राजस्थान में हिरासत में मौत के बढ़ते आँकड़े, गंभीर सवाल और न्याय की पुकार
आरोपों की जांच -
1. राजस्थान में 2024-25 में हिरासत में 9 मौतें हुईं -
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2. वर्ष 2025-26 में यह संख्या 18 हो गई
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3. उपलब्ध सरकारी आँकड़ों के अनुसार 15 मार्च 2026 तक राजस्थान देश में दूसरे स्थान पर रहा -
• ✅ इस अवधि के आँकड़ों में बिहार 19 और राजस्थान 18 मामलों के साथ क्रमशः पहले और दूसरे स्थान पर रहे।
4. जयपुर के मुहाना थाने से जुड़े मामले में किशोर की मौत हुई -
• ✅ मौत और मामले की रिपोर्टिंग की पुष्टि हुई है।
5. किशोर के जन्म प्रमाणपत्र के अनुसार उसकी उम्र 16 वर्ष 9 महीने थी -
✅ समाचार रिपोर्टों में यही उम्र ब किशोर को पीटा गया -
• परिवार और चश्मदीदों के आरोप हैं। अंतिम निष्कर्ष जाँच से निकलेगा।
6. किशोर को दूसरे नाम से अस्पताल ले जाया गया और साँप के काटने की बात कही गई -
• यह आरोप समाचारों में दर्ज है, लेकिन इसे अभी स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
7. लगभग 10 एंटीवेनम इंजेक्शन लगे और सीटी स्कैन में सिर में गंभीर चोट मिली -
• ✅ समाचार रिपोर्टों में इन विवरणों का उल्लेख है। इनसे अपने आप यह साबित नहीं होता कि चोट किसने पहुँचाई या साँप काटने की कहानी जानबूझकर गढ़ी गई थी।
9. राज्य मानवाधिकार आयोग ने सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने के निर्देश दिए -
• ✅ इसकी पुष्टि रिपोर्टों से होती है। आयोग ने मामले में जाँच के लिए भी कदम उठाए।
उपरोक्त आंकड़ों की जांच से यह साबित होता है कि कहीं ना कहीं पुलिसिया कार्यवाही का वीभत्स रूप सामने आया है।
लोकतंत्र में पुलिस का दायित्व नागरिकों की सुरक्षा करना, कानून का पालन सुनिश्चित करना और अपराधों की निष्पक्ष जाँच करना है। लेकिन जब पुलिस हिरासत में किसी व्यक्ति की मौत हो जाती है, विशेषकर तब जब मृतक एक नाबालिग किशोर हो, तो यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं रह जाती। यह कानून के शासन, मानवाधिकारों और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा गंभीर सवाल बन जाता है।
पुलिस हिरासत में मौत एक चिंता -
राजस्थान में पुलिस हिरासत में मौत के दर्ज मामलों से संबंधित आँकड़े चिंता पैदा करते हैं। केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) से प्राप्त आँकड़ों के अनुसार, राजस्थान में वर्ष 2024-25 के दौरान हिरासत में मौत के 9 मामले दर्ज हुए, जबकि वर्ष 2025-26 में 15 मार्च 2026 तक यह संख्या बढ़कर 18 हो गई। इस अवधि में राजस्थान देश में दूसरे स्थान पर रहा। ये आँकड़े बताते हैं कि हिरासत में होने वाली मौतों को केवल अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इनके पीछे की परिस्थितियों, पुलिस की कार्यप्रणाली और जवाबदेही की गंभीरता से समीक्षा आवश्यक है।
जयपुर में किशोर की मौत ने खड़े किए गंभीर सवाल -
जयपुर के मुहाना थाने से जुड़े एक नाबालिग किशोर की मौत का मामला पुलिस व्यवस्था और मानवाधिकारों पर कई सवाल खड़े करता है। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, किशोर के जन्म प्रमाणपत्र में उसकी उम्र 16 वर्ष 9 महीने बताई गई थी। आरोप है कि उसे थाने में रखा गया, जबकि उसके संबंध में मुकदमा दर्ज किए जाने और हिरासत की वैधानिक प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठे हैं।
इस मामले में परिवार और चश्मदीदों की ओर से किशोर के साथ मारपीट किए जाने के आरोप लगाए गए हैं। समाचारों में यह भी बताया गया कि उसे साँप के काटने की बात कहकर निजी अस्पताल ले जाया गया और उसे एंटीवेनम के इंजेक्शन लगाए गए। दूसरी ओर, रिपोर्टों में सीटी स्कैन के दौरान मस्तिष्क में गंभीर चोट सामने आने का उल्लेख है। किशोर की बाद में मौत हो गई।
इन परिस्थितियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि किशोर को चोट कैसे लगी, अस्पताल पहुँचाने से पहले और बाद में वास्तव में क्या हुआ तथा साँप के काटने संबंधी दावे की चिकित्सकीय जाँच से क्या निष्कर्ष निकलता है?
इन सवालों का उत्तर केवल निष्पक्ष और प्रमाण-आधारित जाँच से ही मिल सकता है। जब तक जाँच पूरी नहीं हो जाती, किसी व्यक्ति या पक्ष को दोषी घोषित करना उचित नहीं होगा। लेकिन आरोपों की गंभीरता को देखते हुए जाँच में देरी या लापरवाही की कोई गुंजाइश भी नहीं होनी चाहिए।
नाबालिगों के अधिकारों की रक्षा करना कानून की जिम्मेदारी -
किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 बच्चों के अधिकारों और उनके साथ कानून के अनुरूप व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है। अधिनियम की धारा 10 के अनुसार, कानून से संघर्षरत बच्चे को पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है। ऐसे बच्चे को पुलिस लॉकअप या जेल में नहीं रखा जा सकता और उसे निर्धारित समय-सीमा के भीतर किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत करना होता है।
इसलिए यदि किसी नाबालिग को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के विरुद्ध थाने में रखा गया, तो यह जाँच का अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। पुलिस की वर्दी किसी को कानून से ऊपर नहीं है। कानून का पालन कराने वाली संस्था पर स्वयं कानून का पालन करने की जिम्मेदारी और भी अधिक होती है।
किसी बच्चे के साथ व्यवहार करते समय उसकी उम्र, गरिमा, सुरक्षा और कानूनी अधिकारों का ध्यान रखना अनिवार्य है। यदि किसी अधिकारी ने इन जिम्मेदारियों का उल्लंघन किया है, तो उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
मानवाधिकार आयोग की भूमिका और जाँच की पारदर्शिता -
इस मामले में राजस्थान मानवाधिकार आयोग द्वारा संज्ञान लेकर जाँच कराने तथा थाने के सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने के निर्देश दिए जाने की खबरें सामने आई हैं। यह एक महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि हिरासत में हुई किसी घटना की सच्चाई सामने लाने में सीसीटीवी फुटेज, अस्पताल के रिकॉर्ड, चिकित्सकीय परीक्षण, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, ड्यूटी रजिस्टर और संबंधित व्यक्तियों के बयान अहम साक्ष्य हो सकते हैं।
जाँच में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि किशोर को थाने क्यों लाया गया, उसे वहाँ किस कानूनी आधार पर रखा गया, उसके साथ कौन-कौन से पुलिसकर्मी मौजूद थे, चोट किन परिस्थितियों में लगी और अस्पताल ले जाने के समय क्या जानकारी दी गई थी।
साँप के काटने के दावे की भी स्वतंत्र चिकित्सकीय और फोरेंसिक जाँच होनी चाहिए। केवल किसी बयान के आधार पर न तो उस दावे को सत्य मानना चाहिए और न ही बिना पर्याप्त साक्ष्य उसे जानबूझकर गढ़ी गई कहानी घोषित करना चाहिए।
सीसीटीवी फुटेज को सुरक्षित रखना पर्याप्त नहीं है। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उपलब्ध रिकॉर्ड की निष्पक्ष जाँच हो, साक्ष्यों से छेड़छाड़ न हो और जाँच के निष्कर्ष उचित समय में सार्वजनिक किए जाएँ, बशर्ते कानून और पीड़ित की निजता से संबंधित प्रतिबंधों का पालन किया जाए।
सरकार की जवाबदेही केवल बयान देने तक सीमित नहीं हो सकती -
लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व केवल घटनाओं पर प्रतिक्रिया देना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करना भी है जिसमें हिरासत में होने वाली मौतों की रोकथाम हो और प्रत्येक घटना की निष्पक्ष जाँच सुनिश्चित की जा सके।
राजस्थान सरकार को इस मामले में पारदर्शिता के साथ कार्रवाई करनी चाहिए। यदि प्रथमदृष्टया संबंधित पुलिसकर्मियों के विरुद्ध गंभीर आरोपों की पुष्टि करने वाले साक्ष्य मिलते हैं, तो जाँच को प्रभावित होने से बचाने के लिए उन्हें संवेदनशील ड्यूटी से हटाने या नियमानुसार अन्य अंतरिम कदम उठाने पर विचार किया जाना चाहिए। यदि साक्ष्य अपराध या कर्तव्य में गंभीर लापरवाही स्थापित करते हैं, तो एफआईआर दर्ज करने और विभागीय तथा आपराधिक कार्रवाई की प्रक्रिया कानून के अनुसार आगे बढ़नी चाहिए।
यह माँग किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने की नहीं है। यह नागरिकों के जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा की माँग है। सरकार किसी भी दल की हो, पुलिस प्रशासन की जवाबदेही सुनिश्चित करना उसकी संवैधानिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी है।
हिरासत में मौत केवल एक आँकड़ा नहीं, एक परिवार का उजड़ना है -
सरकारी आँकड़ों में 9 से 18 तक पहुँची संख्या एक सांख्यिकीय वृद्धि दिखाई दे सकती है, लेकिन प्रत्येक मामले के पीछे एक जीवन, एक परिवार और न्याय की उम्मीद जुड़ी होती है। किसी व्यक्ति की हिरासत में मृत्यु होने पर उसके परिजनों को केवल अपने प्रियजन को खोने का दुःख नहीं झेलना पड़ता, बल्कि उन्हें घटना की सच्चाई जानने और न्याय पाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ सकता है।
इसीलिए हिरासत में मौत के प्रत्येक मामले की स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध जाँच आवश्यक है। पुलिस हिरासत में मौजूद व्यक्ति राज्य की जिम्मेदारी के अंतर्गत होता है। उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन का दायित्व है।
सरकार को पुलिस थानों में निगरानी व्यवस्था मजबूत करनी चाहिए, हिरासत संबंधी नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना चाहिए, पुलिसकर्मियों को मानवाधिकारों और किशोर न्याय कानून के प्रति संवेदनशील बनाना चाहिए तथा हिरासत में हुई प्रत्येक मौत की जवाबदेही तय करने के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए।
निष्कर्ष -
न्याय हो, सच्चाई सामने आए
जयपुर के किशोर की मौत का मामला केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहना चाहिए। परिवार को न्याय मिलना चाहिए, सच्चाई सामने आनी चाहिए और यदि किसी ने कानून का उल्लंघन किया है, तो उसके पद या वर्दी की परवाह किए बिना उचित कार्रवाई होनी चाहिए।
राजस्थान सरकार को इस मामले में संवेदनशीलता, निष्पक्षता और तत्परता दिखानी चाहिए। संबंधित साक्ष्यों को सुरक्षित रखा जाए, जाँच की निगरानी की जाए और दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों को कानून के अनुसार दंडित किया जाए।
लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती तभी दिखाई देती है, जब सबसे कमजोर व्यक्ति के अधिकार भी सुरक्षित हों और सत्ता में बैठे लोगों से लेकर कानून लागू करने वाली संस्थाओं तक, हर कोई कानून के प्रति जवाबदेह हो।
हिरासत में मौत का हर मामला एक चेतावनी है। न्याय तभी पूरा होगा, जब सच्चाई सामने आएगी, जवाबदेही तय होगी और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के ठोस कदम उठाए जाएँगे।
कार्यवाही -
जयपुर पुलिस आयुक्तालय में तैनात पुलिस निरीक्षक मुकेश खनाड़िया को APO कर दिया गया है। मुकेश खनाड़िया वही पुलिस अधिकारी बताए जा रहे हैं, जिनके पास नाबालिग सतनाज दोहान की कस्टडी थी। इस मामले में नाबालिग के साथ कथित तौर पर की गई प्रताड़ना और पुलिस की जवाबदेही को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
सवाल यह है कि नाबालिग की कस्टडी के दौरान क्या हुआ और इस मामले में जिम्मेदारी किसकी तय होगी? 15.10.2026
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