2.5 पेपर ALU Jaipur Semester Seco श्रम एवं औद्योगिक विधि - II
इन योजनाओं का प्रशासन Employees' Provident Fund Organisation (EPFO) के माध्यम से होता है और केंद्रीय स्तर पर Central Board of Trustees (CBT) महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
छूट प्राप्त - प्रतिष्ठान (Exempted Establishments) EPF कानून के अंतर्गत कुछ प्रतिष्ठानों को छूट प्राप्त हो सकती है, इसका अर्थ यह नहीं है कि कर्मचारी को PF से पूरी तरह वंचित कर दिया जाएगा। मुख्य विचार यह है कि यदि किसी प्रतिष्ठान की अपनी PF व्यवस्था EPF Scheme के लाभों से कम अनुकूल नहीं है, तो निर्धारित परिस्थितियों में उसे छूट दी जा सकती है।
पाठ्यक्रम
प्रश्न-पत्र संख्या 2.5 श्रम एवं औद्योगिक विधि-II
Unit I -
वेतन संहिता, 2019 (Code on Wages, 2019) -
वेतन संहिता, 2019 (अधिनियम संख्या 29, 2019) निम्नलिखित चार कानूनों को समेकित करती है -
1. वेतन संदाय अधिनियम, 1936
2. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948
3. बोनस संदाय अधिनियम, 1965
4. समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976
वेतन संहिता, परिभाषाएँ, न्यूनतम मजदूरी, फ्लोर वेज, ओवरटाइम, समान वेतन, सलाहकार बोर्ड
1.1 वेतन (Wages) - कर्मचारी (Employee), श्रमिक(Worker) नियक्ता (Employer), प्रतिष्ठान(Establishment), ठेकेदार (Contractor) एवं संविदा श्रमिक (Contract Labour)
1.2 न्यूनतम मजदूरी- निर्धारण एवं पुनरीक्षण - धारा 6 के अंतर्गत उपयुक्त सरकार का न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने का दायित्व है।
न्यूनतम मजदूरी निर्धारण एवं पुनरीक्षण- धारा 7 व 8- मूल दर (Basic Rate), जीवन-यापन लागत भत्ता (Cost of Living Allowance), समग्र/सर्वसमावेशी दर (All-inclusive Rate)
• 1.3 फ्लोर वेज, कार्य के घंटे एवं ओवरटाइम - धारा 9,10,11,12,13 एवं 14
1.4 वेतन में लैंगिक भेदभाव निषेध समान कार्य या समान प्रकृति का कार्य। धारा 4
1.5 सलाहकार बोर्ड - धारा 42 - केंद्रीय सलाहकार बोर्ड/ राज्य सलाहकार बोर्डों के गठन, संरचना, कार्य
UNIT – II -
वेतन संहिता, 2019 वेतन भुगतान, कटौती, बोनस एवं प्रवर्तन -
2.1 वेतन भुगतान की विधि, अवधि एवं समय - धारा 15,16,17, एवं 43
2.2 वेतन कटौती - धारा 18(2) 18(3), 19, 20 व 21 वेतन से कटौती
2.3 बोनस का भुगतान - पात्रता, दर एवं समय सीमा (लेखा वर्ष), सीमा एवं बोनस निर्धारण की अवधारणाएं धारा 26, 29, 31, 32, 33, 34, 36, 39
2.4 दावे एवं विवाद समाधान - धारा 45, 46, 49, 57, 59, 60
2.5 प्रवर्तन - निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता नियुक्ति, अधिकारिता, भूमिका, शक्तियां, नियोक्ता द्वारा रिकॉर्ड संधारण, कंपनियों द्वारा कारित अपराध (बोर्ड, निदेशक, नियोक्ता, मैनेजर), अपराधों की शिकायत (महानगरीय मजिस्ट्रेट) धारा 50, 51, 55
UNIT – III
सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (अधिनियम संख्या 36, 2020) इसके अंतर्गत निम्नलिखित कानूनों सहित विभिन्न कानूनों को समेकित किया गया है:
कर्मचारी भविष्य निधि एवं विविध उपबंध अधिनियम, 1952
कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948
मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961
उपदान संदाय अधिनियम, 1972
कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम, 1923
भविष्य निधि, ESI, उपदान एवं मातृत्व लाभ
3.1 उद्देश्य, विस्तार एवं अनुप्रयोग - प्रमुख परिभाषाएँ, कर्मचारी, वेतन, नियोक्ता, प्रतिष्ठान, गिग श्रमिक, प्लेटफॉर्म श्रमिक, एग्रीगेटर, असंगठित श्रमिक, सामाजिक सुरक्षा ( पात्रता एवं सीमा)
3.2 कर्मचारी भविष्य निधि, पेंशन एवं बीमा - केंद्रीय न्यासी बोर्ड (गठन, शक्तियाँ,
कार्य, प्रशासन), बकाया वसूली, छूट प्राप्त प्रतिष्ठान, छूट की शर्तें, भविष्य निधि का निवेश अंतरराष्ट्रीय श्रमिक लाभों की पोर्टेबिलिटी
3.3 कर्मचारी राज्य बीमा (ESI) - गठन
प्रबंधन, शक्तियां, (नियोक्ता एवं कर्मचारी का) योगदान, ESI कोष का प्रशासन, प्रबंधन, निवेश एवं देय लाभ, ECI अस्पताल, दावे (न्यायालय), दंड
3.4 उपदान (Gratuity) - गणना, शर्तें, सीमा(अधिकतम) जब्ती, नामांकन, नियंत्रक प्राधिकारी, अपीलीय प्राधिकारी
3.5 मातृत्व लाभ - पात्रता, अवधि, अतिरिक्त अवकाश, कमीशनिंग माता (Commissioning Mother) के लिए अवकाश, दत्तक माता के लिए अवकाश,
मातृत्व लाभ अवधि में बर्खास्तगी से सुरक्षा
चिकित्सा बोनस, नर्सिंग ब्रेक, क्रेच सुविधा
निरीक्षकों की शक्तियाँ एवं कर्तव्य।
UNIT – IV
सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020
असंगठित श्रमिक, गिग एवं प्लेटफॉर्म श्रमिक, क्षतिपूर्ति एवं प्रवर्तन
4.1 असंगठित श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा - राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड गठन, कार्य, शक्तियां (भूमिका), भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक
इनके लिए श्रमिक कल्याण बोर्ड, श्रमिकों का पंजीकरण, निर्माण लागत पर उपकर/लेवी, प्रमुख योजना प्रधानमंत्री श्रम योगी मान-धन (PM-SYM) तथा अन्य।
4.2 गिग श्रमिक एवं प्लेटफॉर्म श्रमिक - प्रमुख परिभाषाएँ, एग्रीगेटर, सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ, गिग एवं प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लिए राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड, श्रमिकों का पंजीकरण, सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ।
4.3 रोजगार में लगी चोट के लिए क्षतिपूर्ति - रोजगार के दौरान दुर्घटना,
अनुसूचित व्यावसायिक रोग, मृत्यु के मामले में क्षतिपूर्ति, स्थायी पूर्ण निःशक्तता,
स्थायी आंशिक निःशक्तता, अस्थायी निःशक्तता, क्षतिपूर्ति की गणना, क्षतिपूर्ति का रूपांतरण, चिकित्सीय परीक्षण, क्षतिपूर्ति आयुक्त की नियुक्ति, आयुक्त की शक्तियाँ एवं प्रक्रिया, क्षतिपूर्ति का वितरण
4.4 EPFO एवं ESIC - शासन एवं वित्तीय प्रबंधन, भविष्य निधि के खातों का रख-रखाव, लेखा-परीक्षण, संसद को वार्षिक रिपोर्ट, बकाया राशि की वसूली,
संपत्ति की कुर्की एवं नीलामी, दिवालियापन या परिसमापन में भविष्य निधि देयों की प्राथमिकता, भविष्य निधि अपीलीय अधिकरण, अधिकरण की अधिकारिता एव प्रक्रिया, EPFO एवं ESIC के बीच समन्वय।
4.5 प्रवर्तन एवं दंड - सामाजिक सुरक्षा संगठन, वेब निरीक्षण प्रणाली, निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता की नियुक्ति, शक्तियाँ, निरीक्षण, तलाशी, जब्ती, जांच, कंपनियों द्वारा योगदान का भुगतान न करने, झूठे विवरण देने, जांच/निरीक्षण में बाधा डालने, कानून के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर निदेशकों एवं अधिकारियों द्वारा दायित्व की पूर्ति नहीं करने पर अपराधों का शमन (Compounding), निर्णयन प्राधिकारी, अपील, दावों की प्रक्रिया, परिसीमा अवधि।
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1. वेतन संहिता, 2019 का सामान्य परिचय -
वेतन संहिता, 2019 (Code on Wages, 2019) भारत में वेतन और पारिश्रमिक से संबंधित श्रम कानूनों को सरल, एकीकृत और व्यवस्थित करने के उद्देश्य से बनाया गया एक महत्वपूर्ण श्रम कानून है। इसका मुख्य उद्देश्य श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी, समय पर वेतन भुगतान तथा समान कार्य के लिए समान वेतन जैसी कानूनी सुरक्षा प्रदान करना है। वेतन संहिता, 2019 को संसद द्वारा अधिनियमित किया गया और इसे 8 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई। इसका अधिनियम संख्या 29, 2019 है।
चार पुराने कानूनों के स्थान पर - वेतन संहिता, 2019 द्वारा चार पुराने केंद्रीय श्रम कानूनों को समेकित किया गया है। ये कानून हैं -
1. वेतन संदाय अधिनियम, 1936 (Payment of Wages Act, 1936)
2. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 (Minimum Wages Act, 1948)
3. बोनस संदाय अधिनियम, 1965 (Payment of Bonus Act, 1965)
4. समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 (Equal Remuneration Act, 1976)
इस प्रकार वेतन संहिता ने वेतन से संबंधित विभिन्न कानूनों को एक ही संहिता के अंतर्गत लाने का प्रयास किया है।
वेतन संहिता, 2019 के प्रमुख उद्देश्य -
वेतन संहिता का प्रमुख उद्देश्य देश में वेतन संबंधी कानूनों को सरल और एकरूप बनाना है। इसके प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं -
1. सभी कर्मचारियों और श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करना।
2. श्रमिकों को समय पर वेतन का भुगतान सुनिश्चित करना।
3. न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण की व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाना।
4. केंद्र सरकार द्वारा फ्लोर वेज (Floor Wage) निर्धारित करने की व्यवस्था करना।
5. समान कार्य या समान प्रकृति के कार्य के लिए लैंगिक आधार पर वेतन में भेदभाव को रोकना।
6. बोनस के भुगतान से संबंधित प्रावधानों को व्यवस्थित करना।
7. वेतन से की जाने वाली कटौतियों को नियंत्रित करना।
8. श्रम कानूनों के अनुपालन के लिए निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता (Inspector-cum-Facilitator) की व्यवस्था करना।
9. विभिन्न वेतन संबंधी कानूनों को एक ही कानून में समेकित करके कानून को सरल बनाना।
वेतन संहिता का क्षेत्र - वेतन संहिता का महत्व इस बात में है कि यह केवल किसी एक विशेष उद्योग या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। इसमें कर्मचारियों और श्रमिकों के वेतन से संबंधित व्यापक प्रावधान किए गए हैं। इस संहिता में वेतन, न्यूनतम मजदूरी, फ्लोर वेज, ओवरटाइम, वेतन भुगतान, वेतन से कटौती, बोनस तथा समान पारिश्रमिक जैसे महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया गया है।
वेतन की अवधारणा - वेतन संहिता, 2019 में "वेतन" (Wages) की एक समान परिभाषा दी गई है। सामान्य रूप से वेतन से आशय उस पारिश्रमिक से है जो कर्मचारी को उसके रोजगार या कार्य के संबंध में देय होता है।
वेतन की एक समान परिभाषा बनाए जाने का उद्देश्य विभिन्न श्रम कानूनों में वेतन की अलग-अलग परिभाषाओं से उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों को कम करना है।
न्यूनतम मजदूरी - वेतन संहिता की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक न्यूनतम मजदूरी की व्यवस्था है। उपयुक्त सरकार द्वारा कर्मचारियों के लिए न्यूनतम मजदूरी निर्धारित की जाती है। न्यूनतम मजदूरी का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी श्रमिक को उसके श्रम के बदले कानून द्वारा निर्धारित न्यूनतम राशि से कम भुगतान न किया जाए।
फ्लोर वेज - वेतन संहिता में फ्लोर वेज (Floor Wage) की अवधारणा को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। केंद्र सरकार द्वारा श्रमिकों के जीवन स्तर और विभिन्न क्षेत्रों में जीवन-यापन की लागत को ध्यान में रखते हुए फ्लोर वेज निर्धारित किया जा सकता है। उपयुक्त सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी फ्लोर वेज से कम नहीं होनी चाहिए।
समान वेतन का सिद्धांत - वेतन संहिता लैंगिक आधार पर वेतन संबंधी भेदभाव को रोकती है। समान कार्य या समान प्रकृति का कार्य करने वाले कर्मचारियों के बीच केवल लिंग के आधार पर वेतन या रोजगार संबंधी परिस्थितियों में भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। इस प्रावधान का उद्देश्य कार्यस्थल पर पुरुष और महिला कर्मचारियों के बीच वेतन संबंधी समानता स्थापित करना है।
ओवरटाइम का भुगतान - यदि किसी कर्मचारी से निर्धारित सामान्य कार्य अवधि से अधिक समय तक कार्य कराया जाता है, तो उसे ओवरटाइम के लिए निर्धारित दर से भुगतान किया जाना आवश्यक है। इस प्रकार संहिता श्रमिकों के अतिरिक्त कार्य के लिए अतिरिक्त पारिश्रमिक की व्यवस्था करती है।
वेतन भुगतान - वेतन संहिता में वेतन के भुगतान की अवधि और समय से संबंधित प्रावधान किए गए हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कर्मचारी को उसके द्वारा किए गए कार्य का वेतन निर्धारित समय के भीतर प्राप्त हो।
वेतन से कटौती - नियोक्ता कर्मचारी के वेतन से मनमाने ढंग से कटौती नहीं कर सकता। संहिता में वेतन से की जाने वाली वैध कटौतियों के संबंध में प्रावधान किए गए हैं। इसका उद्देश्य कर्मचारियों को अनुचित या अवैध वेतन कटौती से सुरक्षा प्रदान करना है।
बोनस - वेतन संहिता में बोनस के भुगतान से संबंधित प्रावधान भी शामिल किए गए हैं। पात्र कर्मचारियों को कानून में निर्धारित शर्तों के अनुसार बोनस प्राप्त करने का अधिकार होता है।
सलाहकार बोर्ड - वेतन संहिता में केंद्रीय सलाहकार बोर्ड (Central Advisory Board) तथा राज्य सलाहकार बोर्ड (State Advisory Board) की व्यवस्था की गई है। ये बोर्ड न्यूनतम मजदूरी तथा श्रमिकों से संबंधित विभिन्न विषयों पर सरकार को सलाह देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता - वेतन संहिता में निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता (Inspector-cum-Facilitator) की व्यवस्था की गई है। इसका उद्देश्य केवल कानून के उल्लंघन की जांच करना ही नहीं, बल्कि नियोक्ताओं और कर्मचारियों को श्रम कानूनों के अनुपालन के संबंध में मार्गदर्शन और सुविधा प्रदान करना भी है।
वेतन संहिता, 2019 का महत्व - वेतन संहिता भारतीय श्रम कानूनों के सरलीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। पहले वेतन से संबंधित अलग-अलग विषयों के लिए अलग-अलग केंद्रीय कानून थे। वेतन संहिता ने इन चार प्रमुख कानूनों को एक ही संहिता में समेकित कर दिया। इससे कानून की संरचना अधिक व्यवस्थित होने, अनुपालन को सरल बनाने और श्रमिकों को वेतन संबंधी अधिकारों की बेहतर सुरक्षा मिलने की अपेक्षा की गई है।
निष्कर्ष - वेतन संहिता, 2019 भारत की श्रम विधि व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण सुधार है। इसका मुख्य उद्देश्य वेतन संबंधी कानूनों को एकीकृत और सरल बनाना तथा श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी, समय पर वेतन, समान पारिश्रमिक और बोनस जैसी कानूनी सुरक्षा प्रदान करना है। इस संहिता में न्यूनतम मजदूरी, फ्लोर वेज, वेतन भुगतान, वेतन कटौती, बोनस, ओवरटाइम और लैंगिक समानता जैसे महत्वपूर्ण विषयों को एक व्यापक कानूनी ढांचे में शामिल किया गया है।
2. वेतन (Wages) -
वेतन संहिता, 2019 में वेतन की अवधारणा में न्यूनतम मजदूरी, वेतन भुगतान, बोनस तथा अन्य अनेक प्रावधानों को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि कानून की दृष्टि से वेतन किसे कहा जाता है।
वेतन का अर्थ - सामान्य अर्थ में वेतन उस धनराशि या पारिश्रमिक को कहा जाता है जो कर्मचारी को उसके द्वारा किए गए कार्य या प्रदान की गई सेवाओं के बदले नियोक्ता द्वारा दिया जाता है।
वेतन संहिता, 2019 में वेतन की एक समान परिभाषा दी गई है जिसका उद्देश्य अलग-अलग श्रम कानूनों में वेतन की अलग-अलग परिभाषाओं के कारण उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों को समाप्त करना और वेतन संबंधी प्रावधानों के लिए एक समान आधार तैयार करना है।
वेतन में शामिल राशियां - वेतन की गणना करते समय निम्नलिखित घटकों को ध्यान में रखा जाता है -
मूल वेतन (Basic Pay) - मूल वेतन कर्मचारी को उसके रोजगार के आधार पर मिलने वाला मूल पारिश्रमिक है। यह वेतन संरचना का प्रमुख हिस्सा होता है।
महंगाई भत्ता (Dearness Allowance) - महंगाई के कारण जीवन-यापन की बढ़ती लागत की भरपाई के लिए कर्मचारी को दिया जाने वाला भत्ता महंगाई भत्ता कहलाता है। वेतन की कानूनी गणना में इसका विशेष महत्व है।
3. प्रतिधारण भत्ता (Retaining Allowance) - कुछ विशेष परिस्थितियों में कर्मचारी को रोजगार में बनाए रखने के लिए दिया जाने वाला प्रतिधारण भत्ता भी वेतन की अवधारणा में शामिल किया जाता है।
इस प्रकार वेतन की मूल संरचना को समझने के लिए मूल वेतन, महंगाई भत्ता और प्रतिधारण भत्ता महत्वपूर्ण हैं।
वेतन में शामिल नहीं की जाने वाली राशियां -
I.बोनस - जो रोजगार की शर्तों के अंतर्गत दिए जाने वाले पारिश्रमिक का हिस्सा नहीं है।
II. भत्ते - आवास, प्रकाश, पानी, चिकित्सा सुविधा या अन्य ऐसी सुविधाओं का मूल्य, जिन्हें सरकार द्वारा सामान्य या विशेष आदेश से वेतन से बाहर रखा गया हो।
III. भविष्य निधि कटौती - नियोक्ता द्वारा कर्मचारी के पेंशन या भविष्य निधि में किया गया योगदान तथा उस पर प्राप्त ब्याज।
IV. यात्रा भत्ता - यात्रा या यात्रा रियायत का मूल्य।
V. विशेष खर्च - कर्मचारी को विशेष खर्चों की पूर्ति के लिए दी गई राशि।
VI. मकान किराया भत्ता (House Rent Allowance)।
VII. वाद की स्थिति में भुगतान - किसी न्यायालय या प्राधिकरण के आदेश के अनुपालन में दिया गया पारिश्रमिक।
VIII. अतिरिक्त समय कार्य - ओवरटाइम भत्ता।
IX - इंसेंटिव - कमीशन।
X. ग्रेजुएटी / अवकाश के बदले भुगतान - सेवा समाप्ति के कारण कर्मचारी को दिया जाने वाला ग्रेच्युटी भुगतान।
XI. सेवा समाप्ति पर देय भुगतान - छंटनी क्षतिपूर्ति या अन्य सेवानिवृत्ति लाभ, जो कानून के अनुसार देय हों।
संहिता में वेतन से बाहर रखे गए विभिन्न भत्तों और भुगतानों के संबंध में एक सीमा भी निर्धारित की गई है। इन मदों के अंतर्गत आने वाली राशियां निर्धारित सीमा से अधिक हो जाती हैं, तो अतिरिक्त राशि को वेतन का हिस्सा माना जा सकता है। यही कारण है कि वेतन की कानूनी गणना केवल कर्मचारी की बेसिक सैलरी देखकर नहीं की जाती।
वेतन की 50 प्रतिशत सीमा का महत्व -
वेतन संहिता, 2019 में से एक 50 प्रतिशत का नियम है। यदि कर्मचारी को दिए जाने वाले भत्ते और अन्य भुगतान कुल पारिश्रमिक के 50 प्रतिशत से अधिक हो जाते हैं, तो 50 प्रतिशत से अधिक की राशि को वेतन में जोड़कर माना जाएगा।
उदाहरण - यदि किसी कर्मचारी का कुल पारिश्रमिक 40,000 रुपये है और वेतन से बाहर रखे जाने वाले भत्ते 24,000 रुपये हैं, तो ये कुल पारिश्रमिक के 60 प्रतिशत हैं। इस स्थिति में 50 प्रतिशत से अधिक यानी 4,000 रुपये को वेतन में शामिल किया जाएगा।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह रोकना है कि नियोक्ता वेतन को कृत्रिम रूप से कम दिखाने के लिए बहुत अधिक राशि अलग-अलग भत्तों के रूप में निर्धारित कर दे।
वेतन और न्यूनतम मजदूरी का संबंध -
नियोक्ता कर्मचारी को कानून द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान नहीं कर सकता।
इसलिए यह निर्धारित करना आवश्यक होता है कि कर्मचारी को मिलने वाली कौन-कौन सी राशियां कानूनी रूप से वेतन का हिस्सा हैं और कौन-कौन सी राशियां वेतन से बाहर हैं।
वेतन और बोनस का संबंध - वेतन तथा बोनस दोनों कर्मचारी को प्राप्त होने वाले आर्थिक लाभ हैं, लेकिन दोनों की कानूनी प्रकृति अलग है। वेतन कर्मचारी के कार्य के बदले देय पारिश्रमिक है, जबकि बोनस निर्धारित पात्रता और शर्तों के अनुसार दिया जाने वाला अतिरिक्त भुगतान है। इसलिए सामान्यतः बोनस को वेतन की मूल गणना से अलग रखा जाता है।
वेतन और ओवरटाइम - ओवरटाइम वह अतिरिक्त भुगतान है जो कर्मचारी द्वारा सामान्य कार्य अवधि से अधिक समय तक कार्य करने पर दिया जाता है। वेतन संहिता में ओवरटाइम भुगतान की व्यवस्था की गई है। ओवरटाइम को सामान्य वेतन से अलग होता है और निर्धारित परिस्थितियों में इसके लिए सामान्य वेतन दर से अधिक दर पर भुगतान किया जाता है।
वेतन की परिभाषा का महत्व - वेतन की एक समान परिभाषा का श्रम कानून में व्यापक महत्व है -
I. न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने में सहायता मिलती है।
II. कर्मचारी को देय वेतन की सही गणना की जा सकती है।
III. वेतन से की जाने वाली वैध कटौती निर्धारित करने में सुविधा होती है।
IV. बोनस की गणना में सहायता मिलती है।
V. समान कार्य के लिए समान वेतन के सिद्धांत को लागू करने में सहायता मिलती है।
VI. नियोक्ता द्वारा वेतन को अलग-अलग भत्तों में बांटकर कानूनी दायित्व से बचने की संभावना कम होती है।
VII. विभिन्न श्रम कानूनों में वेतन की अलग-अलग परिभाषाओं के कारण उत्पन्न विवादों को कम किया जा सकता है।
उदाहरण - मान लीजिए किसी कर्मचारी को प्रतिमाह 30,000 रुपये का पारिश्रमिक मिलता है। इसमें मूल वेतन, महंगाई भत्ता और विभिन्न भत्ते शामिल हैं।
यदि किसी कानूनी प्रावधान के लिए वेतन की गणना करनी है, तो केवल मूल वेतन को देखकर निर्णय नहीं किया जाएगा। यह देखा जाएगा कि कौन-कौन सी राशियां वेतन में शामिल हैं और कौन-कौन सी राशियां संहिता के अनुसार बाहर रखी गई हैं। इसके बाद 50 प्रतिशत की सीमा के नियम को भी लागू किया जाएगा।
इसलिए वेतन संहिता के अंतर्गत वेतन एक तकनीकी कानूनी अवधारणा है, जिसका अर्थ केवल कर्मचारी के हाथ में आने वाली कुल रकम नहीं है।
निष्कर्ष - वेतन संहिता, 2019 में वेतन की अवधारणा को एक समान और व्यापक आधार प्रदान किया गया है। मूल वेतन, महंगाई भत्ता और प्रतिधारण भत्ता वेतन के प्रमुख घटक हैं, जबकि अनेक भत्तों और अन्य भुगतानों को निर्धारित परिस्थितियों में इससे बाहर रखा गया है। साथ ही 50 प्रतिशत की सीमा का प्रावधान यह सुनिश्चित करता है कि वेतन संरचना में अत्यधिक भत्ते दिखाकर वास्तविक वेतन को कम न किया जा सके।
इस प्रकार "वेतन" की सही परिभाषा वेतन संहिता, 2019 के लगभग सभी प्रमुख प्रावधानों को समझने की आधारशिला है।
3. कर्मचारी, श्रमिक, नियोक्ता, प्रतिष्ठान, ठेकेदार एवं संविदा श्रमिक -
वेतन संहिता, 2019 में कर्मचारी, श्रमिक, नियोक्ता, प्रतिष्ठान, ठेकेदार और संविदा श्रमिक जैसी अवधारणाएँ बहुत महत्वपूर्ण हैं। इन शब्दों की सही समझ के बिना न्यूनतम मजदूरी, वेतन भुगतान, बोनस और श्रमिकों के अधिकारों को ठीक से समझना कठिन है। संहिता में इनसे संबंधित परिभाषाएँ दी गई हैं और इन्हीं के आधार पर यह निर्धारित होता है कि कानून के प्रावधान किन व्यक्तियों और संस्थानों पर लागू होंगे।
कर्मचारी (Employee) - वेतन संहिता, 2019 के अनुसार कर्मचारी से आशय ऐसे व्यक्ति से है, जो किसी प्रतिष्ठान में मजदूरी के बदले काम करता है।
कर्मचारी में कुशल, अर्द्धकुशल, अकुशल, शारीरिक, तकनीकी, परिचालन, लिपिकीय अथवा पर्यवेक्षकीय कार्य करने वाला व्यक्ति शामिल हो सकता है अर्थात जो व्यक्ति किसी नियोक्ता के लिए काम करता है और उस कार्य के बदले वेतन या मजदूरी प्राप्त करता है, वह कर्मचारी कहलाता है।
उदाहरण - यदि किसी कारखाने में राम मशीन चलाता है और उसे हर महीने वेतन मिलता है, तो राम उस प्रतिष्ठान का कर्मचारी है।
कर्मचारी की प्रमुख विशेषताएँ -
• वह किसी प्रतिष्ठान में कार्य करता है।
• उसके कार्य के बदले उसे पारिश्रमिक प्राप्त होता है।
• उसका रोजगार किसी नियोक्ता के साथ संबंध स्थापित करता है।
• वह शारीरिक अथवा मानसिक दोनों प्रकार का कार्य कर सकता है।
• उसकी सेवा रोजगार की शर्तों के अधीन होती है।
श्रमिक (Worker) - श्रमिक शब्द कर्मचारी की तुलना में अधिक विशिष्ट अर्थ रखता है। प्रत्येक श्रमिक कर्मचारी हो सकता है, लेकिन प्रत्येक कर्मचारी श्रमिक की श्रेणी में नहीं होता है।
वेतन संहिता में श्रमिक वह व्यक्ति जो किसी उद्योग, व्यापार या व्यवसाय में शारीरिक श्रम अथवा अन्य निर्धारित कार्य करता है।
श्रमिक में कुशल, अर्द्धकुशल, अकुशल, तकनीकी और लिपिकीय कार्य करने वाले व्यक्ति शामिल हो सकते हैं। हालांकि कुछ उच्च स्तर के प्रबंधकीय या प्रशासनिक पदों पर कार्य करने वाले व्यक्ति इस परिभाषा से बाहर होते हैं।
उदाहरण - किसी फैक्ट्री में मशीन चलाने वाला ऑपरेटर, पैकिंग करने वाला व्यक्ति या तकनीकी कार्य करने वाला व्यक्ति श्रमिक होता है।
कर्मचारी और श्रमिक में अंतर - कर्मचारी एक व्यापक अवधारणा है, जबकि श्रमिक अपेक्षाकृत विशिष्ट श्रेणी है।
कर्मचारी का संबंध रोजगार संबंध से है, जबकि श्रमिक की पहचान उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य और उसकी कानूनी श्रेणी के आधार पर होती है।
3. नियोक्ता (Employer) - नियोक्ता वह व्यक्ति या संस्था है जो किसी कर्मचारी/श्रमिक को अपने अधीन काम पर रखती है और उसके कार्य के बदले वेतन या पारिश्रमिक देने हेतु उत्तरदायी होती है।
नियोक्ता व्यक्ति, कंपनी, फर्म, संस्था या अन्य कानूनी इकाई हो सकता है।
नियोक्ता के प्रमुख दायित्व -
I. कर्मचारी को निर्धारित वेतन देना।
II. न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान न करना।
III. निर्धारित समय पर वेतन का भुगतान करना।
IV. कानून के अनुसार वेतन से ही कटौती करना।
V. ओवरटाइम का भुगतान करना, जहां लागू हो।
VI. बोनस संबंधी कानूनी प्रावधानों का पालन करना।
VII. आवश्यक अभिलेख और रजिस्टर बनाए रखना।
VIII. श्रम कानूनों के अनुपालन में निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता को आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराना।
उदाहरण - यदि किसी कारखाने का मालिक 100 कर्मचारियों को नौकरी देता है और उन्हें वेतन देता है, तो वह नियोक्ता है।
प्रतिष्ठान (Establishment) - प्रतिष्ठान से आशय उस स्थान या संगठन से है जहाँ कोई उद्योग, व्यापार, व्यवसाय, उत्पादन, सेवा या उससे संबंधित कार्य किया जाता है। वेतन संहिता के संदर्भ में प्रतिष्ठान ए स्थान/ संग्रहण है क्योंकि संहिता के अनेक प्रावधान यह निर्धारित करते हैं कि कौन सा संस्थान या व्यवसाय कानून के अधीन आएगा।
प्रतिष्ठान के उदाहरण -
I. कारखाना
II. दुकान
III. कार्यालय
IV. व्यापारिक संस्था
V. औद्योगिक इकाई
VI. सेवा प्रदान करने वाली संस्था
VII. अन्य निर्धारित संस्थान
अर्थात वह स्थान जहाँ कर्मचारी काम करते हैं और आर्थिक या व्यावसायिक गतिविधि संचालित होती है, वह स्थान या संगठन कानून की दृष्टि से प्रतिष्ठान हो सकता है।
ठेकेदार (Contractor) - ठेकेदार वह व्यक्ति होता है जो किसी प्रतिष्ठान में किसी कार्य को पूरा करने के लिए श्रमिकों को उपलब्ध कराता है अथवा किसी कार्य को ठेके के आधार पर करने की जिम्मेदारी लेता है। ठेकेदार और नियोक्ता के बीच एक संविदात्मक संबंध हो सकता है। ठेकेदार स्वयं श्रमिकों को नियुक्त कर सकता है और उन्हें किसी दूसरे प्रतिष्ठान में काम करने के लिए भेज सकता है।
उदाहरण - मान लीजिए किसी कारखाने ने सफाई का काम एक ठेकेदार को दिया। ठेकेदार ने 20 सफाई कर्मचारियों को नियुक्त किया और उन्हें कारखाने में काम करने के लिए भेजा। इस स्थिति में वह व्यक्ति ठेकेदार कहलाएगा।
ठेकेदार के प्रमुख दायित्व -
I. श्रमिकों को कानून के अनुसार मजदूरी दिलाना।
II. मजदूरी के संबंध में निर्धारित नियमों का पालन करना।
III. श्रमिकों के आवश्यक रिकॉर्ड रखना।
IV. श्रमिकों को कानून द्वारा निर्धारित अधिकारों से वंचित न करना।
V. लागू होने वाले श्रम कानूनों का पालन करना।
संविदा श्रमिक (Contract Labour) -
संविदा श्रमिक वह व्यक्ति है जो किसी प्रतिष्ठान नियोक्ता/ठेकेदार (एजेंसी) के द्वारा नियुक्त होते हैं जो किसी परियोजना विशेष तक कार्य हेतु रखे जाते हैं। इनकी रोजगार एवं वेतन की स्थिति कर्मचारी से निम्न एवं श्रमिक से उच्य होती है। अधिकांश संविदा कर्मी कुशल कार्मिक होते हैं।
जैसे राजस्थान में सरकारी प्रतिष्ठानों में काम करने हेतु राजस्थान संविदा सेवा नियम 2022 के अंतर्गत NHM, शिक्षा, अल्पसंख्यक विभाग, राजीविका व VBGRAMG (पूर्व में नरेगा) योजना में कार्यरत कार्मिक।
संविदा श्रमिक की विशेषताएँ
I. नियुक्ति विशेष नियमानुसार।
II. विशेष परियोजना के संचालन हेतु नियुक्ति।
III. स्थाई कर्मचारी से निम्नतर स्थिति।
IV. उसे मजदूरी या पारिश्रमिक के स्थान पर मानदेय प्राप्त होता है।
V. उस पर लागू श्रम कानूनों के अनुसार न्यूनतम मजदूरी और अन्य वैधानिक अधिकारों की सुरक्षा रहती है।
कर्मचारी, श्रमिक और संविदा श्रमिक में अंतर -
• कर्मचारी एक व्यापक शब्द है, जिसमें विभिन्न प्रकार के रोजगार में लगे व्यक्ति आ सकते हैं।
• श्रमिक वह व्यक्ति है जो कानून में निर्धारित श्रमिक की श्रेणी में आने वाला कार्य करता है।
• संविदा श्रमिक वह श्रमिक है जो किसी प्रतिष्ठान में विशिष्ट परियोजना के संचालन हेतु कार्य करता है।
निविदा कार्मिक - ठेकेदार या एजेंसी के माध्यम से फैक्ट्री में काम करने वाला व्यक्ति जिसे भुगतान नियोक्ता द्वारा नहीं कर एजेंसी/कंपनी के माध्यम से किया जाता है।
जैसे, सफाई कर्मचारी = संविदा श्रमिक
इस प्रकार इन सभी शब्दों का आपस में गहरा संबंध है, लेकिन प्रत्येक का कानूनी अर्थ अलग है।
निष्कर्ष - वेतन संहिता, 2019 को समझने के लिए कर्मचारी, श्रमिक, नियोक्ता, प्रतिष्ठान, ठेकेदार और संविदा श्रमिक की अवधारणाओं को समझना आवश्यक है। कर्मचारी वह व्यक्ति है जो रोजगार के संबंध में कार्य करता है, श्रमिक कानून में निर्धारित श्रेणी का कार्य करने वाला व्यक्ति है, नियोक्ता कर्मचारी को रोजगार देने वाला व्यक्ति या संस्था है, प्रतिष्ठान वह स्थान या संगठन है जहाँ आर्थिक अथवा व्यावसायिक गतिविधि होती है, ठेकेदार किसी कार्य को ठेके पर करने या श्रमिक उपलब्ध कराने वाला व्यक्ति है और संविदा श्रमिक ठेकेदार के माध्यम से प्रतिष्ठान में कार्य करने वाला श्रमिक है।
इन परिभाषाओं के माध्यम से वेतन संहिता यह निर्धारित करने में सहायता करती है कि न्यूनतम मजदूरी, वेतन भुगतान, बोनस तथा अन्य वैधानिक अधिकार और दायित्व किन व्यक्तियों एवं प्रतिष्ठानों पर लागू होंगे।
न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण एवं पुनरीक्षण -
वेतन संहिता, 2019 में न्यूनतम मजदूरी से संबंधित प्रावधान श्रमिकों के आर्थिक संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। संहिता का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी कर्मचारी को उसके श्रम के बदले कानून द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान न किया जाए। धारा 5 के अनुसार कोई नियोक्ता किसी कर्मचारी को उपयुक्त सरकार द्वारा अधिसूचित न्यूनतम मजदूरी से कम मजदूरी नहीं दे सकता।
धारा 6 के अंतर्गत न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण - वेतन संहिता, 2019 की धारा 6 न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण से संबंधित है। इसके अनुसार धारा 9 के अधीन रहते हुए उपयुक्त सरकार, धारा 8 में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कर्मचारियों को देय न्यूनतम मजदूरी की दर निर्धारित करेगी।
इसका अर्थ है कि न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करना केवल नियोक्ता की इच्छा पर निर्भर नहीं है, बल्कि यह सरकार का वैधानिक दायित्व है।
उपयुक्त सरकार का अर्थ - न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने के लिए यह जानना आवश्यक है कि उपयुक्त सरकार कौन है।
सामान्य रूप से केंद्रीय सरकार के नियंत्रण वाले कुछ प्रतिष्ठानों और क्षेत्रों के लिए केंद्र सरकार तथा अन्य प्रतिष्ठानों के लिए संबंधित राज्य सरकार उपयुक्त सरकार होती है। इसलिए प्रत्येक क्षेत्र में न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने वाली सरकार का निर्धारण उस प्रतिष्ठान और रोजगार की प्रकृति के आधार पर किया जाता है।
धारा 6 के अंतर्गत न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने की प्रक्रिया - धारा 6 को समझने के लिए इसके प्रमुख प्रावधानों को क्रम से समझना उपयोगी है।
I. समान कार्य के लिए न्यूनतम मजदूरी - उपयुक्त सरकार समय के आधार पर किए जाने वाले कार्य के लिए न्यूनतम मजदूरी निर्धारित कर सकती है।
समय कार्य (Time Work) में कर्मचारी को उसके द्वारा लगाए गए समय के आधार पर मजदूरी प्राप्त होती है।
यह मजदूरी निम्न आधारों पर निर्धारित हो सकती है
क. प्रति घंटा
ख. प्रतिदिन
ग. प्रतिमाह
उदाहरण - यदि किसी श्रेणी के कर्मचारी के लिए न्यूनतम मजदूरी 500 रुपये प्रतिदिन निर्धारित की गई है, तो सामान्य परिस्थितियों में नियोक्ता उसे 500 रुपये प्रतिदिन से कम मजदूरी नहीं दे सकता।
2. टुकड़ा कार्य के लिए न्यूनतम मजदूरी - कई उद्योगों में श्रमिक को समय के आधार पर नहीं बल्कि उसके द्वारा उत्पादित वस्तुओं या किए गए कार्य की मात्रा के आधार पर मजदूरी दी जाती है। इसे टुकड़ा कार्य (Piece Work) कहा जाता है। धारा 6 के अंतर्गत ऐसे कर्मचारियों के लिए भी न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित की जाती है।
सरकार टुकड़ा कार्य करने वाले कर्मचारियों के लिए ऐसी न्यूनतम दर निर्धारित करेगी जिससे उन्हें कम से कम समय-कार्य के आधार पर निर्धारित न्यूनतम मजदूरी प्राप्त हो सके।
इसका उद्देश्य यह है कि उत्पादन कम होने या काम की मात्रा कम मिलने के कारण श्रमिक की मजदूरी कानून द्वारा निर्धारित न्यूनतम स्तर से नीचे न चली जाए।
न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करते समय ध्यान रखने वाले आधार - धारा 6(6) न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण के लिए कुछ महत्वपूर्ण आधार निर्धारित करती है।
A. श्रमिक का कौशल - सरकार को मुख्य रूप से श्रमिक के कौशल को ध्यान में रखना होगा। श्रमिकों को सामान्यतः निम्न श्रेणियों में बांटा जा सकता है -
क. अकुशल (Unskilled)
ख. अर्द्धकुशल (Semi-skilled)
ग. कुशल (Skilled)
घ. अत्यधिक कुशल (Highly-skilled)
अलग-अलग कौशल स्तर के लिए न्यूनतम मजदूरी की दर अलग हो सकती है।
उदाहरण - किसी अकुशल श्रमिक की न्यूनतम मजदूरी और अत्यधिक कुशल तकनीशियन की न्यूनतम मजदूरी समान होना आवश्यक नहीं है।
B. भौगोलिक क्षेत्र - न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करते समय भौगोलिक क्षेत्र को भी ध्यान में रखा जा सकता है। किसी बड़े शहर में जीवन-यापन की लागत किसी ग्रामीण या अपेक्षाकृत छोटे क्षेत्र की तुलना में अधिक हो सकती है। इसलिए सरकार विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के लिए अलग-अलग न्यूनतम मजदूरी दर निर्धारित कर सकती है।
D. कार्य की कठिन प्रकृति - कुछ कार्य सामान्य कार्यों की तुलना में अधिक कठिन या जोखिमपूर्ण होते हैं। ऐसे कार्यों के लिए न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करते समय कार्य की कठिन प्रकृति को भी ध्यान में रखा जा सकता है।
उदाहरण -
• अत्यधिक तापमान में कार्य
• अत्यधिक आर्द्रता वाले वातावरण में कार्य
खतरनाक कार्य - खतरनाक प्रक्रिjयाओं में कार्य जैसे भूमिगत कार्य धारा 6 सरकार को ऐसे कार्यों की कठिन परिस्थितियों को ध्यान में रखने की अनुमति देती है।
न्यूनतम मजदूरी की दरों की संख्या -
सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी की विभिन्न दरों की संख्या, जहां तक संभव हो, न्यूनतम रखी जानी चाहिए।
इसका उद्देश्य यह है कि मजदूरी की व्यवस्था अत्यधिक जटिल न हो और नियोक्ता तथा कर्मचारी दोनों के लिए दरों को समझना और लागू करना आसान रहे।
न्यूनतम मजदूरी के घटक - धारा 7 के अंतर्गत न्यूनतम मजदूरी में विभिन्न घटक शामिल किए जा सकते हैं। इनमें प्रमुख रूप से मूल मजदूरी (Basic Rate of Wages), जीवन-यापन लागत भत्ता (Cost of Living Allowance) तथा कुछ परिस्थितियों में आवश्यक वस्तुओं पर रियायती दर से मिलने वाली सुविधाओं का नकद मूल्य शामिल हो सकता है। सरकार इन घटकों को मिलाकर समग्र दर (All-inclusive Rate) भी निर्धारित कर सकती है।
इसका उद्देश्य महंगाई और जीवन-यापन की लागत में होने वाले परिवर्तन से श्रमिक की वास्तविक आय को अत्यधिक प्रभावित होने से बचाना है।
न्यूनतम मजदूरी का पुनरीक्षण - न्यूनतम मजदूरी हमेशा एक बार निर्धा रित करके छोड़ नहीं दी जाती। महंगाई, जीवन-यापन की लागत, आर्थिक परिस्थितियों और श्रम बाजार में परिवर्तन के कारण समय-समय पर इसकी समीक्षा और आवश्यकता होने पर पुनरीक्षण किया जाना आवश्यक है।
वेतन संहिता, 2019 की धारा 8(4) के अनुसार उपयुक्त सरकार को न्यूनतम मजदूरी की दरों की समीक्षा या पुनरीक्षण सामान्यतः ऐसे अंतराल पर करना है जो पांच वर्ष से अधिक न हो। इसलिए सरकार को न्यूनतम मजदूरी की समीक्षा के लिए पांच वर्ष से अधिक समय नहीं लेना चाहिए।
न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने की दो विधियां - धारा 8 के अंतर्गत न्यूनतम मजदूरी निर्धारित या संशोधित करने के लिए उपयुक्त सरकार मुख्यतः दो तरीकों में से किसी एक को अपना सकती है।
पहली विधि: समिति द्वारा जांच - सरकार आवश्यकतानुसार एक या अधिक समितियों का गठन कर सकती है।
समिति संबंधित क्षेत्र में मजदूरी की परिस्थितियों का अध्ययन करती है, आवश्यक जांच करती है और न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण या पुनरीक्षण के संबंध में सरकार को अपनी सिफारिश देती है।
श्रमिकों के प्रकार -
श्रमिकों के प्रकार को श्रम कानून के अध्ययन में अलग-अलग आधारों पर समझा जाता है। भारतीय श्रम विधि में श्रमिकों का वर्गीकरण उनके काम की प्रकृति, रोजगार की अवधि, कौशल, रोजगारदाता से संबंध और कार्यस्थल के आधार पर किया जाता है।
स्थायी श्रमिक (Permanent Worker) - जो श्रमिक किसी प्रतिष्ठान में स्थायी रूप से नियुक्त होता है और जिसका रोजगार किसी निश्चित छोटी अवधि तक सीमित नहीं होता।
विशेषताएँ -
• नियमित रोजगार
• अपेक्षाकृत अधिक रोजगार-सुरक्षा
• वेतन एवं सेवा-लाभ की निरंतरता
• छुट्टी, भविष्य निधि, ग्रेच्युटी आदि लाभ लागू कानून के अनुसार मिल सकते हैं।
उदाहरण - किसी कारखाने में नियमित रूप से नियुक्त मशीन ऑपरेटर।
अस्थायी श्रमिक (Temporary Worker) - जिसे किसी निश्चित अवधि या अस्थायी आवश्यकता के लिए नियुक्त किया जाता है।
उदाहरण - किसी परियोजना की अवधि तक नियुक्त कर्मचारी। कुछ महीनों के लिए अतिरिक्त उत्पादन हेतु नियुक्त श्रमिक।
आकस्मिक श्रमिक (Casual Worker) - जिसे आकस्मिक या कभी-कभी उत्पन्न होने वाले काम के लिए नियुक्त किया जाता है। इसका रोजगार सामान्यतः नियमित नहीं होता।
उदाहरण - अचानक अधिक माल आने पर कुछ दिनों के लिए अतिरिक्त श्रमिक रखना।
बदली श्रमिक (Badli Worker) - जब किसी स्थायी श्रमिक की अनुपस्थिति में उसके स्थान पर दूसरे व्यक्ति को काम पर लगाया जाता है, तो उस व्यक्ति को बदली श्रमिक कहा जाता है।
उदाहरण - किसी नियमित कर्मचारी के अवकाश पर जाने पर उसकी जगह दूसरे व्यक्ति को काम देना।
5. प्रशिक्षु (Apprentice) - जो व्यक्ति किसी व्यवसाय या तकनीकी कार्य का प्रशिक्षण प्राप्त करने के उद्देश्य से प्रतिष्ठान में काम करता है। उसका मुख्य उद्देश्य केवल उत्पादन करना नहीं बल्कि कौशल सीखना होता है। भारत में इसके लिए Apprentices Act, 1961 महत्वपूर्ण है।
ठेका श्रमिक (Contract Labour) - जो श्रमिक सीधे मुख्य नियोक्ता द्वारा नियुक्त न होकर ठेकेदार के माध्यम से काम करता है।
संरचना - मुख्य नियोक्ता - ठेकेदार - श्रमिक
उदाहरण - किसी कारखाने की सफाई का काम एक ठेकेदार को दिया गया और ठेकेदार ने सफाईकर्मी नियुक्त किए।
7. संविदा श्रमिक (Contractual Worker) - जिसकी नियुक्ति निश्चित संविदा या अनुबंध के आधार पर होती है।
यह ठेका श्रमिक से अलग अवधारणा हो सकती है। संविदा श्रमिक सीधे नियोक्ता के साथ निश्चित अवधि के रोजगार अनुबंध में हो सकता है, जबकि ठेका श्रमिक सामान्यतः ठेकेदार के माध्यम से कार्य करता है।
बंधुआ श्रमिक (Bonded Labour) - जिस श्रमिक को ऋण या किसी अन्य आर्थिक दायित्व के कारण ऐसी श्रम-व्यवस्था में बाँध दिया जाता है जिसमें उसकी स्वतंत्रता सीमित हो जाती है, उसे बंधुआ श्रमिक कहा जाता है। भारत में बंधुआ मजदूरी प्रतिबंधित है और बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम, 1976 महत्वपूर्ण कानून है।
कुशल, अर्धकुशल और अकुशल श्रमिक -
(क) कुशल श्रमिक (Skilled Worker) - जिसे विशेष तकनीकी ज्ञान या प्रशिक्षण प्राप्त हो।
उदाहरण - इलेक्ट्रीशियन, वेल्डर, मशीन तकनीशियन।
(ख) अर्धकुशल श्रमिक (Semi-skilled Worker) - जिसके पास कुछ विशेष कौशल होता है, लेकिन वह पूर्णतः कुशल श्रमिक के स्तर का नहीं होता।
(ग) अकुशल श्रमिक (Unskilled Worker) - जिस कार्य के लिए विशेष तकनीकी प्रशिक्षण या उच्च कौशल की आवश्यकता नहीं होती।
उदाहरण - सामान्य भार उठाने वाला श्रमिक।
घरेलू श्रमिक (नौकर) (Domestic Worker) - जो किसी घर या परिवार के लिए काम करता है।
उदाहरण - घरेलू सहायक, खाना बनाने वाला, घर की देखभाल करने वाला कर्मचारी आदि।
प्रवासी श्रमिक (Migrant Worker) - जो अपने मूल स्थान से दूसरे राज्य या क्षेत्र में जाकर रोजगार करता है। अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिकों के संबंध में भारतीय श्रम कानूनों में विशेष प्रावधान रहे हैं और वर्तमान श्रम संहिताओं में भी प्रवासी श्रमिकों के लिए प्रावधान किए गए हैं।
गिग श्रमिक (Gig Worker) - जो पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंध के बाहर लचीले या कार्य-आधारित रोजगार में काम करता है।
उदाहरण - ऐप आधारित डिलीवरी या कुछ अन्य प्लेटफॉर्म-आधारित कार्य करने वाले व्यक्ति।
प्लेटफॉर्म श्रमिक (Platform Worker) - जो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म या डिजिटल एप्लिकेशन के माध्यम से कार्य प्राप्त करता है।
उदाहरण - ऐप के माध्यम से डिलीवरी या परिवहन सेवाएँ प्रदान करने वाला व्यक्ति।
आधार - श्रमिक का प्रकार
रोजगार की स्थायित्व - स्थायी, अस्थायी
रोजगार की प्रकृति - आकस्मिक, बदली
नियुक्ति का माध्यम - प्रत्यक्ष, ठेका, संविदा
कौशल - कुशल, अर्धकुशल, अकुशल
प्रशिक्षण - प्रशिक्षु
कार्य का स्थान/प्रकृति - घरेलू, प्रवासी
आधुनिक रोजगार - गिग, प्लेटफॉर्म
शोषण की स्थिति - बंधुआ श्रमिक
श्रम एवं औद्योगिक विधि में।
वेतन संहिता, 2019 (Code on Wages, 2019) की धारा 4 -
समान या समान प्रकृति का कार्य करने वाले श्रमिकों के वेतन में लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। यह प्रावधान पुराने समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 की भावना को आगे बढ़ाता है।
धारा 4 का मूल सिद्धांत - धारा 4 के अनुसार, किसी भी श्रमिक के वेतन की दर निर्धारित करने या रोजगार की शर्तों से संबंधित मामलों में केवल लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता, यदि वह कर्मचारी समान या समान प्रकृति का कार्य कर रहा है।
सरल शब्दों में - काम समान है तो केवल महिला या पुरुष होने के कारण वेतन अलग नहीं किया जा सकता।
उदाहरण - यदि किसी कारखाने में एक पुरुष और एक महिला कर्मचारी दोनों समान योग्यता, समान जिम्मेदारी और समान प्रकार का कार्य करते हैं, तो केवल पुरुष होने के आधार पर पुरुष को ₹25,000 और महिला को ₹20,000 देना कानून की दृष्टि से भेदभावपूर्ण होगा।
समान कार्य का अर्थ - समान कार्य से आशय ऐसा कार्य है जिसमें कार्य की प्रकृति, आवश्यक कौशल, प्रयास और जिम्मेदारी लगभग समान हों तथा कार्य समान परिस्थितियों में किया जा रहा हो।
समान कार्य के चार आधार देखे जाते हैं (क) कौशल (Skill) - दोनों कर्मचारियों के कार्य के लिए आवश्यक कौशल का स्तर समान होना चाहिए।
उदाहरण - पुरुष कर्मचारी मशीन ऑपरेटर है एवं महिला कर्मचारी भी उसी प्रकार की मशीन चलाती है। दोनों के लिए समान तकनीकी दक्षता आवश्यक है तो केवल लिंग के आधार पर वेतन अलग नहीं किया जा सकता।
(ख) प्रयास (Effort) - कार्य करने में लगने वाला मानसिक या शारीरिक प्रयास समान या लगभग समान होना चाहिए। यदि दोनों कर्मचारियों को समान मात्रा में श्रम करना पड़ता है, तो केवल पुरुष और महिला होने के आधार पर अलग-अलग वेतन देना उचित नहीं होगा।
(ग) जिम्मेदारी (Responsibility) -
कार्य के दौरान कर्मचारियों पर पड़ने वाली जिम्मेदारी भी देखी जाती है। यदि दोनों कर्मचारियों की जिम्मेदारियां समान हैं, तो वेतन में केवल लिंग के आधार पर अंतर नहीं किया जा सकता।
(घ) कार्य की परिस्थितियां (Working Conditions) - कार्य जिन परिस्थितियों में किया जा रहा है, वे भी समान या लगभग समान होनी चाहिए। जैसे समान कार्यस्थल, समान शिफ्ट, समान जोखिम, समान कार्य-दायित्व।
समान प्रकृति का कार्य - यह धारा केवल बिल्कुल एक जैसे काम तक सीमित नहीं है। समान प्रकृति का कार्य (Work of a Similar Nature) वह कार्य है जिसमें
• समान स्तर के कौशल की आवश्यकता हो
• समान स्तर का प्रयास करना पड़े
• समान स्तर की जिम्मेदारी हो
• कार्य की परिस्थितियां समान हों
• दोनों कार्यों में अंतर इतना महत्वपूर्ण न हो कि उन्हें अलग-अलग श्रेणी का कार्य माना जाए।
उदाहरण - मान लीजिए किसी कार्यालय में पुरुष कर्मचारी डाटा एंट्री ऑपरेटर है।
महिला कर्मचारी भी डाटा एंट्री ऑपरेटर है।
यदि दोनों का कार्य, जिम्मेदारी और आवश्यक कौशल समान है, तो दोनों को अलग-अलग वेतन देना केवल लिंग के आधार पर उचित नहीं होगा।
कार्य की समानता निर्धारित करने के आधार - धारा 4 को समझते समय केवल पद का नाम (Designation) देखना पर्याप्त नहीं है। मान लीजिए पुरुष का पदनाम Senior Assistant है। महिला का पदनाम Assistant है। लेकिन वास्तविकता में दोनों बिल्कुल समान कार्य कर रहे हैं और दोनों की जिम्मेदारी तथा कौशल समान हैं। ऐसी स्थिति में केवल पदनाम बदल देने से नियोक्ता वेतन में लैंगिक भेदभाव को उचित नहीं ठहरा सकता। अर्थात् वास्तविक कार्य महत्वपूर्ण है, केवल पदनाम नहीं।
वेतन की दर निर्धारित करने में भेदभाव निषिद्ध - धारा 4 का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भेदभाव केवल भुगतान के समय ही नहीं, बल्कि वेतन की दर निर्धारित करते समय भी निषिद्ध है।
उदाहरण - एक कंपनी में समान कार्य के लिए पुरुष कर्मचारी = ₹30,000, महिला कर्मचारी = ₹25,000 है तो एकमात्र कारण लिंग है, तो यह धारा 4 की भावना के विरुद्ध होगा।
रोजगार की शर्तों में भी लैंगिक भेदभाव नहीं - धारा 4 का उद्देश्य केवल वेतन तक सीमित नहीं है। रोजगार से संबंधित परिस्थितियों में भी लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए, जहां समान या समान प्रकृति का कार्य किया जा रहा हो।
उदाहरण - यदि समान कार्य करने वाले पुरुष और महिला कर्मचारियों के लिए वेतन की दर अलग-अलग निर्धारित की जाती है, तो यह निषिद्ध है।
पुरुष और महिला की स्थिति के आधार पर समान वेतन की अवधारणा - यह आवश्यक नहीं है। धारा 4 का अर्थ यह नहीं है कि किसी संस्थान में प्रत्येक पुरुष और प्रत्येक महिला कर्मचारी को समान वेतन मिलना चाहिए। इस कानून का सिद्धांत है समान या समान प्रकृति के कार्य के लिए लिंग के आधार पर वेतन में भेदभाव नहीं। यदि वेतन में अंतर का कोई वास्तविक और वैध आधार है, जैसे अलग पद, अधिक अनुभव, अधिक जिम्मेदारी, अधिक कौशल, अलग कार्य की प्रकृति, अलग कार्य-परिस्थितियां तो केवल उस अंतर के कारण वह लैंगिक भेदभाव नहीं माना जाएगा।
लिंग के आधार पर भेदभाव - धारा 4 का केंद्र gender discrimination है अर्थात् नियोक्ता यह नहीं कह सकता कि यह काम महिलाओं का है, इसलिए वेतन कम होगा।
या पुरुष कर्मचारी हैं, इसलिए उन्हें उसी काम के लिए अधिक वेतन मिलेगा। ऐसा अंतर केवल लिंग के आधार पर होने पर कानून के समानता सिद्धांत के विपरीत होगा।
संवैधानिक आधार - धारा 4 को भारतीय संविधान में समानता प्रावधान -
अनुच्छेद 14 - कानून के समक्ष समानता और कानून का समान संरक्षण।
अनुच्छेद 15 - लिंग सहित कुछ आधारों पर भेदभाव का निषेध।
अनुच्छेद 16 - सरकारी रोजगार में अवसर की समानता।
अनुच्छेद 39(d) - राज्य की नीति के निदेशक तत्वों के अंतर्गत पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन का सिद्धांत।
इस प्रकार, समान कार्य के लिए समान वेतन केवल श्रम कानून का सिद्धांत नहीं है, बल्कि भारतीय संवैधानिक दर्शन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
यहां - यदि किसी को अतिरिक्त तकनीकी जिम्मेदारी दी गई है और उसके कारण उसका वेतन अधिक है, तो स्थिति अलग हो सकती है।
धारा 4 के प्रमुख तत्व -
I समान कार्य या समान प्रकृति के कार्य के लिए लैंगिक भेदभाव निषिद्ध है।
II पुरुष और महिला कर्मचारियों के बीच केवल लिंग के आधार पर वेतन में अंतर नहीं किया जा सकता।
III वेतन की दर निर्धारित करने में भी भेदभाव निषिद्ध है।
IV रोजगार से संबंधित शर्तों में भी लिंग आधारित भेदभाव पर रोक है।
V समानता निर्धारित करने में कौशल, प्रयास, जिम्मेदारी और कार्य-परिस्थितियों को महत्व दिया जाता है।
VI केवल पदनाम समान या अलग होना निर्णायक नहीं है, वास्तविक कार्य की प्रकृति महत्वपूर्ण है।
VII प्रत्येक कर्मचारी को समान वेतन का अधिकार नहीं, बल्कि समान या समान प्रकृति के कार्य के लिए लिंग-निरपेक्ष समान वेतन का अधिकार है।
VIII यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और विशेष रूप से अनुच्छेद 39(d) की भावना को आगे बढ़ाता है।
निष्कर्ष - वेतन संहिता, 2019 की धारा 4 का सार यह है कि काम की कीमत काम से तय होगी, कर्मचारी के लिंग से नहीं।
धारा 9 से 14 न्यूनतम मजदूरी की व्यवस्था -
फ्लोर वेज (Floor Wage), न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण, न्यूनतम मजदूरी की पुनरीक्षा, न्यूनतम मजदूरी की दरों के घटक तथा सामान्य नियम शामिल हैं। इसे परीक्षा की दृष्टि से क्रमवार समझते हैं।
धारा 9 : फ्लोर वेज (Floor Wage) -
अर्थ - फ्लोर वेज का अर्थ ऐसी न्यूनतम मजदूरी से है, जो केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित की जाती है और जिसके नीचे उपयुक्त सरकार द्वारा न्यूनतम मजदूरी निर्धारित नहीं की जा सकती।
फ्लोर वेज = न्यूनतम मजदूरी के लिए देशभर में एक आधारभूत न्यूनतम सीमा।
न्यूनतम मजदूरी अधिनियम की धारा 9 के अनुसार केंद्र सरकार, श्रमिकों के जीवन-स्तर को ध्यान में रखते हुए, फ्लोर वेज निर्धारित कर सकती है।
फ्लोर वेज निर्धारित करते समय केंद्र सरकार निम्न बातों को ध्यान में रखती है - I. श्रमिकों के जीवन-स्तर की आवश्यकताएँ।
II. विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों की सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियाँ।
III. अलग-अलग क्षेत्रों में जीवन-यापन की लागत।
IV. अन्य निर्धारित प्रासंगिक कारक।
क्षेत्रीय अंतर - केंद्र सरकार अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों के लिए अलग-अलग फ्लोर वेज निर्धारित कर सकती है।
उदाहरण - महानगर में जीवन-यापन की लागत किसी ग्रामीण क्षेत्र की तुलना में अधिक हो सकती है। इसलिए दोनों क्षेत्रों के लिए फ्लोर वेज की दर अलग हो सकती है।
महत्वपूर्ण निषेध - उपयुक्त (समेकित) सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी -
फ्लोर वेज से कम नहीं हो सकती। यदि किसी राज्य में पहले से निर्धारित न्यूनतम मजदूरी फ्लोर वेज से अधिक है, तो केवल फ्लोर वेज निर्धारित हो जाने के कारण उस न्यूनतम मजदूरी को कम नहीं किया जा सकता।
उदाहरण - मान लीजिए केंद्र सरकार ने किसी क्षेत्र के लिए फ्लोर वेज ₹500 प्रतिदिन निर्धारित किया। राज्य सरकार की न्यूनतम मजदूरी ₹550 प्रतिदिन है तो राज्य सरकार ₹550 को घटाकर ₹500 नहीं कर सकती अर्थात् फ्लोर वेज एक न्यूनतम आधार है, अधिकतम सीमा नहीं।
न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण - धारा 10 में समेकित सरकार द्वारा न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने की शक्ति एवं दायित्व का प्रावधान है। यहाँ समेकित सरकार से आशय परिस्थितियों के अनुसार केंद्र सरकार अथवा राज्य सरकार से है। न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करते समय सरकार को यह सुनिश्चित करना होता है कि निर्धारित मजदूरी फ्लोर वेज से कम न हो।
न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने के आधार- -
(क) श्रमिक का कौशल - कुशल, अकुशल, अर्द्धकुशल, अति कुशल
(ख) कार्य की प्रकृति - बौद्धिक कार्य, निर्माण कार्य, सेवा कार्य।
(ग) भौगोलिक क्षेत्र - पहाड़ी क्षेत्र, रेगिस्तानी क्षेत्र या समतल क्षेत्र।
(घ) कार्य की कठिनाई - भूमिगत कार्य, सड़क निर्माण
(च) रोजगार की परिस्थितियाँ - स्थाई अस्थाई या सीजनल रोजगार
(छ) न्यूनतम मजदूरी की पुनरीक्षा - न्यूनतम मजदूरी केवल एक बार निर्धारित करके हमेशा के लिए स्थिर नहीं रहती।
न्यूनतम मजदूरी की पुनरीक्षा (Revision) -
पुनरीक्षा क्यों आवश्यक है - समय के साथ महँगाई बढ़ती है वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं जिससे जीवन-यापन की लागत बढ़ती है। समय के अनुसार श्रमिकों की आवश्यकताएँ बदलती हैं जिससे उसकी आर्थिक परिस्थितियों में परिवर्तन होता है।
इसलिए मजदूरी की दरों को समय-समय पर संशोधित करना आवश्यक है।
पुनरीक्षा की अवधि - सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी की दरों की समुचित अंतराल पर पुनरीक्षा या संशोधन किया जाना चाहिए। संहिता यह भी सुनिश्चित करती है कि न्यूनतम मजदूरी व्यवस्था बदलती आर्थिक परिस्थितियों से पूरी तरह कट न जाए। अधिकतम 5 वर्षों में इसकी पुनरीक्षा की जानी चाहिए।
न्यूनतम मजदूरी की दरों का निर्धारण - धारा 12 न्यूनतम मजदूरी की दरों की संरचना को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। न्यूनतम मजदूरी केवल एक साधारण राशि नहीं होती। इसे विभिन्न घटकों के रूप में निर्धारित किया जा सकता है।
न्यूनतम मजदूरी में निम्न घटक -
मूल मजदूरी + महँगाई भत्ता
मजदूरी की मूल दर निर्धारित की जाती है और उसके साथ महँगाई भत्ता (Cost of Living Allowance) जोड़ा जा सकता है।
उदाहरण - मूल मजदूरी = ₹400 और महँगाई भत्ता = ₹100 तो कुल न्यूनतम मजदूरी = ₹500 प्रतिदिन।
मूल मजदूरी (besic pay) + आवश्यक वस्तुओं की रियायती आपूर्ति का नकद मूल्य (DA)
कुछ परिस्थितियों में श्रमिकों को आवश्यक वस्तुएँ रियायती दर पर उपलब्ध कराई जाती हैं। ऐसी रियायत के नकद मूल्य को निर्धारित तरीके से मजदूरी की गणना में शामिल किया जा सकता है।
ऑल-इनक्लूसिव दर - सरकार एक ऐसी न्यूनतम मजदूरी दर भी निर्धारित करती है जिसमें मूल मजदूरी,महँगाई से संबंधित घटक तथा अन्य अनुमत घटक एक ही समेकित दर में शामिल हों।
न्यूनतम मजदूरी की सामान्य दरें - धारा 13 न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने के तरीके से संबंधित है। सरकार विभिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग प्रकार की मजदूरी दर निर्धारित करती है।
(क) समय के आधार पर मजदूरी - प्रति घंटा, प्रतिदिन, प्रति माह। इसे Time Rate कहा जाता है।
उदाहरण - यदि न्यूनतम मजदूरी ₹80 प्रति घंटा है और श्रमिक ने 8 घंटे काम किया है तो ₹80 × 8 = ₹640 अतः निर्धारित परिस्थितियों में उसकी न्यूनतम दैनिक मजदूरी ₹640 होगी।
(ख) उत्पादन के आधार पर मजदूरी - जहाँ कार्य की प्रकृति ऐसी हो कि उत्पादन की मात्रा मापी जा सके, वहाँ Piece Rate निर्धारित की जा सकती है।
उदाहरण - एक वस्तु तैयार करने की न्यूनतम दर ₹20 है। यदि श्रमिक ने 30 वस्तुएँ तैयार कीं तो 30 × ₹20 = ₹600।यहां उसकी मजदूरी ₹600 होगी। लेकिन piece-rate व्यवस्था में भी कानून द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी की सुरक्षा बनी रहती है।
सामान्य कार्य दिवस एवं विश्राम - धारा 14 श्रमिकों के कार्य के घंटों और विश्राम से संबंधित व्यवस्था की गई है। सरकार न्यूनतम मजदूरी से जुड़े नियमों के साथ यह भी निर्धारित कर सकती है कि
• सामान्य कार्य दिवस में कितने घंटे होंगे
• श्रमिक को विश्राम का अंतराल कितना मिलेगा
• सप्ताह में कितने दिन काम कराया जा सकता है
• विश्राम दिवस का प्रावधान क्या होगा।
इसका उद्देश्य यह है कि केवल मजदूरी की न्यूनतम दर निर्धारित करना पर्याप्त न हो, बल्कि श्रमिक से अत्यधिक कार्य भी न कराया जाए।
कार्य के घंटे और ओवरटाइम - कार्य के घंटे और ओवरटाइम का विस्तृत प्रावधान धारा 14 के साथ पढ़ा जाता है, जबकि ओवरटाइम के भुगतान का स्पष्ट प्रावधान वेतन संहिता में आगे की धारा में है। जब किसी कर्मचारी से निर्धारित सामान्य कार्य अवधि से अधिक काम कराया जाता है, तो उसे ओवरटाइम (Overtime) कहा जाता है।
ओवरटाइम की मूल अवधारणा - यदि सामान्य कार्य समय 8 घंटे प्रतिदिन है और कर्मचारी से 10 घंटे काम कराया गया, तो अतिरिक्त 2 घंटे का ओवरटाइम देय होगा जिसकी दर न्यूनतम मजदूरी से दो गुना होगी। अर्थात न्यूनतम मजदूरी 100 रुपए है तो ओवर टाइम 200 रुपए होगा जिसका निर्धारण प्रतिघंटा किया जाता है। इसमें DA की दर नहीं जोड़ी जाएगी।
यदि कर्मचारी ने 3 घंटे ओवरटाइम किया:
₹200 × 3 = ₹600 ओवरटाइम मजदूरी होगी।
8. समेकित धाराएं -
धारा 9 - फ्लोर वेज
धारा 10 - न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण
धारा 11 - न्यूनतम मजदूरी की पुनरीक्षा
धारा 12 - न्यूनतम मजदूरी के घटक
धारा 13 - न्यूनतम मजदूरी की दरें
धारा 14 - सामान्य कार्य दिवस, कार्य के घंटे एवं विश्राम और निर्धारित सामान्य कार्य समय से अधिक काम होने पर ओवरटाइम - कम-से-कम सामान्य मजदूरी की दोगुनी दर।
निष्कर्ष - वेतन संहिता, 2019 की धारा 9 से 14 का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक कर्मचारी को कानून द्वारा संरक्षित न्यूनतम मजदूरी प्राप्त हो, मजदूरी बदलती आर्थिक परिस्थितियों के अनुरूप समय-समय पर संशोधित हो तथा कार्य के समय और अतिरिक्त कार्य के संबंध में श्रमिकों का शोषण न हो। फ्लोर वेज न्यूनतम मजदूरी के लिए आधारभूत सीमा प्रदान करता है, जबकि न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण एवं पुनरीक्षण की जिम्मेदारी उपयुक्त सरकार पर रहती है।
मजदूरी संहिता, 2019 (Code on Wages, 2019) -
भारत के श्रम कानूनों में एक महत्वपूर्ण संहिताकरण है। यह अधिनियम संख्या 29, 2019 है और 8 अगस्त 2019 को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिली। इसका उद्देश्य मजदूरी और बोनस से संबंधित केंद्रीय कानूनों को एकीकृत और सरल करना है।
वर्ष 2026 से यह लागू है।
मजदूरी संहिता, 2019 -
परिचय - मजदूरी संहिता, 2019 का मूल उद्देश्य मजदूरी से संबंधित अलग-अलग केंद्रीय कानूनों को एक ही संहिता में समाहित करना है। इसने निम्न चार केंद्रीय श्रम कानूनों को समाहित किया -
1. मजदूरी संदाय अधिनियम, 1936
2. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948
3. भुगतान बोनस अधिनियम, 1965
4. समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976
इन चार कानूनों को तर्कसंगत बनाकर पूर्व की मजदूरी संहिता में समाहित किया गया है।
मजदूरी संहिता का उद्देश्य -
(1) न्यूनतम मजदूरी की सुरक्षा - प्रत्येक कर्मचारी को निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान न हो।
(2) मजदूरी भुगतान को व्यवस्थित करना - नियोक्ता द्वारा मजदूरी के भुगतान की समय-सीमा और तरीके को विनियमित करना।
(3) लैंगिक समानता - समान या समान प्रकृति के कार्य के संबंध में लिंग के आधार पर मजदूरी में भेदभाव रोकना।
(4) बोनस की व्यवस्था - पात्र कर्मचारियों को वैधानिक बोनस प्रदान करने की व्यवस्था करना।
(5) कानूनों का सरलीकरण - मजदूरी से संबंधित चार अलग-अलग कानूनों की जगह एक व्यापक संहिता बनाना।
संहिता की संरचना -
मजदूरी संहिता में 9 अध्याय और 69 धाराएँ हैं
अध्याय - विषय -
अध्याय I - प्रारंभिक
अध्याय II - न्यूनतम मजदूरी
अध्याय III - मजदूरी का भुगतान
अध्याय IV - बोनस का भुगतान
अध्याय V। - सलाहकार बोर्ड
अध्याय VI - बकाया राशि, दावे एवं लेखा-परीक्षण
अध्याय VII - निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता
अध्याय VIII - अपराध एवं दंड
अध्याय IX - विविध
धारा 2 महत्वपूर्ण परिभाषाएँ - मजदूरी संहिता में प्रयुक्त विभिन्न महत्वपूर्ण शब्दों की परिभाषाएँ दी गई हैं। इनमें विशेष रूप से employee, employer, wages, worker, appropriate Government, accounting year आदि महत्वपूर्ण हैं।
मजदूरी की परिभाषा - मजदूरी उस मौद्रिक पारिश्रमिक को कहते हैं जो कर्मचारी को उसके रोजगार या कार्य के बदले में मिलता है।
इसमें - मूल वेतन, महंगाई भत्ता, प्रतिधारण भत्ता आदि सम्मिलित हैं। कुछ भुगतान/भत्ते परिभाषा में निर्धारित अपवर्जनों के अंतर्गत आते हैं।
50% महंगाई भत्ते का मूल वेतन में विलय का नियम - मजदूरी की गणना में एक महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि यदि निर्धारित अपवर्जित भत्ते कुल पारिश्रमिक के निर्धारित हिस्से से अधिक हो जाते हैं, तो अतिरिक्त राशि को मजदूरी में शामिल किया जा सकता है। यह प्रावधान सामाजिक सुरक्षा संबंधी गणनाओं में भी महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है।
धारा 3 लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध - धारा 3 मजदूरी और भर्ती के क्षेत्र में लिंग-आधारित भेदभाव को रोकती है। यदि दो कर्मचारी समान कार्य या समान प्रकृति का कार्य करते हैं, तो केवल लिंग के आधार पर अलग मजदूरी निर्धारित नहीं की जा सकती।यह पुराने Equal Remuneration Act, 1976 के सिद्धांत को व्यापक मजदूरी संहिता में शामिल करता है।
उदाहरण - यदि पुरुष और महिला कर्मचारी समान प्रकृति का काम कर रहे हैं और दोनों की योग्यता एवं कार्य-शर्तें समान हैं, तो केवल पुरुष होने के कारण उसे अधिक मजदूरी देना कानून के उद्देश्य के विपरीत होगा।
धारा 4 न्यूनतम मजदूरी - यह संहिता का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।पुरानी व्यवस्था में न्यूनतम मजदूरी Scheduled Employments से जुड़ी हुई थी। मजदूरी संहिता न्यूनतम मजदूरी के अधिकार को व्यापक बनाती है और सरकार के अनुसार इसे सभी रोजगारों तक सार्वभौमिक बनाने का उद्देश्य रखती है।
धारा 5 - किसी कर्मचारी को निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान नहीं किया जा सकता। न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण।
धारा 6 न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण से संबंधित है - उचित सरकार विभिन्न कारकों को ध्यान में रखकर न्यूनतम मजदूरी निर्धारित कर सकती है। मजदूरी निर्धारित करते समय विचार किया जाता है
• कार्य की प्रकृति
• कौशल का स्तर
• भौगोलिक क्षेत्र
• कार्य की कठिनाई
• काम की परिस्थितियाँ
• अन्य निर्धारित कारक
इस प्रकार एक ही देश में अलग-अलग प्रकार के कार्य और क्षेत्रों के लिए न्यूनतम मजदूरी अलग हो सकती है।
धारा 7 - न्यूनतम मजदूरी के घटक - न्यूनतम मजदूरी विभिन्न घटकों से मिलकर बन सकती है।
(क) मूल मजदूरी Basic Wage
(ख) जीवन-यापन भत्ता Cost of Living Allowance
(ग) दोनों का संयोजन - मूल मजदूरी तथा जीवन-यापन भत्ते को मिलाकर भी न्यूनतम मजदूरी निर्धारित की जा सकती है।
धारा 8 न्यूनतम मजदूरी का पुनरीक्षण - न्यूनतम मजदूरी निर्धारित एवं संशोधित करने की प्रक्रिया से संबंधित है। इसका उद्देश्य यह है कि न्यूनतम मजदूरी लंबे समय तक स्थिर न रह जाए और आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार उसका पुनरीक्षण हो सके।
धारा 09 - फ्लोर वेज (Floor Wage) - यह मजदूरी संहिता की अत्यंत महत्वपूर्ण विशेषता है। केंद्र सरकार Floor Wage अर्थात् आधारभूत न्यूनतम मजदूरी निर्धारित कर सकती है। राज्य सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी Floor Wage से कम नहीं होनी चाहिए।
उदाहरण - मान लीजिए केंद्र सरकार ने किसी वर्ग के लिए Floor Wage ₹X निर्धारित किया। तब राज्य सरकार उस स्तर से नीचे न्यूनतम मजदूरी निर्धारित नहीं कर सकती।हालाँकि राज्य द्वारा पहले से निर्धारित न्यूनतम मजदूरी यदि Floor Wage से अधिक है तो उसे केवल Floor Wage के कारण कम नहीं किया जाना चाहिए।
धारा 10 - सामान्य कार्य-दिवस से कम काम करने वाले कर्मचारी की मजदूरी - ऐसे कर्मचारी की मजदूरी से संबंधित है जो सामान्य कार्य-दिवस से कम समय काम करता है। कुछ परिस्थितियों में कर्मचारी को उसके द्वारा किए गए कार्य के अनुपात में मजदूरी मिल सकती है।
धारा 11 - दो या अधिक प्रकार का कार्य - यदि कर्मचारी दो या अधिक वर्गों के कार्य करता है तो संबंधित कार्य के लिए लागू मजदूरी दरों के अनुसार भुगतान की व्यवस्था की जाती है।
धारा - 12 Piece Work - कार्य-इकाई के आधार पर मजदूरी पाने वाले कर्मचारियों के लिए न्यूनतम समय-दर से संबंधित व्यवस्था करती है। उद्देश्य यह है कि केवल इसलिए कि कर्मचारी को प्रति इकाई/उत्पादन के आधार पर भुगतान किया जाता है, उसे न्यूनतम वैधानिक मजदूरी से वंचित न किया जाए।
धारा 13 - सामान्य कार्य-दिवस और ओवरटाइम - उचित सरकार सामान्य कार्य-दिवस के संबंध में प्रावधान कर सकती है।
धारा 14 - ओवर टाइम - यदि कर्मचारी निर्धारित सामान्य कार्य-दिवस से अधिक समय काम करता है तो उसे ओवरटाइम के लिए कम-से-कम निर्धारित ओवरटाइम दर पर भुगतान किया जाना है।
धारा 15 - मजदूरी के भुगतान के तरीके - मजदूरी भुगतान मुद्रा, सिक्कों, नोटों, चेक द्वारा, बैंक खाते में जमा करके, अथवा निर्धारित इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भुगतान की जा सकती है, जैसा लागू नियमों में निर्धारित हो।
धारा 16 - मजदूरी की अवधि - नियोक्ता को मजदूरी की अवधि निर्धारित करनी होती है। मजदूरी अवधि - दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक या मासिक हो सकती है, लेकिन निर्धारित सीमा से अधिक अवधि का Wage Period नहीं होना चाहिए।
धारा 17 - मजदूरी के भुगतान की समय - विशेष रूप से रोजगार समाप्त होने की स्थिति में कर्मचारी को देय मजदूरी का समय पर भुगतान सुनिश्चित करने की व्यवस्था है। इसका उद्देश्य कर्मचारी को नौकरी समाप्त होने के बाद अपनी मजदूरी के लिए अनिश्चितकाल तक प्रतीक्षा करने से बचाना है।
धारा 18 - मजदूरी में कटौती - नियोक्ता कर्मचारी की मजदूरी में मनमाने ढंग से कटौती नहीं कर सकता। केवल कानून द्वारा अनुमत परिस्थितियों में ही कटौती की जा सकती है। इसके बाद की धाराओं में विशेष कटौतियों से संबंधित प्रावधान हैं।
धारा 19 – जुर्माना
धारा 20 – ड्यूटी से अनुपस्थिति
धारा 21 – नुकसान या क्षति
धारा 22 – सेवाओं के लिए कटौती
धारा 23 – अग्रिम की वसूली
धारा 24 – ऋण की वसूली
बोनस - मजदूरी संहिता ने Payment of Bonus Act, 1965 को भी अपने भीतर समाहित किया है।
बोनस की पात्रता - सरकार के आधिकारिक विवरण के अनुसार, निर्धारित वेतन सीमा के भीतर आने वाला कर्मचारी जिसने संबंधित accounting year में कम-से-कम 30 दिन काम किया हो, वैधानिक बोनस के लिए पात्र हो सकता है। न्यूनतम बोनस की दर 8.33% बताई गई है, subject to the statutory conditions. बोनस की अधिकतम सीमा - संहिता में बोनस के संबंध में 26% तक की अधिकतम दर का प्रावधान किया गया है, वैधानिक शर्तों के अधीन।
सलाहकार बोर्ड - अध्याय V में - Advisory Board की व्यवस्था है।
इसमें केंद्रीय सलाहकार बोर्ड एवं राज्य सलाहकार बोर्ड की व्यवस्था है। जिनका उद्देश्य सरकार को मजदूरी से संबंधित मामलों में सलाह देना है।
विशेष रूप से - न्यूनतम मजदूरी
महिलाओं के रोजगार, मजदूरी नीति
संबंधित श्रम विषयों पर सलाह महत्वपूर्ण होती है।
मजदूरी के दावे - अध्याय VI में कर्मचारियों के मजदूरी संबंधी दावों के निपटारे की व्यवस्था है। यदि कर्मचारी को न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान हुआ।
मजदूरी का भुगतान नहीं हुआ या अवैध कटौती हुई या बोनस आदि का वैधानिक भुगतान नहीं मिला तो वह निर्धारित प्राधिकारी के समक्ष दावा कर सकता है।
Inspector-cum-Facilitator - यह संहिता की आधुनिक विशेषताओं में से एक है। पुरानी निरीक्षण व्यवस्था में Inspector की भूमिका प्रमुख थी। नई व्यवस्था में Inspector - cum -Facilitator की अवधारणा अपनाई गई है। इसका उद्देश्य केवल उल्लंघन पकड़ना नहीं बल्कि नियोक्ताओं और प्रतिष्ठानों को कानून का अनुपालन करने में मार्गदर्शन देना भी है। इससे निरीक्षण व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और तकनीक-आधारित बनाने का उद्देश्य है।
अपराध और दंड - अध्याय VIII अपराधों और दंड से संबंधित है। यदि नियोक्ता - न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान करता है या मजदूरी के वैधानिक भुगतान का उल्लंघन करता है या बोनस संबंधी प्रावधानों का उल्लंघन करता है या संहिता के अन्य महत्वपूर्ण प्रावधानों का उल्लंघन करता है तो उसके विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई और दंड का प्रावधान है। कुछ परिस्थितियों में पहली बार हुए अपराधों के लिए compounding की व्यवस्था भी है जो कानून के प्रवर्तन को अधिक व्यावहारिक बनाने का प्रयास है।
नियोक्ता और कर्मचारी के अधिकारों का संतुलन - मजदूरी संहिता का उद्देश्य केवल कर्मचारी को न्यूनतम मजदूरी देना नहीं है, बल्कि - नियोक्ता की वैधानिक जिम्मेदारी + कर्मचारी का मजदूरी अधिकार + प्रशासनिक अनुपालन तीनों को एक व्यवस्था में लाना है। इसीलिए इसमें Minimum Wage - Payment - Deductions - Bonus - Claims - Inspection - Penalty की पूरी श्रृंखला बनाई गई है।
इस प्रकार इसमें पुराने चार कानूनों के प्रमुख विषयों को एक संहिता में लाया गया है।
मजदूरी संहिता 2019 की विशेषताएँ -
1 चार केंद्रीय श्रम कानूनों का एकीकरण।
2 न्यूनतम मजदूरी के अधिकार का विस्तार।
3 Floor Wage की व्यवस्था।
4 लिंग आधारित मजदूरी भेदभाव का निषेध।
5 समान या समान प्रकृति के कार्य के लिए समान पारिश्रमिक का सिद्धांत।
6 न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण और पुनरीक्षण की व्यवस्था।
7 ओवरटाइम मजदूरी की व्यवस्था।
8 मजदूरी भुगतान की समय-सीमा।
9 मजदूरी से केवल वैधानिक कटौती।
10 बोनस की व्यवस्था।
11 Central और State Advisory Boards
12 Inspector - cum - Facilitator की व्यवस्था।
13 मजदूरी संबंधी दावों के निपटारे की व्यवस्था।
14 अपराध एवं दंड का प्रावधान।
15 कानून को सरल और अधिक व्यापक बनाने का प्रयास।
मजदूरी संहिता का महत्व - इस संहिता का सबसे बड़ा महत्व यह है कि मजदूरी संबंधी कानूनों को अलग-अलग कानूनों में खोजने के बजाय एक ही व्यापक कानून में व्यवस्थित किया गया है। विशेष रूप से न्यूनतम मजदूरी को व्यापक बनाना और Floor Wage की अवधारणा इसके महत्वपूर्ण पहलू हैं।
महत्वपूर्ण आलोचनात्मक पक्ष - कानून की प्रमुख चुनौतियाँ -
(1) राज्य-स्तरीय नियम और क्रियान्वयन - श्रम संविधान की समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए केंद्र और राज्य दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण है।
(2) असंगठित क्षेत्र - भारत में बड़ी संख्या में श्रमिक असंगठित क्षेत्र में हैं। कानून में अधिकार होना और उनका वास्तविक प्रवर्तन होना दो अलग बातें हैं।
(3) न्यूनतम मजदूरी का वास्तविक भुगतान - न्यूनतम मजदूरी निर्धारित होने के बावजूद प्रभावी निरीक्षण और श्रमिकों में कानूनी जागरूकता आवश्यक है।
(4) मजदूरी की नई परिभाषा - भत्तों और मजदूरी की गणना से संबंधित नियमों का प्रभाव कर्मचारी और नियोक्ता दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
मजदूरी संहिता - 2019 भारतीय श्रम कानूनों के संहिताकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसने Payment of Wages Act, Minimum Wages Act, Payment of Bonus Act और Equal Remuneration Act को एकीकृत कर मजदूरी संबंधी कानून को एक व्यापक ढाँचा दिया। इसकी प्रमुख विशेषताओं में सार्वभौमिक न्यूनतम मजदूरी, Floor Wage, लैंगिक भेदभाव का निषेध, समय पर मजदूरी भुगतान, वैध कटौतियाँ, बोनस, दावा-निवारण और Inspector-cum-Facilitator व्यवस्था प्रमुख हैं।
सबसे जरूरी धाराएँ याद रखें -
धारा 3 - लिंग भेदभाव निषेध
धारा 5 - न्यूनतम मजदूरी का भुगतान
धारा 6 - न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण
धारा 7 - न्यूनतम मजदूरी के घटक
धारा 8 - निर्धारण/पुनरीक्षण की प्रक्रिया
धारा 9 - Floor Wage
धारा 14 - ओवरटाइम
धारा 15 - मजदूरी भुगतान का तरीका
धारा 17 - मजदूरी भुगतान की समय-सीमा
धारा 18 - कटौती
धारा 26 आगे - बोनस
अध्याय VII - Inspector-cum-Facilitator
अध्याय VIII - अपराध एवं दंड।
मजदूरी भुगतान अधिनियम(Payment of Wages Act, 1936) -
यह अधिनियम श्रमिकों को समय पर बिना अनधिकृत कटौती के मजदूरी दिलाने हेतु 1936 में बनाया गया।
महत्वपूर्ण वर्तमान स्थिति -
21 नवंबर 2025 से Code on Wages, 2019 के प्रासंगिक प्रावधान लागू किए गए हैं और Payment of Wages Act, 1936 को नए वेतन-संहिता ढाँचे में समाहित किया गया है। इस अधिनियम में
धारा 2 महत्वपूर्ण परिभाषाएँ
धारा 3 मजदूरी के भुगतान की जिम्मेदारी
धारा 4 मजदूरी अवधि का निर्धारण
धारा 5 मजदूरी भुगतान का समय
धारा 6 मजदूरी भुगतान का माध्यम
धारा 7 मजदूरी से कटौती
धारा 8 जुर्माना
धारा 9 अनुपस्थिति के लिए कटौती
धारा 10 जुर्माने की वसूली
धारा 11 जुर्माना लगाने की प्रक्रिया
धारा 12 जुर्माने की राशि का उपयोग
धारा 13 कटौती संबंधी अतिरिक्त प्रावधान
धारा 14 निरीक्षक
धारा 15 अवैध कटौती/मजदूरी में देरी के दावे
धारा 16 एक ही कर्मचारी के दावों संबंधी प्रावधान
धारा 17 अपील
धारा 18 रिकॉर्ड एवं रजिस्टर
धारा 20 दंड
धारा 21 दंड संबंधी अन्य प्रावधान
1. अधिनियम का परिचय -
Payment of Wages Act, 1936 भारत में मजदूरों को उनकी मजदूरी के भुगतान में होने वाली देरी तथा मनमानी कटौतियों से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया था जिसका मूल उद्देश्य-
1. मजदूरी का समय पर भुगतान सुनिश्चित करना।
2. मजदूरी से की जाने वाली अनधिकृत कटौतियों पर रोक लगाना।
3. नियोक्ता द्वारा मजदूरी रोकने या कम करने की मनमानी को नियंत्रित करना।
4. मजदूर को अपनी मजदूरी संबंधी शिकायत के लिए कानूनी उपचार उपलब्ध कराना।
अर्थात् अधिनियम का मूल सिद्धांत था -
“मजदूर ने जो मजदूरी अर्जित की है, उसे उसे निर्धारित समय पर और विधि-सम्मत कटौती के बाद ही दिया जाए।”
2. अधिनियम का उद्देश्य -
इस अधिनियम के प्रमुख उद्देश्य निम्न हैं -
(1) समय पर मजदूरी का भुगतान - नियोक्ता मजदूर की मजदूरी को अनिश्चित समय तक नहीं रोक सकता।
(2) अनधिकृत कटौती से सुरक्षा - नियोक्ता अपनी इच्छा से मजदूरी में कटौती नहीं कर सकता। केवल अधिनियम द्वारा अनुमत कटौतियाँ ही की जा सकती थीं।
(3) मजदूरों का आर्थिक संरक्षण - मजदूरी श्रमिक की आजीविका का मुख्य साधन है। इसलिए मजदूरी के भुगतान में अनुचित देरी श्रमिक के परिवार के जीवन को सीधे प्रभावित करती है।
(4) नियोक्ता की जवाबदेही - अधिनियम ने यह निर्धारित किया कि मजदूरी का भुगतान करने के लिए कौन जिम्मेदार होगा।
3. महत्वपूर्ण परिभाषाएँ -
(1) समुचित सरकार (Appropriate Government) - अधिनियम में appropriate Government का अर्थ संबंधित प्रतिष्ठान के अनुसार केंद्र या राज्य सरकार से था।
(2) नियोक्ता (Employer) - नियोक्ता वह व्यक्ति है जो श्रमिक को रोजगार देता है और मजदूरी का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होता है।
(ग) मजदूरी (Wages) - धारा 2(vi) में मजदूरी की विस्तृत परिभाषा दी गई है कि
सामान्य रूप से मजदूरी से आशय उस धनराशि से है जो कर्मचारी को उसके रोजगार या किए गए कार्य के बदले देय होती है। इसमें परिस्थितियों के अनुसार निम्न प्रकार की राशियाँ शामिल हो सकती थीं -
A. वेतन
2. भत्ते
3. अतिरिक्त कार्य का भुगतान
4. रोजगार की शर्तों के अनुसार देय अन्य पारिश्रमिक
लेकिन प्रत्येक प्रकार की राशि स्वतः मजदूरी (wages) नहीं बन जाती। इस अधिनियम में कुछ मदों को स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया था।
4. मजदूरी भुगतान अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ -
(1) मजदूरी भुगतान की जिम्मेदारी -
अधिनियम ने यह सुनिश्चित किया कि मजदूरी भुगतान के लिए जिम्मेदार व्यक्ति निर्धारित हो। यदि किसी कारखाने में मजदूरी का भुगतान होना है तो केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि मजदूरी का भुगतान किसी और की जिम्मेदारी थी।
5. मजदूरी की भुगतान-अवधि -
धारा 4 के अनुसार नियोक्ता को मजदूरी की अवधि निर्धारित करनी होती थी।
मजदूरी की अवधि एक महीने से अधिक नहीं हो सकती थी। अर्थात् नियोक्ता मजदूरी की अवधि को मनमाने ढंग से दो या तीन महीने का नहीं बना सकता था।
6. मजदूरी भुगतान की समय-सीमा -
यह अधिनियम का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है। धारा 5 मजदूरी के भुगतान के समय से संबंधित थी। सामान्य नियम के अनुसार मजदूरी का भुगतान निर्धारित समय के भीतर किया जाना आवश्यक था।
विशेष रूप से यदि किसी प्रतिष्ठान में 1,000 से कम श्रमिक थे तो मजदूरी अवधि समाप्त होने के बाद निर्धारित समय के भीतर भुगतान करना आवश्यक था।
यदि 1,000 या उससे अधिक श्रमिक थे तो
भुगतान के लिए अपेक्षाकृत अधिक समय की अनुमति थी।
रोजगार समाप्त होने की स्थिति में कर्मचारी की अर्जित मजदूरी का भुगतान सामान्यतः दो कार्य दिवसों के भीतर किया जाना था। यह प्रावधान श्रमिक को नौकरी समाप्त होने के बाद भी अपनी अर्जित मजदूरी प्राप्त करने की सुरक्षा देता था।
7. मजदूरी के भुगतान माध्यम -
धारा 6 के अंतर्गत मजदूरी का भुगतान मुख्यत -
A.मुद्रा/सिक्कों/नोटों में
B.चेक द्वारा
C.बैंक खाते में जमा करके
अधिनियम में निर्धारित शर्तों के अधीन किया जा सकता था। समय के साथ बैंकिंग और डिजिटल भुगतान व्यवस्था विकसित होने के कारण भुगतान की पद्धतियों में भी परिवर्तन हुआ।
8. मजदूरी से कटौती -
यह अधिनियम का सबसे महत्वपूर्ण विषय है। धारा 7 के अनुसार मजदूरी से कोई भी कटौती तभी की जा सकती थी जब वह अधिनियम द्वारा अधिकृत हो। अर्थात् सामान्य सिद्धांत - “कटौती निषिद्ध है, जब तक कि कानून उसे अनुमति न देता हो।”
9. अनुमत कटौतियाँ -
अधिनियम के अंतर्गत विभिन्न परिस्थितियों में कटौती की अनुमति थी। जिनमें प्रमुख कटौतियाँ -
1. जुर्माना (Fine) - कर्मचारी पर निर्धारित नियमों के अनुसार जुर्माना लगाया जा सकता था। इसके लिए कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक था।
2. अनुपस्थिति - यदि कर्मचारी ड्यूटी से अनुपस्थित रहा तो संबंधित अवधि की मजदूरी में कटौती की जा सकती थी।
3. कर्मचारी द्वारा की गई क्षति या हानि - यदि कर्मचारी की गलती या लापरवाही से नियोक्ता की संपत्ति को नुकसान हुआ तो कानून में निर्धारित शर्तों के अधीन कटौती की जा सकती थी।
4. आवास - नियोक्ता द्वारा उपलब्ध कराए गए आवास के लिए निर्धारित राशि की कटौती।
5. सुविधाएँ और सेवाएँ - नियोक्ता द्वारा दी गई कुछ सुविधाओं या सेवाओं के लिए अधिकृत कटौती।
6. अग्रिम राशि - कर्मचारी को दिए गए वेतन-अग्रिम की वसूली।
7. ऋण - कर्मचारी द्वारा लिए गए ऋण की वसूली, कानून की शर्तों के अधीन।
8. आयकर - कानून के अनुसार देय आयकर की कटौती।
9. भविष्य निधि - मान्य Provident Fund में कर्मचारी के अंशदान की कटौती।
10. सहकारी समितियाँ - कर्मचारी की सहकारी समिति से संबंधित कुछ देयताओं की वसूली।
11. बीमा - कुछ परिस्थितियों में बीमा संबंधी भुगतान।
10. कटौती की अधिकतम सीमा - कानून ने यह भी सुनिश्चित किया कि नियोक्ता मजदूरी का बहुत बड़ा हिस्सा काटकर कर्मचारी को लगभग खाली हाथ न छोड़ दे। सामान्यतः अनुमत कटौतियों की कुल मात्रा पर 50% की सीमा थी। जहाँ कटौती सहकारी समितियों को भुगतान के लिए थी, वहाँ निर्धारित परिस्थितियों में यह सीमा 75% तक हो सकती थी। इसका उद्देश्य था कि श्रमिक की मजदूरी का पर्याप्त हिस्सा उसके जीवन-यापन के लिए सुरक्षित रहे।
11. जुर्माना लगाने के संबंध में नियम -
धारा 8 के अंतर्गत कर्मचारी पर जुर्माना लगाने के संबंध में विशेष नियम थे, नियोक्ता मनमाने ढंग से जुर्माना नहीं लगा सकता था। इसके लिए आवश्यक था कि कर्मचारी को -
A.निर्धारित कृत्य या चूक की जानकारी होना
B.कर्मचारी को संबंधित प्रक्रिया के अनुसार अवसर देना,
C.कानून द्वारा निर्धारित सीमा का पालन करना।
12. जुर्माने की सीमा -
जुर्माने की राशि पर भी कानून ने सीमा निर्धारित की थी। एक मजदूरी अवधि में लगाया जाने वाला जुर्माना कर्मचारी की मजदूरी के 3% से अधिक नहीं हो सकता था। इसका उद्देश्य यह था कि मामूली गलती के नाम पर कर्मचारी की पूरी मजदूरी न छीनी जा सके।
13. क्षति या हानि के लिए कटौती -
यदि कर्मचारी की लापरवाही या गलती के कारण नियोक्ता को आर्थिक नुकसान हुआ, तो नियोक्ता निर्धारित शर्तों के अधीन मजदूरी से कटौती कर सकता था। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि नियोक्ता को केवल वास्तविक और सिद्ध नुकसान के आधार पर कानून के अनुसार कार्रवाई करनी थी। वह मनमाने ढंग से कोई भी रकम नहीं काट सकता था।
14. अनुपस्थिति के लिए कटौती -
यदि कर्मचारी काम से अनुपस्थित रहता था तो अनुपस्थिति की अवधि के अनुपात में मजदूरी काटी जा सकती थी। उदाहरण के लिए मान लीजिए कर्मचारी की दैनिक मजदूरी ₹600 है और वह एक दिन बिना वैध कारण अनुपस्थित रहा, तो उस दिन की मजदूरी की कटौती की जा सकती है।
लेकिन इससे अलग किसी अतिरिक्त दंड की कटौती स्वतः वैध नहीं हो जाती।
15. मजदूरी से अवैध कटौती होने पर उपचार -
यह मजदूर के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सुरक्षा थी। धारा 15 के अंतर्गत कर्मचारी अपनी मजदूरी से की गई अवैध कटौती, या मजदूरी के भुगतान में हुई देरी के संबंध में निर्धारित प्राधिकारी के सामने दावा प्रस्तुत कर सकता था। प्राधिकारी मामले की सुनवाई करके उचित आदेश दे सकता था।
16. दावा कौन कर सकता है -
निर्धारित परिस्थितियों में -
A.स्वयं कर्मचारी
B.उसका अधिकृत प्रतिनिधि
C.पंजीकृत ट्रेड यूनियन का अधिकारी
निरीक्षक
D.अथवा कानून में निर्धारित अन्य व्यक्ति
दावा प्रस्तुत कर सकता था।
इससे मजदूर को अकेले कानूनी लड़ाई लड़ने की आवश्यकता कम होती थी।
17. प्राधिकारी की शक्तियाँ -
दावा सुनने वाला प्राधिकारी -
A.पक्षकारों को सुनना
B.साक्ष्य लेना
C.दस्तावेज संकलन
D.अवैध कटौती की राशि वापस दिलवाना
E.देरी के कारण उचित अतिरिक्त भुगतान का आदेश करना।
इस प्रकार यह केवल शिकायत दर्ज करने की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि क्षतिपूर्ति दिलाने की प्रभावी व्यवस्था भी थी।
18. निरीक्षक की भूमिका -
अधिनियम में Inspectors की व्यवस्था की गई जिसका उद्देश्य यह देखना था कि - A.मजदूरी समय पर दी जा रही है या नहीं,
B.अवैध कटौती तो नहीं की जा रही,
C.नियोक्ता आवश्यक अभिलेख रख रहा है या नहीं,
D.कानून के प्रावधानों का पालन हो रहा है या नहीं।
निरीक्षक को कानून के अनुसार प्रतिष्ठान की जांच करने तथा आवश्यक दस्तावेज देखने की शक्ति प्राप्त थी।
19. नियोक्ता के अभिलेख -
नियोक्ता को मजदूरी से संबंधित आवश्यक
A.रजिस्टर,
B.रिकॉर्ड,
C.भुगतान संबंधी विवरण
रखने होते थे। इसका महत्व यह था कि विवाद होने पर यह पता लगाया जा सके कि किस कर्मचारी को कितनी मजदूरी देय थी और कितनी राशि वास्तव में भुगतान की गई।
20. अधिनियम के उल्लंघन पर दंड
यदि नियोक्ता मजदूरी का समय पर भुगतान नहीं करता है या अवैध कटौती करता या कानून के अनुसार रिकॉर्ड नहीं रखता या निरीक्षक के कार्य में बाधा डालता तो उसके विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती थी।
दंड की प्रकृति और मात्रा संबंधित प्रावधान तथा उल्लंघन के प्रकार पर निर्भर करती थी।
एक सरल उदाहरण - मान लीजिए राम एक कारखाने में काम करता है। उसकी मासिक मजदूरी ₹20,000 है। माह समाप्त होने के बाद नियोक्ता कहता है कि
“कंपनी की स्थिति खराब है, इसलिए इस महीने ₹8,000 अभी रोक रहे हैं।”
यदि ऐसी रोक या कटौती कानून के अंतर्गत अधिकृत नहीं है, तो नियोक्ता केवल अपनी इच्छा से मजदूरी नहीं रोक सकता। इसी प्रकार यदि नियोक्ता कहता है कि “तुमसे मशीन को नुकसान हुआ है, इसलिए ₹10,000 काट लिए।”
तो यह भी स्वतः वैध नहीं होगा। कटौती कानून में निर्धारित शर्तों के अनुरूप होनी चाहिए। यही Payment of Wages Act का मूल दर्शन है।
इस अधिनियम का सामाजिक महत्व -
इस कानून का महत्व केवल मजदूरी दिलाने तक सीमित नहीं था। यह श्रमिक और नियोक्ता के बीच आर्थिक शक्ति के असंतुलन को कम करने का प्रयास था।
श्रमिक की स्थिति अक्सर ऐसी होती है कि
काम आज → मजदूरी समय पर → परिवार का जीवन सुरक्षित। यदि मजदूरी रोक दी जाए तो उसका प्रभाव केवल कर्मचारी पर नहीं बल्कि पूरे परिवार पर पड़ता है। समय पर मजदूरी का भुगतान वास्तव में सामाजिक न्याय का विषय है।
मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936 भारतीय श्रम-कानूनों के इतिहास में श्रमिक संरक्षण का महत्वपूर्ण कानून था। इसका मूल उद्देश्य श्रमिक को उसकी अर्जित मजदूरी समय पर दिलाना तथा नियोक्ता द्वारा मनमानी एवं अनधिकृत कटौती को रोकना था। इस अधिनियम ने मजदूरी भुगतान की अवधि, भुगतान के समय, अनुमत कटौतियों, जुर्माने, निरीक्षण तथा अवैध कटौती और मजदूरी में देरी के विरुद्ध दावा करने की व्यवस्था की। इस प्रकार अधिनियम ने श्रमिकों के आर्थिक हितों की रक्षा करते हुए औद्योगिक संबंधों में न्याय और अनुशासन स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्तमान में इसके विषयों को Code on Wages, 2019 के व्यापक वेतन-कानून ढाँचे में समाहित किया गया है।
मजदूर की मजदूरी उसका पसीना सूखने से पहले मिल जानी चाहिए।
न्यूनतम मजदूरी अधिनियम - (Minimum Wages Act, 1948) -
श्रमिकों के शोषण को रोकने और उन्हें उनके काम के लिए एक कानूनी न्यूनतम पारिश्रमिक दिलाने वाला महत्वपूर्ण श्रम कानून था। परीक्षा की दृष्टि से इसे उद्देश्य, क्षेत्र, प्रमुख परिभाषाएँ, न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण, संशोधन, भुगतान, निरीक्षण, दंड और न्यायिक निर्णयों के आधार पर समझना उपयोगी है।
महत्वपूर्ण वर्तमान स्थिति -
न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 को Code on Wages, 2019 द्वारा निरस्त (repeal) किया गया है। इसलिए यदि प्रश्न विशेष रूप से 1948 के अधिनियम पर है, तो नीचे उसका ऐतिहासिक/कानूनी स्वरूप -
1. अधिनियम का परिचय -
न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 भारत में 15 मार्च 1948 को अधिनियमित किया गया था। इसका मूल उद्देश्य ऐसे अनुसूचित रोजगारों में काम करने वाले श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करना था, जहाँ श्रमिकों की सौदेबाजी की शक्ति कमजोर थी और नियोक्ता कम मजदूरी देने की स्थिति में होते थे। इस कानून का मूल विचार था - “श्रमिक को इतनी कम मजदूरी न मिले कि वह अपने श्रम के बावजूद जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा न कर सके।”
इसलिए यह केवल मजदूरी का निर्धारण करने वाला कानून नहीं था, बल्कि श्रमिकों के आर्थिक शोषण के विरुद्ध सुरक्षा-कवच था।
2. अधिनियम के प्रमुख उद्देश्य -
1. श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी प्रदान करना।
2. कम मजदूरी देकर श्रमिकों के शोषण को रोकना।
3. विभिन्न अनुसूचित रोजगारों में मजदूरी की न्यूनतम सीमा निर्धारित करना।
4. महँगाई के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए मजदूरी में आवश्यक संशोधन करना।
5. मजदूरी भुगतान में पारदर्शिता और नियमितता सुनिश्चित करना।
6. श्रमिकों को निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान होने पर कानूनी उपचार देना।
3. अधिनियम का क्षेत्र -
अधिनियम की विशेषता यह थी कि यह प्रारंभ में “Scheduled Employments” अर्थात अनुसूचित रोजगारों पर लागू होता था। अनुसूचित रोजगारों में समय-समय पर केंद्र या राज्य सरकार द्वारा ऐसे रोजगार शामिल किए जा सकते थे जहाँ मजदूरों का शोषण होने की संभावना अधिक थी।
उदाहरण के लिए विभिन्न क्षेत्रों में , कृषि संबंधी रोजगार, निर्माण कार्य, पत्थर की खदानें, बीड़ी उद्योग, कपड़ा उद्योग, सड़क निर्माण, ईंट-भट्टे व अन्य अधिसूचित रोजगार आदि शामिल हो सकते थे।
4. न्यूनतम मजदूरी का अर्थ
न्यूनतम मजदूरी वह न्यूनतम पारिश्रमिक है जिसे कानून के अनुसार नियोक्ता को निर्धारित रोजगार में श्रमिक को देना अनिवार्य था। अर्थात नियोक्ता और श्रमिक आपसी समझौते से ऐसी मजदूरी तय नहीं कर सकते थे जो सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम हो। यहाँ एक महत्वपूर्ण बात है कि न्यूनतम मजदूरी कोई अधिकतम सीमा नहीं थी। नियोक्ता श्रमिक को न्यूनतम मजदूरी से अधिक भुगतान कर सकता था, लेकिन निर्धारित न्यूनतम से कम भुगतान करना कानून के विपरीत था।
5. न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने की शक्ति -
अधिनियम के अंतर्गत उचित सरकार (Appropriate Government) को न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने की शक्ति दी गई थी। केंद्रीय क्षेत्र के कुछ रोजगारों के लिए केंद्र सरकार राज्य क्षेत्र के रोजगारों के लिए राज्य सरकार न्यूनतम मजदूरी निर्धारित कर सकती थी। सरकार अलग-अलग रोजगारों, श्रमिकों की श्रेणियों तथा क्षेत्रों के लिए अलग-अलग दरें निर्धारित कर सकती थी।
6. न्यूनतम मजदूरी की दरों के प्रकार -
अधिनियम के अंतर्गत मजदूरी की दरें मुख्यतः निम्न प्रकार से निर्धारित की जा सकती थीं -
(क) समय-दर - श्रमिक को काम किए गए समय के आधार पर मजदूरी मिलती है जैसे प्रति घंटा, प्रतिदिन, प्रति सप्ताह, अन्य निर्धारित समय पर एक माह से अधिक नहीं।
(ख) टुकड़ा-दर - श्रमिक को उसके द्वारा किए गए काम या उत्पादित वस्तुओं की मात्रा के आधार पर मजदूरी दी जाती है।
उदाहरण - यदि किसी श्रमिक को प्रत्येक 100 इकाई उत्पादन के लिए ₹500 मिलते हैं, तो यह टुकड़ा-दर का उदाहरण है।
(ग) गारंटीकृत समय-दर - कुछ परिस्थितियों में टुकड़ा-दर पर काम करने वाले श्रमिक को एक निश्चित न्यूनतम मजदूरी की गारंटी दी जा सकती थी, इसका उद्देश्य यह था कि उत्पादन कम होने की स्थिति में भी श्रमिक बिल्कुल न्यूनतम आय से वंचित न हो जाए।
(घ) ओवरटाइम दर - यदि श्रमिक निर्धारित सामान्य कार्य-समय से अधिक काम करता था तो उसे कानून के अनुसार ओवरटाइम मजदूरी प्राप्त हो सकती थी।
7. मजदूरी में महँगाई भत्ता -
न्यूनतम मजदूरी व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण तत्व था महँगाई भत्ता (Dearness Allowance)। महँगाई बढ़ने पर केवल मूल मजदूरी स्थिर रहने से श्रमिक की वास्तविक क्रय-शक्ति कम हो जाती है। इसलिए न्यूनतम मजदूरी में महँगाई से संबंधित घटक को शामिल किया जा सकता था। इसे मूल मजदूरी + महँगाई भत्ता = न्यूनतम मजदूरी के रूप में समझ सकते हैं।
8. न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण -
सरकार मजदूरी निर्धारित करते समय विभिन्न आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रख सकती थी, जैसे श्रमिकों की आवश्यकताएँ, जीवन-यापन की लागत, रोजगार की प्रकृति, क्षेत्रीय परिस्थितियाँ, महँगाई, कार्य की कठिनाई, श्रमिकों की श्रेणी, उद्योग की परिस्थितियाँ आदि, इसका उद्देश्य मजदूरी को केवल नियोक्ता की क्षमता से नहीं, बल्कि श्रमिक के न्यूनतम जीवन-निर्वाह से जोड़ना था।
9. न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने की प्रक्रिया -
अधिनियम ने सरकार को न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने के लिए दो प्रमुख प्रक्रियाएँ प्रदान की थीं।
1. समिति पद्धति - सरकार समितियाँ और उप-समितियाँ नियुक्त कर सकती थी। ये समितियाँ संबंधित रोजगार का अध्ययन, मजदूरी की परिस्थितियों का परीक्षण, श्रमिकों और नियोक्ताओं की स्थिति का अध्ययन, और सरकार को अपनी सिफारिशें देती थीं। इसके बाद सरकार उचित अधिसूचना द्वारा मजदूरी निर्धारित कर सकती थी।
अधिसूचना पद्धति - सरकार प्रस्तावित न्यूनतम मजदूरी की दरों को प्रकाशित करके संबंधित व्यक्तियों से आपत्तियाँ और सुझाव आमंत्रित कर सकती थी। प्राप्त सुझावों पर विचार करने के बाद सरकार अंतिम दरें निर्धारित करती थी।
10. न्यूनतम मजदूरी का पुनरीक्षण -
न्यूनतम मजदूरी हमेशा के लिए एक ही दर पर नहीं रह सकती थी। अधिनियम के अनुसार सरकार को समय-समय पर न्यूनतम मजदूरी की दरों की समीक्षा और आवश्यकतानुसार संशोधन करना था।
सामान्यतः पाँच वर्ष से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए था। इसका कारण स्पष्ट है यदि 1948 में तय मजदूरी को दशकों तक नहीं बदला जाए तो महँगाई के कारण वह मजदूरी वास्तविक अर्थ में न्यूनतम जीवन-निर्वाह की मजदूरी नहीं रह जाएगी।
11. मजदूरी से संबंधित महत्वपूर्ण घटक - Minimum wages were not a concept limited to just “basic wages." न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करते समय निम्न तत्वों को शामिल किया जा सकता था -
1. मूल मजदूरी
2. महँगाई भत्ता
3. आवश्यक वस्तुओं के संबंध में रियायती मूल्य
4. अन्य निर्धारित घटक।
12. मजदूरी से कम भुगतान का निषेध -
अधिनियम का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत था कि निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान नहीं किया जा सकता। यदि सरकार ने किसी रोजगार के लिए ₹X प्रतिदिन न्यूनतम मजदूरी निर्धारित की है, तो नियोक्ता श्रमिक को ₹X से कम भुगतान करके यह नहीं कह सकता कि श्रमिक ने कम मजदूरी पर काम करने की सहमति दी थी। अर्थात: श्रमिक की सहमति भी न्यूनतम वैधानिक मजदूरी से कम भुगतान को वैध नहीं बना सकती थी।
13. मजदूरी भुगतान का माध्यम -
अधिनियम के अंतर्गत यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया कि मजदूरी का भुगतान निर्धारित रूप में हो और श्रमिक को उसके वैधानिक पारिश्रमिक से वंचित न किया जाए। मजदूरी की गणना और भुगतान में निर्धारित नियमों का पालन आवश्यक था।
14. ओवरटाइम मजदूरी -
जब श्रमिक सामान्य कार्य-समय से अधिक काम करता था तो उसे निर्धारित ओवरटाइम दर से भुगतान किया जाना था। इसका उद्देश्य यह था कि नियोक्ता सामान्य मजदूरी देकर श्रमिक से अत्यधिक समय तक काम न करवाए। इस प्रकार अधिनियम ने श्रमिक के समय और श्रम दोनों का आर्थिक मूल्य सुनिश्चित करने का प्रयास किया।
15. निरीक्षक की नियुक्ति -
सरकार अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए Inspectors (निरीक्षकों) की नियुक्ति कर सकती थी। निरीक्षक के कार्यों में प्रमुख रूप से कार्यस्थल का निरीक्षण करना, मजदूरी से संबंधित अभिलेखों की जाँच करना, नियोक्ता से आवश्यक जानकारी प्राप्त करना, श्रमिकों को निर्धारित मजदूरी मिल रही है या नहीं इसकी जाँच करना एवं कानून के उल्लंघन की स्थिति में आवश्यक कार्रवाई करना।
16. अभिलेख और रजिस्टर -
नियोक्ता को मजदूरी, श्रमिकों और रोजगार से संबंधित आवश्यक रिकॉर्ड एवं रजिस्टर रखना होता था। इससे यह पता लगाया जा सकता था कि कितने श्रमिक काम कर रहे हैं, उन्हें कितनी मजदूरी दी गई, कितने घंटे काम कराया गया, ओवरटाइम का भुगतान हुआ या नहीं, न्यूनतम मजदूरी का पालन हुआ या नहीं।
17. श्रमिक को दावा करने का अधिकार -
यदि किसी श्रमिक को निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान किया गया, तो वह कानून के अंतर्गत उचित प्राधिकारी के समक्ष दावा कर सकता था। प्राधिकारी नियोक्ता को कम भुगतान की गई मजदूरी की राशि,और कानून के अनुसार अतिरिक्त क्षतिपूर्ति देने का आदेश कर सकता था।
इस प्रकार अधिनियम केवल न्यूनतम मजदूरी निर्धारित नहीं करता था, बल्कि उसके प्रवर्तन का उपाय भी उपलब्ध कराता था।
18. दंड के प्रावधान -
यदि कोई नियोक्ता निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान करता है, ओवरटाइम का उचित भुगतान नहीं करता,
अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करता है, या आवश्यक रिकॉर्ड नहीं रखता,
तो उसके विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती थी। इसका उद्देश्य कानून को केवल कागज पर रखने के बजाय वास्तविक रूप से लागू करना था।
19. अधिनियम की संवैधानिक पृष्ठभूमि -
न्यूनतम मजदूरी की अवधारणा भारतीय संविधान के सामाजिक-आर्थिक न्याय के उद्देश्यों से भी जुड़ी हुई है। विशेष रूप से
अनुच्छेद 23 बलात् श्रम (forced labour) का निषेध करता है। यदि किसी व्यक्ति को उसकी मजबूरी का लाभ उठाकर अत्यंत कम मजदूरी पर काम कराया जाता है, तो परिस्थितियों के आधार पर यह अनुच्छेद 23 के प्रश्न को जन्म दे सकता है।
अनुच्छेद 39 राज्य की नीति के निदेशक तत्वों में पुरुष और महिला दोनों के लिए समान कार्य के संबंध में समान वेतन तथा श्रमिकों के स्वास्थ्य और शक्ति की रक्षा जैसे उद्देश्य हैं।
अनुच्छेद 43 राज्य से श्रमिकों के लिए जीविका योग्य मजदूरी (living wage) तथा सम्मानजनक जीवन-स्तर सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास की अपेक्षा करता है। इसलिए न्यूनतम मजदूरी कानून को संविधान के सामाजिक एवं आर्थिक न्याय के व्यापक उद्देश्य से जोड़कर देखा जाता है।
महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय -
(1) People's Union for Democratic Rights v. Union of India (1982) - सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि यदि किसी श्रमिक को निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान किया जाता है, तो परिस्थितियों के अनुसार यह अनुच्छेद 23 के अंतर्गत forced labour की समस्या उत्पन्न कर सकता है। अर्थात: कमजोर आर्थिक स्थिति का लाभ उठाकर व्यक्ति से न्यूनतम वैधानिक मजदूरी से कम पर काम करवाना संविधान की दृष्टि से भी गंभीर विषय है।
(2) Sanjit Roy v. State of Rajasthan (1983) - राजस्थान से संबंधित इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सरकार भी श्रमिकों को कानून द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान नहीं कर सकती। सरकारी परियोजना या राहत कार्य होने मात्र से न्यूनतम मजदूरी की वैधानिक गारंटी समाप्त नहीं हो जाती।
(3) Unichoyi v. State of Kerala (1961) - इस निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि न्यूनतम मजदूरी का उद्देश्य श्रमिक को ऐसी मजदूरी उपलब्ध कराना है जो उसके मूलभूत जीवन-निर्वाह की आवश्यकताओं को ध्यान में रखती हो।
न्यूनतम मजदूरी और उचित मजदूरी में अंतर -
आधार = न्यूनतम मजदूरी = उचित मजदूरी
अर्थ = कानून द्वारा निर्धारित न्यूनतम सीमा = न्यूनतम से अधिक परिस्थितियों के अनुसार उचित मजदूरी।
उद्देश्य = शोषण रोकना = श्रमिक और उद्योग दोनों के हित में संतुलित मजदूरी।
कानूनी स्वरूप = वैधानिक रूप से अनिवार्य = औद्योगिक परिस्थितियों के अनुसार
नियोक्ता = इससे कम भुगतान नहीं कर सकता = परिस्थितियों के अनुसार अधिक भुगतान किया जा सकता है
न्यूनतम मजदूरी और जीवन निर्वाह मजदूरी -
तीनों अवधारणाओं को इस क्रम में समझना आसान है:
न्यूनतम मजदूरी→ श्रमिक के शोषण से सुरक्षा की कानूनी न्यूनतम सीमा।
उचित मजदूरी→ श्रमिक की आवश्यकताओं के साथ उद्योग की आर्थिक क्षमता और अन्य परिस्थितियों का संतुलन।
जीवन निर्वाह मजदूरी→ऐसी मजदूरी जिससे श्रमिक अपने और अपने परिवार के लिए सम्मानजनक जीवन-स्तर बनाए रख सके।
अधिनियम का महत्व -
इस अधिनियम का भारतीय श्रम कानून के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है इसके कारण श्रमिकों को कानूनी संरक्षण मिला।
कम मजदूरी की प्रथा पर नियंत्रण लगा।असंगठित एवं कमजोर श्रमिक वर्ग को सुरक्षा मिली। मजदूरी निर्धारण में सरकार की भूमिका स्थापित हुई। महँगाई के अनुरूप मजदूरी संशोधन की व्यवस्था बनी। श्रमिकों को कम भुगतान के विरुद्ध दावा करने का अधिकार मिला।
अधिनियम की सीमाएँ -
इसके बावजूद कुछ व्यावहारिक समस्याएँ थीं -
1. यह मूलतः अनुसूचित रोजगारों तक सीमित था।
2. अलग-अलग राज्यों में मजदूरी की दरों में पर्याप्त अंतर हो सकता था।
3. निरीक्षण और प्रवर्तन की कमजोरी के कारण कई श्रमिकों को वास्तविक लाभ नहीं मिल पाता था।
4. असंगठित क्षेत्र में कानून का पालन सुनिश्चित करना कठिन था।
5. मजदूरी की दरों के निर्धारण और संशोधन में देरी हो सकती थी।
वर्तमान कानून: Code on Wages, 2019 -
Code on Wages, 2019 ने चार पुराने केंद्रीय मजदूरी कानूनों को एकीकृत किया, जिनमें Minimum Wages Act, 1948 भी शामिल था। इसलिए वर्तमान विधिक व्यवस्था को समझने के लिए केवल 1948 के अधिनियम तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं है। Code on Wages का उद्देश्य मजदूरी संबंधी कानूनों को एकीकृत और सरल बनाना तथा न्यूनतम मजदूरी की व्यवस्था को व्यापक बनाना है।
निष्कर्ष - न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 भारतीय श्रम कानून के इतिहास में एक मील का पत्थर था। इसने श्रमिकों को यह कानूनी सुरक्षा प्रदान की कि उन्हें सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान न किया जाए। इसका मूल उद्देश्य श्रमिकों के आर्थिक शोषण को रोकना, उन्हें न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा देना और श्रम के लिए सम्मानजनक पारिश्रमिक सुनिश्चित करना था। People's Union for Democratic Rights v. Union of India तथा Sanjit Roy v. State of Rajasthan जैसे निर्णयों ने न्यूनतम मजदूरी को संवैधानिक गरिमा और अनुच्छेद 23 से भी जोड़ा। यद्यपि 1948 का अधिनियम अब Code on Wages, 2019 द्वारा प्रतिस्थापित हो चुका है, फिर भी भारतीय श्रम-कानून के विकास में इसका ऐतिहासिक और विधिक महत्व अत्यंत महत्वपूर्ण है।
न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 की संवैधानिक वैधता -
भारतीय श्रम-विधि का बहुत महत्वपूर्ण विषय है। इसकी संवैधानिकता को समझने में अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19(1)(g), अनुच्छेद 19(6), अनुच्छेद 21 तथा राज्य के नीति-निदेशक तत्वों, विशेषकर अनुच्छेद 39 और 43 की भूमिका महत्वपूर्ण है।
महत्वपूर्ण वर्तमान स्थिति - न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 अब ऐतिहासिक/पूर्ववर्ती कानून है। इसे Code on Wages, 2019 द्वारा समाहित किया गया है। लेकिन इसकी संवैधानिक वैधता पर सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्णय आज भी श्रम-विधि और संवैधानिक विधि के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
1. न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 का उद्देश्य -
न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 का मूल उद्देश्य कुछ नियोजनों में श्रमिकों को ऐसी मजदूरी से संरक्षण देना था जो उनके शोषण का कारण बने। अधिनियम ने उपयुक्त सरकार को निर्धारित नियोजनों में न्यूनतम मजदूरी तय करने और समय-समय पर उसका पुनरीक्षण करने की शक्ति दी थी। अधिनियम की धारा 3 न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण से संबंधित थी और धारा 5 निर्धारण एवं पुनरीक्षण की प्रक्रिया बताती थी। इसका मूल दर्शन था श्रमिक की आर्थिक विवशता को नियोक्ता की सौदेबाजी की शक्ति का हथियार नहीं बनने देना।
2. संवैधानिक वैधता पर प्रश्न क्यों उठा? -
नियोक्ताओं की ओर से मुख्य तर्क यह था कि सरकार द्वारा न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने से -
1. नियोक्ता की अनुबंध करने की स्वतंत्रता प्रभावित होती है।
2. व्यापार या व्यवसाय करने की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगता है।
3. सरकार द्वारा अलग-अलग क्षेत्रों अथवा नियोजनों के लिए अलग मजदूरी निर्धारित करना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन कर सकता है।
4. आर्थिक रूप से कमजोर उद्योगों पर ऐसी मजदूरी का भार पड़ सकता है जिसे वे वहन न कर सकें।
5. यदि मजदूर स्वयं कम मजदूरी पर काम करने को तैयार है, तो सरकार उसे अधिक मजदूरी लेने के लिए बाध्य क्यों करे?
इन प्रश्नों पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय दिए।
3. अनुच्छेद 19(1)(g) और न्यूनतम मजदूरी -
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(g) नागरिकों को कोई पेशा अपनाने अथवा कोई व्यवसाय, व्यापार या उपजीविका करने की स्वतंत्रता देता है। नियोक्ताओं ने तर्क दिया कि यदि सरकार यह निर्धारित कर दे कि मजदूर को कम-से-कम इतनी मजदूरी देनी ही होगी, तो इससे व्यवसाय करने की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। न्यायालय का दृष्टिकोण व्यवसाय करने का मौलिक अधिकार पूर्ण और निरंकुश अधिकार नहीं है। अनुच्छेद 19(6) राज्य को सामान्य जनता के हित में युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है। इसलिए प्रश्न यह था कि न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करना -
क्या युक्तियुक्त है? - सुप्रीम कोर्ट ने इसका उत्तर हाँ में दिया।
Bijay Cotton Mills Ltd. v. State of Ajmer -
निर्णय: 14 अक्टूबर 1954
रिपोर्ट: AIR 1955 SC 33; 1955 SCR (1) 752.
इस मामले में न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने वाली व्यवस्था को इस आधार पर चुनौती दी गई कि इससे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के अंतर्गत व्यापार और व्यवसाय की स्वतंत्रता प्रभावित होती है। सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि न्यूनतम मजदूरी अधिनियम की संबंधित धाराओं की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा।
न्यायालय ने माना कि न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने से अनुबंध की स्वतंत्रता पर कुछ प्रभाव पड़ता है, लेकिन यह जनहित में श्रमिकों के शोषण को रोकने के उद्देश्य से है। यह राज्य के नीति-निदेशक तत्वों को लागू करने की दिशा में अनुच्छेद 19(6) के अंतर्गत युक्तियुक्त है।
इस निर्णय का मूल सिद्धांत - व्यवसाय करने की स्वतंत्रता का अर्थ श्रमिकों के शोषण की स्वतंत्रता नहीं है। यही न्यूनतम मजदूरी कानून की संवैधानिकता का केंद्रीय आधार बन गया।
4. अनुच्छेद 19(6) की भूमिका -
अनुच्छेद 19(6) राज्य को नागरिकों के अनुच्छेद 19(1)(g) के अधिकार पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है। न्यूनतम मजदूरी कानून के मामले में न्यायालय ने माना कि श्रमिकों को न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा देना → जनहित → युक्तियुक्त प्रतिबंध है अतः नियोक्ता यह नहीं कह सकता कि “मैं अपने व्यवसाय में किसी भी मजदूरी पर कर्मचारी रखूँगा और राज्य इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता।”
राज्य श्रमिकों के शोषण को रोकने के लिए हस्तक्षेप कर सकता है।
5. अनुच्छेद 14 एवं न्यूनतम मजदूरी -
अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता तथा कानून के समान संरक्षण की गारंटी देता है। यह तर्क भी उठाया गया कि अलग-अलग उद्योगों, क्षेत्रों, रोजगारों, श्रमिक वर्गों के लिए अलग-अलग न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करना भेदभावपूर्ण है।
लेकिन न्यायालय ने माना कि हर व्यक्ति को बिल्कुल समान मजदूरी देना ही अनुच्छेद 14 का अर्थ नहीं है। यदि वर्गीकरण का -
1. बुद्धिसंगत आधार (Intelligible Differentia) हो, और
2. उस आधार का कानून के उद्देश्य से तार्किक संबंध (Rational Nexus) हो, तो ऐसा वर्गीकरण संवैधानिक हो सकता है। उदाहरण के लिए किसी क्षेत्र में जीवन-यापन की लागत दूसरे क्षेत्र से अलग हो सकती है। इसी प्रकार अलग-अलग उद्योगों की परिस्थितियाँ भी अलग हो सकती हैं।
इसलिए अलग-अलग परिस्थितियों के अनुसार अलग न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करना अपने-आप में अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं है।
M/s Bhikusa Yamasa Kshatriya v. Sangamner Akola Taluka Bidi Kamgar Union - इस मामले में न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के अंतर्गत बीड़ी श्रमिकों के संबंध में की गई व्यवस्था को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने न्यूनतम मजदूरी व्यवस्था को संवैधानिक माना और यह स्पष्ट किया कि विभिन्न क्षेत्रों या श्रमिक वर्गों के लिए अलग दरें निर्धारित करना, यदि उसका उचित आधार हो, तो अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं है। इससे यह सिद्धांत मजबूत हुआ कि “समानता का अर्थ परिस्थितियों की वास्तविक असमानता को नजरअंदाज करना नहीं है।”
Chandra Bhavan Boarding & Lodging v. State of Mysore
निर्णय: 29 सितंबर 1969
रिपोर्ट: AIR 1970 SC 2042; (1970) 1 SCC 43. इस मामले में न्यूनतम मजदूरी अधिनियम की धारा 5(1) के अंतर्गत सरकार को न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने की शक्ति को चुनौती दी गई। मुख्य प्रश्न था कि क्या सरकार को दी गई शक्ति इतनी व्यापक और अनियंत्रित है कि वह अत्यधिक या unguided delegation बन जाती है? सुप्रीम कोर्ट ने इस चुनौती को स्वीकार नहीं किया।
न्यायालय ने अधिनियम के उद्देश्य, समिति/सलाहकार व्यवस्था तथा न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने की वैधानिक प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए व्यवस्था की वैधता को बरकरार रखा।
6. नियोक्ता की भुगतान क्षमता का तर्क -
यदि नियोक्ता आर्थिक रूप से कमजोर है और न्यूनतम मजदूरी नहीं दे सकता, तो क्या वह न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान कर सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। न्यूनतम मजदूरी का उद्देश्य ही यह सुनिश्चित करना है कि श्रमिक को कानून द्वारा निर्धारित न्यूनतम स्तर से कम मजदूरी न मिले। बाद के निर्णयों में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि किसी व्यक्तिगत नियोक्ता की आर्थिक कठिनाई या भुगतान करने में असमर्थता, अपने-आप में, न्यूनतम मजदूरी कानून को असंवैधानिक नहीं बनाती।
7. मजदूर स्वयं कम मजदूरी पर काम करने को तैयार है वाला तर्क -
यह निर्णय भी Bijay Cotton Mills के संदर्भ में महत्वपूर्ण था। यदि मजदूर गरीबी या बेरोजगारी के कारण कहता है कि मैं कम मजदूरी पर भी काम कर लूँगा। तो क्या राज्य उसे उससे कम मजदूरी पर काम करने से रोक सकता है? सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण था कि श्रमिक की आर्थिक विवशता को वास्तविक स्वतंत्र सौदेबाजी नहीं माना जा सकता। यदि कानून न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करता है तो व्यक्तिगत सहमति से भी उसके नीचे मजदूरी देने का समझौता कानून की अनिवार्यता को समाप्त नहीं कर सकता।
8. अनुच्छेद 43 और न्यूनतम मजदूरी -
संविधान का अनुच्छेद 43 राज्य को श्रमिकों के लिए काम, जीविका, उचित जीवन स्तर, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अवसर से संबंधित परिस्थितियाँ सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने का निर्देश देता है।
Bijay Cotton Mills में सुप्रीम कोर्ट ने न्यूनतम मजदूरी व्यवस्था को संविधान के Directive Principles के उद्देश्यों से जोड़ा और इसे जनहितकारी सामाजिक-आर्थिक विधान माना। यहाँ एक महत्वपूर्ण संवैधानिक दर्शन सामने आता है -
मौलिक अधिकार + नीति-निदेशक तत्व = सामाजिक न्याय की संवैधानिक दिशा।
9. अनुच्छेद 39 का संबंध -
अनुच्छेद 39 राज्य को ऐसी नीति अपनाने की दिशा देता है जिससे पुरुषों और महिलाओं को समान कार्य के लिए समान वेतन मिले। नागरिकों को पर्याप्त आजीविका के साधन प्राप्त हों। आर्थिक व्यवस्था ऐसी न हो जिससे धन और उत्पादन के साधनों का अत्यधिक संकेन्द्रण हो। न्यूनतम मजदूरी कानून इसी व्यापक सामाजिक-आर्थिक न्याय की संवैधानिक भावना से जुड़ा हुआ है।
10. अनुच्छेद 21 और गरिमापूर्ण जीवन -
आधुनिक संवैधानिक व्याख्या में अनुच्छेद 21 का दायरा केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित नहीं माना जाता। जीवन का अर्थ गरिमापूर्ण जीवन से भी जोड़ा गया है।
इसी दृष्टि से न्यूनतम मजदूरी जैसी व्यवस्था श्रमिक के कि भोजन, आवास,
स्वास्थ्य, शिक्षा, जीवन-स्तर, मानवीय गरिमा से जुड़ी सामाजिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है। इसलिए आज न्यूनतम मजदूरी को केवल वेतन का कानूनी आंकड़ा मानना बहुत संकीर्ण दृष्टिकोण होगा। यह श्रमिक की गरिमा और सामाजिक न्याय से भी जुड़ा हुआ है।
11. क्या न्यूनतम मजदूरी अधिनियम मनमाना था? -
नहीं - अधिनियम में न्यूनतम मजदूरी निर्धारण के लिए वैधानिक प्रक्रिया बनाई गई थी। धारा 5 के अंतर्गत सरकार को निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना था और समिति/सलाहकार तंत्र की व्यवस्था भी थी। इसलिए सरकार की शक्ति पूर्णतः निरंकुश नहीं थी।
संवैधानिक वैधता का सार -
संवैधानिक प्रावधान न्यूनतम मजदूरी कानून से संबंध अनुच्छेद 14 उचित वर्गीकरण होने पर अलग-अलग न्यूनतम मजदूरी संवैधानिक -
• अनुच्छेद 19(1)(g) व्यवसाय की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध
• अनुच्छेद 19(6) श्रमिक हित में युक्तियुक्त प्रतिबंध को संरक्षण
• अनुच्छेद 21 गरिमापूर्ण जीवन की व्यापक संवैधानिक अवधारणा
• अनुच्छेद 39 सामाजिक-आर्थिक न्याय और श्रमिक हित
• अनुच्छेद 43 श्रमिकों के लिए उचित जीवन स्तर एवं जीवन निर्वाह योग्य परिस्थितियाँ
• अनुच्छेद 38 सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय को बढ़ावा देना
प्रमुख न्यायिक निर्णय -
1. Bijay Cotton Mills Ltd. v. State of Ajmer (AIR 1955 SC 33)
मुख्य सिद्धांत: न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करना अनुच्छेद 19(1)(g) का उल्लंघन नहीं; यह अनुच्छेद 19(6) के अंतर्गत युक्तियुक्त प्रतिबंध है।
2. Edward Mills Co. Ltd. v. State of Ajmer - न्यूनतम मजदूरी कानून की संवैधानिकता से जुड़े प्रारंभिक महत्वपूर्ण निर्णयों में शामिल।
3. M/s Bhikusa Yamasa Kshatriya v. Sangamner Akola Taluka Bidi Kamgar Union -अलग-अलग क्षेत्रों/वर्गों के लिए न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण और अनुच्छेद 14/19 के प्रश्न पर महत्वपूर्ण।
4. Chandra Bhavan Boarding & Lodging v. State of Mysore -
AIR 1970 SC 2042 - न्यूनतम मजदूरी निर्धारण की सरकारी शक्ति तथा उसकी संवैधानिकता पर महत्वपूर्ण निर्णय।
निष्कर्ष - न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट ने मूलतः स्वीकार किया है। यद्यपि न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करने से नियोक्ता की अनुबंध और व्यवसाय की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध पड़ता है, लेकिन यह प्रतिबंध अनुच्छेद 19(6) के अंतर्गत युक्तियुक्त है क्योंकि इसका उद्देश्य श्रमिकों का शोषण रोकना और जनहित तथा सामाजिक-आर्थिक न्याय को बढ़ावा देना है। Bijay Cotton Mills इस सिद्धांत का आधारभूत निर्णय है। बाद के निर्णयों, विशेषकर Chandra Bhavan Boarding & Lodging, ने इस संवैधानिक स्थिति को और मजबूत किया।
एक पंक्ति में -
न्यूनतम मजदूरी कानून व्यवसाय करने के अधिकार को समाप्त नहीं करता, बल्कि उस अधिकार को श्रमिक के शोषण से रोकते हुए सामाजिक न्याय के संवैधानिक उद्देश्य के साथ संतुलित करता है।और एक परीक्षा-योग्य बात: आज न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 को Code on Wages, 2019 के व्यापक ढाँचे में समाहित किया गया है, इसलिए वर्तमान कानून और ऐतिहासिक संवैधानिक निर्णयों को उत्तर में अलग-अलग पहचानना चाहिए।
सलाहकार बोर्ड गठन - संरचना, प्रतिनिधित्व , कार्य एवं महत्व -
धारा 42 का संबंध वेतन संहिता, 2019 में गठित केंद्रीय सलाहकार बोर्ड तथा राज्य सलाहकार बोर्ड से है। परीक्षा की दृष्टि से इसे के क्रम में समझना सबसे उपयोगी रहेगा।
परिचय - वेतन से संबंधित विषय केवल सरकार द्वारा तय किए जाने वाले प्रशासनिक विषय नहीं हैं। मजदूरों, नियोक्ताओं और सरकार, तीनों के हितों को ध्यान में रखकर न्यूनतम मजदूरी, वेतन संबंधी नीतियों तथा अन्य महत्वपूर्ण मामलों पर सलाह लेना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से वेतन संहिता, 2019 की धारा 42 के अंतर्गत -
1. केंद्रीय सलाहकार बोर्ड (Central Advisory Board) तथा
2. राज्य सलाहकार बोर्ड (State Advisory Board)
के गठन का प्रावधान किया गया है। इन बोर्डों का मूल उद्देश्य सरकार को वेतन संबंधी मामलों पर सलाह और विशेषज्ञ सुझाव देना है।
केंद्रीय सलाहकार बोर्ड -
(A) केंद्रीय सलाहकार बोर्ड का गठन - केंद्र सरकार द्वारा एक केंद्रीय सलाहकार बोर्ड का गठन किया जाता है। यह बोर्ड केंद्र सरकार को संहिता के अंतर्गत आने वाले विभिन्न वेतन संबंधी विषयों पर सलाह देता है।
(B) केंद्रीय सलाहकार बोर्ड की संरचना - केंद्रीय सलाहकार बोर्ड में विभिन्न हितधारकों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाता है। इसकी संरचना में मुख्य रूप से निम्न वर्गों का प्रतिनिधित्व होता है -
1. नियोक्ताओं के प्रतिनिधि - नियोक्ता वर्ग के प्रतिनिधियों को बोर्ड में शामिल किया जाता है ताकि उद्योग और व्यवसाय जगत की व्यावहारिक समस्याओं को सामने रखा जा सके।
2. कर्मचारियों के प्रतिनिधि - कर्मचारियों या श्रमिकों के प्रतिनिधियों को भी बोर्ड में स्थान दिया जाता है, ताकि श्रमिकों के हितों और समस्याओं को उचित महत्व मिले।
3. स्वतंत्र व्यक्ति - बोर्ड में स्वतंत्र व्यक्तियों को भी शामिल किया जाता है। ये व्यक्ति किसी एक पक्ष के प्रतिनिधि न होकर निष्पक्ष दृष्टिकोण प्रदान करते हैं।
4. राज्य सरकारों के प्रतिनिधि - कुछ राज्यों का प्रतिनिधित्व भी बोर्ड में निर्धारित तरीके से किया जाता है, जिससे केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय स्थापित हो सके।
प्रतिनिधित्व में संतुलन - सलाहकार बोर्ड की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है संतुलित प्रतिनिधित्व। बोर्ड में नियोक्ता और कर्मचारी दोनों पक्षों को प्रतिनिधित्व दिया जाता है तथा स्वतंत्र सदस्यों की सहायता से निष्पक्ष दृष्टिकोण प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि मजदूरी निर्धारण में केवल नियोक्ता या केवल श्रमिक का दृष्टिकोण प्रभावी न हो, बल्कि दोनों के हितों का संतुलन बनाया जाए। महत्वपूर्ण बात यह है कि कर्मचारी प्रतिनिधियों की संख्या नियोक्ता प्रतिनिधियों की संख्या से कम नहीं होनी चाहिए। साथ ही, कुल सदस्यों में एक-तिहाई महिलाएँ होने का प्रावधान भी किया गया है।
4. केंद्रीय सलाहकार बोर्ड के कार्य - केंद्रीय सलाहकार बोर्ड का प्रमुख कार्य केंद्र सरकार को वेतन संबंधी मामलों में सलाह देना है। इसके प्रमुख कार्य निम्न हैं - (1) न्यूनतम मजदूरी से संबंधित सलाह - बोर्ड सरकार को न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण और पुनरीक्षण से संबंधित विषयों पर सलाह दे सकता है।
(2) मजदूरी संबंधी मामलों पर सलाह - वेतन संहिता के अंतर्गत आने वाले विभिन्न मामलों पर केंद्र सरकार को सुझाव देना इसका महत्वपूर्ण कार्य है।
(3) महिलाओं के रोजगार से संबंधित सलाह - बोर्ड महिलाओं के लिए रोजगार के अवसरों से संबंधित मामलों पर भी सरकार को सलाह दे सकता है। विशेष रूप से यह देखा जाता है कि महिलाओं के रोजगार के संबंध में समान अवसर और समान व्यवहार के सिद्धांतों का पालन हो।
अन्य संदर्भित विषय - केंद्र सरकार द्वारा बोर्ड को सौंपे या संदर्भित किए गए अन्य मामलों पर भी बोर्ड अपनी राय और सिफारिश दे सकता है।
राज्य सलाहकार बोर्ड -
(A) गठन - प्रत्येक राज्य सरकार द्वारा राज्य सलाहकार बोर्ड का गठन किया जाता है। इसका उद्देश्य राज्य सरकार को वेतन संहिता के अंतर्गत आने वाले मामलों पर सलाह देना है। राज्य स्तर पर मजदूरी और रोजगार की परिस्थितियाँ अलग-अलग हो सकती हैं। इसलिए राज्य सरकार को स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर सलाह देने के लिए यह बोर्ड महत्वपूर्ण है।
राज्य सलाहकार बोर्ड की संरचना - राज्य सलाहकार बोर्ड में भी विभिन्न हितधारकों को प्रतिनिधित्व दिया जाता है।
इसमें मुख्य रूप से -
1. नियोक्ताओं के प्रतिनिधि
2. कर्मचारियों के प्रतिनिधि
3. स्वतंत्र व्यक्ति
शामिल होते हैं।
राज्य सरकार आवश्यकतानुसार बोर्ड की संरचना और सदस्यों की नियुक्ति के संबंध में संहिता तथा बनाए गए नियमों के अनुसार कार्य करती है।
राज्य सलाहकार बोर्ड में संतुलित प्रतिनिधित्व - राज्य सलाहकार बोर्ड में भी कर्मचारी और नियोक्ता दोनों पक्षों के हितों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाता है।
प्रमुख बिंदु -
• कर्मचारी प्रतिनिधित्व महत्वपूर्ण है।
• नियोक्ता वर्ग का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित किया जाता है।
• स्वतंत्र सदस्यों के माध्यम से निष्पक्ष दृष्टिकोण प्राप्त किया जाता है।
• कुल सदस्यों में एक-तिहाई महिलाएँ होने का प्रावधान है।
इस प्रकार बोर्ड को केवल सरकारी अधिकारियों का मंच नहीं बनाया गया है, बल्कि इसमें त्रिपक्षीय दृष्टिकोण अपनाया गया है।
राज्य सलाहकार बोर्ड के कार्य - राज्य सलाहकार बोर्ड के प्रमुख कार्य निम्न हैं -
(1) न्यूनतम मजदूरी के संबंध में सलाह - राज्य सरकार को न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण और उससे जुड़े मामलों में सलाह देना।
(2) मजदूरी नीति पर सलाह - राज्य में मजदूरी से संबंधित नीतियों और व्यवस्थाओं के संबंध में सरकार को सुझाव देना।
(3) श्रमिकों और नियोक्ताओं के हितों का संतुलन - श्रमिकों को उचित मजदूरी मिले, साथ ही उद्योग एवं नियोक्ताओं पर व्यावहारिक रूप से अत्यधिक भार न पड़े, इस संतुलन को ध्यान में रखते हुए सुझाव देना।
(4) महिलाओं के रोजगार से संबंधित विषय - महिलाओं के रोजगार और समान अवसर से संबंधित मामलों पर सरकार को सलाह देना।
(5) सरकार द्वारा संदर्भित विषय - राज्य सरकार द्वारा बोर्ड के पास भेजे गए अन्य वेतन संबंधी मामलों पर भी बोर्ड अपनी सलाह देता है।
सलाहकार बोर्डों का स्वरूप - यह बात विशेष है कि सलाहकार बोर्ड निर्णय लेने वाली न्यायिक संस्था नहीं हैं।
इनका प्रमुख कार्य है - सरकार को सलाह देना, विशेषज्ञ राय उपलब्ध कराना तथा श्रमिक एवं नियोक्ता हितों के बीच संतुलन स्थापित करने में सहायता करना। अर्थात् बोर्ड स्वयं सामान्यतः न्यूनतम मजदूरी का अंतिम निर्धारण करने वाला प्राधिकरण नहीं है। वह सरकार को आवश्यक सलाह और सिफारिश उपलब्ध कराता है।
बोर्डों का महत्व -
(i) त्रिपक्षीय दृष्टिकोण - सलाहकार बोर्ड में सरकार, कर्मचारी और नियोक्ता के दृष्टिकोणों को महत्व मिलता है।
(ii) श्रमिक हितों की सुरक्षा - श्रमिकों की मजदूरी, जीवन-निर्वाह और रोजगार संबंधी समस्याओं को नीति-निर्माण तक पहुँचाने का माध्यम मिलता है।
(iii) नियोक्ताओं की समस्याओं का प्रतिनिधित्व - उद्योगों और नियोक्ताओं की आर्थिक एवं व्यावहारिक कठिनाइयों को भी सरकार के सामने रखा जाता है।
(iv) विशेषज्ञ सलाह - स्वतंत्र सदस्यों के माध्यम से निष्पक्ष एवं विशेषज्ञ दृष्टिकोण प्राप्त होता है।
(v) केंद्र-राज्य समन्वय - केंद्रीय और राज्य स्तर पर अलग-अलग सलाहकार बोर्ड होने से मजदूरी नीति के निर्माण में बेहतर समन्वय स्थापित किया जा सकता है।
(vi) लैंगिक प्रतिनिधित्व - महिलाओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने से वेतन और रोजगार संबंधी निर्णयों में लैंगिक दृष्टिकोण भी शामिल होता है।
केंद्रीय और राज्य सलाहकार बोर्ड में अंतर -
आधार - केंद्रीय बोर्ड - राज्य बोर्ड
गठन - केंद्र सरकार - राज्य सरकार
क्षेत्र - भारत से संबंधित केंद्रीय विषय - संबंधित राज्य के विषय
उद्देश्य - केंद्र सरकार को सलाह देना - राज्य सरकार को सलाह देना
प्रतिनिधित्व - नियोक्ता, कर्मचारी, स्वतंत्र सदस्य - नियोक्ता, कर्मचारी, स्वतंत्र सदस्य
विषय - राष्ट्रीय स्तर के वेतन संबंधी विषय - राज्य स्तर के वेतन संबंधी विषय
महिला प्रतिनिधित्व - कुल सदस्यों में एक-तिहाई महिलाएँ - कुल सदस्यों में एक-तिहाई महिलाएँ
प्रकृति - सलाहकारी सलाहकारी
उदाहरण - मान लीजिए किसी क्षेत्र के श्रमिकों की मजदूरी बहुत कम है और महँगाई लगातार बढ़ रही है।
• कर्मचारी प्रतिनिधि कहेंगे कि वर्तमान मजदूरी से श्रमिक परिवार का जीवन-निर्वाह कठिन है।
• नियोक्ता प्रतिनिधि बताएँगे कि मजदूरी में बहुत अधिक वृद्धि करने से उत्पादन लागत और व्यवसाय पर प्रभाव पड़ेगा।
• स्वतंत्र सदस्य दोनों पक्षों के तर्कों का निष्पक्ष अध्ययन करेंगे।
• इसके बाद बोर्ड सरकार को अपनी सलाह/सिफारिश देगा।
• सरकार उस सलाह को ध्यान में रखते हुए कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई कर सकती है।
इस प्रकार सलाहकार बोर्ड श्रमिक और नियोक्ता के बीच पुल का कार्य करता है।
निष्कर्ष - वेतन संहिता, 2019 की धारा 42 के अंतर्गत केंद्रीय तथा राज्य सलाहकार बोर्डों की व्यवस्था की गई है। इनका उद्देश्य सरकार को न्यूनतम मजदूरी, मजदूरी नीति, महिलाओं के रोजगार तथा संहिता से संबंधित अन्य विषयों पर सलाह देना है। बोर्डों में नियोक्ता, कर्मचारी और स्वतंत्र व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाता है तथा एक-तिहाई महिला प्रतिनिधित्व का प्रावधान है। इस व्यवस्था के माध्यम से मजदूरी संबंधी नीति-निर्माण में श्रमिक हित, नियोक्ता हित और निष्पक्ष विशेषज्ञ दृष्टिकोण के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया गया है।
ट्रिक = सलाह के 42 द्वार
केंद्रीय बोर्ड → केंद्र को सलाह
राज्य बोर्ड → राज्य को सलाह
नियोक्ता + कर्मचारी + स्वतंत्र सदस्य → संतुलित सलाह
1/3 महिलाएँ → समावेशी प्रतिनिधित्व
मुख्य विषय → मजदूरी + रोजगार + महिला रोजगार + अन्य संदर्भित विषय
समिति में नियोक्ताओं के प्रतिनिधि एवं कर्मचारियों के प्रतिनिधि स्वतंत्र सदस्य होते हैं। इसमें नियोक्ता और कर्मचारी प्रतिनिधियों की संख्या समान रखी जाती है तथा स्वतंत्र सदस्यों की संख्या कुल सदस्यों की एक-तिहाई से अधिक नहीं हो सकती।
वेतन संहिता, 2019 : वेतन भुगतान, कटौती, बोनस एवं प्रवर्तन -
वेतन संहिता, 2019 के प्रावधान तीन भागों में विभाजित हैं -
(1) वेतन का भुगतान
(2) वेतन से कटौती
(3) बोनस का भुगतान एवं निर्धारण।
(1). वेतन भुगतान की विधि, अवधि एवं समय धारा 15, 16, 17 एवं 43
वेतन संहिता का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कर्मचारी को उसके द्वारा किए गए कार्य का वेतन समय पर, उचित तरीके से और बिना अनधिकृत कटौती के प्राप्त हो।
(क) धारा 15 वेतन भुगतान की विधि - नियोक्ता द्वारा कर्मचारी को देय वेतन का भुगतान निर्धारित विधियों से किया जा सकता है। सामान्यतः भुगतान निम्न माध्यमों से किया जा सकता है:
1. मुद्रा/सिक्कों में
2. करेंसी नोटों में
3. चेक द्वारा
4. बैंक खाते में जमा करके
5. इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से
अर्थात् आधुनिक व्यवस्था में वेतन का बैंक खाते अथवा डिजिटल माध्यम से भुगतान विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है।
उद्देश्य - वेतन भुगतान को पारदर्शी बनाना तथा कर्मचारी को वास्तविक रूप से उसके देय वेतन की प्राप्ति सुनिश्चित करना।
धारा 16 - वेतन अवधि - वेतन अवधि से आशय उस अवधि से है जिसके लिए कर्मचारी का वेतन निर्धारित और गणना किया जाता है। नियोक्ता को वेतन अवधि निर्धारित करनी होती है, लेकिन कोई भी वेतन अवधि एक महीने से अधिक नहीं हो सकती अर्थात्:वेतन अवधि 1 माह
उदाहरण यदि किसी कर्मचारी की वेतन अवधि 1 जनवरी से 31 जनवरी है, तो यह वैध है। लेकिन यदि नियोक्ता वेतन अवधि 1 जनवरी से 31 मार्च तक निर्धारित करता है, तो यह व्यवस्था संहिता के अनुरूप नहीं होगी, क्योंकि अवधि एक महीने से अधिक हो गई।
उद्देश्य - इस व्यवस्था का उद्देश्य कर्मचारी को लंबे समय तक वेतन की प्रतीक्षा करने से बचाना है।
धारा 17 - वेतन भुगतान का समय - धारा 17 यह सुनिश्चित करती है कि वेतन केवल निर्धारित होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका समय पर भुगतान भी होना चाहिए। वेतन भुगतान की समय-सीमा कर्मचारी के रोजगार की प्रकृति तथा उसकी सेवा समाप्ति की परिस्थिति के अनुसार निर्धारित होती है। सामान्य सिद्धांत यह है कि वेतन का भुगतान संबंधित वेतन-अवधि समाप्त होने के बाद निर्धारित समय के भीतर किया जाए।
सेवा समाप्त होने की स्थिति में यदि -
• कर्मचारी को
• हटाया गया हो
• सेवा से निकाला गया हो
• छंटनी हुई हो
• इस्तीफा दिया हो अथवा अन्य कारण से रोजगार समाप्त हुआ हो
तो उसके देय वेतन के भुगतान के लिए विशेष समय-सीमा लागू होती है।
उद्देश्य - धारा 17 का केंद्रीय उद्देश्य है वेतन का समयबद्ध भुगतान।
धारा 43 - निरीक्षण एवं प्रवर्तन की व्यवस्था - वेतन संहिता के प्रावधानों का केवल बनाया जाना पर्याप्त नहीं है। उनके पालन की निगरानी और उल्लंघन के विरुद्ध कार्रवाई के लिए Inspector-cum-Facilitator अर्थात् निरीक्षक-सह-सुविधादाता की व्यवस्था की गई है। इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं बल्कि
• नियोक्ताओं को कानून समझाना,
• अनुपालन में सहायता करना,
• प्रतिष्ठानों का निरीक्षण करना,
• अभिलेखों की जांच करना,
• उल्लंघनों का पता लगाना,
• आवश्यक होने पर प्रवर्तन कार्रवाई करना है।
इस प्रकार वेतन संहिता में "दंडात्मक निरीक्षण" के साथ "सुविधाप्रद अनुपालन" की अवधारणा अपनाई गई है।
वेतन से कटौती - धारा 18(2), 18(3), 19, 20 एवं 21 में वेतन कर्मचारी की आर्थिक सुरक्षा का प्रमुख साधन है। इसलिए नियोक्ता कर्मचारी के वेतन में अपनी इच्छा से कटौती नहीं कर सकता।
मूल सिद्धांत केवल वही कटौती की जा सकती है जो संहिता द्वारा अधिकृत है। 18 धारा 18 - वेतन से कटौती - धारा 18 वेतन से की जाने वाली कटौतियों से संबंधित मुख्य प्रावधान है।
धारा 18(1) का मूल सिद्धांत - कर्मचारी के वेतन से किसी भी प्रकार की कटौती केवल उन्हीं आधारों पर की जा सकती है जिन्हें संहिता द्वारा अधिकृत किया गया है।
धारा 18(2) : अधिकृत कटौतियाँ - वेतन से अनुमत कटौतियों में विभिन्न प्रकार की कटौतियाँ शामिल हो सकती हैं, जैसे -
1. जुर्माना
2. अनुपस्थिति के कारण कटौती
3. कर्मचारी द्वारा नियोक्ता को हुई क्षति या हानि की वसूली
4. आवास की सुविधा के लिए कटौती
5. नियोक्ता द्वारा प्रदान की गई सेवाओं के लिए कटौती, जहाँ विधि के अनुसार अनुमत हो
6. अग्रिम की वसूली
7. ऋण की वसूली
8. अधिक भुगतान किए गए वेतन की वसूली
9. आयकर अथवा अन्य वैधानिक देयताएँ
10. भविष्य निधि आदि के लिए वैधानिक योगदान
11. सहकारी संस्था को भुगतान
12. बीमा या अन्य अधिकृत योजनाओं के लिए योगदान
13. कर्मचारी की लिखित सहमति/प्राधिकरण से अनुमत अन्य कटौतियाँ, जहाँ संहिता इसकी अनुमति देती है।
महत्वपूर्ण सिद्धांत - नियोक्ता यह नहीं कह सकता - मैं मालिक हूँ, इसलिए वेतन से जितना चाहूँ काट सकता हूँ। कटौती कानूनी आधार और निर्धारित शर्तों के अधीन होनी चाहिए।
6. धारा 18(3) - कटौती की अधिकतम सीमा - यह प्रावधान अत्यंत महत्वपूर्ण है।वेतन से की जाने वाली कुल कटौती सामान्यतः कर्मचारी के वेतन के 50% से अधिक नहीं हो सकती।
उदाहरण - यदि कर्मचारी का वेतन = ₹20,000 है तो कटौती की अधिकतम कुल कटौती ₹20,000 × 50% = ₹10,000 अर्थात् सामान्य स्थिति में कर्मचारी को कम-से-कम ₹10,000 प्राप्त होना चाहिए।
विशेष स्थिति - यदि कटौती का कोई हिस्सा सहकारी संस्था को किए जाने वाले भुगतान के रूप में है, तो निर्धारित परिस्थितियों में कुल कटौती की सीमा 75% तक हो सकती है। इसलिए याद रखें सामान्य सीमा = 50% सहकारी संस्था से संबंधित विशेष स्थिति = 75% तक हो सकती है।
धारा 19 : जुर्माना - नियोक्ता कर्मचारी के विरुद्ध जुर्माना लगाना चाहता है तो उसे संहिता द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा। जुर्माना मनमाने ढंग से नहीं लगाया जा सकता।
प्रमुख सिद्धांत - कर्मचारी को उसके विरुद्ध प्रस्तावित जुर्माने के बारे में जानकारी होनी चाहिए। उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। जुर्माना निर्धारित सीमा और प्रक्रिया के अनुसार होना चाहिए। जुर्माने की राशि का उपयोग निर्धारित कानूनी उद्देश्य के अनुरूप होना चाहिए।
उद्देश्य - इसका उद्देश्य यह रोकना है कि नियोक्ता अनुशासन के नाम पर कर्मचारी से मनमाना धन वसूल करे।
धारा 20 - अनुपस्थिति के कारण कटौती - यदि कर्मचारी अपनी ड्यूटी से अनुपस्थित रहता है तो उसके वेतन से उस अनुपस्थिति के अनुपात में कटौती की जा सकती है। इसे कटौती for absence from duty कहा जाता है।
उदाहरण - यदि कर्मचारी ने एक दिन काम नहीं किया और वह अनुपस्थिति अधिकृत नहीं थी, तो नियमानुसार उस अवधि के लिए वेतन कट सकता है। लेकिन नियोक्ता कर्मचारी के अनुपस्थित रहने से कहीं अधिक राशि मनमाने ढंग से नहीं काट सकता।
सामूहिक अनुपस्थिति - यदि कर्मचारियों का कोई समूह बिना उचित आधार के सामूहिक रूप से काम से अनुपस्थित रहता है, तो संहिता में इसके संबंध में विशेष व्यवस्था हो सकती है। इसका उद्देश्य अनधिकृत अनुपस्थिति और अनुशासनहीनता को नियंत्रित करना है, न कि कर्मचारी के वैध अधिकारों को समाप्त करना।
धारा 21 - कर्मचारी को हुई हानि की कटौती - यदि कर्मचारी की लापरवाही या चूक के कारण नियोक्ता की संपत्ति या धन को नुकसान होता है, तो निर्धारित परिस्थितियों में उस नुकसान की वसूली कर्मचारी के वेतन से की जा सकती है।लेकिन यह कटौती भी मनमानी नहीं हो सकती।
सिद्धांत - कटौती
• वास्तविक हानि से संबंधित होनी चाहिए
• कर्मचारी की जिम्मेदारी से संबंधित होनी चाहिए
• निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए
• कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए।
उदाहरण - मान लीजिए कर्मचारी को कंपनी की मशीन की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी और उसकी सिद्ध लापरवाही के कारण मशीन को ₹10,000 का नुकसान हुआ। कानून द्वारा निर्धारित शर्तों के अधीन नियोक्ता उस वास्तविक नुकसान की राशि की वसूली कर सकता है।
बोनस का भुगतान -
बोनस क्या है? - बोनस कर्मचारी को उसके वेतन के अतिरिक्त दिया जाने वाला वैधानिक भुगतान है, जो निर्धारित परिस्थितियों में उसके रोजगार और प्रतिष्ठान की पात्रता के आधार पर देय होता है। बोनस की व्यवस्था का उद्देश्य कर्मचारी को प्रतिष्ठान की आर्थिक उपलब्धि में भागीदारी प्रदान करना तथा औद्योगिक संबंधों में सहयोग की भावना विकसित करना है। वेतन संहिता, 2019 में बोनस संबंधी प्रमुख प्रावधान धारा 26 से आगे दिए गए हैं।
धारा 26 - बोनस की पात्रता - बोनस पाने के लिए कर्मचारी को संहिता में निर्धारित पात्रता की शर्तें पूरी करनी होती हैं। इसमें यह देखा जाता है कि -
1. कर्मचारी ने संबंधित लेखा वर्ष में निर्धारित दिनों तक कार्य किया है या नहीं।
2. उसका वेतन/मजदूरी सरकार द्वारा निर्धारित पात्रता सीमा के भीतर है या नहीं।
3. प्रतिष्ठान संहिता के बोनस संबंधी प्रावधानों के अंतर्गत आता है या नहीं।
बोनस हेतु न्यूनतम कार्य-दिवस - बोनस की पात्रता के संदर्भ में कर्मचारी द्वारा संबंधित लेखा वर्ष में कम-से-कम 30 दिन कार्य करने की शर्त महत्वपूर्ण है। अर्थात् केवल थोड़े समय के लिए काम करने वाला व्यक्ति स्वतः बोनस का पात्र नहीं हो जाता।
बोनस की न्यूनतम दर - वेतन संहिता की बोनस व्यवस्था में पात्र कर्मचारी को निर्धारित परिस्थितियों में न्यूनतम बोनस प्राप्त होता है।
न्यूनतम बोनस - 8⅓% वेतन या 100 रुपए इनमें जो अधिक हो, वह न्यूनतम बोनस की गणना में महत्वपूर्ण है।
उदाहरण - यदि गणना के अनुसार 8⅓% राशि ₹5,000 आती है, तो न्यूनतम बोनस ₹5,000 होगा। यदि 8⅓% राशि ₹80 आती है, तो न्यूनतम राशि ₹100 होगी।
धारा 29 - बोनस की गणना - बोनस की गणना के लिए कर्मचारी की पूरी वास्तविक मजदूरी को अनिवार्य रूप से आधार नहीं बनाया जाता। संहिता में बोनस की गणना के लिए निर्धारित वेतन/मजदूरी सीमा और संबंधित वैधानिक आधार का प्रयोग किया जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि अत्यधिक वेतन पाने वाले कर्मचारी के लिए बोनस की गणना भी कानून द्वारा निर्धारित सीमा के भीतर हो।
बोनस गणना का सरल सूत्र -
बोनस = बोनस हेतु निर्धारित वेतन × बोनस प्रतिशत
उदाहरण - मान लें बोनस के लिए निर्धारित वेतन ₹15,000 है और बोनस दर 8⅓% है तो ₹15,000 × 8⅓%
≈ ₹1,250 प्रति माह के समतुल्य वार्षिक आधार पर ₹1,250 × 12 = ₹15,000।यह केवल समझाने का उदाहरण है, वास्तविक गणना में संबंधित वैधानिक प्रावधान और लेखा वर्ष के वास्तविक कार्य/वेतन को ध्यान में रखा जाता है।
धारा 31 : बोनस का भुगतान - बोनस का भुगतान उस लेखा वर्ष के आधार पर किया जाता है जिसमें कर्मचारी ने कार्य किया है।
लेखा वर्ष का महत्व - बोनस की गणना के लिए पहले संबंधित लेखा वर्ष निर्धारित किया जाता है। फिर देखा जाता है - • कर्मचारी ने कितने दिन काम किया?
• उसका पात्र वेतन कितना था?
• प्रतिष्ठान का उपलब्ध अधिशेष कितना है?
• बोनस की न्यूनतम अथवा अधिकतम सीमा क्या होगी?
इसके बाद बोनस की राशि निर्धारित की जाती है।
धारा 32 - बोनस से संबंधित विवाद - यदि कर्मचारी और नियोक्ता के बीच बोनस की पात्रता अथवा भुगतान को लेकर विवाद उत्पन्न होता है तो संहिता में निर्धारित विवाद-निवारण तंत्र का प्रयोग किया जा सकता है।
उदाहरण - कर्मचारी कहता है कि मैं बोनस का पात्र हूँ जो ₹20,000 बोनस बनता है।
नियोक्ता कहता है कि तुम बोनस के पात्र नहीं हो।
ऐसे विवाद को संबंधित वैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से निर्धारित किया जा सकता है।
धारा 33 - बोनस के लिए गणना का आधार - बोनस की गणना में उत्पादन, उत्पादकता तथा उपलब्ध अधिशेष जैसी आर्थिक अवधारणाएँ महत्वपूर्ण हो सकती हैं। यहाँ दो महत्वपूर्ण अवधारणाएँ समझना आवश्यक है -
(क) Allocable Surplus - विनियोज्य अधिशेष वह निर्धारित अधिशेष है जो संहिता के अनुसार बोनस के भुगतान के लिए उपलब्ध माना जाता है। इसी के आधार पर कई परिस्थितियों में बोनस की वास्तविक दर निर्धारित होती है।
(ख) Set-on और Set-off - बोनस व्यवस्था में set-on और set-off की अवधारणाएँ महत्वपूर्ण हैं।
Set-on - यदि किसी वर्ष उपलब्ध अधिशेष इतना अधिक है कि उस वर्ष अधिकतम बोनस देने के बाद भी अधिशेष बच जाता है, तो निर्धारित सीमा के अनुसार उस अतिरिक्त राशि को आगामी वर्षों के लिए set-on किया जा सकता है।
Set-off - यदि किसी वर्ष उपलब्ध अधिशेष बोनस की न्यूनतम राशि देने के लिए पर्याप्त नहीं है, तो निर्धारित व्यवस्था के अनुसार पूर्व वर्षों की set-on राशि का उपयोग किया जा सकता है। इसे set-off कहा जाता है।
उदाहरण - मान लें
वर्ष 1- बहुत अधिक अधिशेष → अतिरिक्त राशि बची → Set-on
वर्ष 2 - कम अधिशेष → पिछले वर्ष की Set-on राशि का उपयोग → Set-off
इससे बोनस व्यवस्था में वर्ष-दर-वर्ष आर्थिक उतार-चढ़ाव का संतुलन बनाया जाता है।
धारा 34 - बोनस की अधिकतम सीमा - बोनस की कोई असीमित राशि कर्मचारी को अनिवार्य रूप से नहीं दी जाती।
वैधानिक अधिकतम बोनस की सीमा 20% तक हो सकती है। अर्थात् सामान्य वैधानिक ढाँचे में
न्यूनतम बोनस = 8⅓%
अधिकतम बोनस = 20%
धारा 36 : बोनस की पात्रता से वंचित होना - कुछ परिस्थितियों में कर्मचारी बोनस पाने के अधिकार से वंचित हो सकता है। विशेष रूप से यदि कर्मचारी को संबंधित लेखा वर्ष में कानून द्वारा निर्धारित गंभीर कदाचार के कारण सेवा से हटाया गया हो, तो वह बोनस के अधिकार से वंचित हो सकता है।
उदाहरण -
• धोखाधड़ी
• प्रतिष्ठान में हिंसक व्यवहार
• प्रतिष्ठान की संपत्ति की चोरी या गबन,
• गंभीर कदाचार
जैसी परिस्थितियाँ महत्वपूर्ण हो सकती हैं।इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बोनस का वैधानिक अधिकार गंभीर कदाचार के मामलों में भी बिना किसी अपवाद के लागू न हो।
धारा 39 : बोनस के संबंध में विशेष प्रावधान - धारा 39 बोनस व्यवस्था के कुछ विशेष पहलुओं से संबंधित है और इसे बोनस के सामान्य अधिकार, गणना तथा वैधानिक समायोजन की व्यापक व्यवस्था के साथ पढ़ना चाहिए। परीक्षा की दृष्टि से यहाँ मुख्य बात यह है कि बोनस का निर्धारण केवल कर्मचारी के मूल वेतन को देखकर नहीं किया जाता, बल्कि -
पात्रता + लेखा वर्ष + निर्धारित वेतन + उपलब्ध अधिशेष + न्यूनतम/अधिकतम सीमा + वैधानिक समायोजन को ध्यान में रखा जाता है।
बोनस निर्धारण की पूरी प्रक्रिया एक उदाहरण - मान लें किसी प्रतिष्ठान में कर्मचारी A ने पूरे लेखा वर्ष में कार्य किया।उसकी बोनस-गणना के लिए निर्धारित वेतन = ₹15,000 प्रति माह।
चरण 1 - पात्रता - A ने आवश्यक न्यूनतम दिनों से अधिक काम किया है तो A पात्र है।
चरण 2 - न्यूनतम बोनस न्यूनतम 8⅓% की दर से ₹15,000 × 8⅓% ≈ ₹1,250 प्रति माह वार्षिक आधार: ₹1,250 × 12 = ₹15,000 बोनस।
चरण 3 : अधिकतम सीमा - यदि उपलब्ध अधिशेष के आधार पर अधिक बोनस बनता है, तो भी सामान्य वैधानिक अधिकतम सीमा 20% तक होगी।₹15,000 × 20% = ₹3,000 प्रति माह के समतुल्य।
चरण 4 - Set-on / Set-off - यदि प्रतिष्ठान के अधिशेष में वर्ष-दर-वर्ष अंतर है तो निर्धारित नियमों के अनुसार पिछले वर्षों की set-on/set-off राशि को ध्यान में रखा जा सकता है।
चरण 5 - भुगतान - निर्धारित समय-सीमा के भीतर कर्मचारी को बोनस का भुगतान किया जाएगा।
नोट -
वेतन भुगतान की विधि धारा 15
वेतन अवधि धारा 16
वेतन भुगतान का समय धारा 17
वेतन से कटौती धारा 18 - अधिकतम कटौती 50%, सहकारी संस्था संबंधी विशेष सीमा 75% तक
जुर्माना धारा 19
अनुपस्थिति की कटौती धारा 20
कर्मचारी से हुई हानि की वसूली धारा 21
बोनस की पात्रता धारा 26
बोनस की गणना धारा 29
बोनस भुगतान धारा 31
बोनस संबंधी विवाद/प्रक्रिया धारा 32 आदि
बोनस निर्धारण की अवधारणाएँ - Allocable Surplus, Set-on, Set-off, अधिकतम बोनस 20% न्यूनतम बोनस 8⅓% या ₹100, जो अधिक हो
गंभीर कदाचार का प्रभाव धारा 36
प्रवर्तन/निरीक्षण व्यवस्था Inspector-cum-Facilitator
सूत्र - वेतन भुगतान = विधि → अवधि → समय → प्रवर्तन
वेतन कटौती - केवल अधिकृत कटौती → निर्धारित प्रक्रिया → सीमा 50% → विशेष स्थिति में 75%
बोनस - पात्रता → लेखा वर्ष → गणना → Allocable Surplus → Set-on/Set-off → न्यूनतम 8⅓% → अधिकतम 20% → समय पर भुगतान
निष्कर्ष - वेतन संहिता, 2019 में वेतन संबंधी व्यवस्था का मूल दर्शन यह है कि कर्मचारी को उसका वेतन समय पर और सुरक्षित रूप से मिले तथा नियोक्ता केवल विधि द्वारा अनुमत परिस्थितियों में ही उसमें कटौती कर सके। बोनस व्यवस्था इसके आगे कर्मचारी को प्रतिष्ठान की आर्थिक उपलब्धि में वैधानिक भागीदारी देती है। इस प्रकार धारा 15 से 21 वेतन की सुरक्षा और धारा 26 से 39 बोनस के अधिकार एवं निर्धारण का महत्वपूर्ण ढाँचा प्रस्तुत करती हैं।
दूसरी विधि: प्रस्ताव प्रकाशित करना -
सरकार समिति बनाने के बजाय प्रस्तावित न्यूनतम मजदूरी की दरों को अधिसूचना द्वारा प्रकाशित कर सकती है।
इस अधिसूचना में प्रभावित व्यक्तियों से आपत्तियां और सुझाव प्राप्त करने के लिए एक तारीख निर्धारित की जाती है, जो अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख से कम से कम दो महीने बाद होनी चाहिए।
प्राप्त आपत्तियों और सुझावों पर विचार करने के बाद सरकार अंतिम न्यूनतम मजदूरी निर्धारित या संशोधित करती है।
सलाहकार बोर्ड की भूमिका - जहां सरकार प्रस्ताव प्रकाशित करके न्यूनतम मजदूरी में संशोधन करती है, वहां संबंधित सलाहकार बोर्ड से परामर्श करना भी आवश्यक है।
इस प्रकार न्यूनतम मजदूरी का निर्धारण केवल सरकारी निर्णय नहीं है, बल्कि इसमें नियोक्ताओं, कर्मचारियों और स्वतंत्र विशेषज्ञों के विचारों को भी स्थान दिया गया है।
फ्लोर वेज और न्यूनतम मजदूरी का संबंध - वेतन संहिता में फ्लोर वेज (Floor Wage) की भी व्यवस्था की गई है। केंद्र सरकार न्यूनतम जीवन-स्तर को ध्यान में रखते हुए फ्लोर वेज निर्धारित कर सकती है और विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के लिए अलग-अलग फ्लोर वेज भी निर्धारित किया जा सकता है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि उपयुक्त सरकार द्वारा धारा 6 के अंतर्गत निर्धारित न्यूनतम मजदूरी केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित फ्लोर वेज से कम नहीं हो सकती।
नियोक्ता का दायित्व - न्यूनतम मजदूरी निर्धारित हो जाने के बाद नियोक्ता का प्रमुख दायित्व है कि वह कर्मचारी को निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान न करे। यदि कोई नियोक्ता निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान करता है, तो वह वेतन संहिता के प्रावधानों का उल्लंघन करता है।
उदाहरण - मान लीजिए किसी राज्य सरकार ने किसी कुशल श्रमिक के लिए न्यूनतम मजदूरी 700 रुपये प्रतिदिन निर्धारित की है।
अब कोई नियोक्ता उस श्रमिक को केवल 600 रुपये प्रतिदिन देता है तो यह भुगतान कानून के अनुरूप नहीं होगा, क्योंकि कर्मचारी को निर्धारित न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान किया गया है।
इसी प्रकार यदि सरकार बाद में महंगाई और जीवन-यापन की लागत को ध्यान में रखते हुए न्यूनतम मजदूरी को 750 रुपये प्रतिदिन कर देती है, तो संशोधित दर लागू होने के बाद नियोक्ता को 750 रुपये की न्यूनतम दर का पालन करना होगा।
न्यूनतम मजदूरी निर्धारण का उद्देश्य -
•. श्रमिकों को आर्थिक शोषण से बचाना।
•. श्रमिकों को न्यूनतम आय की कानूनी सुरक्षा देना।
•. जीवन-यापन की आवश्यकताओं को ध्यान में रखना।
• कौशल के अनुसार उचित मजदूरी सुनिश्चित करना।
• कठिन और जोखिमपूर्ण कार्य के लिए उचित मजदूरी का आधार बनाना।
• महंगाई के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए मजदूरी का पुनरीक्षण करना।
• देश में न्यूनतम मजदूरी के लिए एक आधारभूत व्यवस्था तैयार करना।
निष्कर्ष - वेतन संहिता, 2019 की धारा 6 न्यूनतम मजदूरी की पूरी व्यवस्था की आधारशिला है। इसके अंतर्गत उपयुक्त सरकार का दायित्व है कि वह कर्मचारियों के लिए न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करे। न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करते समय श्रमिक के कौशल, भौगोलिक क्षेत्र तथा कार्य की कठिन और जोखिमपूर्ण परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाता है। समय-कार्य और टुकड़ा-कार्य दोनों के लिए न्यूनतम मजदूरी निर्धारित की जा सकती है। वहीं धारा 8 न्यूनतम मजदूरी के निर्धारण और पुनरीक्षण की प्रक्रिया बताती है तथा सामान्यतः पांच वर्ष से अधिक के अंतराल पर इसकी समीक्षा या पुनरीक्षण नहीं किया जाना चाहिए। इस प्रकार धारा 6 और धारा 8 मिलकर श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी की एक गतिशील और कानूनी सुरक्षा व्यवस्था स्थापित करती हैं।
दावे एवं विवाद का समाधान -
मजदूरी संहिता, 2019 (Code on Wages, 2019) में दावों और विवादों के समाधान की व्यवस्था अध्याय VI भुगतान की बकाया राशि, दावे एवं लेखा-परीक्षण तथा अध्याय IX के कुछ प्रावधानों में दी गई है। धारा 45, 46, 49, 57, 59 और 60 को परीक्षा की दृष्टि से क्रमबद्ध और उदाहरण सहित समझते हैं।
1. धारा 45 – संहिता के अंतर्गत दावे और उनकी प्रक्रिया - धारा 45 मजदूर को उसके वेतन, न्यूनतम मजदूरी, अनधिकृत कटौती, बोनस आदि से संबंधित बकाया राशि की वसूली के लिए दावा करने का प्रभावी तंत्र प्रदान करती है।
(क) दावा सुनने वाले प्राधिकारी की नियुक्ति - उपयुक्त सरकार अधिसूचना द्वारा एक या अधिक ऐसे प्राधिकारियों की नियुक्ति कर सकती है जो राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer) से नीचे के पद के न हों। इनका कार्य है -
I. उत्पन्न दावों को सुनना
II. दावे की जांच करना
III. कर्मचारी को देय राशि निर्धारित करना
IV. उचित स्थिति में क्षतिपूर्ति दिलाना।
(ख) क्षतिपूर्ति - प्राधिकारी केवल बकाया राशि दिलाने तक सीमित नहीं है।परिस्थितियों को देखते हुए वह बकाया राशि के अतिरिक्त क्षतिपूर्ति भी दिला सकता है, जो निर्धारित दावे की राशि के 10 गुना तक हो सकती है।
उदाहरण - यदि कर्मचारी की ₹10,000 मजदूरी गलत तरीके से रोक ली गई है, तो प्राधिकारी ₹10,000 बकाया राशि के साथ परिस्थितियों के अनुसार अधिकतम ₹1,00,000 तक क्षतिपूर्ति का आदेश दे सकता है। यह 10 गुना क्षतिपूर्ति अधिकतम सीमा है, अनिवार्य राशि नहीं।
(ग) तीन महीने में निर्णय का प्रयास - प्राधिकारी को दावा प्राप्त होने के बाद उसे तीन महीने के भीतर तय करने का प्रयास करना चाहिए। इसका उद्देश्य मजदूरी संबंधी मामलों का शीघ्र निपटारा है।
(घ) आदेश का भुगतान न करने पर वसूली - यदि नियोक्ता प्राधिकारी द्वारा निर्धारित राशि और क्षतिपूर्ति का भुगतान नहीं करता है, तो प्राधिकारी वसूली प्रमाण-पत्र (Recovery Certificate) कलेक्टर या जिला मजिस्ट्रेट को भेज सकता है, इसके बाद राशि को भू-राजस्व के बकाये (arrears of land revenue) की तरह वसूल किया जाएगा और कर्मचारी को भुगतान किया जाएगा।
कर्मचारी का दावा → प्राधिकारी का आदेश → नियोक्ता द्वारा भुगतान न करना → Recovery Certificate → कलेक्टर/DM → भू-राजस्व के बकाये की तरह वसूली।
(च) दावा कौन कर सकता है? - धारा 45(4) के अनुसार आवेदन कर सकता है
1. स्वयं संबंधित कर्मचारी
2. वह पंजीकृत ट्रेड यूनियन जिसका कर्मचारी सदस्य है
3. Inspector-cum-Facilitator
(छ) अनेक कर्मचारियों के लिए एक आवेदन - यदि किसी प्रतिष्ठान के अनेक कर्मचारियों का समान प्रकार का दावा है, तो नियमों के अधीन एक ही आवेदन अनेक कर्मचारियों की ओर से किया जा सकता है। इससे सामूहिक मजदूरी विवादों के निपटारे में सुविधा होती है।
(ज) दावा दाखिल करने की समय-सीमा - सामान्यतः दावा 3 वर्ष के भीतर दाखिल किया जा सकता है। लेकिन यदि देरी का पर्याप्त कारण (sufficient cause) हो, तो प्राधिकारी तीन वर्ष के बाद भी आवेदन स्वीकार कर सकता है।
(झ) सिविल कोर्ट जैसी शक्तियां - धारा 45(7) के अनुसार दावा प्राधिकारी और धारा 49 के अपीलीय प्राधिकारी को साक्ष्य लेने, गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित करने तथा दस्तावेज प्रस्तुत कराने के संबंध में सिविल न्यायालय जैसी शक्तियां प्राप्त हैं।
धारा 45 = दावा + प्राधिकारी + 10 गुना तक क्षतिपूर्ति + 3 वर्ष की सीमा + 3 महीने में निर्णय का प्रयास + वसूली प्रमाण-पत्र।
धारा 46 – विवादों का संदर्भ - धारा 46 विशेष रूप से बोनस संबंधी विवादों के समाधान से संबंधित है। यदि नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच निम्न विषयों पर विवाद हो -
(क) बोनस की राशि का निर्धारण - अर्थात् कर्मचारी को कितना बोनस दिया जाना चाहिए, इस संबंध में विवाद।
(ख) बोनस पाने की पात्रता - कर्मचारी बोनस पाने का पात्र है या नहीं, इस विषय में विवाद।
(ग) सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान में बोनस संबंधी संहिता की प्रयोज्यता - यदि यह विवाद हो कि Code on Wages के बोनस संबंधी प्रावधान किसी सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान पर लागू होते हैं या नहीं, तो भी धारा 46 लागू होती है। ऐसा विवाद Industrial Disputes Act, 1947 के अर्थ में औद्योगिक विवाद माना जाता है।
उदाहरण - मान लीजिए किसी कंपनी में कर्मचारी कहते हैं कि हम बोनस के पात्र हैं और हमें ₹20,000 बोनस मिलना चाहिए।
नियोक्ता कहता है कि आप बोनस के पात्र ही नहीं हैं। यह सामान्य व्यक्तिगत वेतन-दावा मात्र नहीं है, बल्कि बोनस की पात्रता से जुड़ा विवाद है। धारा 46 के तहत इसे औद्योगिक विवाद के रूप में देखा जाएगा।
सूत्र - धारा 46 = बोनस की राशि + बोनस की पात्रता + सार्वजनिक क्षेत्र में बोनस प्रावधान की प्रयोज्यता।
धारा 49 – अपील - यदि धारा 45 के अंतर्गत नियुक्त प्राधिकारी के आदेश से कोई व्यक्ति व्यथित (aggrieved) है, तो उसे अपील का अधिकार है।
(क) अपील कहां? - अपील उस अपीलीय प्राधिकारी (Appellate Authority) के समक्ष की जाएगी जिसे उपयुक्त सरकार अधिसूचना द्वारा नियुक्त करती है।
(ख) समय-सीमा - अपील आदेश की तारीख से 90 दिनों के भीतर करनी होती है।
(ग) विलंबित अपील - यदि 90 दिन की अवधि समाप्त हो गई है, तब भी अपीलीय प्राधिकारी अपील स्वीकार कर सकता है, यदि वह संतुष्ट हो कि देरी का पर्याप्त कारण था।
उदाहरण - प्राधिकारी ने नियोक्ता को कर्मचारी को ₹50,000 मजदूरी तथा क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया है और
नियोक्ता आदेश से असंतुष्ट है तो 90 दिनों के भीतर → अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष → अपील कर सकता है।
महत्वपूर्ण - धारा 45 के मूल दावे की समय-सीमा 3 वर्ष है, जबकि धारा 49 में आदेश के विरुद्ध अपील की सामान्य अवधि 90 दिन है।
विशेष -
धारा 45 = Claim
धारा 49 = Appeal
धारा 57 – वाद पर रोक (Bar of Suits) - धारा 57 का उद्देश्य एक ही मजदूरी संबंधी मामले को अलग-अलग कानूनी मंचों पर बार-बार उठाने से रोकना है। इसके अनुसार न्यायालय ऐसे दावे की वसूली के लिए वाद स्वीकार नहीं करेगा, जहां दावा निम्न विषयों से संबंधित हो:
न्यूनतम मजदूरी
मजदूरी से की गई कटौती
मजदूरी में भेदभाव
बोनस का भुगतान
और संबंधित राशि
(a) धारा 45 के अंतर्गत दावे का विषय है या
(b) संहिता के अंतर्गत किसी निर्देश का विषय बन चुकी है या
(c) संहिता के अंतर्गत किसी कार्यवाही में तय हो चुकी है या
(d) संहिता के अंतर्गत वसूल की जा सकती थी।
इसका उद्देश्य - यह प्रावधान दोहरी कार्यवाही (parallel proceedings) और परस्पर विरोधी निर्णयों को रोकता है।
उदाहरण - एक कर्मचारी ने ₹30,000 न्यूनतम मजदूरी की वसूली के लिए धारा 45 के अंतर्गत दावा कर दिया। अब उसी ₹30,000 के लिए वह अलग से सामान्य सिविल वाद दायर करके दोहरा उपाय नहीं अपना सकता, क्योंकि मामला संहिता की दावा-प्रक्रिया के अंतर्गत आ चुका है। जहाँ मजदूरी, कटौती, भेदभाव या बोनस से संबंधित राशि Code on Wages के अंतर्गत निर्धारित या वसूल की जा सकती है, वहां उसी राशि की वसूली के लिए अलग सिविल वाद पर रोक है।
धारा 59 – भार-ए-प्रमाण (Burden of Proof) - यह मजदूरों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सुरक्षात्मक प्रावधान है। सामान्य स्थिति में जिस व्यक्ति का दावा होता है, उसे अपने दावे को सिद्ध करना पड़ सकता है। लेकिन धारा 59 कुछ विशेष मजदूरी संबंधी दावों में भुगतान सिद्ध करने का भार नियोक्ता पर डालती है।
किन मामलों में? - जब दावा हो -
1. पारिश्रमिक (remuneration) का भुगतान नहीं किया गया
2. बोनस का भुगतान नहीं किया गया
3. कम मजदूरी या कम बोनस दिया गया
4. संहिता द्वारा अधिकृत न होने वाली कटौती मजदूरी से की गई।
ऐसे मामले में यह सिद्ध करने का भार नियोक्ता पर होगा कि संबंधित बकाया राशि का भुगतान किया जा चुका है।
उदाहरण - राम कहता है कि मुझे जुलाई की ₹15,000 मजदूरी नहीं मिली।
नियोक्ता कहता है कि मैंने मजदूरी दे दी थी। अब केवल कर्मचारी से यह अपेक्षा नहीं की जाएगी कि वह भुगतान न मिलने की असंभव बात साबित करे। भुगतान किया गया था, यह सिद्ध करने का भार नियोक्ता पर होगा।
नियोक्ता इसके लिए वेतन रजिस्टर, बैंक रिकॉर्ड, भुगतान रसीद आदि प्रस्तुत कर सकता है।
इस धारा का महत्व - यह प्रावधान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि
• भुगतान के रिकॉर्ड नियोक्ता के पास होते हैं
• कर्मचारी के लिए भुगतान नहीं हुआ सिद्ध करना कठिन हो सकता है;
• इससे नियोक्ता को अपने भुगतान अभिलेख व्यवस्थित रखने के लिए प्रोत्साहन मिलता है।
धारा 59 = भुगतान किया गया, यह साबित करने की जिम्मेदारी नियोक्ता की।
धारा 60 – अधिकार छोड़ने का अनुबंध (Contracting Out) - धारा 60 मजदूर के वैधानिक अधिकारों की रक्षा करती है। यदि कोई अनुबंध या समझौता ऐसा है जिसमें कर्मचारी - मजदूरी की संहिता के तहत मिलने वाली किसी राशि के अपने अधिकार को छोड़ देता है या
बोनस पाने का अपना अधिकार छोड़ देता है तो ऐसा अनुबंध या समझौता उतनी सीमा तक शून्य (null and void) होगा, जितनी सीमा तक वह व्यक्ति की भुगतान संबंधी कानूनी देयता को समाप्त या कम करने का प्रयास करता है।
उदाहरण 1: मजदूरी - नियोक्ता कर्मचारी से लिखवा लेता है कि मैं न्यूनतम मजदूरी से कम ₹8,000 मासिक मजदूरी स्वीकार करता हूं और भविष्य में न्यूनतम मजदूरी की मांग नहीं करूंगा। ऐसा समझौता उस सीमा तक प्रभावहीन होगा जिस सीमा तक वह Code on Wages के तहत कर्मचारी की वैधानिक मजदूरी को कम करता है।
उदाहरण 2: बोनस - नियोक्ता कर्मचारी से लिखवा देता है मैं इस वर्ष मिलने वाले वैधानिक बोनस का दावा नहीं करूंगा। यदि बोनस संहिता के तहत वास्तव में देय है, तो केवल ऐसे समझौते के आधार पर कर्मचारी का वैधानिक अधिकार समाप्त नहीं किया जा सकता।
धारा 60 का मूल सिद्धांत - कानून द्वारा दिया गया मजदूरी का अधिकार निजी अनुबंध से छीना नहीं जा सकता।
सभी धाराओं का सार -
45 - दावे और प्रक्रिया दावा सुनने वाला प्राधिकारी, 10 गुना तक क्षतिपूर्ति, 3 वर्ष की सीमा
46 - विवादों का संदर्भ बोनस संबंधी विवाद को औद्योगिक विवाद माना जाता है
49 - अपील धारा 45 के आदेश के विरुद्ध 90 दिन में अपील
57 - वाद पर रोक Code के अंतर्गत उपलब्ध दावे के लिए अलग सिविल वाद पर रोक
59 - भार-ए-प्रमाण भुगतान किया गया था, यह सिद्ध करने का भार नियोक्ता पर
60 - Contracting Out कर्मचारी अपने वैधानिक मजदूरी/बोनस अधिकार को अनुबंध से छोड़ नहीं सकता
पूरी प्रक्रिया का Flow - मजदूरी/बोनस संबंधी अधिकार का उल्लंघन - धारा 45 के अंतर्गत दावा - राजपत्रित अधिकारी से नीचे न होने वाला नियुक्त प्राधिकारी - दावा निर्धारित + परिस्थितियों में 10 गुना तक क्षतिपूर्ति - नियोक्ता भुगतान न करे तो Recovery Certificate -कलेक्टर/DM द्वारा भू-राजस्व के बकाये की तरह वसूली - असंतुष्ट पक्ष → धारा 49 के तहत 90 दिन में अपील - और साथ-साथ में
बोनस का विशेष विवाद - धारा 46 - अलग सिविल वाद - धारा 57 द्वारा रोक -
भुगतान सिद्ध करने का भार - धारा 59 में नियोक्ता - अधिकार छोड़ने का समझौता - धारा 60 में प्रभावहीन।
निष्कर्ष - मजदूरी संहिता, 2019 की धारा 45 से 60 तक की व्यवस्था का मूल उद्देश्य कर्मचारी को उसकी वैधानिक मजदूरी और बोनस शीघ्र तथा प्रभावी रूप से दिलाना है। धारा 45 दावा-निवारण की व्यवस्था करती है, धारा 46 बोनस संबंधी विवादों को औद्योगिक विवाद के रूप में मानती है, धारा 49 अपील का अधिकार देती है, धारा 57 समान दावे के लिए अलग वाद को रोकती है, धारा 59 भुगतान सिद्ध करने का भार नियोक्ता पर डालती है तथा धारा 60 कर्मचारी को अपने वैधानिक मजदूरी एवं बोनस अधिकारों को अनुबंध द्वारा त्यागने से संरक्षण प्रदान करती है।
वेतन संहिता, 2019 में प्रवर्तन (Enforcement) -
निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता, उसकी नियुक्ति एवं शक्तियाँ, नियोक्ता द्वारा अभिलेखों का संधारण तथा कंपनियों/निदेशकों/प्रबंधकों द्वारा किए गए अपराधों और उनकी शिकायत की प्रक्रिया धारा 50, 51 और 55 -
प्रवर्तन - किसी कानून को केवल बना देना पर्याप्त नहीं होता। उसके प्रावधानों का वास्तविक रूप से पालन करवाने के लिए निरीक्षण, रिकॉर्ड की जाँच, उल्लंघन की पहचान और दोषी व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई की व्यवस्था आवश्यक होती है। वेतन संहिता, 2019 में इस कार्य के लिए Inspector-cum-Facilitator (निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता) की व्यवस्था की गई है। इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल नियोक्ता को दंडित करना नहीं, बल्कि -
1. श्रमिकों को उनके वैधानिक वेतन संबंधी अधिकार दिलाना,
2. नियोक्ताओं को कानून का पालन करने में सहायता देना,
3. रिकॉर्ड एवं दस्तावेजों की जाँच करना,
4. उल्लंघनों की पहचान करना तथा
5. आवश्यकता होने पर कानूनी कार्रवाई करना है।
निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता - निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता वह अधिकारी है जिसे उपयुक्त सरकार द्वारा वेतन संहिता के अनुपालन की निगरानी और नियोक्ताओं को कानून के अनुपालन के संबंध में मार्गदर्शन देने के लिए नियुक्त किया जाता है। यहाँ इसकी दो भूमिकाएँ संयुक्त हैं -
Inspector = निरीक्षण एवं प्रवर्तन
Facilitator = मार्गदर्शन एवं सुविधा प्रदान करना
अर्थात अधिकारी का उद्देश्य केवल गलती पकड़ना नहीं है, बल्कि नियोक्ता को यह समझाना भी है कि कानून का सही पालन किस प्रकार किया जाए।
निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता की नियुक्ति - धारा 51 के अंतर्गत उपयुक्त सरकार द्वारा निर्धारित क्षेत्र हेतु निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता नियुक्त किए जा सकते हैं।
सरकार उनकी नियुक्ति कर अधिकार-क्षेत्र, शक्तियां एवं निरीक्षण प्रक्रिया का निर्धारण करती है। पूरे क्षेत्र में वेतन संबंधी कानूनों के अनुपालन की निगरानी के लिए प्रशासनिक तंत्र तैयार होता है।
निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता की अधिकारिता - निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता की अधिकारिता उस क्षेत्र और प्रतिष्ठान तक होती है जिसके संबंध में उसे सरकार द्वारा अधिकार दिया गया है। उसकी अधिकारिता में शामिल हैं -
1. प्रतिष्ठानों का निरीक्षण करना।
2. वेतन संबंधी रिकॉर्ड देखना।
3. नियोक्ता से आवश्यक जानकारी प्राप्त करना।
4. श्रमिकों से आवश्यक पूछताछ करना।
5. वेतन भुगतान तथा कटौती की जाँच करना।
6. कानून के उल्लंघन की स्थिति में आवश्यक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू करना।
7. नियोक्ता को कानून के पालन के संबंध में मार्गदर्शन देना।
निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता की भूमिका
1. निरीक्षण की भूमिका - वह यह देखता है कि नियोक्ता वेतन संहिता के प्रावधानों का पालन कर रहा है या नहीं।
उदाहरण - यदि किसी कर्मचारी को निर्धारित न्यूनतम वेतन से कम भुगतान किया जा रहा है, तो निरीक्षक इसकी जाँच कर सकता है।
2. मार्गदर्शक की भूमिका - नियोक्ता को यह बताया जा सकता है कि
• रिकॉर्ड कैसे रखा जाए
• वेतन का भुगतान कैसे किया जाए
• कर्मचारियों को कौन-कौन से अधिकार प्राप्त हैं
• कानून के अनुसार कौन-सी प्रक्रियाएँ अपनानी आवश्यक हैं।
अनुपालन सुनिश्चित करने की भूमिका - निरीक्षक का प्रमुख उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कानून केवल कागज पर न रहे, बल्कि कार्यस्थल पर वास्तविक रूप से लागू हो।
शिकायतों एवं उल्लंघनों की जाँच - श्रमिकों से प्राप्त शिकायतों अथवा निरीक्षण में सामने आए उल्लंघनों की जाँच की जा सकती है।
निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता की शक्तियाँ - निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता को कानून के अनुपालन की जाँच के लिए विभिन्न शक्तियाँ प्रदान की गई हैं -
(i) प्रतिष्ठान में प्रवेश कर सकता है -
उचित समय पर उस स्थान में प्रवेश कर सकता है जहाँ कोई व्यक्ति कार्य करता है या जहाँ वेतन संहिता के प्रावधान लागू होते हैं।
(ii) निरीक्षण कर सकता है - वेतन भुगतान, कार्य के घंटे, कर्मचारियों से संबंधित जानकारी और अन्य संबंधित विषयों की जाँच कर सकता है।
(iii) रिकॉर्ड की जाँच कर सकता है - नियोक्ता द्वारा रखे गए रजिस्टर, रिकॉर्ड तथा अन्य दस्तावेजों की जाँच की जा सकती है।
(iv) दस्तावेज प्रस्तुत कराने की शक्ति - आवश्यक दस्तावेज अथवा जानकारी नियोक्ता से प्रस्तुत करने के लिए कहा जा सकता है।
(v) व्यक्तियों से पूछताछ - नियोक्ता, प्रबंधक या कर्मचारियों से आवश्यक जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
(vi) प्रतिलिपि/दस्तावेज प्राप्त करना -
कानून के अनुसार आवश्यक रिकॉर्ड या उसकी प्रतिलिपि प्राप्त की जा सकती है।
इस प्रकार निरीक्षक की शक्ति का मूल उद्देश्य वेतन संबंधी कानून के अनुपालन की जाँच है, न कि अनावश्यक हस्तक्षेप करना।
नियोक्ता द्वारा रिकॉर्ड संधारण - वेतन कानूनों को प्रभावी बनाने के लिए रिकॉर्ड का सही रखरखाव अत्यंत महत्वपूर्ण है।
नियोक्ता को निर्धारित तरीके से आवश्यक -
कर्मचारियों का विवरण,
कार्य किए गए दिनों/समय का विवरण,
वेतन,
• वेतन की दर
• भुगतान की तिथि
• वेतन से की गई कटौतियाँ
• बोनस तथा अन्य वैधानिक भुगतान
• आवश्यक रजिस्टर एवं रिकॉर्ड
का संधारण करना होता है।
रिकॉर्ड संधारण का उद्देश्य - रिकॉर्ड रखने से यह पता लगाया जा सकता है कि
1. कर्मचारी को सही वेतन मिला या नहीं।
2. न्यूनतम वेतन का पालन हुआ या नहीं।
3. वेतन का भुगतान समय पर हुआ या नहीं।
4. अवैध कटौती की गई या नहीं।
5. बोनस या अन्य देय राशि का भुगतान हुआ या नहीं।
नोट - रिकॉर्ड नियोक्ता के लिए केवल प्रशासनिक कागज नहीं, बल्कि वैधानिक अनुपालन का प्रमाण होता है।
7. कंपनियों द्वारा किए गए अपराध - यदि अपराध किसी कंपनी द्वारा किया जाता है तो जिम्मेदारी किसकी होगी? वेतन संहिता में कंपनी द्वारा किए गए अपराधों के लिए कंपनी के साथ-साथ कुछ जिम्मेदार व्यक्तियों पर भी दायित्व निर्धारित किया गया है। कंपनी एक कृत्रिम कानूनी व्यक्ति है। वह स्वयं भौतिक रूप से अपराध नहीं करती। इसलिए कानून यह देखता है कि अपराध के समय कंपनी के कार्यों के लिए कौन व्यक्ति प्रभारी और उत्तरदायी था। ऐसे मामलों में निम्न व्यक्ति महत्वपूर्ण होते हैं -
• कंपनी
• बोर्ड/बोर्ड के सदस्य
• निदेशक
• प्रबंधक (मैनेजर)
• अन्य जिम्मेदार अधिकारी,
• नियोक्ता।
कंपनी की जिम्मेदारी - यदि कंपनी वेतन संहिता के किसी प्रावधान का उल्लंघन करती है तो कंपनी स्वयं अपराध के लिए उत्तरदायी हो सकती है।
निदेशक/प्रबंधक की जिम्मेदारी - यदि अपराध कंपनी की सहमति, मिलीभगत या उपेक्षा के कारण हुआ है, तो संबंधित जिम्मेदार निदेशक, प्रबंधक या अधिकारी भी उत्तरदायी हो सकता है। लेकिन केवल किसी व्यक्ति का कंपनी में निदेशक होना मात्र हर स्थिति में उसे स्वतः दोषी नहीं बना देता। यह देखना आवश्यक है कि वह व्यक्ति अपराध के समय कंपनी के कार्यों के संचालन के लिए प्रभारी और जिम्मेदार था या नहीं तथा अपराध उसकी सहमति, मिलीभगत या लापरवाही से हुआ था या नहीं।
बोर्ड, निदेशक, नियोक्ता और मैनेजर -
की व्यक्ति संभावित भूमिका -
• कंपनी मुख्य कानूनी इकाई जिसके द्वारा अपराध किया गया
• बोर्ड कंपनी के प्रबंधन/नीतिगत नियंत्रण से संबंधित
• निदेशक कंपनी के संचालन में जिम्मेदार व्यक्ति
• मैनेजर दैनिक प्रबंधन/प्रशासन के लिए जिम्मेदार हो सकता है
• नियोक्ता कर्मचारियों को नियोजित करने वाला व्यक्ति/संस्था
इन सब की जिम्मेदारी तथ्य और कानून में निर्धारित भूमिका पर निर्भर करती है, केवल पदनाम पर नहीं।
अपराधों की शिकायत - वेतन संहिता में शिकायत और अभियोजन के संबंध में विशेष प्रक्रिया निर्धारित की गई है। धारा 55 इस संबंध में महत्वपूर्ण है। इस हेतु सिद्धांत यह है कि वेतन संहिता के अंतर्गत अपराधों का संज्ञान लेने के लिए निर्धारित न्यायिक अधिकारी के समक्ष विधि के अनुसार शिकायत प्रस्तुत की जाती है। विशेष रूप से महानगरीय मजिस्ट्रेट (Metropolitan Magistrate) निर्धारित सक्षम न्यायालय ही अपराध का संज्ञान ले सकता है और शिकायत वैधानिक प्रक्रिया के अनुसार प्रस्तुत की जाती है।
धारा 50, 51 और 55 का सार -
धारा 50 - यह प्रावधान अपराधों के समझौते/Composition of Offences से संबंधित व्यवस्था के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य कुछ निर्धारित अपराधों को कानून में निर्धारित शर्तों के अधीन अभियोजन के स्थान पर निर्धारित प्रक्रिया द्वारा निपटाने की सुविधा देना है।
धारा 51 - यह निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता की नियुक्ति और उसके कार्य/अधिकार से संबंधित प्रमुख प्रावधान है। इसका उद्देश्य वेतन संहिता के अनुपालन की निगरानी तथा नियोक्ताओं को सुविधा एवं मार्गदर्शन देना है।
धारा 55 - यह अपराधों के संज्ञान/शिकायत की न्यायिक प्रक्रिया से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधान है। निर्धारित सक्षम न्यायालय के समक्ष वैधानिक तरीके से शिकायत/अभियोजन की व्यवस्था की जाती है।
उदाहरण - मान लीजिए X Ltd. अपने 100 कर्मचारियों को निर्धारित न्यूनतम वेतन से कम भुगतान करती है। निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता निरीक्षण करता है और
1. कर्मचारियों का रिकॉर्ड देखता है।
2. वेतन रजिस्टर की जाँच करता है।
3. बैंक/भुगतान संबंधी विवरण देखता है।
4. कर्मचारियों से जानकारी लेता है।
5. उल्लंघन पाए जाने पर नियोक्ता को अनुपालन के लिए निर्देश/मार्गदर्शन देता है।
6. यदि मामला अपराध की श्रेणी में आता है तो कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाती है।
7. कंपनी तथा अपराध के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका निर्धारित की जाती है।
8. आवश्यक होने पर निर्धारित न्यायालय के समक्ष शिकायत/अभियोजन की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
निष्कर्ष - वेतन संहिता, 2019 की प्रवर्तन व्यवस्था का मूल उद्देश्य श्रमिकों के वेतन संबंधी अधिकारों की रक्षा और नियोक्ताओं से कानून का पालन करवाना है। निरीक्षक-सह-सुविधाकर्ता इस व्यवस्था की रीढ़ है। वह एक ओर निरीक्षण करके उल्लंघन का पता लगाता है और दूसरी ओर नियोक्ता को कानून का पालन करने के लिए मार्गदर्शन देता है। नियोक्ता द्वारा उचित रिकॉर्ड का संधारण पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करता है। कंपनी द्वारा अपराध किए जाने पर कंपनी के साथ उन व्यक्तियों की जिम्मेदारी भी निर्धारित की जा सकती है जो अपराध के समय उसके संचालन के लिए जिम्मेदार थे।
सूत्र एक पंक्ति में -
निरीक्षक देखे→रिकॉर्ड जाँचे→सुविधा दे→उल्लंघन पकड़े→जिम्मेदारी तय हो→शिकायत/अभियोजन→न्यायिक कार्रवाई।
सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (Code on Social Security, 2020) में कर्मचारी भविष्य निधि से संबंधित पुराने कर्मचारी भविष्य निधि एवं प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 (EPF & MP Act, 1952)
इन उपबंधों को सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के अध्याय III, धारा 14 से 23 में समाहित किया गया है। 1952 का अधिनियम भविष्य निधि, पेंशन तथा जमा-सम्बद्ध बीमा की व्यवस्था करने के लिए बनाया गया था।
कर्मचारी भविष्य निधि का अर्थ - कर्मचारी भविष्य निधि (Employees' Provident Fund/EPF) सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था है, जिसमें कर्मचारी के वेतन से निर्धारित अंशदान और नियोक्ता का अंशदान जमा होता है। कर्मचारी की सेवा समाप्ति, सेवानिवृत्ति आदि के समय यह राशि उसके लिए आर्थिक सुरक्षा का आधार बनती है। सरल शब्दों में आज की कमाई का एक हिस्सा सुरक्षित रखकर कर्मचारी के भविष्य को आर्थिक सुरक्षा देना ही भविष्य निधि की मूल भावना है।
1952 के अधिनियम का उद्देश्य कारखानों और अन्य प्रतिष्ठानों में कर्मचारियों के लिए Provident Fund, Pension Fund और Deposit-linked Insurance Fund की स्थापना करना था। सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 का उद्देश्य कई सामाजिक - सुरक्षा कानूनों को एकीकृत करना है। इसमें EPF से संबंधित विषय Chapter III - Employees Provident Fund में रखे गए हैं। पुराने EPF अधिनियम, 1952 को Code में समाहित किया गया है। पुराने अधिनियम के अंतर्गत बनी योजनाओं को भी संक्रमणकाल में जारी रखने का प्रावधान किया गया था, जब तक वे Code के अनुरूप हैं।
पुराने कानून और नई संहिता का संबंध - पुराना कानून सामाजिक सुरक्षा संहिता
- EPF & MP Act, 1952 Chapter III
EPF Scheme, 1952 EPF से संबंधित योजना हैं -
1. Employees' Pension Scheme 2. 1995 Pension व्यवस्था
3. EDLI Scheme, 1976 Deposit-linked insurance
4. EPFO Central Board/सामाजिक सुरक्षा संगठन की व्यवस्था
EPFO की आधिकारिक वेबसाइट पर वर्तमान में EPF Scheme, EPS तथा EDLI से संबंधित सामग्री भी उपलब्ध है।
सामाजिक सुरक्षा संहिता की धारा 14 से 23 -
धारा 14 – कर्मचारी भविष्य निधि - सामाजिक सुरक्षा संहिता का अध्याय III कर्मचारी भविष्य निधि से संबंधित है। इस अध्याय के अंतर्गत -
1. कर्मचारी भविष्य निधि
2. पेंशन योजना
3. जमा-सम्बद्ध बीमा योजना
4. Central Board
5. अंशदान
6. निधि का प्रबंधन
7. छूट
8. खातों का अंतरण
9. अपील
आदि की व्यवस्था की गई है।
लागू होने का सामान्य आधार - Code के अंतर्गत EPF अध्याय ऐसे प्रतिष्ठानों पर लागू होता है जिनमें 20 या अधिक कर्मचारी हों, subject to the conditions prescribed. EPFO के अध्ययन दस्तावेज में भी Chapter III के लिए 20 से अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों तथा voluntary coverage का उल्लेख किया गया है। इसका अर्थ है कि कर्मचारी संख्या और प्रतिष्ठान की प्रकृति के आधार पर EPF व्यवस्था लागू होती है।
धारा 15 – योजनाएँ - इसके अंतर्गत सरकार द्वारा आवश्यक योजनाएँ बनाई जा सकती हैं। प्रायः तीन प्रकार की सामाजिक-सुरक्षा योजनाएँ महत्वपूर्ण हैं -
(A) Employees' Provident Fund Scheme - यह कर्मचारी की भविष्य निधि से संबंधित है। इसमें कर्मचारी का अंशदान,नियोक्ता का अंशदान, निधि में जमा राशि, ब्याज, निकासी और खाते का अंतरण आदि का प्रबंधन किया जाता है।
(B) Employees' Pension Scheme - यह कर्मचारी तथा उसके परिवार को सेवानिवृत्ति एवं अन्य निर्धारित परिस्थितियों में पेंशन संबंधी सुरक्षा प्रदान करती है।
(C) Employees' Deposit-Linked Insurance Scheme - कर्मचारी की मृत्यु की स्थिति में उसके नामित व्यक्ति/परिवार को बीमा लाभ देने की व्यवस्था इससे संबंधित है।
पुराने कानून में ये तीनों व्यवस्थाएँ अलग-अलग योजनाओं के माध्यम से संचालित होती थीं। EPFO आज भी EPF Scheme 1952, EPS 1995 और EDLI Scheme 1976 की आधिकारिक सामग्री प्रकाशित की गई।
धारा 16 – निधियाँ - सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के अंतर्गत निर्धारित निधियों का निर्माण किया जाता है। इन निधियों का उपयोग कानून द्वारा निर्धारित सामाजिक-सुरक्षा लाभ देने के लिए किया जाता है।
जिसका उद्देश्य हैं
कर्मचारी → अंशदान → निधि → निवेश/प्रबंधन → ब्याज/लाभ → कर्मचारी/परिवार
इस प्रकार EPF केवल बचत खाता नहीं है, बल्कि वैधानिक सामाजिक सुरक्षा तंत्र है।
धारा 17 – कर्मचारी और ठेकेदार द्वारा अंशदान - इस धारा के अनुसार EPF व्यवस्था लागू होती है, वहाँ कर्मचारी और नियोक्ता/ठेकेदार से संबंधित निर्धारित अंशदान जमा किया जाता है।
नियोक्ता की जिम्मेदारी - नियोक्ता का प्रमुख कर्तव्य है कि वह
1. कर्मचारियों को EPF व्यवस्था के अंतर्गत शामिल करना।
2. कर्मचारी का निर्धारित अंशदान काटना।
3. अपने हिस्से का निर्धारित अंशदान देना।
4. निर्धारित समय में राशि जमा करना।
5. आवश्यक रिकॉर्ड रखना।
6. संबंधित विवरण/रिटर्न प्रस्तुत करना।
ठेका श्रमिक - यदि कर्मचारी contractor के माध्यम से कार्य कर रहा है, तो भी सामाजिक सुरक्षा से उसका अधिकार समाप्त नहीं होता। Principal employer और contractor के संबंध में कानून दायित्व निर्धारित करता है। यही कारण है कि EPF कानून में contractor के माध्यम से नियोजित कर्मचारियों का प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण है।
कर्मचारी के अंशदान की प्रकृति - EPF में कर्मचारी के वेतन से निर्धारित अंशदान किया जाता है। EPF व्यवस्था में 12% कर्मचारी अंशदान और 12% नियोक्ता अंशदान होता है, हालांकि लागू wage components, statutory ceiling, exemptions और संबंधित scheme provisions के कारण प्रत्येक कर्मचारी के मामले में वास्तविक गणना अलग होती है।
उदाहरण - मान लीजिए EPF के लिए स्वीकार्य वेतन ₹15,000 है। यदि 12% की दर लागू हो तो कर्मचारी का अंशदान = ₹15,000 × 12% = ₹1,800, नियोक्ता का अंशदान = ₹15,000 × 12% = ₹1,800 कुल 3600 होगा। लेकिन नियोक्ता का पूरा ₹1,800 आवश्यक रूप से EPF खाते में ही नहीं जाता। लागू pension scheme के अनुसार उसका एक भाग pension fund में जा सकता है। इसलिए इसमें 12% + 12% लिखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि applicable scheme और wage ceiling का उल्लेख करना अधिक सही है।
धारा 18 – आयकर अधिनियम के अंतर्गत मान्यता - इस प्रावधान का उद्देश्य निर्धारित परिस्थितियों में भविष्य निधि को Income-tax law के अंतर्गत recognised provident fund के रूप में मान्यता से संबंधित व्यवस्था करना है।इसका महत्व कर्मचारी के लिए कर-संबंधी लाभों में भी दिखाई देता है।
धारा 19 – अन्य ऋणों पर अंशदान की प्राथमिकता - यदि किसी प्रतिष्ठान पर बहुत सारे ऋण हैं, तो EPF से संबंधित वैधानिक देयताओं को सामान्य ऋणों के ऊपर प्राथमिकता प्राप्त होती है। अर्थात।नियोक्ता की आर्थिक कठिनाई कर्मचारी की वैधानिक सामाजिक-सुरक्षा राशि को समाप्त नहीं कर सकती। यह प्रावधान कर्मचारियों के हितों की रक्षा करता है। पुराने EPF Act में भी section 11 के अंतर्गत contributions की priority over other debts का प्रावधान था।
धारा 20 – कुछ प्रतिष्ठानों पर यह लागू नहीं - हर प्रतिष्ठान पर EPF chapter स्वतः समान रूप से लागू नहीं होता। कुछ प्रतिष्ठानों को कानून/अनुसूची/निर्धारित शर्तों के आधार पर बाहर रखा जा सकता है। EPF की प्रयोज्यता प्रतिष्ठान की प्रकृति, कर्मचारी संख्या तथा संहिता एवं उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों/योजनाओं में निर्धारित शर्तों पर निर्भर करती है।
धारा 21 – नियोक्ता द्वारा Provident Fund Account का संचालन - कुछ परिस्थितियों में नियोक्ता को अपने स्तर पर भविष्य निधि खाते का संचालन करने की अनुमति दी जा सकती है, जिसे सामान्यतः exempted establishment की व्यवस्था से समझा जाता है। लेकिन ऐसी छूट का अर्थ यह नहीं है कि कर्मचारी के सामाजिक-सुरक्षा अधिकार समाप्त हो जाते हैं। नियोक्ता को निर्धारित वैधानिक मानकों का पालन करना होता है।
धारा 22 – खातों का अंतरण - कर्मचारी नौकरी बदलता है तो उसका EPF खाता समाप्त नहीं होता, नई नौकरी में उसका PF account/accumulated balance निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार transfer किया जा सकता है। इसका उद्देश्य है पुरानी नौकरी → EPF accumulation → नई नौकरी → नया रोजगार → निरंतर सामाजिक सुरक्षा।
इसलिए कर्मचारी नौकरी बदलने पर भविष्य निधि के अधिकार से वंचित नहीं होता है।
धारा 23 – अपील - यदि सक्षम प्राधिकारी द्वारा ऐसा आदेश पारित किया जाता है जिससे नियोक्ता या संबंधित व्यक्ति प्रभावित होता है, तो कानून पीड़ित को निर्धारित परिस्थितियों में Tribunal में appeal का अधिकार प्रदान करता है। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत से जुड़ा हुआ है क्योंकि प्रशासनिक/वैधानिक निर्धारण के विरुद्ध वैधानिक उपचार उपलब्ध होना आवश्यक है।
EPF व्यवस्था में Central Board - पुराने EPF Act में Central Board of Trustees की व्यवस्था थी। सामाजिक सुरक्षा संहिता में सामाजिक सुरक्षा संगठनों के अंतर्गत Central Board की व्यवस्था की गई है।
Central Board की भूमिका -
• निधि का प्रशासन
• योजनाओं का संचालन
• निवेश एवं वित्तीय प्रबंधन
• कर्मचारियों के PF हितों की देखरेख
• योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी
EPF, Pension और Insurance में अंतर -
आधार - EPF Pension - Insurance
उद्देश्य - भविष्य के लिए बचत - सेवानिवृत्ति / अन्य परिस्थितियों में आय मृत्यु की स्थिति में परिवार को सुरक्षा
लाभार्थी - कर्मचारी कर्मचारी/परिवार - नामित व्यक्ति/परिवार
प्रकृति - Provident Fund - Pension Life insurance-linked benefit
प्रमुख योजना - EPF Scheme - EPS EDLI
आधार - अंशदान आधारित - निर्धारित pension formula/conditions कर्मचारी की सेवा एवं scheme conditions
नियोक्ता के प्रमुख कर्तव्य - EPF व्यवस्था में employer की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है।
1. Registration - लागू होने पर प्रतिष्ठान का पंजीकरण करवाना आवश्यक है।
2. Employee enrolment - पात्र कर्मचारियों को EPF व्यवस्था में शामिल करना।
3. Contribution - कर्मचारी और employer का निर्धारित अंशदान जमा करना।
4. Records - वेतन, कर्मचारियों और अंशदान का उचित रिकॉर्ड रखना।
5. Timely deposit - अंशदान को समय पर जमा करना।
6. Compliance - EPFO/संबंधित प्राधिकारी के निर्देशों का पालन करना।
7. Contractor compliance - ठेका कर्मचारियों से संबंधित EPF दायित्वों की निगरानी करना।
17. कर्मचारी के अधिकार - कर्मचारी को मुख्यत -
(i) PF account का अधिकार
(ii) employer contribution का अधिकार
(iii) ब्याज/लाभ का अधिकार
(iv) निर्धारित परिस्थितियों में withdrawal का अधिकार
(v) नौकरी बदलने पर transfer का अधिकार
(vi) pensionary benefits का अधिकार
(vii) निर्धारित परिस्थितियों में परिवार को insurance/pension benefits
(viii) शिकायत/कानूनी उपचार का अधिकार
18. PF राशि पर सुरक्षा - भविष्य निधि का उद्देश्य कर्मचारी के भविष्य के लिए राशि सुरक्षित करना है। पुराने EPF कानून में भी PF राशि को attachment से संरक्षण देने का विशेष प्रावधान था। इसका सामाजिक महत्व बहुत बड़ा है क्योंकि सामान्यतः कर्मचारी की PF बचत को उसके भविष्य की आर्थिक सुरक्षा के लिए संरक्षित किया जाता है।
19. उल्लंघन की स्थिति में परिणाम - यदि employer कर्मचारी का अंशदान काटकर जमा नहीं करता, अपना अंशदान नहीं देता, PF देयता छिपाता है, गलत रिकॉर्ड रखता है, statutory compliance नहीं करता, तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार निर्धारण, वसूली, ब्याज, damages और दंडात्मक कार्रवाई हो सकती है। पुराने EPF Act में भी बकाया निर्धारण, recovery, damages तथा offences और penalties के विस्तृत प्रावधान थे।
सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से महत्व - EPF व्यवस्था का महत्व केवल सेवानिवृत्ति की बचत तक सीमित नहीं है।
इसके प्रमुख उद्देश्य हैं -
I. वृद्धावस्था में आर्थिक सुरक्षा
II. सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक सहायता
III. कर्मचारी के परिवार की सुरक्षा
IV. आकस्मिक मृत्यु की स्थिति में सहायता
V. रोजगार बदलने पर सामाजिक सुरक्षा की निरंतरता
VI. कर्मचारी और नियोक्ता दोनों में बचत की संस्कृति
VII. औपचारिक रोजगार को सामाजिक सुरक्षा से जोड़ना
यही व्यापक उद्देश्य सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में दिखाई देता है। संहिता का घोषित उद्देश्य संगठित, असंगठित तथा अन्य क्षेत्रों के कर्मचारियों और श्रमिकों तक सामाजिक सुरक्षा का विस्तार करना है।
महत्वपूर्ण धाराओं का सार -
धारा 14 → EPF Chapter
धारा 15 → Schemes
धारा 16 → Funds
धारा 17 → Contribution
धारा 18 → Income-tax recognition
धारा 19 → Priority over other debts
धारा 20 → Certain establishments excluded
धारा 21 → Employer-maintained PF accounts
धारा 22 → Transfer of accounts
धारा 23 → Appeal
निष्कर्ष - कर्मचारी भविष्य निधि एवं प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 भारतीय श्रम-कानून में कर्मचारी की सामाजिक सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार था। सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 ने इस व्यवस्था को अपने अध्याय III में समाहित किया है। इसका मूल दर्शन यह है कि कर्मचारी की वर्तमान मजदूरी का एक हिस्सा उसके भविष्य, सेवानिवृत्ति और परिवार की सुरक्षा के लिए संस्थागत रूप से सुरक्षित रहे। पुराने EPF Act में PF, Pension और Deposit-linked Insurance की जो त्रिस्तरीय व्यवस्था थी, उसका सार नई सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था में भी बना हुआ है।
एक लाइन में - EPF = कर्मचारी की वर्तमान आय का वैधानिक सामाजिक-सुरक्षा संचय + नियोक्ता का अंशदान + भविष्य में आर्थिक सुरक्षा।
महत्वपूर्ण वर्तमान कानूनी नोट - सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 का अधिनियमन 28 सितंबर 2020 को हुआ था, लेकिन इसकी धाराओं का प्रभाव notification/commencement से जुड़ा है। इसलिए किसी परीक्षा या व्यावहारिक कानूनी मामले में यह अलग से देखना जरूरी है कि संबंधित प्रावधान उस तारीख को प्रभावी हुआ था या नहीं।
कर्मचारी राज्य बीमा (ESI) - गठन
प्रबंधन, शक्तियां, (नियोक्ता एवं कर्मचारी का) योगदान, ESI कोष का प्रशासन, प्रबंधन, निवेश एवं देय लाभ, ECI अस्पताल, दावे (न्यायालय), दंड -
कर्मचारी राज्य बीमा (Employees’ State Insurance, ESI) कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 (ESI Act, 1948) के आधार पर लागू होती है। ESI एक सामाजिक सुरक्षा योजना है, जिसका उद्देश्य बीमित कर्मचारियों और उनके परिवार को बीमारी, मातृत्व, रोजगारजनित चोट, अपंगता, मृत्यु आदि परिस्थितियों में चिकित्सकीय तथा नकद लाभ उपलब्ध कराना है। इसका मूल विचार है कर्मचारी और नियोक्ता द्वारा अंशदान किया जाए और उसके बदले कर्मचारी को निर्धारित सामाजिक सुरक्षा लाभ मिलें। ESI व्यवस्था का संचालन Employees’ State Insurance Corporation (ESIC) करती है।
ESI Corporation का गठन - धारा 3 के अंतर्गत केंद्र सरकार द्वारा Employees’ State Insurance Corporation का गठन किया जाता है।यह एक body corporate है, अर्थात्।इसका पृथक कानूनी अस्तित्व है। यह संपत्ति रख सकती है, संपत्ति अर्जित और हस्तांतरित कर सकती है या अनुबंध कर सकती है यह अपने नाम से मुकदमा कर सकती है और इसके विरुद्ध मुकदमा किया जा सकता है।
Corporation की संरचना - Corporation में निम्न प्रतिनिधित्व होता है
1. अध्यक्ष - केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त।
2. उपाध्यक्ष – केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त।
3. केंद्र सरकार के प्रतिनिधि।
4. राज्य सरकारों के प्रतिनिधि।
5. नियोक्ताओं के प्रतिनिधि।
6. कर्मचारियों के प्रतिनिधि।
7. चिकित्सा व्यवसाय के प्रतिनिधि।
8. संसद के सदस्य।
9. Director General - Corporation का प्रमुख कार्यकारी अधिकारी।
इस संरचना का उद्देश्य है कि ESI प्रशासन में सरकार, नियोक्ता, कर्मचारी और चिकित्सा क्षेत्र, सभी का प्रतिनिधित्व हो।
ESI Corporation का प्रबंधन - Corporation के कार्यों के संचालन में Standing Committee और Medical Benefit Council की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
(A) Standing Committee - Standing Committee Corporation के कार्यों के प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके प्रमुख कार्य हैं -
• Corporation के प्रशासन में सहायता करना।
• Corporation के निर्णयों को लागू करने में भूमिका निभाना।
• वित्तीय एवं प्रशासनिक मामलों की देखरेख।
• Corporation द्वारा सौंपे गए कार्यों को करना।
Medical Benefit Council - यह विशेष रूप से चिकित्सा लाभ से संबंधित मामलों में सलाह देती है, इसका संबंध -
चिकित्सा सुविधाओं की गुणवत्ता, अस्पतालों, औषधालय, चिकित्सा सेवा की व्यवस्था चिकित्सा प्रशासन द्वारा होती है।
ESI Corporation की शक्तियाँ - ESIC को अधिनियम के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए व्यापक शक्तियाँ प्राप्त हैं। प्रमुख शक्तियाँ -
• कर्मचारियों एवं नियोक्ताओं का बीमा संबंधी रिकॉर्ड रखना।
• अंशदान निर्धारित एवं संग्रह करना।
• बीमित व्यक्ति को लाभ देना।
• अस्पताल एवं dispensary की व्यवस्था करना।
• चिकित्सा संस्थानों से अनुबंध करना।
• ESI Fund का प्रशासन करना।
• संपत्ति अर्जित करना।
• संपत्ति का प्रबंधन करना।
• निवेश करना।
• निरीक्षण एवं जांच कराना।
• नियोक्ता से आवश्यक जानकारी प्राप्त करना।
• अंशदान की वसूली करना।
• अधिनियम के उल्लंघन पर कार्रवाई करना।
नियोक्ता और कर्मचारी का योगदान - ESI योजना का आर्थिक आधार contribution है। नियोक्ता तथा कर्मचारी दोनों ESI Fund में अंशदान करते हैं।
वर्तमान अंशदान दर -
कर्मचारी का योगदान = वेतन का 0.75%
नियोक्ता का योगदान = वेतन का 3.25%
अर्थात् कुल - 4%
महत्वपूर्ण - जिस कर्मचारी की औसत दैनिक मजदूरी निर्धारित सीमा से कम है, उससे कर्मचारी का अंशदान नहीं लिया जाता, हालांकि नियोक्ता को अपना अंशदान देना पड़ता है।
ESI Contribution जमा करने की जिम्मेदारी - अंशदान जमा करने की प्राथमिक जिम्मेदारी नियोक्ता की होती है।
नियोक्ता कर्मचारी का योगदान मजदूरी से काट सकता है, अपना योगदान स्वयं देगा।दोनों योगदान ESI Corporation में जमा करेगा। यदि नियोक्ता ऐसा करता है तो यह अधिनियम का उल्लंघन है और उसके विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई हो सकती है।
ESI Fund - धारा 26 के अंतर्गत ESI Fund का गठन किया जाता है। इस Fund में हैं
• नियोक्ता का अंशदान।
• कर्मचारी का अंशदान।
• केंद्र/राज्य सरकार से प्राप्त धन।
• अन्य प्राप्तियां।
• संपत्ति से होने वाली आय।
•निवेश से प्राप्त आय।
• अन्य वैधानिक स्रोत।
इस धन का प्रयोग केवल अधिनियम के उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।
ESI Fund का प्रशासन - ESI Fund का प्रशासन Corporation करती है।
Fund का उपयोग चिकित्सा पुनर्भरण, मातृत्व लाभ, विकलांगता, आश्रितता,
दवाओं का खर्च, अंतिम संस्कार खर्च, पुनर्वास, अस्पतालों और औषधालयों के खर्च आदि के लिए किया जाता है।
Corporation को Fund का हिसाब-किताब रखना होता है तथा निर्धारित तरीके से उसका audit कराया जाता है।
ESI Fund का निवेश - ESI Fund का धन मनमाने तरीके से निवेश नहीं किया जा सकता। Corporation को अधिनियम तथा केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार Fund का निवेश करना होता है।
निवेश का मूल उद्देश्य -
• Fund की सुरक्षा
• पर्याप्त liquidity,
• उचित return,
• बीमित व्यक्तियों के हितों की रक्षा करना है।
ESI के अंतर्गत मिलने वाले प्रमुख लाभ - धारा 46 ESI के प्रमुख लाभों का आधार है। मुख्य लाभ हैं -
1. Medical Benefit - बीमित व्यक्ति तथा उसके परिवार को चिकित्सा सुविधा।
2. Sickness Benefit - बीमारी के दौरान निर्धारित शर्तों के अनुसार नकद लाभ।
3. Extended Sickness Benefit - कुछ निर्दिष्ट गंभीर एवं दीर्घकालिक बीमारियों में अतिरिक्त अवधि तक लाभ।
4. Enhanced Sickness Benefit - परिवार नियोजन जैसे निर्धारित मामलों में विशेष दर से लाभ।
5. Maternity Benefit - बीमित महिला को गर्भावस्था, प्रसव, miscarriage आदि से संबंधित परिस्थितियों में निर्धारित लाभ।
6. Disablement Benefit - रोजगारजनित injury के कारण disablement होने पर। इसके दो प्रमुख रूप हैं -
• अस्थाई विकलांगता परिलाभ
• स्थाई विकलांगता परिलाभ
आश्रितता परिलाभ - Employment injury के कारण बीमित व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसके आश्रितों को लाभ।
अंतिम संस्कार खर्च - बीमित व्यक्ति की मृत्यु पर अंतिम संस्कार के खर्च के लिए निर्धारित राशि।
पुनर्वास - कुछ परिस्थितियों में vocational/physical rehabilitation जैसी सुविधाएं।
दवाओं का परिलाभ - Medical Benefit ESI की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से है। इसमें बीमित व्यक्ति को medical consultation, औषधियां, hospitalization, specialist treatment, diagnostic परिलाभ, अन्य आवश्यक चिकित्सा सेवाएं मिल सकती हैं। परिवार के पात्र सदस्यों को भी निर्धारित परिस्थितियों में चिकित्सा सुविधा मिलती है।
12. ESI Hospitals - ESI व्यवस्था के अंतर्गत विभिन्न ESI Hospitals
dispensaries, medical centres, diagnostic centres का संचालन किया जाता है। इनका उद्देश्य बीमित कर्मचारियों तथा उनके परिवारों को सुलभ चिकित्सा सुविधा देना है।
ESI Hospital और ESIC में अंतर -
ESIC = संस्था/Corporation
ESI Hospital = चिकित्सा सुविधा प्रदान करने वाला संस्थान।
Employment Injury - ESI में employment injury अत्यंत महत्वपूर्ण अवधारणा है। अर्थात् ऐसी personal injury जो रोजगार के कारण, रोजगार के दौरान, occupational circumstances में होती है। यदि ऐसी injury के कारण temporary या permanent disablement होता है तो कर्मचारी को संबंधित disablement benefit मिल सकता है।
Commuting Accident - काम पर जाते या काम से लौटते समय दुर्घटना भी निर्धारित परिस्थितियों में employment injury मानी जा सकती है, यदि उसका रोजगार से पर्याप्त संबंध स्थापित हो।
ESI के अंतर्गत दावे (Claims) - बीमित व्यक्ति को लाभ प्राप्त करने के लिए निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार claim करना होता है। दावे से संबंधित महत्वपूर्ण बातें कर्मचारी का insurance status।
contribution की पात्रता -
• बीमारी/चोट/मातृत्व आदि का प्रमाण।
• medical certificate।
• employment injury की स्थिति में accident report।
• निर्धारित समय में claim प्रस्तुत करना।
• ESI प्रशासन पहले claim की जांच करता है।
ESI Claims और न्यायालय - ESI से संबंधित विवादों के लिए अधिनियम में विशेष व्यवस्था है। Employees' Insurance Court की स्थापना धारा 74 के अंतर्गत की जाती है। यह सामान्य civil court से अलग विशेष न्यायिक मंच है।
Employees' Insurance Court किन विवादों को देख सकती है? -
उदाहरण -
• क्या कोई व्यक्ति employee है?
• क्या कोई व्यक्ति insured person है?
• क्या contribution payable है?
• contribution की दर/राशि से संबंधित विवाद।
• employer की liability।
• benefit प्राप्त करने का अधिकार।
• benefit की मात्रा।
• किस व्यक्ति को benefit मिलेगा।
• Corporation द्वारा किए गए •assessment से संबंधित विवाद।
Civil Court का अधिकार - जहां ESI Act किसी विषय के संबंध में विशेष jurisdiction Employees' Insurance Court को देता है, वहां सामान्य civil court की jurisdiction सीमित/बहिष्कृत हो जाती है। इसका उद्देश्य है कि ESI से जुड़े तकनीकी और सामाजिक सुरक्षा संबंधी विवादों का निपटारा विशेष न्यायिक व्यवस्था के माध्यम से हो।
17. Contribution की Recovery - यदि नियोक्ता ESI contribution जमा नहीं करता तो Corporation बकाया राशि की वसूली कर सकती है। इसके लिए contribution का determination, recovery proceedings, arrears की वसूली, attachment आदि वैधानिक उपाय।अपनाए जा सकते हैं। कुछ परिस्थितियों में Corporation धारा 45A के अंतर्गत contribution की राशि का determination भी कर सकती है, विशेषकर जब employer आवश्यक returns, records या particulars प्रस्तुत नहीं करता।
नियोक्ता द्वारा Records का रख-रखाव - नियोक्ता को ESI संबंधी आवश्यक registers, wage records, employee details, contribution records, accident records, returns रखने होते हैं। ESI अधिकारी इन records का निरीक्षण कर सकते हैं।
निरीक्षण एवं जांच - ESI अधिकारियों को यह जांचने की शक्ति होती है कि
establishment अधिनियम के अंतर्गत आता है या नहीं, कौन-कौन कर्मचारी कार्यरत हैं, कितनी मजदूरी दी जा रही है, contribution सही जमा हो रहा है या नहीं, records सही हैं या नहीं का नियोक्ता को निरीक्षण में सहयोग करना होता है।
20. दंड (Penalties) - ESI Act में विभिन्न उल्लंघनों के लिए दंड का प्रावधान है। प्रमुख उल्लंघन -
• Contribution जमा न करना।
• कर्मचारी का contribution काटकर ESI में जमा न करना।
• गलत जानकारी देना।
• records/returns न रखना।
• Corporation को आवश्यक सूचना न देना।
• निरीक्षण में बाधा डालना।
• अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करना।
• विशेष रूप से गंभीर अपराध
• यदि employer कर्मचारी से contribution काट लेता है लेकिन उसे Corporation में जमा नहीं करता, तो यह गंभीर उल्लंघन है और आपराधिक दंड का आधार बन सकता है।
नियोक्ता द्वारा कर्मचारी का योगदान हड़पना - कर्मचारी के वेतन से काटा गया ESI contribution कर्मचारी के हित में रखा गया धन है। यदि employer इसे Corporation में जमा नहीं करता तो उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई हो सकती है।
ESI Act की महत्वपूर्ण धाराएं -
धारा 1 संक्षिप्त नाम, विस्तार एवं प्रारंभ
धारा 2 परिभाषाएं
धारा 3 Employees' State Insurance Corporation
धारा 4 Corporation की संरचना
धारा 5 Corporation का कार्यकाल
धारा 7 Corporation की समितियां
धारा 8 Standing Committee
धारा 10 Medical Benefit Council
धारा 17 अधिकारियों एवं कर्मचारियों की नियुक्ति
धारा 26 ESI Fund
धारा 28 Fund का उपयोग
धारा 38 सभी कर्मचारियों का बीमा
धारा 39 Contribution
धारा 40 Principal employer द्वारा contribution
धारा 41 Principal employer द्वारा contribution की recovery
धारा 44 Employers द्वारा returns आदि
धारा 45 Social Security Officers
धारा 45A Contribution का determination
धारा 46 Benefits
धारा 49 Sickness Benefit की सीमा
धारा 50 Maternity Benefit
धारा 51 Disablement Benefit
धारा 52 Dependants' Benefit
धारा 53 अन्य compensation के साथ प्रतिबंध
धारा 54 Disablement की चिकित्सा जांच
धारा 56 Medical Benefit
धारा 68 Employer द्वारा contribution न देने पर Corporation की कार्रवाई
धारा 74 Employees' Insurance Court
धारा 75 Employees' Insurance Court के विवाद/मामले
धारा 76 Proceedings की शुरुआत
धारा 77 Proceedings की limitation
धारा 82 High Court में appeal
धारा 84 False statement का दंड
धारा 85 अन्य अपराधों का दंड
धारा 85A Repeat offences
धारा 85B Damages
धारा 85C Prosecution आदि से संबंधित प्रावधान
उदाहरण (ESI व्यवस्था) - मान लीजिए रमेश किसी ESI-covered factory में काम करता है। उसकी मजदूरी ₹20,000 प्रतिमाह है। उसके वेतन से: 0.75% = ₹150, कर्मचारी का contribution काटा जाएगा। Employer: 3.25% = ₹650।अपना contribution देगा। दोनों मिलाकर: ₹800 ESI Fund में जाएगा।अब रमेश
• बीमार होता है → Sickness Benefit
• उसकी पत्नी पात्र है → Medical Benefit
• रोजगार के दौरान दुर्घटना होती है →
• Disablement Benefit
• दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है → पात्र
• आश्रितों को Dependants' Benefit
• अंतिम संस्कार → Funeral Expenses
इस प्रकार ESI केवल अस्पताल की सुविधा नहीं है, बल्कि व्यापक सामाजिक सुरक्षा प्रणाली है।
सार - ESI की पूरी व्यवस्था को इस सूत्र से याद करें:
Employer + Employee Contribution → ESI Fund → ESIC Administration → Medical + Cash Benefits → Insurance Court → Penalities
बीमा कराओ → अंशदान दो → Fund बने → ESIC चलाए → बीमारी/मातृत्व/चोट/मृत्यु पर लाभ मिले → विवाद हो तो Employees' Insurance Court → उल्लंघन हो तो दंड।
कर्मचारी भविष्य निधि, पेंशन एवं बीमा - केंद्रीय न्यासी बोर्ड (गठन, शक्तियाँ,
कार्य, प्रशासन), बकाया वसूली, छूट प्राप्त प्रतिष्ठान, छूट की शर्तें, भविष्य निधि का निवेश अंतरराष्ट्रीय श्रमिक लाभों की पोर्टेबिलिटी
कर्मचारी भविष्य निधि, पेंशन एवं बीमा से संबंधित है। वर्तमान परीक्षा-दृष्टि से इसे मुख्यतः कर्मचारी भविष्य निधि और विविध उपबंध अधिनियम, 1952 (EPF & MP Act) तथा उसके अंतर्गत बनी योजनाओं के आधार पर समझना चाहिए। ध्यान रहे कि Code on Social Security, 2020 ने EPF, EPS और EDLI को एकीकृत सामाजिक सुरक्षा ढाँचे में रखने का प्रावधान किया है, लेकिन उसके प्रभावी होने और संबंधित नियमों की स्थिति के कारण परीक्षा में लागू विधिक स्थिति को प्रश्न के वर्ष के अनुसार देखना जरूरी है।
कर्मचारी भविष्य निधि, पेंशन एवं बीमा की मूल अवधारणा - कर्मचारी की सामाजिक सुरक्षा के लिए तीन प्रमुख योजनाएँ महत्वपूर्ण हैं:
| योजना | पूरा नाम | मुख्य उद्देश्य |
|---|---|---|
| EPF | Employees' Provident Fund Scheme, 1952 | सेवानिवृत्ति/नौकरी समाप्ति आदि के लिए बचत |
| EPS | Employees' Pension Scheme, 1995 | सदस्य एवं परिवार को पेंशन |
| EDLI | Employees' Deposit Linked Insurance Scheme, 1976 | कर्मचारी की मृत्यु पर परिवार/नामित व्यक्ति को बीमा लाभ |
केंद्रीय न्यासी बोर्ड (Central Board of Trustees.
A. गठन- EPF & MP Act, 1952 की धारा 5A केंद्रीय न्यासी बोर्ड की स्थापना से संबंधित है। केंद्रीय सरकार द्वारा गठित यह बोर्ड EPF योजना, पेंशन योजना तथा बीमा योजना के प्रशासन में केंद्रीय संस्था है। इसमें शामिल होते हैं -
• केंद्र सरकार के प्रतिनिधि
• नियोक्ता प्रतिनिधि
• कर्मचारी प्रतिनिधि
• संबंधित केंद्रीय सरकारी अधिकारी
Central Provident Fund Commissioner (CPFC) का उद्देश्य - बोर्ड में सरकार, नियोक्ता और कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व रखने का उद्देश्य सामाजिक सुरक्षा निधि के प्रशासन में त्रिपक्षीय भागीदारी (tripartite participation) सुनिश्चित करना है।
केंद्रीय न्यासी बोर्ड की शक्तियाँ - CBT की शक्तियों को चार भागों में समझ सकते हैं
1. निधियों का प्रशासन - बोर्ड EPF की निधि तथा संबंधित योजनाओं के प्रशासन का कार्य करता है।
2. योजना का संचालन - EPF Scheme, EPS तथा EDLI Scheme के प्रभावी प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
3. बजट एवं वित्तीय प्रशासन - निधियों की आय-व्यय व्यवस्था, बजट और वित्तीय प्रबंधन से संबंधित कार्य करता है।
4. निवेश - भविष्य निधि की राशि को केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित निवेश-पद्धति के अनुसार निवेश किया जाता है।
केंद्रीय न्यासी बोर्ड (CBT) के कार्य -
(I) भविष्य निधि का प्रशासन - कर्मचारियों और नियोक्ताओं से प्राप्त अंशदान की व्यवस्था करना।
(II) पेंशन योजना का संचालन - पात्र कर्मचारियों तथा उनके परिवारों को EPS के अनुसार लाभ दिलाना।
(III) बीमा योजना का प्रशासन - EDLI के अंतर्गत कर्मचारी की मृत्यु होने पर पात्र व्यक्ति को बीमा लाभ दिलाना।
(iv) खातों का रख-रखाव - सदस्यों के PF खातों, अंशदान तथा ब्याज का लेखांकन।
(v) दावों का निपटारा - PF withdrawal, pension तथा insurance claims की प्रक्रिया।
(vi) अनुपालन सुनिश्चित करना - नियोक्ताओं द्वारा अंशदान जमा कराने और कानून के पालन की निगरानी।
केंद्रीय न्यासी बोर्ड का प्रशासनिक ढाँचा
• केंद्रीय सरकार
↓
• Central Board of Trustees
↓
• Central Provident Fund↓
• Commissioner
↓
• EPFO का प्रशासनिक तंत्र
↓
• क्षेत्रीय/उप-क्षेत्रीय कार्यालय↓
• नियोक्ता एवं कर्मचारी के PF खाते↓
इस व्यवस्था का उद्देश्य देशभर में सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का एकीकृत प्रशासन है।
बकाया राशि की वसूली (Recovery of Arrears) - यह EPF कानून का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग है।
यदि कोई नियोक्ता -
• कर्मचारी का PF अंशदान जमा नहीं करता।
• नियोक्ता का अंशदान जमा नहीं करता।
• प्रशासनिक शुल्क आदि का भुगतान नहीं करता।
तो वह राशि EPF arrears बन सकती है।
धारा 8 - धारा 8 के अंतर्गत देय राशि की वसूली की व्यवस्था है। बकाया राशि की वसूली के लिए आगे धारा 8B से 8G तक महत्वपूर्ण प्रावधान हैं।
वसूली की प्रक्रिया - बकाया राशि की वसूली को सरल क्रम में
बकाया निर्धारित
↓
Recovery Certificate
↓
संपत्ति/बैंक खाते के विरुद्ध कार्रवाई
↓
वसूली
↓
= EPF निधि में जमा।
Recovery Officer की भूमिका - धारा 8B के अंतर्गत Recovery Officer द्वारा राशि की वसूली की जा सकती है। इसके लिए उपायों में शामिल हो सकते हैं - • नियोक्ता की चल संपत्ति की कुर्की,
• अचल संपत्ति की कुर्की,
• बिक्री,
• बैंक खाते/देय राशि से वसूली,
• नियोक्ता की गिरफ्तारी और निरुद्धि जैसी वैधानिक प्रक्रियाएँ, जहां कानून लागू हो।
धारा 7A का महत्व - धारा 7A के अंतर्गत यह निर्धारित किया जा सकता है कि -
• कोई प्रतिष्ठान अधिनियम के अंतर्गत आता है या नहीं।
• नियोक्ता से कितनी राशि बकाया है।
धारा 7A = देयता निर्धारण
धारा 8 = बकाया वसूली
बकाया पर ब्याज - नियोक्ता द्वारा देय राशि समय पर जमा न करने पर कानून के अनुसार ब्याज लगाया जाता है।
धारा 7Q - के अंतर्गत नियोक्ता को देय राशि पर निर्धारित दर से ब्याज देना पड़ता है। इसका उद्देश्य नियोक्ता को PF राशि रोककर रखने से रोकना है।
हर्जाना/Damages - धारा 14B के अंतर्गत नियोक्ता द्वारा अंशदान जमा करने में default होने पर damages की वसूली की जाती है।
अंतर -
| ब्याज | हर्जाना |
|---|---|
| धारा - धारा 7Q | धारा 14B |
| उद्देश्य - विलंबित भुगतान की वित्तीय भरपाई | default के लिए दंडात्मक/प्रतिपूरक प्रभाव |
| देयता - देय राशि पर लगाया जाता है | कानून/योजना के अनुसार लगाया जाता है |
धारा 17 के अंतर्गत छूट - धारा 17 exemptions से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधान है। छूट निम्न प्रकार से हो सकती है:
(A) प्रतिष्ठान को छूट - यदि किसी प्रतिष्ठान में कर्मचारियों को statutory scheme से अधिक लाभकारी या कम से कम समान लाभ वाली PF व्यवस्था उपलब्ध है।
(B) कर्मचारी को छूट - कुछ परिस्थितियों में किसी कर्मचारी को योजना के अंतर्गत व्यक्तिगत छूट प्राप्त हो सकती है, जहां कानून की शर्तें पूरी हों।
छूट प्राप्त प्रतिष्ठान की शर्तें -
1. पर्याप्त PF लाभ देना होता है।2. कर्मचारियों के हितों की रक्षा करनी होती है।
3. PF राशि का उचित लेखांकन रखना होता है।
4. निर्धारित शर्तों का पालन करना होता है।
5. निरीक्षण एवं निगरानी में सहयोग करना होता है।
6. PF की राशि का उचित निवेश करना होता है।
7. कर्मचारियों को statutory scheme से कम लाभ नहीं मिलना चाहिए।
मूल सिद्धांत - Exemption = कानून से बच निकलना नहीं बल्कि Exemption से न्यूनतम समान स्तर की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था स्थापित करना है।
छूट समाप्त कब - यदि exempted establishment -
• शर्तों का उल्लंघन करे।
• कर्मचारियों के हितों की पर्याप्त सुरक्षा न करे।
• PF निधि का गलत उपयोग करे।
• निर्धारित नियमों का पालन न करे।
तो exemption वापस ली जा सकती है इसलिए exemption सशर्त रियायत है, अधिकार नहीं।
भविष्य निधि का निवेश (Investment of Provident Fund) - भविष्य निधि में जमा राशि कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा की राशि है। इसलिए इसे नियोक्ता अपनी इच्छा से निवेश नहीं कर सकता।निधि का निवेश
• केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित निवेश पैटर्न,
• निर्धारित संस्थाओं/प्रतिभूतियों,
• सुरक्षा,
• तरलता,
• उचित प्रतिफल
को ध्यान में रखकर किया जाता है।
मूल सिद्धांत - PF Investment का पहला उद्देश्य = सुरक्षा उसके बाद उचित प्रतिफल + तरलता + जोखिम नियंत्रण।
PF राशि के निवेश की विशेषताएँ - PF निधि के निवेश में सामान्यतः निम्न सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं
1. सुरक्षित निवेश - कर्मचारियों की जीवनभर की बचत को अत्यधिक जोखिम वाले निवेश में नहीं लगाया जाना चाहिए।2. Diversification - पूरी राशि एक ही प्रकार की परिसंपत्ति में नहीं रखी जाती।
3. Government-prescribed pattern - निवेश केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित नियमों/पैटर्न के अनुसार किया जाता है।
4. Return - निवेश से प्राप्त आय सदस्यों के PF खाते पर लागू ब्याज/रिटर्न व्यवस्था में महत्वपूर्ण होती है।
अंतरराष्ट्रीय श्रमिक लाभों की पोर्टेबिलिटी - International Portability of Social Security Benefits आज कर्मचारी एक देश में नौकरी करके दूसरे देश में काम कर सकता है।
उदाहरण - भारत का कर्मचारी - जर्मनी - फिर भारत में स्थानांतरण पर समस्या यह पैदा होती है कि उसने अलग-अलग देशों में
• PF/social security contribution दिया,
• pension contribution दिया, तो क्या उसकी सारी सामाजिक सुरक्षा राशि/सेवा अवधि समाप्त हो जाएगी? इसी समस्या का समाधान है - Social Security Benefits की Portability
Portability का अर्थ - Portability का अर्थ है कर्मचारी द्वारा एक देश में अर्जित सामाजिक सुरक्षा अधिकारों को दूसरे देश में रोजगार बदलने पर उचित रूप से सुरक्षित रखना या संबंधित देशों के बीच समन्वय के माध्यम से उनका लाभ प्राप्त करना। इसके दो महत्वपूर्ण पहलू हैं
(1) Contribution history की सुरक्षा - कर्मचारी की पूर्व सामाजिक सुरक्षा अवधि नष्ट न हो।
(2) Benefit entitlement - कर्मचारी को निर्धारित शर्तों के अनुसार दूसरे देश में रहने/काम करने के बावजूद अपने pension/social security benefits प्राप्त हो सकें।
भारत और International Social Security Agreements - भारत विभिन्न देशों के साथ Social Security Agreements (SSAs) करता है। इनका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा से संबंधित समस्याओं को हल करना है।
SSA के प्रमुख उद्देश्य -
• Double Social Security Contribution से बचाव
• Contribution periods को कुछ परिस्थितियों में जोड़ना।
• Pension benefits की portability।
• लाभों का विदेश में भुगतान संभव बनाना।
• International workers को social security protection देना।
Certificate of Coverage (CoC) -International workers के संदर्भ में Certificate of Coverage अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि भारतीय कर्मचारी किसी SSA वाले देश में अस्थाई श्रमिक पर जाता है और भारत की social security system के अंतर्गत covered रहता है, तो CoC यह प्रमाणित कर सकता है कि कर्मचारी किस देश की social security व्यवस्था के अंतर्गत covered है। इससे कुछ परिस्थितियों में दो देशों में एक ही अवधि के लिए social security contribution देने की समस्या से बचा जा सकता है।
International Worker EPF framework में International Worker (IW) की विशेष अवधारणा है।इसमें broadly
• भारत में काम करने वाला विदेशी कर्मचारी।
• भारतीय कर्मचारी जो SSA वाले देश में काम करता है।
जैसी परिस्थितियाँ शामिल हो सकती हैं, subject to statutory rules and applicable agreement. International workers के लिए PF compliance सामान्य भारतीय कर्मचारी की तुलना में विशेष नियमों के अधीन होती है।
Portability में Totalisation का महत्व - Totalisation का अर्थ है अलग-अलग देशों में जमा की गई qualifying social-security periods को कुछ परिस्थितियों में जोड़ना।
उदाहरण मान लें कि भारत में qualifying period = 7 वर्ष और देश X में qualifying period = 5 वर्ष व pension के लिए आवश्यक qualifying period = 10 वर्ष है, लागू SSA totalisation की अनुमति देता है तो दोनों अवधियों को निर्धारित तरीके से जोड़कर eligibility निर्धारित की जा सकती है। लेकिन हर SSA में totalisation के नियम समान नहीं होते, यह संबंधित bilateral agreement पर निर्भर करता है।
Portability और PF withdrawal में अंतर -
| PF Withdrawal | Social Security Portability |
|---|---|
| राशि आहरण | अधिकार को दूसरे देश में सुरक्षित रखना |
| घरेलू PF व्यवस्था से संबंधित | अंतरराष्ट्रीय रोजगार से संबंधित |
| सदस्य को राशि मिलती है | contribution/benefit history को coordinate किया जाता है। |
| EPF rules | SSA + EPF rules |
Flow Chart - कर्मचारी काम करता है - PF Contribution - EPF Account - Central Board of Trustees द्वारा प्रशासन - निधि का निर्धारित निवेश - सेवानिवृत्ति/निकासी → PF लाभ - मृत्यु - EDLI/परिवार संबंधी लाभ - पात्रता - EPS Pension
कार्यचारी विदेश चला जाए तो -
भारत में रोजगार - विदेश में रोजगार - Social Security Agreement - CoC / contribution coordination-Totalisation/Portability, जहां लागू हो - Pension/Social Security Benefit
EPF, EPS और EDLI को एक साथ समझें -
EPF =आज की बचत - सुरक्षित भविष्य
EPS =सेवा अवधि → पेंशन
EDLI = मृत्यु → परिवार को बीमा लाभ
निष्कर्ष - कर्मचारी भविष्य निधि, पेंशन एवं बीमा व्यवस्था का मूल उद्देश्य कर्मचारी को सेवा-काल के बाद आर्थिक सुरक्षा, पेंशन के माध्यम से नियमित आय तथा मृत्यु की स्थिति में परिवार को आर्थिक संरक्षण प्रदान करना है। इस पूरी व्यवस्था में Central Board of Trustees प्रशासनिक केंद्र के रूप में कार्य करता है। नियोक्ता द्वारा बकाया राशि न जमा करने पर धारा 7A के अंतर्गत देयता निर्धारण, धारा 7Q के अंतर्गत ब्याज, धारा 8 के अंतर्गत वसूली तथा धारा 14B के अंतर्गत damages महत्वपूर्ण हैं। धारा 17 के अंतर्गत कुछ प्रतिष्ठानों को निर्धारित शर्तों पर छूट मिल सकती है, लेकिन ऐसी छूट कर्मचारी के सामाजिक सुरक्षा लाभों को कम करने का माध्यम नहीं होनी चाहिए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर Social Security Agreements, Certificate of Coverage और totalisation जैसे उपाय migrant/international workers के सामाजिक सुरक्षा अधिकारों को अलग-अलग देशों में नौकरी करने के कारण टूटने से बचाने का प्रयास करते हैं।
उपदान (Gratuity) - गणना, शर्तें, सीमा(अधिकतम) जब्ती, नामांकन, नियंत्रक एवं अपीलीय प्राधिकारी -
उपदान (Gratuity) Payment of Gratuity Act, 1972 से संबंधित है। उपदान (Gratuity) - Gratuity वह एकमुश्त धनराशि है जो नियोक्ता द्वारा कर्मचारी को उसकी दीर्घकालीन सेवा के लिए दी जाती है। यह कर्मचारी के लिए
• दीर्घकालीन सेवा का प्रतिफल।
• सेवानिवृत्ति के बाद आर्थिक सुरक्षा।
• सेवा समाप्ति पर सामाजिक सुरक्षा
का महत्वपूर्ण साधन है।
Gratuity = सेवा की अवधि + अंतिम वेतन + निर्धारित
उपदान पाने की पात्रता धारा 4(1) - कर्मचारी को उपदान तब देय होती है जब उसने किसी प्रतिष्ठान में कम-से-कम 5 वर्ष की निरंतर सेवा पूरी की हो और उसकी सेवा समाप्त हुई हो -
1. सेवानिवृत्ति पर।
2. अधिवर्षिता (superannuation) पर।
3. त्यागपत्र (resignation) पर।
4. मृत्यु पर।
5. अशक्तता (disablement) के कारण सेवा समाप्त होने पर।
अपवाद - मृत्यु या अशक्तता के मामले में 5 वर्ष की सेवा की शर्त आवश्यक नहीं है अर्थात कर्मचारी की मृत्यु यदि कम सेवा अवधि के बाद भी हो जाए तो उसके पात्र व्यक्ति/नामांकित व्यक्ति को नियमानुसार gratuity मिलती है।
उदाहरण - A ने 3 वर्ष सेवा की और उसकी मृत्यु हो गई। उसके 5 वर्ष पूरे नहीं हुए, फिर भी gratuity देय होगी।
निरंतर सेवा (Continuous Service) धारा 2A - के अनुसार continuous service का अर्थ है ऐसी सेवा जिसमें बीच में अनुचित व्यवधान न हो।कुछ परिस्थितियों में बीमारी, दुर्घटना, अवकाश, lay-off, strike या lock-out आदि के कारण अनुपस्थिति होने पर भी सेवा को निरंतर माना जा सकता है।
240 दिन का नियम - जहाँ कर्मचारी ने एक वर्ष की अवधि में निर्धारित संख्या में दिन काम किया है, वहाँ कुछ परिस्थितियों में उसे continuous service में माना जाता है। underground mine में 190 दिन का नियम है।
उपदान की गणना धारा 4(2) - मासिक वेतन पाने वाले कर्मचारी के लिए Gratuity = अंतिम वेतन (Basic + Dearness Allowance) × 15(प्रत्येक पूर्ण सेवा वर्ष के लिए 15 दिन की मजदूरी)/26(महीने में गणना के लिए निर्धारित दिनों की संख्या) × पूर्ण सेवा के वर्ष
उदाहरण - मान लीजिए अंतिम Basic + DA = ₹40,000
सेवा = 20 वर्ष
तो ₹40,000 × 15/26 × 20
= ₹4,61,538 अर्थात gratuity लगभग ₹4.62 लाख होगी।
सेवा के छह महीने से अधिक होने पर - यदि सेवा अवधि में 6 महीने से अधिक का अंश हो तो उसे अगले पूर्ण वर्ष में गिना जाता है।
उदाहरण - सेवा = 20 वर्ष 7 महीने तो। 21 वर्ष माना जाएगा।
सेवा = 20 वर्ष 4 महीने तो 20 वर्ष माना जाएगा।
दैनिक मजदूरी पाने वाले कर्मचारी की गणना - दैनिक मजदूरी पाने वाले कर्मचारी के लिए gratuity की गणना औसत मजदूरी × 15 के आधार पर की जाती है।औसत मजदूरी निर्धारित अवधि में प्राप्त मजदूरी के आधार पर निकाली जाती है।
मौसमी प्रतिष्ठान के कर्मचारी - Seasonal establishment में कर्मचारी के लिए प्रत्येक season में सेवा के प्रत्येक season के लिए 7 दिन की मजदूरी के आधार पर gratuity की गणना की जाती है।
अधिकतम सीमा (Maximum Ceiling) - Payment of Gratuity Act के अंतर्गत gratuity की अधिकतम सीमा वर्तमान में ₹20,00,000 (20 लाख रुपये) है। अर्थात वैधानिक gratuity ₹20 लाख से अधिक नहीं होगी। लेकिन यदि employer द्वारा contract, award, agreement या अन्य व्यवस्था के तहत कर्मचारी को इससे बेहतर gratuity का अधिकार दिया गया है, तो वह अधिक लाभ प्राप्त कर सकता है।
मृत्यु की स्थिति में उपदान - कर्मचारी की मृत्यु होने पर gratuity -
1. उसके नामांकित व्यक्ति (nominee) को।
2. nominee न होने पर उसके heirs/legal heirs को भुगतान।
इस स्थिति में 5 वर्ष की निरंतर सेवा की शर्त लागू नहीं होती।यदि nominee या heir नाबालिग है तो उसकी राशि निर्धारित तरीके से उसके लाभ के लिए सुरक्षित रखी जाती है।
उपदान की जब्ती (Forfeiture) धारा 4(6) - कर्मचारी की gratuity को पूरी तरह या आंशिक रूप से जब्त किया जा सकता है, लेकिन केवल कानून में निर्धारित परिस्थितियों में।
A. नियोक्ता की संपत्ति को नुकसान - यदि कर्मचारी ने जानबूझकर या उपेक्षा से नियोक्ता की संपत्ति को नुकसान या हानि पहुँचाई है, तो gratuity को उस नुकसान की सीमा तक जब्त किया जा सकता है।
उदाहरण - कर्मचारी ने कंपनी की संपत्ति को ₹1 लाख का नुकसान पहुँचाया। उसकी gratuity ₹5 लाख हुई तो अधिकतम ₹1 लाख तक gratuity जब्त की जा सकती है।
B. दंगा या हिंसक आचरण - यदि कर्मचारी की सेवा riotous or disorderly conduct अथवा हिंसा के कारण समाप्त की गई है, तो gratuity पूरी तरह या आंशिक रूप से जब्त की जा सकती है।
C. नैतिक अधमता वाला अपराध - यदि कर्मचारी का ऐसा कार्य जिसके कारण उसकी सेवा समाप्त हुई है, moral turpitude से संबंधित अपराध है और वह अपराध उसने employment के दौरान किया है, तो gratuity पूरी तरह या आंशिक रूप से जब्त की जा सकती है।
महत्वपूर्ण - हर misconduct पर gratuity जब्त नहीं हो सकती। Forfeiture के लिए धारा 4(6) की शर्तों का पूरा होना आवश्यक है।
नामांकन (Nominatiyon) धारा 6 - प्रत्येक कर्मचारी जिसने निर्धारित अवधि के बाद gratuity के लिए पात्रता प्राप्त कर ली है, उसे nomination करना चाहिए।यदि परिवार है - nomination परिवार के एक या अधिक सदस्यों के पक्ष में किया जाता है। किसी outsider को nominee बनाना मान्य नहीं होगा, जब तक कानून में लागू अपवाद न हो।
यदि परिवार नहीं है - तो वह किसी भी व्यक्ति को nominee बना सकता है।
लेकिन बाद में यदि कर्मचारी का परिवार हो जाता है तो पहले का nomination समाप्त हो जाता है और नया nomination करना पड़ता है।
नामांकन में परिवर्तन - कर्मचारी अपने nomination को बदल सकता है।
उदाहरण - विवाह, संतान का जन्म, परिवार में परिवर्तन आदि होने पर nomination में संशोधन किया जा सकता है।
नियोक्ता का gratuity भुगतान करने का दायित्व धारा 7 - जब gratuity payable हो जाती है, तो employer को उसकी राशि निर्धारित करनी होती है।नियोक्ता को gratuity की राशि स्वतः निर्धारित करके कर्मचारी को बतानी होती है। कर्मचारी को हर बार अलग से दावा करना आवश्यक नहीं है।
भुगतान की समय सीमा - Gratuity payable होने के बाद employer को निर्धारित समय के भीतर उसका भुगतान करना होता है। यदि देरी होती है तो interest देय हो सकता है।
विवाद होने पर नियंत्रक प्राधिकारी - Payment of Gratuity Act के अंतर्गत Controlling Authority एक महत्वपूर्ण अधिकारी है। यदि gratuity की पात्रता, राशि, भुगतान, nominee/heir को भुगतान को लेकर विवाद हो तो मामला Controlling Authority के सामने जाता है।
नियंत्रक प्राधिकारी के कार्य -
1. gratuity संबंधी विवाद का निर्णय करना।
2. कर्मचारी को देय gratuity निर्धारित करना।
3. आवश्यक दस्तावेज और साक्ष्य लेना।
4. पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देना।
5. employer को gratuity भुगतान का निर्देश देना।
6. आवश्यकता होने पर बकाया राशि की वसूली की प्रक्रिया प्रारंभ करना।
Controlling Authority की शक्तियाँ - Controlling Authority को inquiry के दौरान कुछ मामलों में Civil Court जैसी शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।जैसे गवाहों को बुलाना, शपथ पर साक्ष्य लेना,दस्तावेज प्रस्तुत कराने का आदेश, affidavit पर evidence लेना,सरकारी अभिलेख को मंगवाना। इसलिए यह केवल administrative officer नहीं बल्कि विवाद-निर्णयन की महत्वपूर्ण वैधानिक भूमिका निभाता है।
अपीलीय प्राधिकारी (Appellate Authority) - यदि किसी पक्ष को Controlling Authority के निर्णय से असंतोष है तो वह निर्धारित समय में Appellate Authority के समक्ष appeal कर सकता है।
कौन appeal कर सकता है? - कर्मचारी, employer, अन्य संबंधित व्यक्ति जो आदेश से प्रभावित है।
अपील की अवधि -धारा 7(7) - अपील 60 दिनों के भीतर की जाती है।पर्याप्त कारण होने पर Appellate Authority अतिरिक्त समय दे सकती है।
Employer की Appeal की विशेष शर्त - यदि employer appeal करता है, तो उसे निर्धारित राशि जमा करने की आवश्यकता हो सकती है।
Employer को Controlling Authority द्वारा निर्धारित gratuity की राशि, अथवा कानून में निर्धारित आवश्यक राशि भी जमा करनी होती है।इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि appeal की प्रक्रिया के कारण कर्मचारी का gratuity अधिकार निष्फल न हो।
Gratuity और अन्य अधिकार धारा 14 - Payment of Gratuity Act के प्रावधानों का प्रभाव inconsistent अन्य enactment/instrument पर प्राथमिकता रख सकता है।साथ ही, जहाँ कर्मचारी को किसी contract, award या agreement के माध्यम से इस Act से बेहतर gratuity benefits मिलते हैं, वहाँ अधिक लाभ को सुरक्षित रखा जा सकता है।
धारा -
धारा 2A Continuous Service
धारा 4 Payment of Gratuity
धारा 4(1) Gratuity की पात्रता
धारा 4(2) Gratuity की गणना
धारा 4(5) बेहतर gratuity benefitsन
धारा 4(6) Gratuity की जब्ती
धारा 6 Nomination
धारा 7 Gratuity का determination और payment
धारा 7(3) भुगतान की समय-सीमा
धारा 7(3A) विलंब पर interest
धारा 7(4) विवाद
धारा 7(7) Appeal
धारा 8 Gratuity की recovery
धारा 9 दंड
धारा 14 Act का overriding effect
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