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06. मिनाज ए जिगर (उर्दू नज़्म संग्रह 01) ✅✍️

1. नज़्म - हारा करते हैं 
2. कांटों में
3 वादा
4. किसी ने छुआ होगा
5. तराना 

1. नज़्म: हारा करते हैं।

उठ के फिर कोशिशें दोबारा करते हैं।
हम लड़ाके, ना हिम्मत हारा करते हैं।।

जो मिला है नसीब में, गवारा करते हैं।
हौसलों की सदा जग में पुकारा करते हैं।।

सहमे दर्द का हम ही इशारा करते हैं,
टीस के बीच सुकूँ का नजारा करते हैं।

रवां नफरतों में इश्क़ को उतारा करते हैं।
घर-घर खुशियों का धारा करते हैं।

चाँद की रोशनी को ज़मीं पे तारा करते हैं।
आँख में आँख डाल सूरज निहारा करते हैं।।

बंजर खेतों में पैदा हरा चारा करते हैं।
काली रात को रोशन सितारा करते हैं।।

हार के बाद भी तर्क किनारा करते हैं।
टूटी कश्तियों को ठीक दोबारा करते हैं।।

जिगर, खुद पे यक़ीं रख, मुराद जहाँ की।
सामने आईने के खुद को सँवारा करते हैं।।
02. कता - कांटों में ...
दलदलों में कमल खिला करते हैं
गुलाब कांटों में ही मिला करते हैं।
हसरतों के पुर होने से कब्ल नहीं
यहां जले चिराग ही जिला करते हैं।
3. कता - वादा ...
उम्र भर साथ नहीं छोड़ोगे तुम
वादा करो यह नहीं तोड़ोगे तुम।
मैं बुलाऊं तो चले आना साथी
ये कदम पीछे नहीं मोड़ोगे तुम।
4. गजल - छुआ होगा....

सिहरी हुई है, उसको हवा ने छुआ होगा
वो नर्म सा चेहरा किसी ने छुआ होगा।

यूँ ही नहीं है आग किसी आशियाने में आज
सुलगा कहीं कोई तो धुआँ होगा।

आलम-ए-ग़म में अश्क न गिन, देख घर मेरा
हर सू मेरे ही दर्द का कुआँ होगा।

तन्हा नहीं हूँ, बोझ-ए-वफ़ा ढो रहा जिगर
मुक़द्दर भी मेरा तेरा मद्दुआ होगा।

खोने से डर मत, ज़रा जी कर तो देख तू
जो जी लिया दिल से, वो जुआ नहीं होगा।

5. ग़ज़ल - तराना

नज़र आया मुझे साज़-ए-हस्ती का तराना भी,
सुना दिल ने बड़े शौक़ से इक पुराना अफ़साना भी।

ख़बर लेने वो आया मुश्ताक़-ए-जहाँ बनकर,
बड़े दिलकश अदब से सुन रहा है ज़माना भी।

न चाहत है अदाओं की, न ज़ुल्फ़ों का फ़साना है,
उसी की कैद में दिल है, उसी में है हर्जाना भी।

गली के चाँद की चाँदनी जब मेरे सहन में उतरी,
बुलबुल ने छेड़ दी धुन, दिल ने गाया तराना भी।

दहकते शोलों के दरमियाँ बाक़ी है तपिश अब तक,
जिगर की राख काफ़ी है क़मर को जलाना भी।

6. ग़ज़ल- घर और हादसे

हादसे पर हादसों को सहते रहे  
हम भी, ‘सब ठीक है’ कहते रहे।

निकले उनके ख़यालों से हम तो,
दिल मेरा है घर उनका कहते रहे।

जंग दिल में मुसलसल शब ओ-रोज़ 
जज़्बे लावे की तरह बहते रहे।
मुसलसल - लगातार

हिज़्र में जुदाई का गहना सरो-पा
हम किताब-ए-खराबा गहते रहे।
हिज़्र - दूरियां, गहना - आभूषण, गहते - पढ़ना, सरो-पा - सर से पांव तक

दूर जिगर दौर-ए-इलहाम से रहे  
मंदिर समझ, मस्जिद ढहते रहे।
इलहाम - प्रेरणा/आभास

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