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लघुकथा - छोटी बहू

लघुकथा - छोटी बहू......
कुंदरू शहर के निकट के गांव जूसर में एक नामचीन बड़े परिवार में चार भाई रहते थे।
गांव के लोग इस परिवार की बड़ी इज्जत और सम्मान करते थे।
पिता अपने समय के जागीरदार थे परंतु लाख कोशिशों के बावजूद बेटों को जिस हद तक पढ़ाने की इच्छा थी नहीं पढ़ा सके।
समय ने करवट बदली, परिवार की जागीरदारी जाती रही, घर में कमाई कम हो गई लेकिन खर्चे वही रहे।
कबीर का दोहा है -
बढ़त बढ़त संपत्ति सलिल मन सरोज बढ़ी जात,
घटत- घटत पुनि ना घटे बरू समूल कुमलात।
धीरे धीरे घर की स्थिति में कमजोरी आने लगी।
कमजोर होते घरों में अक्सर महिलाएं अपने परिवार के लिए लालची हो जाती हैं, ऐसा ही इस घर में हुआ।
बड़ा बेटा पंवरा जिस के नाम से जमीदार ने पानी वाली सिंचित जमीन खरीदी थी पर कब्जा कर लिया। पिता के खूब समझाने पर भी वह नहीं माना तो मायूस हो कर जागीरदार जी ने उसे अपनी सारी जमीनों से बेदखल कर दिया।
उस से छोटा तेरा सिंह जो जागीरदार जी का पूरा काम संभालता था ने बड़ी चालाकी से जमा धन संपत्ति को अपने कब्जे में कर लिया। 
दोनों ही बड़ों ने अपने खुद के मन से कोई फैसला नहीं किया, बस घर वालियों के हठ के आगे परिवार को हार गए।
तीन नंबर का आलियाज सिंह भावुक आदमी था सीधा ही रह गया।
छोटा बेटा जो अभी स्कूल की पढ़ाई पूरी कर कॉलेज में गया ही था इस पूरे मामले से अनभिज्ञ रहा।
तंगी खस्ताहाली में उसने दूसरे शहर में पढ़ने के लिए फॉर्म भरा और ईश्वर की कृपा से पढ़ाई के लिए सरकारी वज़ीफ़ा मिल गया और वह अपनी पढ़ाई में व्यस्त हो गया।
यह छोटा ना ज्यादा तेज़ था और ना ही इतना भोला, सब जानता था पर किसी से कहता कुछ नहीं। वह जब भी छुट्टी 
कुंदरू शहर में बड़ी बहन के घर रहता था। बहन ने अपने पड़ौस की लड़की से उसका रिश्ता कर दिया। 
दो साल तक रिश्ता रहा और बाद में शादी हो गई।
छोटे की बहु तेज़ तर्रार समझदार और होशियार होने के साथ ही पारिवारिक ऊँच - नीच से अच्छी तरह से भिज्ञ थी, छोटा दूसरे शहर में नव वधु ससुराल में।
अब जेठानियों ने अपना जाल डालना शुरू किया, छोटे को बहकाने की पूरी कोशिश की कि वह उस से अलग हो जाए। उस पर चरित्रहीन होने के आरोप लगाए गए पर वह नहीं डिगी। अडिग लड़ती रही, छोटी बहू ने पूरे मामले को समझ लिया आखिर जेठानियाँ चाहती क्या हैं।
जागीरदार जी और जागीरदारिनी भी कमाऊ बेटों के दबाव में बड़ी बहुओं का अधिक पक्ष लेते।
समय बीतता गया, एक दिन छोटे ने जब घरवाली को फोन (तब लैंडलाइन फोन हुआ करते थे) किया तो पता चला दोनों बड़े भाई अलग हो गए हैं और घर में कुछ भी सामान नहीं है। जागीरदार जी की एक हजार रुपए पेंशन आती है जो उनके सिगरेट के खर्च में भी कम पड़ते थे।
दोनों ने किसी के सामने हाथ नहीं फैलाने की बजाय मेहनत करनी शुरू कर दी।
बहुरानी घर का काम सुलटा बंधेज का काम करने लगी और छोटा शहर में पढ़ने के साथ- साथ ट्यूशन पढ़ाने लगा। ऊपर वाले की दुआ से उसे बिना किराए का घर मिला हुआ था, खर्च के लिए 20 बच्चों की ट्यूशन फीस आ जाती।
साल भर बाद छोटे की पढ़ाई पूरी हो गई और वह गांव आ गया।
गांव आते ही उसने कुंदरू शहर और गांव में ट्यूशन और दिन में मजदूरी करनी शुरू कर दी। छः माह बाद उसने अपना एक प्राइमरी स्कूल खोल लिया, जिसमें सैकड़ों बच्चों ने प्रवेश लिया।
घर में रोज के झगड़ों से तंग आ कर दोनों पत्नी पति ने दो छोटे मकान, एक रसोई और छोटा सा आंगन घर के पीछे की खाली जमीन में बना लिए। परिवार के लोगों को उनकी एक बात बहुत बुरी लगती थी कि वो दोनों खाना एक साथ बैठ कर खाते।
लोग तानें मारते के देखो , कैसा बेशर्म आदमी है लुगाई के साथ खाना खाता है। छोटा इन सब की परवाह किए बगैर स्कूल, ट्यूशन और घरेलू जीवन के बीच आगे बढ़ने की लालसा से ओतप्रोत रहता था।
थोड़े दिन में उसके घर एक चांद सी बेटी हुई। जिस दिन बेटी हुई ईश्वर ने उसे दूसरा उपहार सरकारी नौकरी का भी दे दिया। अब छोटा दिन में स्कूल जाता शाम को घर लौट अपनी परी को कंधे पर बैठा कर गुवाड़ में घूमता। 
लोग फिर तानें मारते कि देखो कितना बेशर्म आदमी है बेटी को गोद में कंधे पर लिय घूमता है। 
पर वह तो विद्रोही था, उस पर किसी के दबाव, तानें और कहे का कहां असर होता। नौकरी लगने के बाद भी छोटे में पढ़ाई जारी रखी, रात भर जग कर पढ़ते हुए उसने अधिस्नातक के अपने विषय में  यूनिवर्सिटी का गोल्डमेडल प्राप्त किया।
गांवों में आपसी नाराजगी में रूठने मनाने का दौर चलता रहता है पर छोटी बहू ने मेल मिलाप इस तरह से बनाए रखा कि उनके यहाँ कोई भी काम पड़े पूरी बिरादरी आती है और वो सबके जाते हैं। कहने को तो छोटी बहू कम पढ़ी लिखी है पर बात को साधने, नाराज को मनाने ओर समस्या के समाधान में चपल और होशियार है।
कबीर का मंत्र 
ना काहु से दोस्ती ना काहू से बैर
के सिद्धांत पर अडिग रहीम के सिद्धांत
सब से हिलमिल चलिए नदी नाव संजोग
को आदर्श मान कर वह दिल जीतने में माहिर है।
आज भी विवाह के 30 वर्ष बीत जाने के बाद भी दोनों नव विवाहित के जैसे खुशी-खुशी गृहस्थ जीवन जी रहे हैं।
#जिगर_चूरूवी

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