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लघुकथा - "काल अकाल और रोटी"

लघुकथा
काल, अकाल और रोटी
सोलापुर गांव में संता किसान रहता था। अच्छा-खासा भरा-पूरा परिवार, उपजाऊ जमीन और नेक पड़ोसियों के कारण उसका जीवन सुखमय था।
ईश्वर की कृपा से हर साल बढ़िया बारिश होती और उसकी काली मिट्टी वाली जमीन गांव में सबसे अधिक अनाज देती। लगातार सात-आठ वर्षों तक यह क्रम चलता रहा। संता ने पक्का मकान बनवाया, पत्नी के लिए गहने बनवाए और धीरे-धीरे किसान संता अब गांव में संतराम जमींदार के नाम से पहचानने जाने लगा।
अब उसे बिना चुपड़ी रोटी, सब्जी और सलाद के खाना अच्छा नहीं लगता। सफेद झकाझक धोती, सिला-सिलाया कुर्ता, धारीदार तिवाल और नोकदार जूतियां पहनकर वह टमटम पर बाजार जाता। साथ में चार-पांच टेरिये (चमचे) हुक्का गुड़गुड़ाते और उसकी हां में हां मिलाते। टमटम की रुनझुन से गांव में उसकी शान देखते ही बनती।
घर में कभी बगैर चुपड़ी रोटी मिलती तो वह नाराज़ होकर रोटियां आक के बाड़े में फिंकवा देता और होटल से बढ़िया भोजन मंगवा लेता।
पर समय का पहिया फिरा। अगले तीन-चार वर्षों तक अकाल पड़ा। खेत सूखे, कुएं प्यासे और किसान भूखों मरने लगे। जमींदार संतराम के घर का अनाज भी धीरे-धीरे खत्म हो गया। लोग कहते हैं—जिस साल को छप्पनिया अकाल कहा गया, वह सबसे भयावह था। भूख ने सबको निगल लिया।
संतराम भी अब धीरे-धीरे भूख से तड़पने लगा। उसके टेरिये और चमचे ऐसे गायब हुए जैसे गधे के सिर से सींग।
एक दिन भूख ने उसे इतना सताया कि वह बाड़े में भरुंट खोदने निकला। वहीं आक के सूखे पत्तों में टिटण चलती, तो करड़-करड़ की आवाज आती।
संतराम भागते हुए पत्तों को उलटता और कहता –
🎂“कुण है... रोटी? कुण है... रोटी?”
रोटी-रोटी करते-करते थका हुआ संतराम वहीं आक की छांव में सदा के लिए ठंडा हो गया
🔥कबीर का दोहा चरितार्थ हो उठा –
“बढ़त बढ़त संपत्ति सलिल, मन सरोज बढ़ी जात,
घटत-घटत पुनि ना घटे, बरु समूल कुंभलात।”
शिक्षा - 
समय की बाढ़ के आगे सब पाल टूट जाती हैं।
✍️ जिगर चूरूवी
(शमशेर भालू खां)

पॉडकास्ट रूपांतरण - 
इसमें लिखा रहेगा कि कहाँ नैरेशन है, कहाँ कौन-सा म्यूज़िक और साउंड इफेक्ट (SFX) डालना है। कोई भी एडिटर/साउंड इंजीनियर इसको आसानी से जोड़ सकेगा।

🎧 पॉडकास्ट स्क्रिप्ट – काल, अकाल और रोटी

✍️ जिगर चूरूवी

🎙️ इंट्रो

BGM: ढोलक + बांसुरी की हल्की धुन
SFX: सुबह के गाँव की चिड़ियों की चहचहाहट

Narrator (गंभीर, भावपूर्ण):
यह कहानी है सोलापुर गाँव की…
जहाँ संता नाम का किसान मेहनत और किस्मत के बल पर
संतराम जमींदार बन गया।

🎙️ दृश्य 1 – सम्पन्नता

BGM: हल्की रुनझुन वाली ताल
SFX: टमटम की घंटियाँ "रुनझुन-रुनझुन", हुक्के की गुड़गुड़ाहट

Narrator:
अब संतराम बिना घी-चुपड़ी रोटी और सब्जी के खाना नहीं खाता।
सफेद धोती, सिला-कुर्ता और नोकदार जूते पहनकर
जब टमटम पर निकलता…
तो उसके चमचे हुक्का गुड़गुड़ाते हुए कहते
Chorus (चमचों की आवाज़):
“माया तेरा तीन नाम—संतीयो, संतो, संतराम!”

🎙️ दृश्य 2 – अकाल का आगमन

BGM: उदास ढोलक की धीमी थाप
SFX: आँधी/रेत के तूफ़ान की आवाज़

Narrator:
लेकिन समय का पहिया घूमा…
लगातार तीन साल अकाल पड़ा।
खेत सूख गए, कुएँ प्यासे रह गए।
और जमींदार संतराम का घर भी खाली हो गया।

Narrator (धीमे स्वर में):
चमचे भी ऐसे गायब हुए…
मानो गधे के सिर से सींग।

🎙️ दृश्य 3 – संतराम की भूख

SFX: सूखे पत्तों की खड़खड़ाहट
BGM: तनावपूर्ण धीमी बांसुरी

Santarām (कमजोर और पागलपन से भरी आवाज़ में):
कुण है… रोटी?
कुण है… रोटी??

SFX: तेज़ सांसें → अचानक गिरने की "धप्" आवाज़ → लंबा सन्नाटा

🎙️ समापन

BGM: हल्की बांसुरी और पृष्ठभूमि में गूंजता स्वर
SFX: प्रतिध्वनि जैसी इको

Kabir (गंभीर गूंजती आवाज़ में):
“बढ़त-बढ़त संपत्ति सलिल,
मन सरोज बढ़ी जात।
घटत-घटत पुनि ना घटे,
बरु समूल कुंभलात॥”

🎙️ एंडिंग
BGM: धीमी ढोलक और बांसुरी (Fade out)
Narrator (मार्मिक स्वर में):
भूख से तड़पता संतराम
आक की छाया तले हमेशा के लिए ठंडा हो गया।

कहानी हमें यही सिखाती है—
समय के तूफ़ान के आगे,
सबसे ऊँची मीनार भी धूल हो जाती है।

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