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✅मोहम्मद साहब से पहले अरब

मोहम्मद साहब से पहले अरब के लोग विभिन्न धर्म और विश्वासों को मानते थे।
उन में से कुछ मूर्ति पूजक, कुछ एकेश्वरवादी, कुछ नास्तिक (अधर्मी) और साइबी, कुछ यहुदी और ईसाई थे। 
मूर्ति पूजा अरब के प्राचीन निवासियों में भी पाई जाती थी। आद, समूद, जदीस, जरहम ओला, अमलीक़ अव्वल आदि मूर्ति पूजा करते थे, लेकिन उनका विस्तृत वर्णन बहुत पुराने समय के कारण नहीं मिल रहा है। बाकी रहे अरब आरिबह और अरब मुस्त आरिबह दो प्रकार से मूर्ति पूजा करते थे। 
1. फरिश्ते और जिन्न (दैव) अदृश्य शक्ति वाले।
2. दूसरे पूर्वजों की नकल के बूत तैयार किए गए जिन्होंने अपने जीवन में भले कामों से ख्याति प्राप्त की। 
(यह गिरोह (मूर्ति पूजक होने के बावजूद उनको वास्तविक उपास्य न मानता था, बल्कि उनका विश्वास यह था कि सांसारिक अधिकार उन पूर्वजों की आध्यात्मिक शक्ति की यादगार के रूप में हमारे आगे उपस्थित हैं। वे हमारी इच्छाओं की पूर्ति हेतु खुदा से सिफारिश करते हैं और हिसाब के दिन आध्यात्मिक शक्ति द्वारा उनके गुनाहों को खुदा से माफ करवाएंगे। 
अरब में देवताओं की मूर्तियां जिनकी पूजा की जाती थी जो दो प्रकार के थे -
(क) खास कबीलों की खास मूर्तियां - 
1. हुबुल
2. वद
3. मुत्राअ
4. यगूस
5. यऊक
6. नसर
7. उज्जा
8. लात
9. मनात 
समस्त अरब में पूजे जाने वाले देवताओं की मूर्तियां -
1. दवार, ११-
2. असाफ़,
(कोहे सफ़ा (सफ़ा नामक पहाड़) पर स्थित मूर्ति)
3. नाइला, (कोहे मरवाह (मरवाह पहाड़) पर स्थित मूर्ति, इन दो देवताओं पर बलि दी जाती थी)।
4. अवाअव, इस पर ऊंटों की कुर्बानी (बलि) की जाती थी।
5. काबे के अन्दर हजरत इब्राहीम की तस्वीर थी और उनके हाथ में इस्तखारह (एक प्रकार का कर्मकांड) के तीर थे जो इजलाम कहलाते थे और एक भेड़ का बच्चा उनके निकट खड़ा था। हजरत इस्माईल की मूर्ति खाना काबा में रखी हुई थी।
6. हजरत मरियम और हजरत ईसा नबी की मूर्तियां खाना काबा में रखी हुई थीं। 
इसके अलावा 
1. बद, 
2. यगूस, 
3. यऊक़ और 
4. नसर 
उस अज्ञानता के समय में अरब से भी पहले नूह नबी के पूर्वज थे उनकी पत्थर की मूर्तियां बना कर काबे में लगा कर उनकी पूजा करने लगे। खुदापरस्ती (एकेश्वरवाद) भी यहां प्रचलित था परन्तु कम एवं छुपे हुए। यह दो प्रकार से प्रचलित थी - 
1. अज्ञात और अदृश्य शक्ति की पूजा जिसे वो अपना सृष्टा मानते थे।
2. वो जो किसी अदृश्य/सदृश्य शक्ति में विश्वास नहीं करते थे, नास्तिक (अधर्मी) 
हिसाब किताब का मैदान, आत्मा का पुनर्जीवन, और उस के कर्मों के आधार पर दंड या पुरस्कार को नास्तिक के अलावा सभी मानते थे।
साईबी धर्म वाले शीश और इदरीस नबी के अनुयायी थे जो सात समय की नमाज और एक महीने के रोजे रखते व नमाज ए जनाजा भी पढ़ते व काबा की इज्जत करते थे।रोजा या ये जनाजे की नमाज पढ़ते थे। लेकिन वो सत्रब सय्यारा नामक एक तारे की पूजा करते थे। यहूदी धर्म अरब में 35 सदी पूर्व हदूबे आदम (पांच सौ ईस्वी पूर्व) बख्त नसर की लड़ाई हुई। यहूदियों ने यहां अपने दीन को फैलाना शुरू किया। 4026 हबूते आदम (354 ईस्वी पूर्व) जूनिवास हमीर यमन का राजा यहूदी हो गया जिससे यह धर्म यहां तेजी से फैलने लगा। हबुते आदम यहूदियों द्वारा तोरात की टीकाओं के अनुसार वर्ष विशेष जैसे हिजरी, ईस्वी, संवत्) तीसरी सदी ईस्वी में ईसाई धर्म ने अरब में प्रवेश किया। जबकि पूर्वी कलीसा में ईसाई में नई - नई बातें जोड़ी जा रही थीं। इतिहासकारों के अनुसार यह समय राजा जूनिवास जिस के राजकाल में ईसाई धर्म नजरान इलाके में अधिक फैला। इनके अलावा बनू तमीम मजूसी और अधिकांश कुरैश गुमराह (भटके) हुए थे। मुहम्मद साहब के जन्म से पहले अरब में पंडे (काहिन) और नजूमी (ज्योतिषि) अधिक रहते थे।
इन्होंने यह बात फैलाई कि निकट भविष्य में अरब में एक पैगम्बर पैदा होने वाले हैं जो सभी धर्मों पर प्रभावी होगा।

हुबुल देवता - 
अरब की प्राचीन मान्यताओं में, हुबुल (अरबी: هُبَل) एक देवता था जिसकी पूजा इस्लाम से पहले अरब में, खासकर मक्का के काबा में कुरैश द्वारा की जाती थी. 
यहां हुबुल देवता के बारे में कुछ और जानकारी दी गई है:
पूजा:
हुबुल की पूजा इस्लाम से पहले अरब में व्यापक रूप से की जाती थी, और कुरैश जनजाति के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण था. 
काबा:
हुबुल की मूर्ति काबा में स्थित थी, जो उस समय अरबों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल था. 
प्रतीक:
माना जाता है कि हुबुल की मूर्ति एक मानव आकृति थी जो भविष्यवाणी के कार्यों को नियंत्रित करती थी, जो मूर्ति के सामने तीर फेंककर की जाती थी. 
विवाद:
कुछ विद्वानों का मानना है कि हुबुल अल्लाह का एक प्राचीन नाम था, जबकि अन्य लोग इसे एक अलग देवता मानते हैं. 
अन्य नाम:
कुछ विद्वानों ने हुबुल को एक चंद्र देवता के रूप में भी माना है, हालांकि अन्य लोगों ने इसके विपरीत सुझाव दिया है. 
अल्लाह:
इस्लाम में अल्लाह एक ईश्वर है, जिसे मुसलमानों और अरब ईसाइयों द्वारा एक ईश्वर का उल्लेख करने के लिए प्रयोग में लिया जाता है।

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