चूरू में नशे का बढ़ता प्रभाव - अब चुप रहने का समय नहीं
चूरू केवल रेगिस्तान की रेत, हवेलियों और ऐतिहासिक विरासत का नाम नहीं है। यह मेहनतकश लोगों, सामाजिक चेतना, शिक्षा और भाईचारे की धरती है। लेकिन आज इसी समाज के सामने एक ऐसी चुनौती तेजी से अपना सिर उठा रही है, जिस पर समय रहते गंभीरता से विचार करना जरूरी है।
बढ़ता नशे का बढ़ता प्रभाव -
नशा किसी एक व्यक्ति की समस्या नहीं है। यह घर में प्रवेश करता है तो परिवार को प्रभावित करता है, परिवार से समाज तक पहुँचता है तो सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करता है और जब युवाओं की जिंदगी को अपनी गिरफ्त में लेने लगता है तो पूरे क्षेत्र के भविष्य पर सवाल खड़ा कर देता है।
आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि चूरू में नशा है या नहीं। सवाल यह है कि हम इसके खिलाफ कितनी गंभीरता से खड़े हैं?
शुरुआत छोटी होती है, नुकसान बड़ा -
नशे की शुरुआत अक्सर बहुत मामूली लगती है।
किसी मित्र का आग्रह, जिज्ञासा, तनाव से राहत पाने की कोशिश या केवल यह सोच कि “एक बार लेने से क्या फर्क पड़ेगा।”
लेकिन कई बार यही एक बार धीरे-धीरे आदत में बदल जाता है।
फिर व्यक्ति उस पदार्थ के बिना सामान्य महसूस नहीं करता। पैसा नशे की जरूरत पूरी करने में जाने लगता है। पढ़ाई प्रभावित होती है। काम प्रभावित होता है। परिवार से दूरी बढ़ती है। व्यवहार में परिवर्तन आता है और अंततः व्यक्ति स्वयं भी समझ नहीं पाता कि वह कब अपने ही जीवन का नियंत्रण खो बैठा।
इसलिए नशे के खिलाफ लड़ाई नशे की गिरफ्त में आने के बाद नहीं, उससे पहले शुरू होनी चाहिए।
सबसे बड़ी चिंता युवा हैं -
युवा किसी भी समाज की सबसे बड़ी पूँजी होते हैं। उनके पास ऊर्जा है, सपने हैं और भविष्य बनाने की क्षमता है।
यदि यही ऊर्जा नशे की ओर चली गई तो नुकसान केवल एक युवक या युवती का नहीं होगा। नुकसान परिवार का होगा, समाज का होगा और आने वाली पीढ़ी का होगा।
चूरू के गाँवों से लेकर शहर तक युवाओं के सामने रोजगार, शिक्षा, प्रतियोगिता, आर्थिक दबाव और भविष्य की चिंता जैसी अनेक चुनौतियाँ हैं। ऐसे वातावरण में नशा उन्हें कुछ समय के लिए राहत का भ्रम दे सकता है, लेकिन अंततः समस्याओं को और गहरा करता है।
नशा समस्या का समाधान नहीं है, वह समस्या पर एक और समस्या चढ़ा देता है।
नशे के कारोबार पर कठोर कार्रवाई जरूरी -
नशे की समस्या से निपटने में पुलिस और प्रशासन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
नशीले पदार्थों की अवैध बिक्री, तस्करी और वितरण के नेटवर्क पर प्रभावी कार्रवाई होनी चाहिए। विशेष रूप से उन लोगों की पहचान और कार्रवाई जरूरी है जो युवाओं को नशे की ओर धकेलकर अपना आर्थिक साम्राज्य खड़ा करते हैं।
नशे का शिकार युवक और नशे का कारोबार करने वाला व्यक्ति एक ही श्रेणी में नहीं रखे जा सकते।
नशा बेचने वाले पर कठोर कानून और नशे में फँसे व्यक्ति के लिए उपचार और पुनर्वास, दोनों आवश्यक हैं।
परिवार सबसे पहली चेतावनी घंटी है -
नशे की शुरुआत को पहचानने में परिवार की भूमिका बहुत बड़ी है।
बच्चे के व्यवहार में अचानक परिवर्तन, पढ़ाई या काम में अरुचि, नए मित्रों को लेकर अत्यधिक गोपनीयता, घर से पैसे की मांग बढ़ना, चिड़चिड़ापन या सामाजिक दूरी जैसे संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि हर बदलाव को नशे से जोड़ दिया जाए।
सबसे जरूरी है बातचीत -
बच्चे से पूछिए कि वह परेशान तो नहीं है। उसकी बात सुनिए। उसे डाँटने से पहले समझने की कोशिश कीजिए। उसे यह भरोसा दीजिए कि परेशानी के समय परिवार उसके साथ खड़ा रहेगा।
जिस घर में संवाद जीवित रहता है, वहाँ समस्या को समय रहते पहचानने की संभावना बढ़ जाती है।
विद्यालय और महाविद्यालयों की जिम्मेदारी -
नशामुक्ति केवल पुलिस का विषय नहीं है। शिक्षा व्यवस्था की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
विद्यालयों और महाविद्यालयों में नशे के दुष्परिणामों पर केवल औपचारिक भाषण नहीं, बल्कि नियमित जागरूकता कार्यक्रम होने चाहिए।
विद्यार्थियों को बताया जाना चाहिए कि नशा स्वास्थ्य के साथ-साथ शिक्षा, रोजगार, आर्थिक स्थिति, परिवार और कानून, सभी को प्रभावित कर सकता है।
युवाओं हेतु सकारात्मक विकल्प -
• खेल के मैदान बढ़ाइए।
• पुस्तकालय मजबूत कीजिए।
• कौशल विकास के अवसर बढ़ाइए।
• सांस्कृतिक और रचनात्मक गतिविधियों को प्रोत्साहित कीजिए।
युवा ऊर्जा को दिशा मिलेगी तो वही ऊर्जा समाज निर्माण की ताकत बनेगी।
नशे के शिकार व्यक्ति को समाज से मत काटिए -
नशे की समस्या का एक दुखद पहलू यह भी है कि नशे की आदत से बाहर निकलने की कोशिश करने वाले व्यक्ति को कई बार समाज स्वीकार नहीं करता।
उसे ताने मिलते हैं। परिवार शर्म महसूस करता है। मित्र दूरी बना लेते हैं। व्यक्ति अकेला पड़ जाता है।
यही अकेलापन उसे दोबारा उसी दलदल में धकेल सकता है।
इसलिए नशा छोड़ने वाले व्यक्ति को उपचार, परामर्श, परिवार का सहयोग, रोजगार और सामाजिक स्वीकार्यता की जरूरत होती है।
नशा छोड़ना कमजोरी नहीं, एक कठिन संघर्ष है।
चूरू में सामूहिक अभियान की आवश्यकता -
नशे के खिलाफ चूरू में एक व्यापक सामाजिक अभियान चलाया जा सकता है।
इसमें प्रशासन, पुलिस, चिकित्सा विभाग, शिक्षा विभाग, पंचायतें, नगर निकाय, जनप्रतिनिधि, शिक्षक, अभिभावक, सामाजिक संगठन, धार्मिक एवं सामुदायिक संस्थाएँ और युवा संगठन एक साथ आ सकते हैं।
हर गाँव, हर वार्ड में नशामुक्ति जागरूकता अभियान चलाया जा सकता है।
लोगों को उपचार और परामर्श की उपलब्ध सेवाओं की जानकारी दी जानी चाहिए। नशीले पदार्थों की अवैध बिक्री और तस्करी की सूचना देने के सुरक्षित माध्यमों के बारे में आम नागरिकों को जागरूक किया जाना चाहिए।
अभियान हेतु महत्वपूर्ण बात -
नशामुक्ति अभियान जनता का अभियान बने, केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं।
नशामुक्त चूरू के लिए 10 सूत्रीय संकल्प -
1. नशे की अवैध बिक्री और तस्करी के खिलाफ कठोर एवं निरंतर कार्रवाई हो।
2. स्कूल और कॉलेज स्तर पर नियमित नशामुक्ति जागरूकता कार्यक्रम हों।
3. प्रत्येक क्षेत्र में नशे से प्रभावित लोगों के लिए उपचार और परामर्श की जानकारी उपलब्ध हो।
4. अभिभावकों को युवाओं में आने वाले व्यवहारिक बदलावों के प्रति जागरूक किया जाए।
5. गाँव और शहर के स्तर पर नशामुक्ति जागरूकता समितियाँ बनाई जाएँ।
6. युवाओं के लिए खेल, पुस्तकालय, कौशल विकास और रोजगार से जुड़े अवसर बढ़ाए जाएँ।
7. नशा छोड़ चुके लोगों को सामाजिक बहिष्कार के बजाय पुनर्वास और रोजगार का अवसर दिया जाए।
8. नशे के कारोबार से जुड़े बड़े नेटवर्क पर कार्रवाई को प्राथमिकता दी जाए।
9. समाज के प्रभावशाली लोग, शिक्षक, जनप्रतिनिधि और सामाजिक संगठन नशामुक्ति अभियान में सक्रिय भूमिका निभाएँ।
10. प्रत्येक परिवार अपने बच्चों के साथ नियमित संवाद को अपनी जिम्मेदारी माने।
अब फैसला हमें करना है -
हम यह तय कर सकते हैं कि नशे की समस्या देखकर आँखें फेर लें और यह सोचें कि यह किसी दूसरे के घर की समस्या है।
या फिर यह समझें कि आज किसी दूसरे के घर में लगी आग कल हमारे दरवाजे तक भी पहुँच सकती है।
चूरू को नशे के खिलाफ केवल नारों की जरूरत नहीं है। उसे जागरूक परिवारों, जिम्मेदार युवाओं, संवेदनशील समाज, सक्रिय प्रशासन और कठोर कानून-व्यवस्था की जरूरत है।
हमें यह भी याद रखना होगा कि नशे के खिलाफ लड़ाई केवल नशा छुड़ाने की लड़ाई नहीं है।
• यह युवाओं के सपनों को बचाने की लड़ाई है।
• यह परिवारों को टूटने से बचाने की लड़ाई है।
• यह समाज की सामाजिक पूँजी बचाने की लड़ाई है।
• और सबसे बढ़कर यह चूरू की आने वाली पीढ़ी के भविष्य की लड़ाई है।
आइए -
चूरू में ऐसी सामाजिक चेतना पैदा करें जहाँ नशे को प्रतिष्ठा नहीं, समस्या समझा जाए; जहाँ नशा बेचने वाला सम्मान नहीं, कानून का सामना करे; और जहाँ नशे से बाहर निकलने वाला व्यक्ति तिरस्कार नहीं, सहयोग पाए।
चूरू की पहचान नशे से नहीं, ज्ञान, मेहनत, भाईचारे और युवा शक्ति से होनी चाहिए।
आज शुरुआत करेंगे तो कल बदलाव दिखाई देगा।
नशामुक्त चूरू केवल एक सपना नहीं, सामूहिक संकल्प होना चाहिए।
लेखक - जिगर चूरूवी
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