मिनाज ए जिगर (उर्दू कता, नज़्म और गजल)
13. मुनाफिक....
12. निभाऊंगा ......
11. नहीं कोई फरिश्ता....
10. अलग हैं...
9. कौन देता है....
8. इंसाफ़ का दिन
7. ना ऐब हो....
6. नज़्म - हारा करते हैं ....
5. कांटों में...
4. वादा....
3. किसी ने छुआ होगा....
2. तराना ....
1. घर और हादसे....
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13. फासिक रियाकार....
तुम सीरात ए गुल पर कादिम रहो,
इख़्तियार हमने खुद पर ले लिया।
तफ़रीक में हासिल नहीं कुछ होना,
बेगुनाह ने इल्ज़ाम बाखबर ले लिया।
आज़ाद इब्लीश मुकीम बस्ती-बस्ती में,
हर एक पर उसने असर ले लिया।
कसीदे अमानतदारी के थे रवां कभी,
फासिक ने रियाकारों में घर ले लिया।
समझते हो शान जिस बदी को तुम
आगोश में इसने हमें किस कदर ले लिया।
हटा दो हसद ए गर्दिश तश्वीर से जिगर,
अब चराग़ जवां ने हाथ में मुनव्वर ले लिया
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12. साथ निभाऊँगा
डूबते सूरज को भी खींच लाऊँगा,
रोते चेहरों पर ख़ुशी सजाऊँगा।
आस तुम अपनी कभी छोड़ना नहीं,
तेरी ख़ातिर जीतकर दिखलाऊँगा।
वादे मेरे शीशे के नहीं, पत्थर के हैं,
चोट जितनी दोगे, उतना निखर जाऊँगा।
ये न समझना कि तुम तन्हा खड़े हो,
आज भी संग हूँ, सदा साथ निभाऊँगा।
दिल बहलाने को अल्फ़ाज़ नहीं मेरे,
खाई है क़सम, हर हाल निभाऊँगा।
कहने वाले लाख बातें कहेंगे,
तेरे वास्ते जीकर भी मर जाऊँगा।
जिगर की ख़्वाहिश अभी ज़िंदा है यारो,
वक़्त आने पर हक़ीक़त बताऊँगा।
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11. नहीं कोई फरिश्ता......
निभा पाऊँ भला कैसे ये रिश्ता,
हूँ इक इंसाँ, नहीं कोई फ़रिश्ता।
ज़माने का निगेहबाँ हूँ मैं अब तक,
नहीं कोई फ़साना हूँ गुज़िश्ता।
क़लम से अपनी क़िस्मत खुद लिखी है,
न था तक़दीर का कोई नविश्ता।
अदालत में दबी रह गई थी ज़बानें
वहाँ फ़ैसला सुनाया पेशनविश्ता।
रज़ा पर तू सदा राज़ी रह जिगर,
वही होगा अज़ल का सरनविश्ता।
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10. अलग हैं...
हमारे फ़िक्र के अंदाज़ अलग हैं,
तुम्हारे नख़रे और नाज़ अलग हैं।
मसनवी में कशीदे कब रवाँ हैं,
ये शीरीं ज़हर के अल्फ़ाज़ अलग हैं।
क़दम चूमे गए जिन पेशानियों के,
वो शाहों के वो सर और ताज अलग हैं।
जो नीयत से इबादत हो पज़ीरा,
वो रोज़े और वो नमाज़ अलग हैं।
जो कल तक थे बहुत नज़दीक मेरे,
ज़रूरत पर वही बस आज अलग हैं।
अजब दुनिया का आलम देखता हूँ,
शराफ़त ओढ़े दग़ाबाज़ अलग हैं।
जिगर उड़ते हैं जो अपनी लगन से,
फ़लक के वो सभी शहबाज़ अलग हैं।
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9. कौन देता है...
सहरा के दरख़्तों को भला पानी कौन देता है,
दौलत के एवज़ अपनी जवानी कौन देता है।
यूँ घर में पड़े रहने से बनती नहीं कोई बात,
सूखे हुए पत्तों को चुनर धानी कौन देता है।
नाज़ों से जिसे पाले कोई बाप शफ़ीक़ ऐसा,
ना-अहल को वो बेटी सयानी कौन देता है।
हर चीज़ का इस दौर में तय होता है इक मोल,
यूँ मुफ़्त में वो चीज़ पुरानी कौन देता है।
काटें तो 'जिगर' आप ये गर्दिश के ज़माने,
मुरदे को नई रूह-ओ-रवानी कौन देता है।
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8. इंसाफ़ का दिन.....
हर ज़ुल्म का इक रोज़ इंसाफ़ होगा,
ज़ालिम का हर जुर्म न-माफ़ होगा।
तड़पाए गए जितने भी बे-गुनाह थे,
हर अश्क-ए-सितम तेरे बर-ख़िलाफ़ होगा।
जो चीख़ ब-ज़ोर-ओ-ज़बर दबाई गई,
महशर में उसी का इन्किशाफ़ होगा।
सच को जो झूठ से दबाता रहा है,
उसका न कभी सच से गिलाफ़ होगा।
ख़ौफ़ से जो आँखें झुकी थीं यहाँ पर,
महशर में वही सच शफ़्फ़ाफ़ होगा।
काम आएगी न दौलत, न ज़र साथ होगा,
न कोई तेरा साथी-ए-इंसाफ़ होगा।
आह-ए-मज़लूमाँ को तू हल्का न समझ,
महशर की अदालत में हिसाब होगा।
तय जान, जिगर, मियाद ज़ालिम की अब,
हर जुर्म का इक दिन इन्किशाफ़ होगा।
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7. ना ऐब हो.....
सुख़न में हया हो न कोई भी ऐब हो,
मिलो साफ़ दिल से न दिल में फ़रेब हो।
दिखावे का सदक़ा तो ज़ाया ही है,
अता ऐसी हो जैसे इमदाद-ए-ग़ैब हो।
ज़माने में बिखरी रहे यूँ ख़ुशी,
छनकती दुल्हन के क़दम की पाज़ेब हो।
ये करनी का फल है जो भुगतेगा तू,
समझ आएगा जब कि उम्र-ए-शैब हो।
हक़ीक़त से ऐ दिल जिगर क्यूँ गुरेज़,
वो मुफ़्लिस भी ख़ुश है न दामन पे ज़ैब हो।
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6. नज़्म: हारा करते हैं।
उठ के फिर कोशिशें दोबारा करते हैं।
हम लड़ाके, ना हिम्मत हारा करते हैं।।
जो मिला है नसीब में, गवारा करते हैं।
हौसलों की सदा जग में पुकारा करते हैं।।
सहमे दर्द का हम ही इशारा करते हैं,
टीस के बीच सुकूँ का नजारा करते हैं।
रवां नफरतों में इश्क़ को उतारा करते हैं।
घर-घर खुशियों का धारा करते हैं।
चाँद की रोशनी को ज़मीं पे तारा करते हैं।
आँख में आँख डाल सूरज निहारा करते हैं।।
बंजर खेतों में पैदा हरा चारा करते हैं।
काली रात को रोशन सितारा करते हैं।।
हार के बाद भी तर्क किनारा करते हैं।
टूटी कश्तियों को ठीक दोबारा करते हैं।।
जिगर, खुद पे यक़ीं रख, मुराद जहाँ की।
सामने आईने के खुद को सँवारा करते हैं।।
5. कता - कांटों में ...
दलदलों में कमल खिला करते हैं
गुलाब कांटों में ही मिला करते हैं।
हसरतों के पुर होने से कब्ल नहीं
यहां जले चिराग ही जिला करते हैं।
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4. कता - वादा ...
उम्र भर साथ नहीं छोड़ोगे तुम
वादा करो यह नहीं तोड़ोगे तुम।
मैं बुलाऊं तो चले आना साथी
ये कदम पीछे नहीं मोड़ोगे तुम।
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सिहरी हुई है, उसको हवा ने छुआ होगा
वो नर्म सा चेहरा किसी ने छुआ होगा।
यूँ ही नहीं है आग किसी आशियाने में आज
सुलगा कहीं कोई तो धुआँ होगा।
आलम-ए-ग़म में अश्क न गिन, देख घर मेरा
हर सू मेरे ही दर्द का कुआँ होगा।
तन्हा नहीं हूँ, बोझ-ए-वफ़ा ढो रहा जिगर
मुक़द्दर भी मेरा तेरा मद्दुआ होगा।
खोने से डर मत, ज़रा जी कर तो देख तू
जो जी लिया दिल से, वो जुआ नहीं होगा।
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2. ग़ज़ल - तराना
नज़र आया मुझे साज़-ए-हस्ती का तराना भी,
सुना दिल ने बड़े शौक़ से इक पुराना अफ़साना भी।
ख़बर लेने वो आया मुश्ताक़-ए-जहाँ बनकर,
बड़े दिलकश अदब से सुन रहा है ज़माना भी।
न चाहत है अदाओं की, न ज़ुल्फ़ों का फ़साना है,
उसी की कैद में दिल है, उसी में है हर्जाना भी।
गली के चाँद की चाँदनी जब मेरे सहन में उतरी,
बुलबुल ने छेड़ दी धुन, दिल ने गाया तराना भी।
दहकते शोलों के दरमियाँ बाक़ी है तपिश अब तक,
जिगर की राख काफ़ी है क़मर को जलाना भी।
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1. ग़ज़ल- घर और हादसे
हादसे पर हादसों को सहते रहे
हम भी, ‘सब ठीक है’ कहते रहे।
निकले उनके ख़यालों से हम तो,
दिल मेरा है घर उनका कहते रहे।
जंग दिल में मुसलसल शब ओ-रोज़
जज़्बे लावे की तरह बहते रहे।
मुसलसल - लगातार
हिज़्र में जुदाई का गहना सरो-पा
हम किताब-ए-खराबा गहते रहे।
हिज़्र - दूरियां, गहना - आभूषण, गहते - पढ़ना, सरो-पा - सर से पांव तक
दूर जिगर दौर-ए-इलहाम से रहे
मंदिर समझ, मस्जिद ढहते रहे।
इलहाम - प्रेरणा/आभास
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