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अम्बेडकर लॉ यूनिवर्सिटी द्वितीय सेमेस्टर 2.1 अंतराष्ट्रीय विधि एवं मानवाधिकार

ALU Jaipur Semester Second 
Peper 2.1 पाठ्यक्रम अंतर्राष्ट्रीय विधि एवं मानवाधिकार 
पेपर 2.1: पब्लिक इंटरनेशनल लॉ (ह्यूमन राइट्स सहित) - Public International Law including Human Rightsपेपर लिखित परीक्षा: 80 अंकमिड-टर्म और प्रोजेक्ट: 20 अंककुल अंक: 100 अंक प्रति पेपरनवीनतम अपडेट: आपराधिक कानून के तहत अब पुरानी आईपीसी की जगह नई भारतीय न्याय संहिता (BNS) को सिलेबस में शामिल किया गया है।

Unit I - लोक अंतरराष्ट्रीय विधि का परिचय - 
1.1 - अंतरराष्ट्रीय विधि की प्रकृति एवं क्षेत्र 
A.अंतरराष्ट्रीय विधि की परिभाषा एवं विशेषताएँ
B. अंतरराष्ट्रीय विधि एवं निजी अंतरराष्ट्रीय विधि में अंतर
C. अंतरराष्ट्रीय विधि एवं नगरपालिका/राष्ट्रीय विधि के बीच संबंध
D. अंतरराष्ट्रीय विधि के सिद्धांत:
प्राकृतिक विधि सिद्धांत
E. प्रत्यक्षवाद/सकारात्मकतावाद सिद्धांत
यथार्थवाद सिद्धांत
1.2 अंतरराष्ट्रीय विधि के स्रोत
अंतरराष्ट्रीय विधि के स्रोत - 
A. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की संविधि का अनुच्छेद 38
B. संधियाँ एवं अभिसमय
C. प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि
D. सभ्य राष्ट्रों द्वारा मान्यता प्राप्त विधि के सामान्य सिद्धांत
E. न्यायिक निर्णय एवं विधिवेत्ताओं के लेखन
1.3 अंतरराष्ट्रीय विधि के विषय
अंतरराष्ट्रीय विधि के विषय की अवधारणा - 
A. अंतरराष्ट्रीय विधि के विषय के रूप में राज्य
B. अंतरराष्ट्रीय संगठनों का अंतरराष्ट्रीय विधि के विषय के रूप में स्थान
C. अंतरराष्ट्रीय विधि में व्यक्ति एवं गैर-राज्य अभिकर्ता
D. राज्यों के अधिकार एवं कर्तव्य
E. राज्यों एवं सरकारों की मान्यता
1.4 अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व
अंतरराष्ट्रीय विधि में विधिक व्यक्तित्व की संकल्पना - 
A. राज्यत्व के मानदंड
B. मान्यता एवं उसके विधिक प्रभाव
C. अंतरराष्ट्रीय संगठनों की विधिक स्थिति
D. व्यक्तियों का अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व
1.5 अधिकारिता एवं संप्रभुता
प्रादेशिक अधिकारिता - 
राज्य-क्षेत्र के बाहर की अधिकारिता
अधिकारिता के सिद्धांत - 
A. राष्ट्रीयता का सिद्धांत
B. निष्क्रिय व्यक्तित्व का सिद्धांत
C. संरक्षणात्मक सिद्धांत
D. सार्वभौमिक अधिकारिता का सिद्धांत
अधिकारिता से उन्मुक्तियाँ - 
. राज्य उन्मुक्ति
. राजनयिक उन्मुक्ति
ग. अंतरराष्ट्रीय विधि में संप्रभुता एवं उसकी सीमाएँ।

Unit II -अंतरराष्ट्रीय विवाद समाधान एवं संधि विधि - 
2.1 विवादों का शांतिपूर्ण समाधान
A. कूटनीतिक विधियाँ - 
. वार्ता (Negotiation)
. मध्यस्थता (Mediation)
. सुलह (Conciliation)
B. विधिक विधियाँ - 
. पंचाट/मध्यस्थ न्यायनिर्णयन (Arbitration)
. न्यायिक निर्णय (Adjudication)
C. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की भूमिका
D. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा परामर्शात्मक राय (Advisory Opinions)
E. विवाद समाधान के लिए क्षेत्रीय तंत्र
2.2 बल प्रयोग एवं सामूहिक सुरक्षा
बल प्रयोग का निषेध -
A. संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) के अंतर्गत बल प्रयोग का निषेध
B. बल प्रयोग के निषेध के अपवाद -
. आत्मरक्षा (Self-Defense)
. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति
. संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत सामूहिक सुरक्षा
शांति स्थापना अभियान (Peacekeeping Operations)
C. सुरक्षा की जिम्मेदारी / संरक्षण का दायित्व (Responsibility to Protect - R2P)
2.3 संधि विधि
A. संधि विधि की अवधारणा
B. संधियों की विधि पर वियना अभिसमय, 1969
C. संधियों का निर्माण एवं निष्पादन
D. आरक्षण (Reservations)
E. अनुसमर्थन/पुष्टिकरण (Ratification)
F. परिग्रहण/अभिगमन (Accession)
संधियों की व्याख्या
G. संधियों की समाप्ति एवं निलंबन
2.4 अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व
A. अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व की अवधारणा
राज्य का उत्तरदायित्व
B. राज्य के प्रति आचरण का आरोपण (Attribution of Conduct to the State)
C. अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का उल्लंघन
D. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अवैध कृत्यों के परिणाम
E. क्षतिपूर्ति (Reparations) - 
क. पूर्वस्थिति की बहाली (Restitution)
. प्रतिकर/मुआवज़ा
. संतोष/संतुष्टि (Satisfaction)
2.5 अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि
A. अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि के सिद्धांत
B. जिनेवा अभिसमय एवं अतिरिक्त प्रोटोकॉल
C. युद्धरत पक्षों (Combatants) एवं गैर-युद्धरत व्यक्तियों (Non-Combatants) के बीच अंतर
D. नागरिकों एवं युद्धबंदियों की सुरक्षा
E. युद्ध अपराध एवं उत्तरदायित्व निर्धारित करने के तंत्र

इकाई-III : अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार एवं मानवीय विधि - 
3.1 अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विधि का परिचय - 
A. अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विधि का परिचय
B. अंतरराष्ट्रीय विधि में मानवाधिकारों का विकास
C. मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (UDHR)
D. नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा (ICCPR)
E. आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा (ICESCR)
G. क्षेत्रीय मानवाधिकार प्रणालियाँ - 
. यूरोपीय मानवाधिकार प्रणाली
. अंतर-अमेरिकी मानवाधिकार प्रणाली
. अफ्रीकी मानवाधिकार प्रणाली
3.2 मानवाधिकार संधियाँ एवं प्रवर्तन तंत्र - 
A. महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर अभिसमय (CEDAW)
B. बाल अधिकारों पर अभिसमय (CRC)
C. सभी प्रकार के नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन पर अंतरराष्ट्रीय अभिसमय (ICERD)
D. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद एवं विशेष प्रक्रियाएँ
E. मानवाधिकारों के प्रवर्तन में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) की भूमिका
3.3 भारत में मानवाधिकारों का परिचय -
A. भारत में मानवाधिकारों का ऐतिहासिक विकास
B. मानवाधिकारों का संवैधानिक ढाँचा:
मौलिक अधिकार
C. राज्य के नीति-निदेशक तत्व
D. मानवाधिकारों के संरक्षण में न्यायपालिका की भूमिका
E. न्यायिक सक्रियता एवं जनहित याचिका (PIL) का मानवाधिकारों में महत्व
3.4 वंचित एवं हाशिए पर स्थित समुदायों का संरक्षण - 
A. अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के अधिकार
B. भेदभाव के विरुद्ध कानूनी प्रावधान
C. अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989
D. अल्पसंख्यकों का संरक्षण - 
. संवैधानिक सुरक्षा उपाय
ख. वैधानिक प्रावधान
E. भारत में सामाजिक न्याय एवं सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative Action) की नीतियाँ
3.5 राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाएँ - 
A. राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं की भूमिका
B. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) एवं राज्य मानवाधिकार आयोगों की भूमिका
C. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की शक्तियाँ एवं कार्य
D. मानवाधिकारों के संरक्षण में मानवाधिकार आयोगों की प्रभावशीलता
E. भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं के समक्ष आने वाली चुनौतियाँ
इकाई-IV : समुद्र का विधि-विधान एवं अंतरराष्ट्रीय आर्थिक विधि - 
4.1 समुद्र का अंतरराष्ट्रीय विधि-विधान (Law of the Sea)
A. समुद्र के विधि-विधान का परिचय
B. समुद्र के विधि पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCLOS)
C. समुद्री क्षेत्र - 
. प्रादेशिक समुद्र (Territorial Sea)
ख. सन्निहित क्षेत्र (Contiguous Zone)
. अनन्य आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone - EEZ)
. महाद्वीपीय मग्नतट/महाद्वीपीय शेल्फ (Continental Shelf)
D. तटीय राज्यों एवं स्थलरुद्ध राज्यों के अधिकार एवं कर्तव्य
E. UNCLOS के अंतर्गत विवाद समाधान
F. समुद्री पर्यावरण एवं समुद्री संसाधनों का संरक्षण
4.2 अंतरराष्ट्रीय वायु एवं अंतरिक्ष विधि
अंतरराष्ट्रीय वायु विधि - 
A. अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष विधि
B. अंतरराष्ट्रीय वायु विधि
C. वायु क्षेत्र एवं बाह्य अंतरिक्ष का विनियमन
D. अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन (ICAO)
E. अंतरिक्ष वस्तुओं द्वारा पहुँचाई गई क्षति के लिए दायित्व
F. बाह्य अंतरिक्ष का शांतिपूर्ण उपयोग
4.3 अंतरराष्ट्रीय आर्थिक विधि
A. अंतरराष्ट्रीय आर्थिक विधि का परिचय
B. विश्व व्यापार संगठन (WTO):
सिद्धांत
C. समझौते
D. विवाद समाधान
E. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) एवं विश्व बैंक - 
क. भूमिका
ख. कार्य
F. द्विपक्षीय निवेश संधियाँ (BITs)
G. निवेशक-राज्य विवाद समाधान (ISDS)
H. वैश्विक आर्थिक शासन के समक्ष चुनौतियाँ
4.4 अंतरराष्ट्रीय निवेश विधि - 
A. अंतरराष्ट्रीय निवेश विधि के सिद्धांत
B. विदेशी निवेश का संरक्षण
C. अधिग्रहण/संपत्ति का अनिवार्य अधिग्रहण (Expropriation) एवं मुआवज़ा
D. निवेशक-राज्य विवाद समाधान (ISDS)
E. अंतरराष्ट्रीय विधि में बहुराष्ट्रीय निगमों (Multinational Corporations) की भूमिका
4.5 अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण विधि - 
A. पर्यावरण संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय विधिक ढाँचा
B. सतत विकास एवं अंतरराष्ट्रीय विधि
C. जलवायु परिवर्तन के प्रति विधिक प्रतिक्रियाएँ
D. ओज़ोन परत का संरक्षण एवं मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल
E. सीमा-पार पर्यावरणीय समस्याएँ एवं विवाद

                 UNIT - I
अंतर्राष्ट्रीय विधि - 
अंतरराष्ट्रीय विधि वह विधि है जो राज्यों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों तथा कुछ परिस्थितियों में व्यक्तियों और अन्य गैर-राज्य पक्षों के बीच संबंधों, अधिकारों, कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को नियंत्रित करती है।
सरल शब्दों में, जिस प्रकार किसी देश के भीतर नागरिकों और संस्थाओं के आचरण को राष्ट्रीय कानून नियंत्रित करता है, उसी प्रकार देशों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच संबंधों को नियंत्रित करने वाले नियमों को अंतरराष्ट्रीय विधि कहा जाता है।
उदाहरण के लिए - 
दो देशों के बीच सीमा विवाद
युद्ध और शांति
 वायु एवं आअसमुद्री सीमाएँ
अंतरराष्ट्रीय व्यापार
मानवाधिकार
राजनयिक संबंध
युद्धबंदियों की सुरक्षा
पर्यावरण संरक्षण
अंतरराष्ट्रीय संधियाँ
इन सभी विषयों में अंतरराष्ट्रीय विधि महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
✓प्रमुख परिभाषाएँ - 
ओपेनहाइम (Oppenheim)  - अंतरराष्ट्रीय विधि उन प्रथागत एवं संधि-आधारित नियमों का समूह है जिन्हें राज्य अपने आपसी संबंधों में कानूनी रूप से बाध्यकारी मानते हैं।
जे. जी. स्टॉर्क (J. G. Starke)-अंतरराष्ट्रीय विधि उन सिद्धांतों और नियमों का समूह है जिनका पालन राज्य तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व वाले पक्ष अपने पारस्परिक संबंधों में करते हैं।
अंतरराष्ट्रीय विधि की प्रमुख विशेषताएँ 
1. राज्यों के बीच संबंधों का नियमन - 
यह मुख्य रूप से राज्यों के पारस्परिक संबंधों को नियंत्रित करती है।
2. संधियाँ और प्रथाएँ प्रमुख आधार - 
अंतरराष्ट्रीय विधि का निर्माण संधियों, अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं और विधि के सामान्य सिद्धांतों से होता है।
3. अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भूमिका - 
संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन इसके विकास और क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण हैं।
4. मानवाधिकारों की सुरक्षा - 
आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि केवल राज्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति के मानवाधिकारों को भी संरक्षण देती है।
5. विवादों का शांतिपूर्ण समाधान- 
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय, पंचाट, वार्ता, मध्यस्थता आदि के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान का मार्ग प्रदान करती है।
6. राज्य की संप्रभुता और उसकी सीमाएँ - 
प्रत्येक राज्य संप्रभु है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के कारण उसकी संप्रभुता पूर्णतः निरंकुश नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय विधि के प्रमुख स्रोत - 
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की संविधि के अनुच्छेद 38 के अनुसार प्रमुख स्रोत हैं - 
A. अंतरराष्ट्रीय संधियाँ एवं अभिसमय
B. अंतरराष्ट्रीय प्रथागत विधि
C. विधि के सामान्य सिद्धांत
D. न्यायिक निर्णय
E. प्रमुख विधिवेत्ताओं के लेखन
F. सभ्य राष्ट्रों के द्वारा बनाए गए नियम
लोक एवं निजी अंतरराष्ट्रीय विधि में अंतर - 
1. अंतर्राष्ट्रीय विधि राज्यों (एक सीमा तक व्यक्तियों) के आचरण को नियंत्रित करती है जबकि निजी अंतराष्ट्रीय विधि पूर्ण रूप से व्यक्तियों के आचरण को नियंत्रित करती है।
2. अंतरराष्ट्रीय विधि मुख्यतः राज्यों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों तथा अंतरराष्ट्रीय समुदाय से जुड़े विषयों को नियंत्रित करती है, जबकि निजी अंतरराष्ट्रीय विधि (Private International Law) उन निजी विवादों से संबंधित होती है जिनमें एक से अधिक देशों का कानून जुड़ा हो, जैसे किसी भारतीय और विदेशी नागरिक के बीच विवाह, अनुबंध या संपत्ति का विवाद।
3. लोक अंतरराष्ट्रीय विधि सभी राज्यों के लिए लगभग राज्यों में समान होती है जबकि निजी अंतराष्ट्रीय विधि पृथक हो सकती है।
4. पारस्परिक संबंधों पर आश्रित लोक अंतरराष्ट्रीय विधि के स्रोत प्रथाएं तथा संधियां हैं, जबकि निजी अंतराष्ट्रीय विधि विधानमंडलों द्वारा निर्मित एवं न्यायलयों द्वारा लागू की जाती हैं।
5. लोक अंतरराष्ट्रीय विधि का कार्यक्षेत्र व्यापक है जबकि निजी अंतराष्ट्रीय विधि संबंधित मामले में संबंधित क्षेत्र के कानून के अनुसार कार्य करती हैं।
अंतर्राष्ट्रीय विधि के अनुसार राज्यों के प्रकार - 
1. प्रभुत्व संपन्न राज्य - वे राज्य जो पूर्ण स्वतंत्र हैं एवं उनकी अपनी सरकार राज्य के निर्णय स्वयं लेती है।
2. अपूर्ण प्रभुत्व संपन्न राज्य - वे राज्य जिनकी सरकार तो होती है परन्तु वैदेशिक मामलों में कोई निर्णय स्वयं की सरकार के स्थान पर स्वामित्व सरकार करे। ऐसे राज्य स्वतंत्र संधि आदि नहीं कर सकते। जैसे अमेरिका के फेडरल स्टेट।
3. प्रसंधान राज्य (राज्य मंडल/संघ) - राज्यों का ऐसा समूह जिसके सभी सदस्य राज्य स्वतंत्र एवं प्रभुत्व संपन्न होते हैं और अपना निर्णय स्वयं लेते हैं, उनकी स्वयं की स्वतंत्र सीमा एवं सेना होती है। किसी विशेष बिंदु पर सहमत हो कर एक मंडल या संघ का निर्माण करते हैं। जैसे संयुक्त अरब अमीरात, यूरोपीय संघ आदि।
4. सह राज्य - ऐसे राज्य क्षेत्र जिन पर दो से अधिक राज्यों का अधिकार हो जैसे ग्रीनलैंड।
5. वंशवर्ती राज्य - ऐसे राज्य जो पराधीन हो, स्वयं की कोई नीति नहीं हो, वंशवर्ती राज्य कहलाते हैं।
6. संरक्षित राज्य - कई स्वतंत्र राज्य किसी शक्तिशाली राज्य से संधि के माध्यम से अधीनता स्वीकार कर लेते हैं तो संरक्षित राज्य की श्रेणी में आ जाते हैं।
7. सहयुक्त राज्य - ऐसे राज्य जो अपनी मर्जी से कभी भी संघ से पृथक हो सकते हैं के आधार पर संयुक्त होते हैं को सहयुक्त राज्य कहते हैं जैसे पोर्टेरिको।
8. न्याय राज्य क्षेत्र - इसे प्रन्यासी/न्यासी क्षेत्र भी कहते हैं। यह पूर्ण स्वतंत्र या प्रभुत्व संपन्न नहीं होते हैं, इसकी प्रभुत्व संपन्नता का उपयोग प्रन्यास के अधिकारी करते हैं जैसे अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का क्षेत्र।
9. वेटिकन राज्य - इसे होली सी भी कहते हैं, इसमें ईसाई धर्म के सर्वोच्च नेता पॉप निवास करते हैं। इस पर किसी का कोई अधिकार नहीं है। यह पूर्ण स्वतंत्र, छोटा, तटस्थ गैर सदस्य संयुक्त राष्ट्र संघ राज्य है जिस पर पॉप का धार्मिक शासन है।
10. तटस्थ (निर्गुट) राज्य - वे राज्य जो किसी युद्ध आदि में किसी भी राष्ट्र या राज्य का समर्थन अथवा विरोध नहीं करते, तटस्थ राज्य कहलाते हैं। भारत एक तटस्थ राज्य है जो किसी भी गुट में शामिल नहीं है।
11. तटस्थीकृत राज्य - वे राज्य जो घोषणा करते हैं कि उनके विरुद्ध किसी अन्य राज्य के आक्रमण के जवाब के सिवाय किसी भी अन्य राज्य पर किसी प्रकार का कोई हमला नहीं करेंगे।
12. स्वतंत्र शहर - ऐसे शहर जो एक संधि के माध्यम से किसी भी अन्य राज्य द्वारा किसी प्रकार के हस्तक्षेप से मुक्त होते हैं।
13. राष्ट्रमंडल common wealth of nationas - ऐसे राज्यों का समूह जो कभी अन्य राज्य के अधीन रहा है के संघ की सदस्यता लेता है। ब्रिटिश राष्ट्रमंडल से ब्रिटिश शब्द 1946 में हटा दिया गया था। भारत राष्ट्रमंडल का सदस्य देश है।
अंतर्राष्ट्रीय विधि में राज्य को प्राप्त करने के माध्यम (कौटिल्य का सप्तांग सिद्धांत) 
1. अधिभोग (कब्जा) - फिलिस्तीन पर इजरायल का कब्जा, उत्तर पूर्वी कश्मीर पर पाकिस्तान का कब्जा, तिब्बत पर चीन का कब्जा। पुराने समय में युद्ध के माध्यम से कब्जाए गए राज्य।
2. चिरभोग द्वारा - ऐसे राज्य से लिया जाता है जहाँ राजा या शासक को किसी भूमि, संपत्ति या क्षेत्र से स्थायी रूप से भोग/आय प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त हो। जैसे ब्रिटेन, फ्रांस।
3. उपाबद्ध विधि द्वारा - वह राज्य जो किसी शक्तिशाली राज्य के साथ संधि अथवा समझौते द्वारा राजनीतिक रूप से बँधा हो और जिसकी संप्रभुता उन शर्तों से सीमित हो, उपबद्ध विधि कहलाती है।
4. अनुवृद्धि से प्राप्त राज्य - अनुवृद्धि से प्राप्त राज्य से आशय ऐसे राज्य या प्रदेश से है जिसे किसी शासक ने धीरे-धीरे अपनी शक्ति, प्रभाव, विजय अथवा राजनीतिक विस्तार के माध्यम से अपने राज्य में मिला लिया हो।
5. अध्यर्पण से प्राप्त राज्य - जब कोई राजा या शासक युद्ध, राजनीतिक दबाव, पराजय या किसी समझौते के कारण अपने राज्य अथवा उसके किसी भाग पर अपना अधिकार छोड़कर उसे दूसरे शासक को सौंप देता है, तो इस प्रकार प्राप्त राज्य को अध्यर्पण से प्राप्त राज्य कहा जाता है।
6. पट्टा अथवा लीज से प्राप्त राज्य - एक निश्चित अवधि के लिए शर्तों के अधीन किसी राज्य द्वारा अपना क्षेत्र अन्य राज्य को सौंपना, पट्टा अथवा लीज पद्धति कहलाती है।
7. गिरवीकरण द्वारा - समय विशेष के लिए किसी राज्य द्वारा अपने राज्य क्षेत्र को अन्य राज्य को गिरवी रखने से प्राप्त राज्य।
 8. पंचाट द्वारा - दो या अधिक राज्यों के बीच विवाद की स्थिति में पंचाट निर्णय के आधार पर प्राप्त क्षेत्र को पंचाट द्वारा प्राप्त राज्य कहते हैं।
9. जनमत सर्वेक्षण - दो क्षेत्रों के नागरिकों द्वारा जनमत संग्रहण के बाद बने राज्य।
10. विभाजन - जिसके अंतर्गत पाकिस्तान और बांग्लादेश के जन्म हुआ।
11. विखंडन - रूस द्वारा अपने राज्यों का विखंडन से अन्य देशों का निर्माण।
राज्य कैसे खोया जा सकता है से आशय राज्य के क्षेत्र (Territory) के प्राप्ति और हानि से है। 
1. अध्यर्पण (Cession) - जब एक राज्य संधि या समझौते द्वारा अपने राज्य-क्षेत्र का कोई भाग दूसरे राज्य को सौंप देता है, तो इसे अध्यर्पण कहते हैं।
उदाहरण: युद्ध के बाद संधि के माध्यम से कोई राज्य अपना सीमावर्ती प्रदेश दूसरे राज्य को दे दे।
2. अधीनकरण (Subjugation) - जब कोई राज्य बलपूर्वक किसी दूसरे राज्य को पराजित करके उसके क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेता है, तो इसे अधीनकरण कहा जाता है। पुराने अंतरराष्ट्रीय विधि में विजय के माध्यम से क्षेत्र प्राप्त करने को मान्यता दी जाती थी। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में बलपूर्वक क्षेत्र हथियाना सामान्यतः वैध क्षेत्रीय अधिकार का आधार नहीं है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र चार्टर बल-प्रयोग और क्षेत्रीय अधिग्रहण के विरुद्ध है।
3. चिरभोग (Prescription) - जब कोई राज्य लंबे समय तक किसी ऐसे क्षेत्र पर लगातार, शांतिपूर्ण और प्रभावी रूप से प्रभुत्व रखता है, जिस पर दूसरे राज्य का दावा रहा हो, और दूसरा राज्य लंबे समय तक प्रभावी विरोध न करे, तो पुराने अंतरराष्ट्रीय विधि सिद्धांतों में इसे चिरभोग (Prescription) कहा गया। यहाँ केवल लंबे समय तक कब्जा पर्याप्त नहीं माना जाता; प्रभावी राज्य-सत्ता और दूसरे पक्ष की acquiescence/निष्क्रिय स्वीकृति जैसे तत्व महत्वपूर्ण होते हैं।
4. प्राकृतिक क्रिया (Accretion) - 
प्राकृतिक भौगोलिक प्रक्रियाओं से किसी राज्य के क्षेत्र में वृद्धि या कमी हो सकती है। जैसे नदी द्वारा मिट्टी का धीरे-धीरे जमना, समुद्र या नदी के किनारे भूमि का प्राकृतिक रूप से बढ़ना, ज्वालामुखीय गतिविधि से नई भूमि बनना आदि।
इसे प्राकृतिक क्रिया (Accretion) कहते हैं। 
नोट - प्राकृतिक क्रिया से राज्य-क्षेत्र प्राप्त भी हो सकता है और खो भी सकता है।
5. क्रांति (Revolution) - क्रांति अपने-आप राज्य-क्षेत्र को समाप्त नहीं करती। लेकिन यदि क्रांति के परिणामस्वरूप किसी राज्य की सरकार या संवैधानिक व्यवस्था बदल जाती है, तो सामान्यतः राज्य का अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व और उसका क्षेत्र बना रहता है। हाँ, यदि क्रांति के परिणामस्वरूप राज्य का विघटन, पृथक्करण या किसी क्षेत्र का अलग होकर नया राज्य बनना हो जाए, तब क्षेत्रीय परिवर्तन हो सकता है।
उदाहरण - किसी राज्य में क्रांति के बाद सरकार बदल जाए, लेकिन राज्य की सीमाएँ वही रहें, तो क्षेत्र नहीं खोता।
6. परित्याग (Abandonment) - जब कोई राज्य किसी क्षेत्र पर अपने संप्रभु अधिकार को छोड़ देता है और उस क्षेत्र पर अपना वास्तविक नियंत्रण भी समाप्त कर देता है, तो इसे परित्याग कहा जाता है।
केवल किसी स्थान से अस्थायी रूप से हट जाना पर्याप्त नहीं है। अधिकार छोड़ने की स्पष्ट या परिस्थितियों से सिद्ध इच्छा महत्वपूर्ण होती है।
7. स्वतंत्रता प्रदान करना (Grant of Independence) - जब कोई राज्य अपने अधीन किसी क्षेत्र या उपनिवेश को स्वतंत्र राज्य बनने का अधिकार प्रदान कर देता है, तो मूल राज्य उस क्षेत्र पर अपनी संप्रभुता खो देता है और नया स्वतंत्र राज्य अस्तित्व में आ जाता है।
उदाहरण: औपनिवेशिक शासन से किसी क्षेत्र को स्वतंत्रता प्रदान किए जाने पर उस क्षेत्र पर पूर्व शासक राज्य का संप्रभु अधिकार समाप्त हो जाता है।
अंतरराष्ट्रीय विधि की प्रकृति - 
इसको समझने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि अंतरराष्ट्रीय विधि केवल देशों के बीच संबंधों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी विधि-व्यवस्था है जो राज्यों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों तथा कुछ परिस्थितियों में व्यक्तियों और अन्य अंतरराष्ट्रीय कर्ताओं के अधिकारों एवं दायित्वों को नियंत्रित करती है।
अंतरराष्ट्रीय विधि की प्रकृति पर विधिशास्त्रियों में लंबे समय से विवाद रहा है। मुख्य प्रश्न यह रहा है कि क्या अंतरराष्ट्रीय विधि वास्तव में “विधि” है या केवल राज्यों द्वारा स्वीकार किए गए नैतिक एवं राजनीतिक नियमों का समूह?
1. अंतरराष्ट्रीय विधि की प्रकृति पर मूल विवाद - 
जॉन ऑस्टिन के अनुसार विधि वह आदेश है जो किसी सर्वोच्च संप्रभु सत्ता द्वारा दिया जाए और जिसके पीछे दंड की शक्ति हो। अंतरराष्ट्रीय समाज में कोई ऐसी विश्व-सर्वोच्च सरकार नहीं है जो सभी राज्यों को आदेश दे सके। इसी आधार पर ऑस्टिनवादी विचारधारा ने अंतरराष्ट्रीय विधि को पूर्ण अर्थ में विधि मानने से इनकार किया।
हॉलैंड ने तो यहां तक कह दिया कि अंतरराष्ट्रीय विधि विधि का मृत अवशेष है।
लेकिन आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि इस विचार से आगे निकल चुकी है। आज अंतरराष्ट्रीय विधि में संधियाँ, प्रथागत नियम, न्यायिक निर्णय, अंतरराष्ट्रीय संगठन, दायित्व, प्रतिबंध और विवाद-निपटान की संस्थागत व्यवस्थाएँ मौजूद हैं।
इसलिए आधुनिक दृष्टिकोण में अंतरराष्ट्रीय विधि को वास्तविक विधि-व्यवस्था माना जाता है, यद्यपि इसकी संरचना घरेलू कानून से अलग है।
2. अंतरराष्ट्रीय विधि की प्रमुख विशेषताएँ - 
(क) यह राज्यों के बीच संबंधों को नियंत्रित करती है - 
परंपरागत रूप से अंतरराष्ट्रीय विधि का मुख्य विषय संप्रभु राज्य रहे हैं।
उदाहरण के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा, जल, युद्ध, संधि या राजनयिक संबंधों से जुड़े प्रश्न अंतरराष्ट्रीय विधि के अंतर्गत आते हैं।
आधुनिक समय में इसका क्षेत्र काफी विस्तृत हो गया है।
अंतरराष्ट्रीय विधि में शामिल हैं - 
1. अंतरराष्ट्रीय संगठन
2. व्यक्ति
3. बहुराष्ट्रीय संस्थाएँ
4. कुछ गैर-राज्यीय कर्ता
5. मानवाधिकार संबंधी संस्थाएँ
इस प्रकार अंतरराष्ट्रीय विधि की प्रकृति अब केवल State-centric नहीं रह गई है।
(ख) इसमें कोई विश्व-सर्वोच्च संप्रभु सत्ता नहीं है - 
घरेलू कानून में संसद कानून बना सकती है और न्यायालय तथा प्रशासन उसे लागू करा सकते हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई एक विश्व संसद, विश्व सरकार या विश्व पुलिस नहीं है। फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय विधि अस्तित्वहीन है। राज्य स्वयं संधियों और प्रथाओं के माध्यम से अपने ऊपर दायित्व स्वीकार करते हैं। इसे अंतरराष्ट्रीय विधि की विकेन्द्रित प्रकृति (decentralized nature) कहा जाता है।
(ग) सहमति का महत्वपूर्ण स्थान - 
अंतरराष्ट्रीय विधि में राज्य की सहमति अत्यंत महत्वपूर्ण है। राज्य संधियों के माध्यम से अपने दायित्व स्वीकार करते हैं।
उदाहरण- Vienna Convention on the Law of Treaties, 1969 संधियों के निर्माण, व्याख्या और पालन से संबंधित महत्वपूर्ण नियम निर्धारित करता है।
इस सिद्धांत का आधार है - 
Pacta sunt servanda अर्थात् संधियों का पालन सद्भावना से किया जाना चाहिए।
(घ) प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि का महत्व - 
अंतरराष्ट्रीय विधि केवल लिखित संधियों पर निर्भर नहीं है। लंबे समय से राज्यों द्वारा अपनाई जा रही सामान्य प्रथा, जब उसे विधिक दायित्व के रूप में स्वीकार किया जाता है, तो वह Customary International Law का रूप ले सकती है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की संविधि के अनुच्छेद 38(1)(b) में इसे मान्यता दी गई है।
इसके दो प्रमुख तत्व माने जाते हैं - 
1. State Practice अर्थात राज्यों की सामान्य एवं निरंतर प्रथा
2. Opinio Juris अर्थात इस विश्वास के साथ कि ऐसी प्रथा कानूनी दायित्व के कारण अपनाई जा रही है।
3. अंतरराष्ट्रीय विधि की बाध्यकारी प्रकृति - 
यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई विश्व सरकार नहीं है, तो अंतरराष्ट्रीय विधि राज्यों पर बाध्यकारी कैसे है? इसका उत्तर कई आधारों में मिलता है - 
A संधियां राज्य स्वेच्छा से संधि स्वीकार करते हैं और उसके बाद उससे उत्पन्न दायित्वों का पालन करने के लिए बाध्य होते हैं।
B. प्रथागत विधि -व्यापक और स्वीकार्य राज्य-प्रथा तथा opinio juris से अंतरराष्ट्रीय नियम विकसित होते हैं।
C. सामान्य विधिक सिद्धांत - विभिन्न राष्ट्रीय विधि-व्यवस्थाओं में स्वीकार किए गए सामान्य विधिक सिद्धांत भी अंतरराष्ट्रीय विधि के स्रोत हो सकते हैं।
D. अंतरराष्ट्रीय न्यायिक संस्थाएँ -International Court of Justice जैसे संस्थान राज्यों के बीच विवादों के निपटारे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
4. अंतरराष्ट्रीय विधि की विकेन्द्रीकृत प्रकृति - घरेलू विधि में शक्ति का सामान्य ढाँचा इस प्रकार होता है - विधायिका→ कानून→ कार्यपालिका→ पुलिस/प्रशासन→ न्यायपालिका
लेकिन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में ऐसा केंद्रीकृत ढाँचा नहीं है। यहाँ - राज्य → संधियाँ/प्रथाएँ → अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ → विवाद निपटान → अनुपालन
का अपेक्षाकृत विकेन्द्रित ढाँचा दिखाई देता है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय विधि की प्रकृति घरेलू विधि से मूलतः भिन्न है।
5. अंतरराष्ट्रीय विधि की विकासशील प्रकृति - 
अंतरराष्ट्रीय विधि स्थिर नहीं है। यह समय के साथ विकसित हुई है।
पहले इसका मुख्य विषय था - 
1. युद्ध
2.शांति
3.सीमा
4.राजनयिक संबंध
5.संधियाँ
आधुनिक समय में इसका विस्तार हो गया है - 
1. मानवाधिकार
2. अंतरराष्ट्रीय आपराधिक विधि
3. पर्यावरण
4. समुद्री विधि
5. अंतरराष्ट्रीय व्यापार
6. अंतरराष्ट्रीय निवेश
7. वायु विधि
8. अंतरिक्ष विधि
9. शरणार्थी विधि
10. आतंकवाद से संबंधित अंतरराष्ट्रीय सहयोग
11. साइबर गतिविधियाँ
इसलिए इसकी प्रकृति गतिशील और विकासशील है।
6. मानव-केंद्रित होती अंतरराष्ट्रीय विधि - 
पुरानी अंतरराष्ट्रीय विधि मुख्यतः राज्यों के अधिकारों पर केंद्रित थी। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में व्यक्ति भी महत्वपूर्ण हो गया है।
उदाहरण के लिए - 
1. मानवाधिकार
2. नरसंहार
3. युद्ध अपराध
4. मानवता के विरुद्ध अपराध
5. शरणार्थियों के अधिकार
अब व्यक्ति केवल राज्य का नागरिक भर नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय विधि के कुछ क्षेत्रों में अंतरराष्ट्रीय अधिकारों और दायित्वों का धारक भी हो सकता है।
यही अंतरराष्ट्रीय विधि के आधुनिक स्वरूप की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है।
7. अंतरराष्ट्रीय विधि की न्यायिक प्रकृति - 
अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान के लिए अनेक संस्थाएँ कार्य करती हैं।
सबसे प्रमुख है - International Court of Justice, इसके अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों में विशेष न्यायाधिकरण और संस्थाएँ भी हैं।
उदाहरण - 
1. International Tribunal for the Law of the Sea
2. International Criminal Court
3. WTO dispute settlement system
4. विभिन्न निवेश पंचाट
इससे स्पष्ट है कि अंतरराष्ट्रीय विधि केवल राजनीतिक समझौतों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसका न्यायिक आयाम भी विकसित हो चुका है।
8. अंतरराष्ट्रीय विधि की अनुपालन-आधारित प्रकृति - 
घरेलू कानून में कानून तोड़ने पर पुलिस और न्यायालय सीधे दंड दे सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय विधि में अनुपालन का स्वरूप अधिक जटिल है। राज्यों को प्रभावित करने वाले साधनों में शामिल हैं - 
1. राजनयिक दबाव
2. प्रतिषेधात्मक उपाय
3. आर्थिक प्रतिबंध
4. अंतरराष्ट्रीय संगठनों के निर्णय
5. न्यायिक निर्णय
6. पारस्परिकता
7. अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा
8. संधि-आधारित दायित्व
इसलिए अंतरराष्ट्रीय विधि की प्रभावशीलता केवल दंड पर निर्भर नहीं करती।
9. संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय विधि - 
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय विधि के विकास में United Nations की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।
संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था ने - 
1. अंतरराष्ट्रीय शांति
2. सुरक्षा
3. मानवाधिकार
4. आत्मनिर्णय
5. अंतरराष्ट्रीय सहयोग
6. राज्यों की संप्रभु समानता
के सिद्धांतों को मजबूत किया। विशेष रूप से UN Charter आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि के महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक है।
10. अंतरराष्ट्रीय विधि की सार्वभौमिक प्रकृति - 
अंतरराष्ट्रीय विधि का उद्देश्य केवल किसी एक देश को नियंत्रित करना नहीं है। इसका लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय समुदाय में लागू होने वाले सामान्य नियम विकसित करना है।
हालाँकि सभी नियम सभी राज्यों पर समान रूप से लागू हों, यह आवश्यक नहीं है। कुछ नियम द्विपक्षीय हो सकते हैं, कुछ बहुपक्षीय, कुछ क्षेत्रीय, जबकि कुछ व्यापक रूप से सार्वभौमिक हो सकते हैं।
11. अंतरराष्ट्रीय विधि और राष्ट्रीय विधि का संबंध - 
अंतरराष्ट्रीय विधि और राष्ट्रीय विधि दो अलग-अलग स्तरों पर कार्य करती हैं।
राष्ट्रीय विधि मुख्यतः राज्य के भीतर व्यक्तियों और संस्थाओं को नियंत्रित करती है। अंतरराष्ट्रीय विधि मुख्यतः राज्यों तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय कर्ताओं के बीच संबंधों को नियंत्रित करती है। लेकिन दोनों पूरी तरह अलग-थलग नहीं हैं।
उदाहरण - कोई राज्य अंतरराष्ट्रीय संधि स्वीकार करने के बाद अपने घरेलू कानून में आवश्यक परिवर्तन कर सकता है। इसी कारण आधुनिक विधि-व्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय विधि के बीच निरंतर संपर्क दिखाई देता है।
12. महत्वपूर्ण निर्णीत वादों से अंतरराष्ट्रीय विधि की प्रकृति - 
1. S.S. Lotus Case, 1927 - 
Permanent Court of International Justice ने राज्य की स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय विधि में निषेध के सिद्धांत पर महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। इस मामले ने यह स्पष्ट करने में योगदान दिया कि अंतरराष्ट्रीय विधि में राज्यों की स्वतंत्रता और उनकी विधिक सीमाओं के बीच संबंध किस प्रकार देखा जाता है।
2. North Sea Continental Shelf Cases, 1969 - 
International Court of Justice ने customary international law के निर्माण में state practice और opinio juris के महत्व पर महत्वपूर्ण चर्चा की।
यह मामला प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि की प्रकृति समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
3. Nicaragua v. United States, 1986 - 
इस मामले में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने बल प्रयोग तथा राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप जैसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों पर विचार किया। यह निर्णय इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण है कि लिखित संधि के साथ-साथ customary international law भी राज्यों के व्यवहार को नियंत्रित कर सकती है।
4. Barcelona Traction Case, 1970 - 
इस मामले में ICJ ने erga omnes obligations की अवधारणा को स्पष्ट किया। इससे यह विचार मजबूत हुआ कि कुछ अंतरराष्ट्रीय दायित्व केवल किसी एक राज्य के प्रति नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समग्र हित से जुड़े होते हैं।
अंतरराष्ट्रीय विधि की प्रकृति को एक सूत्र में समझना - 
अंतरराष्ट्रीय विधि = संप्रभु राज्यों की सहमति + अंतरराष्ट्रीय प्रथा + सामान्य विधिक सिद्धांत + अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ + न्यायिक निर्णय + अंतरराष्ट्रीय समुदाय के विकसित होते हित।
निष्कर्ष - अंतरराष्ट्रीय विधि की प्रकृति को केवल इस आधार पर नहीं समझा जा सकता कि इसमें घरेलू कानून जैसी कोई विश्व-सरकार या विश्व-पुलिस नहीं है।
इसकी वास्तविक प्रकृति विकेन्द्रीकृत, सहमति-आधारित, प्रथागत, न्यायिक, गतिशील और क्रमशः मानव-केंद्रित है। आधुनिक युग में अंतरराष्ट्रीय विधि केवल राज्यों के बीच संबंधों को नियंत्रित करने वाली व्यवस्था नहीं रही, बल्कि मानवाधिकार, पर्यावरण, व्यापार, समुद्र, अंतरिक्ष, युद्ध और अंतरराष्ट्रीय शांति-सुरक्षा तक इसका विस्तार हो चुका है।
अंतरराष्ट्रीय विधि घरेलू विधि की प्रतिकृति नहीं है। इसकी अपनी विशिष्ट विकेन्द्रीकृत संरचना, स्रोत, संस्थाएँ और अनुपालन की व्यवस्थाएँ हैं। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय समाज में यह एक वास्तविक और प्रभावी विधि-व्यवस्था के रूप में विकसित हो चुकी है, जिसका केंद्र अब केवल राज्य नहीं बल्कि व्यापक अंतरराष्ट्रीय समुदाय और व्यक्ति भी हैं।

आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि का व्यापक स्वरूप - 
आज अंतरराष्ट्रीय विधि का क्षेत्र बहुत विस्तृत हो चुका है। यह केवल राज्य बनाम राज्य तक सीमित नहीं है। मानवाधिकार, पर्यावरण, अंतरराष्ट्रीय अपराध, समुद्र, अंतरिक्ष, व्यापार, निवेश और मानवीय विधि भी इसके महत्वपूर्ण अंग हैं। संक्षेप में -अंतरराष्ट्रीय विधि वह विधिक व्यवस्था है जो अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सदस्यों के अधिकारों, कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को निर्धारित करते हुए विश्व में शांति, न्याय, सहयोग और व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास करती है।

अंतर्राष्ट्रीय विधि की विषय-वस्तु - 
अंतर्राष्ट्रीय विधि की विषय-वस्तु को समझने के लिए केवल इसकी परिभाषा को समझना पर्याप्त नहीं है। यह समझना ज़रूरी है कि अंतर्राष्ट्रीय विधि किन-किन संबंधों, अधिकारों, दायित्वों और विवादों को नियंत्रित करती है।
अंतर्राष्ट्रीय विधि उन नियमों और सिद्धांतों का समूह है जो राज्यों, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों तथा कुछ परिस्थितियों में व्यक्तियों और अन्य अंतर्राष्ट्रीय विधिक व्यक्तियों के बीच संबंधों को नियंत्रित करते हैं।
प्रोफेसर Oppenheim के अनुसार, अंतर्राष्ट्रीय विधि उन प्रथागत और संधि-आधारित नियमों का समूह है जिन्हें राज्य अपने पारस्परिक संबंधों में विधिक रूप से बाध्यकारी मानते हैं। आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय विधि का क्षेत्र पारंपरिक राज्य-से-राज्य संबंधों तक सीमित नहीं है। इसमें अब मानवाधिकार, अंतर्राष्ट्रीय अपराध, पर्यावरण, समुद्र, वायु और अंतरिक्ष, व्यापार, निवेश, शरणार्थी, युद्ध तथा सामूहिक सुरक्षा जैसे विषय भी सम्मिलित हैं। अंतर्राष्ट्रीय विधि की विषय-वस्तु को निम्नलिखित प्रमुख भागों में समझा जा सकता है:
1. राज्य और उसकी संप्रभुता
2. राज्य का क्षेत्र एवं क्षेत्राधिकार
3. राज्यों की मान्यता
4. राज्य उत्तराधिकार
5. राज्य की जिम्मेदारी
6. संधि-विधि
7. राजनयिक एवं कांसुलर संबंध
8. समुद्र संबंधी अंतर्राष्ट्रीय विधि
9. वायु एवं अंतरिक्ष विधि
10. मानवाधिकार विधि
11. अंतर्राष्ट्रीय मानवीय विधि
12. अंतर्राष्ट्रीय अपराध विधि
13. शरणार्थी एवं नागरिकता संबंधी विधि
14. अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण विधि
15. अंतर्राष्ट्रीय अर्थ एवं व्यापार विधि
16. विवादों का शांतिपूर्ण समाधान
17. युद्ध और सामूहिक सुरक्षा
18. अंतर्राष्ट्रीय संगठन एवं संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था
अब इन्हें महत्वपूर्ण वादों के साथ देखते हैं।
1. राज्य और संप्रभुता - 
अंतर्राष्ट्रीय विधि का सबसे पुराना और महत्वपूर्ण विषय राज्य है।
राज्य के आवश्यक तत्व- 
1. निश्चित भू-भाग
2. स्थायी जनसंख्या
3. सरकार
4. अन्य राज्यों के साथ संबंध स्थापित करने की क्षमता
राज्य की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसकी संप्रभुता (Sovereignty) है।
केस - S.S. Lotus Case (1927) -
France v. Turkey के इस प्रसिद्ध मामले में Permanent Court of International Justice ने राज्य की संप्रभुता और क्षेत्राधिकार से संबंधित सिद्धांतों पर विचार किया। न्यायालय ने यह स्वीकार किया कि अंतर्राष्ट्रीय विधि में राज्यों की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है और किसी राज्य पर प्रतिबंध तभी माना जाएगा जब ऐसा प्रतिबंध अंतर्राष्ट्रीय विधि से स्थापित हो।
महत्त्व - यह निर्णय राज्य की संप्रभुता और क्षेत्राधिकार के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
2. राज्य का क्षेत्र एवं क्षेत्राधिकार - 
अंतर्राष्ट्रीय विधि यह निर्धारित करती है कि किसी राज्य का अधिकार उसके - 
1. भू-भाग
2. समुद्री क्षेत्र
3. वायु-क्षेत्र
तक किस सीमा तक विस्तृत है।
राज्य अपने क्षेत्र के भीतर व्यक्तियों और घटनाओं पर क्षेत्राधिकार रखता है।
केस - S.S. Lotus Case - मामले में न्यायालय ने राज्य के आपराधिक क्षेत्राधिकार के प्रश्न पर विचार किया।
सिद्धांत - किसी राज्य का क्षेत्राधिकार अंतर्राष्ट्रीय विधि की सीमाओं के अधीन होता है।
3. राज्यों की मान्यता - 
किसी नए राज्य या सरकार को अन्य राज्यों द्वारा मान्यता देना भी अंतर्राष्ट्रीय विधि का महत्वपूर्ण विषय है। मान्यता दो प्रकार की हो सकती है - 
1. De facto Recognition
2. De jure Recognition
राज्य की मान्यता का प्रभाव उसके राजनयिक संबंधों, संधियों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में भागीदारी पर पड़ता है।
केस - Tinoco Arbitration (1923)-
इस मामले में Costa Rica में सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकार के कार्यों और उसके द्वारा किए गए दायित्वों की वैधता का प्रश्न उठा।
महत्त्व - यह निर्णय प्रभावी सरकार और सरकार की मान्यता से जुड़े प्रश्नों के अध्ययन में महत्वपूर्ण माना जाता है।
4. राज्य उत्तराधिकार - 
जब किसी राज्य के क्षेत्र, सरकार या अंतर्राष्ट्रीय स्थिति में परिवर्तन होता है, तो यह प्रश्न उठता है कि - पुरानी संधियों का क्या होगा?, संपत्ति किसकी होगी?, ऋण का क्या होगा?, नागरिकता का क्या होगा?
इसे State Succession कहा जाता है।
उदाहरण के लिए किसी राज्य का विभाजन, विलय या स्वतंत्रता प्राप्त करना राज्य उत्तराधिकार के प्रश्न उत्पन्न कर सकता है।
5. राज्य की अंतर्राष्ट्रीय जिम्मेदारी - 
यदि कोई राज्य अंतर्राष्ट्रीय विधि के किसी दायित्व का उल्लंघन करता है तो उसके ऊपर अंतर्राष्ट्रीय जिम्मेदारी उत्पन्न हो सकती है। इसके परिणामस्वरूप 
1. क्षतिपूर्ति
2. पुनर्स्थापन
3. मुआवजा
4. संतोष
जैसे उपाय उपलब्ध हो सकते हैं।
केस - Factory at Chorzów Case (1928) - 
यह अंतर्राष्ट्रीय विधि में Reparation अर्थात क्षतिपूर्ति का अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय है। न्यायालय ने सिद्धांत स्थापित किया कि अंतर्राष्ट्रीय विधि के उल्लंघन से उत्पन्न क्षति की उचित भरपाई की जानी चाहिए।
महत्त्व - अंतर्राष्ट्रीय राज्य-जिम्मेदारी के कानून में यह निर्णय आधारभूत माना जाता है।
6. संधि-विधि - 
राज्यों के बीच अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का बड़ा भाग संधियों द्वारा नियंत्रित होता है। संधियाँ संबंधित पक्षों के लिए अधिकार और दायित्व पैदा करती हैं।
इसके अंतर्गत मुख्य प्रश्न हैं - 
1. संधि का निर्माण
2. हस्ताक्षर
3. अनुसमर्थन
4. व्याख्या
5. पालना
6. समाप्ति
7. आरक्षण
केस -  Qatar v. Bahrain - 
International Court of Justice ने विभिन्न दस्तावेजों और पत्राचार के आधार पर यह प्रश्न देखा कि क्या उन्होंने राज्यों के बीच विधिक दायित्व उत्पन्न किए थे।
महत्त्व - यह निर्णय यह समझने में उपयोगी है कि किसी अंतर्राष्ट्रीय समझौते की विधिक बाध्यकारी प्रकृति कैसे निर्धारित की जाती है।
7. राजनयिक संबंध एवं राजनयिक उन्मुक्तियाँ - 
राज्यों के बीच राजदूतों और राजनयिक प्रतिनिधियों के संबंध भी अंतर्राष्ट्रीय विधि द्वारा नियंत्रित होते हैं। राजनयिकों को कुछ विशेष - 
1. उन्मुक्तियाँ
2. विशेषाधिकार,
3. गिरफ्तारी से सुरक्षा,
4. न्यायिक क्षेत्राधिकार से छूट
प्राप्त होती हैं।
केस - United States Diplomatic and Consular Staff in Tehran (1980) - 
ईरान में अमेरिकी राजनयिकों और वाणिज्य दूतावास के कर्मचारियों को बंधक बनाए जाने का मामला International Court of Justice के सामने आया।
न्यायालय ने ईरान को अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार माना।
महत्त्व - यह मामला Vienna Convention on Diplomatic Relations तथा राजनयिक संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
8. समुद्र की अंतर्राष्ट्रीय विधि - 
समुद्र संबंधी अंतर्राष्ट्रीय विधि में निम्न विषय आते हैं- 
1. Territorial Sea
2. Contiguous Zone
3. Exclusive Economic Zone
4. Continental Shelf
5. High Seas
6. समुद्री संसाधन
7. समुद्री सीमाओं का निर्धारण
केस - North Sea Continental Shelf Cases (1969) - 
Germany, Denmark और Netherlands के बीच Continental Shelf की सीमा निर्धारण का विवाद था।
ICJ ने समुद्री सीमा निर्धारण और equitable principles से जुड़े महत्वपूर्ण सिद्धांत बताए।
महत्त्व - यह समुद्री सीमाओं और प्रथागत अंतर्राष्ट्रीय विधि के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय है।
09. वायु एवं अंतरिक्ष विधि - 
आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय विधि में वायु तथा अंतरिक्ष भी महत्वपूर्ण विषय हैं। इसके अंतर्गत - 
1. राज्य का वायु क्षेत्र
2. अंतर्राष्ट्रीय नागरिक उड्डयन
3. विमान सुरक्षा
4. अंतरिक्ष का शांतिपूर्ण उपयोग
5. अंतरिक्ष वस्तुओं से होने वाली क्षति
6. अंतरिक्ष में राज्य की जिम्मेदारी
आदि आते हैं।
केस - Aerial Incident at Lockerbie - 
Libya और United States/United Kingdom के बीच Lockerbie विमान विस्फोट से संबंधित विवाद ने अंतर्राष्ट्रीय विमानन सुरक्षा, आतंकवाद तथा संधि दायित्वों से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न उत्पन्न किए।
10 मानवाधिकार - 
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंतर्राष्ट्रीय विधि की विषय-वस्तु में मानवाधिकार का महत्व बहुत बढ़ गया।
इसमें शामिल हैं - 
1. जीवन का अधिकार
2. स्वतंत्रता
3. समानता
4. यातना से सुरक्षा
5. धार्मिक स्वतंत्रता
6. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
7. निष्पक्ष न्याय
8. महिलाओं और बच्चों के अधिकार
केस - Barcelona Traction Case (1970)
ICJ ने obligations erga omnes की अवधारणा को स्पष्ट किया। अर्थात कुछ दायित्व ऐसे होते हैं जिनका संबंध पूरे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से होता है।
महत्त्व - मानवाधिकारों के अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण के विकास में यह निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण है।
11. अंतर्राष्ट्रीय मानवीय विधि - 
युद्ध के समय भी कुछ नियम लागू होते हैं।
इसे International Humanitarian Law (IHL) कहते हैं।
इसके अंतर्गत - 
1. युद्धबंदियों का संरक्षण
2. नागरिकों की सुरक्षा
3. घायल सैनिकों का संरक्षण
4. अस्पतालों की सुरक्षा
5. युद्ध में साधनों और तरीकों की सीमाएँ
आदि आते हैं।
केस - Nicaragua v. United States (1986)
ICJ ने Nicaragua और United States के बीच विवाद में use of force, non-intervention तथा customary international law से संबंधित महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किए।
Importance - यह मामला बल प्रयोग और हस्तक्षेप के संबंध में अंतर्राष्ट्रीय विधि का महत्वपूर्ण स्रोत है।
12. अंतर्राष्ट्रीय अपराध विधि - 
आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय विधि में व्यक्ति भी कुछ परिस्थितियों में अंतर्राष्ट्रीय अपराधों के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार हो सकता है।
मुख्य अपराध
1. Genocide
2. War Crimes
3. Crimes against Humanity
4. Aggression
5. Prosecutor v. Tadić
ICTY के इस मामले ने अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक विधि तथा सशस्त्र संघर्षों से संबंधित महत्वपूर्ण सिद्धांत विकसित किए।
महत्त्व - इससे यह विचार मजबूत हुआ कि अंतर्राष्ट्रीय अपराधों के लिए केवल राज्य ही नहीं, बल्कि व्यक्ति भी अंतर्राष्ट्रीय विधि के अंतर्गत जिम्मेदार हो सकता है।
13. नागरिकता और Statelessness
किसी व्यक्ति और राज्य के बीच विधिक संबंध को नागरिकता कहते हैं।
अंतर्राष्ट्रीय विधि यह प्रश्न भी देखती है कि
1. नागरिकता कौन प्रदान कर सकता है?
2. दोहरी नागरिकता क्या है?
3. Stateless व्यक्ति की स्थिति क्या होगी?
4. किसी व्यक्ति को राजनयिक संरक्षण कब मिल सकता है?
केस - Nottebohm Case (Liechtenstein v. Guatemala), 1955
यह नागरिकता और genuine link के संदर्भ में प्रसिद्ध निर्णय है। ICJ ने नागरिकता के वास्तविक और प्रभावी संबंध की अवधारणा पर विचार किया।
14. शरणार्थी विधि - 
अंतर्राष्ट्रीय विधि उन व्यक्तियों की सुरक्षा से भी संबंधित है जो उत्पीड़न या गंभीर खतरे के कारण अपना देश छोड़ देते हैं।
मुख्य सिद्धांत है- Non-Refoulement
किसी व्यक्ति को ऐसी जगह वापस नहीं भेजना जहाँ उसके जीवन या स्वतंत्रता को गंभीर खतरा हो। यह आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय शरणार्थी कानून का महत्वपूर्ण सिद्धांत है।
15. अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण विधि - 
आज पर्यावरण संरक्षण अंतर्राष्ट्रीय विधि का अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बन गया है।
इसमें - 
1. जलवायु परिवर्तन
2. समुद्री प्रदूषण
3. वायु प्रदूषण
4. जैव-विविधता
5. सीमा-पार प्रदूषण
6. प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण
आदि शामिल हैं।
केस - Trail Smelter Arbitration
Canada और United States के बीच सीमा-पार प्रदूषण का विवाद था। इस मामले में यह सिद्धांत विकसित हुआ कि कोई राज्य अपने क्षेत्र का उपयोग इस प्रकार नहीं कर सकता कि उससे दूसरे राज्य के क्षेत्र को गंभीर क्षति हो।
महत्त्व - यह अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण विधि के विकास का ऐतिहासिक आधार माना जाता है।
16. अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक विधि - 
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और आर्थिक संबंध भी अंतर्राष्ट्रीय विधि की विषय-वस्तु में आते हैं।
इसमें - 
1. WTO
2. IMF
3. World Bank
4. International Trade
5. Foreign Investment
6. Bilateral Investment Treaties
7. आर्थिक प्रतिबंध - 
आदि शामिल हैं।
केस - US – Shrimp Case - 
WTO के इस विवाद में व्यापार और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन का प्रश्न उठा।
महत्त्व - अयह मामला बताता है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के नियमों और पर्यावरणीय संरक्षण के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जा सकता है।
17. अंतर्राष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण समाधान - 
अंतर्राष्ट्रीय विधि युद्ध के स्थान पर विवादों के शांतिपूर्ण समाधान को प्रोत्साहित करती है।
मुख्य साधन हैं- 
1. Negotiation
2. Mediation
3. Conciliation
4. Arbitration
5. Judicial Settlement
सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक संस्था है - 
International Court of Justice (ICJ)
केस - Corfu Channel Case (1949)- 
United Kingdom और Albania के बीच विवाद में ICJ ने राज्य की जिम्मेदारी, territorial sovereignty और evidence से जुड़े महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किए।
महत्त्व - यह ICJ के प्रारंभिक और अत्यंत महत्वपूर्ण मामलों में से एक है।
18. बल प्रयोग और सामूहिक सुरक्षा - 
संयुक्त राष्ट्र चार्टर के बाद अंतर्राष्ट्रीय विधि में राज्यों द्वारा बल प्रयोग पर महत्वपूर्ण सीमाएँ लगाई गई हैं।
मुख्य सिद्धांत- राज्य दूसरे राज्य के विरुद्ध बल का प्रयोग नहीं कर सकता।
अपवादों में प्रमुख रूप से - Security Council द्वारा अधिकृत कार्रवाई आत्मरक्षा शामिल हैं।
केस - Nicaragua Case - 
इस मामले में ICJ ने use of force और principle of non-intervention से संबंधित महत्वपूर्ण सिद्धांत स्पष्ट किए।
19. अंतर्राष्ट्रीय संगठन - 
अंतर्राष्ट्रीय संगठन भी आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय विधि की महत्वपूर्ण विषय-वस्तु हैं।
उदाहरण- 
1. United Nations
2. WHO
3. WTO
4. UNESCO
5. IMF
6. World Bank
7. ICAO
केस - Reparation for Injuries Suffered in the Service of the United Nations (1949) - 
यह अत्यंत प्रसिद्ध ICJ Advisory Opinion है। प्रश्न था कि क्या संयुक्त राष्ट्र के पास अंतर्राष्ट्रीय विधि के अंतर्गत विधिक व्यक्तित्व और अपने अधिकारियों को हुई क्षति के लिए दावा करने की क्षमता है। ICJ ने संयुक्त राष्ट्र की international legal personality को स्वीकार किया।
महत्त्व - इस निर्णय ने अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की विधिक व्यक्तित्व की अवधारणा को मजबूत किया।
अंतर्राष्ट्रीय विधि की बदलती विषय-वस्तु - 
अंतर्राष्ट्रीय विधि पहले मुख्यतः राज्यों के बीच संबंधों तक सीमित मानी जाती थी।
लेकिन आज इसकी विषय-वस्तु काफी व्यापक हो चुकी है। इसे इस प्रकार समझ सकते हैं - 
परंपरागत अंतर्राष्ट्रीय विधि
राज्य → राज्य से विकसित होकर
आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय विधि
राज्य → राज्य, राज्य → अंतर्राष्ट्रीय संगठन, अंतर्राष्ट्रीय संगठन → राज्य, राज्य → व्यक्ति, व्यक्ति → अंतर्राष्ट्रीय न्याय, मानवता → वैश्विक संरक्षण तक पहुँच।
महत्वपूर्ण निर्णीत वाद एक नजर में
वाद प्रमुख सिद्धांत - 
1. S.S. Lotus (1927) राज्य क्षेत्राधिकार एवं संप्रभुता
2. Factory at Chorzów (1928) क्षतिपूर्ति एवं Reparation
3. Corfu Channel (1949) राज्य की जिम्मेदारी एवं क्षेत्रीय संप्रभुता
4. Reparation for Injuries (1949) अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की विधिक व्यक्तित्व
5. Nottebohm (1955) नागरिकता एवं Genuine Link
6. North Sea Continental Shelf (1969) समुद्री सीमा एवं प्रथागत विधि
7. Barcelona Traction (1970) Erga Omnes Obligations
8. Nicaragua v. USA (1986) बल प्रयोग एवं Non-Intervention
9. US Diplomatic Staff in Tehran (1980) राजनयिक संरक्षण
10. Trail Smelter Arbitration सीमा-पार पर्यावरणीय क्षति
11. Tadić व्यक्तिगत अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक जिम्मेदारी
12. US – Shrimp व्यापार एवं पर्यावरण
13. Qatar v. Bahrain अंतर्राष्ट्रीय समझौतों की बाध्यकारी प्रकृति
निष्कर्ष - 
अतः अंतर्राष्ट्रीय विधि की विषय-वस्तु अत्यंत व्यापक और गतिशील है। प्रारंभ में इसका मुख्य उद्देश्य राज्यों के बीच युद्ध, शांति, संधि और राजनयिक संबंधों को नियंत्रित करना था, किंतु वर्तमान में इसका विस्तार मानवाधिकार, पर्यावरण, समुद्र, वायु, अंतरिक्ष, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, निवेश, अंतर्राष्ट्रीय अपराध, शरणार्थी, अंतर्राष्ट्रीय संगठन और वैश्विक सुरक्षा तक हो गया है।
निर्णीत वादों ने इस विषय-वस्तु को केवल सैद्धांतिक नहीं रहने दिया, बल्कि व्यावहारिक रूप प्रदान किया है। 

1.  Lotus                    क्षेत्राधिकार
2. Chorzów Factory  क्षतिपूर्ति
3. Corfu Channel      राज्य-जिम्मेदारी 4. Barcelona Traction 
                                  erga omnes                                            दायित्व
5. Nicaragua             बल-प्रयोग 
6. Reparation for Injuries - अंतर्राष्ट्रीय संगठनों की विधिक व्यक्तित्व की अवधारणा को विकसित किया।
इसलिए कहा जा सकता है कि अंतर्राष्ट्रीय विधि की विषय-वस्तु मूलतः अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में शांति, सहयोग, न्याय, उत्तरदायित्व और मानव गरिमा को सुनिश्चित करने वाले सभी प्रमुख विधिक संबंधों का समुच्चय है।

अंतरराष्ट्रीय विधि की परिभाषाएँ - 
अंतराष्ट्रीय विधि की परिभाषा, परिभाषाओं में अंतर है और आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में स्वीकार्य दृष्टिकोण - 
1. जेरेमी बेंथम की परिभाषा - 
अंतरराष्ट्रीय विधि के संदर्भ में Jeremy Bentham ने “International Law” शब्द के प्रयोग को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उनके अनुसार अंतरराष्ट्रीय विधि मुख्यतः राज्यों के बीच संबंधों को नियंत्रित करने वाले नियमों से संबंधित है।
बेंथम के समय अंतरराष्ट्रीय विधि का प्रमुख केंद्र राज्य था। इसलिए उनकी अवधारणा में व्यक्ति की भूमिका लगभग नगण्य थी।
इस दृष्टिकोण में अंतरराष्ट्रीय विधि के प्रमुख विषय थे - 
1. राज्यों के बीच युद्ध और शांति
2. संधियाँ
3. राजनयिक संबंध
4. राज्यों के अधिकार
5. राज्यों के दायित्व
महत्त्व - बेंथम की अवधारणा ने International Law को एक विशिष्ट विधिक क्षेत्र के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
2. L.ओपेनहाइम की परिभाषा - 
अंतरराष्ट्रीय विधि उन प्रथागत और संधि-आधारित नियमों का समूह है जिन्हें राज्य एक-दूसरे के साथ अपने संबंधों में विधिक रूप से बाध्यकारी मानते हैं।
इस परिभाषा के प्रमुख तत्व - 
1. Customary Rules - राज्यों की दीर्घकालीन प्रथा से विकसित नियम।
2. Conventional Rules - संधियों और अंतरराष्ट्रीय समझौतों से उत्पन्न नियम।
3. Legally Binding - नियम केवल नैतिक सलाह नहीं होते, बल्कि विधिक दायित्व उत्पन्न करते हैं।
4. States - ओपेनहाइम के समय अंतरराष्ट्रीय विधि का प्रमुख विषय राज्य था।
इस परिभाषा की सीमा - आधुनिक समय में यह परिभाषा कुछ हद तक सीमित मानी जाती है क्योंकि आज अंतरराष्ट्रीय विधि में अंतरराष्ट्रीय संगठन और व्यक्ति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
3. William Edward Hall - अंतरराष्ट्रीय विधि को राज्यों के बीच संबंधों को नियंत्रित करने वाले नियमों के रूप में देखा जाना चाहिए।
अर्थात अंतरराष्ट्रीय विधि मुख्यतः उन नियमों से बनी है जिन्हें राज्य अपने आपसी संबंधों में स्वीकार करते हैं।
विशेषता - हॉल की परिभाषा में भी State-centric approach दिखाई देती है। राज्य अंतरराष्ट्रीय विधि का प्रमुख विषय, यह दृष्टिकोण पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय विधि का प्रतिनिधित्व करता है।
4. T. J. Lawrence - अंतरराष्ट्रीय विधि सभ्य राज्यों के बीच संबंधों को नियंत्रित करने वाले नियमों की व्यवस्था है।
उनकी अवधारणा का केंद्र भी राज्य ही था। जब दो या अधिक राज्य - 
1. व्यापार करते हैं
2. संधि करते हैं
3. युद्ध करते हैं
4. शांति स्थापित करते हैं
5. राजनयिक संबंध स्थापित करते हैं
तो उनके व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय नियमों की आवश्यकता होती है। इन्हीं नियमों को अंतरराष्ट्रीय विधि कहा जाता है।
5. J.G. Starke - ने आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि की व्यापक अवधारणा प्रस्तुत की। उनके अनुसार अंतरराष्ट्रीय विधि उन विधिक नियमों और सिद्धांतों का समूह है जो मुख्यतः राज्यों के बीच संबंधों को नियंत्रित करते हैं और आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं तथा कुछ हद तक व्यक्तियों से संबंधित नियम भी सम्मिलित हैं।
विशेष महत्व - स्टॉर्क की परिभाषा पारंपरिक और आधुनिक दृष्टिकोण के बीच पुल का कार्य करती है। इसमें राज्य + अंतरराष्ट्रीय संगठन + व्यक्ति = आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि के विषय
6. Hugo Grotius (ग्रोशियस) का दृष्टिकोण - (अंतरराष्ट्रीय विधि का संस्थापक) के अनुसार अंतराष्ट्रीय विधि से राज्यों के बीच संबंध कुछ विधिक और कुछ नैतिक सिद्धांतों से नियंत्रित होते हैं।
उन्होंने युद्ध और शांति, समुद्र, संधियों तथा राज्यों के संबंधों को प्राकृतिक विधि और तर्क के आधार पर समझाने का प्रयास किया।
ग्रोशियस का महत्व - उनके विचारों ने यह स्थापित करने में सहायता की कि - 
1. राज्य अंतरराष्ट्रीय समाज में पूर्णतः निरंकुश नहीं हैं।
2. उनके व्यवहार पर कुछ सामान्य विधिक सिद्धांत लागू होते हैं।
7. जॉन ऑस्टिन का दृष्टिकोण - 
अंतरराष्ट्रीय विधि को सामान्य नगरपालिका विधि के समान वास्तविक विधि नहीं माना।
उनके command theory के अनुसार विधि - सर्वोच्च संप्रभु का आदेश + उसका पालन + दंड की व्यवस्था पर आधारित होती है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय समाज में कोई एक सर्वोच्च संप्रभु सत्ता नहीं है। इसलिए ऑस्टिनवादी दृष्टिकोण में अंतरराष्ट्रीय विधि को उन्होंने मूलतः positive morality के क्षेत्र में रखा।
जैसे भारत में संसद कानून बनाती है। कानून का उल्लंघन होने पर राज्य की संस्थाएँ उसे लागू करा सकती हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई ऐसी सर्वोच्च विश्व सरकार नहीं है जो प्रत्येक राज्य को उसी प्रकार आदेश दे सके। यह दृष्टिकोण आज पूरी तरह स्वीकार नहीं किया जाता क्योंकि - 
1. अंतरराष्ट्रीय संधियाँ बाध्यकारी होती हैं।
2. customary international law अस्तित्व में है।
3. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय हैं।
4. अंतरराष्ट्रीय संगठन हैं।
5. राज्यों पर अंतरराष्ट्रीय दायित्व होते हैं।
6. उल्लंघन पर विभिन्न प्रकार के अंतरराष्ट्रीय परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं।
इसलिए अंतरराष्ट्रीय विधि को केवल नैतिकता मानना आधुनिक दृष्टिकोण से उचित नहीं है।
8. हैन्स केल्सन ने अंतरराष्ट्रीय विधि को वास्तविक विधि के रूप में स्वीकार किया।
उनकी Pure Theory of Law के अनुसार विधि की वैधता एक व्यवस्थित normative structure में समझी जानी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय विधि नियमों की ऐसी व्यवस्था है जो राज्यों के व्यवहार को नियंत्रित करती है।
महत्व - केल्सन का दृष्टिकोण ऑस्टिन से अलग है।
ऑस्टिन पूछते हैं - आदेश देने वाला सर्वोच्च कौन है?
केल्सन पूछते हैं - किस विधिक नियम के आधार पर कोई नियम वैध है?
इसलिए केल्सन अंतरराष्ट्रीय विधि की विधिक प्रकृति को स्वीकार करने में अधिक समर्थ दिखाई देते हैं।
9. लार्ड मैकनेयर ने - अंतरराष्ट्रीय विधि में राज्यों द्वारा स्वीकार किए गए दायित्वों के महत्व पर बल दिया। उनका दृष्टिकोण यह स्पष्ट करता है कि अंतरराष्ट्रीय विधि केवल राजनीतिक समझौते नहीं है। राज्य जब अंतरराष्ट्रीय दायित्व स्वीकार करते हैं तो उन दायित्वों का विधिक महत्व होता है।
10. आधुनिक व्यापक दृष्टिकोण
आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि अब इसकी परिभाषा केवल “States के बीच नियम” कहकर पूरी नहीं की जा सकती।
आज अंतरराष्ट्रीय विधि में शामिल हैं - 
जैसे भारत, फ्रांस, अमेरिका आदि।
राज्य या अन्य अंतरराष्ट्रीय कर्ता के - 
1. अंतरराष्ट्रीय संगठन
जैसे संयुक्त राष्ट्र और उसके विभिन्न 
2. निकाय।
3. व्यक्ति
4. मानवाधिकार
5. अंतरराष्ट्रीय अपराध
6. युद्ध अपराध
7. नरसंहार
8. मानवता के विरुद्ध अपराध
कुछ परिस्थितियों में गैर-राज्यीय संस्थाओं की भूमिका भी सामने आती है।
11. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के संदर्भ में परिभाषा - 
अंतरराष्ट्रीय विधि के स्रोतों को समझने के लिए ICJ Statute का Article 38(1) अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसमें न्यायालय द्वारा लागू किए जाने वाले प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं - 
1. International Conventions
2. International Custom
3. General Principles of Law
4. न्यायिक निर्णय और विद्वानों के लेखन को सहायक साधन के रूप में।
इससे अंतरराष्ट्रीय विधि की वास्तविक संरचना समझने में सहायता मिलती है।
परिभाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन - 
विधिवेत्ता मुख्य आधार दृष्टिकोण - 
• Bentham राज्यों के बीच संबंध राज्य-केंद्रित
• Oppenheim प्रथागत एवं संधि-आधारित नियम राज्य-केंद्रित
• Hall राज्यों के संबंधों के नियम पारंपरिक
• Lawrence राज्यों के बीच संबंध पारंपरिक
• Starke राज्य + अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ + व्यक्ति आधुनिक
• Grotius प्राकृतिक विधि, तर्क, राज्य संबंध दार्शनिक
• Austin संप्रभु आदेश का अभाव अंतरराष्ट्रीय विधि की आलोचना
• Kelsen विधिक नियमों की normative व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय विधि को वास्तविक विधि मानता है।
13. इन परिभाषाओं से निकलने वाले मुख्य तत्व - अलग-अलग परिभाषाओं का अध्ययन करने पर अंतरराष्ट्रीय विधि के निम्नलिखित तत्व सामने आते हैं - 
• यह विधिक नियमों की व्यवस्था है
• यह केवल राजनीतिक घोषणाओं या नैतिक उपदेशों का समूह नहीं है।
•  राज्य इसके प्रमुख विषय हैं।
• इसके प्रमुख स्रोत संधि और प्रथा हैं
• अंतरराष्ट्रीय विधि का बड़ा भाग Treaty + Custom से विकसित होता है।
• इसमें अधिकार और दायित्व दोनों होते हैं
राज्य को केवल अधिकार प्राप्त नहीं होते, बल्कि उस पर अंतरराष्ट्रीय दायित्व भी होते हैं।
• इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय समाज में व्यवस्था बनाए रखना है
अंतरराष्ट्रीय विधि का अंतिम उद्देश्य राज्यों और अन्य अंतरराष्ट्रीय कर्ताओं के बीच शांतिपूर्ण, व्यवस्थित और विधिसम्मत संबंध स्थापित करना है।

अंतरराष्ट्रीय विधि (International Law) और नगरपालिका/राष्ट्रीय विधि (Municipal or National Law) के बीच संबंध - अंतरराष्ट्रीय विधि के सबसे महत्वपूर्ण सैद्धांतिक विषयों में से एक है। इसे समझने के लिए एकवाद (Monism), द्वैतवाद (Dualism), समन्वयवादी दृष्टिकोण तथा भारतीय स्थिति को समझना आवश्यक है।अंतरराष्ट्रीय विधि एवं नगरपालिका/राष्ट्रीय विधि के बीच संबंध - 

अंतरराष्ट्रीय विधि उन नियमों और सिद्धांतों का समूह है जो मुख्यतः राज्यों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों तथा अन्य मान्य अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तियों के बीच संबंधों को नियंत्रित करते हैं। इसके विपरीत, नगरपालिका या राष्ट्रीय विधि किसी राज्य की आंतरिक विधि है, जो उस राज्य के क्षेत्र में व्यक्तियों, संस्थाओं तथा राज्य के बीच संबंधों को नियंत्रित करती है। उदाहरण के लिए - 

• भारत और किसी दूसरे देश के बीच संधि का संबंध → अंतरराष्ट्रीय विधि

• भारत में नागरिक और सरकार के बीच अधिकारों का संबंध → राष्ट्रीय विधि

यदि अंतरराष्ट्रीय विधि और राष्ट्रीय विधि में विरोध हो जाए, तो किसे प्राथमिकता मिलेगी और अंतरराष्ट्रीय नियम देश के घरेलू न्यायालयों में कैसे लागू होंगे?

2. अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय विधि में अंतर

आधार अंतरराष्ट्रीय विधि राष्ट्रीय/नगरपालिका विधि
क्षेत्र राज्यों एवं अंतरराष्ट्रीय विधिक संस्थाओं के संबंध राज्य के भीतर के संबंध
प्रमुख विषय राज्य, अंतरराष्ट्रीय संगठन आदि व्यक्ति, कंपनियाँ, संस्थाएँ एवं राज्य
निर्माण के स्रोत संधियाँ, प्रथा, सामान्य विधिक सिद्धांत आदि संविधान, संसद/विधानमंडल, न्यायिक निर्णय आदि
प्रवर्तन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न तंत्र घरेलू न्यायालय एवं प्रशासन
क्षेत्राधिकार मुख्यतः अंतरराष्ट्रीय राज्य की सीमा के भीतर
उदाहरण UN Charter, treaties भारतीय संविधान, BNS, Contract Act
हालाँकि दोनों के क्षेत्र अलग हैं, लेकिन आधुनिक समय में दोनों के बीच संबंध बहुत घनिष्ठ हो गया है।
3. अंतरराष्ट्रीय विधि और राष्ट्रीय विधि के संबंध के प्रमुख सिद्धांत - 
इस संबंध को मुख्यतः तीन सिद्धांतों के माध्यम से समझाया जाता है—
A. एकवाद का सिद्धांत (Monism) - अर्थ - एकवाद के अनुसार अंतरराष्ट्रीय विधि और राष्ट्रीय विधि एक ही विधिक व्यवस्था के अंग हैं। इस सिद्धांत में दोनों के बीच मूलभूत विभाजन नहीं माना जाता। एकवादी विचारधारा के प्रमुख समर्थकों में Hans Kelsen और Georges Scelle का नाम लिया जाता है।
विशेषताएँ
A. अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय विधि एक ही विधिक व्यवस्था का हिस्सा हैं।
B. अंतरराष्ट्रीय नियमों को घरेलू विधि में लागू करने के लिए प्रत्येक स्थिति में अलग से नया कानून बनाना आवश्यक नहीं माना जाता।
C. परिस्थितियों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय विधि राष्ट्रीय विधि पर प्राथमिकता प्राप्त कर सकती है।
D. व्यक्ति को भी कुछ परिस्थितियों में अंतरराष्ट्रीय विधि के अधिकार एवं दायित्व प्राप्त हो सकते हैं।
उदाहरण - यदि कोई अंतरराष्ट्रीय संधि सीधे लागू होने योग्य है और राष्ट्रीय कानून से उसका विरोध होता है, तो एकवादी दृष्टिकोण में संधि के नियम को प्राथमिकता दिए जाने की संभावना होती है।
B. द्वैतवाद का सिद्धांत (Dualism) - 
द्वैतवाद के अनुसार अंतरराष्ट्रीय विधि और राष्ट्रीय विधि दो अलग-अलग विधिक व्यवस्थाएँ हैं। इस सिद्धांत के प्रमुख समर्थकों में— Triepel, Anzilotti का उल्लेख किया जाता है।
द्वैतवाद के अनुसार अंतर - 
अंतरराष्ट्रीय विधि राष्ट्रीय विधि राज्यों के बीच संबंध व्यक्तियों एवं राज्य के आंतरिक संबंध अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में लागू घरेलू क्षेत्र में लागू अंतरराष्ट्रीय स्रोतों से उत्पन्न राष्ट्रीय विधायिका/संविधान से उत्पन्न अंतरराष्ट्रीय दायित्व घरेलू विधिक दायित्व आदि।
मुख्य सिद्धांत - किसी अंतरराष्ट्रीय संधि पर राज्य द्वारा हस्ताक्षर कर देने मात्र से वह संधि स्वतः घरेलू न्यायालय में लागू नहीं हो जाती। यदि संधि के प्रावधानों को घरेलू स्तर पर लागू करना है, तो आवश्यक होने पर राष्ट्रीय कानून बनाया जाना चाहिए।
किसी राज्य की— संविधान व्यवस्था,
न्यायिक प्रणाली, संसद की भूमिका, संधियों से संबंधित कानून यह निर्धारित करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय नियम घरेलू कानून में किस प्रकार लागू होंगे।
C. समन्वयवादी/मध्यवर्ती दृष्टिकोण
आधुनिक विधिवेत्ता पूर्ण एकवाद या पूर्ण द्वैतवाद को हर परिस्थिति में पर्याप्त नहीं मानते। व्यवहार में अधिकांश देशों की व्यवस्था दोनों सिद्धांतों का मिश्रण दिखाई देती है।
4. राष्ट्रीय विधि और अंतरराष्ट्रीय विधि में संघर्ष - 
यदि अंतरराष्ट्रीय विधि और राष्ट्रीय विधि में टकराव हो जाए तो क्या होगा? इसका उत्तर दो स्तरों पर दिया जाता है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई राज्य अपने आंतरिक कानून का सहारा लेकर अंतरराष्ट्रीय दायित्व से बच नहीं सकता।इस सिद्धांत को Vienna Convention on the Law of Treaties, 1969 के अनुच्छेद 27 में स्पष्ट रूप से मान्यता दी गई है। अर्थात कोई राज्य यह नहीं कह सकता कि— मेरे देश का घरेलू कानून इस संधि को लागू करने की अनुमति नहीं देता, इसलिए मैं अपने अंतरराष्ट्रीय दायित्व का पालन नहीं करूंगा।
5. घरेलू न्यायालयों के स्तर पर स्थिति - घरेलू न्यायालयों में स्थिति अलग हो सकती है। यदि किसी अंतरराष्ट्रीय संधि को लागू करने के लिए घरेलू कानून आवश्यक है, तो न्यायालय उस संधि को सीधे लागू करने में सक्षम नहीं भी हो सकता। इसलिए अंतरराष्ट्रीय दायित्व और घरेलू न्यायालय में उसके प्रत्यक्ष प्रवर्तन को अलग-अलग समझना चाहिए।
भारत में अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय विधि का संबंध - 
भारत की स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारतीय संविधान में अंतरराष्ट्रीय विधि से संबंधित कई प्रावधान हैं।
अनुच्छेद 51 - भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51 राज्य को निर्देश देता है कि वह—
• अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा दे
• राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण और सम्मानजनक संबंध बनाए रखे
• अंतरराष्ट्रीय विधि एवं संधि दायित्वों के प्रति सम्मान बढ़ाए
• अंतरराष्ट्रीय विवादों के मध्यस्थता द्वारा समाधान को प्रोत्साहित करे।
यह राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों का हिस्सा है।
अनुच्छेद 253 - भारत में अंतरराष्ट्रीय संधियों को घरेलू स्तर पर लागू करने के संबंध में अनुच्छेद 253 अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके अनुसार संसद को ऐसी संधियों, समझौतों और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में किए गए निर्णयों को लागू करने के लिए कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है। इससे स्पष्ट होता है कि भारत में अंतरराष्ट्रीय दायित्व को घरेलू कानून में लागू करने में संसद की महत्वपूर्ण भूमिका है।
अनुच्छेद 73 - संघ की कार्यपालिका शक्ति उन विषयों तक भी विस्तारित हो सकती है जिनके संबंध में भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिकार और दायित्व प्राप्त हैं। हालाँकि जहाँ किसी विषय को नियंत्रित करने के लिए संसद ने कानून बना दिया हो, वहाँ कार्यपालिका की शक्ति उस कानून के अधीन होगी। भारतीय न्यायालयों ने अनेक मामलों में अंतरराष्ट्रीय विधि के सिद्धांतों का उपयोग किया है।Vishaka v. State of Rajasthan, 1997 - यह अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय है।कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संबंधित घरेलू कानून के अभाव में सर्वोच्च न्यायालय ने CEDAW (Convention on the Elimination of All Forms of Discrimination Against Women) जैसे अंतरराष्ट्रीय मानकों का सहारा लिया। न्यायालय ने अंतरराष्ट्रीय मानकों को भारतीय संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप माना और Vishaka Guidelines जारी कीं।महत्व - इस निर्णय ने स्पष्ट किया कि जहाँ घरेलू कानून में कोई रिक्तता हो और अंतरराष्ट्रीय मानक भारतीय संविधान के मूल अधिकारों के अनुरूप हों, वहाँ न्यायालय उनकी सहायता से संवैधानिक अधिकारों की व्याख्या कर सकता है।
Jolly George Varghese v. Bank of Cochin, 1980 - इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने International Covenant on Civil and Political Rights (ICCPR) के संदर्भ में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और ऋण की अदायगी से संबंधित प्रश्न पर विचार किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय संधि के प्रावधानों का उपयोग घरेलू कानून की स्पष्ट भाषा को बदलने के लिए नहीं किया जा सकता।
सिद्धांत - अंतरराष्ट्रीय विधि घरेलू कानून की व्याख्या में सहायक हो सकती है, लेकिन वह स्पष्ट घरेलू कानून का स्थान नहीं ले सकती।
Gramophone Company of India Ltd. v. Birendra Bahadur Pandey, 1984 - इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अंतरराष्ट्रीय विधि और भारतीय नगरपालिका विधि के संबंध पर महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। न्यायालय ने यह माना कि जहाँ घरेलू कानून और अंतरराष्ट्रीय विधि में कोई स्पष्ट विरोध नहीं है, वहाँ भारतीय न्यायालय अंतरराष्ट्रीय विधि के नियमों को मान्यता देने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। लेकिन यदि संसद का स्पष्ट कानून अंतरराष्ट्रीय नियम से टकराता है, तो घरेलू न्यायालय में संसद के कानून को प्रभावी माना जाएगा, क्योंकि घरेलू न्यायालय अपने अधिकार संसद के कानून से प्राप्त करते हैं।
15. महत्वपूर्ण सिद्धांत
भारत में न्यायिक दृष्टिकोण को इस प्रकार समझ सकते हैं
1. अंतरराष्ट्रीय विधि को पूरी तरह नजर अंदाज नहीं किया जाता।
2. जहाँ घरेलू कानून में अस्पष्टता या रिक्तता हो, वहाँ अंतरराष्ट्रीय विधि व्याख्या में सहायता कर सकती है।
3. अंतरराष्ट्रीय कानून का प्रयोग संविधान के मूल अधिकारों के अनुरूप किया जा सकता है।
4. यदि संसद ने किसी विषय पर स्पष्ट कानून बनाया है और अंतरराष्ट्रीय नियम उससे टकराता है, तो घरेलू न्यायालय सामान्यतः संसद के कानून को लागू करेगा।
अंतरराष्ट्रीय विधि और राष्ट्रीय विधि के संबंध को याद रखने का आसान सूत्र - संधि →अंतरराष्ट्रीय दायित्व; संसद→ घरेलू कार्यान्वयन, न्यायालय→ व्याख्या।भारत में सामान्यतः स्थिति को इस प्रकार समझा जा सकता है:
International Treaty - भारत का अंतरराष्ट्रीय दायित्व - आवश्यक होने पर संसद द्वारा कानून - ८घरेलू न्यायालय द्वारा कार्यान्वयन/व्याख्या
दोनों विधियों में समन्वय का महत्व - आधुनिक विश्व में अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय विधि को पूरी तरह अलग-अलग रखना कठिन है। मानवाधिकार, पर्यावरण, व्यापार, समुद्री कानून, अंतरराष्ट्रीय अपराध, शरणार्थी संरक्षण, अंतरराष्ट्रीय निवेश और वैश्विक स्वास्थ्य जैसे विषयों में दोनों विधि-व्यवस्थाएँ एक-दूसरे से लगातार जुड़ी हुई हैं। इसलिए आज का दृष्टिकोण टकराव की अपेक्षा समन्वय पर अधिक केंद्रित है।
निष्कर्ष - अंतरराष्ट्रीय विधि और नगरपालिका/राष्ट्रीय विधि दो अलग-अलग स्तरों पर कार्य करती हैं, लेकिन आधुनिक विधिक व्यवस्था में उनका संबंध अत्यंत घनिष्ठ है। एकवाद दोनों को एक ही विधिक व्यवस्था के रूप में देखता है, जबकि द्वैतवाद दोनों को स्वतंत्र एवं पृथक विधिक व्यवस्थाएँ मानता है। आधुनिक राज्य व्यवहार में इन दोनों के बीच एक व्यावहारिक समन्वय दिखाई देता है। भारत में अंतरराष्ट्रीय विधि को विशेष महत्व प्राप्त है। संविधान का अनुच्छेद 51 अंतरराष्ट्रीय विधि के प्रति सम्मान को प्रोत्साहित करता है और अनुच्छेद 253 संसद को अंतरराष्ट्रीय संधियों एवं समझौतों को लागू करने के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है। भारतीय न्यायालय भी अंतरराष्ट्रीय विधि का उपयोग, विशेषकर घरेलू कानून में अस्पष्टता या रिक्तता होने पर, संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप व्याख्या करने में करते हैं।अतः कहा जा सकता है कि अंतरराष्ट्रीय विधि और राष्ट्रीय विधि परस्पर विरोधी होने के बजाय आधुनिक विधि-व्यवस्था में परस्पर पूरक और समन्वयकारी भूमिका निभाती हैं।

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice – ICJ) 
संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुच्छेद 38 में अंतरराष्ट्रीय विधि का बहुत महत्वपूर्ण प्रावधान है। इसे अंतरराष्ट्रीय विधि के स्रोत बताने वाला अनुच्छेद कहा जाता है।
अनुच्छेद 38 का मूल उद्देश्यICJ जब किसी अंतरराष्ट्रीय विवाद का निर्णय करता है, तो उसे यह देखना होता है कि किस विधि या नियम के आधार पर निर्णय दिया जाए। अनुच्छेद 38(1) के अनुसार न्यायालय निम्नलिखित को लागू करता है - 1. अंतरराष्ट्रीय अभिसमय/संधियाँ (International Conventions)
2. अंतरराष्ट्रीय प्रथा (International Custom)
3. सभ्य राष्ट्रों द्वारा मान्यता प्राप्त विधि के सामान्य सिद्धांत (General Principles of Law)
4. न्यायिक निर्णय एवं विद्वानों की श्रेष्ठतम रचनाएँ, सहायक साधन के रूप में
अंतरराष्ट्रीय अभिसमय या संधियाँ
अनुच्छेद 38(1)(a) के अनुसार वे अंतरराष्ट्रीय conventions, चाहे सामान्य हों या विशेष, जिनमें विवाद करने वाले राज्य पक्षकार हैं, न्यायालय के लिए लागू नियमों का स्रोत हैं। सरल भाषा में जब दो या अधिक राज्य किसी विषय पर संधि करते हैं और उस संधि के पक्षकार हैं, तो उस संधि में निर्धारित नियम उनके बीच लागू हो सकते हैं। उदाहरण - संयुक्त राष्ट्र चार्टर, समुद्र संबंधी अंतरराष्ट्रीय अभिसमय, मानवाधिकार संबंधी संधियाँ, राजनयिक संबंधों से संबंधित संधियाँ।
विशेषसंधि उसके पक्षकार राज्यों को बाध्य करती है। इसलिए ICJ के सामने विवाद में यह देखना महत्वपूर्ण है कि संबंधित राज्य उस संधि के पक्षकार हैं या नहीं।
अंतरराष्ट्रीय प्रथायह अनुच्छेद 38(1)(b) का विषय है। इसे International Custom, as evidence of a general practice accepted as law कहा जाता है। अर्थात ऐसी सामान्य राज्य-प्रथा, जिसे राज्य कानून के रूप में स्वीकार करते हैं, अंतरराष्ट्रीय प्रथा के दो प्रमुख तत्व माने जाते हैं - 
(क) राज्य-व्यवहार या सामान्य प्रथाराज्य किसी प्रकार का व्यवहार लगातार और सामान्य रूप से करते हैं। इसे State Practice कहा जाता है।
(ख) Opinio Jurisराज्य यह मानते हैं कि वे ऐसा व्यवहार केवल सुविधा या परंपरा के कारण नहीं, बल्कि कानूनी दायित्व होने के कारण कर रहे हैं इसे Opinio Juris कहते हैं। उदाहरण - 
राजनयिकों को कुछ विशेष प्रकार की सुरक्षा प्राप्त होना लंबे समय तक राज्य-प्रथा और कानूनी विश्वास के आधार पर विकसित हुआ।
महत्वपूर्ण मामलाNorth Sea Continental Shelf Cases (1969) में ICJ ने customary international law के निर्माण में state practice और opinio juris के महत्व पर चर्चा की।
विधि के सामान्य सिद्धांत - यह अनुच्छेद 38(1)(c) में दिया गया है। इसका अर्थ है - सभ्य राष्ट्रों द्वारा मान्यता प्राप्त विधि के सामान्य सिद्धांत। ये ऐसे मूलभूत कानूनी सिद्धांत हैं जिन्हें विभिन्न देशों की विधि-व्यवस्थाएँ सामान्यतः स्वीकार करती हैं।
उदाहरण - Good faith (सद्भावना), न्याय के सिद्धांत Res judicata अर्थात 
• एक बार अंतिम रूप से तय मामले को दोबारा उसी रूप में नहीं उठाया जाना।
• कोई व्यक्ति अपने ही गलत कार्य से लाभ नहीं उठा सकता।
• किसी अधिकार के प्रयोग में मनमानी नहीं की जानी चाहिए।
इन सिद्धांतों का उपयोग विशेष रूप से तब महत्वपूर्ण हो सकता है जब किसी विवाद पर सीधे लागू होने वाली संधि या प्रथा स्पष्ट न हो।
न्यायिक निर्णययह अनुच्छेद 38(1)(d) में आता है। ICJ के अनुसार न्यायिक निर्णय स्वयं अंतरराष्ट्रीय विधि का प्राथमिक स्रोत नहीं हैं, बल्कि वे subsidiary means, अर्थात सहायक साधन हैं। इनमें शामिल हो सकते हैं 
• ICJ के निर्णय
• अन्य अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरणों के निर्णय
• राष्ट्रीय न्यायालयों के महत्वपूर्ण निर्णय
महत्वपूर्ण बातICJ के किसी निर्णय का प्रभाव उस मामले के पक्षकारों और उसी विशेष मामले तक सीमित होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि ICJ का एक फैसला स्वतः पूरी दुनिया के लिए कानून बना देता है।
6. विद्वानों की रचनाएँअनुच्छेद 38(1)(d) में teachings of the most highly qualified publicists का उल्लेख है। अर्थात अंतरराष्ट्रीय विधि के प्रख्यात एवं योग्य विद्वानों की रचनाएँ भी अंतरराष्ट्रीय विधि के नियमों को समझने में सहायक साधन हैं। 
उदाहरणअंतरराष्ट्रीय विधि के प्रमुख विद्वानों की पुस्तकें, शोध एवं व्याख्याएँ।
इनका काम यह बताने में सहायता करना है कि किसी अंतरराष्ट्रीय नियम का अर्थ और विकास क्या है।
Note - विद्वानों की पुस्तक स्वयं कानून नहीं बनाती, बल्कि कानून की पहचान और व्याख्या में सहायता करती है।
Ex Aequo et Bono का विशेष प्रावधान - अनुच्छेद 38(2) के अनुसार ICJ किसी विवाद का निर्णय ex aequo et bono के आधार पर तभी कर सकता है जब विवाद के पक्षकार स्पष्ट रूप से इसके लिए सहमत हों। Ex Aequo et Bono का अर्थ है कठोर कानूनी नियमों के बजाय न्याय, निष्पक्षता और उचितता के आधार पर निर्णय करना। अर्थात यदि दोनों पक्ष सहमत हों कि न्यायालय कठोर कानूनी नियमों के बजाय न्याय और निष्पक्षता को आधार बनाकर निर्णय दे, तो ऐसा किया जा सकता है।
अनुच्छेद 38 की संरचना एक नजर में
प्रावधान स्रोत - 
38(1)(a) International Conventions अंतरराष्ट्रीय संधियाँ
38(1)(b) International Custom अंतरराष्ट्रीय प्रथा
38(1)(c) General Principles of Law विधि के सामान्य सिद्धांत
38(1)(d) Judicial Decisions न्यायिक निर्णय, सहायक साधन
38(1)(d) Teachings of Publicists प्रख्यात विधिवेत्ताओं की रचनाएँ, सहायक साधन
38(2) Ex Aequo et Bono पक्षकारों की सहमति से न्याय एवं निष्पक्षता के आधार पर निर्णय
क्या अनुच्छेद 38 में स्रोतों की “श्रेष्ठता” का क्रम है? - अनुच्छेद 38 में स्रोतों को (a), (b), (c), (d) के रूप में रखा गया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर परिस्थिति में यही कठोर hierarchy है।
संधि + प्रथा + सामान्य विधि-सिद्धांत = प्राथमिक स्रोत हैं एवं न्यायिक निर्णय + विद्वानों की रचनाएँ = सहायक साधन।
इसलिए अनुच्छेद 38 को केवल स्रोतों की सूची मानना पर्याप्त नहीं है। यह ICJ को यह बताता है कि अंतरराष्ट्रीय विधि के नियमों को पहचानने और लागू करने के लिए किन साधनों का उपयोग करना है।
उदाहरण - राज्य A और राज्य B के बीच समुद्री सीमा को लेकर विवाद है।
ICJ सबसे पहले देखता है कि
•  क्या दोनों राज्यों के बीच कोई संधि है?
√यदि है, तो उसकी प्रासंगिक धाराएँ देखी जाएँगी।
• यदि संधि पर्याप्त नहीं है, तो क्या कोई customary international law लागू है?
√राज्य-प्रथा और opinio juris देखे जाएं
• क्या कोई सामान्य कानूनी सिद्धांत सहायता कर सकता है?
√पुराने न्यायिक निर्णय और अंतरराष्ट्रीय विधि के विद्वानों की रचनाएँ क्या मार्गदर्शन देती हैं?
इस प्रकार अनुच्छेद 38 न्यायालय के सामने अंतरराष्ट्रीय विधि का एक प्रकार का कानूनी नक्शा रख देता है।
निष्कर्षICJ की संविधि का अनुच्छेद 38 अंतरराष्ट्रीय विधि के सबसे महत्वपूर्ण प्रावधानों में से एक है। यह न्यायालय द्वारा विवादों के निपटारे में प्रयुक्त विधि के प्रमुख स्रोतों को निर्धारित करता है। इसके अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय संधियाँ, अंतरराष्ट्रीय प्रथा और विधि के सामान्य सिद्धांत प्रमुख स्रोत हैं, जबकि न्यायिक निर्णय तथा प्रख्यात विधिवेत्ताओं की रचनाएँ सहायक साधन हैं। अनुच्छेद 38(2) न्यायालय को पक्षकारों की स्पष्ट सहमति होने पर ex aequo et bono के आधार पर निर्णय देने की अनुमति देता है।
ट्रिकTCGJS - Treaty, Custom, General Principles, Judicial decisions, Scholars।

संधियां एवं अभिसमय - 
अंतरराष्ट्रीय विधि में संधि (Treaty) एवं अभिसमय (Convention) महत्वपूर्ण विषय हैं। दोनों को अक्सर एक-दूसरे के स्थान पर भी प्रयोग किया जाता है, लेकिन इनके प्रयोग के संदर्भ में कुछ अंतर समझना भी हैं।
संधि (Treaty) - संधि दो या दो से अधिक राज्यों के बीच किया गया ऐसा लिखित अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जो अंतरराष्ट्रीय विधि द्वारा शासित होता है और जिससे पक्षकार राज्यों के बीच कानूनी अधिकार एवं दायित्व उत्पन्न होते हैं। सरल शब्दों में जब राज्य किसी विषय पर आपसी सहमति से ऐसा समझौता करते हैं जिसे वे कानूनी रूप से मानने के लिए बाध्य होते हैं, तो उसे अंतरराष्ट्रीय संधि कहा जाता है।उदाहरण - दो राज्य सीमा, व्यापार, रक्षा, जल-विभाजन या राजनयिक संबंधों के संबंध में समझौता कर सकते हैं।
संधि की प्रमुख विशेषताएँ
पक्षकारों की सहमति - संधि का आधार राज्यों की स्वतंत्र सहमति है। किसी राज्य को उसकी सहमति के बिना किसी संधि से बाध्य नहीं किया जा सकता।
अंतरराष्ट्रीय विधि द्वारा शासित - संधि कोई सामान्य राजनीतिक घोषणा मात्र नहीं होती। जिस समझौते को पक्षकार अंतरराष्ट्रीय विधि के अधीन कानूनी दायित्व पैदा करने के उद्देश्य से करते हैं, वह संधि के रूप में महत्वपूर्ण होती है।
लिखित रूपआधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में संधियाँ लिखित रूप में होती हैं।
अधिकार एवं दायित्वसंधि पक्षकारों के लिए विभिन्न अधिकार और कर्तव्य निर्धारित करती है।
सद्भावना से पालनVienna Convention on the Law of Treaties, 1969 के अनुच्छेद 26 में प्रसिद्ध सिद्धांत है Pacta sunt servanda अर्थात जो समझौते किए गए हैं, उनका ईमानदारी और सद्भावना से पालन किया जाना चाहिए।
अभिसमय (Convention) - Convention भी एक प्रकार का अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसमें कई राज्य किसी विशेष विषय पर समान नियम स्थापित करने के लिए सहमत होते हैं।अभिसमय का प्रयोग विशेष रूप से तब अधिक दिखाई देता है जब अनेक राज्य किसी व्यापक अंतरराष्ट्रीय विषय के लिए साझा नियम और मानक बनाना चाहते हैं। उदाहरण
• Vienna Convention on the Law of Treaties, 1969
• Geneva Conventions, 1949
• United Nations Convention on the Law of the Sea, 1982 (UNCLOS)
• Convention on the Rights of the Child, 1989
संधि और अभिसमय में अंतर - Treaty और Convention के बीच हमेशा कोई कठोर कानूनी अंतर नहीं होता। अंतरराष्ट्रीय विधि में किसी समझौते का नाम Treaty, Convention, Agreement, Protocol, Pact, Charter आदि कुछ भी हो सकता है। केवल नाम देखकर उसकी कानूनी प्रकृति तय नहीं होती।
आधार संधि (Treaty) अभिसमय (Convention)
अर्थ - अंतरराष्ट्रीय कानूनी समझौता अंतरराष्ट्रीय कानूनी समझौता
पक्षकार- दो या अधिक राज्य हो सकते हैं सामान्यतः अनेक राज्य
उद्देश्य- किसी विशेष विषय पर अधिकार-दायित्व तय करना व्यापक/सामान्य नियम बनाना
स्वरूप- द्विपक्षीय या बहुपक्षीय प्रायः बहुपक्षीय
कानूनी प्रभाव - पक्षकारों को बाध्य कर सकता है पक्षकारों को बाध्य कर सकता है
नाम का महत्व - Treaty नाम होना आवश्यक नहीं Convention नाम होना आवश्यक नहीं
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि Treaty हमेशा द्विपक्षीय और Convention हमेशा बहुपक्षीय ही होती है।
संधियों के प्रकार
(क) द्विपक्षीय संधि (Bilateral Treaty) - जब दो राज्यों के बीच संधि होती है। 
उदाहरणभारत और किसी दूसरे देश के बीच सीमा, व्यापार या प्रत्यर्पण संबंधी समझौता।
(ख) बहुपक्षीय संधि (Multilateral Treaty) - जब तीन या अधिक राज्य किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते के पक्षकार होते हैं।
उदाहरण - संयुक्त राष्ट्र से संबंधित अनेक बहुपक्षीय समझौते।
संधि बनने की प्रक्रियाएक अंतरराष्ट्रीय संधि सामान्यतः कई चरणों से गुजरती है - 
1. बातचीत (Negotiation) - राज्य संधि की शर्तों पर बातचीत करते हैं।
2. पाठ का स्वीकार किया जाना (Adoption) - संधि का अंतिम पाठ स्वीकार किया जाता है।
3. प्रमाणीकरण (Authentication) - संधि के पाठ को आधिकारिक रूप से प्रमाणित किया जाता है।
4. हस्ताक्षर (Signature) - राज्य संधि पर हस्ताक्षर करते हैं।
5. अनुसमर्थन (Ratification) - कई मामलों में हस्ताक्षर के बाद संबंधित राज्य अपनी संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार संधि की पुष्टि करता है।
6. अनुमोदन/स्वीकृति/अभिगमन - परिस्थिति के अनुसार approval, acceptance या accession भी हो सकता है।
7. प्रवर्तन (Entry into Force) - जब संधि में निर्धारित आवश्यक शर्तें पूरी हो जाती हैं, तो वह लागू हो जाती है।
8. रजिस्ट्रेशन - दोनों पक्ष भविष्य में संधियों के संबंध में किसी विवाद से बचने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ में संधियों का रजिस्ट्रेशन करवाते हैं।
7. हस्ताक्षर और अनुसमर्थन में अंतर - 
हस्ताक्षर (Signature) हस्ताक्षर से राज्य संधि की प्रक्रिया में अपनी सहमति या समर्थन व्यक्त करता है, लेकिन हर स्थिति में इससे राज्य तुरंत संधि के सभी अंतिम दायित्वों से बाध्य नहीं हो जाता।
अनुसमर्थन (Ratification) - अनुसमर्थन वह औपचारिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा राज्य अपनी सहमति को संधि से बाध्य होने के लिए अंतिम रूप देता है, जहाँ संधि ऐसी प्रक्रिया की अपेक्षा करती है।
8. संधियों का पालन - अंतरराष्ट्रीय विधि में दो महत्वपूर्ण सिद्धांत हैं - 
Pacta Sunt Servanda - संधियों का पालन किया जाना चाहिए, राज्य अपनी संधि संबंधी जिम्मेदारियों को good faith अर्थात सद्भावना से पूरा करें।
आंतरिक कानून का बहाना नहीं - Vienna Convention के अनुच्छेद 27 के अनुसार कोई राज्य सामान्यतः अपने आंतरिक कानून को संधि का पालन न करने के औचित्य के रूप में प्रस्तुत नहीं कर सकता।
ICJ के अनुच्छेद 38 से संबंधICJ Statute का अनुच्छेद 38(1)(a) कहता है कि न्यायालय International conventions, whether general or particular, establishing rules expressly recognized by the contesting states. को लागू करेगा।अर्थात यदि विवाद करने वाले राज्यों ने किसी अंतरराष्ट्रीय संधि/अभिसमय में किसी नियम को स्वीकार किया है और वह विवाद पर लागू होता है, तो ICJ उस नियम को अपने निर्णय में लागू कर सकता है।इसलिए संधियाँ और अभिसमय  अंतरराष्ट्रीय विधि के प्रमुख/प्राथमिक स्रोतों में से एक।
संधि का राज्यों पर प्रभावPacta tertiis nec nocent nec prosunt अर्थात किसी संधि से तीसरे राज्य को न तो सामान्यतः दायित्व दिया जा सकता है और न ही अधिकार, जब तक उसकी सहमति न हो। यह सिद्धांत Vienna Convention, 1969 के अनुच्छेद 34  से जुड़ा है।
उदाहरण - यदि A और B ने कोई संधि की है, तो केवल उस संधि के आधार पर C को बाध्य नहीं किया जा सकता, जब तक C की आवश्यक सहमति न हो।
संधि और अंतरराष्ट्रीय प्रथा का संबंध - कभी-कभी संधि में लिखा गया नियम बाद में customary international law के रूप में भी विकसित हो सकता है। इसलिए किसी संधि में लिखे नियम का प्रभाव केवल संधि के पक्षकारों तक ही सीमित रहेगा, यह हमेशा आवश्यक नहीं है। यदि वही नियम स्वतंत्र रूप से customary international law का नियम बन जाए, तो वह व्यापक रूप से लागू हो सकता है।
संक्षेप में
अंतरराष्ट्रीय संधि = राज्यों के बीच कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता।
अभिसमय = अनेक राज्यों द्वारा किसी व्यापक अंतरराष्ट्रीय विषय पर समान नियम स्थापित करने वाला समझौता।महत्वपूर्ण बात - Treaty और Convention के बीच नाम के आधार पर कोई कठोर कानूनी विभाजन नहीं है। दोनों अंतरराष्ट्रीय विधि के अधीन बाध्यकारी समझौतों के रूप में कार्य कर सकते हैं।
निष्कर्षअंतरराष्ट्रीय संधियाँ एवं अभिसमय अंतरराष्ट्रीय विधि के प्रमुख स्रोत हैं। ये राज्यों की सहमति पर आधारित होते हैं और इनके माध्यम से राज्यों के पारस्परिक अधिकार एवं दायित्व निर्धारित किए जाते हैं। संधियों के पालन का मूल सिद्धांत Pacta Sunt Servanda है। ICJ की संविधि के अनुच्छेद 38(1)(a) के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय अभिसमय एवं संधियाँ न्यायालय द्वारा लागू किए जाने वाले प्रमुख विधिक स्रोतों में सम्मिलित हैं।

प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि -
प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि (Customary International Law) अंतरराष्ट्रीय विधि का एक बहुत महत्वपूर्ण स्रोत है। सरल भाषा में जब राज्य लंबे समय तक किसी व्यवहार को लगातार अपनाते हैं और साथ ही यह मानते हैं कि वे ऐसा कानूनी दायित्व होने के कारण कर रहे हैं, तो वह व्यवहार प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि बन सकता है।
प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि का अर्थ - 
प्रथा (Custom) का अर्थ है राज्यों द्वारा लंबे समय से अपनाई जा रही ऐसी सामान्य और नियमित राज्य-प्रथा, जिसे वे कानूनी रूप से बाध्यकारी मानते हैं। अर्थात केवल यह पर्याप्त नहीं है कि राज्य कोई काम बार-बार करते हैं। दो तत्व आवश्यक हैं - 
1. राज्य-प्रथा (State Practice)
2. कानूनी विश्वास या Opinio Juris
सूत्रप्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि = राज्य-प्रथा + Opinio Juris
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की संविधि का अनुच्छेद 38
प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि का सबसे प्रसिद्ध आधार अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की संविधि के अनुच्छेद 38(1)(b) में मिलता है। इसके अनुसार न्यायालय अंतरराष्ट्रीय विवादों में ऐसी international custom को लागू करता है जो कानून के रूप में स्वीकार की गई सामान्य प्रथा का प्रमाण हो। इसलिए अनुच्छेद 38(1)(b) में दो बातें विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं:
General Practice - सामान्य प्रथा
Accepted as Law - उसे कानून के रूप में स्वीकार किया जाना।
प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि के दो आवश्यक तत्व - 
(A) राज्य-प्रथा (State Practice) - राज्यों का वास्तविक व्यवहार प्रथा का पहला आधार है। राज्य-प्रथा कई रूपों में दिखाई दे सकती है - 
• राज्यों के सरकारी कार्य।
• राजनयिक व्यवहार।
• राष्ट्रीय कानून।
• न्यायालयों के निर्णय।
• सैन्य आचरण।
• अंतरराष्ट्रीय संगठनों में राज्य का व्यवहार।
• संधियों के संबंध में राज्य का व्यवहार।
• सरकारी अधिकारियों के वक्तव्य।
• राजनयिक पत्राचार।
• अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में अपनाया गया व्यवहार।
उदाहरणयदि अधिकांश राज्य लंबे समय तक राजनयिक दूतों को कुछ विशेष संरक्षण देते हैं और इस व्यवहार में पर्याप्त स्थिरता दिखाई देती है, तो यह प्रथा अंतरराष्ट्रीय कानून के विकास में योगदान कर सकती है।
Opinio Jurisयह प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि का सबसे महत्वपूर्ण और थोड़ा पेचीदा हिस्सा है। Opinio Juris का अर्थ है कि राज्य किसी व्यवहार को केवल सुविधा, शिष्टाचार या राजनीतिक नीति के कारण नहीं करते, बल्कि इसलिए करते हैं क्योंकि वे उसे कानूनी रूप से आवश्यक या बाध्यकारी मानते हैं।
उदाहरण के लिएयदि राज्य A दूसरे राज्य के राजनयिकों को विशेष संरक्षण देता है क्योंकि वह ऐसा करना अंतरराष्ट्रीय कानून का दायित्व समझता है, तो यहाँ opinio juris मौजूद हो सकता है। लेकिन यदि वह केवल मित्रता या राजनीतिक शिष्टाचार के कारण ऐसा करता है, तो केवल उस व्यवहार से प्रथागत कानून स्थापित नहीं होगा। याद रखने का आसान तरीका - हम ऐसा करते हैं = State Practice - हम ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि कानून हमें ऐसा करने के लिए बाध्य करता है = Opinio Juris, दोनों मिलकर प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि का निर्माण करते हैं।
राज्य-प्रथाहर छोटी-मोटी प्रथा अंतरराष्ट्रीय कानून नहीं बन जाती। राज्य-प्रथा में कुछ विशेष गुण अपेक्षित हैं।
(i) सामान्यताप्रथा पर्याप्त संख्या में राज्यों द्वारा अपनाई जानी चाहिए। हालाँकि सभी राज्यों का पालन करना अनिवार्य नहीं है।
(ii) निरंतरताराज्यों का व्यवहार सामान्यतः लगातार होना चाहिए।
(iii) एकरूपताराज्यों की प्रथा में पर्याप्त समानता होनी चाहिए।
(iv) प्रतिनिधित्वप्रथा में विशेष रूप से उन राज्यों की भागीदारी महत्वपूर्ण हो सकती है जिनका उस विषय से विशेष संबंध है।
Persistent Objector का सिद्धांतयह प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि का महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यदि कोई राज्य किसी उभरती हुई प्रथा के निर्माण के समय से ही लगातार और स्पष्ट रूप से उसका विरोध करता रहे, तो कुछ परिस्थितियों में वह प्रथा उस राज्य के विरुद्ध लागू न हो सके, इसे Persistent Objector Principle कहा जाता है। अर्थात शुरुआत से स्पष्ट और लगातार विरोध - संभावित रूप से उस राज्य पर प्रथा लागू नहीं।लेकिन केवल बाद में विरोध करने से राज्य  प्रथा से मुक्त नहीं हो जाता।
प्रथा के लिए आवश्यक समयपहले यह धारणा अधिक मजबूत थी कि किसी व्यवहार को अंतरराष्ट्रीय प्रथा बनने के लिए बहुत लंबे समय तक चलना चाहिए। लेकिन आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में निश्चित समयावधि आवश्यक नहीं है। यदि कोई नई प्रथा - 
• व्यापक रूप से अपनाई जाए,
• पर्याप्त रूप से एकरूप हो,
• राज्यों द्वारा कानूनी दायित्व के रूप में स्वीकार की जाए 
तो अपेक्षाकृत कम समय में भी प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि विकसित हो सकती है।
प्रमुख वाद (Important Cases) - 
1. North Sea Continental Shelf Cases (1969)यह प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय है।
North Sea Continental Shelf Cases में ICJ ने स्पष्ट किया कि किसी संधि के प्रावधान को प्रथागत अंतरराष्ट्रीय कानून मानने के लिए केवल यह पर्याप्त नहीं है कि वह प्रावधान कई राज्यों ने स्वीकार किया है। यह भी दिखाना आवश्यक है कि राज्य-प्रथा व्यापक और लगभग एकरूप है, राज्यों को विश्वास है कि वे कानूनी दायित्व के कारण ऐसा कर रहे हैं। इस मामले ने Opinio Juris की महत्ता को विशेष रूप से स्पष्ट किया।
Asylum Case (Colombia v. Peru), 1950Asylum Case में क्षेत्रीय प्रथा (regional custom) का प्रश्न उठा। न्यायालय ने कहा कि किसी विशेष क्षेत्रीय प्रथा को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त रूप से स्पष्ट, लगातार और समान व्यवहार का प्रमाण आवश्यक है। इससे यह सिद्ध होता है कि केवल दावा कर देना पर्याप्त नहीं है, प्रथा को प्रमाणित करना पड़ता है।
Nicaragua v. United States, 1986Nicaragua v. United States यह मामला प्रथागत अंतरराष्ट्रीय कानून के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ICJ ने माना कि कुछ सिद्धांत संधि में मौजूद होने के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से customary international law का भी हिस्सा हो सकते हैं। इस मामले में बल प्रयोग पर प्रतिबंध (prohibition of the use of force) और non - intervention जैसे सिद्धांतों के प्रथागत स्वरूप पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई।
संधि और प्रथा में अंतर
आधार - संधि विधि प्रथागत - अंतरराष्ट्रीय विधि
आधार - लिखित समझौता - राज्य-प्रथा
स्वरूप - लिखित - अलिखित
सहमति - संधि में राज्य की सहमति  महत्वपूर्ण - प्रथा + Opinio Juris
प्रमाण - संधि का पाठ - राज्य व्यवहार एवं कानूनी विश्वास
लागू क्षेत्र - पक्षकार राज्यों के बीच - उपयुक्त परिस्थितियों में व्यापक रूप से लागू
परिवर्तन - संशोधन/नई संधि आदि नई राज्य-प्रथा एवं Opinio Juris से विकास
प्रथागत विधि और संधि का संबंधदोनों एक-दूसरे से अलग होते हुए भी परस्पर जुड़े हैं। कई बार कोई नियम पहले प्रथा के रूप में विकसित होता है - बाद में संधि में लिख दिया जाता है। और कभी-कभी संधि में लिखा गया नियम - बाद में व्यापक राज्य-प्रथा और Opinio Juris के कारण customary international law बन सकता है। इसलिए संधि और प्रथा के बीच हमेशा लोहे की दीवार नहीं होती, बल्कि दोनों के बीच लगातार कानूनी संवाद चलता रहता है।
प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि के प्रकार
1. सामान्य प्रथा (General Custom) - जो व्यापक रूप से अंतरराष्ट्रीय समुदाय में स्वीकार की जाती है।
2. क्षेत्रीय प्रथा (Regional Custom) - किसी विशेष क्षेत्र के राज्यों के बीच विकसित प्रथा।
3. स्थानीय या विशेष प्रथा  - (Local/ Special Custom) कुछ सीमित राज्यों के बीच लंबे समय से चली आ रही विशेष प्रथा।
प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि के लाभ
अंतरराष्ट्रीय कानून में उन क्षेत्रों को भरती है जहाँ लिखित संधि नहीं है। बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुसार विकसित हो सकती है।
राज्यों के व्यवहार को कानूनी स्वरूप प्रदान करती है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में स्थिरता पैदा करती है।
अनेक मौलिक अंतरराष्ट्रीय नियमों का आधार बनती है।
इसकी प्रमुख सीमाएँ
• प्रथा का अस्तित्व सिद्ध करना कठिन हो सकता है।
• यह निर्धारित करना कठिन होता है कि राज्य का व्यवहार वास्तव में कानूनी बाध्यता के कारण है या केवल राजनीतिक नीति के कारण।
• राज्यों की प्रथाएँ कभी-कभी विरोधाभासी होती हैं।
• Opinio Juris को प्रत्यक्ष रूप से प्रमाणित करना कठिन हो सकता है।
निष्कर्षप्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि अंतरराष्ट्रीय कानून की रीढ़ के समान महत्वपूर्ण स्रोत है। इसका निर्माण केवल राज्य के बार-बार किए गए व्यवहार से नहीं होता, बल्कि उस व्यवहार के साथ यह विश्वास भी आवश्यक है कि ऐसा व्यवहार कानूनी दायित्व के कारण किया जा रहा है। इसलिए इसके दो मूल तत्व हैं - 
State Practice + Opinio Juris = Customary International Law और इसका प्रमुख विधिक आधार ICJ Statute का अनुच्छेद 38(1)(b) है।

अंतरराष्ट्रीय विधि के विषय के रूप में राज्य (State as a Subject of International Law)  - 
अंतरराष्ट्रीय विधि का सबसे महत्वपूर्ण और पारंपरिक विषय है। अंतरराष्ट्रीय विधि की अधिकांश अवधारणाएँ राज्य की संप्रभुता, अधिकारों, कर्तव्यों और अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व के इर्द-गिर्द विकसित हुई हैं।
राज्य का अर्थअंतरराष्ट्रीय विधि में राज्य से आशय ऐसे राजनीतिक रूप से संगठित समुदाय से है जिसके पास (मॉन्टेविडियो कन्वेंशन, 1933 के अनुच्छेद 1 के अनुसार राज्य के चार प्रमुख तत्व माने जाते हैं) - 
• निश्चित भू-भाग, 
• स्थायी जनसंख्या, 
• सरकार तथा 
• अन्य राज्यों के साथ संबंध स्थापित करने की क्षमता हो।
इन तत्वों के आधार पर किसी राजनीतिक इकाई के राज्य होने का निर्धारण किया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय विधि के विषयअंतरराष्ट्रीय विधि का विषय वह व्यक्ति या संस्था है जिसके पास अंतरराष्ट्रीय विधि के अंतर्गत अधिकार और कर्तव्य हों तथा जो उन अधिकारों का प्रयोग या कर्तव्यों का पालन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करता हो। प्राचीन विधि में राज्य को अंतरराष्ट्रीय विधि का प्राथमिक एवं प्रमुख विषय माना जाता था परन्तु आधुनिक समय में अंतरराष्ट्रीय संगठन, व्यक्ति तथा कुछ संस्थाएं भी सीमित परिस्थितियों में अंतरराष्ट्रीय विधि के विषय माने जाते हैं।
राज्य अंतरराष्ट्रीय विधि का विषय क्योंराज्य को अंतरराष्ट्रीय विधि का प्रमुख विषय इसलिए माना जाता है क्योंकि राज्य के पास संप्रभुता होती है, अंतरराष्ट्रीय अधिकार होते हैं, अंतरराष्ट्रीय दायित्व होते हैं, संधि करने की क्षमता होती है,  राजनयिक संबंध स्थापित करने की क्षमता होती है, अंतरराष्ट्रीय विवादों में पक्षकार बनने की क्षमता होती है तथा अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व वहन करने की क्षमता होती है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय विधि की मूल संरचना में राज्य की केंद्रीय भूमिका है।
राज्य की संप्रभुताअंतरराष्ट्रीय विधि के संदर्भ में संप्रभुता (Sovereignty) राज्य की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है। संप्रभुता का अर्थ है कि राज्य अपने क्षेत्र और आंतरिक मामलों में सर्वोच्च सत्ता रखता है तथा बाहरी रूप से किसी अन्य राज्य के अधीन नहीं होता। संप्रभुता के दो प्रमुख पक्ष हैं - 
(क) आंतरिक संप्रभुताराज्य को अपने क्षेत्र के भीतर कानून बनाने और शासन करने की सर्वोच्च शक्ति प्राप्त होती है।
(ख) बाह्य संप्रभुताराज्य अन्य राज्यों से स्वतंत्र होकर अंतरराष्ट्रीय संबंध स्थापित करता है। इसी कारण सभी संप्रभु राज्य अंतरराष्ट्रीय विधि के समक्ष समान माने जाते हैं।
राज्य के अंतरराष्ट्रीय अधिकारअंतरराष्ट्रीय विधि राज्य को अनेक महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान करती है।
I. स्वतंत्रता का अधिकारप्रत्येक संप्रभु राज्य को स्वतंत्र रूप से अपने राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक मामलों का संचालन करने का अधिकार है।
II. क्षेत्रीय अखंडता का अधिकारराज्य को अपने क्षेत्र की सुरक्षा और अखंडता बनाए रखने का अधिकार है। अन्य राज्यों को उसके क्षेत्रीय अधिकारों का सम्मान करना चाहिए।
III. समानता का अधिकारराज्य छोटे या बड़े, शक्तिशाली या कमजोर हों, अंतरराष्ट्रीय विधि के मूल सिद्धांत के अनुसार उनकी संप्रभु समानता स्वीकार की जाती है।
IV. आत्मरक्षा का अधिकारसंयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के अंतर्गत सशस्त्र हमले की स्थिति में राज्य को व्यक्तिगत या सामूहिक आत्मरक्षा का अंतर्निहित अधिकार प्राप्त है।
V. राजनयिक संबंध स्थापित करने का अधिकार - राज्य अन्य राज्यों के साथ राजनयिक संबंध स्थापित कर सकता है और राजदूतों का आदान-प्रदान कर सकता है।
VI. संधि करने का अधिकारराज्य अंतरराष्ट्रीय संधियों और समझौतों में पक्षकार बन सकता है और उनके माध्यम से अधिकार एवं दायित्व स्वीकार कर सकता है।
राज्य के अंतरराष्ट्रीय कर्तव्यअंतरराष्ट्रीय विधि केवल राज्यों को अधिकार ही नहीं देती बल्कि उन पर अनेक कर्तव्य भी डालती है। राज्य का प्रमुख कर्तव्य है कि वह - 
• अन्य राज्यों की संप्रभुता का सम्मान करे।
• दूसरे राज्य के क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन न करे।
• बल के अवैध प्रयोग से बचे।
• अंतरराष्ट्रीय संधियों का पालन करे।
• अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को सद्भावना से पूरा करे।
• दूसरे राज्यों के आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप न करे।
• मानवाधिकारों से संबंधित अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का सम्मान करे।
राज्य की संधि करने की क्षमता - Vienna Convention on the Law of Treaties, 1969 के अनुसार प्रत्येक राज्य में संधि करने की क्षमता होती है। राज्य अंतरराष्ट्रीय विधि के अंतर्गत संधि करने की पूर्ण क्षमता रखने वाला प्रमुख पक्ष है। राज्यद्विपक्षीय /बहुपक्षीय संधि या  अंतरराष्ट्रीय समझौते कर सकता है।
अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्वयदि कोई राज्य अंतरराष्ट्रीय विधि के अंतर्गत अपने दायित्व का उल्लंघन करता है, तो उस पर अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व (International Responsibility) उत्पन्न हो सकता है।
उदाहरण - यदि कोई राज्य किसी अन्य राज्य के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय दायित्व का उल्लंघन करता है, तो उसे उल्लंघन रोकना,
पुनर्स्थापन (Restitution), क्षतिपूर्ति (Compensation), या उचित संतोष (Satisfaction) जैसे उपाय करने पड़ सकते हैं।
इस प्रकार राज्य केवल अंतरराष्ट्रीय अधिकारों का धारक नहीं है बल्कि अपने अंतरराष्ट्रीय कृत्यों के लिए उत्तरदायी भी है।
राज्य की अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व (International Personality)राज्य को अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व (International Legal Personality) प्राप्त है। इसका अर्थ है कि राज्य अधिकार प्राप्त कर सकता है + दायित्व वहन कर सकता है + अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्य कर सकता है। यही कारण है कि राज्य को अंतरराष्ट्रीय विधि का पूर्ण और मूलभूत विषय माना जाता है।
राज्य की मान्यताकिसी नए राज्य के अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व के संदर्भ में मान्यता (Recognition) का प्रश्न महत्वपूर्ण है। मान्यता का अर्थ है कि एक मौजूदा राज्य किसी राजनीतिक इकाई को राज्य के रूप में स्वीकार करता है और उसके साथ अंतरराष्ट्रीय संबंध स्थापित करने की इच्छा व्यक्त करता है। मान्यता के दो प्रमुख सिद्धांत बताए जाते हैं - 
(A) Constitutive Theoryइसके अनुसार किसी नए राज्य का अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व अन्य राज्यों द्वारा मान्यता दिए जाने से स्थापित होता है।
(B) Declaratory Theoryइसके अनुसार राज्य का अस्तित्व उसके आवश्यक तत्वों की पूर्ति से होता है। मान्यता केवल उस तथ्य की घोषणा या स्वीकृति है। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में Declaratory दृष्टिकोण को अधिक स्वीकार्यता प्राप्त है।
राज्य और अंतरराष्ट्रीय संगठन में अंतरराज्य को अंतरराष्ट्रीय विधि का प्राथमिक विषय माना जाता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय संगठन व्युत्पन्न या सीमित अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व रखते हैं।
उदाहरण - संयुक्त राष्ट्र (UN) को उसके उद्देश्यों और कार्यों के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व प्राप्त है। यह बात International Court of Justice के Reparation for Injuries Suffered in the Service of the United Nations (1949) परामर्शात्मक मत में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हुई। न्यायालय ने माना कि संयुक्त राष्ट्र के पास अपने कार्यों के लिए आवश्यक अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व और दावे करने की क्षमता है।
राज्य के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय दावायदि किसी राज्य के अंतरराष्ट्रीय अधिकारों का उल्लंघन होता है तो वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने अधिकारों की रक्षा कर सकता है। राज्य 
• राजनयिक माध्यम अपना सकता है
• वार्ता कर सकता है
• मध्यस्थता या सुलह का सहारा ले सकता है
• पंचाट में जा सकता है
• अथवा अधिकार क्षेत्र होने पर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के समक्ष मामला ला सकता है।
राज्य की प्रतिरक्षा (State Immunity)- अंतरराष्ट्रीय विधि में सिद्धांत है कि एक संप्रभु राज्य दूसरे राज्य के न्यायालयों के समक्ष कुछ परिस्थितियों में राज्य प्रतिरक्षा का दावा कर सकता है।
इसका आधार राज्य की संप्रभु समानता का सिद्धांत है - एक राज्य दूसरे राज्य के अधीन नहीं है।
हालांकि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में Restrictive Immunity का सिद्धांत विकसित हुआ है, जिसके अंतर्गत संप्रभु कार्यों और वाणिज्यिक कार्यों के बीच अंतर किया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय विधि में राज्य का महत्वराज्य को अंतरराष्ट्रीय विधि का सबसे महत्वपूर्ण विषय मानने के कारण - 
•  राज्य संप्रभु होता है।
•  राज्य के पास व्यापक अंतरराष्ट्रीय अधिकार होते हैं।
•  राज्य अंतरराष्ट्रीय संधियों का प्रमुख पक्षकार होता है।
•  राज्य अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व वहन करता है।
• अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की व्यवस्था मुख्यतः राज्यों के व्यवहार पर निर्भर करती है।
•  संयुक्त राष्ट्र जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की संरचना भी मुख्यतः राज्यों पर आधारित है।
निष्कर्षअंतरराष्ट्रीय विधि के विकास के प्रारंभिक दौर में राज्य ही लगभग एकमात्र अंतरराष्ट्रीय विधिक विषय माना जाता था। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि ने इस अवधारणा का विस्तार करते हुए अंतरराष्ट्रीय संगठनों और कुछ परिस्थितियों में व्यक्तियों को भी अधिकार एवं दायित्व प्रदान किए हैं। फिर भी राज्य आज भी अंतरराष्ट्रीय विधि का प्राथमिक, मूलभूत और सबसे व्यापक विषय है। उसकी संप्रभुता, समानता, स्वतंत्रता, संधि करने की क्षमता, अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व और विवाद समाधान की क्षमता उसे अंतरराष्ट्रीय विधि की आधारभूत इकाई बनाती है।

अंतरराष्ट्रीय विधि के विषय के रूप में अंतरराष्ट्रीय संगठन (International Organizations as Subjects of International Law)  - 
अंतर्राष्ट्रीय संगठन आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि का महत्वपूर्ण विषय है। पहले अंतरराष्ट्रीय विधि में केवल राज्यों को प्रमुख विषय माना जाता था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय संगठनों के विकास के साथ यह अवधारणा विस्तृत हुई।
अंतरराष्ट्रीय विधि के विषय के रूप में अंतरराष्ट्रीय संगठन - 
अंतरराष्ट्रीय संगठन का अर्थअंतरराष्ट्रीय संगठन ऐसे संगठन हैं जिन्हें अंतरराष्ट्रीय समझौते या संधि द्वारा स्थापित किया जाता है और जिनके अपने निश्चित उद्देश्य, कार्य, संस्थाएं तथा अधिकार होते हैं। इनमें अनेक संप्रभु राज्य सदस्य होते हैं।
उदाहरण - 
• संयुक्त राष्ट्र (UN)
• विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO)
• अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO)
• विश्व व्यापार संगठन (WTO)
• अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF)
विश्व बैंक - अंतरराष्ट्रीय संगठन स्वयं राज्य नहीं होते, बल्कि राज्यों द्वारा बनाए गए स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय संस्थागत निकाय होते हैं।
अंतरराष्ट्रीय विधि का विषयअंतरराष्ट्रीय विधि का विषय वह व्यक्ति या संस्था है जिसके पास अंतरराष्ट्रीय विधि के अंतर्गत अधिकार + कर्तव्य + अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्य करने की क्षमता हो।
परंपरागत रूप से राज्य को अंतरराष्ट्रीय विधि का प्रमुख विषय माना जाता था। लेकिन आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों को भी सीमित और व्युत्पन्न अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व (International Legal Personality) प्रदान किया है।
अंतरराष्ट्रीय संगठन विधिक व्यक्तित्वअंतरराष्ट्रीय संगठन राज्यों द्वारा बनाए जाते हैं। उनकी स्थापना किसी संविधान, चार्टर या अंतरराष्ट्रीय संधि के माध्यम से होती है।
उदाहरण - संयुक्त राष्ट्र की स्थापना UN Charter, 1945 के द्वारा हुई। किसी संगठन को अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व प्राप्त होने का अर्थ है कि वह अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए - 
• अधिकार प्राप्त कर सकता है।
• दायित्व ग्रहण कर सकता है।
• संधियां या समझौते कर सकता है।
• अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दावा कर सकता है।
• संपत्ति रख सकता है।
• वह अपने कार्यों के लिए कानूनी कार्रवाई कर सकता है।
हालांकि संगठन की शक्तियां उसके संविधान/स्थापना-संधि और निर्धारित उद्देश्यों तक सीमित रहती हैं।
Reparation for Injuries Case, 1949अंतरराष्ट्रीय संगठनों के विधिक व्यक्तित्व का न्यायिक आधार Reparation for Injuries Suffered in the Service of the United Nations (1949) है। इस मामले में संयुक्त राष्ट्र के एक अधिकारी Count Folke Bernadotte की हत्या के बाद यह प्रश्न उठा कि क्या संयुक्त राष्ट्र स्वयं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने अधिकारी को हुई क्षति के संबंध में दावा कर सकता है।
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने माना कि संयुक्त राष्ट्र के पास अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व है और वह अपने कार्यों तथा अपने एजेंटों को हुई क्षति के संबंध में अंतरराष्ट्रीय दावा कर सकता है। इस निर्णय ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों की अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व की अवधारणा को मजबूत आधार प्रदान किया।
अंतरराष्ट्रीय संगठनों के अधिकारअंतरराष्ट्रीय संगठनों को उनके स्थापना - पत्र और अंतरराष्ट्रीय विधि के अनुसार अनेक अधिकार प्राप्त हो सकते हैं - 
I. संधि करने का अधिकारअंतरराष्ट्रीय संगठन अपने कार्यक्षेत्र से संबंधित विषयों पर राज्यों या अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ समझौते कर सकते हैं।
उदाहरण - संयुक्त राष्ट्र विभिन्न राज्यों के साथ मुख्यालय समझौते तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय समझौते कर सकता है।
II. अंतरराष्ट्रीय दावा करने का अधिकारयदि संगठन के किसी अधिकारी या एजेंट को उसके आधिकारिक कार्य करते समय क्षति पहुंचती है, तो संगठन अपने अधिकारों की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय दावा कर सकता है। यही सिद्धांत Reparation for Injuries Case में स्थापित हुआ।
III. संपत्ति रखने का अधिकारअंतरराष्ट्रीय संगठन अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भवन, कार्यालय, धन, उपकरण,  अन्य संपत्ति रख सकते हैं।
IV. विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां
अंतरराष्ट्रीय संगठनों और उनके अधिकारियों को उनके स्वतंत्र कार्यों के लिए कुछ Privileges and Immunities प्राप्त होते हैं।
उदाहरण - संगठन के आधिकारिक कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप से सुरक्षा।
अंतरराष्ट्रीय संगठनों के कर्तव्य - अंतरराष्ट्रीय संगठनों पर भी उनके स्थापना-पत्र और अंतरराष्ट्रीय विधि के अनुसार कुछ दायित्व होते हैं। उन्हें - 
• अपने निर्धारित उद्देश्यों के भीतर कार्य करना चाहिए।
• अपने संविधान/चार्टर का पालन करना चाहिए।
• सदस्य राज्यों के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए।
• अंतरराष्ट्रीय विधि के लागू नियमों का पालन करना चाहिए।
• अपने कार्यों से उत्पन्न अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय संगठन की शक्तियां
यह राज्य और अंतरराष्ट्रीय संगठन के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर है। राज्य की संप्रभुता मूलभूत है, जबकि अंतरराष्ट्रीय संगठन की शक्तियां सौंपे गए सीमित अधिकारों (Conferred Powers) पर आधारित होती हैं। इसे Principle of Conferral कहा जाता है। अर्थात् संगठन वही कार्य कर सकता है जो उसके संविधान/चार्टर द्वारा अधिकृत हों या उसके उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक रूप से निहित हों। इसलिए अंतरराष्ट्रीय संगठन राज्य की तरह असीमित संप्रभुता का प्रयोग नहीं करता।
निहित शक्तियों का सिद्धांतअंतरराष्ट्रीय संगठनों के संबंध में Implied Powers Doctrine भी महत्वपूर्ण है। इस सिद्धांत के अनुसार यदि किसी संगठन को उसके उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कोई शक्ति स्पष्ट रूप से नहीं दी गई है, लेकिन वह शक्ति संगठन के कार्यों को प्रभावी ढंग से पूरा करने के लिए आवश्यक है, तो कुछ परिस्थितियों में उसे ऐसी निहित शक्ति प्राप्त मानी जा सकती है।Reparation for Injuries Case में ICJ के दृष्टिकोण ने इस अवधारणा को महत्वपूर्ण समर्थन दिया।
अंतरराष्ट्रीय संगठनों की अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्वअंतरराष्ट्रीय संगठन केवल अधिकारों के धारक नहीं हैं, बल्कि उनके कार्यों से अंतरराष्ट्रीय दायित्व भी उत्पन्न हो सकते हैं। यदि कोई अंतरराष्ट्रीय संगठन - 
• अंतरराष्ट्रीय दायित्व का उल्लंघन करता है।
• अपने एजेंट के माध्यम से गलत अंतरराष्ट्रीय कृत्य करता है।
• या अपने ऊपर लागू किसी दायित्व का उल्लंघन करता है।
तो परिस्थितियों के अनुसार उसके अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व (International Responsibility) लागू हो सकता है। इस विषय में अंतरराष्ट्रीय विधि आयोग (ILC) ने Articles on the Responsibility of International Organizations (ARIO), 2011 तैयार किए हैं।
अंतरराष्ट्रीय संगठनों की प्रतिरक्षा - अंतरराष्ट्रीय संगठनों को उनके स्वतंत्र कार्यों के लिए कुछ कानूनी प्रतिरक्षा (Immunity) और विशेषाधिकार दिए जाते हैं। इनका उद्देश्य संगठन को व्यक्तिगत लाभ देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि वह सदस्य राज्यों या किसी अन्य बाहरी शक्ति के अनुचित दबाव के बिना अपने कार्य कर सके।
उदाहरण - संयुक्त राष्ट्र और उसके अधिकारियों को विभिन्न अंतरराष्ट्रीय समझौतों के अंतर्गत विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां प्राप्त हैं।
अंतरराष्ट्रीय संगठन और राज्य में अंतर 
आधार - राज्य - अंतरराष्ट्रीय संगठन
आधार - संप्रभुता - संधि/चार्टर
विधिक व्यक्तित्व - मूलभूत व्युत्पन्न - सीमित
शक्तियां - व्यापक - निर्धारित उद्देश्यों तक सीमित
सदस्यता - राज्य स्वयं सदस्य बनता है - राज्य सदस्य होते हैं
संधि क्षमता - व्यापक - कार्यक्षेत्र तक सीमित
क्षेत्रीय संप्रभुता - होती है - नहीं होती
अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व - व्यापक - अपने कार्यों के संबंध में
प्रमुख आधार - राज्य की संप्रभुता - स्थापना - पत्र एवं अंतरराष्ट्रीय विधि
क्या सभी अंतरराष्ट्रीय संगठनों को समान अधिकार प्राप्त होते हैं? नहीं,  प्रत्येक संगठन का अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व उसके स्थापना-पत्र और कार्यों पर निर्भर करता है।
उदाहरणसंयुक्त राष्ट्र के अधिकार उसके चार्टर और कार्यों से निर्धारित होते हैं।• WHO के अधिकार उसके संविधान और स्वास्थ्य संबंधी उद्देश्यों से निर्धारित होते हैं।• WTO की शक्तियां व्यापारिक नियमों और उसके समझौतों से संबंधित हैं।
इसलिए अंतरराष्ट्रीय संगठनों का विधिक व्यक्तित्व राज्यों की तरह सामान्य और पूर्ण नहीं, बल्कि कार्यात्मक (Functional) होता है।
Functional Personality का सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय संगठन का विधिक व्यक्तित्व उसके कार्य और उद्देश्यों की पूर्ति के लिए होता है।
उदाहरण - यदि किसी संगठन का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य सहयोग है, तो वह स्वास्थ्य संबंधी कार्यों के लिए आवश्यक अधिकारों का प्रयोग कर सकता है। वह राज्य की तरह हर प्रकार के अंतरराष्ट्रीय कार्य करने का अधिकार नहीं रखता। इसी कारण इसे Functional International Legal Personality कहा जाता है।
आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में महत्वअंतरराष्ट्रीय संगठनों के विकास ने अंतरराष्ट्रीय विधि को केवल राज्य-केंद्रित व्यवस्था से आगे बढ़ाकर एक व्यापक संस्थागत व्यवस्था में परिवर्तित किया है।
आज अंतरराष्ट्रीय संगठन - 
• अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा
• मानवाधिकार
• स्वास्थ्य
• श्रम
• व्यापार
• पर्यावरण
• आर्थिक विकास
• मानवीय सहायता
जैसे क्षेत्रों में अपनी भूमिका निभा रहे हैं।इस कारण आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया है।
निष्कर्षअंतरराष्ट्रीय संगठन राज्य नहीं हैं, लेकिन आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में उन्हें उनके कार्यों और उद्देश्यों के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व प्राप्त है। वे अधिकार और दायित्व धारण कर सकते हैं, अंतरराष्ट्रीय समझौते कर सकते हैं, दावे प्रस्तुत कर सकते हैं और अपने आधिकारिक कार्यों के लिए आवश्यक विशेषाधिकार एवं उन्मुक्तियां प्राप्त कर सकते हैं। Reparation for Injuries Case, 1949 ने इस सिद्धांत को महत्वपूर्ण न्यायिक मान्यता दी। फिर भी उनका व्यक्तित्व राज्यों के समान पूर्ण नहीं है, वह व्युत्पन्न, सीमित और कार्यात्मक है। इस प्रकार आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में राज्य के बाद अंतरराष्ट्रीय संगठन एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक विषय के रूप में स्थापित हो चुके हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय विधि में व्यक्ति एवं गैर-राज्य अभिकर्ता - 
अंतरराष्ट्रीय विधि में व्यक्ति एवं गैर-राज्य अभिकर्ता (Individuals and Non-State Actors) आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि का बहुत महत्वपूर्ण विषय है। परंपरागत अंतरराष्ट्रीय विधि में लगभग पूरा ध्यान राज्यों पर था, लेकिन आज मानवाधिकार, अंतरराष्ट्रीय आपराधिक विधि, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, पर्यावरण, आतंकवाद-निरोध, शरणार्थी कानून और वैश्विक शासन के विकास के कारण व्यक्ति तथा अनेक गैर-राज्य अभिकर्ता भी अंतरराष्ट्रीय विधि के प्रभावी भागीदार बन गए हैं।
परंपरागत दृष्टिकोण के अनुसार अंतरराष्ट्रीय विधि राज्यों के बीच संबंधों को नियंत्रित करने वाली विधि थी। राज्य ही संधियाँ करते थे, अंतरराष्ट्रीय दायित्व स्वीकार करते थे और अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों के समक्ष विवाद प्रस्तुत करते।
इस दृष्टिकोण में व्यक्ति को अंतरराष्ट्रीय विधि का विषय (Subject) नहीं माना जाता था। व्यक्ति केवल अपने राज्य के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय विधि से संबंधित अधिकार या संरक्षण प्राप्त करता था।लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय विधि में बड़ा परिवर्तन आया। मानवाधिकार कानून और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक विधि के विकास ने व्यक्ति को सीधे अंतरराष्ट्रीय विधि के अधिकारों और दायित्वों का धारक बना दिया। इसी प्रकार आज अनेक गैर-राज्य अभिकर्ता (Non-State Actors) अंतरराष्ट्रीय संबंधों और अंतरराष्ट्रीय विधि के निर्माण, क्रियान्वयन तथा अनुपालन को प्रभावित करते हैं।
गैर-राज्य अभिकर्ता का अर्थगैर-राज्य अभिकर्ता से आशय ऐसे व्यक्तियों या संगठनों से है जो राज्य नहीं हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सरल शब्दों में जो अभिकर्ता राज्य नहीं है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय संबंधों, अंतरराष्ट्रीय निर्णयों या अंतरराष्ट्रीय विधि के निर्माण अथवा क्रियान्वयन को प्रभावित करता है, उसे गैर-राज्य अभिकर्ता कहा जा सकता है।
इसके अंतर्गतव्यक्ति, अंतरराष्ट्रीय संगठन, गैर-सरकारी संगठन (NGOs),  बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, सशस्त्र गैर-राज्य समूह, विद्रोही एवं युद्धरत समूह,  कुछ मामलों में मुक्ति आंदोलन, अंतरराष्ट्रीय न्यायिक एवं अर्ध-न्यायिक संस्थाएँ एवं।अन्य वैश्विक नागरिक समाज संगठन आते हैं। सभी गैर-राज्य अभिकर्ता अंतरराष्ट्रीय विधि के पूर्ण विधिक विषय (full subjects) नहीं हैं। उनके अधिकार, दायित्व और विधिक व्यक्तित्व उनकी प्रकृति तथा संबंधित अंतरराष्ट्रीय नियमों पर निर्भर करते हैं।
परंपरागत अंतरराष्ट्रीय विधि में व्यक्तिव्यक्ति परंपरागत विधि का विषय नहीं बल्कि वस्तु (object) माना जाता था। उस समय यह माना जाता था कि अंतरराष्ट्रीय विधि राज्यों के बीच संबंधों की विधि है। इसलिए यदि किसी व्यक्ति के साथ किसी दूसरे राज्य में अन्याय होता था, तो सामान्यतः उसका अपना राज्य उसके पक्ष में अंतरराष्ट्रीय दावा करता था। व्यक्ति स्वयं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र रूप से दावा नहीं कर सकता था।
आधुनिक विधि में व्यक्ति की स्थितिआधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि ने इस स्थिति को काफी बदल दिया है। आज व्यक्ति को कुछ परिस्थितियों में अधिकार प्राप्त हैं जैसे
• जीवन का अधिकार, 
• स्वतंत्रता का अधिकार, 
• यातना से मुक्ति, 
• धर्म एवं विचार की स्वतंत्रता, 
• निष्पक्ष न्याय का अधिकार, 
• भेदभाव से सुरक्षा एवं शरणार्थी संरक्षण
व्यक्ति के प्रत्यक्ष अंतरराष्ट्रीय दायित्व
• नरसंहार न करना, 
• युद्ध अपराध न करना
• मानवता के विरुद्ध अपराध न करना
• कुछ परिस्थितियों में आक्रमण के 
• अपराध के लिए दायित्व आदि।
इसलिए आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में व्यक्ति की स्थिति को केवल object मानना पर्याप्त नहीं है।
व्यक्ति अंतरराष्ट्रीय विधि का विषय क्योंकिसी इकाई को अंतरराष्ट्रीय विधि का विषय मानने के लिए यह देखा जाता है कि
I. क्या उसके पास अंतरराष्ट्रीय विधि से प्राप्त अधिकार हैं?
II. क्या उस पर अंतरराष्ट्रीय विधि द्वारा दायित्व लगाए जा सकते हैं?
III. क्या वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने अधिकारों का प्रवर्तन करा सकता है?
IV. क्या उसके पास किसी सीमा तक अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व (International Legal Personality) है?
आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में व्यक्ति इन सभी क्षेत्रों में कुछ हद तक सक्षम हो गया है। हालाँकि उसका विधिक व्यक्तित्व राज्य के समान पूर्ण और व्यापक नहीं है।
मानवाधिकार विधि में व्यक्तिव्यक्ति की अंतरराष्ट्रीय विधिक स्थिति का सबसे बड़ा विकास अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून में हुआ है।
उदाहरणUniversal Declaration of Human Rights, 1948 ने व्यक्ति को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों का केंद्र बना दिया।  इसके बाद 
• International Covenant on Civil and Political Rights, 1966
• International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights, 1966
• Convention Against Torture
• Convention on the Rights of the Child
• Convention on the Elimination of All Forms of Discrimination Against Women
आदि ने व्यक्ति के अधिकारों को अंतरराष्ट्रीय विधि के स्तर पर मजबूत किया।
व्यक्ति का अंतरराष्ट्रीय न्यायिक संस्थाओं तक पहुँचनाआधुनिक मानवाधिकार व्यवस्था में कुछ अंतरराष्ट्रीय या क्षेत्रीय संस्थाएँ व्यक्तियों को शिकायत करने का अवसर देती हैं।
उदाहरणयूरोपीय मानवाधिकार प्रणाली में कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति European Court of Human Rights के समक्ष अपने अधिकारों के उल्लंघन की शिकायत कर सकता है। इसी प्रकार विभिन्न मानवाधिकार संधियों के अंतर्गत कुछ परिस्थितियों में individual communications की व्यवस्था उपलब्ध है। इससे व्यक्ति की अंतरराष्ट्रीय विधिक स्थिति और मजबूत होती है।
अंतरराष्ट्रीय आपराधिक विधि में व्यक्तिव्यक्ति की अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व का सबसे स्पष्ट उदाहरण अंतरराष्ट्रीय आपराधिक विधि है। यहाँ व्यक्ति सीधे अंतरराष्ट्रीय अपराध के लिए उत्तरदायी हो सकता है।
उदाहरण
नरसंहार (Genocide)
मानवता के विरुद्ध अपराध (Crimes against humanity)
युद्ध अपराध (War crimes)
हिंसा (Aggression)
यदि कोई व्यक्ति अंतरराष्ट्रीय अपराध करता है तो केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि मैं तो राज्य की ओर से कार्य कर रहा था। कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति स्वयं अंतरराष्ट्रीय आपराधिक दायित्व के अधीन आता है।
नूर्नबर्ग सिद्धांतद्वितीय विश्वयुद्ध के बाद Nuremberg Trials ने व्यक्ति के अंतरराष्ट्रीय दायित्व के सिद्धांत को विशेष रूप से मजबूत किया। नूर्नबर्ग का मूल विचार था कि अंतरराष्ट्रीय अपराध व्यक्ति द्वारा किए जाते हैं, केवल अमूर्त राज्य द्वारा नहीं। इससे यह सिद्धांत मजबूत हुआ कि व्यक्ति अंतरराष्ट्रीय विधि का प्रत्यक्ष दायित्व-धारक हो सकता है।
International Criminal Court और व्यक्तिInternational Criminal Court (ICC) आधुनिक अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्याय का प्रमुख संस्थान है। यह राज्य को नहीं बल्कि व्यक्तियों को अंतरराष्ट्रीय अपराधों के लिए अभियोजित करता है, अपने अधिकार क्षेत्र एवं Rome Statute की शर्तों के अधीन। इससे व्यक्ति की अंतरराष्ट्रीय विधि में स्थिति और स्पष्ट होती है।
व्यक्ति और राजनयिक संरक्षणपरंपरागत अंतरराष्ट्रीय विधि में यदि किसी व्यक्ति के अधिकार का विदेश में उल्लंघन होता था, तो वह सीधे अंतरराष्ट्रीय दावा नहीं कर सकता था।उसका राज्य Diplomatic Protection के माध्यम से उसका मामला उठा सकता था। इससे स्पष्ट होता है कि ऐतिहासिक रूप से व्यक्ति की स्थिति राज्य पर काफी निर्भर थी। लेकिन आधुनिक मानवाधिकार कानून ने व्यक्ति को स्वयं कुछ अंतरराष्ट्रीय अधिकारों का धारक बनाकर इस निर्भरता को कम किया है।
अंतरराष्ट्रीय विधि में व्यक्ति की सीमित विधिक व्यक्तित्वयह कहना उचित नहीं होगा कि व्यक्ति अब राज्यों के समान पूर्ण अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व रखता है।व्यक्ति - 
• संधियाँ नहीं कर सकता
• राज्य की तरह संप्रभुता का दावा नहीं कर सकता
• अंतरराष्ट्रीय संगठनों की स्थापना राज्य की तरह नहीं करता
• सामान्यतः ICJ में सीधे पक्षकार नहीं बन सकता।
इसलिए व्यक्ति आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि का सीमित अथवा विशिष्ट क्षेत्राधिकार वाला विधिक विषय है।
गैर-राज्य अभिकर्ता का उदयवैश्वीकरण ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों को बहुत बदल दिया है। आज केवल सरकारें ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव नहीं डालतीं बल्कि कुछ संस्थाएं, व्यक्ति या समूह भी प्रभाव डालते हैं। इसमें - 
• बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ
• मानवाधिकार संगठन
• पर्यावरण संगठन
• गैर-सरकारी संगठन (NGOs)
• अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठन
• विद्रोही समूह
• मुक्ति आंदोलन
• वैश्विक नागरिक समाज
• विशेषज्ञ संस्थाएँ
अंतरराष्ट्रीय निर्णयों और नीतियों को प्रभावित करते हैं।
गैर-सरकारी संगठन (NGOs) - NGOs आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के महत्वपूर्ण गैर-राज्य अभिकर्ता हैं।
उदाहरण
• Amnesty International
• Human Rights Watch
• International Committee of the Red Cross (ICRC)
का कार्य है - 
• मानवाधिकारों की निगरानी।
• युद्ध पीड़ितों की सहायता।
• पर्यावरण संरक्षण।
• शरणार्थियों की सहायता।
• अंतरराष्ट्रीय कानून के विकास के लिए अभियान।
• सरकारों पर अंतरराष्ट्रीय दबाव।
हालाँकि NGOs को राज्यों के समान पूर्ण अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व प्राप्त नहीं है।
International Committee of the Red Cross (ICRC)ICRC एक विशेष प्रकार का गैर-राज्य अभिकर्ता है।यह अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी स्थिति सामान्य NGO से अलग और विशिष्ट है।
• युद्धबंदियों के संबंध में कार्य।
• सशस्त्र संघर्षों में मानवीय सहायता।
• International Humanitarian Law के पालन को बढ़ावा देना।
• जिनेवा अभिसमयों से संबंधित कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना।
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (MNCs) - आज बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी अंतरराष्ट्रीय विधि को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण शक्तियाँ हैं।
उदाहरण - 
• वैश्विक तकनीकी कंपनियाँ
• ऊर्जा कंपनियाँ
• दवा कंपनियाँ
• वित्तीय संस्थाएँ
• खनन कंपनियाँ
इनका प्रभाव 
• अंतरराष्ट्रीय व्यापार
• निवेश
• पर्यावरण
• श्रम अधिकार
• मानवाधिकार
• डेटा और तकनीक पर पड़ता है।
कुछ अंतरराष्ट्रीय निवेश विवादों में कंपनियाँ और विदेशी निवेशक अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की कार्यवाहियों में भी पक्षकार बन सकते हैं, जहाँ संबंधित संधि और नियम इसकी अनुमति देते हैं।
सशस्त्र गैर-राज्य समूहसशस्त्र संघर्षों में राज्य के अतिरिक्त कुछ संगठित समूह भी महत्वपूर्ण होते हैं।
उदाहरण - 
• विद्रोही समूह
• insurgent groups
• belligerent groups
• कुछ मुक्ति आंदोलन
अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि के कुछ नियम ऐसे समूहों पर भी लागू हो सकते हैं। विशेष रूप से Common Article 3 of the Geneva Conventions गैर-अंतरराष्ट्रीय सशस्त्र संघर्षों में कुछ न्यूनतम मानवीय मानकों को लागू करता है। इसका अर्थ यह है कि कुछ परिस्थितियों में गैर-राज्य सशस्त्र समूह भी अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि के दायित्वों से प्रभावित होते हैं।
राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनकुछ ऐतिहासिक परिस्थितियों में National Liberation Movements को अंतरराष्ट्रीय विधि में विशेष स्थान प्राप्त हुआ। उपनिवेशवाद और आत्मनिर्णय के संघर्षों के संदर्भ में कुछ मुक्ति आंदोलनों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष मान्यता मिली। इनका संबंध विशेष रूप से Right to Self-Determination से रहा है।
19. अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठन
आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में आतंकवादी संगठन भी महत्वपूर्ण गैर-राज्य अभिकर्ता हैं। हालाँकि उन्हें वैध अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व प्राप्त नहीं होता फिर भी वे
• अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा को प्रभावित करते हैं।
• राज्यों की सुरक्षा नीतियों को प्रभावित करते हैं।
• अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद-रोधी कानून के विकास को प्रेरित करते हैं।
इसलिए वे अंतरराष्ट्रीय संबंधों के actor हो सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें स्वतः अंतरराष्ट्रीय विधि का वैध subject माना जाए।
गैर-राज्य अभिकर्ताओं की अंतरराष्ट्रीय विधि में भूमिकागैर-राज्य अभिकर्ता पाँच प्रकार से भूमिका निभाते हैं - 
I. विधि निर्माण को प्रभावित करनाNGOs और विशेषज्ञ संगठन नई संधियों और अंतरराष्ट्रीय मानकों के निर्माण के लिए दबाव बनाते हैं।
विधि के अनुपालन की निगरानीमानवाधिकार संगठन सरकारों द्वारा मानवाधिकारों के पालन की निगरानी करते हैं।
अंतरराष्ट्रीय नीति निर्माणबहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और नागरिक समाज संगठन अंतरराष्ट्रीय नीतियों को प्रभावित कर सकते हैं।
विवाद समाधानकुछ गैर-राज्य अभिकर्ता अंतरराष्ट्रीय arbitration या अन्य विधिक प्रक्रियाओं में भाग ले सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का पालन
अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के कुछ नियम गैर-राज्य सशस्त्र समूहों पर भी लागू हो सकते हैं।
राज्य और गैर-राज्य अभिकर्ता में अंतर
आधार - राज्य गैर-राज्य - अभिकर्ता
संप्रभुता - होती है - नहीं 
अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व - पूर्ण - सीमित /विशिष्ट
संधि करने की क्षमता - होती है - नहीं
अंतरराष्ट्रीय दायित्व - व्यापक क्षेत्र - विशिष्ट क्षेत्र
ICJ में पक्षकार - राज्य हो सकते हैं - नहीं
मानवाधिकार दायित्व - राज्य पर व्यापक - परिस्थितिनुसार
अंतरराष्ट्रीय प्रभाव - अत्यधिक - कई मामलों में महत्वपूर्ण
व्यक्ति और गैर-राज्य अभिकर्ता में अंतर - 
आधार - व्यक्ति गैर-राज्य - अभिकर्ता
स्वरूप - प्राकृतिक - व्यक्ति व्यक्ति या संगठन/समूह
अधिकार - मानवाधिकार आदि - उनकी प्रकृति के अनुसार
दायित्व - अंतरराष्ट्रीय अपराधों में प्रत्यक्ष दायित्व संभव - कुछ समूहों पर विशेष दायित्व
विधिक व्यक्तित्व - सीमित अलग-अलग स्तर का
उदाहरण - आरोपी - मानवाधिकार धारक NGO, MNC, सशस्त्र समूह
आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में इनका बढ़ता महत्वआज अंतरराष्ट्रीय विधि को केवल States-only system मानना उचित नहीं है। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में - राज्य + अंतरराष्ट्रीय संगठन + व्यक्ति + NGOs + MNCs + अन्य गैर-राज्य अभिकर्ता मिलकर एक अधिक जटिल अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाते हैं। इसे आप इस प्रकार याद रख सकते हैं - 
परंपरागत अंतरराष्ट्रीय विधि में राज्य केंद्र में था, आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में राज्य के साथ व्यक्ति और विभिन्न गैर-राज्य अभिकर्ताओं की भूमिका भी बढ़ गई है।
क्या हर गैर-राज्य अभिकर्ता अंतरराष्ट्रीय विधि का विषय है नहीं।Actor (अभिकर्ता) और Subject (विधिक विषय) समान शब्द नहीं हैं। कोई संस्था अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित कर सकती है, लेकिन इससे उसे स्वतः अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व प्राप्त नहीं हो जाता।
उदाहरणकोई बड़ी कंपनी अंतरराष्ट्रीय राजनीति और व्यापार को बहुत प्रभावित कर सकती है, लेकिन केवल इस कारण वह राज्य के समान अंतरराष्ट्रीय विधि का पूर्ण subject नहीं बन जाती। इसलिए अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व एक spectrum की तरह है, जिसमें अलग-अलग अभिकर्ताओं के अधिकार और दायित्व अलग-अलग स्तर पर होते हैं।
अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व का बदलता स्वरूप - आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि विधिक व्यक्तित्व अब या तो है या नहीं है वाला प्रश्न नहीं रह गया है। 
किसी इकाई के पास - 
• कुछ अधिकार हो सकते हैं।
• कुछ दायित्व हो सकते हैं।
• कुछ अंतरराष्ट्रीय प्रक्रियाओं तक पहुँच हो सकती है लेकिन राज्य जैसी पूर्ण क्षमता न हो।
इसलिए व्यक्ति और गैर-राज्य अभिकर्ताओं का विधिक व्यक्तित्व कार्यात्मक (functional) और सीमित (limited) हो सकता है।
महत्वपूर्ण न्यायिक संदर्भ
(I) Reparation for Injuries - Suffered in the Service of the United Nations, ICJ, 1949
यह मामला मुख्यतः अंतरराष्ट्रीय संगठनों के विधिक व्यक्तित्व के लिए प्रसिद्ध है।अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व की क्षमता को स्वीकार किया। यह मामला व्यापक सिद्धांत को समझने में मदद करता है कि अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व केवल राज्यों तक सीमित नहीं है।
(II) Nuremberg Trialsइनसे व्यक्ति के प्रत्यक्ष अंतरराष्ट्रीय आपराधिक दायित्व का सिद्धांत मजबूत हुआ।
आलोचनात्मक दृष्टिकोणव्यक्ति एवं गैर-राज्य अभिकर्ताओं की बढ़ती भूमिका के बावजूद कुछ समस्याएँ हैं - 
I. विधिक व्यक्तित्व की अस्पष्टतासभी गैर-राज्य अभिकर्ताओं की स्थिति समान नहीं है।
II. उत्तरदायित्व की समस्याबहुराष्ट्रीय कंपनियों या गैर-राज्य समूहों के गलत कार्यों के लिए दायित्व तय करना कठिन हो सकता है।
III. राज्य की प्रधानताअंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में आज भी राज्य सबसे महत्वपूर्ण और व्यापक विधिक विषय हैं।
IV. प्रवर्तन की समस्याव्यक्ति के अधिकारों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू कराने की प्रभावी व्यवस्था हर मामले में उपलब्ध नहीं है।
निष्कर्षअंतरराष्ट्रीय विधि में व्यक्ति और गैर-राज्य अभिकर्ताओं का महत्व आधुनिक युग की एक प्रमुख विशेषता है। परंपरागत अंतरराष्ट्रीय विधि में राज्य ही लगभग पूर्ण और प्रमुख विषय था, जबकि व्यक्ति को मुख्यतः राज्य के माध्यम से ही अंतरराष्ट्रीय संरक्षण प्राप्त होता था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मानवाधिकार कानून और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक कानून के विकास ने व्यक्ति को प्रत्यक्ष अंतरराष्ट्रीय अधिकारों और दायित्वों का धारक बनाया।
इसी प्रकार NGOs, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, ICRC, राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन और कुछ सशस्त्र गैर-राज्य समूह अंतरराष्ट्रीय विधि के निर्माण, विकास, अनुपालन और क्रियान्वयन को प्रभावित करते हैं। फिर भी गैर-राज्य अभिकर्ता होने मात्र से किसी संस्था को राज्य के समान पूर्ण अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यक्तित्व प्राप्त नहीं होता।
सूत्र - 
परंपरागत अंतरराष्ट्रीय विधि = राज्य-केंद्रित
आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि = राज्य + अंतरराष्ट्रीय संगठन + व्यक्ति + गैर-राज्य अभिकर्ता”
सबसे महत्वपूर्णहर Non-State Actor, International Legal Subject नहीं होता, लेकिन अनेक Non-State Actors आधुनिक International Law के महत्वपूर्ण Actors हैं।

राज्य - अधिकार, कर्तव्य एवं मान्यता अंतरराष्ट्रीय विधि में राज्य (State) सबसे प्रमुख और पारंपरिक विषय माना जाता है। किसी राज्य के अस्तित्व के साथ उसे कुछ अंतरराष्ट्रीय अधिकार प्राप्त होते हैं और उसके ऊपर कुछ अंतरराष्ट्रीय कर्तव्य भी लागू होते हैं। इसी प्रकार, जब कोई नया राज्य अस्तित्व में आता है अथवा किसी राज्य में नई सरकार सत्ता में आती है, तो अन्य राज्यों के सामने यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि उसे अंतरराष्ट्रीय संबंधों में मान्यता (Recognition) दी जाए या नहीं।
राज्य के अधिकारों का अर्थराज्य के अधिकारों से आशय उन शक्तियों और दावों से है जिन्हें अंतरराष्ट्रीय विधि राज्य को प्रदान करती है और जिनके आधार पर वह अन्य राज्यों से अपने हितों के सम्मान की अपेक्षा कर सकता है। राज्य के प्रमुख अधिकार निम्नलिखित हैं - 
(1) संप्रभुता का अधिकारप्रत्येक स्वतंत्र राज्य को अपने क्षेत्र तथा अपनी जनता पर सर्वोच्च अधिकार प्राप्त होता है।
संप्रभुता के दो प्रमुख पक्ष हैं - 
क. आंतरिक संप्रभुता - राज्य अपने क्षेत्र के भीतर कानून बनाने और शासन करने में स्वतंत्र है।
ख. बाह्य संप्रभुता - राज्य अन्य राज्यों के अधीन नहीं होता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकता है।
इसका अर्थ यह है कि कोई अन्य राज्य किसी स्वतंत्र राज्य के आंतरिक एवं बाहरी मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
राज्य की स्वतंत्रता का अधिकार - प्रत्येक संप्रभु राज्य को स्वतंत्र रूप से।अपनी राजनीतिक व्यवस्था निर्धारित करने, आर्थिक नीतियाँ बनाने, विदेश नीति निर्धारित करने, अन्य राज्यों से संबंध स्थापित करने और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भाग लेने का अधिकार होता है।
क्षेत्रीय अखंडता का अधिकार - राज्य को अपने क्षेत्र की अखंडता और सुरक्षा बनाए रखने का अधिकार है। अन्य राज्य उसके क्षेत्र पर बलपूर्वक कब्जा नहीं कर सकते। क्षेत्रीय अखंडता के सिद्धांत का संबंध बल-प्रयोग के निषेध से भी है।
राजनीतिक स्वतंत्रता का अधिकारराज्य को यह अधिकार है कि वह अपने राजनीतिक, प्रशासनिक और संवैधानिक स्वरूप का निर्धारण स्वयं करे। किसी दूसरे राज्य को यह अधिकार नहीं है कि वह किसी राज्य पर अपनी शासन-पद्धति थोपे।
समानता का अधिकारअंतरराष्ट्रीय विधि में राज्यों की कानूनी समानता का सिद्धांत स्वीकार किया गया है। इसे Sovereign Equality of States कहा जाता है। इसका अर्थ है कि बड़े और छोटे, शक्तिशाली और कमजोर राज्य कानूनी दृष्टि से संप्रभु समानता रखते हैं।
उदाहरण - भारत, फ्रांस या किसी छोटे राज्य की संप्रभुता का कानूनी सिद्धांत समान है, भले ही उनकी आर्थिक या सैन्य शक्ति अलग-अलग हो।
आत्मरक्षा का अधिकारयदि किसी राज्य के विरुद्ध सशस्त्र हमला होता है, तो उसे व्यक्तिगत अथवा सामूहिक आत्मरक्षा का अधिकार प्राप्त है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 51 आत्मरक्षा के अधिकार को मान्यता देता है। हालाँकि यह अधिकार असीमित नहीं है। आत्मरक्षा की कार्रवाई आवश्यक और परिस्थितियों के अनुरूप होनी चाहिए तथा संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था के अंतर्गत इसके संबंध में आवश्यक सूचना देनी होती है।
अस्तित्व का अधिकारप्रत्येक राज्य को अपने अस्तित्व और स्वतंत्रता की रक्षा करने का अधिकार है। किसी राज्य को केवल उसकी कमजोरी के कारण समाप्त नहीं किया जा सकता।
क्षेत्राधिकार का अधिकारराज्य अपने क्षेत्र में व्यक्तियों, संपत्ति और घटनाओं के संबंध में कानून बना सकता है तथा उनका प्रवर्तन कर सकता है। इसे राज्य का Territorial Jurisdiction कहा जाता है। कुछ परिस्थितियों में राज्य अपने नागरिकों के संबंध में क्षेत्र के बाहर भी अधिकार क्षेत्र का प्रयोग कर सकता है।
राजनयिक संबंध स्थापित करने का अधिकार - राज्य को अन्य राज्यों के साथ
राजनयिक संबंध स्थापित करने, राजदूत भेजने, राजदूत स्वीकार करने, संधियाँ करने का अधिकार है। हालाँकि किसी दूसरे राज्य के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करना सामान्यतः दोनों पक्षों की सहमति पर निर्भर करता है।
संधि करने का अधिकारसंप्रभु राज्य अन्य राज्यों अथवा अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ अंतरराष्ट्रीय संधियाँ कर सकते हैं।
उदाहरण - शांति संधि, व्यापार संधि, सीमा संबंधी संधि, रक्षा संबंधी समझौता,  पर्यावरण संबंधी संधि आदि।
राज्यों के अंतरराष्ट्रीय कर्तव्य अधिकारों के साथ राज्य पर कुछ अंतरराष्ट्रीय दायित्व भी होते हैं। अंतरराष्ट्रीय विधि में राज्य यह दावा नहीं कर सकता कि संप्रभुता का अर्थ उसे कुछ भी करने की असीमित स्वतंत्रता है।
(1) अन्य राज्यों की संप्रभुता का सम्मान करनाप्रत्येक राज्य का कर्तव्य है कि वह दूसरे राज्यों की स्वतंत्रता, संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करे।
(2) आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करनाएक राज्य को दूसरे राज्य के घरेलू मामलों में अनुचित हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
उदाहरण - किसी दूसरे राज्य की सरकार को बलपूर्वक बदलने का प्रयास अंतरराष्ट्रीय विधि के मूलभूत सिद्धांतों के विरुद्ध हो सकता है।
(3) बल-प्रयोग से बचनासंयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) राज्यों को दूसरे राज्य की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल के प्रयोग या बल की धमकी से रोकता है।
इस नियम के कुछ मान्य अपवाद अंतरराष्ट्रीय विधि में मौजूद हैं, जैसे सुरक्षा परिषद द्वारा अधिकृत कार्रवाई तथा अनुच्छेद 51 के अंतर्गत आत्मरक्षा।
(4) अंतरराष्ट्रीय विवादों का शांतिपूर्ण समाधान - राज्यों का कर्तव्य है कि वे अपने अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान शांतिपूर्ण साधनों से करें। जैसे वार्ता,  मध्यस्थता, सुलह, पंचाट एवं न्यायिक समाधान।
(5) अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का पालनराज्य द्वारा स्वीकार की गई वैध अंतरराष्ट्रीय संधियों और अन्य अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का ईमानदारी से पालन किया जाना चाहिए। यह सिद्धांत Pacta Sunt Servanda कहलाता है, अर्थात वैध समझौतों का पालन किया जाना चाहिए।
(6). मानवाधिकारों का सम्मानआधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में राज्यों से अपेक्षा की जाती है कि वे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दायित्वों का सम्मान करें।
(7) दूसरे राज्यों को हानि से बचानाराज्य को अपने क्षेत्र का इस प्रकार उपयोग नहीं करना चाहिए कि उससे दूसरे राज्यों या उनके अधिकारों को गंभीर अंतरराष्ट्रीय क्षति पहुँचे।
उदाहरण - यदि किसी राज्य के क्षेत्र से ऐसी गतिविधि संचालित हो जिससे दूसरे राज्य को गंभीर पर्यावरणीय या अन्य अंतरराष्ट्रीय क्षति हो, तो जिम्मेदारी उत्पन्न हो सकती है।
(8) अंतरराष्ट्रीय सहयोग का कर्तव्यआधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में राज्यों से शांति, सुरक्षा, मानवाधिकार, पर्यावरण और अन्य वैश्विक समस्याओं के समाधान में सहयोग की अपेक्षा की जाती है।
अधिकार और कर्तव्य का संबंधराज्य के अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। 
सूत्रअंतरराष्ट्रीय अधिकार = दूसरे राज्यों पर कुछ सम्मान/दायित्व की अपेक्षा
अंतरराष्ट्रीय कर्तव्य = अपने अधिकारों के प्रयोग पर विधिक सीमाएँ
उदाहरण - भारत को अपनी संप्रभुता का अधिकार है, लेकिन भारत को भी दूसरे राज्यों की संप्रभुता का सम्मान करना होगा।
राज्यों की मान्यतामान्यता (Recognition) से आशय उस औपचारिक अथवा व्यवहारिक स्वीकृति से है जिसके द्वारा कोई राज्य यह स्वीकार करता है कि कोई इकाई राज्य के रूप में अस्तित्व में आ गई है और वह उसके साथ अंतरराष्ट्रीय संबंध स्थापित करने के लिए तैयार है। सरल शब्दों में मान्यता का अर्थ है किसी नई राजनीतिक इकाई को अंतरराष्ट्रीय संबंधों में राज्य के रूप में स्वीकार करना।
उदाहरण - यदि किसी क्षेत्र में नई स्वतंत्र राजनीतिक इकाई बनती है, तो अन्य राज्य यह निर्णय ले सकते हैं कि वे उसे स्वतंत्र राज्य के रूप में मान्यता देंगे या नहीं।
राज्य की मान्यता की आवश्यकताराज्य की मान्यता के बाद 
• राजनयिक संबंध स्थापित करना आसान होता है।
• संधियाँ करना संभव होता है।
• अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भागीदारी का मार्ग खुल सकता है।
• न्यायालयों में उसकी स्थिति मजबूत हो सकती है।
• उसके सरकारी कृत्यों को अन्य राज्यों में मान्यता मिल सकती है।
लेकिन एक महत्वपूर्ण बात है कि मान्यता और राज्य का अस्तित्व एक ही बात नहीं हैं। किसी इकाई के राज्य होने के प्रश्न और अन्य राज्यों द्वारा उसे मान्यता दिए जाने के प्रश्न में अंतर किया जाता है।
राज्य की मान्यता के सिद्धांत - मान्यता के संबंध में दो सिद्धांत प्रसिद्ध हैं - 
(A) संस्थापक सिद्धांत (Constitutive) Theory - इस सिद्धांत के अनुसार कोई राजनीतिक इकाई तब तक पूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व प्राप्त नहीं करती जब तक अन्य राज्यों द्वारा उसे मान्यता न दी जाए। अर्थात  Recognition creates international personality. इस सिद्धांत के अनुसार मान्यता का महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि अन्य राज्यों की स्वीकृति से नई इकाई अंतरराष्ट्रीय समुदाय में प्रभावी रूप से प्रवेश करती है।
आलोचनाइस सिद्धांत की प्रमुख आलोचना यह है कि यदि राज्य का अस्तित्व अन्य राज्यों की इच्छा पर निर्भर कर दिया जाए तो राज्यत्व का प्रश्न अत्यधिक राजनीतिक हो जाएगा। एक राज्य कुछ राज्यों द्वारा मान्यता प्राप्त कर सकता है और कुछ द्वारा नहीं। इसलिए केवल मान्यता को राज्य के अस्तित्व का निर्णायक आधार मानना कठिन है।
(B) घोषणात्मक सिद्धांत / Declaratory Theoryयह सिद्धांत मानता है कि राज्य का अस्तित्व अन्य राज्यों की मान्यता पर निर्भर नहीं करता।यदि कोई इकाई राज्य बनने की आवश्यक वस्तुगत शर्तों को पूरा करती है, तो वह राज्य हो सकती है, भले ही कुछ राज्यों ने उसे औपचारिक मान्यता न दी हो। इस सिद्धांत का संबंध Montevideo Convention, 1933 में व्यक्त राज्यत्व की प्रसिद्ध शर्तों से जोड़ा जाता है।
मुख्य शर्तें हैं - 
1. स्थायी जनसंख्या
2. निश्चित क्षेत्र
3. सरकार
4. अन्य राज्यों के साथ संबंध स्थापित करने की क्षमता
इस सिद्धांत का मूल विचार है - मान्यता राज्य का निर्माण नहीं करती, बल्कि पहले से विद्यमान राज्य की स्थिति को स्वीकार करती है। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में घोषणात्मक दृष्टिकोण को सामान्यतः अधिक स्वीकार्यता प्राप्त है, यद्यपि व्यवहार में मान्यता का राजनीतिक और व्यावहारिक महत्व अत्यंत अधिक है।
मान्यता के प्रकार
(1) वास्तविक मान्यता / De facto Recognition - जब कोई राज्य किसी नई राजनीतिक सत्ता को वास्तविक नियंत्रण और स्थायित्व के आधार पर सीमित रूप से स्वीकार करता है, लेकिन उसके पूर्ण और स्थायी राज्यत्व के बारे में अभी निश्चित नहीं है, तो इसे De facto recognition कहा जाता है। यह मान्यता अस्थायी या सीमित प्रकृति की मानी जाती है।
(2) विधिक मान्यता / De jure Recognition जब कोई राज्य किसी नई सत्ता को पूर्ण और अंतिम रूप से वैध सरकार अथवा राज्य के रूप में स्वीकार करता है, तो इसे De jure recognition कहा जाता है। यह अधिक पूर्ण और स्थायी प्रकृति की होती है।
De facto और De jure में अंतर
आधार - De facto - De jure
प्रकृति - वास्तविक/व्यावहारिक - विधिक/पूर्ण
स्थायित्व - अपेक्षाकृत अस्थायी - अधिक स्थायी
निश्चितता - सीमित - अधिक
संबंध - सीमित हो सकते हैं - व्यापक
उद्देश्य - वास्तविक नियंत्रण को स्वीकार करना - पूर्ण वैधता स्वीकार करना।
व्यक्त और निहित मान्यता
व्यक्त मान्यता/Express Recognition - जब कोई राज्य स्पष्ट घोषणा, नोट या औपचारिक वक्तव्य द्वारा किसी राज्य को मान्यता देता है।
निहित मान्यता/Implied Recognitionजब राज्य बिना औपचारिक घोषणा के ऐसे व्यवहार करता है जिससे मान्यता का स्पष्ट संकेत मिलता है।
उदाहरण - नई सत्ता के साथ ऐसे औपचारिक अंतरराष्ट्रीय संबंध स्थापित करना जो राज्य के रूप में उसकी स्वीकृति को दर्शाते हों। हालाँकि केवल किसी प्रकार का संपर्क या व्यावहारिक व्यवहार हमेशा मान्यता का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जाता।
मान्यता देने के प्रभावजब किसी राज्य को मान्यता मिलती है, तो इसके कई महत्वपूर्ण प्रभाव होते हैं - 
(1) राजनयिक संबंधमान्यता प्राप्त इकाई के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करना आसान हो जाता है।
(2) संधि संबंधवह अन्य राज्यों के साथ अंतरराष्ट्रीय समझौते करने की स्थिति में आती है।
(3) न्यायिक प्रभावकुछ परिस्थितियों में मान्यता प्राप्त राज्य के सरकारी कृत्यों को विदेशी न्यायालयों में अधिक सम्मान मिलता है।
(4) संपत्ति संबंधी अधिकारविदेशी क्षेत्र में राज्य की सरकारी संपत्ति और अधिकारों को मान्यता मिलने में सहायता होती है।
(5) अंतरराष्ट्रीय संगठनों में सहभागिता - मान्यता व्यावहारिक रूप से अंतरराष्ट्रीय संगठनों में भागीदारी के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है, यद्यपि सदस्यता अपने अलग नियमों के अधीन होती है।
सरकारों की मान्यता - सरकार की मान्यता (Recognition of Government) राज्य की मान्यता से अलग अवधारणा है। राज्य पहले से अस्तित्व में हो सकता है, लेकिन उसके भीतर क्रांति, सैन्य तख्तापलट, गृहयुद्ध,  संवैधानिक परिवर्तन के कारण नई सरकार सत्ता में आ सकती है, ऐसी स्थिति में दूसरे राज्य यह तय करते हैं कि वे नई सत्ता को उस राज्य की वैध सरकार के रूप में स्वीकार करते हैं या नहीं।
दोनों में अंतर है - 
राज्य की मान्यता = राज्य के अस्तित्व की स्वीकृति
सरकार की मान्यता = उस राज्य पर शासन करने वाली सत्ता की स्वीकृति
सरकार को मान्यता देने के आधार - परंपरागत रूप से सरकार की मान्यता के लिए कुछ महत्वपूर्ण तत्व देखे जाते हैं:
(1) प्रभावी नियंत्रणनई सरकार का राज्य के अधिकांश महत्वपूर्ण क्षेत्र और प्रशासन पर वास्तविक नियंत्रण होना महत्वपूर्ण माना जाता है।
(2) स्थायित्वयह देखा जाता है कि नई सरकार के पास शासन चलाने की पर्याप्त स्थिरता है या नहीं।
(3) जनता पर प्रशासनिक नियंत्रण - सरकार वास्तव में प्रशासन, कानून-व्यवस्था और राज्य की संस्थाओं को संचालित कर रही है या नहीं।
(4) अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का पालननई सरकार द्वारा पूर्व सरकार के अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का सम्मान करने की क्षमता और इच्छा भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
(5) संवैधानिक वैधतायदि सरकार संवैधानिक प्रक्रिया के अनुसार सत्ता में आई है तो उसकी मान्यता सामान्यतः कम विवादास्पद होती है।
सरकार की मान्यता और प्रभावी नियंत्रण - परंपरागत अंतरराष्ट्रीय व्यवहार में effective control अर्थात प्रभावी नियंत्रण का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। यदि कोई नई सत्ता - 
• राजधानी पर नियंत्रण रखती है।
• प्रशासन चला रही है।
• सेना/पुलिस पर नियंत्रण रखती है।
• कानून लागू कर रही है।
• राज्य के अधिकांश क्षेत्र पर प्रभावी शासन कर रही है।
तो दूसरे राज्य उसे सरकार के रूप में मान्यता देने पर विचार कर सकते हैं लेकिन आधुनिक समय में केवल प्रभावी नियंत्रण ही हमेशा पर्याप्त नहीं माना जाता। लोकतांत्रिक वैधता, संवैधानिक व्यवस्था, मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय वैधानिकता भी राजनीतिक एवं कानूनी विचारों को प्रभावित कर सकते हैं।
सरकार की मान्यता के प्रकार - सरकार की मान्यता भी मुख्यत - 
(1) De facto Recognitionनई सरकार के वास्तविक नियंत्रण को स्वीकार करना, लेकिन उसकी स्थायित्व अथवा पूर्ण वैधता के संबंध में कुछ अनिश्चितता रखना।
(2) De jure Recognitionनई सरकार को उस राज्य की पूर्ण और वैध सरकार के रूप में स्वीकार करना।
मान्यता वापस लेनापरंपरागत सिद्धांत के अनुसार परिस्थितियों में परिवर्तन होने पर मान्यता के संबंध में राज्य अपनी नीति बदल सकता है। लेकिन राज्य की मान्यता और सरकार की मान्यता को अलग-अलग देखना आवश्यक है।
उदाहरण - किसी राज्य की सरकार बदल जाने से वह राज्य अंतरराष्ट्रीय कानून के लिए समाप्त नहीं हो जाता। राज्य बना रहता है, सरकार बदलती है। राज्य की मान्यता एक बार देने के बाद वापस नहीं ली जा सकती।
राज्य और सरकार की मान्यता में अंतर 
आधार राज्य की मान्यता सरकार की मान्यता

विषय - राज्य - सरकार।
मुख्य प्रश्न - क्या यह राजनीतिक इकाई एक राज्य है? - क्या यह उस राज्य की सरकार है?
परिवर्तन - अपेक्षाकृत स्थायी - सरकार बदलने पर पुनः प्रश्न उठ सकता है।
उद्देश्य राज्य के अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व को स्वीकार करनाशासन करने वाली सत्ता को स्वीकार करना।
उदाहरण - नए स्वतंत्र राज्य का उभरना - तख्तापलट के बाद नई सरकार का आना
मान्यता और अंतरराष्ट्रीय विधिमान्यता केवल कानूनी विषय नहीं बल्कि राजनीतिक + कानूनी दोनों विषय है। किसी राज्य द्वारा मान्यता देने के निर्णय में ये बातें प्रभाव डाल सकती हैं - 
• अंतरराष्ट्रीय कानून।
• राजनीतिक हित।
• क्षेत्रीय स्थिरता।
• मानवाधिकार।
• लोकतांत्रिक वैधता।
• राष्ट्रीय सुरक्षा।
• विदेश नीति।
इसलिए मान्यता को केवल एक यांत्रिक कानूनी प्रक्रिया समझना उचित नहीं है।
राज्य के अधिकार
1. संप्रभुता का अधिकार
2. स्वतंत्रता का अधिकार
3. समानता का अधिकार
4. क्षेत्रीय अखंडता का अधिकार
5. अस्तित्व का अधिकार
6. आत्मरक्षा का अधिकार
7. क्षेत्राधिकार का अधिकार
8. राजनयिक संबंध स्थापित करने का अधिकार
9. संधि करने का अधिकार
राज्य के कर्तव्य
1. अन्य राज्यों की संप्रभुता का सम्मान
2. आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना
3. बल-प्रयोग से बचना
4. विवादों का शांतिपूर्ण समाधान
5. अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का पालन
6. मानवाधिकारों का सम्मान
7. दूसरे राज्यों को अंतरराष्ट्रीय क्षति से बचाना
8. अंतरराष्ट्रीय सहयोग करना
मान्यता के सिद्धांत
Constitutive Theory
Declaratory Theory
मान्यता के प्रकार - 
De facto
De jure
Express
Implied
राज्य और सरकार की मान्यता में मूल अंतर
State Recognition राज्य के अस्तित्व को स्वीकार करती है, जबकि Government Recognition किसी राज्य की शासन-सत्ता को स्वीकार करती है।
निष्कर्षअंतरराष्ट्रीय विधि में राज्य को केवल अधिकारों का धारक नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्वों का वहनकर्ता भी माना जाता है। उसकी संप्रभुता उसे स्वतंत्र रूप से कार्य करने की शक्ति देती है, लेकिन यही संप्रभुता उसे दूसरे राज्यों की संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय विधि का सम्मान करने के लिए बाध्य करती है। इसी प्रकार, मान्यता अंतरराष्ट्रीय समुदाय में किसी राज्य या सरकार की व्यावहारिक स्थिति को अत्यंत प्रभावित करती है। राज्य की मान्यता और सरकार की मान्यता में अंतर करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। राज्य स्थायी अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व रख सकता है, जबकि उसकी सरकार समय-समय पर बदल सकती है।
नोटराज्य के अधिकार उसकी संप्रभुता से उत्पन्न होते हैं, उसके कर्तव्य अंतरराष्ट्रीय विधि से सीमित होते हैं, राज्य की मान्यता उसके राज्यत्व की स्वीकृति है और सरकार की मान्यता उस राज्य में शासन करने वाली सत्ता की स्वीकृति है।

अंतर्राष्ट्रीय अधिकारिता का सिद्धांत एवं उन्मुक्तियां - 
अंतर्राष्ट्रीय अधिकारिता एवं संप्रभुता
 अंतरराष्ट्रीय विधि में प्रत्येक राज्य को अपने राज्य-क्षेत्र में कानून बनाने, कानून लागू करने तथा न्यायिक निर्णय देने की शक्ति प्राप्त होती है। इस शक्ति को अधिकारिता (Jurisdiction) कहते हैं।
दूसरी ओर, संप्रभुता (Sovereignty) का अर्थ है कि राज्य अपने क्षेत्र और अपने अधिकार-क्षेत्र में सर्वोच्च सत्ता रखता है तथा सामान्यतः किसी बाहरी राज्य के अधीन नहीं होता। इस प्रकार कहा जा सकता है कि संप्रभुता राज्य की सर्वोच्च सत्ता है, जबकि अधिकारिता उस सत्ता का विधिक प्रयोग है।
अधिकारिता का अर्थ एवं परिभाषाअधिकारिता (Jurisdiction) से आशय राज्य की उस विधिक शक्ति से है जिसके द्वारा वह 
1. कानून बना सकता है
2. कानून लागू कर सकता है
3. न्यायालयों के माध्यम से विवादों का निर्णय कर सकता है तथा
4. अपराधों और व्यक्तियों के संबंध में राज्य की शक्ति का प्रयोग कर सकता है।
अधिकारिता के प्रकार - 
(1) विधायी अधिकारिता (Legislative Jurisdiction) - राज्य की कानून बनाने की शक्ति।
(2) कार्यपालिका/प्रवर्तन अधिकारिता (Executive or Enforcement Jurisdiction) - राज्य की अपने कानूनों को लागू करने और उनका पालन कराने की शक्ति।
(3) न्यायिक अधिकारिता (Judicial Jurisdiction) - न्यायालयों की विवादों और अपराधों पर निर्णय देने की शक्ति।
किसी राज्य के पास कानून बनाने की अधिकारिता होना और उस कानून को दूसरे राज्य के क्षेत्र में जाकर लागू करने की शक्ति होना एक ही बात नहीं है। अंतरराष्ट्रीय विधि में enforcement jurisdiction की क्षेत्रीय सीमाएँ होती हैं - अधिकारिता और संप्रभुता का संबंध - 
अंतरराष्ट्रीय विधि में अधिकारिता का मूल आधार राज्य की संप्रभुता है। उदाहरण के लिए, भारत अपने क्षेत्र में - 
• भारतीय कानून लागू करता है,
• अपराधों पर कार्रवाई करता है,
• भारतीय न्यायालयों के माध्यम से निर्णय कराता है।
√लेकिन भारत किसी दूसरे संप्रभु राज्य के क्षेत्र में अपनी पुलिस या प्रशासनिक शक्ति उसकी सहमति के बिना प्रयोग नहीं कर सकता इसलिए सिद्धांत है एक राज्य की संप्रभुता दूसरे राज्य की संप्रभुता पर समाप्त होती है।
4. प्रादेशिक अधिकारिता (Territorial Jurisdiction) - प्रादेशिक अधिकारिता का अर्थ है कि राज्य को अपने राज्य-क्षेत्र (territory) में व्यक्तियों, संपत्ति, घटनाओं और अपराधों के संबंध में अधिकारिता प्राप्त होती है। यह अधिकारिता अंतरराष्ट्रीय विधि में अधिकारिता का सबसे मूलभूत और व्यापक आधार है।
राज्य-क्षेत्र - 
स्थलीय सीमा
जलीय सीमा 
प्रादेशिक समुद्र
उसके ऊपर का वायु-क्षेत्र
और अंतरराष्ट्रीय विधि के अनुसार कुछ अन्य समुद्री अधिकार-क्षेत्र।
उदाहरणयदि किसी विदेशी नागरिक ने भारत की भूमि पर अपराध किया है, तो केवल विदेशी नागरिक होने के कारण वह भारतीय अधिकारिता से बाहर नहीं हो जाता। अपराध भारत के क्षेत्र में हुआ है, इसलिए भारत को उस पर प्रादेशिक अधिकारिता प्राप्त होगी।
व्यक्तिपरक प्रादेशिकता (Subjective Territoriality) जब अपराध की शुरुआत राज्य के क्षेत्र में हुई हो, तो राज्य उस अपराध पर अधिकारिता का दावा कर सकता है।
उदाहरण - A भारत में बैठकर किसी दूसरे देश में साइबर अपराध की शुरुआत करता है। भारत अपनी प्रादेशिक अधिकारिता का आधार बना सकता है क्योंकि अपराध का महत्वपूर्ण कृत्य भारत से हुआ।
वस्तुनिष्ठ प्रादेशिकता (Objective Territoriality) - जब अपराध का कुछ महत्वपूर्ण भाग दूसरे राज्य में हुआ लेकिन उसका प्रभाव किसी राज्य के क्षेत्र में पड़ा, तो प्रभावित राज्य कुछ परिस्थितियों में अधिकारिता का दावा कर सकता है। इसे अंतरराष्ट्रीय विधि में Effects Doctrine से भी जोड़ा जाता है।
राज्य-क्षेत्र के बाहर की अधिकारिता - (Extraterritorial Jurisdiction)।सामान्य नियम यह है कि राज्य की अधिकारिता उसके क्षेत्र तक सीमित रहती है। लेकिन कुछ परिस्थितियों में राज्य अपने क्षेत्र के बाहर होने वाले कार्यों पर भी अधिकारिता का दावा कर सकता है। इसे बहिर्भौमिक/राज्य-क्षेत्रातीत अधिकारिता (Extraterritorial Jurisdiction) कहा जाता है। इसके प्रमुख आधार निम्न हैं - 
1. राष्ट्रीयता का सिद्धांत
2. निष्क्रिय व्यक्तित्व का सिद्धांत
3. संरक्षणात्मक सिद्धांत
4. सार्वभौमिक अधिकारिता का सिद्धांत
5. कुछ मामलों में प्रादेशिक प्रभाव का सिद्धांत
अधिकारिता के सिद्धांत - 
1. राष्ट्रीयता का सिद्धांत (Nationality Principle) - इस सिद्धांत के अनुसार कोई राज्य अपने नागरिकों द्वारा विदेश में किए गए कार्यों के संबंध में भी कुछ परिस्थितियों में अधिकारिता का प्रयोग कर सकता है। इसका आधार है नागरिकता और राज्य के बीच विधिक संबंध। अर्थात व्यक्ति विदेश में हो सकता है, लेकिन उसकी राष्ट्रीयता के कारण उसके अपने राज्य के साथ विधिक संबंध बना रहता है।
उदाहरणमान लीजिए एक भारतीय नागरिक विदेश में ऐसा अपराध करता है जिस पर भारतीय कानून और लागू अंतरराष्ट्रीय नियम भारत को अधिकारिता देते हैं। ऐसी स्थिति में भारत अपने नागरिक के संबंध में अधिकारिता का दावा कर सकता है।
विशेषताएँ - 
1. इसका आधार अपराधी की राष्ट्रीयता है।
2. अपराध राज्य के बाहर हुआ हो सकता है।
3. इसका प्रयोग संबंधित घरेलू कानून और अंतरराष्ट्रीय विधि की सीमाओं के अधीन होता है।
महत्वयह सिद्धांत विशेष रूप से उन अपराधों में उपयोगी है जहाँ नागरिक विदेश में अपराध करके अपने देश लौट जाता है।
2. निष्क्रिय व्यक्तित्व का सिद्धांत - (Passive Personality Principle)- इस सिद्धांत में अधिकारिता का आधार पीड़ित व्यक्ति की राष्ट्रीयता होती है। अर्थात यदि किसी राज्य के नागरिक को विदेश में अपराध का शिकार बनाया जाता है, तो उसका राज्य कुछ गंभीर परिस्थितियों में अपराधी के विरुद्ध अधिकारिता का दावा कर सकता है।
उदाहरणयदि किसी भारतीय नागरिक पर विदेश में किसी विदेशी व्यक्ति द्वारा गंभीर अंतरराष्ट्रीय अपराध किया जाता है, तो परिस्थितियों और लागू विधि के अनुसार भारत पीड़ित की भारतीय राष्ट्रीयता के आधार पर अधिकारिता का दावा कर सकता है।
आलोचनापरंपरागत रूप से इस सिद्धांत को लेकर काफी विवाद रहा है, क्योंकि अपराध दूसरे राज्य के क्षेत्र में हुआ,
अपराधी दूसरे राज्य का नागरिक हो सकता है और इससे कई राज्यों के बीच अधिकारिता का टकराव हो सकता है।आतंकवाद तथा कुछ गंभीर अंतरराष्ट्रीय अपराधों के संदर्भ में इसका महत्व बढ़ा है।
3. संरक्षणात्मक सिद्धांत (Protective Principle) - इस सिद्धांत के अनुसार कोई राज्य अपने महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हितों या राज्य की सुरक्षा के विरुद्ध विदेश में किए गए कार्यों पर अधिकारिता का दावा कर सकता है। इसमें अपराध का पीड़ित कोई निजी व्यक्ति होना आवश्यक नहीं है। मुख्य बात यह है कि कार्य से राज्य के महत्वपूर्ण हितों को खतरा उत्पन्न हो।
उदाहरणयदि कोई व्यक्ति विदेश में रहते हुए किसी राज्य की मुद्रा की बड़े पैमाने पर जालसाजी करता है, राज्य की सुरक्षा व्यवस्था को नुकसान पहुँचाने की योजना बनाता है, या राज्य की सुरक्षा के विरुद्ध गंभीर गतिविधि करता है, तो संबंधित राज्य संरक्षणात्मक सिद्धांत के आधार पर अधिकारिता का दावा कर सकता है।
उद्देश्यइस सिद्धांत का उद्देश्य राज्य की।सुरक्षा, संप्रभुता, राष्ट्रीय संस्थाओं, आर्थिक व्यवस्था तथा सरकारी हितों की रक्षा करना है।
सीमाराज्य इस सिद्धांत का अत्यधिक व्यापक उपयोग नहीं कर सकता। यदि हर राज्य विदेश में होने वाली किसी भी गतिविधि को अपने राष्ट्रीय हित से जोड़कर अधिकारिता का दावा करे, तो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में गंभीर टकराव उत्पन्न हो सकता है।
4. सार्वभौमिक अधिकारिता का सिद्धांत (Universal Jurisdiction) - सार्वभौमिक अधिकारिता सबसे असाधारण प्रकार की अधिकारिता है।इसके अनुसार कुछ अत्यंत गंभीर अंतरराष्ट्रीय अपराधों के संबंध में कोई राज्य, कुछ निर्धारित परिस्थितियों में, अपराध के उसके क्षेत्र में न होने, अपराधी के उसके नागरिक न होने, और पीड़ित के उसके नागरिक न होने के बावजूद अधिकारिता का दावा कर सकता है।
इसका आधार यह विचार है कि कुछ अपराध पूरी अंतरराष्ट्रीय मानव-समुदाय के विरुद्ध होते हैं।
उदाहरणपरंपरागत रूप से सार्वभौमिक अधिकारिता को विशेष रूप से समुद्री डकैती (Piracy) के संदर्भ में स्वीकार किया गया है। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में कुछ अन्य गंभीर अंतरराष्ट्रीय अपराधों के संबंध में भी इसके प्रयोग पर चर्चा होती है, लेकिन प्रत्येक अपराध के लिए नियम समान नहीं हैं।
विशेषताएँ
1. अपराध अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए गंभीर होना चाहिए।
2. अपराधी और पीड़ित की राष्ट्रीयता हमेशा आवश्यक आधार नहीं होती।
3. इसका प्रयोग अंतरराष्ट्रीय संधियों और प्रचलित अंतरराष्ट्रीय विधि के अनुसार होना चाहिए।
4. इसका उद्देश्य गंभीर अंतरराष्ट्रीय अपराधों को दण्डहीनता से बचाना है।
महत्वयह सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय अपराधों के विरुद्ध दण्डहीनता (impunity) को रोकने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
10. अधिकारिता के आधार पर सिद्धांत एक नजर में - 
• राष्ट्रीयता का सिद्धांत - अपराधी की राष्ट्रीयता
• निष्क्रिय व्यक्तित्व - पीड़ित की राष्ट्रीयता
संरक्षणात्मक सिद्धांत - राज्य के महत्वपूर्ण हित/सुरक्षा
सार्वभौमिक अधिकारिता - अपराध की अंतरराष्ट्रीय गंभीरता
ट्रिक - 
अपराधी → राष्ट्रीयता
पीड़ित → निष्क्रिय व्यक्तित्व
राज्य का हित → संरक्षणात्मक
पूरी मानवता का गंभीर अपराध → सार्वभौमिक
अधिकारिता से उन्मुक्तियाँ (Immunities from Jurisdiction) - अंतरराष्ट्रीय विधि में कुछ व्यक्तियों और संस्थाओं को दूसरे राज्य की अधिकारिता से उन्मुक्ति (Immunity) प्राप्त होती है।उन्मुक्ति का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति कानून से ऊपर है। इसका उद्देश्य - 
• राज्य की संप्रभु समानता
• राजनयिक संबंधों की स्वतंत्रता
• अंतरराष्ट्रीय कार्यों के सुचारु संचालन की रक्षा करना है।
मुख्य रूप से दो महत्वपूर्ण उन्मुक्तियाँ हैं - 
1. राज्य उन्मुक्ति (State Immunity)
2. राजनयिक उन्मुक्ति (Diplomatic Immunity)
राज्य उन्मुक्ति (State Immunity) - एक संप्रभु राज्य को सामान्यतः दूसरे संप्रभु राज्य के न्यायालयों के समक्ष उसकी सहमति के बिना मुकदमे या न्यायिक प्रक्रिया से उन्मुक्ति प्राप्त होती है, subject to applicable international law and exceptions. इसका आधार है - 
 Par in parem non habet imperium अर्थात् समान संप्रभु पर दूसरे समान संप्रभु का अधिकार नहीं।
उदाहरणभारत का कोई सरकारी राज्य-संप्रभु कार्य यदि विदेश में विवाद का विषय बनता है, तो विदेशी न्यायालय सीधे भारत को अपने न्यायिक अधिकार के अधीन नहीं कर सकता, जब तक लागू नियमों के अनुसार अधिकारिता का आधार या भारत की सहमति न हो।
राज्य उन्मुक्ति के दो दृष्टिकोण
(क) पूर्ण उन्मुक्ति सिद्धांत (Absolute Immunity) - इस दृष्टिकोण के अनुसार राज्य को दूसरे राज्य के न्यायालयों से व्यापक उन्मुक्ति प्राप्त होती थी।
(ख) प्रतिबंधित उन्मुक्ति सिद्धांत (Restrictive Immunity) - आधुनिक दृष्टिकोण में राज्य के कार्यों को सामान्यतः दो भागों में देखा जाता है - 
Jure Imperii - राज्य के संप्रभु कार्य।
Jure Gestionisव्यावसायिक/वाणिज्यिक प्रकृति के कार्य।
आधुनिक राज्य-उन्मुक्ति व्यवस्था में संप्रभु कार्यों को उन्मुक्ति अधिक मजबूती से प्राप्त होती है, जबकि वाणिज्यिक गतिविधियों के संबंध में उन्मुक्ति सीमित हो सकती है।
उदाहरणयदि कोई राज्य दूसरे देश में अपने दूतावास के लिए संप्रभु कार्य करता है, तो यह जुरे इम्पेरी की श्रेणी में आएगा। लेकिन किसी सामान्य व्यावसायिक लेन-देन में उसकी स्थिति अलग हो सकती है।
13. राजनयिक उन्मुक्ति (Diplomatic Immunity) - राजनयिक उन्मुक्ति वह विशेष विधिक सुरक्षा है जो किसी राज्य के राजनयिक प्रतिनिधियों को दूसरे राज्य में अपने आधिकारिक कार्य स्वतंत्र रूप से करने के लिए प्राप्त होती है। इसका प्रमुख अंतरराष्ट्रीय आधार 1961 की Vienna Convention on Diplomatic Relations है।
उद्देश्यराजनयिक उन्मुक्ति का उद्देश्य राजनयिक को व्यक्तिगत विशेषाधिकार देना मात्र नहीं है, बल्कि राजनयिक मिशन को स्वतंत्र और प्रभावी ढंग से कार्य करने देना है।
राजनयिकों की प्रमुख उन्मुक्तियाँ - 
(1) व्यक्ति की सुरक्षाराजनयिक एजेंट को सामान्यतः गिरफ्तार या हिरासत में नहीं लिया जा सकता, सिवाय अत्यंत सीमित परिस्थितियों के जो अंतरराष्ट्रीय नियमों में निर्धारित हैं।
(2) आपराधिक अधिकारिता से उन्मुक्तिराजनयिक एजेंट को प्राप्त राज्य की आपराधिक अधिकारिता से व्यापक उन्मुक्ति प्राप्त होती है।
(3) दीवानी एवं प्रशासनिक अधिकारिता से उन्मुक्तिदीवानी और प्रशासनिक मामलों में भी उन्मुक्ति होती है, लेकिन इसके कुछ अपवाद हैं, जैसे 
• निजी अचल संपत्ति से संबंधित कुछ मामले
• उत्तराधिकार संबंधी कुछ मामले
• आधिकारिक कार्य के बाहर पेशेवर या व्यावसायिक गतिविधियाँ।
(4) राजनयिक परिसर की सुरक्षादूतावास के परिसर को विशेष सुरक्षा प्राप्त होती है। प्राप्त राज्य के अधिकारी सामान्यतः मिशन के प्रमुख की सहमति के बिना परिसर में प्रवेश नहीं कर सकते।
(5) दस्तावेज एवं अभिलेखराजनयिक मिशन के आधिकारिक दस्तावेज और अभिलेख विशेष सुरक्षा प्राप्त करते हैं।
(6) संचार की स्वतंत्रताराजनयिक मिशन को अपने राज्य से आधिकारिक संपर्क बनाए रखने की सुविधा प्राप्त होती है।
राज्य उन्मुक्ति और राजनयिक उन्मुक्ति में अंतर
आधार - राज्य उन्मुक्ति - राजनयिक उन्मुक्ति
किसे प्राप्त संप्रभु राज्य - राजनयिक एजेंट/मिशन
आधार राज्य की संप्रभु समानता - राजनयिक कार्यों की स्वतंत्रता
उद्देश्य संप्रभु राज्यों की समानता प्रभावी राजनयिक संबंध
प्रमुख प्रश्न दूसरे राज्य के न्यायालय की अधिकारिता राजनयिक पर प्राप्त - राज्य की अधिकारिता
प्रकृति - राज्य के कार्यों से संबंधित - राजनयिक व्यक्ति एवं मिशन से संबंधित
अंतरराष्ट्रीय विधि में संप्रभुता संप्रभुता का अर्थ है राज्य की अपने क्षेत्र और जनता पर सर्वोच्च तथा स्वतंत्र सत्ता, और बाहरी रूप से किसी अन्य राज्य के अधीन न होना।
संप्रभुता के दो प्रमुख पहलू हैं - 
(1) आंतरिक संप्रभुता - 
• राज्य को अपने क्षेत्र के भीतर
• कानून बनाने
• प्रशासन चलाने
• न्याय प्रदान करने
• कर लगाने
• व्यवस्था बनाए रखने की सर्वोच्च शक्ति प्राप्त होती है।
(2) बाह्य संप्रभुताराज्य दूसरे राज्यों से स्वतंत्र होता है और सामान्यतः किसी बाहरी राज्य के अधीन नहीं होता।
संप्रभुता की प्रमुख विशेषताएँ - 
1. सर्वोच्चताराज्य की संप्रभु सत्ता उसके क्षेत्र में सर्वोच्च होती है।
2. स्वतंत्रताराज्य बाहरी नियंत्रण से स्वतंत्र होता है।
3. क्षेत्रीयतासंप्रभुता का प्रमुख प्रयोग राज्य के क्षेत्र में होता है।
4. विधिक समानताअंतरराष्ट्रीय विधि में संप्रभु राज्यों को सामान्यतः समान विधिक स्थिति प्राप्त है।
5. गैर-हस्तक्षेपएक राज्य को दूसरे राज्य के आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
संप्रभुता पूर्ण नहीं हैआधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में संप्रभुता को असीमित या निरंकुश शक्ति नहीं माना जाता। राज्य स्वयं अंतरराष्ट्रीय विधि के नियमों से बंधे हैं।
संप्रभुता की प्रमुख सीमाएँ हैं - 
(1) अंतरराष्ट्रीय संधियाँराज्य जिन संधियों का पक्षकार है, उनके दायित्वों का पालन करना होता है।
(2) प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधिअंतरराष्ट्रीय प्रथाएँ भी राज्यों के आचरण को नियंत्रित करती हैं।
(3) संयुक्त राष्ट्र चार्टरसंयुक्त राष्ट्र व्यवस्था में बल के प्रयोग, आक्रमण तथा अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण प्रतिबंध हैं।
(4) मानवाधिकारआधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में मानवाधिकारों के प्रति राज्य के दायित्व संप्रभुता के प्रयोग को प्रभावित करते हैं।
(5) अंतरराष्ट्रीय अपराधनरसंहार, युद्ध अपराध और मानवता के विरुद्ध अपराध जैसे गंभीर अपराधों के संबंध में राज्य की शक्ति अंतरराष्ट्रीय विधि से नियंत्रित होती है।
(6) दूसरे राज्यों की क्षेत्रीय संप्रभुताकोई राज्य सामान्यतः दूसरे राज्य के क्षेत्र में उसकी सहमति के बिना अपनी पुलिस, प्रशासनिक या सैन्य शक्ति का प्रयोग नहीं कर सकता।
(7) अंतरराष्ट्रीय न्यायिक दायित्वकुछ परिस्थितियों में राज्य अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों या अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के समक्ष अपने दायित्वों के अधीन हो सकते हैं, यदि संबंधित अधिकारिता का विधिक आधार मौजूद हो।
संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय विधि का आधुनिक स्वरूपपुराने समय में संप्रभुता को अक्सर लगभग पूर्ण और असीमित सत्ता के रूप में देखा जाता था। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि ने इस अवधारणा को परिवर्तित किया है।आज स्थिति यह है कि  - 
संप्रभुता + अंतरराष्ट्रीय दायित्व = आधुनिक राज्य व्यवस्था
राज्य स्वतंत्र है, लेकिन वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अलग-थलग नहीं है। उसे
• संधियों का पालन करना,
• अंतरराष्ट्रीय शांति का सम्मान करना,
• दूसरे राज्यों की संप्रभुता का सम्मान करना 
• मानवाधिकारों से संबंधित दायित्वों का पालन करना, 
• और अंतरराष्ट्रीय अपराधों के विरुद्ध लागू नियमों का सम्मान करना होता है।
अधिकारिता और संप्रभुता का समग्र संबंध 
उदाहरण
भारत की संप्रभुता → भारत को अपने क्षेत्र में सर्वोच्च विधिक सत्ता देती है।
प्रादेशिक अधिकारिता → भारत अपने क्षेत्र में कानून लागू करता है।
बहिर्भौमिक अधिकारिता → कुछ विशेष परिस्थितियों में भारत विदेश में हुए कार्यों पर भी अधिकारिता का दावा कर सकता है।
अंतरराष्ट्रीय विधि की सीमाएँ - भारत उस अधिकारिता को दूसरे राज्य की संप्रभुता का उल्लंघन करते हुए मनमाने ढंग से लागू नहीं कर सकता।
निष्कर्षअंतरराष्ट्रीय विधि में अधिकारिता और संप्रभुता एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। प्रादेशिक अधिकारिता राज्य की संप्रभुता का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम है, जबकि राष्ट्रीयता, निष्क्रिय व्यक्तित्व, संरक्षणात्मक और सार्वभौमिक अधिकारिता राज्य को कुछ परिस्थितियों में अपने क्षेत्र के बाहर होने वाली गतिविधियों पर भी अधिकारिता प्रदान करने के आधार देते हैं। साथ ही, राज्य उन्मुक्ति और राजनयिक उन्मुक्ति अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संप्रभु समानता तथा राजनयिक कार्यों की स्वतंत्रता की रक्षा करती हैं। आधुनिक अंतरराष्ट्रीय विधि में संप्रभुता महत्वपूर्ण है, लेकिन यह असीमित नहीं है। संधियों, प्रथागत अंतरराष्ट्रीय विधि, संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था, मानवाधिकार संबंधी दायित्वों और दूसरे राज्यों की संप्रभुता जैसे नियम राज्य की शक्ति पर आवश्यक सीमाएँ लगाते हैं।
एक पंक्तिराज्य अपनी संप्रभुता के कारण अधिकारिता का प्रयोग करता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विधि यह निर्धारित करती है कि उस अधिकारिता का प्रयोग कहाँ, किसके विरुद्ध और कितनी सीमा तक किया जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय विवाद समाधान एवं संधि विधि - 
कूटनीतिक वार्ता, मध्यस्थता,  सुलह, पंचाट/मध्यस्थ न्यायनिर्णयन,  अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की भूमिका एवं विवाद समाधान के लिए क्षेत्रीय तंत्र - अंतरराष्ट्रीय विवाद में राज्य युद्ध या बल-प्रयोग के बजाय शांतिपूर्ण साधनों का सहारा लेते हैं। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(3) राज्यों को अपने विवादों का शांतिपूर्ण समाधान करने का दायित्व देता है और अनुच्छेद 33 वार्ता, जाँच, मध्यस्थता, सुलह, पंचाट, न्यायिक निर्णय तथा अन्य शांतिपूर्ण साधनों का उल्लेख करता है।
अंतरराष्ट्रीय विवादजब दो या अधिक राज्यों के बीच किसी कानूनी अधिकार, तथ्य, सीमा, संधि, क्षेत्र, समुद्री अधिकार, राजनयिक स्थिति या किसी अन्य अंतरराष्ट्रीय दायित्व के संबंध में मतभेद उत्पन्न होता है और एक पक्ष दूसरे के दावे का विरोध करता है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय विवाद कहा जाता है। जैसे भारत - पाकिस्तान और भारत -चीन सीमा विवाद।
• समुद्री सीमा का विवाद (हॉर्मूज विवाद)
• नदी के जल के उपयोग का विवाद (भारत पाकिस्तान सिंधु जल विवाद)
• किसी संधि की व्याख्या को लेकर विवाद
• राजनयिक या दायित्व संबंधी विवाद (रूस यूक्रेन विवाद)
शांतिपूर्ण समाधान का आधारसंयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुसार राज्यों को ऐसे विवादों का समाधान इस प्रकार करना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और न्याय खतरे में न पड़े।
A. कूटनीतिक विधियाँ (Diplomatic Methods) - कूटनीतिक विधियों में कोई बाध्यकारी न्यायिक निर्णय नहीं दिया जाता। इनका मुख्य उद्देश्य पक्षों को बातचीत के माध्यम से स्वैच्छिक समझौते तक पहुँचाना है। इसमें 
क. वार्ता (Negotiation) - वार्ता अंतरराष्ट्रीय विवाद को सुलझाने की सबसे सरल और सामान्य विधि है। इसमें विवाद से संबंधित राज्य स्वयं आपस में बातचीत करते हैं और किसी समझौते पर पहुँचने का प्रयास करते हैं। इसमें तीसरे पक्ष की आवश्यकता नहीं होती।
प्रक्रिया - 
1. विवाद उत्पन्न होता है।
2. संबंधित राज्य बातचीत के लिए सहमत होते हैं।
3. राजनयिक प्रतिनिधि या अधिकारी बैठक करते हैं।
4. दोनों पक्ष अपने दावे और प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
5. समझौते के संभावित विकल्पों पर चर्चा होती है।
6. सहमति होने पर समझौता या संधि की जा सकती है।
वार्ता से समाधान की विशेषताएँ - 
• प्रत्यक्ष प्रक्रिया
• तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप नहीं
• लचीली एवं अनौपचारिक
• अपेक्षाकृत कम खर्चीली
• पक्षकार स्वयं समाधान तय करते हैं
• समाधान बाध्यकारी तभी होता है जब उसे समझौते/संधि का रूप दिया जाए।
लाभवार्ता से राज्यों के पारस्परिक संबंध खराब होने की संभावना कम रहती है। साथ ही, राज्य ऐसा समाधान स्वीकार कर सकते हैं जो दोनों के लिए व्यावहारिक हो।
उदाहरणसीमा, व्यापार, जल-वितरण अथवा राजनयिक विवादों में द्विपक्षीय वार्ता का व्यापक उपयोग होता है।
ख. मध्यस्थता (Mediation) - जब दो राज्यों के बीच सीधे बातचीत से समाधान नहीं निकलता, तब कोई तीसरा पक्ष विवाद को सुलझाने में सक्रिय सहायता करता है। इसे मध्यस्थता कहते हैं। जैसे ईरान अमेरिका जंग में पाकिस्तान ने भूमिका निभाई और भारत पाक युद्ध 2025 में अमेरिका ने भूमिका निभाई। मध्यस्थ कोई तीसरा राज्य, अंतरराष्ट्रीय संगठन या प्रतिष्ठित व्यक्ति हो सकता है।
मध्यस्थ की भूमिकामध्यस्थ 
• दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाता है।
• दोनों की बात सुनता है।
• समझौते के सुझाव देता है।
• विवाद के समाधान का प्रस्ताव रखता है।
• पक्षों के बीच संचार स्थापित करता है।
•  अंतिम निर्णय पक्षकारों की सहमति पर निर्भर करता है।
मध्यस्थता और वार्ता में अंतर
आधार - वार्ता  - मध्यस्थता
पक्ष - विवादित राज्य - स्वयं विवादित राज्य + तीसरा पक्ष
तीसरे पक्ष की भूमिका - नहीं - सक्रिय
निर्णय - पक्ष स्वयं लेते हैं - मध्यस्थ सुझाव देता है
बाध्यकारी शक्ति - नहीं - मध्यस्थ का प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं
ग. सुलह (Conciliation) - सुलह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें एक स्वतंत्र सुलह आयोग विवाद के तथ्यों एवं कानूनी पहलुओं की जाँच करता है और पक्षकारों को समाधान के लिए प्रस्ताव देता है। यह वार्ता और न्यायिक प्रक्रिया के बीच की विधि मानी जाती है।
सुलह की प्रक्रिया - 
1. सुलह आयोग का गठन।
2. दोनों पक्ष अपने दावे प्रस्तुत करते हैं।
3. आयोग तथ्यों और कानूनी प्रश्नों की जाँच करता है।
4. दोनों पक्षों के तर्क सुने जाते हैं।
5. आयोग समाधान की अनुशंसा/रिपोर्ट प्रस्तुत करता है।
सुलह की विशेषतासुलह आयोग का प्रस्ताव बाध्यकारी नहीं होता, जब तक पक्षकार उसे स्वीकार न करें।
मध्यस्थता और सुलह में अंतर - मध्यस्थता में तीसरा पक्ष विवादित पक्षों को समझौते की ओर सक्रिय रूप से ले जाता है, जबकि सुलह में आयोग विवाद के तथ्यों और कानून की व्यवस्थित जाँच करके समाधान की अनुशंसा करता है।
B. विधिक विधियाँ (Legal Methods) - विधिक विधियों में विवाद का समाधान अपेक्षाकृत औपचारिक कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से होता है। इस हेतु मुख्य विधियाँ - 
1. पंचाट/Arbitration - पंचाट में विवादित राज्य अपने विवाद को एक या अधिक पंच/ Arbitrators के समक्ष प्रस्तुत करते हैं और पंच कानूनी आधार पर निर्णय देता है।अंतरराष्ट्रीय पंचाट का प्रमुख आधार पक्षकारों की सहमति है।
पंचाट की प्रक्रिया - 
1. राज्य पंचाट के लिए सहमत होते हैं।
2. पंच या पंचमंडल का गठन होता है।
3. विवाद के मुद्दे निर्धारित किए जाते हैं।
4. लिखित एवं मौखिक तर्क प्रस्तुत किए जाते हैं।
5. प्रमाणों का परीक्षण होता है।
6. पंच निर्णय (Award) देता है।
पंचाट की विशेषताएँ - यह - 
• सहमति आधारित होता है। 
• पक्षकार पंचों के चयन में भूमिका निभा सकते हैं।
• प्रक्रिया अपेक्षाकृत लचीली।
• विशेषज्ञ पंच नियुक्त किए जा सकते हैं।
• निर्णय पक्षकारों पर बाध्यकारी होता है।
स्थायी पंचाट न्यायालय Permanent Court of Arbitration (PCA) - अंतरराष्ट्रीय विवादों के पंचाट के लिए महत्वपूर्ण संस्था है। ध्यान रहे PCA और ICJ अलग संस्थाएँ हैं।
2. न्यायिक निर्णय/Adjudication - न्यायिक निर्णय में विवाद को किसी स्थायी अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है और न्यायालय अंतरराष्ट्रीय विधि के आधार पर निर्णय देता है।
उदाहरण - International Court of Justice अर्थात अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ)।
ICJ की विशेषताएँ - 
• स्थायी न्यायिक संस्था।
• न्यायाधीशों का पूर्वनिर्धारित ढाँचा।
• कानूनी प्रक्रिया अपेक्षाकृत औपचारिक।
• अंतरराष्ट्रीय विधि के आधार पर निर्णय।
• संबंधित पक्षों के लिए निर्णय बाध्यकारी होता है, जब न्यायालय को उस विवाद पर अधिकारिता प्राप्त हो।
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की भूमिका ICJ संयुक्त राष्ट्र का प्रधान न्यायिक अंग है और इसका मुख्यालय हेग, नीदरलैंड में है। इसके दो प्रमुख कार्य हैं - 
1. विवादों का न्यायिक समाधानराज्यों के बीच कानूनी विवादों का निर्णय करना। इसमें विवादित मामलों के पक्षकार केवल राज्य ही ICJ में  वाद दायर सकते हैं। व्यक्ति, निजी कंपनी या गैर-सरकारी संस्था सीधे contentious case में पक्षकार नहीं बन सकती।
2. परामर्शात्मक राय देनासंयुक्त राष्ट्र के अधिकृत अंगों और कुछ विशेषीकृत एजेंसियों द्वारा पूछे गए कानूनी प्रश्नों पर ICJ Advisory Opinion दे सकता है।
ICJ की अधिकारिताICJ की contentious jurisdiction मुख्यतः राज्य की सहमति पर आधारित है। सहमति विभिन्न रूपों में हो सकती है - 
(i) विशेष समझौता (Special Agreement) दो राज्य किसी विशेष विवाद को ICJ के सामने प्रस्तुत करने पर सहमत हों।
(ii) संधि में अधिकारिता संबंधी प्रावधान - किसी संधि में यह व्यवस्था हो सकती है कि उससे संबंधित विवाद ICJ में ले जाया जाएगा।
(iii) Optional Clause Declaration - ICJ Statute के अनुच्छेद 36(2) के अंतर्गत राज्य कुछ परिस्थितियों में ICJ की अनिवार्य अधिकारिता को स्वीकार कर सकते हैं।
ICJ के निर्णय की बाध्यताICJ Statute का अनुच्छेद 59 कहता है कि न्यायालय का निर्णय संबंधित मामले में पक्षकारों के लिए बाध्यकारी होता है।अर्थात ICJ का निर्णय - 
• मामले के पक्षकारों पर लागू होता है।
• उसी मामले तक सीमित होता है।
• अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार उसका पालन अपेक्षित है।
संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 94 भी सदस्य राज्यों को ICJ के उस निर्णय का पालन करने का दायित्व देता है जिसमें वे पक्षकार हैं। यदि कोई पक्ष निर्णय का पालन नहीं करता, तो परिस्थितियों के अनुसार दूसरा पक्ष सुरक्षा परिषद का सहारा ले सकता है।
ICJ द्वारा परामर्शात्मक राय (Advisory Opinions) - Advisory Opinion किसी विवाद में पक्षकारों के बीच सामान्य "निर्णय" नहीं होती, बल्कि किसी कानूनी प्रश्न पर ICJ की आधिकारिक न्यायिक राय होती है। ICJ Statute का अनुच्छेद 65 Advisory Opinions से संबंधित है।
राय कौन माँग सकता है? - संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 96 के अनुसार - 
• UN General Assembly
• UN Security Council
कानूनी प्रश्नों पर ICJ से Advisory Opinion माँग सकते हैं। इसके अतिरिक्त, General Assembly की अनुमति/प्राधिकरण के अंतर्गत कुछ विशेषीकृत एजेंसियाँ भी अपनी गतिविधियों के क्षेत्र से संबंधित कानूनी प्रश्नों पर राय माँग सकती हैं।
Advisory Opinion की विशेषताएँ - 
1. यह कानूनी प्रश्न पर आधारित होती है।
2. यह contentious case से अलग प्रक्रिया है।
3. इसमें सामान्यतः राज्य आपस में मुकदमेबाज पक्षकार नहीं होते।
4. सामान्यतः Advisory Opinion स्वयं उसी प्रकार बाध्यकारी नहीं होती जैसे contentious judgment।
5. फिर भी इसका अत्यधिक कानूनी और नैतिक/प्राधिकृत महत्व होता है।
6. यह अंतरराष्ट्रीय विधि के विकास और स्पष्टीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
उदाहरण
Nuclear Weapons Advisory Opinion (1996) - ICJ ने परमाणु हथियारों की धमकी या प्रयोग से संबंधित अंतरराष्ट्रीय विधि के प्रश्नों पर राय दी।
Wall Advisory Opinion (2004)
ICJ ने Occupied Palestinian Territory में दीवार के निर्माण से संबंधित कानूनी प्रश्नों पर Advisory Opinion दी।
Chagos Archipelago Advisory Opinion (2019) - ICJ ने उपनिवेशवाद और Chagos Archipelago से संबंधित कानूनी प्रश्नों पर राय दी।
विवाद समाधान के लिए क्षेत्रीय तंत्र (Regional Mechanisms) संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के अतिरिक्त विभिन्न क्षेत्रों में क्षेत्रीय संगठन भी अंतरराष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अध्याय VIII क्षेत्रीय व्यवस्थाओं/संगठनों से संबंधित है।
प्रमुख क्षेत्रीय तंत्र - 
1. यूरोपीय क्षेत्रEuropean Union तथा यूरोप की अन्य संस्थाएँ विवाद समाधान और कानूनी सहयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। विशेष रूप से European Court of Human Rights मानवाधिकार संबंधी मामलों में महत्वपूर्ण है।
2. अमेरिकी क्षेत्रOrganization of American States के अंतर्गत विवाद समाधान की विभिन्न व्यवस्थाएँ विकसित हुई हैं।
3. अफ्रीकी क्षेत्रAfrican Union क्षेत्रीय शांति एवं सुरक्षा और विवाद समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
4. एशियाई क्षेत्रएशिया में यूरोप जैसी एकल व्यापक न्यायिक व्यवस्था नहीं है, लेकिन ASEAN जैसे क्षेत्रीय संगठन संवाद, परामर्श और विवाद समाधान की व्यवस्थाएँ प्रदान करते हैं।
क्षेत्रीय तंत्र के लाभ
• क्षेत्रीय परिस्थितियों की बेहतर समझ।
• विवादित राज्यों के बीच निकट संवाद।
• स्थानीय/क्षेत्रीय समस्याओं का शीघ्र समाधान।
• क्षेत्रीय शांति एवं सुरक्षा को बढ़ावा।
• संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक तंत्र का पूरक।
कूटनीतिक और विधिक विधियों में मुख्य अंतर - 
आधार - कूटनीतिक विधियाँ - विधिक विधियाँ
प्रमुख साधन - वार्ता, मध्यस्थता, सुलह - पंचाट, न्यायिक निर्णय
तीसरे पक्ष की भूमिका - हो सकती है - निर्णायक भूमिका
प्रक्रिया - लचीली - अधिक औपचारिक
उद्देश्य - समझौता- कानूनी समाधान
निर्णय - बाध्यकारी नहीं - पंचाट/न्यायिक निर्णय बाध्यकारी
नियंत्रण - पक्षकारों के पास अधिक - न्यायिक/पंचाट संस्था के पास अधिक
आधार  - राजनीतिक + कूटनीतिक + कानूनी मुख्यतः अंतरराष्ट्रीय कानून
निष्कर्षअंतरराष्ट्रीय विधि का मूल उद्देश्य केवल विवाद का निर्णय करना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बनाए रखते हुए विवाद का शांतिपूर्ण समाधान करना है। वार्ता, मध्यस्थता और सुलह पक्षकारों को स्वैच्छिक समझौते तक पहुँचाती हैं, जबकि पंचाट और न्यायिक निर्णय कानूनी आधार पर अधिक औपचारिक समाधान प्रदान करते हैं। ICJ इस व्यवस्था का केंद्रीय न्यायिक अंग है, जबकि Advisory Opinions अंतरराष्ट्रीय कानून के विकास और उसकी व्याख्या में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। क्षेत्रीय तंत्र इस वैश्विक व्यवस्था को स्थानीय और क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत बनाते हैं।

अन्तर्राष्ट्रीय विधि में शांति स्थापना हेतु बल प्रयोग एवं सामूहिक सुरक्षा - 
अंतर्राष्ट्रीय विधि और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के संदर्भ में बल प्रयोग और सामूहिक सुरक्षा को अलग-अलग समझना जरूरी है, क्योंकि एक का मूल नियम बल प्रयोग पर रोक है और दूसरा उस रोक के भीतर अंतर्राष्ट्रीय शांति की रक्षा की व्यवस्था है।अंतर्राष्ट्रीय विधि का प्रमुख उद्देश्य राज्यों के बीच शांति एवं सुरक्षा बनाए रखना है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना इसी उद्देश्य से हुई। संयुक्त राष्ट्र चार्टर ने राज्यों द्वारा अपनी शक्ति के आधार पर दूसरे राज्य के विरुद्ध सैन्य बल प्रयोग करने पर प्रतिबंध लगाया गया है। इस व्यवस्था के दो प्रमुख आधार हैं - 
1. बल प्रयोग का निषेधसंयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) अंतर्राष्ट्रीय विधि में बल प्रयोग के निषेध का मूल प्रावधान है। इसके अनुसार संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य अपने अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में किसी राज्य की प्रादेशिक अखंडता (Territorial Integrity) या राजनीतिक स्वतंत्रता (Political Independence) के विरुद्ध बल प्रयोग की धमकी या बल प्रयोग से बचेंगे।
अनुच्छेद 2(4) के मुख्य तत्व - 
1. बल प्रयोग की धमकी पर रोक केवल वास्तविक सैन्य हमला ही निषिद्ध नहीं है। किसी राज्य को सैन्य बल के प्रयोग की धमकी देना भी अनुच्छेद 2(4) के दायरे में आ सकता है। 
2. बल प्रयोग पर रोक किसी राज्य के विरुद्ध सैन्य शक्ति का प्रयोग करना निषिद्ध है, जब तक वह चार्टर के अंतर्गत मान्य अपवाद में न आता हो। 
3. प्रादेशिक अखंडता की रक्षा किसी राज्य की सीमा या क्षेत्र पर सैन्य शक्ति से कब्जा करना चार्टर की मूल व्यवस्था के विरुद्ध है।
4. राजनीतिक स्वतंत्रता की रक्षा किसी राज्य की सरकार या राजनीतिक व्यवस्था को सैन्य शक्ति से बदलने का प्रयास अंतर्राष्ट्रीय विधि की मूल व्यवस्था से टकरा सकता है। 
5. अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में लागू यह नियम राज्यों के बीच संबंधों पर लागू होता है और आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय विधि में बल प्रयोग के निषेध का केंद्रीय सिद्धांत है।
अनुच्छेद 2(4) का महत्वइस प्रावधान ने राज्यों की सैन्य शक्ति के प्रयोग को नियंत्रित करने के लिए एक वैश्विक कानूनी ढाँचा बनाया। इसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय विवादों को युद्ध में बदलने से रोकना है।
बल प्रयोग के निषेध के अपवाद - बल प्रयोग का निषेध पूर्ण रूप से निरपेक्ष नहीं है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर में दो प्रमुख वैधानिक आधार विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं - 
1. आत्मरक्षा का अधिकार
2. सुरक्षा परिषद द्वारा अधिकृत कार्रवाई इसके अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था इन्हीं चार्टर शक्तियों के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय शांति बनाए रखने का साधन है।
(क)आत्मरक्षा (Self-Defence) अनुच्छेद 51 राज्यों के आत्मरक्षा के अंतर्निहित अधिकार को मान्यता देता है। यदि किसी राज्य के विरुद्ध सशस्त्र हमला (Armed Attack) होता है, तो उसे व्यक्तिगत या सामूहिक आत्मरक्षा में कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त होता है।
आत्मरक्षा के प्रकार - 
1. व्यक्तिगत आत्मरक्षा (Individual Self-Defence) - जब किसी राज्य पर सशस्त्र हमला होता है और वह स्वयं अपनी रक्षा के लिए सैन्य कार्रवाई करता है। 
2. सामूहिक आत्मरक्षा (Collective Self-Defence) - जब एक राज्य पर सशस्त्र हमला होने पर दूसरे राज्य उसकी सहायता के लिए आत्मरक्षा की कार्रवाई करते हैं।
आत्मरक्षा की प्रमुख शर्तें - 
(i) सशस्त्र हमला - आत्मरक्षा के अधिकार का केंद्रीय आधार सशस्त्र हमला है। 
(ii) आवश्यकता - सैन्य कार्रवाई वास्तविक खतरे से निपटने के लिए आवश्यक होनी चाहिए। 
(iii) आनुपातिकता - आत्मरक्षा की कार्रवाई खतरे के अनुपात से अत्यधिक नहीं होनी चाहिए। 
(iv) सुरक्षा परिषद को सूचना - अनुच्छेद 51 के अनुसार आत्मरक्षा में उठाए गए उपायों की जानकारी सुरक्षा परिषद को दी जानी चाहिए।
आत्मरक्षा और सुरक्षा परिषदआत्मरक्षा का अधिकार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की प्राथमिक भूमिका को समाप्त नहीं करता। सुरक्षा परिषद अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखने के लिए आवश्यक कार्रवाई कर सकती है।
(ख) संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति - संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अध्याय VII सुरक्षा परिषद को अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा के लिए खतरे की स्थिति में कार्रवाई करने की शक्ति देता है।
अनुच्छेद 39सुरक्षा परिषद यह निर्धारित करती है कि - शांति के लिए खतरा है शांति भंग हुई है, या आक्रमण हुआ है। इसके बाद वह उचित उपाय निर्धारित कर सकती है।
अनुच्छेद 41 इसमें गैर-सैन्य उपायों का प्रावधान है, जैसे आर्थिक प्रतिबंध,  व्यापारिक प्रतिबंध, राजनयिक संबंधों में कमी या समाप्ति, संचार संबंधी प्रतिबंध आदि।
अनुच्छेद 42यदि अनुच्छेद 41 के उपाय पर्याप्त नहीं हैं, तो सुरक्षा परिषद वायु, समुद्र या स्थल सेना द्वारा आवश्यक कार्रवाई का निर्णय कर सकती है। इसमें सैन्य बल का प्रयोग शामिल हो सकता है।
महत्वपूर्ण बातयदि सुरक्षा परिषद अध्याय VII के अंतर्गत सैन्य कार्रवाई को अधिकृत करती है, तो वह अनुच्छेद 2(4) के सामान्य निषेध का उल्लंघन नहीं मानी जाती, क्योंकि कार्रवाई संयुक्त राष्ट्र की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था के अंतर्गत होती है।
2. संयुक्त राष्ट्र के अंतर्गत सामूहिक सुरक्षा - सामूहिक सुरक्षा (Collective Security) का अर्थ है कि अंतर्राष्ट्रीय शांति को खतरा किसी एक राज्य की समस्या न मानकर पूरे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की समस्या माना जाए। इस व्यवस्था का मूल विचार है: “एक के विरुद्ध गंभीर आक्रमण, शांति और सुरक्षा के विरुद्ध खतरा है और उसका सामना सामूहिक रूप से किया जाएगा।
सामूहिक सुरक्षा की प्रक्रिया - 
शांति को खतरा → सुरक्षा परिषद का निर्धारण → आवश्यक उपाय → प्रतिबंध/अन्य कार्रवाई → आवश्यकता पर सैन्य कार्रवाई → शांति की पुनर्स्थापना
सामूहिक सुरक्षा की विशेषताएँ - 
1. इसका केंद्र संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद है।
2. इसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की रक्षा है।
3. इसमें गैर-सैन्य और सैन्य दोनों उपाय हो सकते हैं।
4. सदस्य राज्यों से सहयोग की अपेक्षा की जाती है।
5. इसका आधार संयुक्त राष्ट्र चार्टर है।
शांति स्थापना अभियान -संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना अभियान सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था से संबंधित एक महत्वपूर्ण व्यावहारिक साधन है। शांति स्थापना का उद्देश्य संघर्षरत पक्षों के बीच हिंसा रोकना, युद्धविराम लागू कराने में सहायता करना और स्थायी राजनीतिक समाधान के लिए परिस्थितियाँ तैयार करना है।
शांति स्थापना की प्रकृतिसंयुक्त राष्ट्र चार्टर में Peacekeeping नाम से कोई स्वतंत्र अध्याय नहीं है। यह संयुक्त राष्ट्र की व्यवहारगत और संस्थागत व्यवस्था के रूप में विकसित हुआ। शांति स्थापना के प्रमुख कार्य - 
1. युद्धविराम की निगरानी।
2. संघर्षरत पक्षों के बीच बफर व्यवस्था।
3. नागरिकों की सुरक्षा में सहायता।
4. मानवीय सहायता के लिए सुरक्षित वातावरण।
5. चुनाव एवं राजनीतिक संक्रमण में सहायता।
6. कानून एवं संस्थाओं के पुनर्निर्माण में सहायता।
7. निरस्त्रीकरण, विमुक्ति एवं पुनर्वास में सहायता।
8. शांति समझौतों के पालन की निगरानी।
शांति स्थापना के प्रमुख सिद्धांत
1. पक्षों की सहमति - शांति स्थापना मिशन के लिए संबंधित पक्षों की सहमति महत्वपूर्ण आधार है। 
2. निष्पक्षता - शांति सैनिकों को संघर्ष के किसी पक्ष के राजनीतिक समर्थन के रूप में कार्य नहीं करना चाहिए। 
3. बल का सीमित प्रयोग - बल का प्रयोग मिशन के जनादेश तथा आत्मरक्षा जैसे वैध आधारों के अनुसार किया जाता है।
Peacekeeping और Peace Enforcement में अंतर - 
आधार - Peacekeeping - Peace Enforcement 
उद्देश्य - शांति बनाए रखना - शांति लागू कराना
आधार - सहमति और सहयोग - सुरक्षा परिषद की प्रवर्तन शक्ति
बल प्रयोग - सीमित एवं जनादेश आधारित - अधिक व्यापक सैन्य कार्रवाई संभव
प्रकृति - मध्यस्थता एवं निगरानी - बाध्यकारी कार्रवाई
सुरक्षा की जिम्मेदारी / संरक्षण का दायित्व (Responsibility to Protect - R2P) - Responsibility to Protect (R2P) का विचार इस सिद्धांत पर आधारित है कि नागरिकों को अत्यंत गंभीर अंतर्राष्ट्रीय अपराधों से बचाने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य की है। R2P का विकास 2005 के World Summit में राज्य प्रमुखों द्वारा स्वीकार किए गए ढाँचे से जुड़ा है।
R2P के अंतर्गत चार गंभीर अपराधR2P अपराधों से नागरिकों की रक्षा पर केंद्रित है - 
1. Genocide (नरसंहार)
2. War Crimes (युद्ध अपराध)
3. Ethnic Cleansing (जातीय सफाया)
4. Crimes Against Humanity (मानवता के विरुद्ध अपराध)
R2P के तीन स्तंभ
1. राज्य की जिम्मेदारी - प्रत्येक राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी अपने नागरिकों को नरसंहार, युद्ध अपराध, जातीय सफाए और मानवता के विरुद्ध अपराधों से बचाना है। 
2. अंतर्राष्ट्रीय सहायता - अंतर्राष्ट्रीय समुदाय राज्यों को अपनी इस जिम्मेदारी को पूरा करने में सहायता करता है। इसमें  क्षमता निर्माण, संस्थागत सहायता, संघर्ष की रोकथाम, मानवीय सहायता जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं। 
3. सामूहिक कार्रवाई - यदि कोई राज्य अपनी जनता की रक्षा करने में असफल रहता है या स्वयं गंभीर अपराध करता है, तो अंतर्राष्ट्रीय समुदाय संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से सामूहिक कार्रवाई कर सकता है। सैन्य कार्रवाई की स्थिति में संयुक्त राष्ट्र चार्टर और सुरक्षा परिषद की वैधानिक व्यवस्था का पालन आवश्यक है।
R2P और मानवीय हस्तक्षेप - R2P का अर्थ यह नहीं है कि कोई भी राज्य अपनी इच्छा से दूसरे राज्य में सैन्य हस्तक्षेप कर सकता है। R2P का ढाँचा संयुक्त राष्ट्र की सामूहिक कार्रवाई और चार्टर आधारित व्यवस्था से जुड़ा है। इसलिए R2P को एकतरफा सैन्य हस्तक्षेप का खुला लाइसेंस नहीं माना जा सकता।
सामूहिक सुरक्षा और आत्मरक्षा में अंतर - 
आधार - आत्मरक्षा - सामूहिक सुरक्षा
आधार - अनुच्छेद 51 - अध्याय VII
उद्देश्य - सशस्त्र हमले से रक्षा - अंतर्राष्ट्रीय शांति की रक्षा
कार्रवाई - प्रभावित राज्य स्वयं या सहयोगी राज्य - संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था के अंतर्गत
कारण - सशस्त्र हमला शांति हेतु खतरा - शांति भंग या आक्रमण
प्रकृति - व्यक्तिगत/सामूहिक रक्षा अंतर्राष्ट्रीय सामूहिक कार्रवाई
बल प्रयोग और सामूहिक सुरक्षा का संबंधपूरी व्यवस्था का क्रम - 
अनुच्छेद 2(4) → बल प्रयोग पर निषेध 
अनुच्छेद 51 → सशस्त्र हमले की स्थिति में आत्मरक्षा
अध्याय VII → सुरक्षा परिषद द्वारा सामूहिक कार्रवाई
अनुच्छेद 41 → गैर-सैन्य प्रतिबंध
अनुच्छेद 42 → आवश्यक होने पर सैन्य कार्रवाई
Peacekeeping → संघर्ष के बाद/दौरान शांति बनाए रखने में सहायता
R2P → गंभीर अंतर्राष्ट्रीय अपराधों से नागरिकों की रक्षा का दायित्व
निष्कर्षअंतर्राष्ट्रीय विधि ने राज्यों की सैन्य शक्ति को नियंत्रित करने के लिए अनुच्छेद 2(4) में बल प्रयोग के निषेध को स्थापित किया है। अनुच्छेद 51 सशस्त्र हमले की स्थिति में आत्मरक्षा का अधिकार देता है। दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को अध्याय VII के अंतर्गत अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा के लिए सामूहिक कार्रवाई करने की शक्ति प्राप्त है। शांति स्थापना अभियान संघर्षों को नियंत्रित करने और राजनीतिक समाधान के लिए वातावरण बनाने का माध्यम हैं। Responsibility to Protect (R2P) नागरिकों को नरसंहार, युद्ध अपराध, जातीय सफाए और मानवता के विरुद्ध अपराधों से बचाने के लिए राज्य तथा अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की जिम्मेदारी को रेखांकित करता है। इस पूरी व्यवस्था का केंद्रीय लक्ष्य है युद्ध को रोकना, आक्रमण को नियंत्रित करना और अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा बनाए रखना।

संधि (Law of Treaties) - अर्थ, प्रक्रिया, प्रभाव, महत्व एवं समाप्ति/निलंबन - 
अंतर्राष्ट्रीय विधि में संधि विधि बहुत महत्वपूर्ण अध्याय है। इसका मूल आधार संधियों की विधि पर वियना अभिसमय, 1969 है।
अनुच्छेद 2 में संधि की परिभाषा - 
अनुच्छेद 2(1)(a) के अनुसार, संधि ऐसा अंतर्राष्ट्रीय लिखित समझौता है जो राज्यों के बीच संपन्न हो और अंतर्राष्ट्रीय विधि द्वारा शासित हो, चाहे वह एक ही दस्तावेज में हो या संबंधित दस्तावेजों की श्रृंखला में।
संधि की अवधारणा - संधि (Treaty) दो या अधिक राज्यों के बीच किया गया ऐसा अंतर्राष्ट्रीय समझौता है जो अंतर्राष्ट्रीय विधि द्वारा शासित होता है और जिसके द्वारा पक्षकारों के बीच विधिक अधिकार एवं दायित्व उत्पन्न होते हैं। सरल शब्दों में संधि = राज्यों की सहमति + अंतर्राष्ट्रीय विधि के अधीन समझौता + विधिक दायित्व
उदाहरण शांति संधि, सीमा निर्धारण संधि,  व्यापार समझौता, प्रत्यर्पण संधि।मानवाधिकार संबंधी संधि, पर्यावरण संबंधी संधि आदि। 
अंतर्राष्ट्रीय के नाम - 
I. Treaty - संधि
II. Convention - अभिसमय
III. Agreement - समझौता
IV. Pact - प्रसंविदा
V. Protocol - प्रोटोकॉल
VI. Charter - चार्टर
VII. Covenant — प्रसंविदा
केवल नाम से यह निर्धारित नहीं होता कि कोई दस्तावेज संधि है या नहीं। उसकी विधिक प्रकृति और पक्षकारों की मंशा महत्वपूर्ण है।
संधि विधि का आधार - संधि विधि के प्रमुख स्रोत हैं - 
1. राज्यों की प्रथा (State Practice)
2. अंतर्राष्ट्रीय प्रथागत विधि
3. न्यायिक निर्णय
4. विधिवेत्ताओं के लेखन
5. Vienna Convention on the Law of Treaties, 1969
संधियों की विधि पर वियना अभिसमय, 1969 - Vienna Convention on the Law of Treaties, 1969 को सामान्यतः संधि विधि का प्रमुख संहिताबद्ध आधार माना जाता है। यह 23 मई 1969 को अपनाया गया और 27 जनवरी 1980 को लागू हुआ।
उद्देश्यइस अभिसमय का उद्देश्य संधियों से संबंधित नियमों को व्यवस्थित करना है, जैसे - 
I. संधि का निर्माण
II. संधि की वैधता
III. संधि का पालन
IV. संधि की व्याख्या
V. आरक्षण
VI. संशोधन
VII. समाप्ति
VIII. निलंबन
संधि का महत्वपूर्ण सिद्धांत
I. अनुच्छेद 26 का मूल सिद्धांत पेक्ट संट सर्वेंडा (Pacta Sunt Servanda)  - प्रत्येक लागू संधि अपने पक्षकारों के लिए बाध्यकारी है और उसका पालन सद्भावना से किया जाना चाहिए, अर्थात् राज्य केवल इसलिए संधि से पीछे नहीं हट सकता कि बाद में उसे संधि पसंद नहीं रही।
II. आंतरिक कानून का बहाना नहीं - अनुच्छेद 27 के अनुसार कोई राज्य अपने आंतरिक कानून के प्रावधानों को संधि का पालन न करने के औचित्य के रूप में प्रस्तुत नहीं कर सकता। 
संधियों का निर्माण एवं निष्पादन - संधि का निर्माण कई चरणों में होता है।
1. बातचीत/वार्ता (Negotiation) -
सबसे पहले संबंधित राज्य संधि की शर्तों पर बातचीत करते हैं।
उदाहरण - भारत और किसी दूसरे देश के बीच प्रत्यर्पण संधि बनानी है तो - √दोनों देश चर्चा करेंगे कि 
• किन अपराधों में प्रत्यर्पण होगा? 
• किन परिस्थितियों में प्रत्यर्पण अस्वीकार होगा?
• अभियुक्त को कौन-सी सुरक्षा मिलेगी?
2. पाठ का अंगीकरण (Adoption of Text) - वार्ता के बाद संधि का अंतिम पाठ तैयार और स्वीकार किया जाता है।अनुच्छेद 9 संधि के पाठ को अपनाने से संबंधित है। सभी वार्ताकार राज्यों की सहमति आवश्यक होती है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में निर्धारित मतदान नियम लागू हो सकते हैं।
3. संधि के पाठ का प्रमाणीकरण (Authentication) - अगला चरण संधि के पाठ को आधिकारिक रूप से प्रमाणित करना है। इससे यह निश्चित होता है कि यही वह अंतिम पाठ है जिस पर राज्यों ने सहमति व्यक्त की है।
4. हस्ताक्षर (Signature) राज्य का अधिकृत प्रतिनिधि संधि पर हस्ताक्षर करता है लेकिन ध्यान रहे हस्ताक्षर और अनुसमर्थन हमेशा एक ही चीज नहीं हैं  कुछ संधियों में हस्ताक्षर ही राज्य की अंतिम सहमति माना जा सकता है, जबकि अन्य में हस्ताक्षर के बाद Ratification आवश्यक होती है।
5. सहमति व्यक्त करने के तरीके - Vienna Convention के अनुच्छेद 11 के अनुसार कोई राज्य संधि से बाध्य होने की सहमति इन माध्यमों से व्यक्त कर सकता है - 
• हस्ताक्षर 
• संधि बनाने वाले दस्तावेजों का आदान-प्रदान
• अनुसमर्थन (Ratification)
• स्वीकृति (Acceptance)
• अनुमोदन (Approval)
• परिग्रहण/अभिगमन (Accession)
या अन्य सहमत माध्यम।
6. प्रवर्तन (Entry into Force) - जब संधि की निर्धारित शर्तें पूरी हो जाती हैं तो वह लागू होती है।
उदाहरण - यदि संधि में लिखा है कि वह 10 राज्यों द्वारा Ratification के बाद लागू होगी, तो दसवें राज्य द्वारा आवश्यक कार्रवाई पूरी करने के बाद संधि लागू हो सकती है।
संधि पर आरक्षण (किसी विशेष अनुच्छेद को लागू नहीं करना (Reservations) - आरक्षण का अनुच्छेद 2(1)(d) के अनुसार अर्थ है किसी राज्य द्वारा संधि पर हस्ताक्षर, Ratification, Acceptance, Approval अथवा Accession के समय दिया गया ऐसा एकपक्षीय वक्तव्य जिसके द्वारा वह संधि के कुछ प्रावधानों के कानूनी प्रभाव को अपने ऊपर लागू होने से बाहर रखना या उसमें परिवर्तन करना चाहता है।
सरल भाषा में राज्य कहता है: मैं संधि में शामिल हो रहा हूँ, लेकिन इस विशेष प्रावधान को इस सीमा तक स्वीकार नहीं करता।
उदाहरणमान लो किसी संधि में 20 अनुच्छेद हैं और कोई राज्य अनुच्छेद 15 की किसी व्यवस्था को स्वीकार नहीं करना चाहता। यदि संधि अनुमति देती है, तो वह उस प्रावधान पर Reservation लगा सकता है।
संधि में आरक्षण की सीमाएँ - अनुच्छेद 19 के अनुसार राज्य आरक्षण तब नहीं कर सकता जब - 
1. संधि आरक्षण को निषिद्ध करती हो।
2. संधि केवल कुछ निश्चित आरक्षणों की अनुमति देती हो और प्रस्तावित आरक्षण उनमें शामिल न हो।
3. आरक्षण संधि के विषय और उद्देश्य (Object and Purpose) के विरुद्ध हो।
4. आरक्षण की स्वीकृति और आपत्ति
अन्य राज्य Reservation स्वीकार कर सकते हैं या उस पर Objection कर सकते हैं।
लेकिन केवल आपत्ति कर देने से हर स्थिति में पूरी संधि समाप्त नहीं हो जाती। उसका प्रभाव संबंधित संधि और पक्षकारों की स्थिति पर निर्भर करता है।
5. संधि पर Reservations का महत्व - यह व्यवस्था राज्यों को संधि में व्यापक भागीदारी का अवसर देती है।
• पूर्ण स्वीकार → संधि में शामिल होना आसान
• कुछ प्रावधानों पर आरक्षण → राज्य अपनी विशेष परिस्थितियों के बावजूद संधि में शामिल हो सकता है।
संधि का अनुसमर्थन/पुष्टिकरण  (Ratification) - Ratification वह औपचारिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई राज्य संधि पर हस्ताक्षर करने के बाद यह अंतिम रूप से व्यक्त करता है कि वह संधि से बाध्य होने के लिए अपनी सहमति देता है।
अनुसमर्थन की आवश्यकता - कई देशों में कोई राजनयिक प्रतिनिधि केवल हस्ताक्षर करके राज्य को अंतिम रूप से बाध्य नहीं कर सकता। संधि को संवैधानिक या वैधानिक प्रक्रिया से अनुमोदित करना पड़ता है।
भारत के संदर्भ में अनुसमर्थनभारत में संधियों के संबंध में कार्यपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका है। संविधान का अनुच्छेद 73 संघ की कार्यपालिका शक्ति की सीमा से संबंधित है और अनुच्छेद 253 संसद को अंतर्राष्ट्रीय संधियों, समझौतों और अभिसमयों को लागू करने के लिए कानून बनाने की शक्ति देता है।
महत्वपूर्ण बातभारत में प्रत्येक अंतर्राष्ट्रीय संधि को लागू करने के लिए संसद की अलग से स्वीकृति आवश्यक हो, ऐसा नियम नहीं है, लेकिन यदि संधि को घरेलू कानून में प्रभावी करने के लिए विधायी परिवर्तन आवश्यक हो, तो संसद की भूमिका आती है।
Ratification और Signature में अंतर - 
आधार Signature - Ratification

प्रकृति - प्रारंभिक/औपचारिक सहमति - अंतिम औपचारिक सहमति
हमेशा आवश्यक? - नहीं  - नहीं
उद्देश्य - संधि के पाठ पर सहमति दर्शाना - राज्य को संधि से बाध्य करने की अंतिम सहमति
प्रभाव - संधि के अनुसार अलग-अलग - राज्य की अंतिम सहमति
संधि का परिग्रहण/अभिगमन (बाद में जुड़ना) (Accession) - Accession वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई राज्य ऐसी संधि का पक्षकार बनता है जिस पर उसने मूल रूप से हस्ताक्षर नहीं किया था।
उदाहरण - मान लो A, B और C ने संधि बनाई और उस पर हस्ताक्षर किए। बाद में D भी उस संधि का पक्षकार बनना चाहता है, लेकिन वह मूल हस्ताक्षरकर्ता नहीं था। संधि यदि अनुमति देती है तो D Accession के माध्यम से पक्षकार बन सकता है।
Accession और Ratification में अंतर - 
Ratification - पहले हस्ताक्षर → बाद में पुष्टि।
Accession - मूल हस्ताक्षरकर्ता नहीं → बाद में संधि से जुड़ना। जी
संधियों की व्याख्या (Interpretation of Treaties) - संधि की भाषा अस्पष्ट होने पर उसका अर्थ निर्धारित करना आवश्यक होता है। Vienna Convention के अनुच्छेद 31 से 33 विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
अनुच्छेद 31- सामान्य व्याख्या नियम संधि की व्याख्या - 
1. सद्भावना (Good Faith) से
2. शब्दों के सामान्य अर्थ (Ordinary Meaning) के अनुसार,
3. उनके संदर्भ (Context) में,
4. तथा संधि के विषय और उद्देश्य (Object and Purpose) के प्रकाश में की जाएगी।
यही चार शब्द महत्वपूर्ण हैं - Good Faith + Ordinary Meaning + Context + Object & Purpose
Context में क्या शामिल है? - अनुच्छेद 31 के अनुसार संदर्भ में शामिल हो सकते हैं संधि का पाठ, प्रस्तावना, Annexes,  संधि से संबंधित समझौते संधि के निर्माण के संबंध में पक्षकारों के बीच हुए कुछ समझौते/दस्तावेज
Subsequent Practiceसंधि के बाद पक्षकारों द्वारा उसके अनुप्रयोग में अपनाई गई ऐसी प्रथा जो संधि की व्याख्या पर सहमति स्थापित करे, भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
अनुच्छेद 32 अनुपूरक साधनयदि अनुच्छेद 31 के आधार पर अर्थ अस्पष्ट या संदिग्ध हो या परिणाम स्पष्ट रूप से असंगत/अनुचित हो तो Supplementary Means of Interpretation का सहारा लिया जा सकता है।
मुख्य साधन संधि की तैयारी का इतिहास (Travaux Préparatoires)।संधि के निष्कर्ष की परिस्थितियाँ
अनुच्छेद 33 - बहुभाषी संधियाँ - यदि संधि दो या अधिक भाषाओं में प्रमाणित है तो प्रत्येक प्रमाणित पाठ सामान्यतः समान रूप से प्रामाणिक होता है, जब तक संधि अन्यथा न कहे। यदि भाषाओं के बीच अर्थ में अंतर हो तो संधि के उद्देश्य और संदर्भ को ध्यान में रखकर सामंजस्यपूर्ण अर्थ निकालने का प्रयास किया जाता है।
संधियों की समाप्ति एवं निलंबन - 
संधि की समाप्ति (Termination) - Termination का अर्थ है कि संधि भविष्य के लिए पक्षकारों पर लागू रहना बंद कर देती है।
समाप्ति के प्रमुख आधार - 
(1) संधि की शर्तों के अनुसार समाप्तियदि संधि में लिखा है कि वह 10 वर्ष के बाद समाप्त होगी तो निर्धारित अवधि पूरी होने पर वह समाप्त हो सकती है।
(2) सभी पक्षकारों की सहमतिसभी पक्षकार सहमत होकर संधि समाप्त कर सकते हैं।
(3) Withdrawalयदि संधि में Withdrawal की अनुमति है तो निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कोई राज्य संधि से बाहर निकल सकता है।
(4) नई संधि द्वारा प्रतिस्थापनयदि सभी पक्षकार बाद में ऐसी नई संधि करते हैं जो उसी विषय को नियंत्रित करती है, तो पुरानी संधि कुछ परिस्थितियों में समाप्त या प्रतिस्थापित हो सकती है।
(5) गंभीर उल्लंघन (Material Breach)अनुच्छेद 60 के अनुसार यदि कोई पक्षकार संधि का गंभीर उल्लंघन करता है, तो परिस्थितियों के अनुसार अन्य पक्षकार संधि को समाप्त करने या उसके संचालन को निलंबित करने का आधार प्राप्त कर सकते हैं।
• Bilateral Treaty - एक पक्ष द्वारा material breach होने पर दूसरा पक्ष उसे termination या suspension का आधार बना सकता है।
• Multilateral Treaty - स्थिति अधिक जटिल होती है और अन्य पक्षकारों के अधिकार संधि तथा Vienna Convention के अनुसार निर्धारित होते हैं।
(6) असंभवता (Impossibility of Performance) - 
अनुच्छेद 61 - यदि संधि के पालन के लिए आवश्यक वस्तु/स्थिति स्थायी रूप से समाप्त हो गई है और उसके कारण संधि का पालन असंभव हो गया है, तो कुछ परिस्थितियों में राज्य इस आधार का सहारा ले सकता है।
उदाहरण - यदि किसी नदी या भौगोलिक वस्तु के अस्तित्व पर संधि का पालन निर्भर था और वह स्थायी रूप से समाप्त हो गई।लेकिन राज्य अपनी स्वयं की गलती से उत्पन्न असंभवता का सामान्यतः लाभ नहीं उठा सकता।
परिस्थितियों में मूलभूत परिवर्तन (Fundamental Change of Circumstances) - अनुच्छेद 62 में इसका उल्लेख है। इसे Rebus Sic Stantibus के सिद्धांत से जोड़ा जाता है।
जिसका अर्थ है जिन मूल परिस्थितियों के आधार पर राज्य ने संधि स्वीकार की थी, उनमें असाधारण और मूलभूत परिवर्तन हो जाए तो कुछ कठोर शर्तों के अधीन राज्य संधि की समाप्ति या उससे हटने का आधार प्रस्तुत कर सकता है। लेकिन यह बहुत सीमित सिद्धांत है।
आवश्यक शर्तें - 
परिवर्तन - मूल परिस्थिति से संबंधित होना चाहिए।
सहमति - पक्षकार की सहमति के लिए आवश्यक आधार होना चाहिए।
दायित्व की सीमा में बदलाव - संधि के अधीन दायित्व की सीमा को मूल रूप से बदलना चाहिए। यदि संधि सीमा-निर्धारण से संबंधित है तो Fundamental Change of Circumstances का प्रयोग विशेष रूप से प्रतिबंधित है।
संधि की अमान्यता (Invalidity) - संधि समाप्त होने और संधि शुरू से ही वैध न होने में अंतर है। Vienna Convention में कुछ आधार हैं - 
(i) कमी/गलती (Error) - राज्य ने किसी महत्वपूर्ण तथ्य या स्थिति के संबंध में ऐसी भूल की जो उसकी सहमति के लिए महत्वपूर्ण थी।
(ii) धोखाधड़ी (Fraud) - दूसरे पक्ष द्वारा धोखे से सहमति प्राप्त करना।
(iii) भ्रष्टाचार (Corruption) - राज्य के प्रतिनिधि को भ्रष्ट करके सहमति प्राप्त करना।
(iv) राज्य प्रतिनिधियों पर दबाव  Coercion of Representative - राज्य के प्रतिनिधि पर दबाव या धमकी डालकर उसकी सहमति प्राप्त करना।
(v) राज्य पर दबाव Coercion of State - बल या बल प्रयोग की धमकी द्वारा राज्य को संधि स्वीकार करने के लिए बाध्य करना।
(vi) मानवीय मूल्य Jus Cogens के विरुद्ध संधि अनुच्छेद 53 के अनुसार यदि कोई संधि ऐसी अनिवार्य सामान्य अंतर्राष्ट्रीय विधि (Peremptory Norm /Jus Cogens) के विरोध में है, तो वह शून्य (Void) है।
उदाहरण - 
• नरसंहार का निषेध
• दासता का निषेध
• यातना के विरुद्ध मूलभूत निषेध
जैसे मौलिक नियमों के विरुद्ध संधि की वैधता गंभीर रूप से प्रभावित होती है।
4. संधि का निलंबन (Suspension) - 
Suspension की स्थिति में संधि की वैधता समाप्त नहीं होती, लेकिन एक निश्चित अवधि या परिस्थितियों में उसके दायित्वों का संचालन अस्थायी रूप से रुक जाता है।
Termination और Suspension में अंतर
आधार - Termination - Suspension
अर्थ - संधि का संचालन समाप्त - संचालन अस्थायी रूप से रुकना
प्रकृति - स्थायी प्रभाव - अस्थायी प्रभाव
संधि - भविष्य में लागू नहीं रहती - परिस्थितियाँ बदलने पर फिर लागू हो सकती है
उद्देश्य - संबंध समाप्त करना - कुछ समय के लिए दायित्व रोकना
संधि के पालन का मूल सिद्धांत - संधि विधि का सबसे प्रसिद्ध सिद्धांत है:Pacta Sunt Servanda. अनुच्छेद 26 के अनुसार Every treaty in force is binding upon the parties to it and must be performed by them in good faith. अर्थात् प्रवर्तन में आई प्रत्येक संधि पक्षकारों पर बाध्यकारी है और उसका पालन सद्भावना से किया जाना चाहिए। यही संधि विधि की रीढ़ है।
पूरा क्रम एक नजर में - 
संधि विधि ↓
वार्ता (Negotiation)
पाठ का अंगीकरण (Adoption)
प्रमाणीकरण (Authentication)
हस्ताक्षर (Signature)
Ratification / Acceptance / Approval
Accession
Entry into Force
Pacta Sunt Servanda
Interpretation: Articles 31–33
Amendment / Reservation
Suspension / Termination
Vienna Convention Articles अनुच्छेद - 
 2 संधि एवं आरक्षण की परिभाषाएँ
6 राज्यों की संधि करने की क्षमता
7 प्रतिनिधित्व/Full Powers
9 संधि के पाठ का Adoption
11 संधि से बाध्य होने की सहमति
12 Signature
14 Ratification
15 Accession
19 Reservations
20 Reservations की Acceptance/Objection
21 Reservations के विधिक प्रभाव
24 संधि का प्रवर्तन
26 Pacta Sunt Servanda
27 आंतरिक कानून का सहारा नहीं
31 General Rule of Interpretation
32 Supplementary Means
33 बहुभाषी संधियों की व्याख्या
39–41 संशोधन/Modification
46–53 संधि की अमान्यता से संबंधित आधार
53 Jus Cogens
54 पक्षकारों की सहमति से Termination/Withdrawal
56 Withdrawal जब संधि में प्रावधान न हो
60 Material Breach
61 Impossibility of Performance
62 Fundamental Change of Circumstances
64 नए Jus Cogens के कारण पुरानी संधि का प्रभाव
65–68 Termination/Invalidity आदि की प्रक्रिया
सूत्र - 
1. संधि का आधार: राज्य की स्वतंत्र सहमति
2. संधि की रीढ़: Pacta Sunt Servanda
3. आरक्षण की सीमा: Object and Purpose
4. Ratification: हस्ताक्षर के बाद अंतिम पुष्टि
5. Accession: मूल हस्ताक्षर के बिना बाद में पक्षकार बनना
6. Interpretation: Articles 31–33
7. Termination/Suspension: Articles 54–64
सार  - राज्य अपनी स्वतंत्र सहमति से संधि करते हैं, सद्भावना से उसका पालन करते हैं, संधि का अर्थ उसके शब्दों, संदर्भ और उद्देश्य से निर्धारित किया जाता है, और केवल अंतर्राष्ट्रीय विधि में मान्य आधारों पर ही उससे बाहर निकला या उसके संचालन को निलंबित किया जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व (International Responsibility) अवधारणा, 
राज्य का उत्तरदायित्व, राज्य के प्रति आचरण का आरोपण,  दायित्वों का उल्लंघन, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अवैध कृत्यों के परिणाम, क्षतिपूर्ति (पूर्वस्थिति की बहाली, प्रतिकर/मुआवज़ा संतोष/संतुष्टि) - 
Public International Law में International Law Commission (ILC) के Articles on Responsibility of States for Internationally Wrongful Acts, 2001 (ARSIWA) के अनुसार - 
अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व  की अवधारणाअंतरराष्ट्रीय विधि में अंतर्राष्ट्रीय उत्तरदायित्व का अर्थ है कि जब कोई राज्य अंतरराष्ट्रीय विधि के अधीन अपने दायित्व का उल्लंघन करता है और उसका आचरण उस राज्य से विधिक रूप से संबद्ध है, तो उस राज्य पर अंतरराष्ट्रीय विधिक उत्तरदायित्व उत्पन्न होता है।
राज्य का आचरण + राज्य को आरोपण (Attribution) + अंतरराष्ट्रीय दायित्व का उल्लंघन = Internationally Wrongful Act, राज्य का उत्तरदायित्व
ARSIWA के Article 1 का मूल सिद्धांत है कि किसी राज्य का प्रत्येक internationally wrongful act उस राज्य की international responsibility को जन्म देता है।
Internationally Wrongful Act - ARSIWA के Article 2 के अनुसार किसी राज्य का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अवैध कृत्य तब बनता है जब वह - 
(A) Conduct attributable to the State - अर्थात् कार्य या omission राज्य को विधिक रूप से आरोपित किया जा सके।
(B) Breach of an international obligation - उस आचरण से उस राज्य के किसी अंतरराष्ट्रीय दायित्व का उल्लंघन हुआ हो।
उदाहरणमान लीजिए राज्य X ने संधि के माध्यम से वचन दिया कि वह राज्य Y के नागरिकों की संपत्ति की रक्षा करेगा।यदि राज्य X जानबूझकर उनकी संपत्ति नष्ट करता है, या ऐसी परिस्थिति में आवश्यक सुरक्षा नहीं देता और यह उसके अंतरराष्ट्रीय दायित्व का उल्लंघन है, तो X का internationally wrongful act बन सकता है।
राज्य का उत्तरदायित्व (State Responsibility) राज्य अंतरराष्ट्रीय विधि का प्रमुख विषय है। इसलिए जब कोई राज्य treaty obligation तोड़ता है, customary international law का उल्लंघन करता है, दूसरे राज्य के अधिकार का उल्लंघन करता है,  अंतरराष्ट्रीय अपराध/गंभीर उल्लंघन से संबंधित दायित्व तोड़ता है तो उस पर State Responsibility उत्पन्न हो सकती है। यहां एक महत्वपूर्ण है कि State responsibility और criminal responsibility को एक ही चीज नहीं समझना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय विधि में राज्य के wrongful act से अंतरराष्ट्रीय विधिक दायित्व उत्पन्न होता है, जैसे उल्लंघन रोकना,पुनरावृत्ति न करने की गारंटी, restitution,  compensation या satisfaction.
राज्य के प्रति आचरण का आरोपण (Attribution)किसी व्यक्ति ने कोई गलत कार्य कर दिया, इससे स्वतः राज्य जिम्मेदार नहीं हो जाता। पहले यह देखना होता है कि क्या वह conduct अंतरराष्ट्रीय विधि के अनुसार राज्य का conduct माना जा सकता है? इसे Attribution कहते हैं।
राज्य के अंगों का आचरण Article 4 - किसी राज्य के legislative organs,  executive organs, judicial organs, central government,  territorial governmental authorities का conduct राज्य का conduct माना जाता है।
उदाहरणयदि राज्य की पुलिस किसी विदेशी नागरिक के विरुद्ध ऐसा कार्य करती है जो अंतरराष्ट्रीय दायित्व का उल्लंघन है, तो राज्य यह नहीं कह सकता कि पुलिस ने किया है, सरकार ने नहीं क्योंकि पुलिस राज्य का अंग है। इसलिए उसका व्यवहार राज्य को attributable हो सकता है।
अधिकार से अधिक कार्य करना  Article 7कभी-कभी राज्य का अधिकारी अपनी शक्ति से बाहर जाकर कार्य करता है।
उदाहरणएक पुलिस अधिकारी को केवल गिरफ्तारी की शक्ति मिली है, लेकिन वह हिरासत में व्यक्ति को गंभीर रूप से प्रताड़ित करता है। यदि उसने official capacity में सरकारी अधिकार का उपयोग करते हुए कार्य किया है, तो केवल यह तथ्य कि उसने अपने अधिकार की सीमा पार कर दी, राज्य के attribution को आवश्यक रूप से समाप्त नहीं करता।इसे excess of authority / contravention of instructions की स्थिति के रूप में समझा जाता है।
निजी व्यक्ति और राज्य का उत्तरदायित्व - सामान्य नियम है कि Private person का conduct सीधे राज्य का conduct नहीं होता। लेकिन कुछ अपवाद हैं जैसे  Article 5 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति या संस्था सरकारी अधिकार का कोई तत्व प्रयोग कर रही है और उसे ऐसा करने का अधिकार राज्य के कानून द्वारा दिया गया है, तो उसका conduct परिस्थितियों में राज्य को attributable हो सकता है।
दूसरे राज्य के नियंत्रण में कार्य Article 6यदि किसी राज्य के अंग दूसरे राज्य द्वारा उपलब्ध कराए गए हैं, तो परिस्थितियों के अनुसार उनका conduct किस राज्य को attributable होगा।
विद्रोही/Insurrectional Movements Article 10यदि कोई  insurrectional movement,  revolutionary movement बाद में सफल होकर नई सरकार बन जाता है, तो उस movement का पूर्व conduct कुछ परिस्थितियों में नए राज्य को attributable होता है। इसी प्रकार यदि वह movement नया राज्य स्थापित करता है तो संबंधित नियम लागू होते हैं।
राज्य द्वारा आचरण को स्वीकार करना  Article 11कभी कोई कार्य मूल रूप से राज्य का conduct नहीं था, लेकिन राज्य बाद में उसे acknowledge,  adopt कर लेता है। ऐसी स्थिति में वह conduct अंतरराष्ट्रीय विधि के अनुसार राज्य को attributable हो सकता है।
दायित्वों का उल्लंघन (Breach of International Obligation) Article 12 जब किसी राज्य का conduct उस राज्य के लिए लागू अंतरराष्ट्रीय obligation के अनुरूप नहीं होता, तब obligation का breach होता है।Obligation का स्रोत अंतरराष्ट्रीय दायित्व आ सकता है 
• Treaty से
• Customary International Law से
• General principles से
• अन्य मान्य अंतरराष्ट्रीय विधिक स्रोतों से
obligation के breach - हेतु यह देखना होगा कि संबंधित obligation उस समय राज्य पर लागू था या नहीं।
उदाहरणराज्य A ने 2020 में किसी treaty को स्वीकार किया। यदि उसने 2018 में ऐसा कार्य किया जो treaty के दायित्व के विपरीत था, तो केवल उस treaty के आधार पर 2018 का breach नहीं कहा जा सकता, जब तक कोई अन्य applicable obligation मौजूद न हो।
अर्थात् Obligation must be binding upon the State at the relevant time.
Continuing Breachकुछ उल्लंघन एक बार होकर समाप्त नहीं होते। यदि wrongful situation लगातार बनी रहती है, तो उसे continuing breach कहा जा सकता है।
उदाहरण - किसी व्यक्ति को राज्य ने अंतरराष्ट्रीय विधि के विरुद्ध लगातार अवैध हिरासत में रखा। यदि violation जारी है तो breach भी जारी रह सकता है।
Circumstances Precluding Wrongfulnessहर ऐसा कार्य जो गलत दिखाई देता है, हर परिस्थिति में internationally wrongful act नहीं होगा। कुछ परिस्थितियों में wrongfulness precluded हो सकती है।
मुख्य परिस्थितियां ARSIWA Chapter V के अनुसार - 
1. Consent
2. Self-defence
3. Countermeasures
4. Force majeure
5. Distress
6. Necessity
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अवैध कृत्य के परिणाम  यदि State Responsibility स्थापित हो जाए तो उसका परिणाम क्या होगा? ARSIWA के Articles 28 के अनुसार इसके परिणाम - 1. Wrongful act को रोकनाराज्य को ongoing violation समाप्त करना होता है।
2. पुनरावृत्ति न करने की गारंटीजहां परिस्थितियां इसकी मांग करती हैं, वहां appropriate assurances and guarantees of non-repetition देना पड़ सकता है।
3. पूर्ण क्षतिपूर्ति Article 31राज्य को wrongful act से हुई injury की full reparation करनी होती है।
क्षतिपूर्ति (Reparation) - अंतरराष्ट्रीय विधि का एक केंद्रीय सिद्धांत है कि  Wrongful act के कारण हुई injury की पूर्ण क्षतिपूर्ति होनी चाहिए।
Reparation का उद्देश्य - यह है कि injured State/person को उस स्थिति के जितना संभव हो सके निकट लाया जाए जो wrongful act न होने पर होती।
Restitution + Compensation + Satisfaction (RCS) = Full Reparation.
पूर्वस्थिति की बहाली (Restitution) Article 35Restitution का अर्थ है गलत कृत्य होने से पहले की स्थिति को पुनः स्थापित करना।
उदाहरणराज्य A ने अंतरराष्ट्रीय विधि के विरुद्ध राज्य B की कोई संपत्ति जब्त कर ली। यदि संभव हो तो संपत्ति वापस करना = Restitution या यदि किसी व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया और उसे मुक्त करना संभव remedy है, तो वह restitution के विचार से संबंधित है।
Restitution की सीमाएं - यह हमेशा अनिवार्य या संभव नहीं होती। यदि   restitution materially impossible है, या restitution से प्राप्त लाभ की तुलना में अत्यधिक disproportionate burden उत्पन्न होगा तो केवल restitution पर जोर नहीं दिया जाता। ऐसी स्थिति में compensation या अन्य forms of reparation महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
प्रतिकर/मुआवजा (Compensation) Article 36जब restitution पर्याप्त नहीं है, तो राज्य को wrongful act से हुई financially assessable damage के लिए compensation देना पड़ सकता है। इसमें वास्तविक आर्थिक क्षति, महत्वपूर्ण क्षति, अन्य क्षति आदि शामिल होते हैं, यदि वे पर्याप्त रूप से स्थापित हों।
Compensation का उद्देश्यCompensation का उद्देश्य आरोपी राज्य को दंडित करना नहीं है अपितु  पीड़ित पक्ष को हुई आर्थिक रूप से मूल्यांकन योग्य क्षति की भरपाई करना।इसलिए Compensation ≠ Punishment।
संतुष्टि (Satisfaction) Article 37Satisfaction तब महत्वपूर्ण होती है जब injury को केवल पैसे से ठीक नहीं किया जा सकती इसके रूप में - 
• wrongful act को स्वीकारना
• गलती मानना
• क्षमा याचना
• अन्य उपयुक्त अनार्थिक परिलाभ।
उदाहरणमान लीजिए किसी राज्य ने दूसरे राज्य की संप्रभुता का गंभीर उल्लंघन किया, लेकिन कोई ऐसी आर्थिक क्षति नहीं हुई जिसे धन से पूरी तरह मापा जा सके।
ऐसी स्थिति में: औपचारिक क्षमा/गलती की स्वीकृति = संतुष्टि से भरपाई होती है।
यथास्थिति बहाली - क्षतिपूर्ति और संतुष्टि में अंतर - 
आधार - Restitution Compensation - Satisfaction
अर्थ - पूर्व स्थिति बहाल करना - आर्थिक क्षति की भरपाई - गैर-आर्थिक remedy
प्रकृति - वस्तु/स्थिति - वापस धनराशि - स्वीकारोक्ति या क्षमा याचना आदि
उद्देश्य - Status quo ante - Financial loss की भरपाई - Moral/legal injury की remedy
प्रमुख Article - 35 - 36 - 37
उदाहरण - जब्त संपत्ति वापस - संपत्ति की आर्थिक क्षति का भुगतान - औपचारिक माफी
Causation और Reparationराज्य से वही क्षति recover की जा सकती है जिसका wrongful act से पर्याप्त causal connection हो अर्थात् केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि मुझे नुकसान हुआ। उसे यह भी स्थापित करना होगा कि यह नुकसान राज्य के internationally wrongful act के कारण हुआ।
नैतिक क्षति (Moral Damage) - International responsibility में केवल आर्थिक क्षति ही महत्वपूर्ण नहीं है।
कभी प्रतिष्ठा, dignity, sovereign rights, non-material interests को हुई क्षति भी संबद्ध हो सकती है। ऐसी परिस्थितियों में satisfaction महत्वपूर्ण remedy हो सकती है।
Serious Breaches of Peremptory Norms ARSIWA Articles 40 और 41 यदि कोई राज्य peremptory norm of general international law (jus cogens) के गंभीर उल्लंघन के लिए जिम्मेदार है, तो अन्य राज्यों पर भी विशेष दायित्व उत्पन्न हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में अन्य राज्यों को l
• awful means से serious breach समाप्त करने के लिए cooperate करना चाहिए।
• उस स्थिति को lawful मान्यता नहीं देनी चाहिए जो ऐसे गंभीर उल्लंघन से उत्पन्न हुई है।
• ऐसी स्थिति बनाए रखने में सहायता नहीं करनी चाहिए।
State Responsibility का पूरा ढांचा
• राज्य का Conductक्या Conduct State को attributable है? - हाँ
• क्या International Obligation का Breach हुआ? - हाँ
तो Internationally Wrongful Act हुआ जो State Responsibility का निर्माण करता है जिसका परिणाम = Cessation + Non-Repetition/Full Reparation
Restitution / Compensation / Satisfaction

Responsibility और Liability में अंतर - 
• State Responsibility internationally wrongful act से उत्पन्न दायित्व है।
जबकि कुछ अंतरराष्ट्रीय विधिक व्यवस्थाओं में lawful activities से होने वाली transboundary harm के लिए liability/compensation के अलग सिद्धांत होते हैं। इसलिए दोनों समानार्थी नहीं हैं।
न्यायिक निर्णय - Factory at Chorzów - अंतरराष्ट्रीय क्षतिपूर्ति के सिद्धांत को समझने के लिए Chorzów Factory (Germany v. Poland) अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस मामले में Permanent Court of International Justice ने यह सिद्धांत स्थापित किया कि अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन के परिणामस्वरूप ऐसी reparation होनी चाहिए जो wrongful act के परिणामों को यथासंभव समाप्त करे। इसी मामले से full reparation का सिद्धांत अंतरराष्ट्रीय विधि में अत्यंत प्रसिद्ध हुआ।
किसने किया - Attribution
कौन-सा दायित्व टूटा - Breach
अब क्या होगा - Responsibility
नुकसान कैसे पूरा होगा - Restitution + Compensation + Satisfaction.

अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि (International Humanitarian Law) के सिद्धांत, जिनेवा अभिसमय एवं अतिरिक्त प्रोटोकॉल, युद्धरत पक्षों (Combatants) एवं गैर-युद्धरत व्यक्तियों के बीच अंतर, नागरिकों एवं युद्धबंदियों की सुरक्षा, युद्ध अपराध एवं उत्तरदायित्व निर्धारित करने के तंत्र - 
अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि अर्थ एवं अवधारणा - अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि (IHL) उन अंतरराष्ट्रीय नियमों का समूह है जो सशस्त्र संघर्ष के दौरान मानव पीड़ा को कम करने, युद्ध में भाग न लेने वाले या अब भाग लेने की स्थिति में न रहने वाले व्यक्तियों की रक्षा करने तथा युद्ध के साधनों और तरीकों को सीमित करने के लिए बनाए गए हैं। इसे Law of Armed Conflict (LOAC) या Law of War भी कहा जाता है। इसका उद्देश्य युद्ध को समाप्त करना नहीं, बल्कि युद्ध की स्थिति में भी मानवता की न्यूनतम मर्यादाओं को बनाए रखना है। IHL के दो प्रमुख आधार माने जाते हैं:
1. Geneva Law - युद्ध से प्रभावित व्यक्तियों की सुरक्षा।
2. Hague Law - युद्ध के साधनों और तरीकों पर नियंत्रण।
अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि के प्रमुख सिद्धांत - 
(A) मानवता का सिद्धांत (Principle of Humanity) - युद्ध में भी प्रत्येक व्यक्ति की मानवीय गरिमा का सम्मान किया जाना चाहिए। ऐसे व्यक्तियों को अनावश्यक पीड़ा पहुँचाना निषिद्ध है जो युद्ध में सक्रिय रूप से भाग नहीं ले रहे हैं। घायल सैनिकों की देखभाल, बंदियों के साथ मानवीय व्यवहार, नागरिकों की सुरक्षा तथा यातना और अमानवीय व्यवहार का निषेध इसी सिद्धांत पर आधारित है।
(B) विभेदीकरण का सिद्धांत (Principle of Distinction) - यह IHL का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है। युद्धरत पक्षों को Combatants और Civilians तथा Military Objectives और Civilian Objects में अंतर करना आवश्यक है। हमला केवल वैध सैन्य लक्ष्य पर किया जा सकता है। नागरिकों को जानबूझकर निशाना बनाना निषिद्ध है।
(C) आनुपातिकता का सिद्धांत (Principle of Proportionality) किसी वैध सैन्य लक्ष्य पर भी ऐसा हमला नहीं किया जा सकता जिसमें अपेक्षित सैन्य लाभ की तुलना में नागरिकों को होने वाली आकस्मिक क्षति अत्यधिक हो। अतः सैन्य लाभ और संभावित नागरिक क्षति के बीच संतुलन आवश्यक है।
(D) सैन्य आवश्यकता का सिद्धांत (Military Necessity) - युद्ध में वही सैन्य कार्रवाई की जा सकती है जो वैध सैन्य उद्देश्य प्राप्त करने के लिए आवश्यक हो और IHL द्वारा निषिद्ध न हो। सैन्य आवश्यकता का अर्थ यह नहीं है कि युद्ध जीतने के लिए कोई भी साधन अपनाया जा सकता है।
(E) अनावश्यक पीड़ा का निषेध (Prohibition of Unnecessary Suffering) ऐसे युद्ध साधनों या तरीकों का प्रयोग निषिद्ध है जो सैनिकों को सैन्य उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक सीमा से अधिक या अनावश्यक पीड़ा पहुँचाते हैं।
(F) सावधानी का सिद्धांत (Principle of Precaution) - हमला करने वाले पक्ष को नागरिकों और नागरिक वस्तुओं को होने वाली क्षति कम करने के लिए व्यावहारिक सावधानियाँ अपनानी चाहिए, जैसे लक्ष्य की सही पहचान, जहाँ संभव हो पूर्व चेतावनी तथा कम नागरिक क्षति वाला विकल्प अपनाना।
(G) मानवीय एवं गैर-भेदभावपूर्ण व्यवहार - जो व्यक्ति शत्रु के नियंत्रण में आ गया है या युद्ध में भाग लेने की स्थिति में नहीं है, उसके साथ मानवीय व्यवहार किया जाना चाहिए। जाति, धर्म, राष्ट्रीयता, लिंग आदि के आधार पर अनुचित भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।
जिनेवा अभिसमय, 1949 (Geneva Conventions) 1949 के चार जिनेवा अभिसमय आधुनिक IHL की आधारशिला हैं।
प्रथम जिनेवा अभिसमय, 1949यह स्थल पर सशस्त्र बलों के घायल और बीमार सदस्यों की सुरक्षा से संबंधित है। इसमें घायल सैनिकों के सम्मान, चिकित्सा सहायता, चिकित्सा कर्मियों और चिकित्सा इकाइयों की सुरक्षा का प्रावधान है।
द्वितीय जिनेवा अभिसमय, 1949यह समुद्र में सशस्त्र बलों के घायल, बीमार एवं Shipwrecked सदस्यों की सुरक्षा से संबंधित है।
तृतीय जिनेवा अभिसमय, 1949यह युद्धबंदियों (Prisoners of War/POWs) के साथ व्यवहार से संबंधित है। युद्धबंदियों को यातना, अमानवीय व्यवहार और अपमान से सुरक्षा दी जाती है तथा भोजन, चिकित्सा, आवास, धार्मिक आस्था और परिवार से संपर्क जैसी सुविधाओं की व्यवस्था की जाती है।
चतुर्थ जिनेवा अभिसमय, 1949यह युद्ध के समय नागरिक व्यक्तियों की सुरक्षा से संबंधित है, विशेषकर कब्जे वाले क्षेत्रों के नागरिकों की।
Geneva Conventions में Common Article 3 - चारों Geneva Conventions में Common Article 3 अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह गैर-अंतरराष्ट्रीय सशस्त्र संघर्षों में न्यूनतम मानवीय मानक स्थापित करता है। इसके अंतर्गत हत्या, अंग-भंग, यातना, क्रूर व्यवहार, बंधक बनाना तथा व्यक्तिगत गरिमा का अपमान जैसे कृत्य निषिद्ध हैं। इसे IHL के minimum humanitarian standards का आधार माना जाता है।
अतिरिक्त प्रोटोकॉल (Additional Protocols) - 
Additional Protocol I, 1977 - यह International Armed Conflicts से संबंधित है। इसमें नागरिकों की सुरक्षा, civilian objects की रक्षा, distinction, proportionality और precautions जैसे सिद्धांतों को मजबूत किया गया।
Additional Protocol II, 1977यह Non-International Armed Conflicts से संबंधित है और Common Article 3 से आगे अतिरिक्त मानवीय संरक्षण प्रदान करता है।
Additional Protocol III, 2005 - इसने Red Crystal (लाल क्रिस्टल) को एक अतिरिक्त सुरक्षात्मक प्रतीक के रूप में मान्यता दी।
6. Combatants एवं Civilians में अंतर - 
• Combatants वे व्यक्ति होते हैं जो अंतरराष्ट्रीय सशस्त्र संघर्ष में किसी पक्ष के सशस्त्र बलों का हिस्सा होते हैं और युद्ध में भाग लेने के लिए अधिकृत होते हैं। यदि वे शत्रु के हाथ पड़ते हैं और लागू नियमों के अनुसार पात्र हैं, तो उन्हें POW status प्राप्त हो सकता है।
• Civilians / Non-Combatantsजो व्यक्ति सशस्त्र बलों का सदस्य नहीं है और प्रत्यक्ष रूप से शत्रुता में भाग नहीं ले रहा है, वह सामान्यतः civilian है। नागरिकों को प्रत्यक्ष हमले से संरक्षण प्राप्त है। यदि कोई civilian directly participates in hostilities करता है, तो लागू IHL के अनुसार उस अवधि में उसकी सुरक्षा की स्थिति प्रभावित होती है।
आधार - Combatant - Civilian
भूमिका - युद्ध में भाग लेने वाला - युद्ध में भाग न लेने वाला
सैन्य स्थिति - सशस्त्र बलों का सदस्य होता है - सशस्त्र बलों का सदस्य नहीं
सैन्य लक्ष्य - target होता है - target नहीं
POW पात्र - हो सकता है - POW नहीं
IHL पालन - अनिवार्य - अनिवार्य
नागरिकों की सुरक्षाIHL नागरिक आबादी को युद्ध की मार से बचाने पर विशेष बल देता है। नागरिकों के विरुद्ध जानबूझकर हमला, आतंक फैलाने के उद्देश्य से हिंसा, बंधक बनाना, यातना, सामूहिक दंड तथा कुछ परिस्थितियों में अवैध निर्वासन या स्थानांतरण निषिद्ध हैं। Civilian Objects जैसे सामान्य घर, विद्यालय, अस्पताल और धार्मिक स्थल भी संरक्षण प्राप्त करते हैं। लेकिन यदि कोई civilian object सैन्य उद्देश्य के लिए प्रयुक्त होने लगे तो लागू IHL के अनुसार उसका कानूनी status बदल सकता है।
अस्पताल एवं चिकित्सा कर्मियों की सुरक्षा - अस्पताल, medical units तथा medical personnel को IHL के अंतर्गत विशेष संरक्षण प्राप्त है। चिकित्सा कर्मियों का कार्य घायल और बीमार व्यक्तियों का उपचार करना है, चाहे वे किसी भी पक्ष से संबंधित हों। उन्हें केवल उनके चिकित्सकीय कार्य के कारण निशाना नहीं बनाया जा सकता।
युद्धबंदी (Prisoners of War) - युद्धबंदी वह व्यक्ति है जो लागू अंतरराष्ट्रीय सशस्त्र संघर्ष में शत्रु के हाथ में आ गया है और Geneva Convention III के अनुसार POW status का पात्र है।
युद्धबंदियों के प्रमुख अधिकार - 
• मानवीय व्यवहार।
• यातना और क्रूर व्यवहार से सुरक्षा।
• पर्याप्त भोजन एवं चिकित्सा।
• उचित आवास।
• धार्मिक आस्था का पालन।
• परिवार से संपर्क।
• व्यक्तिगत गरिमा का सम्मान। 
POW को दंडित करने के लिए नहीं बल्कि उसकी आगे की सैन्य भागीदारी को रोकने के उद्देश्य से हिरासत में रखा जाता है। उससे जानकारी प्राप्त करने के लिए यातना या coercion का प्रयोग नहीं किया जा सकता।
युद्ध अपराध (War Crimes)युद्ध अपराध वे गंभीर उल्लंघन हैं जो लागू IHL के अंतर्गत व्यक्तिगत आपराधिक उत्तरदायित्व उत्पन्न करते हैं। 
उदाहरण
1. जानबूझकर civilians की हत्या।
2. संरक्षित व्यक्तियों की हत्या।
3. यातना और अमानवीय व्यवहार।
4. POWs के साथ गंभीर दुर्व्यवहार।
5. बंधक बनाना।
6. अवैध deportation या transfer।
7. नागरिक आबादी को जानबूझकर target करना।
8. कुछ परिस्थितियों में rape एवं अन्य गंभीर sexual violence।
9. कुछ परिस्थितियों में बच्चों की अवैध भर्ती या युद्ध में उपयोग।
10. संरक्षित सांस्कृतिक या धार्मिक संपत्ति पर गंभीर अवैध हमला। महत्वपूर्ण: प्रत्येक युद्धकालीन मृत्यु या प्रत्येक IHL violation स्वतः war crime नहीं होता। War crime के लिए संबंधित कानून के आवश्यक तत्वों का पूरा होना आवश्यक है।
State Responsibility एवं Individual Criminal Responsibility - 
State Responsibility - किसी राज्य द्वारा अंतरराष्ट्रीय विधि-विरुद्ध कृत्य किए जाने पर राज्य का अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व उत्पन्न हो सकता है। Individual Criminal Responsibility - किसी व्यक्ति द्वारा war crime किए जाने पर उस व्यक्ति का व्यक्तिगत आपराधिक उत्तरदायित्व उत्पन्न होता है। अतः: State Responsibility ≠ Individual Criminal Responsibility एक ही घटना से दोनों प्रकार का उत्तरदायित्व उत्पन्न हो सकता है।
युद्ध अपराधों के उत्तरदायित्व निर्धारण के तंत्र - 
(A) National Courts - राज्य अपने घरेलू कानून के अंतर्गत युद्ध अपराधों की जांच और अभियोजन कर सकते हैं।
(B) Universal Jurisdictionकुछ गंभीर अंतरराष्ट्रीय अपराधों के संबंध में कुछ राज्यों के घरेलू न्यायालय अपराध के स्थान या आरोपी की राष्ट्रीयता से परे भी, अपने कानून के अनुसार, अभियोजन कर सकते हैं।
(C) International Criminal Court (ICC) - International Criminal Court Rome Statute के आधार पर स्थापित स्थायी अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय है। इसके अपराधाधिकार में - 
1. Genocide
2. Crimes against Humanity
3. War Crimes
4. Crime of Aggression शामिल हैं। ICC व्यक्तियों का prosecution करता है, राज्यों का नहीं।
Complementarity PrincipleICC अंतर्राष्ट्रीय न्यायालयों का स्थान लेने वाला प्रथम न्यायालय नहीं है। यदि कोई राज्य वास्तविक रूप से मामले की जांच और अभियोजन कर रहा है, तो Rome Statute की complementarity व्यवस्था के अनुसार ICC की भूमिका सीमित हो सकती है।
ICC में मामला पहुँचने के प्रमुख तरीके 
क. Rome Statute के आधार पर - 1. State Party Referral - कोई State Party किसी situation को Prosecutor के समक्ष refer कर सकती है।
2. UN Security Council Referral - United Nations Security Council कुछ परिस्थितियों में situation को ICC Prosecutor को refer कर सकता है।
3. Prosecutor's Initiative - Rome Statute की निर्धारित प्रक्रिया और न्यायिक अनुमति के अधीन Prosecutor investigation शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
ख. Command Responsibility के आधार परयदि किसी military commander या superior को अधीनस्थों द्वारा किए जा रहे अपराधों का ज्ञान था, या परिस्थितियों के अनुसार उसे ज्ञान होना चाहिए था, और उसने अपराध रोकने या दोषियों के विरुद्ध आवश्यक एवं उचित कार्रवाई नहीं की, तो लागू कानून के अंतर्गत command responsibility उत्पन्न होती है। इसका मूल विचार है Command power के साथ command responsibility भी आती है। हालाँकि केवल किसी व्यक्ति का commander होना उसे स्वतः युद्ध अपराध का दोषी नहीं बनाता। संबंधित कानूनी तत्वों का सिद्ध होना आवश्यक है।
ग. Individual Criminal Responsibility के प्रमुख आधार परव्यक्ति को लागू अंतरराष्ट्रीय आपराधिक कानून के अनुसार उत्तरदायी ठहराया जा सकता है, जैसे - 
• अपराध का प्रत्यक्ष साथ
• आदेश देना
• उकसाना
• सहायता या सुविधा प्रदान करना
• अपराध में अन्य रूप से योगदान
युद्ध अपराधों की जांच एवं अभियोजन - उत्तरदायित्व निर्धारण = घटना → तथ्य-संग्रह → साक्ष्य → आरोपी की पहचान → कानूनी वर्गीकरण → जांच → अभियोजन → न्यायिक परीक्षण → निर्णय → दंड साक्ष्य में प्रत्यक्षदर्शी, दस्तावेज, सैन्य रिकॉर्ड (photographs/ videos, satellite evidence, forensic evidence, digital communications तथा medical records) के आधार पर।
IHL और International Human Rights Law में अंतर - 
आधार - IHL Human Rights Law
मुख्य क्षेत्र - सशस्त्र संघर्ष - हर समय 
उद्देश्य - युद्ध की पीड़ा सीमित करना - मानवाधिकारों की रक्षा
प्रमुख विषय - Civilians, Combatants, POWs - जीवन, स्वतंत्रता, समानता आदि
प्रमुख स्रोत - Geneva Conventions आदि - मानवाधिकार संधियाँ आदि
लागू क्षेत्र - Armed Conflict - Peace एवं Conflict दोनों
IHL और Human Rights Law - एक दूसरे के विरोधी नहीं हैं। अनेक परिस्थितियों में दोनों एक साथ लागू होते हैं।  
सार - IHL के पाँच प्रमुख सिद्धांत (HDPMP)
• Humanity
• Distinction
• Proportionality
• Military Necessity
• Precaution 
चार Geneva Conventions
I → Land पर घायल एवं बीमार
II → Sea पर घायल, बीमार एवं Shipwrecked
III → Prisoners of War
IV → Civilians याद रखने की सरल ट्रिक: एक घायल, दो समुद्र, तीन बंदी, चार नागरिक।
निष्कर्षअंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि युद्ध को कानून से बाहर की स्थिति नहीं मानती। इसका मूल उद्देश्य है कि युद्ध की आवश्यकता भी मानवता की सीमाओं के भीतर रहे। Geneva Conventions और Additional Protocols ने घायल एवं बीमार सैनिकों, shipwrecked व्यक्तियों, युद्धबंदियों, नागरिकों तथा चिकित्सा कर्मियों को व्यापक संरक्षण प्रदान किया है। वहीं Humanity, Distinction, Proportionality, Military Necessity और Precaution युद्ध के साधनों एवं तरीकों पर नियंत्रण रखते हैं। गंभीर उल्लंघनों की स्थिति में राष्ट्रीय न्यायालय, Universal Jurisdiction और ICC जैसे तंत्र व्यक्तिगत आपराधिक उत्तरदायित्व निर्धारित कर सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार एवं मानवीय विधि परिचय, विकास, सार्वभौम घोषणा (UDHR), नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा (ICCPR), आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा (ICESCR), क्षेत्रीय यूरोपीय, अंतर-अमेरिकी और अफ्रीकी मानवाधिकार प्रणालियाँ 
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विधि (International Human Rights Law) - अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विधि उन अंतरराष्ट्रीय नियमों और सिद्धांतों का समूह है जो प्रत्येक मनुष्य के जीवन, स्वतंत्रता, समानता, गरिमा और विकास से संबंधित अधिकारों की रक्षा करते हैं। इसका मूल विचार है मनुष्य होने मात्र से व्यक्ति कुछ मूलभूत अधिकारों का अधिकारी है। मानवाधिकार राज्य और व्यक्ति के संबंध में राज्य की जिम्मेदारियाँ निर्धारित करते हैं।
प्रमुख विशेषताएँ - 
1. सार्वभौमिकता: मानवाधिकार सभी मनुष्यों के लिए हैं।
2. अविभाज्यता: नागरिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार परस्पर जुड़े हैं।
3. समानता एवं गैर-भेदभाव।
4. मानव गरिमा की रक्षा।
5. राज्य का दायित्व: राज्य को अधिकारों का सम्मान, संरक्षण और क्रियान्वयन करना होता है।
6. अंतरराष्ट्रीय निगरानी: संधियों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के माध्यम से अनुपालन की समीक्षा की जाती है।
अंतरराष्ट्रीय मानवीय विधि (International Humanitarian Law) - इसे IHL या Law of Armed Conflict (LOAC) कहा जाता है। यह युद्ध या सशस्त्र संघर्ष के दौरान लागू होने वाले नियमों का समूह है। इसका उद्देश्य युद्ध को समाप्त करना नहीं बल्कि युद्ध के मानवीय प्रभावों को सीमित करना है।
यह दो प्रकार से संबंधित है - 
(क) युद्ध में कौन-कौन से तरीके और साधन प्रतिबंधित हैं?
(ख) युद्ध से प्रभावित किन व्यक्तियों की रक्षा करनी है?
मुख्य सिद्धांत - 
1. Distinction - नागरिकों और combatants के बीच अंतर।
2. Proportionality - सैन्य लाभ की तुलना में अत्यधिक नागरिक क्षति नहीं होनी चाहिए।
3. सैन्य कार्यवाही की आवश्यकता (Military Necessity)
4. मानवता (Humanity)
5. बचाव (Precaution)
6. उपचार (Remedy) - घायल और बीमार व्यक्तियों की सुरक्षा।
7. सुरक्षा - युद्धबंदियों तथा नागरिकों की सुरक्षा।
प्रमुख स्रोत - 
हेग कन्वेंशन (Hague Law)
जेनेवा कन्वेंशन (Geneva Conventions, 1949)
अतिरिक्त बचाव कन्वेंशन (Additional Protocols, 1977)
उपलब्ध अंतर्राष्ट्रीय विधि (Customary International Humanitarian Law)
IHRL और IHL में संबंध - 
आधार - मानवाधिकार विधि - मानवीय विधि
मुख्य उद्देश्य - मानवाधिकारों की रक्षा - सशस्त्र संघर्ष के मानवीय प्रभावों को सीमित करना
मुख्य क्षेत्र - शांति और संघर्ष दोनों - armed conflict
प्रमुख विषय - जीवन, स्वतंत्रता, समानता आदि - नागरिक, घायल, युद्धबंदी आदि
प्रमुख दस्तावेज - UDHR, ICCPR, ICESCR - Geneva Conventions
लागू होने का आधार - राज्य की मानवाधिकार जिम्मेदारी - सशस्त्र संघर्ष
उद्देश्य मानव गरिमा युद्ध में मानवता
महत्वपूर्ण - दोनों विधियाँ अलग-अलग होते हुए भी मानव गरिमा और जीवन की रक्षा के साझा उद्देश्य से जुड़ी हैं।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों का विकास मानवाधिकारों की आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का विकास द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद तेजी से हुआ।
प्रमुख पड़ाव - 
संयुक्त राष्ट्र चार्टर 1945 - मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रताओं के सम्मान को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का उद्देश्य बनाया गया।
सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा पत्र (UDHR) 1948मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा अपनाई गई।
ICCPR और ICESCR 1966दो प्रमुख मानवाधिकार प्रसंविदाएँ अपनाई गईं।जो 1976 में लागू हुईं जिसके बाद - 
• महिलाओं के अधिकार
• बाल अधिकार
• नस्लीय भेदभाव का उन्मूलन
• यातना का निषेध
• विकलांग व्यक्तियों के अधिकार आदि के लिए अनेक संधियाँ बनीं।
इस प्रकार आधुनिक मानवाधिकार व्यवस्था एक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संरक्षण तंत्र में विकसित हुई।
सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा Universal Declaration of Human Rights (UDHR) 1948 - को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 10 दिसंबर 1948 को अपनाया जिसमें 30 अनुच्छेद हैं। इसे आधुनिक अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार व्यवस्था की आधारशिला माना जाता है।
महत्वपूर्ण बात - UDHR स्वयं एक Declaration है, पारंपरिक अर्थ में treaty नहीं। इसलिए यह ICCPR जैसी संधि नहीं है। लेकिन इसने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के विकास पर अत्यंत गहरा प्रभाव डाला और इसके अनेक सिद्धांत आज व्यापक रूप से मान्य मानवाधिकार मानकों का हिस्सा हैं।
UDHR के प्रमुख अधिकार - 
A. अनुच्छेद 1 समानता और गरिमासभी मनुष्य स्वतंत्र और समान गरिमा एवं अधिकारों के साथ जन्म लेते हैं।
B. अनुच्छेद 2भेदभाव का निषेध।
C. अनुच्छेद 3 जीवन और स्वतंत्रता
• जीवन का अधिकार
• स्वतंत्रता का अधिकार
• व्यक्तिगत सुरक्षा का अधिकार
D. अनुच्छेद 4 - दासता का निषेध 
E. अनुच्छेद 5 - यातना और क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार/दण्ड का निषेध।
F. अनुच्छेद 6 - विधिक अधिकार, कानून के समक्ष व्यक्ति के रूप में मान्यता।
G. अनुच्छेद 7 - कानून के समक्ष समानता।
H.अनुच्छेद 8 - प्रभावी न्यायिक उपचार।
I. अनुच्छेद 9 - मनमानी गिरफ्तारी, निरोध या निर्वासन का निषेध।
J. अनुच्छेद 10 - निष्पक्ष और सार्वजनिक सुनवाई।
K. अनुच्छेद 11 - अपराध सिद्ध होने तक निर्दोषता की धारणा।
L. अनुच्छेद 12 नागरिक स्वतंत्रताएँ
- निजता, परिवार, घर और पत्राचार में मनमाना हस्तक्षेप नहीं।
M. अनुच्छेद 13 - आवागमन और निवास की स्वतंत्रता।
N. अनुच्छेद 14 - उत्पीड़न से बचने के लिए शरण मांगने का अधिकार।
O. अनुच्छेद 16 - राष्ट्रीयता का अधिकार।
P. अनुच्छेद 16 - विवाह और परिवार का अधिकार।
Q. अनुच्छेद 17 - संपत्ति का अधिकार।
R. अनुच्छेद 18 - राजनीतिक अधिकार,  विचार, अंतरात्मा और धर्म की स्वतंत्रता।
S. अनुच्छेद 19 - विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
T. अनुच्छेद 20 - शांतिपूर्ण सभा और संगठन की स्वतंत्रता।
U. अनुच्छेद 21 - शासन में भाग लेने और स्वतंत्र चुनाव का अधिकार।
V. अनुच्छेद 22 - आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकार
W. अनुच्छेद 23 - सामाजिक सुरक्षा, काम, समान कार्य के लिए समान वेतन और उचित कार्य दशाएँ।
X. अनुच्छेद 24 - विश्राम और अवकाश।
Y. अनुच्छेद 25 - पर्याप्त जीवन-स्तर।
Z. अनुच्छेद 26 - शिक्षा।
Ab. अनुच्छेद 27 - सांस्कृतिक जीवन में भागीदारी।
International Covenant on Civil and Political Rights (ICCPR), 1966 - इसे 16 दिसंबर 1966 को अपनाया गया और 23 मार्च 1976 को लागू हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य व्यक्ति के नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों की अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा करना है।
प्रमुख अधिकार - 
अनुच्छेद 6 - जीवन का अधिकार - प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की रक्षा की जानी चाहिए।
अनुच्छेद 7 - यातना का निषेध - किसी व्यक्ति को यातना या क्रूर, अमानवीय अथवा अपमानजनक व्यवहार/दण्ड नहीं दिया जाएगा।
अनुच्छेद 8 - दासता एवं बलात् श्रम दासता और दास-व्यापार का निषेध तथा forced labour पर प्रतिबंध।
अनुच्छेद 9 - व्यक्तिगत स्वतंत्रता - मनमानी गिरफ्तारी और निरोध का निषेध।
अनुच्छेद 10निरुद्ध व्यक्तियों के साथ मानवीय व्यवहार।
अनुच्छेद 14 - Fair Trial और न्यायिक प्रक्रिया की गारंटी।
अनुच्छेद 17 - निजता, परिवार, घर और पत्राचार की सुरक्षा।
अनुच्छेद 18 - विचार, अंतरात्मा और धर्म की स्वतंत्रता।
अनुच्छेद 19 - अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
अनुच्छेद 21 - शांतिपूर्ण सभा।
अनुच्छेद 22 - संगठन/संघ बनाने की स्वतंत्रता।
अनुच्छेद 25 राजनीतिक भागीदारी - सार्वजनिक मामलों में भाग लेना, मतदान,
चुनाव लड़ना, सार्वजनिक सेवा तक समान पहुंच
अनुच्छेद 26कानून के समक्ष समानता और भेदभाव का निषेध।
अनुच्छेद 27जातीय, धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकार।
ICCPR की विशेषता विचलन (Derogation) अनुच्छेद 4 - ICCPR में कुछ परिस्थितियों में राज्य को कुछ अधिकारों से अस्थायी रूप से विचलन (derogation) की अनुमति मिलती है।
सार्वजनिक आपातस्थिति में, जो राष्ट्र के जीवन के लिए खतरा हो, निर्धारित शर्तों के अधीन कुछ दायित्वों से विचलन किया जा सकता है। लेकिन कुछ मूल अधिकारों को derogation से बाहर रखा गया है।
नोटEmergency does not mean unlimited suspension of human rights.
ICCPR के Optional Protocols - ICCPR के साथ Optional Protocols ने मानवाधिकार संरक्षण को और मजबूत किया। 
1. सुनवाई का अधिकार - Optional Protocol के अंतर्गत निर्धारित शर्तों के अनुसार व्यक्ति Human Rights Committee के समक्ष communication प्रस्तुत कर सकता है, यदि संबंधित राज्य ने उस protocol को स्वीकार किया हो।
2. मृत्युदंड का उन्मूलन - Optional Protocol का उद्देश्य death penalty के उन्मूलन की दिशा में है।
International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights (ICESCR), 1966 - इसे भी 16 दिसंबर 1966 को अपनाया गया और 3 जनवरी 1976 को लागू हुआ। इसका उद्देश्य आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा करना है।
प्रमुख अधिकार - 
अनुच्छेद 6काम करने का अधिकार।
अनुच्छेद 7न्यायसंगत एवं अनुकूल कार्य परिस्थितियाँ:
• उचित मजदूरी
• समान कार्य के लिए समान वेतन
• सुरक्षित एवं स्वस्थ कार्य परिस्थितियाँ
• विश्राम एवं अवकाश
अनुच्छेद 8 - ट्रेड यूनियन बनाने और उसमें शामिल होने का अधिकार तथा हड़ताल का अधिकार, कानून के अनुसार।
अनुच्छेद 9 सामाजिक सुरक्षा का अधिकार।
अनुच्छेद 10परिवार, मातृत्व और बच्चों की सुरक्षा।
अनुच्छेद 11पर्याप्त जीवन-स्तर 
• पर्याप्त भोजन
• वस्त्र
• आवास
• जीवन-स्थितियों में निरंतर सुधार
अनुच्छेद 12 - शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के उच्चतम उपलब्ध स्तर का अधिकार।
अनुच्छेद 13 शिक्षा का अधिकार।
अनुच्छेद 15 संस्कृति में भागीदारी तथा वैज्ञानिक प्रगति के लाभों का आनंद।
ICESCR और Progressive Realization - ICCPR और ICESCR का एक महत्वपूर्ण अंतर यह है कि ICESCR के अधिकारों को लागू करने में संसाधन और आर्थिक क्षमता की भूमिका होती है। अनुच्छेद 2(1) के अनुसार राज्य अपने उपलब्ध संसाधनों की अधिकतम सीमा तक अधिकारों की progressive realization के लिए कदम उठाते हैं।अर्थात राज्य से यह अपेक्षा है कि वह इन अधिकारों की प्राप्ति की दिशा में लगातार और प्रभावी प्रगति करे। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि राज्य कुछ भी न करे।
ICCPR और ICESCR में अंतर - 
आधार - ICCPR - ICESCR
अधिकार - नागरिक एवं राजनीतिक - आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक
उदाहरण - जीवन, स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति - काम, स्वास्थ्य, शिक्षा
मुख्य दृष्टिकोण - व्यक्तिगत स्वतंत्रता - सामाजिक-आर्थिक कल्याण
निगरानी - Human Rights Committee - Committee on Economic, Social and Cultural Rights
Progressive realization - प्रमुख विशेषता नहीं महत्वपूर्ण सिद्धांत - 
राज्य की भूमिका अधिकारों में हस्तक्षेप से बचना और संरक्षण संसाधनों के माध्यम से क्रमिक क्रियान्वयन।
दोनों में संबंधआज मानवाधिकारों को indivisible and interdependent माना जाता है।
उदाहरणशिक्षा का अधिकार → राजनीतिक भागीदारी की क्षमता → अभिव्यक्ति एवं समानता का प्रभावी उपयोग। इसलिए दोनों Covenants एक-दूसरे से जुड़े हैं।
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार प्रणाली - मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई संस्थाएँ हैं - 
संयुक्त राष्ट्र स्तर
• UN Human Rights Council
• Office of the High 
• Commissioner for Human Rights
• Treaty Bodies
• Special Rapporteurs
• Universal Periodic Review
इनका उद्देश्य मानवाधिकारों की स्थिति की निगरानी और राज्यों की जवाबदेही को बढ़ाना है।
क्षेत्रीय मानवाधिकार प्रणालियाँविश्व स्तर की व्यवस्था के अतिरिक्त तीन प्रमुख क्षेत्रीय मानवाधिकार प्रणालियाँ विकसित हुई हैं
यूरोप - European System
अमेरिका - Inter-American System
अफ्रीका - African System
इनका लाभ यह है कि क्षेत्रीय स्तर पर मानवाधिकारों के लिए अधिक विशिष्ट न्यायिक/अर्ध-न्यायिक तंत्र विकसित हुआ है।
यूरोपीय मानवाधिकार प्रणाली - 
मुख्य दस्तावेजEuropean Convention on Human Rights, 1950
मुख्य संस्था - European Court of Human Rights (ECtHR) यह व्यवस्था Council of Europe के ढाँचे में विकसित हुई।
प्रमुख अधिकार - 
• जीवन
• यातना से मुक्ति
• स्वतंत्रता और सुरक्षा
• निष्पक्ष सुनवाई
• निजता
• धर्म
• अभिव्यक्ति
• सभा एवं संगठन
• प्रभावी उपचार
विशेषता - European system की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है कि व्यक्ति निर्धारित शर्तों के अधीन European Court of Human Rights तक पहुँच सकता है। इस कारण यह क्षेत्रीय मानवाधिकार न्याय-व्यवस्था का अत्यंत विकसित उदाहरण है।
अंतर-अमेरिकी मानवाधिकार प्रणाली - Organization of American States (OAS) के अंतर्गत विकसित हुई।
मुख्य दस्तावेज - American Declaration of the Rights and Duties of Man, 1948
बाद में - American Convention on Human Rights, 1969
मुख्य संस्थाएँ - 
1. Inter-American Commission on Human Rights - मानवाधिकार उल्लंघनों की शिकायतों की जांच और निगरानी करती है।
2. Inter-American Court of Human Rights - Convention के अधीन आने वाले राज्यों के संबंध में मानवाधिकार मामलों पर न्यायिक भूमिका निभाती है।
प्रमुख अधिकार - 
• जीवन
• व्यक्तिगत स्वतंत्रता
• निष्पक्ष न्याय
• अभिव्यक्ति
• धर्म
• राजनीतिक अधिकार
• आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार
अफ्रीकी मानवाधिकार प्रणाली - 
मुख्य दस्तावेज - African Charter on Human and Peoples' Rights, 1981 इसे Banjul Charter भी कहा जाता है। इस प्रणाली की एक विशेषता है कि इसमें केवल individual rights ही नहीं बल्कि peoples' rights भी महत्वपूर्ण हैं।
प्रमुख अधिकार - 
• जीवन
• स्वतंत्रता
• समानता
• गरिमा
• धर्म
• अभिव्यक्ति
• संगठन
• स्वास्थ्य
• शिक्षा
• विकास
• पर्यावरण आदि
विशेष अधिकार - Peoples' Rights
अफ्रीकी चार्टर में समुदाय/जनसमुदाय के अधिकारों को भी मान्यता दी गई है।
उदाहरण
• आत्मनिर्णय
• विकास का अधिकार
• प्राकृतिक संसाधनों से संबंधित अधिकार
संस्थाएँ
• African Commission on Human and Peoples' Rights
• African Court on Human and Peoples' Rights
तीन क्षेत्रीय प्रणालियों की तुलना - 
आधार - यूरोप - अमेरिका - अफ्रीका
प्रमुख संधि European Convention American Convention African Charter
मुख्य संस्था European Court Inter-American Court + Commission African Court + Commission
क्षेत्र Europe Americas Africa
विशेषता मजबूत न्यायिक संरक्षण Commission + Court प्रणाली Individual + Peoples' Rights
महत्वपूर्ण अधिकार Civil/political rights Civil/political + socio-economic development Human + Peoples' Rights
मानवाधिकार (IHRL) और मानवीय विधि (IHL) में अंतर  - 
• Human Rights Law पूछता है कि राज्य व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करे?
• Humanitarian Law पूछता है कि सशस्त्र संघर्ष होने पर युद्ध में मानवता की रक्षा कैसे की जाए?
उदाहरणशांति के समय पुलिस द्वारा किसी व्यक्ति को मनमाने ढंग से गिरफ्तार करना = मानवाधिकार उल्लंघन 
उदाहरण - युद्ध के दौरान घायल सैनिक के साथ अमानवीय व्यवहार - IHL का उल्लंघन।
उदाहरण - युद्ध के दौरान नागरिकों को जानबूझकर निशाना बनाना - IHL का गंभीर उल्लंघन।
निष्कर्षअंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विधि का विकास इस विचार पर आधारित है कि मानव गरिमा केवल राज्य के घरेलू कानून का विषय नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता भी है। UDHR ने मानवाधिकारों की सार्वभौमिक आधारभूमि तैयार की, जबकि ICCPR ने नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों और ICESCR ने आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकारों को संधि-आधारित ढाँचा प्रदान किया। इसके साथ यूरोपीय, अंतर-अमेरिकी और अफ्रीकी क्षेत्रीय प्रणालियों ने मानवाधिकारों के संरक्षण को क्षेत्रीय न्यायिक और निगरानी तंत्र प्रदान किया।
विशेष
UN Charter 1945 - प्रारंभिक मानवाधिकार 
UDHR 1948 - अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा
ICCPR 1966 - स्वतंत्रता और राजनीतिक अधिकारों की मजबूती
ICESCR 1966 - सामाजिक-आर्थिक न्याय को आधार 
क्षेत्रीय प्रणालियां - अधिकारों के संरक्षण हेतु न्यायिक/निगरानी तंत्र।

मानवाधिकार संधियाँ एवं प्रवर्तन तंत्र - महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर अभिसमय (CEDAW), बाल अधिकारों पर अभिसमय (CRC), सभी प्रकार के नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन पर अंतरराष्ट्रीय अभिसमय (ICERD), संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद एवं विशेष प्रक्रियाएँ, मानवाधिकारों के प्रवर्तन में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) की भूमिका -

भाई, इसे अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार विधि के परीक्षा-उपयोगी ढाँचे में समझते हैं। यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संधियाँ अधिकार निर्धारित करती हैं, जबकि प्रवर्तन तंत्र उन अधिकारों के पालन की निगरानी, शिकायत, जांच और दबाव का माध्यम बनते हैं।

मानवाधिकार संधियाँ एवं प्रवर्तन तंत्र

1. मानवाधिकार संधियों का अर्थ

मानवाधिकार संधि (Human Rights Treaty) वह अंतरराष्ट्रीय समझौता है जिसमें राज्य व्यक्तियों के मूल मानवाधिकारों को स्वीकार करने, उनका सम्मान करने, संरक्षण देने और उन्हें प्रभावी बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय दायित्व स्वीकार करते हैं।

प्रमुख उद्देश्य

1. व्यक्ति के अधिकारों की अंतरराष्ट्रीय मान्यता।


2. भेदभाव एवं उत्पीड़न की रोकथाम।


3. राज्य के दायित्व निर्धारित करना।


4. मानवाधिकार उल्लंघनों की अंतरराष्ट्रीय निगरानी।


5. पीड़ितों को शिकायत और उपचार के साधन उपलब्ध कराना।


6. राज्यों को अपनी घरेलू नीतियों और कानूनों में सुधार के लिए बाध्य करना।



प्रमुख संधियाँ

इस विषय में तीन अत्यंत महत्वपूर्ण संधियाँ हैं:

CEDAW → महिलाओं के विरुद्ध भेदभाव

CRC → बाल अधिकार

ICERD → नस्लीय भेदभाव



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2. CEDAW

Convention on the Elimination of All Forms of Discrimination against Women

CEDAW = महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन पर अभिसमय

इसे संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 18 दिसंबर 1979 को अपनाया और यह 3 सितंबर 1981 को लागू हुआ।

इसे अक्सर “महिलाओं का अंतरराष्ट्रीय अधिकार-पत्र” (International Bill of Rights for Women) कहा जाता है।

2.1 CEDAW का मुख्य उद्देश्य

CEDAW का मूल उद्देश्य महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव को समाप्त करना और पुरुषों तथा महिलाओं के बीच वास्तविक समानता स्थापित करना है।

भेदभाव की अवधारणा

CEDAW के अनुसार महिलाओं के विरुद्ध भेदभाव का अर्थ broadly ऐसे किसी भी भेद, बहिष्कार या प्रतिबंध से है जिसका उद्देश्य या प्रभाव महिलाओं के मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रताओं की समान मान्यता, उपभोग या प्रयोग को बाधित करना हो।

इसमें राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, नागरिक और अन्य क्षेत्रों में भेदभाव शामिल है।


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2.2 CEDAW के प्रमुख प्रावधान

(A) समानता का सिद्धांत

राज्यों को महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता सुनिश्चित करनी होती है।

(B) भेदभावपूर्ण कानूनों का उन्मूलन

राज्यों का दायित्व है कि:

भेदभावपूर्ण कानूनों को समाप्त करें;

नए भेदभावपूर्ण कानून न बनाएं;

महिलाओं के अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा करें।


(C) राजनीतिक एवं सार्वजनिक जीवन

महिलाओं को:

मतदान का अधिकार,

चुनाव लड़ने का अधिकार,

सार्वजनिक पद धारण करने का अधिकार,

राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार


समान रूप से प्राप्त होना चाहिए।

(D) राष्ट्रीयता

महिलाओं को पुरुषों के समान:

राष्ट्रीयता प्राप्त करने,

बदलने,

बनाए रखने


के अधिकार मिलने चाहिए।

(E) शिक्षा

महिलाओं को पुरुषों के समान शिक्षा के अवसर प्राप्त होने चाहिए।

(F) रोजगार

महिलाओं को:

समान रोजगार अवसर,

समान पारिश्रमिक,

व्यावसायिक प्रशिक्षण,

पदोन्नति,

सामाजिक सुरक्षा


का अधिकार होना चाहिए।

(G) स्वास्थ्य

महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुंच मिलनी चाहिए।

(H) ग्रामीण महिलाओं के अधिकार

CEDAW ग्रामीण महिलाओं की विशेष समस्याओं को भी मान्यता देता है और कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार तथा सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी पर बल देता है।

(I) विवाह एवं परिवार

महिलाओं को विवाह और परिवार के मामलों में पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त होने चाहिए।


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2.3 CEDAW की विशेषता: वास्तविक समानता

CEDAW केवल यह नहीं कहता कि कानून की नजर में पुरुष और महिला समान हों।

यह substantive equality अर्थात वास्तविक/परिणामपरक समानता पर भी बल देता है।

इसलिए आवश्यकता पड़ने पर राज्य महिलाओं की वास्तविक स्थिति सुधारने के लिए विशेष अस्थायी उपाय (temporary special measures) अपना सकते हैं।

उदाहरण:

महिलाओं के लिए आरक्षण,

विशेष शिक्षा कार्यक्रम,

राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के उपाय।



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2.4 CEDAW का प्रवर्तन तंत्र

CEDAW के पालन की निगरानी CEDAW Committee करती है।

समिति के प्रमुख कार्य

1. राज्यों की आवधिक रिपोर्टों की जांच।


2. राज्य से प्रश्न पूछना।


3. सुझाव/सिफारिशें देना।


4. General Recommendations जारी करना।


5. Optional Protocol के अंतर्गत, संबंधित शर्तें पूरी होने पर, व्यक्तिगत शिकायतों और गंभीर/व्यवस्थित उल्लंघनों की जांच करना।



भारत

भारत CEDAW का पक्षकार है। भारत ने CEDAW पर 1993 में हस्ताक्षर/अनुसमर्थन किया था और इसके पालन के संबंध में अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग दायित्व स्वीकार किए हैं।


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3. CRC

Convention on the Rights of the Child

CRC = बाल अधिकारों पर अभिसमय

इसे संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 20 नवंबर 1989 को अपनाया और यह 2 सितंबर 1990 को लागू हुआ।

यह विश्व में बाल अधिकारों की सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संधि है।

3.1 “बालक” की परिभाषा

CRC के अनुसार, सामान्यतः 18 वर्ष से कम आयु का प्रत्येक मानव बालक है, जब तक संबंधित कानून के अनुसार वयस्कता पहले प्राप्त न हो।


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3.2 CRC के चार मूल सिद्धांत

CRC को याद रखने के लिए चार pillars अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:

1. Non-discrimination

किसी बालक के साथ:

लिंग,

जाति,

धर्म,

भाषा,

राष्ट्रीयता,

सामाजिक स्थिति


आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।

2. Best interests of the child

बालक से संबंधित प्रत्येक कार्रवाई में बालक के सर्वोत्तम हित को प्राथमिक consideration मिलना चाहिए।

3. Right to life, survival and development

प्रत्येक बच्चे को:

जीवन,

अस्तित्व,

विकास


का अधिकार है।

4. Respect for child's views

बालक को प्रभावित करने वाले मामलों में उसकी आयु और परिपक्वता के अनुसार उसके विचारों को उचित महत्व दिया जाना चाहिए।

इसे याद रखें:

> D-B-S-V
Discrimination – Best interests – Survival – Views




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3.3 CRC द्वारा मान्यता प्राप्त प्रमुख अधिकार

जीवन एवं विकास

बच्चे के जीवन और समग्र विकास की सुरक्षा।

नाम और राष्ट्रीयता

जन्म के बाद पहचान, नाम और राष्ट्रीयता का अधिकार।

परिवार

जहाँ तक संभव हो, बच्चे को पारिवारिक वातावरण में रहने और पारिवारिक संबंध बनाए रखने की सुरक्षा।

शिक्षा

प्राथमिक शिक्षा को व्यापक रूप से उपलब्ध एवं सुलभ बनाने पर बल।

स्वास्थ्य

उच्चतम प्राप्त योग्य स्वास्थ्य स्तर और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच।

शोषण से सुरक्षा

बच्चों को:

आर्थिक शोषण,

खतरनाक श्रम,

यौन शोषण,

यौन दुर्व्यवहार,

तस्करी,

अन्य प्रकार के शोषण


से सुरक्षा।

बाल न्याय

अपराध के आरोप वाले बच्चों के साथ उनकी आयु और गरिमा के अनुरूप न्यायपूर्ण व्यवहार।


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3.4 CRC का प्रवर्तन

CRC के पालन की निगरानी Committee on the Rights of the Child करती है।

समिति:

राज्य की रिपोर्टों की समीक्षा करती है;

प्रश्न करती है;

concluding observations देती है;

General Comments जारी करती है;

CRC के Optional Protocols के अंतर्गत संबंधित मामलों पर कार्य करती है।


भारत

भारत CRC का पक्षकार है। इसलिए भारत को बाल अधिकारों की स्थिति के संबंध में अंतरराष्ट्रीय निगरानी और रिपोर्टिंग व्यवस्था का सामना करना पड़ता है।


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4. ICERD

International Convention on the Elimination of All Forms of Racial Discrimination

ICERD = सभी प्रकार के नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन पर अंतरराष्ट्रीय अभिसमय

इसे संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 दिसंबर 1965 को अपनाया और यह 4 जनवरी 1969 को लागू हुआ।

इसका मुख्य उद्देश्य नस्लीय भेदभाव के सभी रूपों का उन्मूलन है।


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4.1 नस्लीय भेदभाव का अर्थ

ICERD के अंतर्गत racial discrimination में सामान्यतः नस्ल, रंग, वंश या राष्ट्रीय/जातीय मूल के आधार पर ऐसा भेद, बहिष्कार, प्रतिबंध या प्राथमिकता शामिल है जिसका उद्देश्य या प्रभाव मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रताओं की समान मान्यता या प्रयोग को समाप्त या बाधित करना हो।


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4.2 ICERD के प्रमुख उद्देश्य

1. नस्लीय भेदभाव समाप्त करना।


2. नस्लीय श्रेष्ठता की विचारधारा का विरोध।


3. नस्लीय घृणा और प्रचार को रोकना।


4. समान नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार सुनिश्चित करना।


5. आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में समानता।


6. नस्लीय भेदभाव के पीड़ितों को प्रभावी उपचार उपलब्ध कराना।




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4.3 राज्य के दायित्व

राज्यों को:

नस्लीय भेदभाव की निंदा करनी चाहिए;

सरकारी संस्थाओं द्वारा नस्लीय भेदभाव रोकना चाहिए;

कानूनों में आवश्यक सुधार करना चाहिए;

नस्लीय भेदभाव को बढ़ावा देने वाले संगठनों/प्रचार के विरुद्ध उचित कार्रवाई करनी चाहिए;

न्यायिक और अन्य प्रभावी remedies उपलब्ध करानी चाहिए।


सकारात्मक उपाय

ऐतिहासिक रूप से वंचित नस्लीय समूहों की वास्तविक समानता सुनिश्चित करने के लिए विशेष उपाय किए जा सकते हैं।


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4.4 ICERD Committee

ICERD के पालन की निगरानी Committee on the Elimination of Racial Discrimination (CERD) करती है।

इसके प्रमुख कार्य:

राज्य रिपोर्टों की समीक्षा;

concluding observations;

General Recommendations;

कुछ परिस्थितियों में individual communications;

अंतर-राज्य शिकायतों से संबंधित कार्य।



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5. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद

UN Human Rights Council

United Nations Human Rights Council (UNHRC) संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख अंतर-सरकारी मानवाधिकार संस्था है।

यह 2006 में स्थापित हुई और इसने पूर्व Commission on Human Rights का स्थान लिया।

मुख्यालय

जिनेवा, स्विट्ज़रलैंड।

सदस्य

परिषद में 47 सदस्य राज्य होते हैं, जिनका चुनाव संयुक्त राष्ट्र महासभा करती है।


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5.1 मानवाधिकार परिषद के प्रमुख कार्य

1. मानवाधिकारों का संरक्षण

विश्वभर में मानवाधिकारों की स्थिति पर विचार करना।

2. उल्लंघनों की जांच

गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों पर:

बहस,

जांच,

तथ्य-संग्रह,

रिपोर्ट


की व्यवस्था करना।

3. Universal Periodic Review

यह अत्यंत महत्वपूर्ण तंत्र है।

UPR क्या है?

Universal Periodic Review (UPR) में संयुक्त राष्ट्र के प्रत्येक सदस्य राज्य के मानवाधिकार रिकॉर्ड की समय-समय पर समीक्षा की जाती है।

इसकी विशेषता है:

> हर राज्य की समीक्षा होती है, केवल मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपी राज्यों की नहीं।



UPR में:

1. राज्य अपनी स्थिति प्रस्तुत करता है।


2. अन्य राज्य प्रश्न और recommendations देते हैं।


3. संबंधित राज्य जवाब देता है।


4. आगे की प्रगति की समीक्षा होती है।




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6. विशेष प्रक्रियाएँ

Special Procedures

मानवाधिकार परिषद की Special Procedures मानवाधिकार उल्लंघनों और विशेष मानवाधिकार विषयों की स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय निगरानी का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

इनमें मुख्यतः:

Special Rapporteurs

Independent Experts

Working Groups


शामिल होते हैं।


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6.1 Special Rapporteur कौन होता है?

यह किसी विशेष मानवाधिकार विषय या किसी देश की स्थिति पर स्वतंत्र रूप से काम करने वाला विशेषज्ञ होता है।

उदाहरण:

महिलाओं के विरुद्ध हिंसा;

यातना;

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता;

धार्मिक स्वतंत्रता;

अत्यधिक गरीबी;

मानव तस्करी;

बच्चों की बिक्री और यौन शोषण आदि।



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6.2 Special Procedures के कार्य

(A) Country visits

विशेषज्ञ संबंधित देश की यात्रा कर सकता है और वहां की मानवाधिकार स्थिति का अध्ययन कर सकता है।

(B) Communications

मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों में सरकारों को communications भेजी जा सकती हैं।

(C) Reports

मानवाधिकार परिषद या महासभा को रिपोर्ट प्रस्तुत की जाती है।

(D) Recommendations

सरकारों को मानवाधिकार स्थिति सुधारने की सिफारिशें दी जाती हैं।

(E) Urgent appeals

गंभीर और तत्काल मानवाधिकार खतरे के मामलों में संबंधित सरकार का ध्यान तत्काल आकर्षित किया जा सकता है।


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6.3 Special Procedures की सीमा

इनकी सबसे बड़ी सीमा यह है कि ये सामान्यतः राष्ट्रीय न्यायालय की तरह बाध्यकारी निर्णय देकर दण्ड नहीं दे सकते।

इनकी शक्ति मुख्यतः:

जांच,

तथ्य-संग्रह,

सार्वजनिक रिपोर्ट,

recommendations,

अंतरराष्ट्रीय दबाव


पर आधारित होती है।


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7. मानवाधिकार प्रवर्तन में NGOs की भूमिका

NGO = Non-Governmental Organization

NGOs सरकार से स्वतंत्र संस्थाएं हैं जो मानवाधिकारों की रक्षा, जागरूकता और advocacy में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

उदाहरण के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर Amnesty International, Human Rights Watch आदि संस्थाएं मानवाधिकार संबंधी दस्तावेजीकरण और advocacy करती हैं।


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7.1 NGOs की प्रमुख भूमिकाएँ

1. मानवाधिकार उल्लंघनों का दस्तावेजीकरण

NGOs:

पीड़ितों के बयान लेते हैं;

घटनाओं की जांच करते हैं;

आंकड़े एकत्र करते हैं;

रिपोर्ट तैयार करते हैं।


इससे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को ground-level information मिलती है।


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2. पीड़ितों को कानूनी सहायता

NGOs पीड़ितों को:

कानूनी सलाह,

न्यायालयीन सहायता,

शिकायत प्रक्रिया की जानकारी,

rehabilitation


प्रदान कर सकती हैं।


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3. संयुक्त राष्ट्र तंत्र में भागीदारी

NGOs:

UN bodies को reports भेजती हैं;

shadow reports प्रस्तुत करती हैं;

treaty bodies के सामने alternative information देती हैं;

मानवाधिकार परिषद की बैठकों में advocacy करती हैं।


Shadow Report

जब किसी राज्य की आधिकारिक रिपोर्ट के अतिरिक्त NGO अपनी स्वतंत्र रिपोर्ट प्रस्तुत करता है, तो उसे अक्सर Shadow Report/Alternative Report कहा जाता है।

यह treaty body को राज्य की स्थिति का अधिक व्यापक चित्र देता है।


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7.4 जन-जागरूकता

NGOs:

मानवाधिकार शिक्षा;

seminars;

workshops;

publications;

campaigns;

social media advocacy


के माध्यम से जनता को अधिकारों के बारे में जागरूक करती हैं।


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7.5 सरकार पर दबाव

NGOs:

सार्वजनिक अभियान,

मीडिया,

न्यायिक कार्यवाही,

नीति-निर्माताओं से संवाद,

अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के समक्ष advocacy


के माध्यम से सरकार को कानून और नीतियां सुधारने के लिए प्रेरित करती हैं।


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7.6 मानवाधिकार उल्लंघनों की early warning

NGOs जमीन पर काम करती हैं, इसलिए वे कई बार:

हिंसा,

भेदभाव,

विस्थापन,

तस्करी,

हिरासत में दुर्व्यवहार


जैसे मामलों की जानकारी सरकारी या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से पहले प्राप्त कर लेती हैं।

इससे early warning mechanism के रूप में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।


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8. Treaty Bodies और Human Rights Council में अंतर

आधार Treaty Bodies Human Rights Council

आधार विशिष्ट मानवाधिकार संधि UN संस्थागत व्यवस्था
सदस्य स्वतंत्र विशेषज्ञ सदस्य राज्य
उदाहरण CEDAW Committee, CRC Committee, CERD Human Rights Council
मुख्य कार्य संबंधित संधि का पालन देखना व्यापक मानवाधिकार स्थिति देखना
State reports महत्वपूर्ण UPR में महत्वपूर्ण
शिकायतें संबंधित treaty/optional protocol पर निर्भर विशेष प्रक्रियाओं आदि के माध्यम से
निर्णय का स्वरूप सामान्यतः recommendations/views resolutions, recommendations आदि



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9. CEDAW, CRC और ICERD की तुलना

विषय CEDAW CRC ICERD

संरक्षण महिलाएं बच्चे नस्लीय/जातीय समूहों से संबंधित समानता
वर्ष 1979 1989 1965
निगरानी समिति CEDAW Committee CRC Committee CERD
मुख्य समस्या लैंगिक भेदभाव बाल अधिकारों का संरक्षण नस्लीय भेदभाव
प्रमुख सिद्धांत Gender equality Best interests of child Racial equality
रिपोर्टिंग हाँ हाँ हाँ
विशेष शिकायत तंत्र Optional Protocol के माध्यम से Optional Protocol के माध्यम से, संबंधित शर्तों के अधीन संबंधित व्यवस्था के अनुसार



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10. मानवाधिकार प्रवर्तन की पूरी श्रृंखला

इसे परीक्षा में एक flow के रूप में लिखना बहुत प्रभावी रहेगा:

अंतरराष्ट्रीय संधि
राज्य दायित्व स्वीकार करता है
राष्ट्रीय कानून/नीतियों में कार्यान्वयन
Treaty Body द्वारा निगरानी
State Reports
NGOs की Shadow Reports
Questions + Examination
Concluding Observations/Recommendations
Follow-up

इसके समानांतर:

UN Human Rights Council
UPR + Special Procedures
Country Visits / Communications / Reports
International scrutiny + Recommendations


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11. मानवाधिकार प्रवर्तन की सीमाएँ

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार व्यवस्था की कुछ व्यावहारिक सीमाएँ हैं:

1. राज्य की संप्रभुता

अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं हर मामले में घरेलू न्यायालय की तरह सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं।

2. Recommendations की प्रकृति

कई UN mechanisms की recommendations सीधे घरेलू न्यायालय के आदेश जैसी बाध्यकारी नहीं होतीं।

3. Enforcement machinery सीमित

अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में ऐसा कोई एक वैश्विक पुलिस बल नहीं है जो प्रत्येक मानवाधिकार उल्लंघन पर तुरंत कार्रवाई कर सके।

4. राजनीतिक प्रभाव

कुछ UN bodies में राज्यों की राजनीतिक भूमिका के कारण मानवाधिकार प्रश्न कभी-कभी राजनीतिक विवाद का रूप ले सकते हैं।

5. Implementation gap

किसी राज्य द्वारा संधि स्वीकार करना और वास्तव में जमीन पर अधिकार लागू करना दो अलग बातें हैं।


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12. परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण बिंदु

CEDAW

महिलाएं + समानता + भेदभाव उन्मूलन + CEDAW Committee

CRC

बच्चे + Best Interests + Survival & Development + Child's Views + CRC Committee

ICERD

नस्लीय भेदभाव + समानता + CERD

Human Rights Council

47 सदस्य + Geneva + UPR + मानवाधिकार निगरानी

Special Procedures

Special Rapporteur + Independent Expert + Working Group + Country Visit + Communications + Reports

NGOs

Documentation + Legal Aid + Advocacy + Shadow Reports + Awareness + International Pressure

🧠 अंतिम स्मृति सूत्र

> CEDAW = WOMEN
CRC = CHILDREN
ICERD = RACE
HRC = REVIEW
SPECIAL PROCEDURES = INVESTIGATE & REPORT
NGOs = DOCUMENT + ADVOCATE



इस पूरे टॉपिक का केंद्रीय विचार एक वाक्य में:

> “संधियाँ अधिकारों और राज्य के दायित्वों को स्थापित करती हैं, Treaty Bodies उनके पालन की निगरानी करते हैं, Human Rights Council वैश्विक समीक्षा करता है, Special Procedures उल्लंघनों की जांच और रिपोर्ट करते हैं तथा NGOs जमीन से तथ्य जुटाकर पीड़ितों और अंतरराष्ट्रीय तंत्र के बीच महत्वपूर्ण सेतु का काम करते हैं।”

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