनुषंगिक विषय।
लोकसभा अध्यक्ष का प्रमाणन - किसी विधेयक के धन विधेयक होने या न होने के संबंध में लोकसभा अध्यक्ष का निर्णय अंतिम होता है।
धन विधेयक की प्रक्रिया - धन विधेयक केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है। इसके लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश आवश्यक होती है। लोकसभा द्वारा पारित होने के बाद इसे राज्यसभा के पास भेजा जाता है।
राज्यसभा -
• इसे अस्वीकार नहीं कर सकती,
• इसमें संशोधन नहीं कर सकती,
• केवल सिफारिशें कर सकती है।
राज्यसभा को धन विधेयक प्राप्त होने के बाद 14 दिनों के भीतर उसे लोकसभा को लौटाना होता है। लोकसभा राज्यसभा की सिफारिशों को स्वीकार कर सकती है या अस्वीकार कर सकती है। यदि राज्यसभा 14 दिनों के भीतर विधेयक वापस नहीं करती, तो विधेयक लोकसभा द्वारा पारित रूप में दोनों सदनों से पारित माना जाता है।
धन विधेयक में संयुक्त बैठक - धन विधेयक के संबंध में संसद की संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं है। क्योंकि राज्यसभा की भूमिका इसमें सीमित है और अंतिम नियंत्रण लोकसभा का है।
वित्त विधेयक (Financial Bill) - वित्त विधेयक धन विधेयक से व्यापक अवधारणा है। संविधान में वित्तीय विधेयकों की मुख्य व्यवस्था अनुच्छेद 117 में है। वित्त विधेयक दो प्रकार के होते हैं -
श्रेणी-I - वित्तीय विधेयक, अनुच्छेद 117(1) से संबंधित इसमें अनुच्छेद 110(1)(a) से (g) में उल्लिखित वित्तीय विषयों के साथ-साथ अन्य विषय भी हो सकते हैं। इसलिए हर Money Bill एक विशेष प्रकार का वित्तीय विधेयक है, लेकिन हर Financial Bill Money Bill नहीं है। इसे केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है और राष्ट्रपति की सिफारिश आवश्यक होती है। लेकिन इसके संबंध में राज्यसभा की शक्तियाँ धन विधेयक की तुलना में अधिक हैं।
श्रेणी-II - वित्तीय विधेयक अनुच्छेद 117(3) के अंतर्गत ऐसे विधेयक आते हैं जिनमें भारत की संचित निधि से व्यय की व्यवस्था होती है, लेकिन वे अनुच्छेद 110 के अर्थ में धन विधेयक नहीं होते। ऐसे विधेयक के पारित होने के लिए राष्ट्रपति की सिफारिश आवश्यक होती है। यह विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है, क्योंकि यह Money Bill नहीं है।
धन विधेयक और वित्त विधेयक में अंतर -
आधार - धन विधेयक - वित्त विधेयक
संवैधानिक आधार - अनुच्छेद 110 - अनुच्छेद 117
विषय - केवल अनुच्छेद 110 के विषय - व्यापक वित्तीय विषय
कहाँ प्रस्तुत - केवल लोकसभा - प्रकार के अनुसार लोकसभा या कोई सदन
राष्ट्रपति की सिफारिश - आवश्यक - संबंधित श्रेणी में आवश्यक
राज्यसभा की शक्ति- केवल सिफारिश - सामान्य विधेयक जैसी महत्वपूर्ण भूमिका
14 दिन की सीमा - लागू - नहीं
लोकसभा अध्यक्ष का प्रमाणन - आवश्यक - प्रत्येक वित्त विधेयक के लिए नहीं
संयुक्त बैठक - नहीं - लागू हो सकती है, जहाँ संविधान अनुमति देता है
दायरा - संकीर्ण - व्यापक
उदाहरण - यदि विधेयक में केवल एक नया कर लगाया जाए और उस कर से प्राप्त धन भारत की संचित निधि में जमा होगा जैसे अनुच्छेद 110 में आने वाले विषय हैं, तो वह Money Bill हो सकता है। लेकिन यदि उसी विधेयक में कर संबंधी प्रावधान के साथ कोई ऐसा सामान्य विषय भी जोड़ दिया जाए जो अनुच्छेद 110 में नहीं आता, तो वह Money Bill नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार Financial Bill हो सकता है।
संसद की वित्तीय शक्ति का महत्व -
सरकार का tex से संबंधित सिद्धांत - No taxation without representation.
अर्थात जनता पर कर लगाने और जनता के धन को खर्च करने का अधिकार निर्वाचित प्रतिनिधियों की संवैधानिक प्रक्रिया के अधीन है। इसीलिए वित्तीय मामलों में लोकसभा की विशेष भूमिका है, क्योंकि वह प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा निर्वाचित सदन है।
राज्य में वित्तीय प्रक्रिया - संघ की तरह राज्य में भी लगभग समान संवैधानिक ढाँचा है। जिसके लिए
विषय के अनुच्छेद - संघ - राज्य
• वार्षिक वित्तीय विवरण - 112 - 202
• अनुदानों की माँग - 113- 203
• विनियोग विधेयक - 114 - 204
अनुपूरक/अतिरिक्त/अधिक अनुदान - 115 - 205
लेखानुदान आदि- 116 - 206
वित्तीय विधेयक - 117 - 207
संचित निधि- 266 - 266
आकस्मिकता निधि - 267 - 267
पूरी वित्तीय प्रक्रिया एक नजर में -
वार्षिक वित्तीय विवरण/बजट -अनुदानों की माँग - लोकसभा द्वारा मतदान विनियोग विधेयक - विनियोग अधिनियम - संचित निधि से व्ययऔर कर लगाने के लिए
वित्त विधेयक - संसदीय स्वीकृति - राष्ट्रपति की स्वीकृति - कर संबंधी विधिक अधिकार
याद रखने योग्य अनुच्छेद - संसद एवं कार्यवाही
अनुच्छेद 79 - संसद का गठन
अनुच्छेद 85 - संसद के अधिवेशन
अनुच्छेद 100 - मतदान एवं गणपूर्ति
अनुच्छेद 105- संसदीय विशेषाधिकार
अनुच्छेद 110- धन विधेयक
अनुच्छेद 111- राष्ट्रपति की स्वीकृति
अनुच्छेद 112 - वार्षिक वित्तीय विवरण
अनुच्छेद 113 - अनुदानों की माँग
अनुच्छेद 114 - विनियोग विधेयक
अनुच्छेद 115 - अनुपूरक/अतिरिक्त/अधिक अनुदान
अनुच्छेद 116 - लेखानुदान आदि
अनुच्छेद 117 - वित्तीय विधेयक
अनुच्छेद 118 - कार्य-संचालन के नियम
अनुच्छेद 120 - संसद में भाषा
अनुच्छेद 121- न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा की सीमा
अनुच्छेद 122- संसदीय कार्यवाही में न्यायालय का हस्तक्षेप
राज्य विधानमंडल -
अनुच्छेद 168- राज्य विधानमंडल
अनुच्छेद 174 - अधिवेशन
अनुच्छेद 189 - मतदान एवं गणपूर्ति
अनुच्छेद 194 - विशेषाधिकार
अनुच्छेद 198 - धन विधेयक की विशेष प्रक्रिया
अनुच्छेद 199 - राज्य का धन विधेयक
अनुच्छेद 200 - राज्यपाल की स्वीकृति
अनुच्छेद 202 - वार्षिक वित्तीय विवरण
अनुच्छेद 203 - अनुदानों की माँग
अनुच्छेद 204 - विनियोग विधेयक
अनुच्छेद 205 - अनुपूरक/अतिरिक्त/अधिक अनुदान
अनुच्छेद 206 - लेखानुदान आदि
अनुच्छेद 207 - वित्तीय विधेयक
अनुच्छेद 208 - कार्य-संचालन के नियम
अनुच्छेद 210 - विधानमंडल में भाषा
अनुच्छेद 212 - विधानमंडलीय कार्यवाही में न्यायालय का हस्तक्षेप
निष्कर्ष - भारतीय संविधान ने विधायिका के सामान्य कार्य-संचालन और वित्तीय नियंत्रण के बीच संतुलित व्यवस्था बनाई है। सामान्य विधायी कार्य में दोनों सदनों की महत्वपूर्ण भूमिका है, जबकि धन विधेयक और सरकारी वित्तीय नियंत्रण में लोकसभा/विधानसभा को विशेष स्थान प्राप्त है। इसका मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकार जनता का धन विधायिका की संवैधानिक अनुमति और निगरानी के बिना खर्च न कर सके।
नोट - संसदीय कार्य-संचालन सरकार को राजनीतिक रूप से उत्तरदायी बनाता है, जबकि वित्तीय प्रक्रिया सरकार को जनता के धन के उपयोग के लिए विधायिका के प्रति उत्तरदायी बनाती है।
सदस्यों की निरर्हता एवं दसवीं अनुसूची
A.संसद एवं राज्य विधानमंडल के सदस्यों की निरर्हता
B.दलबदल विरोधी कानून
C.संविधान की दसवीं अनुसूची
D.दलबदल के आधार पर सदस्यता की समाप्ति -
सदस्यों की निरर्हता एवं संविधान की दसवीं अनुसूची - भारतीय संविधान ने संसद और राज्य विधानमंडलों के सदस्यों के लिए कुछ ऐसी परिस्थितियाँ निर्धारित की हैं जिनमें कोई व्यक्ति सदस्य बनने या बने रहने के लिए अयोग्य अथवा निरर्ह (Disqualified) हो जाता है। इन निरर्हताओं का उद्देश्य है -
• विधायिका में योग्य एवं निष्पक्ष व्यक्ति बने रहें।
• पद के दुरुपयोग को रोका जा सके।
• हितों के टकराव को नियंत्रित किया जा सके।
• सदस्य अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों का पालन करें।
• राजनीतिक दलों में अनुशासन बना रहे।
• निर्वाचित प्रतिनिधि व्यक्तिगत लाभ के लिए बार-बार दल न बदलें।
सदस्यों की निरर्हता के दो प्रमुख संवैधानिक आधार -
(1) सामान्य संवैधानिक निरर्हता - इस संबंध में संसद हेतु अनुच्छेद 102 और राज्य विधानमंडल हेतु अनुच्छेद 191 में व्यवस्था दी गई है।
(2) दलबदल के आधार पर निरर्हता - संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद 102(2) में संसद सदस्य एवं 191(2) में विधानमंडल सदस्य हेतु व्यवस्था दी गई है।
I. संसद के सदस्यों की निरर्हता - संसद के सदस्यों की निरर्हता का मुख्य प्रावधान अनुच्छेद 102 में है। इसके अनुसार कोई व्यक्ति संसद के किसी सदन का सदस्य चुने जाने और सदस्य बने रहने के लिए निरर्ह होगा यदि वह निर्धारित संवैधानिक परिस्थितियों में आता है -
1. लाभ का पद धारण करना - यदि कोई व्यक्ति भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन लाभ का पद (Office of Profit) धारण करता है, तो वह संसद की सदस्यता के लिए निरर्ह हो सकता है।लेकिन प्रत्येक सरकारी पद स्वतः लाभ का पद नहीं बन जाता। संसद कानून द्वारा कुछ पदों को निरर्हता से मुक्त कर सकती है।
उद्देश्य - विधायक सरकार के आर्थिक या प्रशासनिक प्रभाव में आकर स्वतंत्र निर्णय न लें।
2. विकृतचित्तता - यदि किसी सक्षम न्यायालय ने व्यक्ति को विकृतचित्त (unsound mind) घोषित किया है, तो वह संसद की सदस्यता के लिए निरर्ह हो सकता है। केवल मानसिक बीमारी या मानसिक तनाव पर्याप्त नहीं है। आवश्यक है कि सक्षम न्यायालय द्वारा विधिक रूप से ऐसी घोषणा की गई हो।
3. दिवालियापन - यदि व्यक्ति अदत्त दिवालिया (undischarged insolvent) है, तो वह संसद की सदस्यता के लिए निरर्ह हो सकता है। अर्थात व्यक्ति दिवालिया घोषित हो चुका है और अभी तक उसे दिवालियापन से विधिक रूप से मुक्ति नहीं मिली है।
4. विदेशी राज्य की नागरिकता - यदि व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं रहा है या स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता प्राप्त कर चुका है, या किसी विदेशी राज्य के प्रति निष्ठा या allegiance स्वीकार कर चुका है, तो वह संसद का सदस्य बनने के लिए निरर्ह होगा।
5. संसद द्वारा बनाए गए कानून के अधीन निरर्हता - अनुच्छेद 102(1)(e) के अनुसार संसद कानून बनाकर अतिरिक्त निरर्हताएँ निर्धारित कर सकती है।
उदाहरण - जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) के अंतर्गत विभिन्न परिस्थितियों में व्यक्ति चुनाव लड़ने अथवा सदस्य बने रहने से निरर्ह हो सकता है।
II. राज्य विधानमंडल के सदस्यों की निरर्हता - राज्य विधानमंडल के सदस्यों की निरर्हता का प्रावधान अनुच्छेद 191 में है। इसके प्रमुख आधार संसद के सदस्यों के समान हैं। राज्य विधानमंडल के लिए प्रमुख निरर्हताएँ
1. लाभ का पद धारण करना
2. सक्षम न्यायालय द्वारा विकृतचित्त घोषित होना
3. अदत्त दिवालिया होना
4. भारतीय नागरिक न होना अथवा विदेशी नागरिकता स्वेच्छा से प्राप्त करना
5. संसद द्वारा बनाए गए कानून के अधीन निरर्ह होना
6. राज्य विधानमंडल के संदर्भ में राज्य विधानमंडल भी अपने अधिकार क्षेत्र के अनुसार कानून बना सकता है, जहाँ संविधान इसकी अनुमति देता है।
III. अनुच्छेद 103 और 192 निरर्हता के प्रश्न का निर्णय -
संसद के सदस्य के संबंध में - यदि प्रश्न उठता है कि संसद का कोई सदस्य किसी निरर्हता के अधीन हो गया है या नहीं, तो अनुच्छेद 103 लागू होता है। इस मामले में राष्ट्रपति निर्णय करते हैं, लेकिन राष्ट्रपति को निर्णय लेने से पहले निर्वाचन आयोग की राय प्राप्त करनी होती है और उस राय के अनुसार कार्य करना होता है।
राज्य विधानमंडल सदस्य के संबंध में- राज्य विधानमंडल के सदस्य की निरर्हता के प्रश्न पर अनुच्छेद 192 लागू होता है।इसमें राज्यपाल निर्णय करता है, लेकिन निर्वाचन आयोग की राय प्राप्त करने के बाद और उसके अनुसार कार्य करता है।
लेकिन ध्यान रहे, दलबदल की निरर्हता दसवीं अनुसूची के अंतर्गत आती है और उसका निर्णय सामान्यतः संबंधित सदन के अध्यक्ष/सभापति द्वारा किया जाता है।
B. दलबदल विरोधी कानून - दलबदल का अर्थ है कोई निर्वाचित सदस्य जिस राजनीतिक दल के टिकट पर चुनाव जीतकर आया है, वह बाद में उस दल को छोड़कर किसी दूसरे राजनीतिक दल का समर्थन या सदस्यता स्वीकार कर ले अथवा अपने दल के निर्देश के विपरीत कार्य करे।
अर्थात जिस दल के नाम और समर्थन से जनता ने प्रतिनिधि को चुना, उसका राजनीतिक साथ छोड़ देना दलबदल कहलाता है। हालाँकि कानून में दलबदल की निरर्हता केवल दल छोड़ने तक सीमित नहीं है। दसवीं अनुसूची ने इसके विशिष्ट आधार निर्धारित किए हैं।
भारत में दलबदल की समस्या - स्वतंत्रता के बाद भारतीय राजनीति में अनेक अवसरों पर निर्वाचित सदस्य किसी लालच में आकर दल बदल लेते थे वो सरकार गिराने या बनाने में व्यक्तिगत सौदेबाजी करते थे। वर्ष 1960 और 1970 के दशक में यह समस्या अति गंभीर हो गई। इसी संदर्भ में प्रसिद्ध राजनीतिक अभिव्यक्ति सामने आई आया राम, गया राम। इससे राजनीतिक दल बदलने की प्रवृत्ति का प्रतीकात्मक वर्णन किया जाता है। वर्ष 1970 के बाद 2014 से 2026 तक सुनियोजित दलबदल हुआ जैसे ज्योतिरादित्य सिंधिया का भाजपा में शामिल होकर ऑपरेशन लोटस के अंतर्गत मध्य प्रदेश की कांग्रेस की निर्वाचित सरकार को गिराना, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के NCP/TMC विधायकों और संसद सदस्यों का भाजपा में शामिल होना और दिल्ली के AAP (राज्य सभा) सांसदों का भाजपा में शामिल होना।
दलबदल विरोधी कानून की आवश्यकता - दलबदल विरोधी कानून का उद्देश्य था -
(i) राजनीतिक स्थिरता - बार-बार दल बदलने से सरकारों की स्थिरता प्रभावित होती थी।
(ii) मतदाता के विश्वास की रक्षा - मतदाता किसी उम्मीदवार को उसके राजनीतिक दल और विचारधारा के आधार पर भी वोट देते हैं।
(iii) राजनीतिक भ्रष्टाचार (हॉर्स ट्रेडिंग) रोकना - दल बदलने के बदले पद, सत्ता या अन्य लाभ प्राप्त करने की प्रवृत्ति को रोकना।
(iv) दलगत अनुशासन - निर्वाचित सदस्यों को अपने दल के घोषित निर्णयों के प्रति उत्तरदायी बनाना।
52वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 (राजीव गांधी सरकार)- दलबदल विरोधी कानून को संवैधानिक रूप से प्रभावी बनाने के लिए संविधान (52वाँ संशोधन) अधिनियम, 1985 पारित कर संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ते हुए अनुच्छेद 102(2) व 191(2) जोड़ा गया। इसलिए दसवीं अनुसूची को Anti -Defection Law/दलबदल विरोधी कानून कहा जाता है।
C. संविधान की दसवीं अनुसूची - दसवीं अनुसूची में यह बताया गया है कि किन परिस्थितियों में संसद अथवा राज्य विधानमंडल का सदस्य दलबदल के आधार पर निरर्ह होगा। इसे दो भागों में समझ सकते हैं -
1. राजनीतिक दल के सदस्य द्वारा दलबदल
2. निर्दलीय एवं नामित सदस्यों के संबंध में दलबदल
I. राजनीतिक दल के सदस्य की निरर्हता - दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 2(1)(a) के अनुसार यदि किसी राजनीतिक दल का सदस्य स्वेच्छा से अपने राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है, तो वह निरर्ह हो सकता है। यहाँ
स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना केवल लिखित इस्तीफा देना नहीं है। व्यक्ति ने औपचारिक रूप से इस्तीफा न दिया हो, फिर भी उसके आचरण से यह स्पष्ट हो सकता है कि उसने राजनीतिक दल छोड़ दिया है। अर्थात उसका व्यवहार (conduct) भी महत्वपूर्ण है।
II. पार्टी के निर्देश के विरुद्ध मतदान या मतदान से विरत रहना - दसवीं अनुसूची के अनुसार यदि कोई सदस्य अपने राजनीतिक दल द्वारा जारी निर्देश के विरुद्ध सदन में मतदान करता है; या मतदान से अनुपस्थित रहता है, और ऐसा वह अपने दल की पूर्व अनुमति के बिना करता है तथा दल द्वारा निर्धारित समय में उसे माफ नहीं किया जाता, तो वह दलबदल के आधार पर निरर्ह हो सकता है।
इसे Party Whip के विरुद्ध मतदान कहा जाता है।
उदाहरण - मान लीजिए लोकसभा में पार्टी A के 100 सांसद हैं। सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव आता है। पार्टी अपने सांसदों को निर्देश (व्हिप) जारी करती है कि सरकार के पक्ष में मतदान करें। यदि पार्टी A का कोई सांसद बिना अनुमति इसके विपरीत मतदान करता है या निर्धारित शर्तों के अंतर्गत अनुपस्थित रहता है, तो दसवीं अनुसूची के तहत उसके विरुद्ध निरर्हता की कार्यवाही हो सकती है।
III. निर्दलीय सदस्य - यदि कोई व्यक्ति निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतता है और चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है, तो वह दसवीं अनुसूची के अंतर्गत निरर्ह हो सकता है। इसका उद्देश्य है कि निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव के समय किसी दल का टिकट लिए बिना जनता से समर्थन लेकर जीतने के बाद तत्काल किसी दल में शामिल होकर उस जनादेश का राजनीतिक रूपांतरण न करे।
IV. नामित सदस्य - नामित सदस्य के लिए विशेष नियम है। यदि कोई नामित सदस्य सदन में नामित होने के छह महीने के भीतर किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है, तो इस आधार पर निरर्ह नहीं किया जा सकता। लेकिन यदि वह छह महीने की अवधि समाप्त होने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो वह दसवीं अनुसूची के तहत निरर्हता के अधीन हो सकता है। अर्थात नामित सदस्य + 6 महीने के भीतर दल में प्रवेश = निरर्हता नहीं और 6 महीने के बाद दल में प्रवेश = निरर्हता का आधार।
D. दलबदल के आधार पर सदस्यता की समाप्ति - दलबदल करने पर सदस्यता समाप्त होती है -
निरर्हता का निर्णय - दसवीं अनुसूची के अनुसार दलबदल से संबंधित निरर्हता के प्रश्न पर -
लोकसभा में लोकसभा अध्यक्ष।
राज्यसभा में राज्यसभा सभापति।
विधानसभा में विधानसभा अध्यक्ष।
विधान परिषद में विधान परिषद सभापति।
निर्णय करते हैं। अर्थात सदन का Presiding Officer महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अध्यक्ष/सभापति की भूमिका - यदि किसी सदस्य पर दलबदल का आरोप लगाया जाता है, तो उसके विरुद्ध निरर्हता की याचिका/प्रश्न उठ सकता है। अध्यक्ष/सभापति इस मामले में -
1. मामले पर विचार करते हैं।
2. संबंधित पक्षों को सुन सकते हैं।
3. उपलब्ध तथ्यों एवं दस्तावेजों की जांच करते हैं।
4. दसवीं अनुसूची के प्रावधानों को लागू करते हैं।
5. आरोप सत्य पाए जाने पर सदस्य को निरर्ह घोषित करते हैं।
न्यायिक समीक्षा - पहले यह प्रश्न उठा कि क्या अध्यक्ष/सभापति के निर्णय को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है इसका उत्तर Kihoto Hollohan v. Zachillhu (1992) मामले में मिला।
Kihoto Hollohan v. Zachillhu में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अध्यक्ष/सभापति का निर्णय न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के अधीन होता है। अर्थात अध्यक्ष/सभापति का निर्णय पूर्णतः न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं है। हालाँकि न्यायालय संवैधानिक/कानूनी सीमाओं के भीतर ही हस्तक्षेप करता है।
अध्यक्ष स्वयं दलबदल करें तो? - यह दिलचस्प संवैधानिक प्रश्न है कि यदि अध्यक्ष/सभापति के स्वयं के विरुद्ध दलबदल का प्रश्न उठता है, तो दसवीं अनुसूची में ऐसी स्थिति हेतु अलग व्यवस्था है। ऐसी स्थिति में संबंधित सदन द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किसी अन्य व्यक्ति को निर्णयकारी भूमिका मिल सकती है। इससे यह सिद्धांत सामने आता है कि
कोई व्यक्ति अपने ही विवाद में निर्णायक नहीं होना चाहिए।
विलय (Merger) का अपवाद - दलबदल विरोधी कानून में एक महत्वपूर्ण अपवाद विलय (Merger) है। यदि किसी राजनीतिक दल के कम-से-कम दो-तिहाई विधायक/सांसद किसी अन्य राजनीतिक दल में विलय के पक्ष में हों, तो दसवीं अनुसूची के तहत इसे वैध विलय माना जा सकता है और संबंधित सदस्यों को दलबदल के आधार पर निरर्हता से संरक्षण मिल सकता है।
उदाहरण - मान लीजिए किसी राजनीतिक दल के राज्य विधानसभा में 60 सदस्य हैं। यदि दो-तिहाई 60 × 2/3 = 40 सदस्य किसी दूसरे दल के साथ विधिवत विलय का समर्थन करते हैं, तो दसवीं अनुसूची के विलय संबंधी अपवाद का प्रश्न उठ सकता है।
महत्वपूर्ण - पहले दसवीं अनुसूची में Split यानी विभाजन का भी अपवाद था।लेकिन 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा उस अपवाद को समाप्त कर दिया गया। अब केवल कुछ परिस्थितियों में दो-तिहाई सदस्यों वाला merger संरक्षण प्रदान करता है।
उदाहरण - वर्ष 2026 में AAP के 10 में से 07 राज्य सभा सदस्यों का भाजपा में विलय इसका ताजा उदाहरण है।
91वाँ संविधान संशोधन, 2003 - दलबदल विरोधी कानून को और मजबूत करने के लिए 91वें संविधान संशोधन द्वारा
• Split का अपवाद समाप्त किया गया।
• संविधान के अनुच्छेद 75(1A) और 164(1A) के अनुसार केंद्र और राज्यों में मंत्रिपरिषद के आकार की सीमा (कुल सदस्य संख्या का अधिकतम 15%) निर्धारित की गई।
• दलबदल से जुड़े व्यक्तियों के मंत्री पद प्राप्त करने पर प्रतिबंध लगाए गए।
दलबदल विरोधी कानून की मुख्य विशेषताएँ -
• दल की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ना = निरर्हता
• पार्टी निर्देश के विरुद्ध मतदान = निरर्हता हो सकती है
• पार्टी निर्देश के विरुद्ध मतदान से अनुपस्थित रहना = निरर्हता हो सकती है
• निर्दलीय सदस्य का दल में शामिल होना = निरर्हता
• नामित सदस्य का 6 माह बाद दल में शामिल होना = निरर्हता
• मान्य विलय में 2/3 सदस्य निरर्हता से = अपवाद
• पुराना Split अपवाद = समाप्त
• निर्णय = सदन का अध्यक्ष/सभापति
• निर्णय की न्यायिक समीक्षा = संभव
दलबदल विरोधी कानून के लाभ -
(1) राजनीतिक स्थिरता - सरकारें केवल व्यक्तिगत सौदेबाजी के कारण बार-बार गिरने से बचती हैं।
(2) दलगत अनुशासन - राजनीतिक दल के सदस्य अपने दल के महत्वपूर्ण निर्णयों के प्रति उत्तरदायी रहते हैं।
(3) मतदाता के जनादेश की रक्षा - चुनाव परिणाम के बाद अचानक राजनीतिक पाला बदलने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगता है।
(4) राजनीतिक भ्रष्टाचार पर नियंत्रण - मंत्री पद या अन्य लाभ के लिए होने वाले दलबदल को रोकने में सहायता मिलती है।
(5) लोकतांत्रिक स्थिरता - संसदीय शासन प्रणाली में सरकार की स्थिरता महत्वपूर्ण है। दलबदल विरोधी कानून इस स्थिरता को मजबूत करता है।
दलबदल विरोधी कानून की आलोचनाएँ - दलबदल विरोधी कानून पूर्णतः दोषरहित नहीं है -
(i) विचार की स्वतंत्रता पर प्रभाव - सांसद या विधायक जनता के प्रतिनिधि होते हैं। यदि उन्हें प्रत्येक महत्वपूर्ण मतदान में पार्टी निर्देश का पालन करना पड़े, तो उनकी स्वतंत्र राजनीतिक अभिव्यक्ति प्रभावित हो सकती है।
(ii) पार्टी नेतृत्व की शक्ति बढ़ना - इससे पार्टी नेतृत्व अत्यधिक शक्तिशाली हो सकता है।
(iii) अध्यक्ष/सभापति की निष्पक्षता पर प्रश्न - चूँकि अध्यक्ष/सभापति अक्सर किसी राजनीतिक दल से संबंधित होते हैं, इसलिए उनके निर्णय की निष्पक्षता को लेकर प्रश्न उठ सकते हैं।
(iv) निर्णय में विलंब - यदि दलबदल की याचिका पर लंबे समय तक निर्णय न लिया जाए, तो कानून का उद्देश्य कमजोर हो सकता है।
(v) हर असहमति को दलबदल मानने का खतरा - लोकतंत्र में स्वस्थ असहमति आवश्यक है। दलगत अनुशासन और विधायक की स्वतंत्र अंतरात्मा के बीच संतुलन कठिन प्रश्न है।
दलबदल कानून और व्हिप - Whip (व्हिप) राजनीतिक दल द्वारा अपने सदस्यों को सदन में मतदान के संबंध में दिया गया निर्देश है।लेकिन प्रत्येक पार्टी निर्देश के उल्लंघन पर स्वतः सदस्यता समाप्त नहीं होती। दसवीं अनुसूची की विशिष्ट शर्तें पूरी होना आवश्यक है। इसलिए -
Whip का उल्लंघन - हर स्थिति में स्वतः सदस्यता समाप्त नहीं बल्कि इसमें दसवीं अनुसूची की शर्तें पूरी - निरर्हता की कार्यवाही - सक्षम अध्यक्ष/सभापति का निर्णय महत्वपूर्ण है।
दलबदल विरोधी कानून और निरर्हता में अंतर -
सामान्य निरर्हता - अनुच्छेद 102/191।और दलबदल आधारित निरर्हता अनुच्छेद 102(2)/191(2) + दसवीं अनुसूची। यहां दोनों अलग-अलग संवैधानिक व्यवस्थाएँ हैं।
महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान -
संवैधानिक - प्रावधान
अनुच्छेद 102 - संसद के सदस्यों की निरर्हता
अनुच्छेद 103 - संसद सदस्य की निरर्हता के प्रश्न पर राष्ट्रपति का निर्णय
अनुच्छेद 191 - राज्य विधानमंडल के सदस्यों की निरर्हता
अनुच्छेद 192 - राज्य विधानमंडल सदस्य की निरर्हता के प्रश्न पर राज्यपाल का निर्णय
अनुच्छेद 102(2) - दलबदल के आधार पर संसद सदस्य की निरर्हता
अनुच्छेद 191(2) - दलबदल के आधार पर राज्य विधानमंडल सदस्य की निरर्हता
दसवीं अनुसूची दलबदल विरोधी कानून
52वाँ संशोधन, 1985 दसवीं अनुसूची जोड़ी गई
91वाँ संशोधन, 2003 Split अपवाद समाप्त, दलबदल व्यवस्था मजबूत।
न्यायिक निर्णय -
1. Kihoto Hollohan v. Zachillhu, 1992 - यह दलबदल विरोधी कानून का सबसे महत्वपूर्ण मामला है। सर्वोच्च न्यायालय ने दसवीं अनुसूची की संवैधानिक वैधता को व्यापक रूप से स्वीकार किया तथा अध्यक्ष/सभापति के निर्णय को न्यायिक समीक्षा के अधीन माना।
2. Rajendra Singh Rana v. Swami Prasad Maurya, 2007 - इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने दलबदल संबंधी संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया कि केवल तकनीकी रूप से इस्तीफा न देने से यह आवश्यक नहीं कि सदस्य ने दल की सदस्यता नहीं छोड़ी है। उसके आचरण से भी निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
3. Keisham Meghachandra Singh v. Hon'ble Speaker, 2020 - इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने दलबदल याचिकाओं पर अनिश्चितकाल तक निर्णय लंबित रखने की समस्या पर गंभीर चिंता व्यक्त की और अध्यक्ष के निर्णय में अत्यधिक विलंब को लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए समस्या माना।
एक संवैधानिक समस्या - अध्यक्ष ही निर्णायक क्यों? - यह दलबदल विरोधी कानून का सबसे चर्चित प्रश्न है। एक ओर अध्यक्ष/सभापति सदन के संरक्षक हैं।दूसरी ओर वे किसी राजनीतिक दल से आए हुए निर्वाचित व्यक्ति होते हैं। इसलिए प्रश्न उठता है कि क्या दलबदल संबंधी विवाद का निर्णय किसी स्वतंत्र संवैधानिक या न्यायिक संस्था को करना चाहिए? इस विषय पर समय-समय पर सुधार के सुझाव दिए गए हैं। न्यायालय ने भी दलबदल मामलों के शीघ्र निपटारे और निष्पक्ष प्रक्रिया की आवश्यकता पर जोर दिया है।
उदाहरण - मान लीजिए विधानसभा में पार्टी X के टिकट पर A विधायक चुनाव जीतता है। बाद में A
स्थिति 1 - पार्टी X छोड़कर पार्टी Y में शामिल हो जाता है तो दसवीं अनुसूची के तहत निरर्हता का प्रश्न उठ सकता है।
स्थिति 2 - पार्टी X सरकार के पक्ष में मतदान करने का निर्देश देती है, लेकिन A बिना अनुमति विपक्ष में मतदान करता है तो दसवीं अनुसूची के तहत निरर्हता हो सकती है।
स्थिति 3 - A निर्दलीय जीतता है और बाद में पार्टी Y में शामिल हो जाता है तो निरर्हता का आधार बन सकता है।
स्थिति 4 - A नामित सदस्य है और छह महीने के भीतर किसी दल में शामिल होता है तो इस आधार पर दसवीं अनुसूची की निरर्हता लागू नहीं होगी परन्तु 6 माह बाद किसी दल में शामिल होता है तो दसवीं अनुसूची लागू होगी।
स्थिति 5 - पार्टी X के दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरे दल में वैध विलय करते हैं तो दसवीं अनुसूची के merger exception का लाभ मिल सकता है।
निष्कर्ष - सदस्यों की निरर्हता भारतीय लोकतंत्र में विधायिका की शुचिता और स्वतंत्रता बनाए रखने की संवैधानिक व्यवस्था है। संसद के लिए अनुच्छेद 102 और राज्य विधानमंडल के लिए अनुच्छेद 191 सामान्य निरर्हताओं का प्रावधान करते हैं, जबकि दलबदल के आधार पर निरर्हता अनुच्छेद 102(2), 191(2) तथा दसवीं अनुसूची के अंतर्गत आती है।
52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा दसवीं अनुसूची को संविधान में शामिल किया गया। इसका उद्देश्य राजनीतिक दल बदलने की अवसरवादी प्रवृत्ति पर नियंत्रण लगाना था। बाद में 91वें संविधान संशोधन, 2003 ने "split" के अपवाद को समाप्त करके व्यवस्था को और कठोर बनाया। हालाँकि दलबदल विरोधी कानून ने राजनीतिक स्थिरता और दलगत अनुशासन को मजबूत किया है, फिर भी यह विधायक की अंतरात्मा की स्वतंत्रता, पार्टी नेतृत्व के प्रभुत्व और अध्यक्ष/सभापति की निष्पक्षता जैसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक प्रश्न पैदा करता है। इसलिए इसका वास्तविक उद्देश्य केवल दलबदल रोकना नहीं, बल्कि राजनीतिक स्थिरता और निर्वाचित प्रतिनिधि की स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करना होना चाहिए।
अनुच्छेद 102/191 = सामान्य निरर्हता
अनुच्छेद 102(2)/191(2) = दलबदल की निरर्हता
दसवीं अनुसूची = दलबदल विरोधी कानून
52वाँ संशोधन, 1985 = शुरुआत
91वाँ संशोधन, 2003 = Split समाप्त
अध्यक्ष/सभापति = प्रारंभिक निर्णायक प्राधिकारी
Kihoto Hollohan = न्यायिक समीक्षा संभव
विधायी विशेषाधिकार -
A.संसद के विशेषाधिकार
B.राज्य विधानमंडल के विशेषाधिकार
C.सदस्यों के विशेषाधिकार
D.विशेषाधिकारों का उद्देश्य एवं सीमा
विधायी विशेषाधिकार (Legislative Privileges) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105 और 194 का महत्वपूर्ण विषय है।
विधायी विशेषाधिकार का अर्थ - विधायी विशेषाधिकार से आशय उन विशेष अधिकारों, उन्मुक्तियों और शक्तियों से है जो संसद के दोनों सदनों, राज्य विधानमंडलों के सदनों तथा उनके सदस्यों को प्राप्त हैं, ताकि वे अपने विधायी कार्यों को स्वतंत्रता, निर्भीकता और प्रभावी ढंग से कर सकें। सरल शब्दों में विधायी विशेषाधिकार वे विशेष अधिकार हैं जो संसद और विधानमंडलों तथा उनके सदस्यों को सदन के कार्यों को स्वतंत्र एवं निर्बाध रूप से संचालित करने के लिए प्राप्त होते हैं। इनका उद्देश्य किसी सदस्य को व्यक्तिगत लाभ देना नहीं, बल्कि विधायिका की स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा करना है।
संवैधानिक आधार - भारतीय संविधान में मुख्यतः दो अनुच्छेद विधायी विशेषाधिकारों से संबंधित हैं है
अनुच्छेद 105 - यह संसद और उसके सदस्यों के विशेषाधिकारों से संबंधित है।
1. संसद में वाक्-स्वातंत्र्य।
2. संसद या उसकी समिति में कही गई बात या दिए गए मत के संबंध में न्यायालयीय कार्यवाही से उन्मुक्ति।
3. संसद के अन्य विशेषाधिकार।
4. विशेषाधिकारों को संसद द्वारा कानून बनाकर निर्धारित करने की शक्ति।
अनुच्छेद 194 - यह राज्य विधानमंडलों और उनके सदस्यों के विशेषाधिकारों से संबंधित है। राज्य विधानमंडल के लिए लगभग उपरोक्तानुसार व्यवस्था रहती है।
इन दोनों अनुच्छेदों की संरचना लगभग समान है।
A. संसद के विशेषाधिकार - संसद के विशेषाधिकार दो प्रकार के माने जाते हैं -
(i) सामूहिक विशेषाधिकार - ये पूरे सदन को प्राप्त होते हैं।
(ii) व्यक्तिगत विशेषाधिकार - ये संसद के प्रत्येक सदस्य को उसके संसदीय कार्य के संबंध में प्राप्त होते हैं।
संसद के प्रमुख सामूहिक विशेषाधिकार
1. सदन की कार्यवाही को नियंत्रित करने का अधिकार - प्रत्येक सदन को अपनी कार्यवाही स्वयं संचालित करने का अधिकार है। सदन -
• अपनी कार्यवाही के नियम बनाता है
• बहस का संचालन करता है
• प्रश्न पूछने की प्रक्रिया निर्धारित करता है
• सदन में व्यवस्था बनाए रखता है
• अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकता है।
इस प्रकार सदन अपने आंतरिक कार्यों में पर्याप्त स्वायत्तता रखता है।
बाहरी व्यक्तियों को सदन से बाहर करने का अधिकार - सदन आवश्यक परिस्थितियों में गोपनीय बैठक कर सकता है और जनता या प्रेस को कार्यवाही से बाहर रख सकता है। हालाँकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसदीय कार्यवाही में पारदर्शिता महत्वपूर्ण है।
सदन को अपनी कार्यवाही प्रकाशित करने का अधिकार - संसद को अपनी कार्यवाही और रिपोर्ट प्रकाशित करने का अधिकार है। लेकिन विशेषाधिकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना भी है कि सदन की कार्यवाही को गलत, भ्रामक या अपमानजनक तरीके से प्रस्तुत करके सदन की गरिमा को नुकसान न पहुँचाया जाए।
बाहरी हस्तक्षेप से स्वतंत्रता - संसद को अपने आंतरिक कार्यों में अनावश्यक बाहरी हस्तक्षेप से सुरक्षा प्राप्त है। न्यायालय सदन की ऐसी आंतरिक कार्यवाही में हस्तक्षेप नहीं करता जो संविधान और कानून के अनुरूप हो, हालांकि यह सुरक्षा पूर्ण नहीं है।
अवमानना और विशेषाधिकार भंग के लिए दंड देने की शक्ति - यदि कोई व्यक्ति सदन या उसके सदस्य के विशेषाधिकार का उल्लंघन करता है अथवा सदन की अवमानना करता है, तो सदन उसके विरुद्ध कार्रवाई कर सकता है।
सदन निम्न प्रकार की कार्रवाई कर सकता है -
• चेतावनी
• भर्त्सना
• फटकार
• कारावास, विशेष परिस्थितियों में
• अन्य संसदीय कार्रवाई।
सदन को अपने सदस्यों को अनुशासित करने का अधिकार - सदन अपने सदस्यों के अनुशासन को बनाए रखने के लिए कार्रवाई कर सकता है।
उदाहरण -
सदस्य को सदन से बाहर करना
निलंबित करना
गंभीर मामले में निष्कासन की कार्रवाई करना।
विशेषाधिकार भंग पर जांच - यदि किसी सदस्य को लगता है कि उसके या सदन के विशेषाधिकार का उल्लंघन हुआ है, तो विशेषाधिकार का प्रश्न उठाया जा सकता है। मामला विशेषाधिकार समिति (Committee of Privileges) को भेजा जा सकता है। समिति मामले की जांच करके अपनी रिपोर्ट सदन को देती है।
B. राज्य विधानमंडल के विशेषाधिकार - राज्य विधानमंडल के विशेषाधिकार अनुच्छेद 194 में दिए गए हैं। राज्य में विधान सभा जहाँ द्विसदनीय व्यवस्था है वहाँ विधान परिषद को संवैधानिक विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं।
राज्य विधानमंडल के विशेषाधिकार - राज्य विधानमंडल के विशेषाधिकार काफी हद तक संसद के समान हैं।
1. सदन में वाक्-स्वातंत्र्य - सदस्यों को विधानमंडल में बोलने की स्वतंत्रता प्राप्त है। लेकिन इसका अर्थ पूर्ण एवं असीमित स्वतंत्रता नहीं है, सदस्य को -
• संविधान
• सदन के नियम
• संसदीय परंपराओं
• अध्यक्ष/सभापति के निर्देश का पालन करना
सदन में दिए गए भाषण और मत के संबंध में न्यायालयीय संरक्षण - यदि किसी विधायक ने सदन में कोई भाषण दिया या मतदान किया, तो केवल उस भाषण या मत के आधार पर उसके विरुद्ध सामान्यतः न्यायालय में कार्यवाही नहीं की जा सकती।
उदाहरण: - यदि विधायक ने सदन में सरकार की कड़ी आलोचना की, तो केवल उस संसदीय भाषण के आधार पर उसके विरुद्ध मानहानि का सामान्य मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। लेकिन यह सुरक्षा सदन के बाहर दिए गए बयान पर स्वतः लागू नहीं होती।
सदन की कार्यवाही में हस्तक्षेप से सुरक्षा - राज्य विधानमंडल को अपनी आंतरिक कार्यवाही संचालित करने में विशेष स्वतंत्रता प्राप्त है। अध्यक्ष/सभापति सदन में व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठा सकते हैं।
विशेषाधिकार भंग के लिए दंड - राज्य विधानमंडल भी विशेषाधिकार भंग या सदन की अवमानना करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई कर सकता है।
समितियों की कार्यवाही की सुरक्षा - विधानमंडलीय समितियों को भी अपने कार्यों के संचालन में आवश्यक विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं।
C. सदस्यों के विशेषाधिकार - संसद और विधानमंडल के सदस्यों को प्राप्त व्यक्तिगत विशेषाधिकारों का उद्देश्य उन्हें निर्भीक होकर जनहित में बोलने और कार्य करने की स्वतंत्रता देना है।
वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता - संसद सदस्य का संसदीय भाषण विशेष रूप से संरक्षित है। यह स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 105(1) में और राज्य विधायकों के लिए अनुच्छेद 194(1) में दी गई है। लेकिन यह स्वतंत्रता - सदन के नियमों, संविधान और संसदीय अनुशासन एवं परंपरा के अधीन है।
न्यायालयीय कार्यवाही से उन्मुक्ति - अनुच्छेद 105(2) के अनुसार संसद में कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में सदस्य के विरुद्ध न्यायालय में कार्यवाही नहीं की जा सकती। इसी प्रकार राज्य विधानमंडल के लिए अनुच्छेद 194(2) लागू होता है।
उदाहरण - मान लीजिए किसी सांसद ने संसद में कहा कि सरकार की यह नीति जनहित के विरुद्ध है। केवल इस संसदीय वक्तव्य के आधार पर उसके विरुद्ध न्यायालय में सामान्य कार्रवाई नहीं की जा सकती।
संसदीय समितियों में कही गई बात की सुरक्षा - संसदीय या विधानमंडलीय समिति के समक्ष दिए गए वक्तव्य और कार्यवाही को भी संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। इससे सदस्य समिति में स्वतंत्र रूप से अपनी राय व्यक्त कर सकता है।
गिरफ्तारी से संबंधित विशेषाधिकार - संसदीय विशेषाधिकारों में ऐतिहासिक रूप से संसद सदस्य को सिविल मामलों में गिरफ्तारी से कुछ संरक्षण प्राप्त रहा है।इसका उद्देश्य यह था कि विरोधी पक्ष या कोई व्यक्ति न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करके सदस्य को संसद की कार्यवाही से अनुपस्थित न करा सके। लेकिन यह विशेषाधिकार आपराधिक मामलों में गिरफ्तारी के लिए सामान्य प्रतिरक्षा नहीं है। अर्थात् सांसद या विधायक होना व्यक्ति को अपराध करने पर गिरफ्तारी से सामान्य छूट नहीं देता।
सदन की कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार - सदस्य को सदन की बैठकों में उपस्थित होने, बहस में भाग लेने और मतदान करने का अधिकार प्राप्त है, जब तक संविधान या सदन के नियमों के अनुसार उसे ऐसा करने से रोका न गया हो।
विशेषाधिकार और मौलिक अधिकार में अंतर -
आधार - विधायी विशेषाधिकार - मौलिक अधिकार
स्रोत - अनुच्छेद 105 एवं 194 - संविधान का भाग III
लाभार्थी - सदन एवं उसके सदस्य - नागरिक/व्यक्ति अधिकार के अनुसार
उद्देश्य - विधायिका की स्वतंत्रता - व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं गरिमा
प्रकृति - संसदीय कार्य से संबंधित व्यापक - संवैधानिक अधिकार
सीमा - सदन के नियम, संविधान एवं न्यायिक नियंत्रण - संविधान द्वारा निर्धारित सीमाएँ
उल्लंघन - विशेषाधिकार भंग - संवैधानिक/कानूनी उपचार
D. विशेषाधिकारों का उद्देश्य एवं सीमा
विशेषाधिकारों का उद्देश्य - विधायी विशेषाधिकारों के पीछे मुख्य उद्देश्य सदस्यों को व्यक्तिगत सुविधा देना नहीं, बल्कि विधायिका की स्वतंत्रता को सुरक्षित करना है।
1. निर्भीक विधायी कार्य - सदस्य बिना बाहरी दबाव के अपनी बात कह सकें।
2. जनहित में स्वतंत्र बहस - संसद और विधानमंडल में विभिन्न नीतियों पर खुलकर चर्चा हो सके।
3. बाहरी हस्तक्षेप से सुरक्षा - कार्यपालिका, न्यायपालिका या अन्य बाहरी शक्तियों द्वारा सदन के वैध आंतरिक कार्यों में अनुचित हस्तक्षेप को रोका जा सके।
4. सदन की गरिमा की रक्षा - सदन की प्रतिष्ठा और अधिकार को बनाए रखना।
5. संसदीय कार्यवाही की निरंतरता - सदस्य अनावश्यक मुकदमों या अन्य दबावों के कारण संसदीय कार्य से बाधित न हों।
6. जवाबदेह सरकार - विशेषाधिकारों के कारण सांसद और विधायक सरकार से प्रश्न पूछने, नीतियों की आलोचना करने और प्रशासन को जवाबदेह बनाने में अधिक स्वतंत्र होते हैं।
विशेषाधिकारों की सीमाएँ - यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है कि विशेषाधिकार असीमित शक्ति नहीं हैं।
1. संविधान सर्वोच्च है - संसद और विधानमंडल के विशेषाधिकार संविधान के अधीन हैं। संसद स्वयं संविधान से ऊपर नहीं है।
2. विशेषाधिकार का प्रयोग सदन के कार्य से संबंधित होना चाहिए - विशेषाधिकार का उद्देश्य संसदीय कार्य को स्वतंत्र बनाना है। इसका प्रयोग किसी सदस्य के व्यक्तिगत लाभ या निजी विवाद के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
3. वाक्-स्वातंत्र्य पूर्ण नहीं है - संसद में बोलने की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि सदस्य सदन के नियमों या अध्यक्ष के निर्देशों की अवहेलना कर सकता है।
4. आपराधिक कानून से पूर्ण छूट नहीं - सांसद या विधायक को केवल सदस्य होने के कारण अपराध के लिए सामान्य प्रतिरक्षा प्राप्त नहीं है। विशेषाधिकार को आपराधिक कृत्यों का कवच नहीं बनाया जा सकता।
5. न्यायिक समीक्षा - विधायी विशेषाधिकारों का अर्थ यह नहीं है कि न्यायालयों का अधिकार पूरी तरह समाप्त हो गया। जहाँ संवैधानिक सीमाओं, मौलिक अधिकारों या गंभीर कानूनी प्रश्नों का उल्लंघन हो, वहाँ न्यायपालिका की भूमिका सामने आ सकती है।
महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय -
(1) M.S.M. Sharma v. Sri Krishna Sinha - इस मामले को Searchlight Case के नाम से भी जाना जाता है। इसमें विधानमंडल के विशेषाधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संघर्ष का प्रश्न सामने आया।
इससे यह सिद्धांत उभरा कि संसदीय विशेषाधिकार और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
(2) Special Reference No. 1 of 1964 - इसे Keshav Singh Case के नाम से जाना जाता है। इस मामले में विधानमंडल के विशेषाधिकार और न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र के बीच महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठा। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विधानमंडल के विशेषाधिकार संविधान से ऊपर नहीं हैं।
(3) Raja Ram Pal v. Hon'ble Speaker, Lok Sabha (2007) - सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि संसद की विशेषाधिकार संबंधी कार्रवाई पूरी तरह न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं है। यदि संसद की कार्रवाई संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन करती है तो न्यायालय उसकी समीक्षा कर सकता है।
(4) Amarinder Singh v. Special Committee, Punjab Vidhan Sabha (2010) - इस मामले में विशेषाधिकार की शक्ति के प्रयोग की सीमा पर विचार किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने विशेषाधिकार की शक्ति को अनियंत्रित या असीमित शक्ति मानने से इनकार किया।
(5) Sita Soren v. Union of India (2024) - यह आधुनिक समय का अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय है। सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि संसद या विधानमंडल में रिश्वत लेकर भाषण देने या मतदान करने के मामले में अनुच्छेद 105(2) या 194(2) की संसदीय उन्मुक्ति नहीं मिलती। अर्थात् संसदीय विशेषाधिकार भ्रष्टाचार के लिए ढाल नहीं बन सकता।
विशेषाधिकार भंग (Breach of Privilege) - जब कोई व्यक्ति सदन के विशेषाधिकार का उल्लंघन करता है जैसे
• सदस्य को संसदीय कार्य करने से रोकता है
• सदन की गरिमा को गंभीर रूप से प्रभावित करता है
• सदन की कार्यवाही में अनुचित हस्तक्षेप करता है
तो उसे विशेषाधिकार भंग कहा जा सकता है।
उदाहरण - यदि किसी व्यक्ति ने जानबूझकर किसी सांसद को धमकाकर संसद में बोलने से रोकने का प्रयास किया, तो परिस्थितियों के अनुसार यह विशेषाधिकार का प्रश्न बन सकता है।
विशेषाधिकार समिति - संसद और विधानमंडलों में Privileges Committee विशेषाधिकार से जुड़े मामलों की जांच करती है। इसके मुख्य कार्य -
1. विशेषाधिकार भंग की शिकायत की जांच।
2. संबंधित व्यक्ति/सदस्य से तथ्य प्राप्त करना।
3. साक्ष्यों का परीक्षण।
4. यह निर्धारित करना कि विशेषाधिकार भंग हुआ या नहीं।
5. अपनी रिपोर्ट सदन को देना।
6. सदन द्वारा अंतिम निर्णय लिया जाना।
18. विशेषाधिकार बनाम अवमानना - दोनों को एक नहीं समझना चाहिए।विशेषाधिकार भंग तब होता है जब सदन या सदस्य के किसी विशेषाधिकार का उल्लंघन हो। सदन की अवमानना (Contempt of House) का क्षेत्र अपेक्षाकृत व्यापक है। ऐसा कार्य भी अवमानना हो सकता है जो किसी विशिष्ट विशेषाधिकार का उल्लंघन न होते हुए भी सदन के कार्य में बाधा डालता है या उसकी गरिमा को प्रभावित करता है।
विशेषाधिकारों का संहिताकरण - भारतीय संविधान ने संसद और विधानमंडलों के सभी विशेषाधिकारों की पूरी सूची नहीं दी है। अनुच्छेद 105(3) और 194(3) के अनुसार संसद/राज्य विधानमंडल कानून बनाकर अपने विशेषाधिकारों को निर्धारित कर सकते हैं।जब तक ऐसा व्यापक कानून नहीं बनाया जाता, तब तक कई संसदीय विशेषाधिकार संवैधानिक प्रावधानों, संसदीय परंपराओं और ब्रिटिश संसदीय विशेषाधिकारों से विकसित सिद्धांतों पर आधारित रहे हैं, जहाँ तक वे भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के अनुकूल हैं।
संवैधानिक संतुलन - विधायी विशेषाधिकारों को इस सूत्र से याद करें:
विधायी स्वतंत्रता ↔ व्यक्तिगत स्वतंत्रता ↔ न्यायिक समीक्षा अर्थात् -
• विधायिका स्वतंत्र रहे
• सदस्य निर्भीक होकर बोलें
परन्तु यह ध्यान रखा जाए कि -
• विशेषाधिकार का दुरुपयोग न हो
• नागरिकों के अधिकारों की अनदेखी न हो
• संविधान की सर्वोच्चता बनी रहे।
सार - विधायी विशेषाधिकार वे विशेष अधिकार और उन्मुक्तियाँ हैं जो संसद, राज्य विधानमंडलों तथा उनके सदस्यों को अपने संवैधानिक एवं विधायी कार्यों को स्वतंत्र और प्रभावी ढंग से करने के लिए प्राप्त हैं। संसद के विशेषाधिकारों का मुख्य संवैधानिक आधार अनुच्छेद 105 तथा राज्य विधानमंडलों का अनुच्छेद 194 है। इनमें सदन में वाक्-स्वातंत्र्य, संसदीय भाषण और मतदान के संबंध में न्यायालयीय उन्मुक्ति, सदन की कार्यवाही को नियंत्रित करने की शक्ति, विशेषाधिकार भंग पर दंड देने की शक्ति आदि शामिल हैं। इनका उद्देश्य सदस्य को व्यक्तिगत लाभ देना नहीं, बल्कि विधायिका की स्वतंत्रता, गरिमा और प्रभावशीलता की रक्षा करना है। तथापि ये विशेषाधिकार असीमित नहीं हैं। वे संविधान के अधीन हैं और उपयुक्त परिस्थितियों में न्यायिक समीक्षा के अधीन भी हो सकते हैं। Raja Ram Pal तथा Sita Soren जैसे निर्णयों ने यह स्पष्ट किया है कि संसदीय विशेषाधिकार को संवैधानिक मर्यादा से परे नहीं ले जाया जा सकता।
ट्रिक -
105 = संसद
194 = राज्य विधानमंडल
विशेषाधिकार के 5 आधार वामदन्यास =
वा = वाक्-स्वातंत्र्य
द = दंड देने की शक्ति
म= मतदान की उन्मुक्ति
न्या = न्यायालयीय उन्मुक्ति
स = सदन की स्वतंत्रता
एक वाक्य - विशेषाधिकार सदन की ढाल है, सदस्य की निजी तलवार नहीं।
संघ न्यायपालिका, उच्च न्यायालय एवं अधीनस्थ न्यायालय की संरचना एवं संवैधानिक स्थिति -
भारतीय संविधान में न्यायपालिका को स्वतंत्र, निष्पक्ष और कानून के शासन की रक्षा करने वाली संस्था के रूप में स्थापित किया गया है। संघ स्तर पर सर्वोच्च न्यायालय, राज्य स्तर पर उच्च न्यायालय तथा उसके नीचे अधीनस्थ न्यायालय न्यायिक व्यवस्था की मुख्य कड़ियाँ हैं।
भारत में न्यायपालिका का संवैधानिक ढाँचा - भारत में न्यायपालिका की संरचना तीन स्तरों पर पाई जाती है -
1. संघ न्यायपालिका → संविधान के भाग V, अध्याय IV अनुच्छेद 124–147 में सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) का प्रावधान है।
अनुच्छेद 124 के अंतर्गत भारत में एक सर्वोच्च न्यायालयकी स्थापना नई दिल्ली में की गई है। यह भारत की न्यायिक व्यवस्था का सर्वोच्च न्यायालय है जिसके निर्णय पूरे भारत में बाध्यकारी होते हैं।
के संरक्षण के लिए सर्वोच्च न्यायालय रिट जारी कर सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक शक्तियाँ -
न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) - सर्वोच्च न्यायालय संविधान के विरुद्ध होने वाले कानून या सरकारी कार्रवाई की वैधता की जाँच कर सकता है।यदि कोई कानून संविधान का उल्लंघन करता है तो न्यायालय उसे असंवैधानिक घोषित कर सकता है।
संविधान का संरक्षक - सर्वोच्च न्यायालय संविधान की व्याख्या करता है और उसके सर्वोच्चत्व की रक्षा करता है।
मौलिक अधिकारों का संरक्षक - अनुच्छेद 32 के माध्यम से नागरिक सीधे सर्वोच्च न्यायालय की शरण ले सकते हैं।
कानून की घोषणा - अनुच्छेद 141 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी होती है।
(5) पूर्ण न्याय करने की शक्ति - अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय को किसी मामले में complete justice करने के लिए आवश्यक आदेश देने की शक्ति प्रदान करता है।
सर्वोच्च न्यायालय की स्वतंत्रता - न्यायपालिका की स्वतंत्रता भारतीय संविधान की मूल विशेषताओं में से एक है।इसके लिए अनेक सुरक्षा उपाय हैं -
• न्यायाधीशों का सुरक्षित कार्यकाल।
• कठिन पदच्युति प्रक्रिया।
• वेतन एवं भत्तों की संवैधानिक सुरक्षा।
• न्यायिक कार्य में कार्यपालिका का अनावश्यक हस्तक्षेप रोकना।
• न्यायालय को अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति।
• न्यायिक निर्णयों की स्वतंत्रता।
सर्वोच्च न्यायालय की संरचना - सर्वोच्च न्यायालय में -
भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) एवं संसद द्वारा निर्धारित संख्या में अन्य न्यायाधीश।
संविधान प्रारंभ में मुख्य न्यायाधीश तथा अधिकतम सात अन्य न्यायाधीशों की व्यवस्था करता था। बाद में संसद ने कानून द्वारा न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई है। अतः वर्तमान व्यवस्था को संविधान की मूल संख्या से नहीं, बल्कि संसद द्वारा बनाए गए संबंधित कानून के अनुसार समझना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति - अनुच्छेद 124(2) के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। व्यवहार में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में Collegium System विकसित हुआ है।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की योग्यता - सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए व्यक्ति -
1. भारत का नागरिक हो
2. कम-से-कम पाँच वर्ष तक किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा हो या
3. कम-से-कम दस वर्ष तक किसी उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहा हो या
4. राष्ट्रपति की राय में कोई distinguished jurist (विशिष्ट विधिवेत्ता) हो।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश का कार्यकाल - सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक पद पर रहता है। परन्तु वह -
• राष्ट्रपति को संबोधित लिखित त्यागपत्र देकर पद छोड़ सकता है।
• संसद द्वारा निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार हटाया जा सकता है।
न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया - सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को सामान्य प्रशासनिक आदेश से नहीं हटाया जा सकता। उसे हटाने के लिए संविधान में महाभियोग जैसी विशेष प्रक्रिया निर्धारित है। जिसके आधार हैं -
1. सिद्ध कदाचार (proved misbehaviour) या
2. अक्षमता (incapacity)।
संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति न्यायाधीश को पद से हटा सकते हैं। इस कठिन प्रक्रिया का उद्देश्य न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुरक्षित करना है।
सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता - सर्वोच्च न्यायालय की अधिकारिता को निम्न भागों में बाँटा जा सकता है -
(A) मूल अधिकारिता - अनुच्छेद 131 के अंतर्गत संघ और राज्यों अथवा राज्यों के बीच कुछ विवादों पर सर्वोच्च न्यायालय को मूल अधिकारिता प्राप्त है।
उदाहरण -
• केंद्र बनाम राज्य
• एक राज्य बनाम दूसरा राज्य
यदि विवाद संविधान द्वारा निर्धारित प्रकृति का है, तो वह सीधे सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष जा सकता है।
(B) अपीलीय अधिकारिता - सर्वोच्च न्यायालय देश का सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय है। यह संवैधानिक मामलों,
दीवानी मामलों,आपराधिक मामलों में निर्धारित परिस्थितियों में अपील सुन सकता है।
(C) विशेष अनुमति याचिका - अनुच्छेद 136 सर्वोच्च न्यायालय को Special Leave Petition (SLP) के माध्यम से विशेष अनुमति देने की असाधारण शक्ति प्रदान करता है। यह शक्ति अत्यंत व्यापक है, लेकिन इसका प्रयोग न्यायालय के विवेक पर निर्भर है।
(D) सलाहकारी अधिकारिता - अनुच्छेद 143 के अंतर्गत राष्ट्रपति किसी महत्वपूर्ण विधिक या तथ्यात्मक प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय से सलाह मांग सकते हैं।
(E) रिट अधिकारिता - अनुच्छेद 32 के अंतर्गत मौलिक अधिकारों
मुख्य रिट -
1. Habeas Corpus – बंदी प्रत्यक्षीकरण
2. Mandamus – परमादेश
3. Prohibition – प्रतिषेध
4. Certiorari – उत्प्रेषण
5. Quo Warranto – अधिकार-पृच्छा
डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान की आत्मा और हृदय कहा था।
2. राज्य न्यायपालिका →भाग VI, अध्याय V अनुच्छेद 214–231 में उच्च न्यायालय (High court)
उच्च न्यायालय की संवैधानिक स्थिति - अनुच्छेद 214 के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा। लेकिन संविधान संसद को दो या अधिक राज्यों अथवा दो या अधिक राज्यों और किसी संघ राज्य क्षेत्र के लिए सामान्य उच्च न्यायालय स्थापित करने की अनुमति देता है। जैसे पंजाब हरियाणा एवं चंडीगढ़ का एक ही उच्य न्यायालय है। इसलिए प्रत्येक राज्य के लिए अलग उच्च न्यायालय होना आवश्यक नहीं है। उच्च न्यायालय राज्य की न्यायिक व्यवस्था का मुख्य अंग है जो सर्वोच्च न्यायालय के अधीन अपीलीय रूप से कार्य करता है।
उच्च न्यायालय की संरचना - उच्च न्यायालय में - मुख्य न्यायाधीश एवं अन्य न्यायाधीश होते हैं। न्यायाधीशों की संख्या प्रत्येक उच्च न्यायालय की आवश्यकता और कार्यभार के आधार पर निर्धारित की जाती है।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति - अनुच्छेद 217 के अंतर्गत उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। नियुक्ति की संवैधानिक प्रक्रिया में भारत के मुख्य न्यायाधीश, राज्यपाल और संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श का प्रावधान है। वर्तमान संवैधानिक व्यवहार में नियुक्तियों में Judicial Collegium की महत्वपूर्ण भूमिका है।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की योग्यता - व्यक्ति -
1. भारत का नागरिक हो; तथा
2. भारत में कम-से-कम 10 वर्ष तक न्यायिक पद पर रहा हो; या
3. एक या अधिक उच्च न्यायालयों में कम-से-कम 10 वर्ष तक अधिवक्ता रहा हो।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति - उच्च न्यायालय का न्यायाधीश -
• 62 वर्ष की आयु तक पद पर रहता है।
• वह राष्ट्रपति को लिखित त्यागपत्र देकर पद छोड़ सकता है।
• उसे भी सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर संसद की निर्धारित प्रक्रिया के बाद राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।
उच्च न्यायालय की अधिकारिता -
(A) रिट अधिकारिता - अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालय को रिट जारी करने की शक्ति देता है। यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर है - सर्वोच्च न्यायालय → अनुच्छेद 32 → मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए।
उच्च न्यायालय → अनुच्छेद 226 → मौलिक अधिकार + अन्य विधिक अधिकारों के लिए।
इस कारण उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता क्षेत्र की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
(B) अपीलीय अधिकारिता - उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध दीवानी एवं आपराधिक अपील सुन सकता है।
(C) मूल अधिकारिता - कुछ उच्च न्यायालयों को विशेष मामलों में मूल अधिकारिता प्राप्त होती है। यह अधिकारिता सभी उच्च न्यायालयों में समान नहीं है।
(D) पर्यवेक्षण की शक्ति - अनुच्छेद 227 के अंतर्गत प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने क्षेत्र के अधीनस्थ न्यायालयों और अधिकरणों पर superintendence (अधीक्षण) की शक्ति प्राप्त है, जहाँ संविधान/कानून द्वारा अपवाद न हो।
उच्च न्यायालय की संवैधानिक स्थिति -
उच्च न्यायालय संविधान द्वारा स्थापित न्यायालय है। राज्य की न्यायिक व्यवस्था का सर्वोच्च न्यायालय है जो -
• मौलिक एवं विधिक अधिकारों की रक्षा करता है।
• अधीनस्थ न्यायालयों पर पर्यवेक्षण करता है।
• न्यायिक पुनरावलोकन कर सकता है।
• संविधान की व्याख्या में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
3. अधीनस्थ न्यायपालिका → भाग VI, अध्याय VI (अनुच्छेद 233–237) में जिला एवं अन्य अधीनस्थ न्यायालय।
का प्रावधान है जो उच्च न्यायालय के अधीन कार्य करते हैं। इनमें प्रमुख हैं -
• जिला एवं सत्र न्यायालय
• सिविल न्यायालय
• आपराधिक न्यायालय
• अन्य वैधानिक अधीनस्थ न्यायालय
इनका संगठन राज्य की न्यायिक आवश्यकताओं और संबंधित कानूनों के अनुसार होता है।
जिला न्यायपालिका की संरचना - जिला स्तर पर सामान्यतः दो प्रमुख न्यायिक धाराएँ दिखाई देती हैं -
• दीवानी न्यायपालिका - यह संपत्ति, अनुबंध, धन की वसूली, पारिवारिक विवाद आदि दीवानी मामलों को सुनता है।
• आपराधिक न्यायपालिका - यह अपराधों से संबंधित मामलों को सुनती है।जिला स्तर पर District and Sessions Judge की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।एक ही न्यायिक अधिकारी, अधिकारिता के अनुसार
• दीवानी मामले में - District Judge
• आपराधिक मामले में - Sessions Judge के रूप में कार्य कर सकता है।
अधीनस्थ न्यायालयों की नियुक्ति - अनुच्छेद 233 के अंतर्गत जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति राज्य के राज्यपाल द्वारा संबंधित उच्च न्यायालय से परामर्श करके की जाती है। यदि कोई व्यक्ति पहले से संघ या राज्य की सेवा में नहीं है, तो जिला न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए निर्धारित योग्यता, जिसमें कम-से-कम 7 वर्ष अधिवक्ता या प्लीडर के रूप में अनुभव और उच्च न्यायालय की अनुशंसा शामिल है, लागू होती है।
अन्य न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति - अनुच्छेद 234 के अंतर्गत जिला न्यायाधीशों के अलावा न्यायिक सेवा में नियुक्तियाँ राज्यपाल द्वारा, राज्य लोक सेवा आयोग और उच्च न्यायालय से परामर्श के बाद, राज्य द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार की जाती हैं।
अधीनस्थ न्यायालयों पर उच्च न्यायालय का नियंत्रण - अनुच्छेद 235 के अनुसार जिला न्यायालयों तथा उनके अधीन न्यायालयों पर नियंत्रण उच्च न्यायालय में निहित है। इसमें शामिल हैं -
पदस्थापन, पदोन्नति, अवकाश, अनुशासनात्मक नियंत्रण आदि।
इस व्यवस्था का उद्देश्य न्यायपालिका को कार्यपालिका के अनुचित प्रभाव से बचाना है।
अधीनस्थ न्यायपालिका की संवैधानिक स्थिति - अधीनस्थ न्यायालय संविधान के अधीन कार्य करते हैं और उच्च न्यायालय के पर्यवेक्षण तथा नियंत्रण में रहते हैं इनका मुख्य कार्य है -
1. कानून के अनुसार मामलों का निपटारा।
2. नागरिकों को न्याय उपलब्ध कराना।
3. साक्ष्यों की जाँच करना।
4. दीवानी एवं आपराधिक मामलों में निर्णय देना।
5. उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून का पालन करना।
संघ न्यायपालिका और उच्च न्यायालय में अंतर -
आधार - सर्वोच्च न्यायालय - उच्च न्यायालय
संवैधानिक आधार - अनुच्छेद 124–147 - अनुच्छेद 214–231
स्तर - राष्ट्रीय - राज्य/बहु-राज्य
न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति - 65 वर्ष - 62 वर्ष
रिट - अनुच्छेद 32 - अनुच्छेद 226
अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण - प्रत्यक्ष प्रशासनिक नियंत्रण नहीं - अनुच्छेद 235 के अनुसार नियंत्रण
निर्णय की बाध्यता - सभी न्यायालयों पर - अपने क्षेत्र के अधीनस्थ न्यायालयों पर
अपीलीय स्थिति - सर्वोच्च (राष्ट्रपति से याचना) - सर्वोच्च न्यायालय के अधीन
उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायालय में अंतर -
आधार - उच्च न्यायालय - अधीनस्थ न्यायालय
संवैधानिक आधार - अनुच्छेद 214–231 - अनुच्छेद 233–237
स्तर - राज्य का सर्वोच्च न्यायालय - जिला/स्थानीय स्तर
नियुक्ति - राष्ट्रपति - राज्यपाल + HC परामर्श
रिट - शक्ति - अनुच्छेद 226 सामान्यतः नहीं
पर्यवेक्षण - अधीनस्थ न्यायालयों पर - उच्च न्यायालय के नियंत्रण में
अपील - SC में जा सकती है - HC में अपील जा सकती है
मुख्य उद्देश्य - संवैधानिक/विधिक संरक्षण और अपील - प्रथम स्तर पर न्याय प्रदान करना
न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक स्थिति - संविधान ने न्यायपालिका को केवल विवाद निपटाने वाली संस्था नहीं बनाया है। उसे संविधान की रक्षा का महत्वपूर्ण दायित्व भी दिया है।
न्यायपालिका के प्रमुख संवैधानिक कार्य -
1. संविधान की रक्षा - सरकार संविधान की सीमा में कार्य कर रही है या नहीं, इसकी जाँच।
2. मौलिक अधिकारों की रक्षा - नागरिकों के अधिकारों का संरक्षण।
3. न्यायिक पुनरावलोकन - असंवैधानिक कानूनों/कार्यों को निरस्त करने की शक्ति।
4. संघीय संतुलन की रक्षा - केंद्र और राज्यों के बीच संवैधानिक विवादों का निपटारा।
5. विधि के शासन की रक्षा - किसी व्यक्ति या सरकार को कानून से ऊपर न होने देना।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता के संवैधानिक साधन - संविधान न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए कई सुरक्षा उपाय करता है -
(1) न्यायाधीशों की सुरक्षित पदावधि - उन्हें मनमाने ढंग से पद से नहीं हटाया जा सकता।
(2) कठिन पदच्युति प्रक्रिया - महाभियोग जैसी विशेष प्रक्रिया आवश्यक है।
(3) वेतन की सुरक्षा - न्यायाधीशों के वेतन एवं सेवा-शर्तों को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है।
(4) न्यायिक कार्य में स्वतंत्रता - कार्यपालिका न्यायिक निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
(5) अवमानना की शक्ति - न्यायालय अपने आदेश और अधिकारिता की रक्षा के लिए contempt jurisdiction का प्रयोग कर सकता है।
(6) अधीनस्थ न्यायपालिका पर उच्च न्यायालय का नियंत्रण - अनुच्छेद 235 न्यायिक प्रशासन में कार्यपालिका के अनुचित प्रभाव को कम करता है।
न्यायालय से संबंधित अनुच्छेद -
अनुच्छेद 124 → सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना
अनुच्छेद 129 → सर्वोच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय
अनुच्छेद 131 → मूल अधिकारिता
अनुच्छेद 132–134 → अपीलीय अधिकारिता
अनुच्छेद 136 → विशेष अनुमति से अपील
अनुच्छेद 137 → पुनर्विचार
अनुच्छेद 141 → सर्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि बाध्यकारी
अनुच्छेद 142 → पूर्ण न्याय
अनुच्छेद 143 → राष्ट्रपति का परामर्श
अनुच्छेद 214 → राज्यों के लिए उच्च न्यायालय
अनुच्छेद 217 → उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति/शर्तें
अनुच्छेद 226 → उच्च न्यायालय की रिट शक्ति
अनुच्छेद 227 → उच्च न्यायालय का अधीक्षण
अनुच्छेद 233 → जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति
अनुच्छेद 234 → अन्य न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति
अनुच्छेद 235 → अधीनस्थ न्यायालयों पर उच्च न्यायालय का नियंत्रण
अनुच्छेद 236 → परिभाषाएँ
अनुच्छेद 237 → कुछ मजिस्ट्रेटों पर प्रावधान लागू करना
निष्कर्ष - भारतीय न्यायपालिका की संरचना सर्वोच्च न्यायालय → उच्च न्यायालय → अधीनस्थ न्यायालय के रूप में व्यवस्थित है। सर्वोच्च न्यायालय राष्ट्रीय स्तर पर संविधान का संरक्षक और अंतिम अपीलीय न्यायालय है। उच्च न्यायालय राज्य स्तर पर संवैधानिक एवं विधिक अधिकारों की रक्षा करते हुए अधीनस्थ न्यायपालिका पर नियंत्रण रखता है। जिला एवं अधीनस्थ न्यायालय आम नागरिकों को न्याय प्रदान करने की न्यायिक व्यवस्था की आधारभूत इकाई हैं। इस प्रकार भारतीय संविधान ने न्यायपालिका को स्वतंत्रता, निष्पक्षता, न्यायिक पुनरावलोकन, मौलिक अधिकारों की सुरक्षा और विधि के शासन का प्रहरी बनाया है। यही कारण है कि भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका केवल विवादों का निपटारा करने वाली संस्था नहीं, बल्कि संविधान की सर्वोच्चता की संरक्षक भी है।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ संवैधानिक आधार, आवश्यकता महत्व एवं न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं पद की सुरक्षा -
न्यायपालिका की स्वतंत्रता (Independence of Judiciary) - न्यायपालिका की स्वतंत्रता भारतीय संविधान और संवैधानिक शासन-व्यवस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। इसका अर्थ केवल न्यायाधीशों को स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने देना नहीं है, बल्कि न्यायपालिका का कार्यपालिका, विधायिका, राजनीतिक दबाव, आर्थिक प्रभाव तथा अन्य बाहरी हस्तक्षेप से स्वतंत्र होकर संविधान और कानून के अनुसार न्याय करना है।
भारत में एकीकृत न्यायिक व्यवस्था है, जिसके शीर्ष पर सर्वोच्च न्यायालय, उसके बाद उच्च न्यायालय तथा उनके अधीन अधीनस्थ न्यायालय हैं। संविधान न्यायपालिका को ऐसी संस्थागत सुरक्षा प्रदान करता है जिससे वह संविधान की सर्वोच्चता और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा कर सके।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ- सामान्य अर्थ में न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ है कि न्यायालय अपने न्यायिक कार्यों और निर्णयों में किसी बाहरी शक्ति के अनुचित दबाव, हस्तक्षेप या प्रभाव के अधीन न हो। न्यायाधीश को निर्णय करते समय यह नहीं देखना चाहिए कि सरकार क्या चाहती है, विपक्ष क्या चाहता है, मीडिया क्या कह रहा है, किसी राजनीतिक दल का क्या मत है अथवा किसी प्रभावशाली व्यक्ति को क्या लाभ या हानि होगी। उसका आधार होना चाहिए: संविधान + कानून + उपलब्ध साक्ष्य + न्यायिक विवेक।
स्वतंत्रता का अर्थ निरंकुशता नहीं - न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ न्यायपालिका की निरंकुशता नहीं है।
न्यायाधीश कानून और संविधान से बंधे होते हैं। स्वतंत्रता का उद्देश्य न्यायाधीश को कानून से ऊपर रखना नहीं, बल्कि उसे कानून के अनुसार निष्पक्ष निर्णय लेने में सक्षम बनाना है।
न्यायिक स्वतंत्रता के दो पक्ष -
(i) संस्थागत स्वतंत्रता - पूरी न्यायपालिका को अन्य अंगों से स्वतंत्र रखना। इसमें न्यायपालिका के प्रशासन में स्वतंत्रता, न्यायिक कार्यों में बाहरी हस्तक्षेप का अभाव, न्यायालयों की अपनी प्रक्रिया तथा न्यायिक निर्णयों में सरकार के हस्तक्षेप का अभाव शामिल है।
(ii) व्यक्तिगत न्यायिक स्वतंत्रता - प्रत्येक न्यायाधीश को अपने निर्णय में स्वतंत्रता मिलना। न्यायाधीश को यह भय नहीं होना चाहिए कि किसी निर्णय के कारण उसका पद छीन लिया जाएगा, वेतन कम कर दिया जाएगा, राजनीतिक बदला लिया जाएगा, पदोन्नति प्रभावित होगी अथवा अनावश्यक प्रशासनिक दबाव डाला जाएगा।
न्यायिक स्वतंत्रता के संवैधानिक आधार - संविधान ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए अनेक संवैधानिक सुरक्षा-व्यवस्थाएँ की हैं।
I. शक्तियों का पृथक्करण - संविधान में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्यों का पृथक्करण पूर्ण रूप से कठोर नहीं है, लेकिन तीनों अंगों के बीच संस्थागत संतुलन बनाया गया है। अनुच्छेद 50 राज्य को निर्देश देता है कि वह न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने के लिए कदम उठाए। इसका विशेष महत्व अधीनस्थ न्यायपालिका के संदर्भ में है।
II. संविधान की सर्वोच्चता - भारत में संविधान सर्वोच्च विधि है। विधायिका द्वारा बनाया गया कोई कानून यदि संविधान के विपरीत है, तो न्यायपालिका उसकी संवैधानिक वैधता की समीक्षा कर सकती है। इसे Judicial Review (न्यायिक पुनरावलोकन) कहते हैं। इसके माध्यम से न्यायपालिका सरकार और विधायिका की संवैधानिक सीमाओं की निगरानी करती है।
III. अनुच्छेद 32 और मौलिक अधिकारों की सुरक्षा - अनुच्छेद 32 नागरिकों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार देता है। डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान का “हृदय और आत्मा” कहा था। सर्वोच्च न्यायालय पाँच प्रमुख रिट जारी कर सकता है:
1. Habeas Corpus – बंदी प्रत्यक्षीकरण
2. Mandamus – परमादेश
3. Prohibition – प्रतिषेध
4. Certiorari – उत्प्रेषण
5. Quo Warranto – अधिकार-पृच्छा
इनके माध्यम से नागरिकों के अधिकारों की न्यायिक सुरक्षा होती है।
IV. अनुच्छेद 124 – सर्वोच्च न्यायालय - अनुच्छेद 124 सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना और उसके न्यायाधीशों से संबंधित महत्वपूर्ण व्यवस्था करता है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था में नियुक्ति के संदर्भ में Collegium System विकसित हुआ है, जिसमें वरिष्ठ न्यायाधीशों की संस्था नियुक्ति और पदोन्नति की सिफारिश में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
V. न्यायाधीशों की पद-सुरक्षा - न्यायिक स्वतंत्रता की महत्वपूर्ण सुरक्षा यह है कि न्यायाधीश को मनमाने ढंग से पद से नहीं हटाया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को संविधान में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही हटाया जा सकता है। अनुच्छेद 124(4) के अनुसार हटाने का आधार सिद्ध कदाचार या अक्षमता होना चाहिए। संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है और उसके बाद राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी करते हैं। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को अनुच्छेद 217 और 218 के अंतर्गत समान प्रकार की संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है।
VI. न्यायाधीशों के वेतन और भत्तों की सुरक्षा - न्यायाधीशों को पर्याप्त और सुरक्षित वेतन देना न्यायिक स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण तत्व है। यदि सरकार किसी न्यायाधीश को यह भय दिखा सके कि उसके प्रतिकूल निर्णय के बाद उसका वेतन या सेवा-लाभ कम कर दिया जाएगा, तो वास्तविक स्वतंत्रता प्रभावित होगी। इसलिए संविधान न्यायाधीशों के वेतन और सेवा-शर्तों को विशेष सुरक्षा प्रदान करता है।
VII. न्यायाधीशों के कार्यकाल की सुरक्षा - न्यायाधीशों का कार्यकाल राजनीतिक इच्छा पर निर्भर नहीं होता। सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश 65 वर्ष तथा उच्च न्यायालय का न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक पद पर रहता है, subject to constitutional removal procedure। इससे कार्यपालिका द्वारा मनमाने ढंग से न्यायाधीश को हटाने की संभावना कम होती है।
VIII. पद छोड़ने के बाद वकालत पर प्रतिबंध - अनुच्छेद 124(7) के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय का पूर्व न्यायाधीश भारत में किसी न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष वकालत नहीं कर सकता। इसी प्रकार अनुच्छेद 220 उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीशों के लिए पद छोड़ने के बाद भारत में कुछ न्यायालयों में प्रैक्टिस पर प्रतिबंध लगाता है। इसका उद्देश्य हितों के टकराव और पद के संभावित दुरुपयोग को रोकना है।
IX. न्यायालयों को अपनी प्रक्रिया निर्धारित करने की शक्ति - अनुच्छेद 145 सर्वोच्च न्यायालय को संसद द्वारा बनाए गए कानून के अधीन अपनी practice और procedure के लिए नियम बनाने की शक्ति देता है। यह न्यायालय की संस्थागत स्वतंत्रता को मजबूत करता है।
X. सर्वोच्च न्यायालय का अभिलेख न्यायालय होना - अनुच्छेद 129 के तहत सर्वोच्च न्यायालय Court of Record है और उसे अपनी अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति प्राप्त है। उच्च न्यायालय भी अनुच्छेद 215 के अंतर्गत Court of Record हैं। इससे न्यायालय की गरिमा और अधिकारिता की रक्षा होती है।
XI. न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करना - अनुच्छेद 50 का उद्देश्य विशेष रूप से न्यायिक स्वतंत्रता को मजबूत करना है। यह नीति-निर्देशक तत्व है, लेकिन इसका संवैधानिक महत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका मूल विचार है:
जिस व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध न्यायिक नियंत्रण होना है, उसी के अधीन न्यायपालिका नहीं होनी चाहिए।»
XII. उच्च न्यायालयों की स्वतंत्रता - उच्च न्यायालयों को भी महत्वपूर्ण संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है-
• अनुच्छेद 214 – प्रत्येक राज्य के लिए उच्च न्यायालय
• अनुच्छेद 217 – न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं सेवा-शर्तें
• अनुच्छेद 218 – सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने संबंधी प्रावधानों का उच्च न्यायालय पर लागू होना
• अनुच्छेद 219 – शपथ
• अनुच्छेद 220 – पद छोड़ने के बाद वकालत पर प्रतिबंध
• अनुच्छेद 221 – वेतन आदि
• अनुच्छेद 222 – न्यायाधीशों का स्थानांतरण
• अनुच्छेद 224 – अतिरिक्त एवं कार्यवाहक न्यायाधीश
• अनुच्छेद 226 – रिट जारी करने की शक्ति
• अनुच्छेद 227 – अधीनस्थ न्यायालयों पर अधीक्षण
ये सभी मिलकर उच्च न्यायालय की संवैधानिक स्वतंत्रता को मजबूत करते हैं।
न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं पद की सुरक्षा -
न्यायाधीशों की नियुक्ति - सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश: अनुच्छेद 124 के अनुसार राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं। व्यवहार में नियुक्ति की वर्तमान प्रणाली Collegium System के माध्यम से विकसित हुई है।
Collegium System - वर्तमान व्यवस्था में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति/पदोन्नति के संबंध में Chief Justice of India तथा वरिष्ठतम न्यायाधीशों का Collegium महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह व्यवस्था संविधान के मूल पाठ में Collegium शब्द के रूप में नहीं लिखी गई है, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों से विकसित हुई है।
महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय -
First Judges Case – 1981 (S. P. Gupta v. Union of India) - में नियुक्ति के संदर्भ में कार्यपालिका की भूमिका को अपेक्षाकृत अधिक महत्व दिया गया।
Second Judges Case – 1993 Supreme Court Advocates-on-Record Association v. Union of India - में Collegium व्यवस्था को महत्वपूर्ण रूप से स्थापित किया गया और न्यायिक नियुक्तियों में Chief Justice of India तथा वरिष्ठ न्यायाधीशों की भूमिका को प्रमुख बनाया गया।
Third Judges Case – 1998 राष्ट्रपति के Reference - पर सर्वोच्च न्यायालय ने Collegium की संरचना और कार्यप्रणाली को और स्पष्ट किया। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के स्तर पर Collegium में CJI + चार वरिष्ठतम न्यायाधीश महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
National Judicial Appointment Commission (NJAC) और 99वाँ संविधान संशोधन - वर्ष 2014 में संसद ने National Judicial Appointments Commission (NJAC) बनाने का प्रयास किया। इसके लिए 99वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2014 तथा National Judicial Appointments Commission Act, 2014 लाए गए। लेकिन Supreme Court Advocates-on-Record Association v. Union of India (2015) में सर्वोच्च न्यायालय ने NJAC और 99वें संविधान संशोधन को असंवैधानिक घोषित कर दिया। मुख्य आधार था कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान की Basic Structure का हिस्सा है। इसके बाद Collegium व्यवस्था जारी रही।
न्यायाधीशों के पद की सुरक्षा - न्यायाधीशों की स्वतंत्रता तभी वास्तविक होगी जब उनका पद सुरक्षित हो। इसलिए संविधान में -
(i) आयु सीमा - SC Judge → 65 वर्ष, HC Judge → 62 वर्ष।
(ii) कठिन Removal Procedure - न्यायाधीश को सामान्य प्रशासनिक आदेश से नहीं हटाया जा सकता।
(iii) संसद की विशेष भूमिका - Removal प्रक्रिया में संसद के दोनों सदनों की विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है।
(iv) कार्यपालिका की मनमानी से सुरक्षा - सरकार किसी प्रतिकूल निर्णय के कारण न्यायाधीश को सामान्य प्रशासनिक तरीके से पद से नहीं हटा सकती।
न्यायाधीशों का स्थानांतरण - उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का स्थानांतरण अनुच्छेद 222 के अंतर्गत किया जा सकता है। लेकिन स्थानांतरण की शक्ति का प्रयोग न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। इसी कारण न्यायिक नियुक्तियों और स्थानांतरण की प्रक्रिया में Collegium की भूमिका विकसित हुई।
न्यायपालिका की वित्तीय स्वतंत्रता - न्यायपालिका की वास्तविक स्वतंत्रता के लिए आर्थिक स्वतंत्रता भी आवश्यक है। यदि न्यायपालिका पूरी तरह कार्यपालिका के आर्थिक नियंत्रण में हो तो अप्रत्यक्ष दबाव उत्पन्न हो सकता है। संविधान में न्यायाधीशों के वेतन आदि के संबंध में विशेष सुरक्षा दी गई है तथा कुछ न्यायिक व्यय Consolidated Fund से संबंधित होते हैं।
न्यायिक स्वतंत्रता की आवश्यकता एवं महत्व -
1. संविधान की सर्वोच्चता की रक्षा - यदि सरकार संविधान का उल्लंघन करे तो स्वतंत्र न्यायपालिका उसे रोक सकती है। संविधान सर्वोच्च है, सरकार नहीं।
2. मौलिक अधिकारों की रक्षा - नागरिकों के मौलिक अधिकारों की संवैधानिक सुरक्षा स्वतंत्र न्यायपालिका से होती है। यदि राज्य किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का अनुचित हनन करे तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है।
3. विधि के शासन की स्थापना - Rule of Law का अर्थ है कि कानून सबसे ऊपर है और कानून के सामने सभी समान हैं। स्वतंत्र न्यायपालिका इस सिद्धांत की प्रहरी है।
4. कार्यपालिका की मनमानी पर नियंत्रण - यदि कार्यपालिका अपनी शक्ति का दुरुपयोग करती है तो न्यायपालिका Judicial Review का प्रयोग कर सकती है। उदाहरण के लिए, सरकार ने किसी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा हो तो न्यायालय Habeas Corpus जारी करके उसकी स्वतंत्रता की रक्षा कर सकता है।
5. विधायिका पर संवैधानिक नियंत्रण - संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाया गया कानून यदि संविधान के विरुद्ध है तो न्यायालय उसकी संवैधानिक समीक्षा कर सकता है। इसे Judicial Review कहते हैं।
6. अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्गों की सुरक्षा - लोकतंत्र केवल बहुमत का शासन नहीं है। यदि बहुमत द्वारा किसी अल्पसंख्यक या कमजोर वर्ग के अधिकारों का उल्लंघन हो तो स्वतंत्र न्यायपालिका उनके अधिकारों की रक्षा कर सकती है।
7. निष्पक्ष चुनाव एवं लोकतांत्रिक व्यवस्था- न्यायपालिका चुनावी विवादों और निर्वाचन संबंधी कानूनों की व्याख्या में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता बढ़ती है।
8. संघवाद की रक्षा - भारत में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन है। यदि केंद्र और राज्य के बीच संवैधानिक विवाद उत्पन्न हो तो स्वतंत्र न्यायपालिका उसका समाधान करती है। इस प्रकार न्यायपालिका संघीय संतुलन की संरक्षक भी है।
9. नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा - भाषण, अभिव्यक्ति, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, जीवन, समानता आदि अधिकारों की रक्षा के लिए स्वतंत्र न्यायपालिका आवश्यक है।
न्यायिक स्वतंत्रता के प्रमुख तत्व - न्यायपालिका स्वतंत्र = नियुक्ति में स्वतंत्रता + कार्यकाल की सुरक्षा + वेतन की सुरक्षा + हटाने की कठिन प्रक्रिया + निर्णय में स्वतंत्रता + प्रशासनिक स्वतंत्रता + न्यायिक पुनरावलोकन।
न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही - दोनों में संतुलन आवश्यक है।
न्यायिक स्वतंत्रता - न्यायाधीश को बिना दबाव न्याय करने की स्वतंत्रता।
न्यायिक जवाबदेही: न्यायाधीश भी संविधान, कानून और न्यायिक नैतिकता के प्रति उत्तरदायी हों। स्वतंत्रता का अर्थ जवाबदेही से मुक्ति नहीं है और जवाबदेही का अर्थ न्यायिक स्वतंत्रता का विनाश नहीं है।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता और Basic Structure Doctrine -
Kesavananda Bharati v. State of Kerala (1973) के ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने Basic Structure Doctrine स्थापित की। बाद के निर्णयों में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को संविधान की मूल संरचना के महत्वपूर्ण तत्व के रूप में मान्यता मिली। इसका अर्थ है कि संसद संविधान में संशोधन करने की अपनी शक्ति का प्रयोग करके ऐसी व्यवस्था नहीं बना सकती जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता का मूल स्वरूप नष्ट हो जाए।
महत्वपूर्ण संवैधानिक अनुच्छेद -
अनुच्छेद - विषय
32 - मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु सर्वोच्च न्यायालय
50 - न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करना
124 - सर्वोच्च न्यायालय एवं न्यायाधीश
129 - सर्वोच्च न्यायालय Court of Record
136 - Special Leave Petition
137 - सर्वोच्च न्यायालय की Review Power
141 - SC द्वारा घोषित विधि सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी
142 - Complete Justice
145 - Supreme Court Rules
214 - प्रत्येक राज्य के लिए उच्च न्यायालय
217 - HC Judges की नियुक्ति/सेवा
218 - Removal provisions का HC पर प्रयोग
220 - HC Judge के retirement के बाद practice restriction
221 - HC Judges का वेतन
225 - HC Judge का transfer
226 - High Court की writ jurisdiction
227 - High Court का superintendence
235 - अधीनस्थ न्यायालयों पर High Court का नियंत्रण
निष्कर्ष - न्यायपालिका की स्वतंत्रता भारतीय लोकतंत्र की सुरक्षा-कवच है। संविधान ने न्यायपालिका को स्वतंत्र बनाने के लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति, कार्यकाल, वेतन, पद से हटाने की प्रक्रिया, न्यायिक पुनरावलोकन, रिट अधिकारिता और प्रशासनिक स्वतंत्रता जैसी अनेक व्यवस्थाएँ की हैं। इसका अंतिम उद्देश्य न्यायाधीशों को विशेषाधिकार देना नहीं, बल्कि नागरिकों को निष्पक्ष न्याय की गारंटी देना है।
स्वतंत्र न्यायपालिका वह है जो सत्ता के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि संविधान और विधि के पक्ष में खड़ी होती है।”
अतः भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में न्यायपालिका की स्वतंत्रता केवल एक प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का महत्वपूर्ण अंग है।
अधीनस्थ न्यायालय की संरचना उच्च न्यायालय का नियंत्रण एवं संवैधानिक स्थिति -
भारतीय न्यायपालिका की वह आधारभूत इकाई है जहाँ आम नागरिक के अधिकांश दीवानी और फौजदारी विवादों का प्रथम स्तर पर निपटारा होता है। संविधान के भाग VI, अध्याय VI (अनुच्छेद 233 से 237) में अधीनस्थ न्यायालयों से संबंधित प्रमुख प्रावधान दिए गए हैं।
A. अधीनस्थ न्यायालयों की संरचना - भारत में न्यायपालिका मुख्यतः तीन स्तरों पर कार्य करती है:
1. सर्वोच्च न्यायालय
2. उच्च न्यायालय
3. जिला एवं अधीनस्थ न्यायालय
अधीनस्थ न्यायालयों को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में समझा जा सकता है:
1. जिला न्यायालय - प्रत्येक जिले में एक जिला एवं सत्र न्यायालय होता है। दीवानी मामलों में इसे जिला न्यायालय (District Court) कहा जाता है। फौजदारी मामलों में इसे सत्र न्यायालय (Sessions Court) कहा जाता है। इसका प्रमुख जिला एवं सत्र न्यायाधीश (District & Sessions Judge) होता है। जिला न्यायाधीश जिले की न्यायिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण प्रशासनिक भूमिका भी निभाता है।
जिला न्यायालय के अधीनस्थ न्यायालय - राज्य के अनुसार इनके नाम और स्तर में कुछ अंतर हो सकता है।
दीवानी पक्ष -
• सिविल जज (सीनियर डिवीजन)
• सिविल जज (जूनियर डिवीजन)
• अन्य सक्षम दीवानी न्यायालय
फौजदारी पक्ष -
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM)
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी
न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय श्रेणी, जहाँ राज्य की न्यायिक संरचना में ऐसा पद हो
नोट - न्यायालयों के वास्तविक पदनाम और स्थानीय संरचना राज्य के कानूनों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
B. जिला एवं अधीनस्थ न्यायालय -
1. जिला न्यायाधीश की नियुक्ति - अनुच्छेद 233 जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है। जिला न्यायाधीश की नियुक्ति राज्यपाल के द्वारा की जाती है, लेकिन संबंधित उच्च न्यायालय से परामर्श आवश्यक है। यदि किसी व्यक्ति की पहले से राज्य या संघ की सेवा में नियुक्ति नहीं है, तो जिला न्यायाधीश बनने के लिए कम से कम 7 वर्ष तक अधिवक्ता या प्लीडर रहना चाहिए; और उसकी नियुक्ति के लिए उच्च न्यायालय की सिफारिश होनी चाहिए। इस प्रकार नियुक्ति में तीन महत्वपूर्ण संस्थाएँ भागीदार होती हैं -
राज्यपाल + उच्च न्यायालय + योग्य अधिवक्ता/न्यायिक अधिकारी
अनुच्छेद 233 का महत्व - इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जिला न्यायपालिका में नियुक्ति केवल कार्यपालिका की इच्छा पर निर्भर न हो। उच्च न्यायालय की भूमिका न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए सुरक्षा-कवच का काम करती है।
2. अन्य न्यायिक सेवा में नियुक्ति - अनुच्छेद 234 जिला न्यायाधीशों के अतिरिक्त राज्य की न्यायिक सेवा में व्यक्तियों की भर्ती से संबंधित है। ऐसी नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है लेकिन
राज्य लोक सेवा आयोग से परामर्श तथा।उच्च न्यायालय से परामर्श की संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है। इसका उद्देश्य न्यायिक सेवा में योग्य एवं स्वतंत्र व्यक्तियों की नियुक्ति सुनिश्चित करना है।
C. अधीनस्थ न्यायालयों पर उच्च न्यायालय का नियंत्रण - अनुच्छेद 235 के अनुसार जिला न्यायालयों और उनके अधीन न्यायालयों पर नियंत्रण उच्च न्यायालय में निहित है, इसमें शामिल हैं -
1. पोस्टिंग - न्यायिक अधिकारियों की पोस्टिंग के संबंध में उच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
2. पदोन्नति - अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों की पदोन्नति में उच्च न्यायालय महत्वपूर्ण संवैधानिक भूमिका निभाता है।
3. अवकाश - न्यायिक अधिकारियों के अवकाश संबंधी मामलों पर भी उच्च न्यायालय का नियंत्रण रहता है।
4. अनुशासनात्मक नियंत्रण - न्यायिक अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई में उच्च न्यायालय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
5. स्थानांतरण - न्यायिक अधिकारियों के स्थानांतरण पर भी उच्च न्यायालय का नियंत्रण रहता है।
अनुच्छेद 235 का उद्देश्य - इस प्रावधान के पीछे मूल विचार है अधीनस्थ न्यायपालिका को कार्यपालिका के अनुचित प्रभाव से मुक्त रखना। यदि जिला न्यायाधीश या अन्य न्यायिक अधिकारी अपने पद, पदोन्नति या अनुशासन के लिए सीधे कार्यपालिका पर निर्भर हों, तो न्यायिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।इसलिए संविधान ने न्यायपालिका के भीतर एक संस्थागत नियंत्रण-व्यवस्था बनाई है।
D. अधीनस्थ न्यायपालिका की संवैधानिक स्थिति - अधीनस्थ न्यायपालिका की संवैधानिक स्थिति को समझने के लिए अनुच्छेद 233 से 237 अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
अनुच्छेद 50 - राज्य को निर्देश दिया गया है कि वह न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने के लिए कदम उठाए। यह राज्य के नीति-निदेशक तत्वों में
महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय
अनुच्छेद 233 - जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति
अनुच्छेद 234 - जिला न्यायाधीशों के अतिरिक्त न्यायिक सेवा में भर्ती
अनुच्छेद 235 - अधीनस्थ न्यायालयों पर उच्च न्यायालय का नियंत्रण
अनुच्छेद 236 - District Judge की परिभाषा, Judicial Service की अवधारणा
अनुच्छेद 237 - राज्यपाल को यह शक्ति देता है कि वह अधीनस्थ मजिस्ट्रेटों के संबंध में इस अध्याय के प्रावधानों को लागू कर सके, जैसा वह आवश्यक समझे।
न्यायिक स्वतंत्रता और अधीनस्थ न्यायपालिका की स्वतंत्रता - संविधान में न्यायपालिका की स्वतंत्रता केवल सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय तक सीमित नहीं है। अधीनस्थ न्यायपालिका भी स्वतंत्र न्यायिक व्यवस्था का अभिन्न अंग है। इसका कारण है सामान्य नागरिक का पहला वास्तविक न्यायिक संपर्क जिला न्यायालय, सिविल न्यायालय, मजिस्ट्रेट न्यायालय से ही होता है। इसलिए यदि अधीनस्थ न्यायपालिका स्वतंत्र नहीं होगी, तो संविधान द्वारा प्रदत्त न्याय की वास्तविक गारंटी कमजोर हो जाएगी।
उच्च न्यायालय और अधीनस्थ न्यायपालिका का संबंध -
• उच्च न्यायालय नियंत्रण – अनुच्छेद 235
• जिला एवं सत्र न्यायालय - अन्य अधीनस्थ न्यायालय
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायाधीश के प्रत्येक न्यायिक निर्णय में मनमाने ढंग से हस्तक्षेप कर सकता है। उच्च न्यायालय का नियंत्रण प्रशासनिक एवं सेवा-संबंधी नियंत्रण के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जबकि अधीनस्थ न्यायालय अपने न्यायिक कार्य में कानून और संविधान के अनुसार निर्णय देते हैं।
न्यायिक निर्णय -
1. Chandra Mohan v. State of Uttar Pradesh, 1966 -
यह मामला अनुच्छेद 233 की व्याख्या के लिए महत्वपूर्ण है। सर्वोच्च न्यायालय ने जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति में उच्च न्यायालय की संवैधानिक भूमिका को महत्व दिया और स्पष्ट किया कि संविधान में निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है।
2. State of West Bengal v. Nripendra Nath Bagchi, 1966 - यह निर्णय अनुच्छेद 235 से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय है। सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय का नियंत्रण व्यापक है और इसमें अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों के सेवा-संबंधी तथा अनुशासनात्मक पहलू भी शामिल हो सकते हैं।
3. All India Judges' Association v. Union of India - यह मामलों की एक श्रृंखला है जिसमें अधीनस्थ न्यायपालिका की सेवा शर्तें, वेतन, पदोन्नतिकार्य-परिस्थितियाँ एवं न्यायिक स्वतंत्रता आदि से जुड़े प्रश्नों पर सर्वोच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण निर्देश दिए।
जिला न्यायपालिका का महत्व - भारत में न्याय की वास्तविक पहुँच का बड़ा हिस्सा जिला न्यायपालिका के माध्यम से होता है। यह न्यायपालिका की नींव → जिला न्यायालय → उच्च न्यायालय → सर्वोच्च न्यायालय की संरचना में पहला प्रमुख न्यायिक मंच है।
जिला न्यायालय -
• साक्ष्य रिकॉर्ड करता है।
• तथ्य निर्धारित करता है।
• दीवानी विवादों का निर्णय करता है।
• गंभीर आपराधिक मामलों की सुनवाई करता है।
• अपीलों की सुनवाई करता है।
• कानून के अनुसार नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है।
परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण अंतर
ट्रिक - 50 निर्देशक तत्व→ 233 नियुक्ति → 234 भर्ती → 235 नियंत्रण → 236 परिभाषा → 237 विस्तार
निष्कर्ष - अधीनस्थ न्यायपालिका भारतीय न्याय-व्यवस्था की जमीनी रीढ़ है। संविधान ने अनुच्छेद 233–237 के माध्यम से इसकी नियुक्ति, भर्ती, नियंत्रण और संरचना को संवैधानिक आधार दिया है। विशेष रूप से अनुच्छेद 235 के अंतर्गत उच्च न्यायालय का नियंत्रण अधीनस्थ न्यायपालिका की स्वतंत्रता का केंद्रीय तत्व है। इसके साथ अनुच्छेद 50 न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने की संवैधानिक दिशा देता है।
न्यायिक सक्रियता, न्यायिक अतिक्रमण, न्यायिक आत्म-संयम एवं जनहित याचिका -
न्यायिक सक्रियता, न्यायिक अतिक्रमण, न्यायिक आत्म-संयम एवं जनहित याचिका ये चारों अवधारणाएँ भारतीय संवैधानिक विधि में न्यायपालिका की भूमिका और उसकी सीमाओं को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। विशेष रूप से Judicial Activism, Judicial Overreach, Judicial Restraint और PIL एक-दूसरे से जुड़े हुए विषय हैं। इन्हें संविधान के अनुच्छेद 32, 136, 226, 141 और 142 के संदर्भ में समझना उपयोगी है।
न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) - न्यायिक सक्रियता से आशय न्यायपालिका द्वारा संविधान और कानून की व्याख्या करते समय सक्रिय एवं प्रगतिशील भूमिका निभाने से है, विशेषकर तब जब विधायिका या कार्यपालिका अपने संवैधानिक दायित्वों को प्रभावी ढंग से पूरा नहीं कर रही हो। सरल शब्दों में जब न्यायपालिका कानून की व्याख्या के माध्यम से संवैधानिक मूल्यों, मौलिक अधिकारों और न्याय को प्रभावी बनाने के लिए सक्रिय भूमिका निभाती है, तो इसे न्यायिक सक्रियता कहते हैं। यह न्यायपालिका द्वारा नया कानून बनाना नहीं है। इसका मूल आधार मौजूदा संविधान और कानून की ऐसी व्याख्या है जो उनके उद्देश्य और अधिकार-संरक्षण को प्रभावी बनाए।
न्यायिक सक्रियता की आवश्यकता - भारत जैसे लोकतंत्र में न्यायिक सक्रियता के विकास के प्रमुख कारण हैं:
1. मौलिक अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा।
2. विधायिका अथवा कार्यपालिका की निष्क्रियता।
3. सामाजिक एवं आर्थिक न्याय की आवश्यकता।
4. कमजोर एवं वंचित वर्गों को न्याय उपलब्ध कराना।
5. संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखना।
6. प्रशासनिक मनमानी पर नियंत्रण।
7. Rule of Law को मजबूत करना।
8. पर्यावरण, मानवाधिकार एवं सार्वजनिक हित की रक्षा।
न्यायिक सक्रियता के प्रमुख साधन -
(A) संविधान की व्यापक व्याख्या - न्यायालय संविधान के प्रावधानों को केवल संकीर्ण शब्दार्थ तक सीमित न रखकर उनके उद्देश्य और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप व्याख्यायित करता है।
(B) अनुच्छेद 21 का विस्तार - न्यायपालिका ने जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को व्यापक अर्थ दिया है। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत न्यायिक व्याख्या के माध्यम से विभिन्न अधिकारों को संरक्षण मिला, जैसे -
• गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार
• स्वच्छ पर्यावरण
• विधिक सहायता
• शीघ्र न्याय
• निजता
• आजीविका आदि।
(C) PIL का विकास - जनहित याचिका ने न्यायपालिका को ऐसे व्यक्तियों और समूहों तक न्याय पहुँचाने में सहायता की जो स्वयं न्यायालय तक पहुँचने में असमर्थ थे।
(D) लगातार निगरानी (Continuing Mandamus) - कुछ मामलों में न्यायालय केवल एक बार आदेश देकर मामला समाप्त नहीं करता, बल्कि आदेशों के अनुपालन की लगातार निगरानी करता है।
(E) संवैधानिक उपचार (Constitutional Remedies) - अनुच्छेद 32 और 226 के अंतर्गत न्यायालयों द्वारा writ jurisdiction का प्रयोग भी न्यायिक सक्रियता का महत्वपूर्ण माध्यम है।
न्यायिक सक्रियता के उदाहरण (न्यायिक निर्णय) -
(1) Kesavananda Bharati v. State of Kerala - इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने Basic Structure Doctrine विकसित किया। न्यायालय ने कहा कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती। यह भारतीय संवैधानिक न्यायशास्त्र में न्यायिक शक्ति का ऐतिहासिक उदाहरण है।
(2) Maneka Gandhi v. Union of India - न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की व्याख्या को व्यापक बनाया और कहा कि "procedure established by law" की प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और गैर-मनमानी होनी चाहिए। इससे Articles 14, 19 और 21 के बीच संबंध मजबूत हुआ।
(3) Vishaka v. State of Rajasthan - कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने Vishaka Guidelines जारी कीं। उस समय इस विषय पर विशिष्ट संसदीय कानून उपलब्ध नहीं था। बाद में Sexual Harassment of Women at Workplace Act, 2013 आया। यह न्यायिक सक्रियता का प्रमुख उदाहरण माना जाता है।
(4) M.C. Mehta v. Union of India - पर्यावरण संरक्षण से संबंधित अनेक मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने महत्वपूर्ण सिद्धांत विकसित किए तथा पर्यावरणीय अधिकारों को Article 21 से जोड़ा।
न्यायिक अतिक्रमण (Judicial Overreach) - जब न्यायपालिका अपनी संवैधानिक न्यायिक भूमिका से आगे बढ़कर ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने लगे जो मुख्यतः विधायिका के कानून-निर्माण या कार्यपालिका के नीति-निर्धारण/प्रशासनिक क्षेत्र से संबंधित हैं, तो उसे न्यायिक अतिक्रमण कहा जाता है।
इसमें अंतर -
Judicial Activism = सक्रिय न्यायिक भूमिका
Judicial Overreach = उस भूमिका की सीमा पार करना।
अर्थात प्रत्येक judicial overreach activism हो सकता है, लेकिन प्रत्येक judicial activism overreach नहीं होता।
न्यायिक सक्रियता की सीमाएँ - न्यायिक सक्रियता का अर्थ न्यायपालिका की असीमित शक्ति नहीं है। न्यायालय का अपने अधिकार-क्षेत्र से आगे बढ़ना एवं अत्यधिक हस्तक्षेप ही न्यायिक अतिक्रमण कहलाता है। न्यायपालिका को -
• संविधान का सम्मान करना चाहिए।
• शक्ति का विकेंद्रीकरण (Separation of Powers) का पालन करना चाहिए।
• विधायिका के नीति-निर्धारण क्षेत्र में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
• विशेषज्ञ प्रशासनिक निर्णयों में अनावश्यक हस्तक्षेप से बचना चाहिए।
• न्यायिक प्रक्रिया का उपयोग व्यक्तिगत या राजनीतिक उद्देश्यों के लिए नहीं होने देना चाहिए।
Judicial Overreach की आलोचना एवं प्रभाव - इसके आलोचकों के अनुसार
• Separation of Powers की अवधारणा कमजोर होती है।
• न्यायपालिका की संस्थागत सीमाएँ प्रभावित होती हैं।
• न्यायालय के पास हर नीति के प्रशासनिक और आर्थिक परिणामों का पर्याप्त विशेषज्ञ ज्ञान नहीं होता।
• लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित संस्थाओं की भूमिका कम होती है।
• न्यायिक आदेशों से governance में कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
विशेष - यदि कार्यपालिका या विधायिका गंभीर संवैधानिक उल्लंघन करे, तो न्यायपालिका का हस्तक्षेप आवश्यक भी हो सकता है। इसलिए हर judicial intervention को overreach कहना उचित नहीं है।
न्यायिक आत्म-संयम (Judicial Restraint) - Judicial Restraint का अर्थ है कि न्यायालय अपनी न्यायिक शक्ति का सावधानीपूर्वक और सीमित प्रयोग करे तथा जहाँ संविधान और कानून की सीमाएँ अनुमति न दें वहाँ नीति-निर्धारण में हस्तक्षेप न करे। सरल शब्दों में न्यायालय वह करे जो संविधान उसे करने का अधिकार देता है, न कि वह जो उसे करना उचित प्रतीत होता है।"
Judicial Restraint के प्रमुख सिद्धांत
1. Separation of Powers का सम्मान।
2. विधायिका के निर्णयों के प्रति institutional respect।
3. कार्यपालिका के प्रशासनिक क्षेत्र में सीमित हस्तक्षेप।
4. संवैधानिक प्रश्न होने पर ही व्यापक हस्तक्षेप।
5. न्यायिक निर्णयों में restraint और judicial discipline।
6. Constitutional interpretation में precedent का सम्मान।
7. राजनीतिक प्रश्नों में अनावश्यक हस्तक्षेप से बचना।
8. न्यायालय स्वयं को नीति-निर्माता के रूप में स्थापित न करे।
Judicial Activism और Judicial Restraint में अंतर -
आधार - Judicial Activism - Judicial Restraint
दृष्टिकोण - सक्रिय - संयमित
न्यायिक भूमिका - व्यापक - सीमित
उद्देश्य - अधिकारों/न्याय की सक्रिय सुरक्षा - संस्थागत सीमाओं का सम्मान
नीति मामलों में - आवश्यकता पर हस्तक्षेप - परहेज
विधायिका - कानून की संवैधानिक समीक्षा के साथ सक्रिय दृष्टिकोण - विधायिका के क्षेत्र का अधिक सम्मान
खतरा - Overreach की संभावना - अधिकार-संरक्षण में अत्यधिक निष्क्रियता की संभावना
जनहित याचिका (Public Interest Litigation - PIL) - जनहित याचिका ऐसी न्यायिक कार्यवाही है जिसमें किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा व्यक्तिगत निजी हित के बजाय व्यापक सार्वजनिक हित से संबंधित अधिकारों या समस्याओं के समाधान के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जाता है। भारत में PIL ने न्याय तक पहुँच की अवधारणा को व्यापक बनाया।
PIL का विकास - भारत में PIL का विकास मुख्यतः 1970 और 1980 के दशक में हुआ। न्यायपालिका ने Locus Standi के पारंपरिक नियमों को उदार बनाया। मुकदमा वही व्यक्ति करता है जिसका अधिकार प्रभावित हुआ हो। PIL में न्यायालय ने सार्वजनिक-हित वाले मामलों में public-spirited persons को न्यायालय आने की अनुमति दी।
PIL के उद्देश्य -
1. गरीब और कमजोर वर्गों को न्याय दिलाना।
2. मानवाधिकारों की रक्षा।
3. पर्यावरण संरक्षण।
4. बंधुआ मजदूरी का उन्मूलन।
5. जेलों एवं हिरासत में मानवाधिकारों की रक्षा।
6. महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा।
7. प्रशासनिक मनमानी पर नियंत्रण।
8. सार्वजनिक संस्थाओं में जवाबदेही।
9. सामाजिक न्याय को बढ़ावा देना।
PIL के संवैधानिक आधार -
अनुच्छेद 32 - सर्वोच्च न्यायालय को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए writ जारी करने की शक्ति देता है।
अनुच्छेद 226 - उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों के साथ-साथ अन्य विधिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए भी writ jurisdiction प्रदान करता है।
इसीलिए PIL के लिए Article 226 का क्षेत्र Article 32 से व्यापक हो सकता है।
PIL में Locus Standi - PIL ने traditional locus standi को liberal बनाया। अब यदि किसी कमजोर वर्ग के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है और वह स्वयं न्यायालय नहीं पहुँच सकता, तो कोई public-spirited व्यक्ति/संस्था न्यायालय का ध्यान उस समस्या की ओर आकर्षित कर सकती है। इसे Representative Standing या Public Interest Standing के रूप में समझा जा सकता है।
PIL किन मामलों में लाई जा सकती है?
उदाहरण -
• बंधुआ मजदूरी।
• बाल मजदूरी।
• जेलों की अमानवीय परिस्थितियाँ।
• पर्यावरण प्रदूषण।
• हिरासत में अत्याचार।
• महिलाओं के अधिकार।
• बच्चों के अधिकार।
• विस्थापित या अत्यंत कमजोर वर्गों के अधिकार।
• सार्वजनिक संसाधनों का गंभीर दुरुपयोग।
• प्रशासनिक निष्क्रियता से प्रभावित व्यापक जनहित।
PIL के दुरुपयोग पर न्यायालय की दृष्टि
PIL का उद्देश्य Public Interest है, Private Interest नहीं। यदि कोई व्यक्ति
• निजी बदले के लिए
• राजनीतिक उद्देश्य से
• publicity के लिए
• व्यक्तिगत लाभ के लिए
• business rivalry के लिए
• न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग करने के लिए
PIL दायर करता है, तो न्यायालय उसे खारिज कर सकता है और उपयुक्त मामलों में exemplary costs भी लगा सकता है।
PIL के महत्वपूर्ण मामले -
(1) Hussainara Khatoon v. State of Bihar - विचाराधीन कैदियों की स्थिति का मामला था। न्यायालय ने Speedy Trial को Article 21 का महत्वपूर्ण हिस्सा माना। यह PIL के विकास का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
(2) S.P. Gupta v. Union of India - इस मामले ने PIL और liberalized locus standi के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
(3) Bandhua Mukti Morcha v. Union of India - बंधुआ मजदूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय ने महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया। यह सामाजिक न्याय संबंधी PIL का प्रमुख उदाहरण है।
(4) Vishaka v. State of Rajasthan - कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से सुरक्षा के लिए Guidelines जारी की गईं। यह PIL, judicial activism और constitutional rights के परस्पर संबंध का उत्कृष्ट उदाहरण है।
PIL, Judicial Activism और Judicial Overreach का संबंध - इन तीनों को इस प्रकार समझें: PIL → न्यायालय तक जनहित का मामला पहुँचाने का माध्यम Judicial Activism → न्यायालय का सक्रिय संवैधानिक दृष्टिकोण Judicial Overreach → सक्रियता की संभावित सीमा-लाँघना अर्थात PIL स्वयं judicial activism नहीं है। PIL एक procedural/judicial mechanism है, जिसका उपयोग judicial activism के माध्यम से अधिकारों की रक्षा करने में हो सकता है।
चारों अवधारणाओं का तुलनात्मक अध्ययन -
आधार - न्यायिक सक्रियता - न्यायिक अतिक्रमण - न्यायिक आत्म-संयम - जनहित याचिका
English - Judicial Activism - Judicial Overreach - Judicial Restraint - PIL
प्रकृति - न्यायिक दृष्टिकोण - सीमा से आगे हस्तक्षेप - संयमित न्यायिक दृष्टिकोण - न्यायिक कार्यवाही/उपाय
मुख्य उद्देश्य - न्याय एवं अधिकारों की प्रभावी रक्षा - अत्यधिक न्यायिक हस्तक्षेप की स्थिति - शक्तियों का संतुलन - जनहित की रक्षा
प्रमुख चिंता - निष्क्रियता से बचना - Separation of Powers - Judicial limits - Access to Justice
उदाहरण - Basic Structure Vishaka - नीति-निर्धारण में अत्यधिक हस्तक्षेप के आरोप वाले मामले - सीमित न्यायिक हस्तक्षेप - Hussainara, Bandhua Mukti Morcha
ट्रिक - A-R-O-P
A = Activism → सक्रिय न्यायपालिका
R = Restraint → स्वयं पर नियंत्रण
O = Overreach → सीमा से आगे
P = PIL → जनहित को न्यायालय तक पहुँचाना
निष्कर्ष - भारतीय संविधान में न्यायपालिका को संविधान की सर्वोच्चता, मौलिक अधिकारों और Rule of Law की रक्षा का महत्वपूर्ण दायित्व दिया गया है। न्यायिक सक्रियता ने अनेक अवसरों पर न्याय को समाज के कमजोर वर्गों तक पहुँचाने और मौलिक अधिकारों का विस्तार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जनहित याचिका ने न्याय तक पहुँच को लोकतांत्रिक और व्यापक बनाया है। दूसरी ओर, न्यायिक आत्म-संयम न्यायपालिका को उसकी संवैधानिक सीमाओं का स्मरण कराता है और विधायिका तथा कार्यपालिका के क्षेत्र का सम्मान सुनिश्चित करता है। जब सक्रियता इन संस्थागत सीमाओं को पार करने लगे, तो न्यायिक अतिक्रमण की समस्या उत्पन्न हो सकती है।
संघ एवं राज्यों के बीच विधायी, प्रशासनिक एवं वित्तीय संबंध शक्तियों का विभाजन, वितरण एवं दायित्व -
संवैधानिक आधार - संघ और राज्यों के बीच संबंधों का मुख्य आधार संविधान का भाग XI (अनुच्छेद 245–263) और भाग XII (अनुच्छेद 264–300A) है। इन्हें तीन मुख्य भागों में बाँटा जाता है -
संबंध - प्रमुख अनुच्छेद - मुख्य विषय
विधायी संबंध - 245–255 - कानून बनाने की शक्तियों का विभाजन।
प्रशासनिक संबंध - 256–263 - प्रशासनिक शक्तियों एवं दायित्वों का वितरण।
वित्तीय संबंध - 268–293 - कर, राजस्व एवं वित्तीय संसाधनों का वितरण।
इसके अतिरिक्त सातवीं अनुसूची में तीन सूचियों के माध्यम से विधायी शक्तियों का विभाजन किया गया है -
1. संघ सूची
2. राज्य सूची
3. समवर्ती सूची
A. अनुच्छेद 245–255 विधायी संबंध (Legislative Relations) - विधायी संबंध का अर्थ है कि संघ संसद और राज्य विधानमंडल किन विषयों पर कानून बना सकते हैं। इसका संवैधानिक आधार सातवीं अनुसूची है।
अनुच्छेद 245 - काQनूनों का क्षेत्र -
संसद - पूरे भारत या भारत के किसी भाग के लिए कानून बना सकती है।
राज्य विधानमंडल - अपने राज्य के पूरे या किसी भाग के लिए कानून बना सकता है।
विशेष - संसद द्वारा बनाया गया कानून केवल इस आधार पर अवैध नहीं होगा कि उसका प्रभाव भारत के बाहर भी पड़ता है।
अनुच्छेद 246 शक्तियों का विषयगत विभाजन - सातवीं अनुसूची में विषयों को तीन सूचियों में बाँटा गया है।
(1) संघ सूची (List I) - इन विषयों पर केवल संसद को कानून बनाने की सामान्य शक्ति है।
• रक्षा
• विदेश मामले
• नागरिकता
• मुद्रा
• बैंकिंग
• रेलवे
• डाक एवं तार
• परमाणु ऊर्जा
• अंतर्राज्यीय व्यापार
• संघ लोक सेवा
• राष्ट्रीय राजमार्ग
• जल एवं नभ
• सेना आदि।
नोट - राष्ट्रीय महत्व के विषय → संघ सूची → संसद
(2) राज्य सूची (List II) - इन विषयों पर सामान्यतः राज्य विधानमंडल कानून बनाता है।
• पुलिस
• लोक व्यवस्था
• सार्वजनिक स्वास्थ्य
• कृषि
• स्थानीय शासन
• बाजार एवं मेले
• भूमि
• राज्य लोक सेवाएँ
• राज्य के भीतर व्यापार आदि।
नोट - स्थानीय/क्षेत्रीय विषय → राज्य सूची → राज्य विधानमंडल
(3) समवर्ती सूची (List III) - इन विषयों पर संसद और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।
• आपराधिक विधि
• आपराधिक प्रक्रिया
• विवाह एवं तलाक
• दत्तक ग्रहण
• उत्तराधिकार
• शिक्षा
• वन
• श्रम कल्याण
• विद्युत
• जनसंख्या नियंत्रण आदि।
अनुच्छेद 254 टकराव की स्थिति - यदि समवर्ती सूची के किसी विषय पर संघ और राज्य के कानून में टकराव हो जाए तो अनुच्छेद 254 लागू होता है। संसद का कानून राज्य कानून पर प्रभावी होगा लेकिन यदि राज्य कानून राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रखा गया हो और राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त कर चुका हो तो वह राज्य में प्रभावी रह सकता है। फिर भी संसद बाद में उसी विषय पर कानून बनाकर उस राज्य कानून को बदल सकती है।
अनुच्छेद 248 अवशिष्ट शक्तियाँ - तीनों सूचियों में जो विषय नहीं हैं, उन पर कानून बनाने की शक्ति संसद को प्राप्त है। इसे अवशिष्ट विधायी शक्ति (Residuary Legislative Power) कहते हैं।
उदाहरण - नई तकनीक से उत्पन्न ऐसे विषय, जो संविधान की सूचियों में स्पष्ट रूप से नहीं हैं, संसद के अधिकार क्षेत्र में आ सकते हैं। भारत में अवशिष्ट शक्ति संघ के पास है।
राज्य सूची पर संसद की कानून बनाने की शक्ति - सामान्य स्थिति में राज्य सूची राज्य का क्षेत्र है, लेकिन संविधान कुछ विशेष परिस्थितियों में संसद को राज्य सूची पर कानून बनाने की अनुमति देता है।
(i) अनुच्छेद 249 राष्ट्रीय हित में - यदि राज्यसभा अपने उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करे कि राज्य सूची का कोई विषय राष्ट्रीय हित में संसद द्वारा विनियमित किया जाना आवश्यक है, तो संसद उस विषय पर कानून बना सकती है। प्रस्ताव अधिकतम एक वर्ष के लिए प्रभावी रहता है और इसे बार-बार एक-एक वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है।
(ii) अनुच्छेद 250 राष्ट्रीय आपातकाल - जब अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल लागू हो, तब संसद राज्य सूची के विषयों पर कानून बना सकती है।आपातकाल समाप्त होने के बाद भी ऐसा कानून अधिकतम छह महीने तक प्रभावी रह सकता है।
(iii) अनुच्छेद 252 राज्यों की सहमति - दो या अधिक राज्य विधानमंडल प्रस्ताव पारित करके संसद से अनुरोध कर सकते हैं कि वह राज्य सूची के किसी विषय पर कानून बनाए। इसके बाद संसद कानून बना सकती है। बाद में अन्य राज्य भी उस कानून को अपने राज्य में लागू करने के लिए उसे अपना सकते हैं। ऐसे कानून में संशोधन या निरसन संसद ही कर सकती है।
(iv) अनुच्छेद 253 अंतरराष्ट्रीय समझौते - किसी अंतरराष्ट्रीय संधि, समझौते, सम्मेलन या अंतरराष्ट्रीय निर्णय को लागू करने के लिए संसद राज्य सूची के विषय पर भी कानून बना सकती है। यह संघ की महत्वपूर्ण शक्ति है।
(v) अनुच्छेद 356 राष्ट्रपति शासन - राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होने पर संसद राज्य की विधायी शक्तियों का प्रयोग कर सकती है।
संसद और राज्य विधानमंडल के कानूनों की सर्वोच्चता विधायी क्षेत्र में मुख्य सिद्धांत -
संघ सूची → संसद की प्रधानता
राज्य सूची → राज्य विधानमंडल की प्रधानता
समवर्ती सूची → दोनों, लेकिन टकराव में संसद की प्रधानता
इसके पीछे तीन प्रमुख सिद्धांत हैं -
1. Pith and Substance - न्यायालय कानून के वास्तविक स्वरूप और मुख्य विषय को देखता है। यदि कानून उस विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है जिसने उसे बनाया है, तो केवल सहायक रूप से दूसरे क्षेत्र को प्रभावित करने पर कानून अमान्य नहीं होगा।
2. Colourable Legislation - विधायिका वह कार्य अप्रत्यक्ष रूप से नहीं कर सकती जिसे वह प्रत्यक्ष रूप से करने के लिए सक्षम नहीं है।
Doctrine - जो प्रत्यक्ष रूप से नहीं कर सकते, उसे अप्रत्यक्ष रूप से भी नहीं कर सकते।
3. Repugnancy - समवर्ती सूची में संघ और राज्य कानून के बीच वास्तविक असंगति होने पर अनुच्छेद 254 के अनुसार संघ कानून को प्राथमिकता मिलती है, विषयगत अपवादों के अधीन।
अनुच्छेद 256–263 प्रशासनिक संबंध (Administrative Relations) - विधायी शक्ति के बाद प्रश्न आता है कि कानूनों को लागू कौन और कैसे लागू करेगा, इसका प्रमुख आधार है।
अनुच्छेद 256 राज्यों का दायित्व - राज्य की कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार होना चाहिए कि -
• संसद द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन हो।
• राज्य में लागू मौजूदा केंद्रीय कानूनों का पालन हो।
• संघ सरकार राज्यों को आवश्यक निर्देश दे सकती है।
अनुच्छेद 257 संघ का नियंत्रण - राज्य अपनी कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार करेगा कि उससे संघ की कार्यपालिका शक्ति में बाधा न आए।
संघ राज्य को निर्देश दे सकता है कि -
1. राष्ट्रीय या सामरिक महत्व के संचार साधनों का निर्माण एवं रखरखाव किया जाए।
2. रेलवे की सुरक्षा के लिए आवश्यक उपाय किए जाएँ।
ऐसे निर्देशों से होने वाले अतिरिक्त खर्च की भरपाई के लिए संविधान में व्यवस्था है।
अनुच्छेद 356 संघ के निर्देशों का पालन न करने का प्रभाव - यदि कोई राज्य संघ के संवैधानिक निर्देशों का पालन नहीं करता और ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है जिसमें राज्य सरकार संविधान के अनुसार नहीं चलाई जा सकती, तो अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन का आधार बन सकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि केंद्र को राज्यों पर असीमित प्रशासनिक नियंत्रण प्राप्त है। संघ की शक्तियाँ भी संविधान द्वारा सीमित हैं।
अनुच्छेद 258 संघ द्वारा राज्य को कार्य सौंपना - राष्ट्रपति राज्य सरकार की सहमति से संघ की कार्यपालिका के कुछ कार्य राज्य को सौंप सकता है। इस प्रकार राज्य, संघ के कार्यों के प्रशासन में भूमिका निभा सकता है।
अनुच्छेद 258A राज्य द्वारा संघ को कार्य सौंपना - राज्य का राज्यपाल, भारत सरकार की सहमति से राज्य की कार्यपालिका के कुछ कार्य संघ को सौंप सकता है। इससे दोनों स्तरों के प्रशासन में सहयोग की व्यवस्था बनती है।
अखिल भारतीय सेवाएँ (संघ लोक सेवा आयोग) - अनुच्छेद 312 के तहत अखिल भारतीय सेवाओं की व्यवस्था की गई है।
उदाहरण -
भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS)
भारतीय पुलिस सेवा (IPS)
भारतीय वन सेवा (IFoS)
इन सेवाओं की विशेषता यह है कि अधिकारी -
1. संघ और राज्यों दोनों के प्रशासनिक ढाँचे में कार्य कर सकते हैं।
2. उनकी भर्ती संघ स्तर पर होती है।
3. वे राज्य प्रशासन में भी महत्वपूर्ण पदों पर कार्य करते हैं।
4. इससे प्रशासन में राष्ट्रीय एकरूपता और संघ-राज्य समन्वय बढ़ता है।
अनुच्छेद 262 अंतर्राज्यीय जल विवाद - संसद अंतर्राज्यीय नदियों या नदी घाटियों के जल के उपयोग, वितरण और नियंत्रण से संबंधित विवादों के निपटारे के लिए कानून बना सकती है। यह संघ-राज्य संबंधों का महत्वपूर्ण प्रशासनिक एवं संघीय पक्ष है।
अनुच्छेद 263 अंतर्राज्यीय परिषद - राष्ट्रपति ऐसी परिषद स्थापित कर सकता है जो
• राज्यों के बीच विवादों की जाँच एवं चर्चा करे।
• संघ और राज्यों के सामान्य हित के विषयों पर विचार करे।
• नीति और कार्रवाई के बेहतर समन्वय के लिए सुझाव दे।
इसे Inter-State Council कहा जाता है जिसका उद्देश्य है - विवाद → संवाद → समन्वय → सहकारी संघवाद
प्रशासनिक संबंधों की विशेषता - भारतीय व्यवस्था में प्रशासनिक शक्तियों का स्वरूप पूर्णतः पृथक नहीं है।
बल्कि इसमें संघीयता + एकात्मक झुकाव + सहकारी संघवाद तीनों दिखाई देते हैं।
उदाहरण -
1. राज्य अपने प्रशासन में स्वतंत्र हैं।
2. केंद्र राज्यों को कुछ परिस्थितियों में निर्देश दे सकता है।
3. अखिल भारतीय सेवाएँ दोनों स्तरों को जोड़ती हैं।
4. अंतर्राज्यीय परिषद सहयोग का मंच प्रदान करती है।
अनुच्छेद 268–293 वित्तीय संबंध (Financial Relations) - संघ-राज्य संबंधों का सबसे व्यावहारिक प्रश्न है पैसा कौन जुटाएगा और खर्च कौन करेगा?
संविधान ने कर लगाने, कर एकत्र करने, राजस्व बाँटने तथा राज्यों को अनुदान देने की विस्तृत व्यवस्था की है।
कराधान की शक्ति - संघ और राज्यों के बीच कर लगाने की शक्तियों का विभाजन किया गया है।
संघ के प्रमुख कर क्षेत्र - संघ को संविधान द्वारा विभिन्न महत्वपूर्ण कराधिकार दिए गए हैं, जैसे -
• सीमा शुल्क
• निगम कर
• आयकर, कृषि आय को छोड़कर
• केंद्रीय उत्पाद शुल्क के कुछ क्षेत्र
• अंतर्राज्यीय व्यापार से संबंधित कुछ कराधिकार आदि।
राज्य के प्रमुख कर क्षेत्र -
• राज्य आबकारी
• स्टाम्प शुल्क के कुछ क्षेत्र
• भूमि राजस्व
• वाहनों पर कर
• बिजली पर कर
• राज्य के भीतर कुछ वस्तुओं/गतिविधियों पर कर आदि से राजस्व प्राप्त होता है।
GST के बाद कर व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन हुआ है, जिसकी संवैधानिक आधारभूमि अनुच्छेद 246A और 279A है।
GST और संघ-राज्य वित्तीय संबंध - 101वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2016 के बाद GST व्यवस्था लागू हुई।
अनुच्छेद 246A - संसद और राज्य विधानमंडल दोनों को GST संबंधी कानून बनाने की शक्ति देता है। अंतर्राज्यीय आपूर्ति के मामले में संसद को विशेष शक्ति है।
अनुच्छेद 269A - अंतर्राज्यीय व्यापार या वाणिज्य में GST की वसूली और वितरण से संबंधित व्यवस्था करता है।
अनुच्छेद 279A - GST Council की स्थापना करता है। GST Council में
केंद्रीय वित्त मंत्री राज्यों के वित्त मंत्री शामिल होते हैं। इससे भारत में सहकारी संघवाद का वित्तीय रूप दिखाई देता है।
करों का वितरण - संविधान विभिन्न प्रकार से करों के वितरण की व्यवस्था करता है।
मॉडल 1 - संघ कर लगाता है → संघ वसूलता है → राज्यों को हिस्सा मिलता है
मॉडल 2 - संघ कर लगाता है → राज्य वसूलते/उपयोग करते हैं
मॉडल 3 - संघ और राज्य दोनों को कराधान की शक्ति GST इसका उदाहरण है।
अनुच्छेद 280 वित्त आयोग - राष्ट्रपति प्रत्येक पाँच वर्ष में या आवश्यकता होने पर उससे पहले वित्त आयोग का गठन करता है। इसका मुख्य कार्य है संघ और राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों पर सिफारिश करना।
वित्त आयोग सुझाव देता है -
1. संघ द्वारा लगाए गए करों की शुद्ध आय में राज्यों का हिस्सा कितना हो।
2. राज्यों के बीच उस हिस्से का वितरण कैसे हो।
3. राज्यों को अनुदान देने के सिद्धांत क्या हों।
4. पंचायतों और नगरपालिकाओं के संसाधनों को बढ़ाने के लिए राज्य की संचित निधि को बढ़ाने के उपायों पर सुझाव।
5. राष्ट्रपति द्वारा संदर्भित अन्य वित्तीय विषय।
Vertical और Horizontal Devolution - वित्तीय वितरण को दो भागों में समझना बहुत उपयोगी है।
Vertical Devolution - संघ → सभी राज्य अर्थात संघ के विभाज्य करों में राज्यों का कुल हिस्सा कितना होगा।
Horizontal Devolution - एक राज्य → दूसरे राज्य अर्थात राज्यों के कुल हिस्से को अलग-अलग राज्यों के बीच किस अनुपात में बाँटा जाएगा। यह अनुपात वित्त आयोग की सिफारिशों से निर्धारित होता है।
अनुच्छेद 275 अनुदान (Grants-in-Aid) - संघ कुछ राज्यों को सहायता अनुदान दे सकता है। इसका उद्देश्य राज्यों की वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करना तथा कुछ विशेष क्षेत्रों/समुदायों के कल्याण से संबंधित आवश्यकताओं को समर्थन देना है।
अनुच्छेद 282 विशेष अनुदान - संघ या राज्य किसी भी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अनुदान दे सकते हैं, भले ही वह विषय उनकी विधायी शक्ति के क्षेत्र में न आता हो।
अनुच्छेद 292–293 उधार लेने की शक्ति संघ- केंद्र सरकार भारत की संचित निधि की प्रतिभूति पर उधार ले सकती है।
राज्य - सरकारें भी उधार ले सकती हैं, लेकिन संविधान द्वारा निर्धारित परिस्थितियों में उन पर प्रतिबंध होते हैं।यदि किसी राज्य पर संघ का ऋण बकाया है या संघ द्वारा राज्य को दिए गए ऋण के संबंध में दायित्व है, तो राज्य के नए उधार पर संघ की सहमति आवश्यक हो सकती है।
संघ एवं राज्य विधानमंडलों के बीच शक्तियों का विभाजन -
आधार - संघ - राज्य
संघ सूची - पूर्ण विधायी - शक्ति नहीं
राज्य सूची - विशेष परिस्थितियों में - पूर्ण
समवर्ती सूची - हाँ - हाँ
अवशिष्ट विषय - संसद - नहीं
राष्ट्रीय आपातकाल - राज्य सूची पर भी कानून - शक्ति सीमित
अंतरराष्ट्रीय समझौते - राज्य सूची पर भी कानून संभव - सीमित
राष्ट्रपति शासन - संसद राज्य की विधायी शक्ति का प्रयोग कर सकती है - सामान्य विधायी कार्य बाधित
मूल सिद्धांत -
संघ सूची = संघ
राज्य सूची = राज्य
समवर्ती सूची = दोनों
अवशिष्ट = संघ
संघ एवं राज्यों के बीच प्रशासनिक शक्तियों का वितरण -
संघ की प्रशासनिक शक्तियाँ - संघ की कार्यपालिका शक्ति उन विषयों तक विस्तृत है जिन पर संसद कानून बना सकती है।
संघ प्रशासन, रक्षा, विदेश नीति, मुद्रा, रेलवे, संचार एवं राष्ट्रीय संस्थाओं आदि का संचालन करता है।
राज्य की प्रशासनिक शक्तियाँ - राज्य की कार्यपालिका शक्ति मुख्यतः उन विषयों तक विस्तृत है जिन पर राज्य विधानमंडल कानून बना सकता है।
उदाहरण - पुलिस, लोक व्यवस्था, कृषि, स्वास्थ्य, स्थानीय शासन, भूमि एवं प्रशासन आदि।
संघ का राज्यों पर प्रशासनिक नियंत्रण
अनुच्छेद 256 - संसद के कानूनों के पालन हेतु निर्देश।
अनुच्छेद 257 - संघ के हितों की रक्षा हेतु निर्देश।
अनुच्छेद 258 - संघ अपने कार्य राज्य को सौंप सकता है।
अनुच्छेद 258A - राज्य अपने कार्य संघ को सौंप सकता है।
अनुच्छेद 312 - अखिल भारतीय सेवाएँ।
अनुच्छेद 355 - बाहरी आक्रमण और आंतरिक अशांति से राज्यों की रक्षा तथा संविधान के अनुसार शासन सुनिश्चित करना संघ का कर्तव्य।
अनुच्छेद 356 - संवैधानिक तंत्र विफल होने पर राष्ट्रपति शासन।
संघ एवं राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों एवं दायित्वों का विभाजन -
1. संसाधन कौन जुटाएगा→ कराधान शक्तियों का वितरण।
2. खर्च कौन करेगा → संघ और राज्यों की कार्यपालिका तथा संवैधानिक जिम्मेदारियों का वितरण।
वित्तीय असंतुलन - Vertical Fiscal Imbalance - भारत में संघ के पास अपेक्षाकृत अधिक राजस्व-संग्रह क्षमता है, जबकि राज्यों के पास अनेक महत्वपूर्ण व्यय दायित्व हैं।
उदाहरण - राज्यों पर स्वास्थ्य, शिक्षा, पुलिस, कृषि स्थानीय शासन, ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में बड़ा खर्च आता है।
इसलिए संघ से राज्यों को करों में हिस्सा।अनुदान अन्य वित्तीय हस्तांतरण दिए जाते हैं। इसे Fiscal Federalism कहते हैं।
संघ एवं राज्यों के प्रमुख वित्तीय दायित्व
संघ - रक्षा , विदेश मामले, मुद्रा एवं मौद्रिक व्यवस्था, रेलवे,
राज्य - पुलिस, लोक व्यवस्था, कृषि, सार्वजनिक स्वास्थ्य,
संघ एवं राज्य - शिक्षा, श्रम, वन, GST
यह विभाजन हमेशा कठोर नहीं है, क्योंकि अनेक क्षेत्रों में साझी जिम्मेदारी है।
संचित निधि, आकस्मिकता निधि और लोक लेखा - संघ और राज्यों की वित्तीय व्यवस्था को समझने के लिए तीन निधियाँ महत्वपूर्ण हैं -
(1) संचित निधि - संघ के लिए भारत की संचित निधि और प्रत्येक राज्य के लिए राज्य की संचित निधि। सरकारी आय का प्रमुख हिस्सा इसमें जमा होता है और विधि के अनुसार खर्च किया जाता है।
(2) आकस्मिकता निधि - अप्रत्याशित एवं तात्कालिक खर्चों के लिए।
(3) लोक लेखा - ऐसी धनराशि जिसे सरकार न्यासी के रूप में रखती है, जैसे कुछ सार्वजनिक जमा आदि।
वित्तीय संघवाद की संस्थाएँ - संघ-राज्य वित्तीय संबंधों को संचालित करने वाली प्रमुख संस्थाएँ हैं -
1. अनुच्छेद 280 वित्त आयोग - कर वितरण एवं अनुदानों पर सिफारिश।
2. अनुच्छेद 279A GST परिषद - GST से संबंधित संघ-राज्य समन्वय।
3. संसद - केंद्रीय करों, बजट और वित्तीय कानूनों में महत्वपूर्ण भूमिका।
4. राज्य विधानमंडल - राज्य करों, बजट एवं राज्य व्यय को नियंत्रित करता है।
5. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) - संघ और राज्यों के वित्तीय लेखों की संवैधानिक लेखापरीक्षा।
संघ-राज्य संबंधों का समग्र मूल्यांकन - भारतीय संविधान में संघ और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन संघात्मक (Federal) है, लेकिन इसमें संघ को अपेक्षाकृत मजबूत बनाया गया है।
संघात्मक विशेषताएँ -
1. लिखित संविधान
2. संविधान की सर्वोच्चता
3. शक्तियों का संवैधानिक विभाजन
4. स्वतंत्र न्यायपालिका
5. द्विस्तरीय शासन
6. राज्य विधानमंडलों की संवैधानिक स्थिति
7. एकात्मक झुकाव
8. अवशिष्ट शक्ति संघ के पास
9। संसद की राज्य सूची में प्रवेश की विशेष शक्तियाँ
10. आपातकालीन प्रावधान
11. राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका
12. अखिल भारतीय सेवाएँ
13. संघ के निर्देश
14. राष्ट्रपति शासन
15. एकल संविधान और एकीकृत न्यायपालिका
इसलिए भारत को अक्सर संघात्मक व्यवस्था के साथ मजबूत केंद्र वाली व्यवस्था कहा जाता है।
सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) - आधुनिक भारत में संघ-राज्य संबंध केवल "केंद्र बनाम राज्य" की अवधारणा पर आधारित नहीं हैं। कई क्षेत्रों में दोनों को मिलकर काम करना पड़ता है - GST Council - वित्तीय सहयोग
Inter-State Council - प्रशासनिक सहयोग
Finance Commission - वित्तीय वितरण
All India Services - प्रशासनिक एकीकरण
समवर्ती सूची - साझा विधायी क्षेत्र
इसलिए भारतीय संघवाद को समझने का बेहतर सूत्र है -
शक्तियों का संवैधानिक विभाजन + परस्पर निर्भरता + सहयोगात्मक संघवाद।
सार - विधायी संबंध अनुच्छेद 245–255 + सातवीं अनुसूची =
संघ सूची - संसद -
राज्य सूची - राज्य
समवर्ती सूची - दोनों
अवशिष्ट - संसद
विशेष परिस्थितियों में संसद - राज्य सूची
प्रशासनिक संबंध अनुच्छेद 256–263 राज्यों द्वारा संघीय कानूनों का पालन
संघ के निर्देश -
• संघ द्वारा राज्य को कार्य सौंपना
• राज्य द्वारा संघ को कार्य सौंपना
• अखिल भारतीय सेवाएँ
• अंतर्राज्यीय परिषद
वित्तीय संबंध अनुच्छेद 268–293 -
• कराधान शक्तियों का वितरण
• करों का संघ-राज्य वितरण
• अनुदान
• वित्त आयोग
• GST परिषद
• उधार
• वित्तीय समायोजन
ट्रिक -
245–255 → कानून
256–263 → प्रशासन
264–293 → पैसा
विशेष -
246 → तीन सूचियाँ
248 → अवशिष्ट शक्ति
249 → राष्ट्रीय हित
250 → आपातकाल
252 → राज्यों की सहमति
253 → अंतरराष्ट्रीय समझौता
254 → संघ-राज्य कानूनों में असंगति
256–257 → संघ के निर्देश
258–258A → कार्यों का पारस्परिक हस्तांतरण
262 → अंतर्राज्यीय जल विवाद
263 → अंतर्राज्यीय परिषद
280 → वित्त आयोग
279A → GST परिषद
292–293 → उधार
355–356 → राज्यों के संबंध में संघ का संवैधानिक दायित्व/राष्ट्रपति शासन
एक पंक्ति में पूरा अध्याय -
विधायी संबंध तय करते हैं कि कानून कौन बनाएगा, प्रशासनिक संबंध बताते हैं कि शासन कौन चलाएगा, और वित्तीय संबंध तय करते हैं कि धन कौन जुटाएगा, किसे मिलेगा और कौन खर्च करेगा।
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