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प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की शहादत

इंदिरा गांधी हत्याकांड चित्र गैलरी
         इंदिरा गांधी बाल्यकाल
            इंदिरा गांधी युवा काल
          इंदिरा गांधी प्रौढ़ काल 
          नई दिल्ली हत्या स्थल
       हत्या के समय पहने कपड़े
            अंतिम यात्रा अर्थी
           इंदिरा जी चिता पर
               ज्वलित चिता
   मुखाग्नि देते हुए पुत्र राजीव गांधी 
श्रद्धांजलि देने पहुंची आम भारतीय नारी
हत्यारे सा संतवंत सिंह, बेअंत सिंह और केहर सिंह 
    इंदिरा गांधी मेमोरियल नई दिल्ली 
   समाचार पत्र दैनिक भास्कर फोटो

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या
ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार के बाद इंदिरा गांधी को मृत्यु का भान पहले ही हो गया था। हत्या के एक दिन पहले 30 अक्टूबर को भुवनेश्वर में जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि  “आज मैं जिंदा हूं, शायद कल न रहूं, मुझे इस बात की परवाह नहीं है। मैंने एक लंबी जिंदगी जी है। मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने अपनी जिंदगी लोगों की सेवा करते हुए बिताई है। मैं अपनी आखिरी सांस तक लोगों की सेवा करती रहूंगी और मेरे खून का एक - एक कतरा भारत को मजबूत करेगा।”
31 अक्टूबर 1984 को नई दिल्ली सफदरजंग रोड प्रधानमंत्री आवास पर सुबह का सामान्य दिन था। आयरिश टीवी के लिए ब्रिटिश अभिनेता पीटर उस्तीनोव एक वृत्तचित्र बना रहे थे। इस वृतचित्र के फिल्मांकन हेतु इंदिरा जी तैयार हो रहे थे। सामान्यतः वो अपना बुलेट प्रूफ जैकेट पहनती थीं पर आज बिना जैकेट के ही कांस्टेबल नारायण सिंह, निजी सुरक्षा अधिकारी रामेश्वर दयाल और निजी सचिव आर.के. धवन के साथ छोटे गेट से बाहर निकल कर एक अकबर रोड स्थित प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर जाते समय दो अंगरक्षक कांस्टेबल सतवंत सिंह और सब इंस्पेक्टर बेअंत सिंह ने अंधाधुंध गोलियां चला कर इंदिरा जी को घायल कर दिया। बेअंत सिंह ने .38 (9.7 मिमी) पिस्टल से तीन गोलियां चलाईं जिस से श्रीमती गांधी धरती पर गिर गईं, इसके बाद सतवंत सिंह ने स्टर्लिंग सब स्टेन कार्बाइन से तेतीस गोलीयां चलाई जिन में से कुल 27 गोलियां इंदिरा जी को लगीं। गोलीबारी कर दोनो ने हथियार डाल दिए। बेअंत सिंह ने कहा " हमें जो करना था कर दिया अब तुम जो करना चाहो करो।"
घायल इंदिरा को कार द्वारा एम्स ले जाया गया। अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में दम तोड़ दिया। एम्स डॉक्टर्स ने ऑपरेशन कर उनके शरीर से 23 गोलियां निकाल दीं पर 07 गोलियां अंदर ही रह गई। दोपहर बाद 2:20 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। इन्दिरा गांधी की हत्या की सूचना 10 घंटे बाद शाम के समाचारों में दूरदर्शन पर समाचार वाचक सलमा सुल्तान ने दी।
अस्पताल से शव 01 नवंबर को आम जन के दर्शनार्थ तीन मूर्ति भवन (पुराने पैतृक आवास) ले जाया गया। 03 नवंबर को राज घाट के पास उनका अंतिम संस्कार किया गया। पुत्र राजीव गांधी ने मुखाग्नि दी। इस स्थान का नाम शक्ति स्थल रखा गया। एक से बारह नवंबर तक राष्ट्रीय शोक रखा गया। अगले चार दिनों में 1984 के सिख नरसंहार में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 3350 सिख व अन्य आंकड़ों के अनुसार 30000 सिक्खों की मौत हुई। हजारों बेघर हो गए।

हत्यारों को सजा - 
केवल छह मिनट में सीमा पुलिस अधिकारी तरसेम सिंह जामवाल और राम सरन ने बेअंत को पकड़ कर वहीं मार डाला। सतवंत सिंह को अन्य साथी केहर सिंह के साथ भागने के प्रयास से पहले घायल अवस्था में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। सतवंत सिंह और केहर सिंह पर मुकदमा चला, दोषी ठहराए गए और पांच साल बाद 6 जनवरी 1989 को फांसी दे दी गई। दोनो "बोले सो निहाल, सत श्री अकाल" के नारे लगाते हुए फांसी पर झूल गए।

अपराधियों का पंजाब में महिमा मंडन - 
हत्यारे अपराधियों को पंजाब में मान - समान दिया गया। उन्हें कौम दे हीरे ( जेम्स ऑफ द कम्युनिटी ) की उपाधि दी गई। इस विषय पर एक पंजाबी फिल्म 22 अगस्त 2014 को रिलीज की जानी थी पर भारत सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया।

इंदिरा गांधी हत्याकांड जांच आयोग - 
इंदिरा गांधी हत्याकांड की जांच हेतु न्यायमूर्ति मनहरलाल प्राणलाल ठक्कर की अध्यक्षता में न्यायमूर्ति ठक्कर जांच आयोग का गठन किया गया। इस आयोग ने हत्या की साजिश के प्रत्येक पहलू का गहन परीक्षण कर पृथक से जांच की सिफारिश की। ठक्कर आयोग की रिपोर्ट में खुलासा था कि हत्याकांड की साजिश में मिलीभगत के संदेह की सुई आर. के. धवन की ओर इंगित होती नजर आ रही है। श्रीमती गांधी के निजी सचिव आर.के. धवन ने खुफिया और सुरक्षा अधिकारियों के आदेश को खारिज कर (खुफिया विभाग ने सरवंत सिंह और बेअंत सिंह सहित कई सुरक्षा कर्मियों को संभावित साजिशकर्ताओं से साझीदारी के शक में हटाने की सलाह दी थी।) को यथावत रखा। बेअंत सिंह 10 साल से इंदिरा गांधी के पसंदीदा गार्डों में से एक था। सिख होने के कारण सब इंस्पेक्टर बेअंत सिंह को ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद सुरक्षा स्टाफ से हटा दिया गया परंतु श्रीमती गांधी ने उन्हें पुनः सुरक्षा गार्ड के रूप में रखने के निर्देश दिए। 22 वर्षीय सतवंत सिंह को मई 1984 में ही गार्ड के रूप में रखा गया था। सतवंत सिंह से पूछताछ के बाद केहर सिंह (बेअंत सिंह का चाचा) और बलबीर सिंह के नाम साजिश में शामिल लोगों में आए।
मुकदमें की चार्जशीट के अनुसार ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद बेअंत सिंह चाचा केहर सिंह के साथ अक्सर गुरुद्वारे जाया करता थ। एक दिन बेअंत सिंह गुरुद्वारे में उपदेश सुनते समय रोने लगा। चाचा केहर सिंह ने कहा, रो मत बदला ले। यहीं से बेअंत सिंह ने इंदिरा गांधी की हत्या की योजना बनाना शुरू कर दिया। बाद में बलबीर सिंह को इस योजना में शामिल किया गया। सिंतबर 1984 में प्रधानमंत्री आवास में तैनात बलबीर सिंह को एक बाज दिखता है. उसने जैसे ही बाज को देखा तो तुरंत बेअंत सिंह को बुलाया और बाज की तरफ इशारा किया कि बाज (गुरु गोविंद सिंह का निशान, चिड़ियां नाल बाज़ लडावे वो ही सच्चा सिक्ख कहलावे)। इंदिरा गांधी की हत्या से पहले सतवंत सिंह और बेअंत सिंह ने अपनी ड्यूटी बदलवाई। 30 अक्टूबर को सतवंत सिंह ने साथी कांस्टेबल से कहा था कि मेरे पेट में दिक्कत है और तुम्हारी जो पोजिशन है उसके पास में ही टॉयलेट पड़ता है ऐसा कहते हुए उसने ड्यूटी एक्सचेंज कर ली। बेअंत सिंह की रात की ड्यूटी लगी थी और उसने भी बहाना बनाकर दिन की ड्यूटी करवा ली और सुबह घटना को अंजाम दे दिया।

"मेरे रक्त का एक एक कतरा भारत की एकता और अखंडता को मजबूत करेगा।"
- भ्वनेश्वर के अंतिम सार्वजनिक भाषण में इंदिरा गांधी का उद्बोधन।

शमशेर भालू खान 
9587243963

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