मिनाज ए जिगर
(नज़्म संग्रह)
शायर का ताअरूफ-
नाम - शमशेर खान
उपनाम - प्रेम, शमशेर गांधी
तखल्लुस - पहले परवाना नाम से लिखना शुरू किया। पत्नी अख्तर बानो (सदफ) के सुझाव पर जिगर चूरूवी नाम से लिखना शुरू किया।
पैदाइश - 18.04.1978 सहजूसर, चूरू (राजस्थान)
पिता का नाम - श्री भालू खां (पूर्व विधायक (1980 से 1985), चूरू।
माता का नाम - सलामन बानो (गृहणी)
ताअलिम -
1. रामावि सहजूसर में पहली कक्षा में दाखिला 10.07.1984 से 1993 में मेट्रिक तक।
2. राउमावि बागला, चूरू से हेयर सेकंडरी 1993 से 1995 तक
3. राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय भाषाई अल्पसंख्यक अजमेर से BSTC, 1995 से 1997
4. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में स्नातक 1998 से 2001 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय, अजमेर)
5. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में अधिस्नातक 2004 से 2005 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय बीकानेर से गोल्ड मेडलिस्ट - 2005 उर्दू साहित्य)
6. कश्मीर विश्वविद्याल, श्रीनगर के नंद ऋषि शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय से B.Ed.- (2007 - 8)
7. इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय से विशेष आवश्यकता विद्यार्थियों के शिक्षण हेतु विशेष अध्ययन - 2012
8. वर्तमान में LLB में प्रवेश (13.08.2025 से)
विवाह - पत्नी अख्तर बानो (सदफ) से 20.10.1996 में विवाह हुआ।
संतान - तीन पुत्रियां
1. अंजलि खान (LLM)
2. रोजा खान (BSC Nursing) सेवारत
3. प्रेरणा खान (BSC Nursing) सेवारत
व्यवसाय -
1. निजी विद्यालय शिक्षक एवं विद्यालय संचालन - 1997 से 1999
2. राजकीय सेवा तृतीय श्रेणी अध्यापक 10.07.1999 से 14.12.2014 तक
3. द्वितीय श्रेणी शिक्षक 14.12.2014 से 01.09.2023 तक
4. स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति 01.09.2023 से
पद -
1. तहसील अध्यक्ष - शिक्षक संघ शेखावत, चूरू
2. जिला मंत्री शिक्षक संघ शेखावत चूरू
3. प्रदेशध्यक्ष, सर्व शिक्षा अभियान कर्मचारी संघ, राजस्थान
4. प्रदेशाध्यक्ष, युवा मुस्लिम महासभा, राजस्थान
5. प्रदेश संयोजक, राजस्थान तृतीय भाषा बचाओ आंदोलन
6. प्रदेश संयोजक, संविदा मुक्ति आंदोलन राजस्थान
7. प्रदेश सचिव अखिल भारतीय कांग्रेस सेवादल 2024 से
8. जिलाध्यक्ष शिक्षक प्रकोष्ठ कांग्रेस, चूरू 2025 से
9. संयोजक चूरू विधानसभा समस्या एवं समाधान समिति, चूरू
आंदोलन -
1. संविदा मुक्ति आंदोलन
2. दांडी यात्रा
3. सामाजिक सरोकार
पुस्तकें -
1. मिरातुल जिगर
2. हृदयांश (हिंदी कविता संग्रह)
3. कालजे री कोर (राजस्थानी कविता संग्रह)
4. कसासुल जिगर - गजल समूह
5. मिनाज ए जिगर - नज़्म संग्रह
6. मूलांश
7. इमरान ए जिगर
8. प्रस्तुत पुस्तक के बारे में -
लेखक ने उर्दू, हिंदी, मारवाड़ी भाषा की लगभग सभी विधाओं में कलम आजमाई है। प्रस्तुत दीवान शमशेर भालू खां का प्रथम प्रयास है। लेखक का मत है कि वर्तमान समय में काव्य में शुद्ध भाषा एवं शख्त बहर, गेयता और माप का चलन संभव नहीं है। इस दौर में भाषाओं के कुछ शब्द इस तरह से घुलमिल गए हैं कि उन्हें एक भाषा में बांधना शब्द के साथ अन्याय होगा। हिंदी - उर्दू दोनों भाषाओं में सम्मिलित ग़ज़ल, गीत, कविता एवं छंदों का उपयोग आम बात हो गई है।
अतः हमें बंधनों को तोड़ते हुए सम्मिलित विधाओं में सभी भाषाओं का मेल करते हुए साहित्य सृजन करना चाहिए।
अंत में लेखक के कथन अनुसार उन्होंने इस किताब को किसी भी बंधन से मुक्त रखते हुए भावों को जनता तक पहुंचाने का एक छोटा सा प्रयास किया है।
शायर की जुबान.....
तूफ़ाँ बनकर उड़ेंगे हम ज़ुल्म के साये से
वही अज़ियत वही दर्द इंसान पराए से।
मुकद्दमा - मिनाज ए जिगर -
यहां जिगर चूरूवी (शमशेर भालू खां) का नज़्म का मजमुआ दिया गया है।
इसकी एक मुकम्मल किताब की हैसियत से समालोचना लिखिए
यह संग्रह "मिनाज ए जिगर" जिगर चूरूवी (शमशेर भालू खां) की नज़्मों का एक संपूर्ण और विविधतापूर्ण मजमुआ है, जिसमें समकालीन संवेदनाएं, सामाजिक आलोचना, और इंसानी हालात की गहराइयां पाई जाती हैं[1]। समालोचकीय दृष्टि से यह किताब कई स्तरों पर उल्लेखनीय है।
साहित्यिक संवेदनाएँ और शिल्प
इस संग्रह में रचनाकार का शिल्प स्पष्ट दिखाई देता है—हर नज़्म में भावों का गहन विस्तार, बिम्बों की सजीवता और भाषा की दरद भरी नवीनता[1]। कई जगह जिगर चूरूवी ने पारंपरिक शैली को बनाए रखते हुए समकालीन विषयों को छूने की कोशिश की है, जिससे यह संग्रह केवल भावुकता नहीं बल्कि सामाजिक चेतना का दस्तावेज़ भी बन जाता है।
- पहली ही नज़्म "गुरूर किस बात का" से विनम्रता और जीवन के क्षणभंगुर स्वभाव पर गहरा विमर्श मिलता है[1]।
- "हक सुनना" में सामाजिक संतुलन और सच्चाई की तलाश को केंद्र में रखा गया है, जो आज के समय में और भी प्रासंगिक है।
- "बच्चे से गुजारिश", "माँ", "मजदूर" जैसे शीर्षक सामाजिक गहराई व इंसानी रिश्तों को बेहद संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करते हैं।
विषयवस्तु और विचारधारा
इस किताब की विषयवस्तु बहुत विविध है: सामाजिक अन्याय, मज़हबी मसले, इंसानियत की खोज, संघर्ष, क्रांति, मातृत्व, बचपन, शिक्षा, और प्रेम जैसे तमाम पहलुओं को छुआ गया है।
- "इंकलाब" और "संघर्ष" पर कई नज़्में हैं, जिसमें ज़ुल्म के खिलाफ आवाज उठाने की प्रेरणा दिखाई देती है[1]।
- "इंसान हो गया", "मजदूर", "जंग" आदि रचनाओं में आर्थिक एवं सांस्कृतिक संघर्ष का वर्णन नपे-तुले लहजे में मिलता है[1]।
- "उर्दू बचाएं", "परिंदे की सीख" जैसी नज़्में भाषा और परंपरा के महत्व के साथ बदलाव की आवश्यकता पर बल देती हैं।
भाव, छंद, और संरचना
शमशेर भालू खां की भाषा आम बोलचाल की है जिसमें लोक-शैली, उर्दू के सिलसिलेवार अल्फाज, और हिंदी के सहज भाव मिलते हैं[1]। अधिकतर नज़्में तुकांत हैं, लेकिन कहीं-कहीं मुक्त छंद की विशेषताएं भी हैं। अनुप्रास और पुनरावतरण का सुंदर प्रयोग हुआ है, जो संग्रह की भावनात्मक प्रभावोत्पादकता को बढ़ाता है।
- प्रत्येक नज़्म का शीर्षक स्पष्ट और अर्थपूर्ण है, जिससे विषयवस्तु समझने में आसानी होती है[1]।
- कई जगह मर्सिया, दुआ, मां जैसी पारंपरिक शैलियों को आधुनिक प्रश्नों से जोड़ने की कोशिश है[1]।
समकालीनता और सामाजिक आलोचना -
इस किताब की एक बड़ी विशेषता इसकी समकालीनता है। इसमें वर्तमान समाज के राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों—धर्म, भाषा, शिक्षा, असमानता—की स्पष्ट आलोचना मिलती है।
- "गैरों में...", "जवाब तो दे...", "इंसान हो गया...", "हौसले कुंद..." जैसी नज़्मों में सामाजिक परिस्थिति और सत्ताधारियों के प्रति तीन बिंदु: व्यंग्य, कटाक्ष और पीड़ा मिलता है[1]।
- ये नज़्में केवल भाव-विभोर नहीं करतीं बल्कि पाठक को सोचने पर मजबूर करती हैं—यह रचनाकार की बौद्धिक ईमानदारी का प्रमाण है।
समालोचनात्मक निष्कर्ष -
"मिनाज ए जिगर" एक मुकम्मल किताब की तरह पढ़ी जा सकती है। यह संग्रह आज की सामाजिक ज़रूरतों, बदलाव और संघर्ष का साहित्यिक दस्तावेज़ है[1]। उर्दू-हिंदी शायरी के समकालीन मायनों में इससे बेहतर प्रतिरोध और आत्मचेतना के स्वर दुर्लभ हैं।
पठनीयता, शैली, विषय, और संदेश—हर पक्ष पर यह मजमुआ असरदार है। यह रचनाकार की अपनी आवाज़ है जिसे समाज और इंसानियत की जरूरत के लिहाज से बेहद अहम माना जा सकता है।
फेहरिस्त -
01. गुरूर किस बात का.......
02. हक सुनना........
03. चला........
04. बच्चे से गुजारिश....
05. आओ शुरू करें.....
06. चुप हैं....
07. घर देख.....
08. गर जिंदा....
09. आ चल के....
10. नजारे.....
11. उर्दू बचाएं.....
12. हौसले कुंद......
13. कल क्या होगा.....
14. इंसान हो गया....
15. परिंदे की सीख...
16. दिखेंगे..
17. जवाब तो दे.....
18. हारा करते हैं.....
19. मजदूर...
20. गैरों में....
21. अहसान......
22. जाऊं.....
23. फरिश्ता.....
24. लगे.....
25. नया साल.......
26. बुझा.......
27. वाले...
28. गया.....
29. बना दिया......
30. दुआ......
31. दुआ या रब्बी....
32. करते हैं.......
33. देखिए........
34. मां.........
35. बच्चे......
36. जंग.........
37. पढ़ो..........
38. रब.......
39. हमारा.....
40. डराते हो........
41. देखिए.......
42. सड़ गया.....
43. अपने.......
44. यह मौसम......
45. डूबा जहाज.......
46. हुसैन....
47. अरमान...
48. पढ़ो......
49 सफर..
50. हम ...
51. टिके....
52. कर....
53. गाज़ी....
नज़्म
01. गुरूर किस बात का.....गुरुर किस बात का
पुतला हूं ख़ाक का।
इसी में मिल जाऊंगा
मैं मिट्टी बन जाऊंगा।
जिंदगी क्या है आखि़र
ना बड़ी समझता फिर।
झोंका एक हवा का
फ़ानी बुलबुला सा।
सांस ये आया वो गया
लाश में तब्दील हो गया।
मौत की इतनी सी रूदाद
दिन की थकन के बाद।
रात को सुकून से सो जाना
तेरे आने का नाम है जाना।
02. हक सुनना.....
हक सुनना
मसला ये नहीं
हक बात कहनें वाले
खत्म हो गए
मुश्किल ये है
हम सिर्फ
अपनी मर्जी का हक
सुनना चाहते हैं।
03. चला.......
जिंदगी की हर डगर पर
लीक से हट कर चला।
राह मुश्किल थी मगर
मैं भीड़ से बच कर चला।
04. बच्चे से गुजारिश.......
मज़हब की दीवारों से दूर
ए मेरे चश्म ए नूर
तुझे छू के ना जाये गुरुर
रब्बे कायनात का मश्कूर
अरद ओ चरख पे ज़हूर
तिफ्ल सब्र से काम लेना
बस उस का नाम लेना।
बन के बड़ा नेकनामी करना
ना खूं की मेरे बदनामी करना
फी कल्ब शादमानी करना
तू हक़ की पाशबानी करना
कर सके तो महरबानी करना
तिफ़्ल मुश्किल काम लेना
बस उस का नाम लेना।
चमकना सितारे से जायद
खुद का तू खुद कायद
मुश्किलें यकीनी नहीं शायद
रुक्न ए महफिल फायद
कहें लोग खुश आमदीद आयद
तिफ्ल मत आराम लेना
बस उसका नाम लेना।
05. आओ शुरू करें.....
आओ शुरू करें
जो बीच मे रह गई
अधूरी इबारत
पूरी करें
आप नहीं माने
हमने बात
पूरी शिद्दत से रखी
आप भी हैं
हम भी हैं
आजमा कर देखेंगे
कब तक नहीं मानोगे
इंक़लाब के सैलाब में
बह ना जाये अकड़ कहीं
अभी मरने पर उतरे
हम मरें या बचें
पर इंक़लाब
ज़िंदा रहेगा
आखिरी सांस तक
इंक़लाब जिंदाबाद
*********
06. चुप हैं....
जो जुल्म से डर कर चुप हैं
पर कब तब रूकोगे
आना पड़ेगा सुन कर
दर्द भरी वेदना मन की
आप को भी मुझे भी
तब आयेगी क्रांति
तब बरपा होगा इंक़लाब
इंक़लाब ज़िंदाबाद
क्रांति जिंदाबाद
संघर्ष जिंदाबाद।
जब सुन ले
आजाइये इस के साथ
अपनों के लिये
कुछ सपने बुनने
कुछ कहती है
ये मौन आवाज
आप ने सुनी
या अनसुनी की
फर्क नहीं पड़ता
चल पड़ा अकेला
यायावर सा खामोश
पुकारता हुआ
आने को
साथ निभाने को
स्वयं का
मैं तुम और यह मौन
आवाज काफी हैं
जगाने को
जो जुल्म से
डर कर चुप हैं
पर कब तब रूकोगे
आना पड़ेगा
सुन कर दर्द भरी वेदना
मन की आप को भी
मुझे भी
तब आयेगी क्रांति
तब बरपा होगा इंक़लाब
इंकलाब जिंदाबाद
क्रांति जिंदाबाद
संघर्ष जिंदाबाद।
07. घर देख.......
नहीं आती घर देख मुसीबत
रश्म अदायगी रही इंसानियत
शुक्र खुदा का खैर ए नूइयत
हो गई इंसान की खासियत
हौसले कुंद बेजा मशरूफियत
आदमी में ना बका आदमियत।
बदला ना सूरज चांद वही
वही जंगल वही शेर मांद वही।
वही नदी वही नाले बांध वही।
कमज़र्फ की बातों में सड़ांध वही।
कार ए बद मद्दुआ आफ़ियत
आदमी में ना बका आदमियत ।
समां संग फानुश जलते देखे
रास्ते हमराह मुसाफिर चलते देखे।
आजाद कैद में मचलते देखे
तख्त ए शाह उछलते देखे।
देखी मुनअक़िद बज़्म ए ताजियत
आदमी में ना बका आदमियत।
चरख पे सुराख ज़रूर होगा
होगा जो खुदा को मंजूर होगा।
हाँ, ज़ेरे सर मगरूर होगा
सच के चेहरे पे नूर होगा।
बढ़ता चलेगा साहिबे सलाहियत
आदमी में ना बका आदमियत।
08. गर जिंदा...
गर जिंदा हैं तो दिखेंगे
पढ़ा है इंक़लाब लिखेंगे।
हम जवाहर मुल्क के
भाव मोहब्बत बिकेंगे।
09. आ चल......
आ चल के ढूंढ कहीं ज़मीन अपनी
ए कौम तेरी खोई ज़मीन अपनी।
हूँ लाख बुरा सही नागवार ना जान
हो खड़ा छोड़ गद्दी नसीन अपनी।
यह टूटा सा घर खुला दिल तेरे वास्ते
ड्योढ़ी पे लाना समझे तौहीन अपनी।
पूराना है दर्द दवा की जाये खास
खुराक कुछ ले दे छोड़ संगीन अपनी।
यूँ न बिगाड़ मुस्तकबिल नोजवाँ तू
माजी में देख तश्वीर रंगीन अपनी।
एतमाद रख कोशिश कर बार-बार
दौड़ाओ घोड़े कस के जीन अपनी।
न सियासत विरासत तिजारत के हुये
अफसोस थड़ी पे गुजरी सीन अपनी।
नए हैं महफ़िल में ताजा-ताजा उमरा
मगलौज हैं आराइसे शौकीन अपनी।
बात सुन लीजिये जाननी हो सीरत
जिगर निकाले मेख देखे मीन अपनी।
10. बात........
वो चांद के नजारों की बात करते हैं
उजड़े चमन बहारों की बात करते हैं।
रहते यहां बहुत रसूखदार लोग
खुद्दार ही खुद्दारों की बात करते हैं।
11. उर्दू बचाएं......
जिन्होंने ठान ली जद्दोजहद की
चलो हम हौसला उनका बढ़ायें।
सभी शामिल हों तहरीक में अब
किसी भी शर्त पर उर्दू बचायें।
12. हौसले कुंद......
हौसले कुंद बेजा मशरूफियत
आदमी में ना बका आदमियत।
न बदला सूरज चांद वही
वही जंगल वही शेर मांद वही।
वही नदी वही नाले बांध वही
कमज़र्फ की बातों में सड़ांध वही।
कार ए बद मद्दुआ आफ़ियत
आदमी में ना बका आदमियत।
समां संग फानुश जलते देखे
रास्ते हमराह मुसाफिर चलते देखे।
आजाद कैद में मचलते देखे।
तख्त ए शाह उछलते देखे।
देखी मुनअक़िद बज़्म ए ताजियत।
आदमी में ना बका आदमियत।
चरख पे सुराख ज़रूर होगा
तू चल खुदा को मंजूर होगा
हाँ ज़ेरे सर मगरूर होगा।
सच के चेहरे पे नूर होगा।
बढ़ता चलेगा साहिबे सलाहियत
आदमी में ना बका आदमियत।
13. कल क्या होगा.....
मसला ये नहीं कल क्या हुआ
मसला ये है कल क्या होगा।
घोर सन्नाटा या डर से उबरें
येलगार मे मिटें या निखरें।
चल साथ कदम से कदम मिला
ले सबक तारीख से दुनिया हिला।
मामला तेरा मेरा नहीं पुश्तो का हुआ
काम से ले मजलूम की दुआ।
सोच ले परेशां हो मलाल करे
या तपा अहम को कमाल करे।
हसर मे दारेन का हिसाब होना है
यहां किया ना कुछ वहाँ रोना है।
14. इंसान हो गया.....
नशे में मज़हब के इंसान हो गया
देखते देखते शहर वीरान हो गया।
कोई इजराइल कोई ईरान हो गया
मैं ढूंढता रहा जो इंसान हो गया।
एकसा गाजा तेलवीब तेहरान हो गया
आज आदम का बेटा शैतान हो गया।
हरा भरा खेत लहु लुहान हो गया
बनी इस्माइल कासीदो ज़िंदान हो गया।
बारूद से काला आसमान हो गया
धरती का हर कोना जापान हो गया।
जिगर दर्द बढ़ के परवान हो गया
हमें क्या नफा क्या नुकसान हो गया।
15. परिदे की सीख.....
कोई कहे चालाक
कोई कहे मुबीन
हार नहीं मानते
दानिश ओर ज़हीन।
घड़े में कंकर भरने का
नुस्खा आला तरीन
काला कौआ बोलकर
करते हैं तौहीन।
मरते दम तक
कोशिश का शौकीन
कोई कहे चालाक
कोई कहे मुबीन
हार नहीं मानते
दानिश और ज़हीन।
वक़्त के साथ
बदलाव ज़रूरी
हल उसी में छुपा
दरपेश मजबूरी।
लाख दफा उड़ना
तय करनी दूरी
मरने से पहले
जीने की चाहत पूरी।
यह काला कौआ
छोड़े नहीं ज़मीन
कोई कहे चालाक
कोई कहे मुबीन
हार नहीं मानते
दानिश ओर ज़हीन।
तौसीफ मासूका से
जानिए इसकी
आस में मुंडेर पे
बैठने की जिसकी
श्राद्ध में करें
अगवानी जिसकी
क़ासिद मिलन का
सुनकर सिसकी
पलकों पर बैठाएं
मुन्तज़िर नाजनीन
कोई कहे चालाक
कोई कहे मुबीन
हार नहीं मानते
दानिश और ज़हीन
सूरतेहाल आज
कुछ सीख ली जाये
यूँ शिकस्त को
दमेआख़िर जीत ली जाये।
बंजर जमीं आस से
उम्मीद से सींच ली जाये
हां लाइन उन से बड़ी
खींच ली जाये
पढ़िए सीखिए
चाहे जाना पड़े चीन
कोई कहे चालाक
कोई कहे मुबीन
हार नहीं मानते
दानिश और ज़हीन
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16. दिखेंगे......
गर जिंदा हैं तो दिखेंगे
पढ़ा है इंक़लाब लिखेंगे।
हम जवाहर मुल्क के
भाव मोहब्बत बिकेंगे।
17. जवाब तो दे.....
तू जवाब तो दे,
जुल्म का हिसाब तो दे।
अगर मुझसे गुनाह हुआ,
तो अब अजाब तो दे।
आदिल के हाथ में
सही किताब तो दे।
एक ही सवाल —
तू जवाब तो दे।
पसमांदा को कब तक
यूँ रुलाओगे?
उलझे हुए मसले
कैसे सुलझाओगे?
सामने आकर भी
क्यों घबराओगे?
कोशिश लाख कर के
बच न पाओगे।
चेहरे पे सच की
एक नक़ाब तो दे।
एक ही सवाल —
तू जवाब तो दे।
आज़ादी के लिए
अब लड़ना होगा।
बसने की खातिर
उजड़ना होगा।
बिना फिरे भाई
सड़ना होगा।
अपनी ही बात पर
अड़ना होगा।
काँटों के बीच भी
एक गुलाब तो दे।
एक ही सवाल —
तू जवाब तो दे।
18 हारा करते हैं.....
चल उठ लड़ कोशिश दोबारा करते हैं
हम लड़ाके, लड़ाके नहीं हारा करते हैं।
नसीब का लिखा जलना गवारा करते हैं
बजा बिगुल हिम्मत का नजारा करते हैं।
दर्द झेलने का तुझको इशारा करते हैं
मिटा टीस, नाचारा को चारा करते हैं।
अब रवाँ मोहब्बत की धारा करते हैं
हर घर को इसरत का इदारा करते हैं।
चांद की रोशनी जमीं पे उतारा करते हैं
आंख मिला सूरज को निहारा करते हैं।
बंजर खेत में फसल का इजारा करते है
अंधेरी रात को रोशन सितारा करते हैं।
जिगर मुरीद न बन जहां की मुराद है तू
काजी ना मुल्जिम को निहारा करते हैं।
19. मजदूर......
मज़दूर के साथ बैठो तो दर्द कहे
भीगा पसीने में धूप को सर्द कहे।
तब्दीले हालात के वादे कई हुये
वो मेरा हुआ कब मसना गर्द कहे।
उसके नाम से चलाते सब करोबार
हाय रे मज़बूर किसे हमदर्द कहे।
खून जला सूखे पसीने की जगह
कब्ल पसीना सूखे मजदूरी फर्द कहे।
सो जाता वो टाट पर फुटपाथ पर
कुचल दो उसे ज़माना बेदर्द कहे।
ज़िंदाबाद इंक़लाब जिंदाबाद रहे
कहें काँपते हाथ ये होंठ ज़र्द कहे।
हके मज़दूर के लिये लड़ेगा जिगर
शूरमा कहे या कोई दहशतगर्द कहे।
20. गैरों में.....
#आज रात को सपने में, मोदी जी, अमित शाह जी, गुलजार साहब और कई लोग बैठे थे। सभी आपस में बाते कर रहे थे मैं चुपचाप सुन रहा था। उनकी पूरी बात में उर्दू ज़बान की मुखालफत साफ नजर आ रही थी, पर अपनी बात को बेहतर ढंग से पेश करने के लिए कोई ना कोई उर्दू शेअर बोल रहे थे।
काफी देर बाद मैने उनको यह बात कही -
पहली बात — तेरी #महफिल में
मुझे आता है एक ख्याल | तेरी महफिल में
एक मीठी जबां पे सवाल | तेरी महफिल में
कहने को हांकते एक लाठी | से सब को
अफसोस और है मलाल | तेरी महफिल में
दूसरी बात — ए #उर्दू
सरेआम करते हैं तुझे | बदनाम ए उर्दू
पर चलता नहीं तेरे बिना | काम ए उर्दू
लगे हैं मिटाने को तेरा | वजूद जहां से
मिटा ना सके तू जुबां | ए आम ए उर्दू
21. अहसान.......
यूं असलाफ की खातिर रखने वालो
ढके सर नंगे पैर खुले टखने वालो
अपने ही खून का मजा चखने वालो
एक हो जाओ एक खुदा रखने वालो।
दास्तानों की बात इकबाल ने कही
हस्ती की बात अहवाल ने कही
गिराँ हालात जाते हर साल ने कही
घिरे मुसीबत में सरे पमाल ने कही
आजीज हो क्यों जब सब तुम्हारा है
कायनात को वास्ते तुम्हारे संवारा है
खिलाफत तुम्हें नहीं जो गवारा है
तू दर दर की खा ठोकर का मारा है
जिगर क्यों तुझ पर अहसान कोई
पराया बने क्यों तेरे घर मेहमान कोई
बवक्त संभल ना ले ले तेरी जान कोई
ईमान को बचाने का कर सामान कोई।
22. जाऊं.....
पहले इश्क फिर दगा फिर वफ़ा का मौका दिया
हाय रे ज़ालिम तूने हर एक में धोका दिया।
हमला आवर हो आंख से अदा से ज़बान से
देखते ही देखते हुए मुशरिक मुसलमान से।
या इलाही रहम इनका अंदाज़ ए क़त्ल देखिए
हाय, यूं मुस्कुरा के जान लेने की अक़्ल देखिए।
खरीद के सामान मौत का मेरे कंधे पे लाद दिया
तरीका इन हसीनाओं ने क्या खूब इज़ाद किया।
आया हूं भीड़ में तेरे तबस्सुम के दीदार को
शर्त आंखों पे पट्टी बांध तलाश कर यार को।
किस्मत ने मुझे फ़ाज़िल का गुलाम बना दिया
उसने बंद कर आँखें सुबह को शाम बना दिया।
रुस्तगारी ना मुझ से ना तुझ से उसकी हुई
छूने से निकल जाती है जान ज्यूँ छुईमुई।
मुद्दत से दिल में एक अरमान लिए बैठा हूं
सुन मेरी जान में तेरे लिए जान लिए बैठा हूं।
बुख्ल की दौलत रंज के सिवा कुछ और नहीं
जीते जी के जंजाल के सिवा कुछ और नहीं।
बंदा परवर की चौखट पर सर पटक कर जान दी
आ कर कब्र पर मेरी उसने इश्क़ ए अज़ान दी।
मुश्किलो हर सिम्त से घेर लो के जाने ना पाए
अहवाल हैं क्या किसीको हाल बताने ना पाए।
जिगर चल उस दुनिया में जहां फरेब ना हो
पहले कोई एक तो बता जिसमें ऐब ना हो।
मोती चुनने का शौक कहां के समंदर में जाऊं
तू वो दिल ए गोहर बता जिस के अंदर मैं जाऊं।
23. फरिश्ता ......
एक दुआ इस फरिश्ते के नाम -
आ कर खुदा से सामने मेरे शिकायत कर
पर संगदिल पहले वो मौका इनायत कर।
तू कह दे कि नहीं रहा मैं काम का तेरे
जारी तुझ से चाहत की याद रिवायत कर
मेरे खाते में जमा सब तेरे हवाले कर दूं
साबित खुद को जा ए विलायत कर।
अज़दाद का अफसाना कहेगा कब तक
छोड़ वो कहानी शुरू नई हिकायत कर।
इन सितारों को जमीन पर जगह दे दो
रब्बा हवाले जिगर को मेरे हिदायत कर।
24. लगे....
तुम घर आओ मेरे तो घर कैसा लगे
खुशियों से हो मुअत्तर ऐसा लगे।
हम साथ हमसफर सफर कैसा लगे
बैठे हों जिब्रिल के पर पर ऐसा लगे।
मैं तुम्हें कहूं अपना अगर कैसा लगे
हमदम का घर मेरे घर जैसा लगे।
आंखों के प्याले मयस्सर कैसा लगे
मेरे होठों से लगा समंदर ऐसा लगे।
धरती पे आ जाए कमर कैसा लगे
यह मेरे सामने है अख्तर ऐसा लगे।
तुम डालोगी मुझ पे नजर कैसा लगे
बिन पिए हो जाए असर ऐसा लगे।
मिल कर रहे भाई बशर तो कैसा लगे
जन्नत के बाग में है घर ऐसा लगे।
तुम मांगो जानो जर तो कैसा लगे
मैं हवाले कर दूं जिगर ऐसा लगे।
25. नया साल...
सूरज बदला न चांद न तारों का संजोग
नया साल मुबारक बधाई देते लोग।
वही धरती वही पानी वही हैं सब लोग
कोई हुआ मदमस्त कोई निभाए जोग।
वही दिन वही रात वही लगे हैं रोग
भूखा दिन का सोया देखे छप्पन भोग।
न हवा बदली न दाना पानी का उपभोग
जोड़ तोड़ में मग्न गुणा भाग घटा योग।
एक साल बाद है इसका विदाई योग
फिर अलविदा कहें कहें मुबारक लोग।
**********
26. चाल.....
मन नहीं तन नहीं, नहीं बदली चाल
हम दीवार का कैलेंडर बदलते हर साल
आना किसी के जाने का नाम हुआ
नए साल पर आयद सदा इल्जाम हुआ।
27. बुझा .....
बुझा चराग़ जला दिया
फिर किसी ने बुझा दिया।
सिसकियों ने दिखाई राह
वादा किसी ने भुला दिया।
जो हंसता नहीं हंसाता है
वक्त ने मसखरा बना दिया।
अंधेरों के राज कब तक
दिया रोशन बुझा दिया।
शीशा टूटे की सदा सुनी
साजे दिल दबा दिया।
संभल के देख ना उसे तू
जिसने देखा मुस्कुरा दिया।
बाती जली कहें जला दिया
भेद मैने सब बता दिया।
हार कर जंग जिंदगी की
हार को हमने हरा दिया।
जिगर कहो दिल की बात
उसको मेरा किसने पता दिया।
28. वाले.......
नफरतों की आग लगाने वाले
इंसान को जिंदा जलाने वाले।
सड़क पर खून बहाने वाले
जहर घोलने और फैलाने वाले।
धर्म जाति का गीत गाने वाले
ना तेरे ना मेरे किसी के नहीं
नफरतों की आग लगाने वाले।
जमीर खुद का खुद मार लिया
खून बहाया और अंतसार किया
गिरे हद से हद को पार किया
आदमी को हेय लाचार किया
संबंधों का ही व्यापार किया।
मासूम पे लाठियां बरसाने वाले
नफरतों की आग लगाने वाले।
वफ़ा की सनद बांटने वाले
मुर्दों का खून चाटने वाले
फसल बेबसी की लाटने वाले
इंसाफ की डोर काटने वाले
कुछ ना किसी को गांठने वाले।
कीना ओर हसद फैलाने वाले
नफरतों की आग लगाने वाले।
सुन वो ना सुन जो लड़ाते हैं
बात पर बेबात टांग अड़ाते हैं
कहें कुछ ओर कुछ बड़बड़ाते हैं
झूठ के बांस पर हमें चढ़ाते हैं
मरे के माल पे नज़र गड़ाते हैं।
यह आने के बाद ना जाने वाले
नफरतों की आग लगाने वाले।
काटने वालों पर ताला कर दो
भूखों के नाम निवाला कर दो
अंधेरों में उजाला कर दो
रुके काम मेरा हवाला कर दो।
ओ घर किसी का ढहाने वाले
नफरतों की आग लगाने वाले।
29. गया...
तपा,जला, पिटा आहंग तलवार हो गया
गिरा संभला गिरा शह सवार हो गया।
वक्त बदले ना बदला वो लाचार हो गया
सांचे में ढला आदमी शानदार हो गया।
असल में हकीकत तहकीक के मसाइल
तलाश ए इसरत में यार गद्दार हो गया।
बदले हो पर अपनों से बदल ना जाना
फूला फला सजर फलदार हो गया।
वाहिद तू नहीं जिगर हर कोई मुब्तला
घिसा बार बार मोती आबदार हो गया।
**********
30. बना दिया......
पैसे की चाह ने क्या क्योंकर बना दिया
कमसिन को बंधवा नोकर बना दिया।
तालीम शेबा ना रहा घर का मेरे
टीवी सिनेमा को मिम्बर बना दिया।
तड़पते लोगों को देख मज़ा ले रहे
खुदा ने इन्सां को पत्थर बना दिया।
ना हाथ का हुनर ना दीन रहा बाकी
ढाढ़ी-टोपी का हाल क्याकर बना दिया
जिनके न आने से महफ़िल बेहाल थी
अव्वल जो थे को आखिर बना दिया।
वक़्त आ गया अब दोस्तों सुनो
बदले माहौल जो सोकर बना दिया।
जन्नत उसकी जिसकी दुनिया मुकम्मल
तालीम ने खुल्द में घर बना दिया।
जिगर शुक्र खुदा का करने को बेकरार
खाक को ईमां का पेकर बना दिया।
**************31. दुआ......
दिल से उठती है दुआ
सुन ए मेरे खुदा
दौलत ए इल्म से
जगमगा दो यह जहाँ
दिल से उठती......
जीना हो इंसान खातिर
मुझ से खुश हो इन्सां
जो मोसर हो सब पर
बख्श दे वो जुबाँ
दिल से उठती है दुआ
दिल से.......
रोशनी इल्म की मेरे
जमाने को पुर नूर करे
बन्दा-बन्दा खुश हो
और अंधेरों को दूर करे
हर चमन महका हुआ
दिल से उठती.......
नफरतों को गर्क कर के
सीनों में मोहब्बत भर दे
सबको सुकून मिले
सच को वो अजर दे
हाल हो बदला हुआ
दिल से उठती......
साना बा साना चलें
कदम मिला के चलें
ऐसा ना कोई काम करें
के सर झुका के चलें
सोई उम्मीदें हो रवां
दिल से उठती........
32. दुआ या रब्बी ......
दुआ ए रब्बी
रब्बी या रब्बी या रब्बी
रब्बी या रब्बी या रब्बी
अल्लाह तेरे दरबार में
हाजिर हूँ हर बार मैं
मोहम्मद की सरकार में
पाऊं वफा ओ वकार मैं
आजीज न हो कोई कभी
रब्बी या रब्बी या रब्बी
ओलादे आदम पे रहम
मौला करम मौला करम
सख्त हों जुल्मों सितम
सुब्हान कल्ला हु करम
भलाई बढ़े मिटे बदी
रब्बी या रब्बी या रब्बी
अमन हो हर जा मकां
ज़ईफ़ तिफ्ल और जवां
साना बा साना हमनवां
यूं गुजरे हयात ना तवां
पल पल जिएं ज्यों सदी
रब्बी या रब्बी या रब्बी
33. करते हैं........
हम जिस नाजनीन से प्यार करते है
वो दिल तोड़ने के बहाने हजार करते हैं
आरजू संग संग सैर बागो बहार करते हैं
रास्ते मय गर्दो गुब्बार पुर खार करते हैं
हम जिस नाजनीन से प्यार करते हैं
वो दिल तोड़ने के बहाने हजार करते हैं।।
बिकते हैं जिस्म मोल भाव से दिन में
वादा वफा हो कैसे उन बेजान दिल में
कहे महबूब किसे बेगानी महफिल में
चुभें कसक से जिगर आजार करते हैं
हम जिस नाजनीन से प्यार करते हैं
वो दिल तोड़ने के बहाने हजार करते हैं।।
अफराद का शुमार शे से ना कीजिए
सिला रहम कीजिए और दुआ लीजिए
समझ हो कुंद तो या खुदा खुदा कीजिए
तकमील सब्र की दिन गुजार करते हैं
हम जिस नाजनीन से प्यार करते हैं
वो दिल तोड़ने के बहाने हजार करते हैं।।
जमाना देखता है बुलंद बाजु पे परचम
जीत का मतलब नहीं बढ़ें आगे हरदम
उम्दा हों कार गुजारी और ख्वाहिश कम
जिसे देखने की तमन्ना बार बार करते हैं
हम जिस नाजनीन से प्यार करते हैं
वो दिल तोड़ने के बहाने हजार करते हैं।
33. देखिए..........
होती है कैसी खुदा की मार देखिए
रोते हैं सड़कों पे जारो कतार देखिए।
जन्नत जहन्नम का तजकरा कैसा
इसी जमीं पर इनके आसार देखिए।
हक हुसैन फातिमा का लाल हक
मुश्किलों से होते हैं दो चार देखिए।
कुफान किस्मत में ना साथ हुसैन का
दामन हुआ जिनका दागदार देखिए।
बाजू कटे अब्बास नेजों की नोक से
गिरा जो घोड़े से सहसवार देखिए।
प्यासी आले अली दरिया ए फरात पे
तीर अली असगर के गले पार देखिए।
अश्के जैनब गस ए सकीना का मंजर
हाय, जुर्म ए यजीद बार बार देखिए।
मोहब्बत में हुसैन से वो अकीदत कहां
कहा मैं हुसैन से वो ताजदार देखिए।
कैद हुरमा की बेड़ियों की झंकार देखिए
सब्रे जैनुल आबेदीन की बहार देखिए।
करबला में गिरा खून का हर कतरा
जमा आज वहीं सुर्ख खार देखिए।
तपते सहरा में सूखती जबां हुसैन की
शहादत को नौजवान बेकरार देखिए।
नेजो पे सरे हुसैन अब्बास का सर
नाचते ताशों पर यजीद मक्कार देखिए।
सबो रोज करबला की हिकायत जिंदा
ना समझ सके हम मुरदार देखिए।
अली के लाल का जहदो वकार देखिए
हम खड़े कहां बागौर सरकार देखिए।
जानो अमान किए क्यों निसार देखिए
बेकरारों को आ जाए वो करार देखिए।
शहादत हुसैन की ना हो जाया मोमिन
बिछाते कदमों में हम नार देखिए।
जिगर सुन के दास्तां यह आंखें नम
देख जमीर ए खुद बार बार देखिए।
34. मां.........
माँ
आप से प्यारा
आप से बढ़कर
सिवा खुदा के
कोई नहीं कोई
माँ
तुझ से मेरा वजूद
तुझ से मेरा नाम
तुझ मेरी पहचान
तुमसा ना कोई महान
माँ
सब्र का नाम
इख्लास की मूरत
सहने की इन्तहा
तश्किन का सबूत
माँ
फ़र्ज़ की किताब
पहला मदरसा
अर्श की आवाज
फर्श का शुकून
माँ
लफ्ज़ बड़ा
छाया सा
ज़मीन सा
सुतून सा
माँ
बस माँ है
मेरी माँ
तेरी माँ
सबकी माँ
***********
35. बच्चे.........
प्यारा सा बच्चा
दुआ कर रहा ये
मुसीबत पड़ी है
रब तू ही बचा ले
इंसा गिरा इतना
गाफिल है तुझ से
खुशी ढूंढे फिरता
बातिल है उस से
उम्मीदें करूँ अब
बता दे किस से
इलाही तू सच्चा
माँगू मैं तुझी से
कहा उस ने हमसे
किया वो कभी ना
मझधार में बचाले
ना डूबे सफीना
तु ही अबतर है
तू महरबान है
हाथों में तेरे
मिल्लत की जाँ है
जो तू हो राजी
हो और कोई ना
माँगू में किस से
तुझ सा कहीं ना
कमसिन की सुनले
मुझ में कमी ना
वास्ता नबी का
पुकारे सकीना
वबा के हालात
देखे नहीं जाते
खत्म इसे कर
देखे नहीं जाते
हमें माफ कर दे
किया जो सही ना
पनाह मांगते हैं
कर आसां जीना
36. जंग.........
सरहदों की जंग में
माँ के बेटे मरते हैं
सैनिक दुश्मन दोस्त
सबके घर उजड़ते हैं
सरहदों की जंग में
माँ के बेटे मरते हैं।
रोमानिया तंजानिया
बोस्निया हर्जेगोविना
सीरिया हो या इराक़
ईरान और अफगान
बमों की बारिश से
इंसानी चिथड़े उड़ते हैं
सैनिक दुश्मन.....
यूक्रेन रूस के मिसाइल
फिलिस्तीन से इजराइल
चीन हॉंगकॉंग जापान
भारत से पाकिस्तान
किस बात पे झगड़ते हैं
सैनिक .......
वो चीख सुन पाओगे
यह चित्कार रोक पाओगे
वो उजड़ी बस्तियों के ढेर
बोलो कहाँ छुपाओगे
आत्माओं के सीने सड़ते हैं
सैनिक.........
युद्ध समस्या का हल कहाँ
अमर रहा भुजबल कहाँ
धमाकों से सफल यहाँ
शेष रहा अंचल कहाँ
गुब्बार धुएँ के उड़ते हैं
सैनिक........
37. पढ़ो.......
हिसाब देने के वास्ते पढ़ो
हिसाब लेने के वास्ते पढ़ो
सवाल करने के वास्ते पढ़ो
जवाब देने के वास्ते पढ़ो
साज़िश समझने के वास्ते पढ़ो
हक़ व इंकलाब के वास्ते पढ़ो
बराबरी हिस्सेदारी के वास्ते पढ़ो
एक-एक मोड़ ओर रास्ते पढ़ो
बग़ावत को किताब दे सको पढ़ो
गर्दनों का नाप दे सको पढ़ो
गूँगों को आवाज़ दे सको पढ़ो
बेपर को परवाज़ दे सको पढ़ो
रस्मों के मदफ़्न तक पढ़ो
इज़्ज़त के कफ़न तक पढ़ो
हो बात में वजन तक पढ़ो
कुचलने को फन तक पढ़ो
खात्मा दौरे स्याह तक पढ़ो
बेबसी आह तबाह तक पढ़ो
पढ़ो रात से सुबह तक पढ़ो
हालात से निबाह तक पढ़ो
पढ़ो उम्र दराज़ के लिये पढ़ो
दिलों पर राज़ के लिये पढ़ो
मकाम के वसूल तक पढ़ो
रहमतों के नुजुल तक पढ़ो।
नस्लों के अंदाज़ के लिये पढ़ो
खुद पर नाज़ के लिये पढ़ो
बनने को सरताज के लिये पढ़ो
पढ़ो पढ़ो तुम आज के लिये।
तिफ्ल ओरत ओ मर्द भी पढ़ो
खिले जबीं चेहरे जर्द भी पढ़ो
पढ़ो नौजवां कौम के फर्द भी पढ़ो
मिटा दे मायूसी वो दर्द भी पढ़ो।
घर में एक है या दस पढ़ो
हों लाख मुश्किल तस पढ़ो
इकरा नबी की शान पढ़ो
मैं पढ़ूं तुम पढ़ो बस पढ़ो।
38. रब .......
बहुक्म तेरे फरिश्तों ने आदम को सजदा किया
मुनकिर इब्लिश जो कायनात को गाहे सजदा किया।
समझे यह ओलाद ए आदम की औकात है।
या रब समझ से परे तू और तेरी जात है
नज्म तारों की चरख पे बिछाई क्या खूब
मारा वही तारा जिसने जो मुनकिरे महबूब।
कुदरत है तेरी कहीं दिन और कहीं रात है
या रब समझ से परे तू और तेरी जात है
एक खता ने आदमी को घर से बेघर किया
ओलाद के उसकी नाम तूने वही घर किया।
सीखा ज़मीं पे रहना खाना पाना निजात है
या रब समझ से परे तू और तेरी जात है।
********************************
39. हमारा....
जो आज है वो हमारा है
डूबते का तिनका सहारा है
बे गैरत अहसान फरामोश
ना मेरा हुआ ना तुम्हारा है
********************************
40. डराते हो.........
40. डराते हो.........
हवाओं ने आजमाई जमीन से पुख्तगी मेरी
मुसाफिर हवाएं चली गईं कदम बढ़ते गए।
आसमानी किरदार से रंगत जो स्याह हुई
दुश्वारियां हवा हुई और सनम बढ़ते गए।
ज़ोर आजमाइश इस क़दर चढ़ी शबाब पर
सीढ़ी दर सीढ़ी गिरती रही हम चढ़ते गए।
फुरसत में हो तो पूछिए मेरा हाल क्या है
बसे दिलों में जायद कम उजड़ते गए।
डराते हो किसे खंजर से,संगीन से बंदूक से
गिरे लाख दफा फिर उठे कदम पड़ते गए।
41. देखिए......
42. सड़ गया.........
********************************
43. अपने......
सुन रहा दिल के दरवाजों से
मैं देख रहा हूं नीम आंखों से।
कुछ है जो इस हाल पे रोते हैं
परायों में भी तो अपने होते हैं।
44. यह मौसम....
यह बारिश यह गर्मी और कड़कती सर्दी
हर रोज सुबह शाम इसे सहती है वर्दी।
रैली हो सभा जुलूस या तीज त्योंहार हो
हर वक्त तहफ्फुज में खड़ी रहती है वर्दी।
भला बुरा कितना हम कहते दिल खोल
किया किसी का और उसे भरती है वर्दी।
थाने की बोली छूटती नीलामी में कितनी
ले ले कर रंग दारी चौथ भरती है वर्दी।
नेता जो कहे माल मेरा पार करना होगा
थाने से खुद के दूजे तक करती है वर्दी।
रिश्वत जेब में इनके ज्यादा नहीं बचती
काट कर रातें पेट ऊपर भरती है वर्दी।
साहब ने साहब को ना भेजी अगर बंधी
इक खांचे में कोने में टंगी रहेती है वर्दी।
खाता है मलाई कोई खुरचन मिले इनको
इस पे कभी आह नहीं भरती है वर्दी।
जो चोर पाले जनता ने जानते सब हैं
गलती हमारी का उजर भरती है वर्दी।
45. डूबा जहाज.....
डूबे हुए सूरज को भी मैं खींच लाऊंगा
रोते हुये चेहरे पे खुशियां सजाऊंगा।
तुम आस ना छोड़ो जो यार मेरे हो
तुम्हारी कसम तुमको जीत दिलाऊंगा।
मेरे वादे नहीं शीशे से पत्थर से बने हैं
जितनी भी करोगे चोट तराशा जाऊंगा।
यह ना सोचना के तुम आज अकेले हो
में साथ खड़ा था और साथ निभाऊंगा।
दिल बहलाने को मेरे अल्फाज नहीं हैं
खाई है कसम वो हर हाल निभाऊंगा।
कहने को कहते हैं कहने वाले कहेंगे
में जिया हूं तुम्हारे लिए मर के दिखाऊंगा।
जिगर की कवाईश अब भी रुकी नहीं
में जनता हूं वो तुम नहीं वक्त पे बताऊंगा।
हजारों आंखों ने देखे सपने
हर एक सपना सच्च भी होगा।
अमन के रस्ते चलना अपना
जुबां सलामत शहद अपनी।
हजारों......
तुम ने सोचा चले गए हम
नहीं रुके है हम खड़े बादम
हमारा सलीका नया नहीं है
नई नहीं यह ज़हद अपनी।
हजारों.......
कह दो ग़म से रहे दूर हम से
डरे नहीं हैं कभी भी तुम से
जीतेंगे हम यह जंग वरना
यहीं बनेगी लहद अपनी।
हजारों......
47. हुसैन.....(मर्सिया)
हुसैन अलैहिस्सलाम
ना झुका है ना झुकेगा इम्मामा हुसैन का
कयामत तक याद रहे जमाना हुसैन का।
हुसैन शहीद हो कर जिन्दों में शुमार है
यजीदी गाते हैं आज तराना हुसैन का।
वो भूख वो प्यास वो कर्बला की गर्मी
खुदाई को नापसंद वो सताना हुसैन का।
हुसैन इब्ने अली और फातमा के लाल
राह ए हक में वो सर कटाना हुसैन का।
बेटो को भतीजों को भाई को देखता
खेमे से मैदान ए जंग में जाना हुसैन का।
जान जाती अपनो की आंखों के सामने
नम आंखों से रब को शुक्राना हुसैन का।
किस्मत में जो बदा है होता है हर हाल
छोड़ मदीना कर्बला में आना हुसैन का।
सजदे किये कई नबी ओ मलाइक ने
नाम रहे सज्दे में सर कटाना हुसैन का।
लाखों की फोज यजीदी 72 हुसैनी थे
जंग हार के दिल जीत जाना हुसैन का।
जब खत्म हो गये अली असगर जान से
खेमे में तस्कीन गम में घराना हुसैन का।
आंसू ना गिरे जमीं पे ए बहन मेरी सुनो
यही मंजूर रब को था फरमाना हुसैन का।
हक के रास्ते पर हजार दुस्वारियां होंगी
लिखता रहेगा किस्सा जमाना हुसैन का।
यजीद ने वो कटा सर नेजे पे रख लिया
संगीन के सायों में मुस्कुराना हुसैन का।
जिगर कहूं क्या मैं क्या क्या बयां करूं
बिरलों को मिलता है दोस्ताना हुसैन का।
47. अरमान.......
कुछ अरमान बाकी हैं
कुछ अहसान बाकी हैं।
चाहत की नुमाइश के
कई रुझान बाकी हैं।
तेरे लफ्जों की दीवारें
परेशां नहीं करती।
मेरी हिम्मत बाकी है
तेरे इम्तहान बाकी हैं।
जिंदा हूं मेरी जान बाकी है
कुछ अरमान बाकी हैं
कुछ अहसान बाकी हैं।
मोहब्बत की निशानी को
यूं ना मिट्टी में डालो तुम
मैं संभला हुआ हूं पर
खुद को संभालो तुम
कहोगे एक दिन खुद को
निहायत गलीज बातें
जो कसम मैने उठाई है
आओ उठालो तुम।
धरती पर ऐसे इंसान बाकी हैं
कुछ अरमान बाकी हैं
कुछ अहसान बाकी हैं।
केंचुली में या बिल में हो
अजधहा की सीरत हो
खुदा के वास्ते बख्शो
जो खुदा की बसीरत हो
तेरा दावा मोहब्बत का
एक झूठ है खाली
जो सच्चा है नही डरता
राजा से सिपाही से
परे तोहमत मेरा ईमान बाकी है
कुछ अरमान बाकी हैं
कुछ अहसान बाकी हैं।
ललाई खून की मेरे
कभी काली नही होती
मेरे सर पे टोपी है
मेरी पहचान है धोती
कुछ कह दूंगा तो रूठोगे
तुम यार सुन लो तो
क्या कुछ और बाकी है
या खींचातान बाकी है
रहमत की बारिश परवान बाकी है
कुछ अरमान बाकी हैं
कुछ अहसान बाकी हैं।
48. पढ़ो.....
हिसाब देने के वास्ते पढ़ो
हिसाब लेने के वास्ते पढ़ो
सवाल करने के वास्ते पढ़ो
जवाब देने के वास्ते पढ़ो
साज़िश समझने के वास्ते पढ़ो
हक़ व इंकलाब के वास्ते पढ़ो
बराबरी हिस्सेदारी के वास्ते पढ़ो
एक-एक मोड़ ओर रास्ते पढ़ो
बग़ावत को किताब दे सको पढ़ो
गर्दनों का नाप दे सको पढ़ो
गूँगों को आवाज़ दे सको पढ़ो
बेपर को परवाज़ दे सको पढ़ो
रस्मों के मदफ़्न तक पढ़ो
इज़्ज़त के कफ़न तक पढ़ो
हो बात में वजन तक पढ़ो
कुचलने को फन तक पढ़ो
खात्मा दौरे स्याह तक पढ़ो
बेबसी आह तबाह तक पढ़ो
पढ़ो रात से सुबह तक पढ़ो
हालात से निबाह तक पढ़ो
पढ़ो उम्र दराज़ के लिये पढ़ो
दिलों पर राज़ के लिये पढ़ो
मकाम के वसूल तक पढ़ो
रहमतों के नुजुल तक पढ़ो।
नस्लों के अंदाज़ के लिये पढ़ो
खुद पर नाज़ के लिये पढ़ो
बनने को सरताज के लिये पढ़ो
पढ़ो पढ़ो तुम आज के लिये।
तिफ्ल ओरत ओ मर्द भी पढ़ो
खिले जबीं चेहरे जर्द भी पढ़ो
पढ़ो नौजवां कौम के फर्द भी पढ़ो
मिटा दे मायूसी वो दर्द भी पढ़ो।
घर में एक है या दस पढ़ो
हों लाख मुश्किल तस पढ़ो
इकरा नबी की शान पढ़ो
मैं पढ़ूं तुम पढ़ो बस पढ़ो।
49. सफर..
सफर लंबा है और वक्त कम।
दो कदम आप बढ़ो दो कदम हम।
यह मुश्किलें हम से कहां बड़ी हैं
हर हाथ में जादूगर की छड़ी है।
हिम्मत के पांवों पर जवानी खेलती रहेगी
हर आफत बला को दूर धकेलती रहेगी।
कलेजे की आग से आंखों के शोले
तू लड़ इस तरह के खून खोले।
जुर्रत को कहां जरूरत है आन की
तेरी जुर्रत ही तो बात है शान की।
आकिल की आंख का शुरमा बनकर
जी गर जीना है तो शूरमां बन कर।
जिगर मुखालिफ की परवाह न कर
गलत है गर संगी वाह वाह न कर।
*********************************
50. हम....
रास्ता नहीं कहीं से निकले हम
ले लकुटिया घर से निकले हम।
अब से कोई वहम नहीं होगा
हक बात पर रहम नहीं होगा।
सड़कें छोटी कदम बड़े हैं
हम अपनी जिद्द पर अड़े हैं।
एड़ियों का लहू ज़मीं पी गई
मरे चेहरे की खुशियां जी गई।
सूरज को दीया दिखाना मत
तूने क्या किया बताना मत।
51. टिके......
आसान है तनकीद हर किसी के लिए
बात तो तब है के कोई इबारत लिखें।
किसी की तरफ अंगुली करने वाले
तुझ पर उठी तीन अंगुलियां न दिखें।
पशो पेश में हूँ,देखूं किसे किस को नहीं
लिखने वाले तेरे लिए वो क्या लिखे।
हर हूनर अजमाया तस्कीन के लिए
तेरे दर की रोशनी में चराग मेरे बिके।
जिगर महाफिल के उसूल याद रहे तुझे
टिकेंगे वही अस्खास जो साथ तेरे टिके।
52. कर
जो तुझे मना करे तु अता कर
जफा के बदल में तु वफ़ा कर।
नुकसान लाख कर दरगुजर
मिले मौका तुझे तो नफा कर।
तोड़ने वाले से मिल दिल से
टूटे को जोड़ने का रिश्ता कर।
जुल्म का जवाब शिला रहम
बख्शदे तु किये को भुला कर।
तुराब का हिसाब हुआ आसां
दी कलम तालिब को आ कर।
खर्च दे जो कमाया ए बलीग
जो साथ जाए वो शे जमा कर।
जिगर ज़ामीने जन्नत यह बात
दूर अंधेरा शम ए इल्म जला कर।
*********************************
53. गाज़ी.....
खबर बिना सच जाने छापी गई
शराफत की ज़मी झूठ से नापी गई।
अखबारों का कब ये उसूल हुआ
पैमाना-ए-खबर का फ़िज़ूल हुआ।
वक़्त-ए-ग़म दुश्मन भी रोता होगा
दाग़ी है काला सहाफ़त का चोग़ा।
नौजवान आज सड़क पे पड़े थे
तुम झूठ को सच कहने पे अड़े थे।
अपनों के खोने का दर्द जानोगे
जब बीतेगी खुद पर तो मानोगे।
कौन मुजरिम, किसकी साजिश है
ये बेगुनाहों पे इल्ज़ाम नवाज़िश है।
मुजरिम कौन, कैसा पता नहीं लगता
ग़लत को सही करें अच्छा नहीं लगता।
सुन लो, हम सह गए ज़ुल्म इतने
अब काम न आएंगे तेरे फ़ितने।
शहीद को तुम शहीद क्यों नहीं बताते
मंशा-ए-खुद को क्यों नहीं दिखाते।
हम हक़ पे रहे, बार-बार इंसाफ़ किया
पर न समझना दिल से माफ़ किया।
पुलिस ओ सहाफ़त का सत्य धर्म है
हक़ से पूरा करे जो उसका कर्म है।
अब नहीं चलेगी ये जालसाज़ी
ज़िंदाबाद गाज़ी, ज़िंदाबाद गाज़ी।
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