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स्वतंत्रता सैनानी नीरा आर्य

स्वतंत्रता संग्राम की जासूस वीरांगना - नीरा आर्य - 
सुभाष चंद्र बोस के साथ नीरा आर्य 

नाम - नीरा आर्य 
उपनाम
1. नीरा नागिनी (संगीन घोंपकर पति की हत्या करने पर नेताजी द्वारा दिया गया नाम)।
2. पेदम्मा - (हैदराबाद की महिलाओं द्वारा दिया गया नाम)।
पिता का नाम - सेठ छज्जूमल, व्यापारी थे, जिनका व्यापार कलकत्ता सहित देशभर में फैला हुआ था।
माता का नाम - अभी ज्ञात नहीं
जन्म स्थान - खेकड़ा, बागपत उत्तर प्रदेश
जन्म दिनांक - 5 मार्च 1902
शांत स्थान - हैदराबाद, तेलंगाना
मृत्यु दिनांक - रविवार 26 जुलाई, 1998
सहोदर - भाई बसंतकुमार (आजाद हिन्द फौज में सिपाही), आजादी के बाद संन्यासी बन गए।
पति - श्रीकांत जयरंजन दास (अंग्रेज पुलिस इंस्पेक्टर)
पद - आजाद हिन्द फौज की रानी झांसी रेजिमेंट की सिपाही (कैप्टन), गुप्तचर
विशेष
1. श्रीकांत जयरंजन दास अंग्रेज भक्त अधिकारी था जिसे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जासूसी कर मौत के घाट उतारने की जिम्मेदारी दी गई थी। अवसर पाकर श्रीकांत ने नेताजी को मारने हेतु गोलियां दागी जो नेताजी के ड्राइवर को लगी। वहां उपस्थित नीरा आर्य ने श्रीकांत जयरंजन दास के पेट में संगीन घोंपकर उसकी हत्या कर दी।
2. आजादी के बाद इन्होंने फूल बेचकर जीवन यापन किया, लेकिन कोई भी सरकारी सहायता या पेंशन स्वीकार नहीं की।
शिक्षा - प्रारम्भिक शिक्षा कलकत्ता के निकट भगवानपुर गांव से गुरु (संस्कृत) बनी घोष के सानिध्य में पूर्ण कर आगे पढ़ने हेतु कलकत्ता आ गईं। नीरा आर्य हिन्दी, अंग्रेजी, बंगाली के साथ-साथ कई अन्य भाषाओं में भी प्रवीण थीं।

नीरा आर्य के कार्य - 
पवित्र मोहन रॉय आजाद हिंद फौज के गुप्तचर विभाग के अध्यक्ष थे जिनके निर्देशन में महिला एवं पुरुष गुप्तचर विभाग काम करता था। इसमें नीरा आर्य को आजाद हिंद फौज की प्रथम जासूस होने का गौरव प्राप्त है। नीरा को यह जिम्मेदारी स्वयं नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने दी थी। अपनी साथी मानवती आर्य, सरस्वती राजामणि, दुर्गा मल्ल गोरखा, एवं युवक डेनियल काले के साथ इन्होंने नेताजी के लिए अंग्रेजों की जासूसी की। [

नीरा आर्य की जेल यात्रा - 
आजाद हिन्द फौज के समर्पण के बाद जब लाल किले में मुकदमा चला तो सभी बंदी सैनिकों को छोड़ दिया गया, लेकिन इन्हें पति की हत्या के आरोप में काले पानी की सजा हुई थी, जहां इन्हें घोर यातनाएं दी गई। आजादी के बाद इन्होंने फूल बेचकर जीवन यापन किया, लेकिन कोई भी सरकारी सहायता या पेंशन स्वीकार नहीं की।

नीरा आर्य की आत्मकथा के अंश - 
नीरा ने स्वयं की आत्मकथा लिखी जिसके अंश - 
01. जासूसी - 
जासूसी से संबंधित इनकी आत्मकथा का एक अंश इस प्रकार है : मेरे साथ एक और लड़की थी, सरस्वती राजामणि। वह उम्र में मुझसे छोटी थी, जो मूलतः बर्मा की रहने वाली थी और वहीं जन्मी थी। उसे और मुझे एक बार अंग्रेजी अफसरों की जासूसी का काम सौंपा गया। हम लड़कियों ने लड़कों की वेशभूषा अपना ली और अंग्रेज अफसरों के घरों और मिलिट्री कैम्पों में काम करना शुरू किया। हमने आजाद हिंद फौज के लिए बहुत सूचनाएँ इकट्ठी की। हमारा काम होता था अपने कान खुले रखना, हासिल जानकारी को साथियों से डिस्कस करना, फिर उसे नेताजी तक पहुँचाना। कभी-कभार हमारे हाथ महत्वपूर्ण दस्तावेज भी लग जाया करते थे। जब सारी लड़कियों को जासूसी के लिए भेजा गया था, तब हमें साफ तौर से बताया गया था कि पकड़े जाने पर हमें खुद को गोली मार लेनी है। एक लड़की ऐसा करने से चूक गई और जिंदा गिरफ्तार हो गई। इससे तमाम साथियों और आर्गेनाइजेशन पर खतरा मंडराने लगा। मैंने और राजामणि ने फैसला किया कि हम अपनी साथी को छुड़ा लाएँगी। हमने हिजड़े नृतकी की वेशभूषा की और पहुँच गई उस जगह जहाँ हमारी साथी दुर्गा को बंदी बना के रखा हुआ था। हमने अफसरों को नशीली दवा खिला दी और अपनी साथी को लेकर भागी। यहां तक तो सब ठीक रहा लेकिन भागते वक्त एक दुर्घटना घट ही गई, जो सिपाही पहरे पर थे, उनमें से एक की बंदूक से निकली गोली राजामणि की दाई टांग में धंस गई, खून का फव्वारा छूटा। किसी तरह लंगडाती हुई वो मेरे और दुर्गा के साथ एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ गई। नीचे सर्च आॅपरेशन चलता रहा, जिसकी वजह से तीन दिन तक हमें पेड़ पर ही भूखे-प्यासे रहना पड़ा। तीन दिन बाद ही हमने हिम्मत की और सकुशल अपनी साथी के साथ आजाद हिंद फौज के बेस पर लौट आई। तीन दिन तक टांग में रही गोली ने राजमणि को हमेशा के लिए लंगड़ाहट बख्श दी। राजामणि की इस बहादुरी से नेताजी बहुत खुश हुए और उन्हें आईएनए की रानी झांसी ब्रिगेड में लेफ्टिनेंट का पद दिया और मैं कैप्टन बना दी गई। मैंने एक दिन राजामणि को मजाक में कहा, तू तो लंगडी हो गई, अब तेरे से शादी कौन करेगा? तो बोली, आजाद हिन्द में हजारों छोरे हैं, उनमें से कोई एक जो जंग में सीने पर और दोनों पैरों पर गोलियां खाएगा और दुश्मनों को ढेर करेगा उसी से कर लूंगी, बराबर की जोड़ी हो जाएगी।
02. जेल में - 
‘‘मैं जब कोलकाता जेल से अंडमान पहुंची, तो हमारे रहने का स्थान वे ही कोठरियाँ थीं, जिनमें अन्य महिला राजनैतिक अपराधी रही थी अथवा रहती थी। हमें रात के 10 बजे कोठरियों में बंद कर दिया गया और चटाई, कंबल आदि का नाम भी नहीं सुनाई पड़ा। मन में चिंता होती थी कि इस गहरे समुद्र में अज्ञात द्वीप में रहते स्वतंत्रता कैसे मिलेगी, जहाँ अभी तो ओढ़ने बिछाने का ध्यान छोड़ने की आवश्यकता आ पड़ी है। जैसे-तैसे जमीन पर ही लोट लगाई और नींद भी आ गई। लगभग 12 बजे एक पहरेदार दो कम्बल लेकर आया और बिना बोले-चाले ही ऊपर फेंककर चला गया। कंबलों का गिरना और नींद का टूटना भी एक साथ ही हुआ। बुरा तो लगा, परंतु कंबलों को पाकर संतोष भी आ ही गया।।
अब केवल वही एक लोहे के बंधन का कष्ट और रह-रहकर भारत माता से जुदा होने का ध्यान साथ में था। ‘‘सूर्य निकलते ही मुझको खिचड़ी मिली और लुहार भी आ गया। हाथ की सांकल काटते समय थोड़ा-सा चमड़ा भी काटा, परंतु पैरों में से आड़ी बेड़ी काटते समय, केवल दो-तीन बार हथौड़ी से पैरों की हड्डी को जाँचा कि कितनी पुष्ट है। मैंने एक बार दुःखी होकर कहा - 
‘‘क्या अंधा है, जो पैर में मारता है?’‘ 
"पैर क्या हम तो दिल में भी मार देंगे, क्या कर लोगी?’’ उसने मुझे कहा था। 
‘‘बंधन में हूँ तुम्हारे कर भी क्या सकती हूँ...’’  फिर मैंने उनके ऊपर थूक दिया था, 
‘‘औरतों की इज्जत करना सीखो?’’ 
जेलर भी साथ थे, तो उसने कड़क आवाज में कहा - 
‘‘तुम्हें छोड़ दिया जाएगा,यदि तुम बता दोगी कि तुम्हारे नेताजी सुभाष कहाँ हैं?’’ 
‘‘वे तो हवाई दुर्घटना में चल बसे,’’ मैंने जवाब दिया, ‘‘सारी दुनिया जानती है।’’ 
‘‘नेताजी जिंदा हैं....झूठ बोलती हो तुम कि वे हवाई दुर्घटना में मर गए?’’ जेलर ने कहा।
‘हाँ नेताजी जिंदा हैं।’’ 
‘तो कहाँ हैं...।’’ 
‘‘मेरे दिल में जिंदा हैं वे।’’ 
जैसे ही मैंने कहा तो जेलर को गुस्सा आ गया था और बोले, 
‘‘तो तुम्हारे दिल से हम नेताजी को निकाल देंगे।’’ और फिर उन्होंने मेरे आँचल पर ही हाथ डाल दिया और मेरी आँगी को फाड़ते हुए फिर लुहार की ओर संकेत किया...लुहार ने एक बड़ा सा जंबूड़ औजार जैसा फुलवारी में इधर-उधर बढ़ी हुई पत्तियाँ काटने के काम आता है, उस ब्रेस्ट रिपर को उठा लिया और मेरे दाएँ स्तन को उसमें दबाकर काटने चला था...लेकिन उसमें धार नहीं थी, ठूँठा था और उरोजों (स्तनों) को दबाकर असहनीय पीड़ा देते हुए दूसरी तरफ से जेलर ने मेरी गर्दन पकड़ते हुए कहा, 
‘‘अगर फिर जबान लड़ाई तो तुम्हारे ये दोनों गुब्बारे छाती से अलग कर दिए जाएँगे...’’
उसने फिर चिमटानुमा हथियार मेरी नाक पर मारते हुए कहा, 
‘‘शुक्र मानो महारानी विक्टोरिया का कि इसे आग से नहीं तपाया, आग से तपाया होता तो तुम्हारे दोनों स्तन पूरी तरह उखड़ जाते।’’ 
03. उपन्यास - 
उर्दू लेखिका फरहाना ताज (जो हिन्दी में मधु धामा के नाम से लिखती हैं) को भी इन्होंने अपने जीवन के अनेक प्रसंग सुनाए। धमा ने नीरा आर्य के जीवन पर एक उपन्यास लिखा है, जिसमें इनके आजादी की जंग में योगदान को रेखांकित किया गया है।

नीरा आर्य के अंतिम दिन - 
नीरा आर्य ने जीवन के अंतिम दिनों में हैदराबाद में फूल बेचकर झोंपड़े में गुजारा किया। अतिक्रमण बता कर सरकार ने इनकी झोंपड़ी को तोड़ दिया। बीमार नीरा आर्य की चार मीनार के पास उस्मानिया अस्पताल में मृत्यु हो गई। एमएफ हुसैन पर भारत माता पेंटिंग मुकदमा करने वाले हिन्दी अखबार दैनिक स्वतंत्र वार्ता के पत्रकार तेजपाल सिंह धामा ने इनका अंतिम संस्कार किया।

नीरा आर्य के संबंध में लेखन कार्य - 
स्वयं नीरा आर्य द्वारा रचित पुस्तकें - 
01. मेरा जीवन संघर्ष (हिन्द पाकेट बुक्स)
02. अंडमान की अनोखी प्रथाएं
नीरा आर्य के बारे में अन्य लेखन - 
1. आजाद हिन्द फौज के गुमनाम सैनिक, मन्मथनाथ गुप्त, हिन्द पाकेट बुक्स, 1968
2. ये जासूस महिलाएं, सत्यदेव नारायण सिन्हा हिन्द पाकेट बुक्स, 1968
3. नेताजी सुभाष चंद्र बोस के अज्ञात साथी, निर्मल बोस, अक्षरा प्रकाशन, 1978
4. आजाद हिन्द की पहली जासूस, हिन्द पाकेट बुक्स, 2004
5. भूली बिसरी ऐतिहासिक कहानियां, तेजपाल सिंह धामा, सूर्या भारती प्रकाशन,  2012
6. आजाद हिन्द की पहली जासूस, मधु धामा, सागर प्रकाशन, 2018
7. भारतीय किसान यूनियन, हुक्के से हक तक, डॉ. रणजीत सिंह, सागर प्रकाशन, 2018
8. ये जासूस महिलाएं, सत्यदेव नारायण सिन्हा, पेंगुइन रेंडम हाउस, 2019
9. नीरा आर्यः आजाद हिन्द की पहली जासूस, मधु धामा, आर्यखंड टेलीविजन प्रा. लि., 2021

नीरा आर्य राष्ट्रीय सम्मान - 
नीरा आर्य के नाम पर एक राष्ट्रीय पुरस्कार भी स्थापित किया गया है। प्रथम नीरा आर्य पुरस्कार के लिए छत्तीसगढ़ के अभिनेता अखिलेश पांडे को दिया गया।

निरा आर्य स्मारक -
नीरा आर्य के जन्मस्थल खेकड़ा, बागपत में साहित्यकार तेजपालसिंह धामा एवं मधु धामा ने मिलकर व्यक्तिगत रूप से 70 लाख रुपए में नीरा आर्य स्मारक की स्थापना की है, जिसमें एक भव्य पुस्तकालय भी है। यहां उनकी प्रतिमा के साथ-साथ 300 से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों की जनकारी भी संग्रहित की गई है।

आवश्यकता है इन शहीदों को उचित समान दिया जाए।

शमशेर भालू खां 
9587243963

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