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09. हृदयांश (हिंदी कविता संग्रह 01) 54 कविताएं✍️

                       हृदयांश
                    कविता संग्रह 
01. एक सपना
02. बूझो तो जानें
03. हराम कमाई 
04. जिंदगी के रंग
05. मुक्तक
06. है एक शक्तिमान 
07. इंडिया 2047
08. करोना काल 
09. आंखों के सपने
10. तुम्हें आना होगा......
11. मर रही है.....
12. चीर हरण.....
13. बीते दिन.....
14. हार जीत.....
15. मति विनाश.....
16. जिंदाबाद...…
17. सीता........
18. मुक्त कविता देश हित.....
19. धर्म पताका......
20. कैसी देशभक्ति.....
21. घर जाएंगे.....
22. जलियांवाला बाग.....
23. विदाई......
24. पुरस्कार......
25. हराम कर....
26. अहम का त्याग.....
27. व्यथा........
29. गलियारों में.......
30. नेता........
31. क्यों घर आई.....
32. घुल गए......
33. शुरू करें...
34. होली.......
35. गांधी.........
36. करीब......
37. राणा सांगा......
38. बैठक...........
39. श्री राम......
40. सपने.......
41. समर्थन......
42. शक्ति..........
43. दास.......
44. जीवन मित्र.........
45. कल जो..........
46. चोट.......
47. दिया........
48. तपा सोना.........
49. पांव पखारें........
50. मीत आयेगा......
51. पितामह.....
51. द्रोपदी......
52. मैं और तुम.....
 53. कला.....
54. राहुल...



        01 - एक सपना - 
कहते हैं चुनाव के लिए जरूरी है पैसा
मैं कहूं नहीं, कुछ नहीं है ऐसा।

है चुनाव का अपना एक फंडा
यहां जरूरी झंडा, डंडा- गर्म ठंडा।

मौका मिला तो नई एक मशाल दूंगा
टिकट मिलने पर चुनाव निकाल दूंगा।

काम कैसे होते हैं योजना बना कर
दिखा सकता हूं गांव शहर सजा कर।

वोट की नब्ज़ टटोलना जानता हूं
कहां क्या है बोलना जानता हूं।

कौन अपना पराया पहचान मुझे
नहीं कह सकता कच्चे कान मुझे।

पिताजी के दिखाए रस्ते पे चलना
आता है मुझे हर सांचे में ढलना।

बिगड़ी बात बनाना जानता हूं
हो जाए गलती उसे मानता हूं।

कहें लोग चाय भी नहीं पिला पाओगे
मैं पिलाऊंगा दूध जब तुम आओगे।

बिजली पानी चिकित्सा सड़क स्कूल
यही जरूरतें हैं नागरिक की मूल।

ट्रांसफर पोस्टिंग संविदा निविदा आसान
खुश मजदूर कुली किसान बागवान।

लाइब्रेरी स्टेडियम व्यवसायिक शिक्षा
हर योजना की गहन सूक्ष्म समीक्षा।

फेरीवाल, व्यापारी छोटा दुकानदार
समझ के साथ सबका भला उद्धार।

जल भराव कटानी रस्ते लाइट स्ट्रीट में
समस्या समाधान होगा मेरी ट्रीट में।

108 गांव 75 वार्ड चूरू के खुशहाल
देखो कैसे चमकता है चूरू का भाल।

कवि हूं नेता हूं संघर्ष का पर्याय 
लूँ दुआ सबकी नहीं किसी की हाय।

हर हाथ को काम हर सर पर छांव
साफ सुथरे हो गली मोहल्ले गांव।

पर्यावरण बचा के लगाऊं पेड़ अपार
खेत में नहर से बंजर भूमि सुधार।

आवास वाहन रोजगार की पहल
शुद्ध मनोरंजन के दिल जाए बहल।

विदेश जाने वालों का कुछ करना है
उन्हें भविष्य के लिए नहीं डरना है।

नीति रणनीति और परिणीति से काम
मेहनत से उत्पादन का पूरा पूरा दाम।

जाति धर्म रंग लिंग नस्ल भेद से दूर
मानव कल्याण की संभावना प्रचूर।

जिगर शमशेर गांधी को चुन के देख
रेशमी सपनों के धागे बुन के देख।
                  ------------ 
                02बूझो तो कौन 
जब कुछ नहीं होता है 
बात बात पे रोता है
कहने को छः घंटे सोता है
बीज कलह के बोता है
बहाने नए नए लाता है
रोनी सूरत बनाता है।

15 लाख जुमला तुम्हारा था
कर मुक्त भारत का नारा था
पूरे देश ने स्वीकारा था
कहो दोष क्या हमारा था
कभी - कभी देश में आता है
रोनी सूरत बनाता है।

खेलो इंडिया कहां है आज
गिरी बेटियों पे जिसकी गाज
कपटी अपचारियों का राज
खंड - खंड होता समाज
बेगुनाहों को सताता है
रोनी सूरत बनाता है।

बुलेट ट्रेन एक कहानी
चाय केतली और नादानी
सिसके बीवी भरी जवानी
फेंकम फांक ना आनी जानी
जब भेद सामने आता है
रोनी सूरत बनाता है।

खुद दे तो गाली सुहानी
दाता जिसका है अडानी
शर्म उनसे पानी पानी
अपनी डफली लमतरानी
महंगी मशरूम खाता है
रोनी सूरत बनाता है।

भेष टैगोर का बना कर
नाचे ढोल पीपही बजाकर
भैंस मंगलसूत्र चोरी कथा सुनाकर
वोट चोरी चुना लगा कर
स्वयं को अवतरित बताता है
रोनी सूरत बनाता है।

कहे किसी को जर्सी गाय
बना स्वःघोषित नमो शिवाय
फोटो शूट कर पूछे राय
दानव को कहे पन्ना धाय
राम को पकड़ अंगुली चलाता है
रोनी सूरत बनाता है।

शत्रु चीन से हाथ मिलाया
छप्पन इंच कहां सीना दिखाया
ट्रंप को परम मित्र बताया
शांत देश में आतंक मचाया
स्वांग नए नए रचाता है
रोनी सूरत बनाता है।
                 ----------------
       03हराम कमाई
भाई की ज़मीन दबाई,
बेटों की हवेली बनवाई
अंत घड़ी करीब आई
याद आया अपना भाई
कैसा मोह कैसी कमाई।

जवानी का जोश भारी
न समझ, न थी तैयारी
पछतावा दिल पर भारी
भाई के काम आए भाई
कैसा मोह कैसी कमाई।

पाप की गठरी भर गई
जीवित आत्मा मर गई
चकाचौंध सब उतर गई
लालच ने आग लगाई
कैसा मोह कैसी कमाई।

इबादत का मुखौटा ओढ़े
दिल से रिश्ते सबसे तोड़े।
संगियों संग शत्रुता जोड़े
हराम की रोटी पर मलाई
कैसा मोह कैसी कमाई।

समय का न्याय अटल है
लोभ पतन का जूठा फ़ल है।
अपनों से करता छल है
दुर्गुण बनें जब आतताई
कैसा मोह कैसी कमाई।
                 ---------------
               04जिंदगी के रंग - 
उम्मीद हैं
उमंग हैं
 तरंग है
नाचे अंग अंग है
ए ज़िन्दगी
तेरे कई रंग हैं।

खुश हूं
खुश मिजाज हूं
रहूं ऐसा,आज हूं
खुद की खुद से
जंग है
ए जिंदगी
तेरे कई रंग हैं।

बदलते दौर में
बढ़ते शोर में
रहें संग
वो तू और मैं
मिजाज मलंग है
ए जिंदगी
तेरे कई रंग हैं।

बेचारे का चारा
मरा, बेसहारा
एक की जीत
एक हारा
कुएं पड़ी भंग है
ए जिंदगी
तेरे कई रंग हैं।

काम की
नाम की
इनाम की
बातें इल्हाम की
आदमी आदमी से तंग है
ए जिंदगी
तेरे कई रंग हैं।
                    ------------
                     05. मुक्तक 
मसला ये नहीं
हक बात कहनें वाले
खत्म हो गए
मुश्किल ये है 
हम सिर्फ 
अपनी मर्जी का हक
सुनना चाहते हैं।
                  ---------- 
              06. है एक शक्तिमान 
है एक शक्तिमान 
चांद से ठंडा
सूर्य से गर्म
बिग बैंग का उद्घाटक
तारों से तेजवान 
है एक शक्तिमान।

आग को पानी
पानी से पत्थर 
ग्रहों का संयोजक
अस्त और उदयमान
है एक शक्तिमान।

जीवन दाता 
वहीं पिता और माता
परमाणु का संस्थापक
अरदास प्रेयर अजान
है एक शक्तिमान।

ढूंढ खुद में
मिलूंगा तब मैं
ब्रह्मांड का अभिभावक
अंतरिक्ष का स्वाभिमान
है एक शक्तिमान।

जनेऊ टीका टोपी
नमाज आरती जो की 
पाखंड के प्रस्तावक
मानव ही भगवान
है एक शक्तिमान।
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             07. इंडिया - 2047
स्वप्न विकसित भारत का
सपना शिक्षित भारत का।

युवक लक्षित भारत का
वासी रक्षित भारत का।

शासक दीक्षित भारत का
जन निकसित भारत का।

हो कैसा भविष्य का भारत
हर हाथ काम की महारत।

बच्चे खेलें करें शरारत
सर्व जन भाव सेवारत।

उपजे अन्न हर खेत में
कनक निपजे रेत में।

हिंसा उपद्रव से दूर हो
कुशल हर मजदूर हो।

लगें उद्योग भरपूर हों
श्रमिक हित ज़रूर हों।

सही संसाधनों उपयोग हो
पर्यावरण प्रेमी उपभोग हो।

चयन सही हो नेताओं का
भारत भाग्य प्रणेताओं का।

भाई भतीजावाद इंकार
दोषी को दंड दे सरकार।

धर्म जाति लिंग भाषा का रक्षण
दुराग्रह का ना हो कोई लक्षण।

समन्वित सबका साथ हो
विकास में सबका हाथ हो।

हो नृप जैसा राम थे
सदासई अविराम थे।

सड़क, चिकित्सा, सिंचाई
हर हाथ को दो काम भाई।

चिंतित ना बेटी का बाप हो
कन्या जन्म ना अभिशाप हो।

शिक्षा पर पूरा पूरा खर्च हो
एकसे मंदिर मस्जिद चर्च हो।

स्वप्न विकसित भारत का
नागरिक शिक्षित भारत का।
                  ----------------
       8. करोना काल 
बालक पढाई से हाथ धो बैठे 
कैद हम घुमाई से हाथ धो बैठे
बीमार दवाई से हाथ धो बैठे 
अंत्येष्टि भी कतार में होना है 
किस-किस से हाथ धोना है।

किराया चालू दुकान बंद है 
रसोई खाली मकान बन्द है 
घर चौकड़ी मैदान बन्द है 
आदमी टूटता खिलौना है 
किस-किस से हाथ धोना है।

लूटता धरती का भगवान हमें 
बेचता समझकर सामान हमें 
करना कब तक विषपान हमें 
यह जीवन बना बोझ ढोना है 
किस-किस से हाथ धोना है।

सोये देवता नींद में फरिश्ते 
अब तार-तार होने लगे रिश्ते 
जमी आसमान के बीच पीसते 
बहुत खो चुके कितना खोना है 
किस-किस से हाथ धोना है।

मुश्किल के पल छंट जायेंगे 
मुसीबत के दिन कट जायेंगे 
पुण्य करने से पाप घट जाएंगे 
भविष्य का स्वप्न सलोना है 
किस-किस से हाथ धोना है।
                ---------------
           09. आंखों के सपने 
इन आँखों के सपने
देखना इन आंखों से 
मैं नहीं हम मिलकर 
देखते हैं कब पूरे करें
इन आँखों के सपने
इनको है ज़रूरत 
थोड़ी सी हंसी प्यार 
एक मुस्कुराहट 
मिलकर देंगे इनको 
इन आँखों के सपने 
परी की दास्तां यही 
सब गलत यह सही 
इन आँखों के सपने 
बिना कुछ कहे कहीं 
खुली आँखों से देखें 
हम तुम हम सब 
इन आँखों के सपने
                   -------------
10. तुम्हें आना होगा - 
इंक़लाब आसान नहीं
तपना पड़ता है आग में
जो हृदय से उठती है
वो आग जो जलाती नहीं
जगाती है सोए को
वो आग चिंगारी बन
हमें करती है आगाह
सुनहरे भविष्य के लिए
इस ने अपना काम कर दिया
कब जागोगे तुम
कब लड़ोगे अपने लिए
तिफ़ल ही सही पर शूरमा है
खड़ा है अंगारों पे तन्हा
पुकारती है इस की आंखें
जिन में सपने हैं कल के
मेने सुन ली मौन तरंग
जो इस के अंतर्मन से उठी
आप जब सुन लें
आ जाना साथ देने
अपने लिए
कुछ सपने बुनने हैं
कुछ कहती है 
ये मौन आवाज
आप ने सुनी 
या अनसुनी की
फर्क नहीं पड़ता 
चल पड़ा अकेला
यायावर सा खामोश
पुकारता आने को
साथ निभाने को 
स्वयं का
मैं तुम और 
यह मौन आवाज
काफी हैं जगाने को
जो जुल्म से डर कर चुप हैं
पर कब तब रूकोगे
आना पड़ेगा सुन कर 
दर्द भरी वेदना मन की
आप को भी मुझे भी
तब आयेगी क्रांति
तब बरपा होगा इंक़लाब
इंक़लाब ज़िंदाबाद
क्रांति जिंदाबाद
संघर्ष जिंदाबाद
              --------------
11. मर रही है....
मन से तन से
सहायता की
परोपकार की
मानवीय संवेदना  
मर रही है
मानवता क्या कर रही है।
तड़प कर 
कैमरे में संजो रहे पल 
शालीन सभ्य 
भेड़िये 
शान से 
सड़क पर 
करुणा सहायता
मानवता का भाव 
मर रहा है
मानव क्या कर रहा है
पैर था हाथ थे
समाप्त पुरुषार्थ थे 
दो शब्द शोक के 
दम तोड़ती 
आदमियत के नाम 
हृदय से उतर रहा है
मानव क्या कर रहा है।
                  ------------
11. चीर हरण.....
देवी द्रोपदी का चीर हरण हुआ 
भीषण महाभारत का रण हुआ। 
दुखी सीता बिलखती रोती
लंका की हालत क्या होती।
दुर्योधन का अट्टहास सुनोगो 
बोलो तुम किस को चुनोगे।

दुस्सासन की हिम्मत फिर हुई
भयानक भयभीत निरभई। 
लाज लूटने वाला कौरव कौन
भीष्म पितामह हैं क्यों मौन। 
ऐसे राम राज के स्वपन बुनोगे 
बोलो तुम किस को चुनोगे।

दिल्ली सोया राज दरबार
कठोर तम हृदयी सरकार। 
जले देश राजा विमान सवार 
राजाजी धिक्कार है धिक्कार। 
मन कही मन की कब सुनोगे 
बोलो तुम किस को चुनोगे।

ट्रैक्टर नीचे कुचलता किसान कहे
लाज लुटेरे बेटी पहलवान कहे। 
स्थापित धर्म दंड का सम्मान कहे
सनातन ईसाई सिख मुसलमान कहे। 
धर्म की भट्टी में कब तक भूनोगे 
बोलो तुम किस को चुनोगे।

भारत राष्ट्र का सम्मान बचालो 
इंद्र वज्र गदा हनुमान उठालो। 
हे कृष्ण अब सुदर्शन संभालो 
गांडीव से अर्जुन के तीर चलालो। 
सहस्त्ररण भीम बन वीर घूमोगे 
बोलो तुम किस को चुनोगे।
                 ------------
13. बीते दिन.......
बीते दिन जीते शान से चले गुमान में 
आज वो अस्थियां बिखरी श्मशान में

शक्ति का घमंड छेद करे आसमान में 
सूखा शरीर नहीं शब्द नहीं जबान में

तर्जनी के बल करे बवाल जहान में 
अंधेरे के तीर लौट आये कमान में।

बल रूप मोह मद ये छल संसार में 
भटकता मानव मन रहे अरमान में।

राज मोहर नोक पे जूते के फरमान में 
वंशज उनके फिरते मारे लोक जहान में

कुल लाज बची रहे चाहे जीना छान में 
रही गाथा सदा अमर उनकी शान में।

हे नरोत्तम जिगर बात रखियो ध्यान में 
गांव सराहे सरहे मुरख कहे महान मैं।
                     ------------
14. हार जीत.....
साहब हार और जीत में क्या रखा है 
हमने चूरु आपने तारानगर मजा चखा है।

दिन एक से नहीं होते कभी धूप - छांव
हम रोज जलते अब जले आपके पांव।

जिस जुबां में लिखते सुनते मिटाने वालो 
घर खुद के जलते औरों के जलाने वालो।

मैंने सब्र की इंतहा में बेजां अश्क खर्चे हैं 
तेरी आदावत से ज्यादा मेरी मोहब्बत के चर्चे हैं।

खोली आंखें अंधेरों में उजाला नहीं पड़ा 
जंगल में खेलते शेर से पाला नहीं पड़ा।

अखबारात में खुद को मशगूल कीजिए 
हुजूर बचकानी बातों को तूल दीजिए।

जिगर सुनो अभी तो इश्क की धुन बाकी
हुआ क्या है आनी वक्त की सुन बाकी।
                   -------------
15. मति विनाश....
मन मंदिर के द्वार खड़ा विश्वास के दास 
पद बढ़ा तो कद घटा हुआ मति विनाश।

गीता उपदेश कर्मफल गुंजा चार दिशा 
कृष्ण कहे अर्जुन से हे तात करो विश्वाश।

मर्यादा के श्रीराम ने त्यागा राज घर बार 
साथिन सीता अनुगामी को करे परिहास।

खेले निराले खेले बखत नित रोज
खूंटी निगले गलहार हरिश्चंद्र उच्छवास।

पान सड़े न घोड़ा अड़े अनहोनी न होय 
होनी को न बांध सके कितने करो प्रयास।

अबल को सबल करे कुकुर रंगा सियार मसीतां दौड़े काजीजी हो भयंकर त्रास।

हीन भाव से आत्म बल हुआ मरे समान 
सूतली रोके हाथी को नहीं शक्ति आभास।
                   ++++++++
16. भय....
चुप हो डर कर भय से
पर कब तब रूकोगे 
आना पड़ेगा सुन कर 
दर्द भरी वेदना मन की 
आप को भी, मुझे भी 
तब आयेगी क्रांति 
तब आएगा इंक़लाब 
इंक़लाब ज़िंदाबाद 
क्रांति जिंदाबाद 
संघर्ष जिंदाबाद
जब सुन ले
आ जाना इसके साथ 
अपनों के लिये 
कुछ सपने बुनने 
कुछ कहती है 
ये मौन आवाज 
आप ने सुनी 
या अनसुनी की 
फर्क नहीं पड़ता 
चल पड़ा अकेला 
यायावर सा खामोश 
पुकारता हुआ 
आने को 
साथ निभाने को 
स्वयं का 
मैं तुम और यह मौन 
आवाज काफी है
जगाने को 
जो जुल्म से 
डर कर चुप हैं 
पर कब तब रूकोगे 
आना पड़ेगा 
सुन कर दर्द भरी वेदना 
मन की आप को भी 
मुझे भी 
तब आयेगी क्रांति 
तब आएगा इंक़लाब 
इंकलाब जिंदाबाद
क्रांति जिंदाबाद 
संघर्ष जिंदाबाद।
                   ++++------
17. सीता......
दुःख की मैं साथी, कहने वाली
मर्यादा में बंधी, रहने वाली
हल नोक धरा से, निकलने वाली
राजसुता भेष रंक में ढलने वाली
दूरदर्शी, अनंत गुणी अनीता थी
वो सीता थी, वो सीता थी।

वन कंटक चुभे, उफ नहीं हुई
रघुकुल बहू, कुटिया में रही
समक्ष रावण, किंचित न ढही
जन्मी पवित्र, आजन्म पवित्र रही
सहे लांछन, धवल हर्षिता थी
वो सीता थी, वो सीता थी।

विजयी राम, घर लौटे सुधीर
बरसने लगे, नावक के तीर
आरोप लगे, सीता पर गंभीर
अग्नि परीक्षा, व्याकुल अधीर
समा गई धरा, सुचिता थी
वो सीता थी, वो सीता थी।

पति प्रसन्नता, सुख मानती
लव- कुश की मात जानकी
स्त्रित्व की परीक्षा आन की
धनी आन, बान, शान की
सत्गुणी बहती सरिता थी
वो सीता थी, वो सीता थी।
        **********
18. मुक्त छंद..........देश हित
हम  देश  हित में लड़ते हैं
मर के नाम अमर करते हैं
मांग  राखियां  उजड़ते  हैं
अपनों से अपने बिछड़ते हैं
बारूद  पर  पग  धरते  हैं
हम  देश  हित में लड़ते हैं............

भारत मां के वीर जवान
खड़े  सरहद सीना तान
मन  के  अधूरे  अरमान
लिखते लहू से देश गान
यादों के महल गढ़ते हैं
हम देश हित में लड़ते हैं............

पुलवामा में  संहार हुआ
RDX से हाहाकार हुआ
बेखबर  खबरदार  हुआ
गुमनाम चौकीदार  हुआ
हो  घायल गिर पड़ते हैं
हम देश हित में लड़ते हैं............

किस ने उरी के मारा तीर
गुलाम हुआ आधा कश्मीर
कठुआ  का  घाव गंभीर
सोपोर का  छलनी शरीर
नासूर के जख्म सड़ते हैं 
हम देश हित में लड़ते हैं............

पहलगांव में दोषी को
तोड़ दो अब खामोशी को
मारे पूछ धर्म जोशी को
बंद करो सरगोशी को
नापाक कदम उखड़ते हैं
हम देश हित में लड़ते हैं............
                 ***********
19. धर्म पताका.......
तुम झुको या हम झुक जाएँ, संगम बेला एक हो,
निर्णय चाहे अलग रहे, पर अंत सभी का नेक हो।

कहने वाले कहते रहें, कौन खेत की मूली हो,
चाहे तुच्छ कहें हमें, या गोधूलि की धूलि हो।

एक से एक मिलकर बन जाए, साथी संघ महान,
छोटी चींटी कर लेती है, हाथी तक का काम।

मुझसे टकराकर टूटोगे तुम, यह मेरा वादा है,
रंगों संग अब खेलने का, दिवाली इरादा है।

हारूँ या जीतूँ मैं लेकिन, डर निकलेगा हार का,
संगीनों में ढूँढूँगा मैं, चेहरा अपने यार का।

मुड़कर देख ज़रा तूने क्या, छोड़े हैं निशान यहाँ,
देव नहीं ये मिट्टी के ही, होते सब इंसान यहाँ।

लग तू अपने काम पे अब, हम भी लगें अपने पर,
देखें कौन पहुँच सकेगा, अपने ही अंजाम पर।

बिना सिंहासन मर्द बने जो, बात वही औकात हो,
मरना हो तो मरना मेरा, खुद में ही सौगात हो।

तिनका हूँ पर गिर जाऊँ तो, आँख किसी की फोड़ दूँ,
मैं चट्टान, टकराए को, टुकड़ों में तोड़ दूँ।

कहे जिगर मैं तुरंग मन का, आदेश निभाऊँगा,
मिट्टी में मिल कर भी, धर्म पताका लहराऊँगा।
                  **********
20. देशभक्ति......
वो पहलगांव गया जो चुनाव हार गया।
जितवाया जिसको यहां चला वही बिहार गया। 

सऊदी से लौटा मगर नहीं की कोई बात।
बैठक में बुलाया गया तो मारी उसने लात।।

पुलवामा के शहीदों का अब तक नाम नहीं।
कातिल खुला फिरता रहा, कोई इल्ज़ाम नहीं।।

उरी में जो जला वतन, वो कैसा था हाहाकार।
रोक न पाया चौकीदार, देखो यह सरकार।।

मित्र के बंदरगाह पर गूंजी थी तालियां।
देशभक्ति के नाम मनाते हैं हम दिवालियां।।

संतों फकीरों की धरा, भारत माता पुकार।
नॉन बायलॉजिकल हुआ, देवों का अवतार।।

जिगर रोटी की खोज में निकला भूखा आज।
गुनहगार हैं सिंहासन पर, मौन खड़ा समाज।।
                  ********
21.मुक्त छंद घर जाएंगे...
घर जायेंगे।

ना थका हूं
ना झुका हूं 
कुछ सोच कर
थोड़ा रुका हूं।

कायम बात पर
काबू जज्बात पर
दिल से काम लेता हूं
मुखालिफ बिसात पर

आज मैं कल कोई ओर आयेगा 
सुनसान राहों पर शौर आयेगा।
छुपे गद्दार मेरी आस्तीन में
के हल्कान का दौर आयेगा।

शाहों की मिट्टी पे झाड़ उगे
वक्त है यह रोके ना रुके
जो कहीं नहीं झुके
लाठी खुदा की कब रुके।

वक्त है संभल जाओ 
यकजहती के गीत गाओ
सुर से अपने सुर मिलाओ
किसी मसीहा को बुलाओ।

हालात सुधरते सुधर जायेंगे 
नया जमाना नया सर लायेंगे 
कुछ दिन की यह सराये फ़ानी
मरेंगे और अपने घर जायेंगे।
       ***********
22. जलियांवाला बाग......
अंग्रेजों भारत छोड़ो हर तरफ यह राग था
खेली गई खून से होली वो जलियांवाला बाग था।

अंग्रेजी मिशन के भारत आने का विरोध पुरजोर था
आजादी जन्म सिद्ध अधिकार यह नारा चहुंओर था।

डायर के हुक्म से यहां दनादन चली थीं गोलियां
मरने वालों कह रहे थे इंकलाब की बोलियां।

इंसानों से ज्यादा वहां बंदूकों का साया था
आसमान भी रोया तब काला बादल छाया था।

मंजूर नहीं थी गुलामी चाहे प्राण ही निकल गए
कुर्बान होने को बलिदानी घरों से बाहर निकल गए।

आज भी वो लाशों का कुआं याद शहीदों की दिलाता है
देख खून से लथपथ काया रोम रोम उठ जाता है।

वो भारत के लाल सपूत जाति थी न्यारी न्यारी
देख एकता कांपे गौरे हुकुम उनका था भारी।

जात धर्म से ऊपर प्यारी देश की आजादी थी
वो मां के राज बेटे थे बेटी रानी शहजादी थी।

आज फिर जरूरत ऐसे ही इंकलाब की आन पड़ी
आजादी की रक्षा हेतु चाहे गवानी जान पड़ी।

जिगर भारत का बेटा खुद जान हथेली पर लेलेगा
देख मातृभूमि की खातिर अब कौन जान से खेलेगा।
              **********
23. बिदाई......
श्लाघा  मनुज  की  हो रहे भावासार
ससम्मान विदा करे हृदय भरा उद्गार।

पुष्प  गुच्छ  श्रद्धा मय  बिखरे  सर्वत्र
कर्मयोगी को समर्पित अभिनंदन पत्र।

30.12.81 प्रथम नियुक्ति शोभासर 
15 वर्ष तक आप रहे गांव सहजूसर।

जन्म बास गेट हाल पुनिया कलोनी चूरू
धन्य,  मैं अहो भाग्य मिला आप सा गुरु।

वात्सल्य माता सा शिष्यों पर लुटाते रहे
कक्षा छ से आठ सामाजिक पढ़ाते रहे।

पुस्तकालय और वृक्षारोपण में अग्रगामी
कुशल समाजसेवी प्रसिद्धि से निष्कामी।

बेदाग, बे लाग, मृदु भाषी  समयानुरूप
वृहदस्तर पर यश गान हुआ फलस्वरूप।

मनोहारी छवि शील व्यक्ति कर्मयोगी दक्ष
हार न  मान सदा रहे  सर्वसुलभ निष्पक्ष।

गुरुवर प्रातः स्मरण अभिनन्दन करते हैं 
स्वस्थ  शांत  जीवन  हेतु  वंदन करते हैं।

राज काज में लिखा इतने दिन का योग
समाज  काज में रत रहें सदा रहें निरोग।

कहे  कवि  जिगर  गुरु  के  बखान  में
सफलता  का वास सदगुरु के ध्यान में।

स्नेह हम पर बना रहे यथा आज अविरल
हेत  दर्शाएं  मृदु  वचन वाणी से निश्छल।
अगस्त 2014
श्री देवकरण फगेड़िया, गुरु जी के राउमावि घांघु से सेवानिवृति समारोह में विदाई शब्द।
               ***********
24. पुरस्कार...........
पुरस्कार से इतराना नहीं
तिरस्कार से घबराना नहीं
मन के सत को दबाना नहीं
रुकने का ढूंढ बहाना नहीं
थके हो पथिक, रुक जाना नहीं।

तुम जो भी करते हो
बोलो किस से डरते हो
रोज तिल -तिल कर मरते हो
पीने को घूंट खाने को दाना नहीं
थके हो पथिक, रुक जाना नहीं।

कपास का लिबास कब बना
कांटों में उगा रेत में सना
कटा, पिटा तना तब बना
होश छोड़ दे वो दीवाना नहीं
थके हो पथिक, रुक जाना नहीं।

जो लड़ेगा वो हारेगा 
फिर भूल को संवारेगा
आंखों से चश्मे उतारेगा
चुने फूल बिखराना नहीं
थके हो पथिक, रुक जाना नहीं।

मुर्झाए हो खिलोगे तुम
सुख से कभी मिलोगे तुम
मंतव्य से नहीं हिलोगे तुम
लक्ष्य से डगमगाना मत
थके हो पथिक, रुक जाना नहीं।
              *************
25. हराम कर....
कभी ना उठीं ये नज़रें
हरदम झुकीं ये नज़रें।
जुबां जब जब गर्जी
लड़ीं खिलाफ अनावर्जी 
जिंदादिल दहाड़ता है
तारीकियाँ पछाड़ता है।
परछाइयां राहों पे जमी
बता मुझ में क्या कमी।
अक्सर यह सुना है
तुझसे निस्बत गुनाह है।
मुर्दों को जगाने आया
मैं तुझे बुलाने आया।
चिल्ला मत माजरा देख
हालाते हाजरा देख।
देख क्या क्या बीती है
तेरी मेरी आपबीती है।
जिगर दम लगा सकोगे
खुद को बचा सकोगे।
खबरे बद फैलाई जाती
आग यूं लगाई जाती।
हाल मुस्तकबिल पे टिका है
आंसुओं के मोल बिका है
दर्द में राहत अता करने
ग़म है कहां पता करने
मैं रोज गुनगुनाता हूं
तुझे सारी बात बताता हूं।
अब उठ काम कर
आराम खुद पर हराम कर।
                   **********
26. अहम का त्याग........
दुर्गम पथ पर चल पड़ा
कहे नीच कोई कहे बड़ा।

दृढ़ निश्चय अटल विश्वाश
तपा कुंदन मणिक जड़ा।

बन कर बेरागी जीना आया
दिया वसुंधरा ने कोष गढ़ा।

दारुण्य कपट अशेष श्लाघा
मीत पथ सुदामा आगे बढ़ा।

भ्रंश न्यूनतम शून्य विभोर 
कलरव मधुरिम शांत खड़ा।

दम्भ मति नाशक विनाशक
सन्निकट जो इस पर अड़ा।
                *************
27. व्यथा.......
व्यथा से निःरस निहारती आँखें
रौबदार ताकतवर से दबती जबान
कौन इसका कारण कौन करे निदान
उत्तर इसका देगा कौन
कैसे हो भारत महान।

हाथ को काम नहीं
स्त्री का सम्मान नहीं
पूरे सब नहीं अरमान
कैसे हो भारत महान।

कहने को शक्तिशाली हैं
पर हाथ सबके खाली हैं
रोता सड़क पर किसान
कैसे हो भारत महान।

काम की पहली शर्त रिश्वत
रिश्वत नागरिक की किश्मत
आबरू बिके ज्यों सामान
कैसे हो भारत महान।

कोई इसका हल हो
हम से ही पहल हो
ईश्वर दे ऐसा वरदान
कैसे हो भारत महान।

दीप जले एक लो उठे
हम चले सब लोग उठे
जागे हिन्दू और मुसलमान
प्यारा अपना भारत महान।
               ***********
29. गलियारों में.......
सत्ता के गलियारों में
सेठों की सरकारों में
धर्म के ठेकेदारों में
आदमी पिसता है
स्वाभिमान बिकता है।

जाती के प्रताप से
नेताजी के दाब से
या नोटों की आब से
सब हो गया दिखता है
स्वाभिमान बिकता है।

निर्भया अमानुष दृष्टि
चिंतित सम्पूर्ण सृष्टि
कोमला पर अम्ल वृष्टि
सम्भ्रांत ठिठकता है
स्वाभिमान बिकता है।

तिलक,टोपी पहचान
डाकू,चोर,लुटेरे महान
अपराध रक्षक विधान
सदाशय कहाँ टिकता है
स्वाभिमान बिकता है।

खेतिहर नीचे गगन के
बाबाजी अंदर सदन के
सड़ते फफोले बदन के
आमजन ही सिकता है
स्वाभिमान बिकता है।
                *************
30. नेता.....
नेता एकम नेता
नहीं किसी को देता

नेता दूनी दगाबाज
गिरा हुआ जालसाज

नेता तिये तिकड़मी
भरता नही इसका टमी

नेता चौके छलिया
पिये खून बताये दलिया

नेता पंचे पाखंडी
इनसे बढ़कर न कोई घमण्डी

नेता छके छलकपट
गिरगिट सा रंग बदल झटपट

नेता साते सत्यानासी
डाकू बन फिरे सन्यासी

नेता आठे उठापटक
जो भी मिले जायें गटक

नेता नम्मा नाम खराब
इसका साथ एक अजाब

नेता ढहाई दलबदल
बचना इनसे रहना संभल

जनता के लिये जोंक हैं
चाहे दौसा, चूरू टोंक है।
             *************
31. क्यों घर आई...
गुड़िया घर आंगन आई
परिवार में खुशियां छाई
पुलकित मुखड़ा देख देख
पिता खिलखिलाए मां हर्षाई
आई मेरे घर परी आई।।

लता सी वो लहराई
पेंजानिया छमछमाई 
नन्हें पांव धरे धरा पर
माता देख कर मुस्काई
आई मेरे घर परी आई।।

बड़ी हुई बोली बोल
झरने जेसे बोल अमोल 
झाड़ू पकड़े ना उठा पाई
रोने जैसी सूरत बनाई
आई मेरे घर परी आई।।

बड़ी हुई हो उठाया बस्ता
पगडंडियां वो स्कूल का रस्ता
हंसती गई थक कर आई
मां के काम की करे बंटाई 
आई मेरे घर परी आई।।

सदा परीक्षा में ऊंचे अंक
बेटी रानी राजा रंक
मांग जिद से न मनवाई
लिख पढ़ ऊंची छलांग लगाई
आई मेरे घर परी आई।।

स्वयं के दम आगे बढ़ी
डिग्री तक वो खूब पढ़ी
चुनी उसने चिकित्साई
परिजन सुन फूले न समाई
आई मेरे घर परी आई।।

बेटी डॉक्टर या खिलाड़ी
किसने उसकी आन उजाड़ी 
सिसक सिसक कर रात बिताई
फूट पड़ी मेरी रुलाई
क्यों, आई मेरे घर परी आई।।
                **********
32. घुल गए......
बरसात में रस घुल जाये
कालिमा रात की धुल जाये
कपट के किवाड़ खुल जाये
मन से मन मिल जुल जाये
ना उम्मीदी की हर गर्द हटे 
संगीत कोई बुलबुल गाये।।

सम्मान से सबका मान हो
भाई भाई के लिए कुर्बान हो
हौसलों को बेपर उड़ान हो
पूरे सब के सब अरमान हो
रिश्तों के बीच हर गर्द हटे
मानवता का गुणगान हो।।

बहुत हुआ अब ओर ना हो
बर्बरता का अति शोर ना हो
स्नेह - प्रेम का छोर ना हो
जुल्म जबर का जोर ना हो
चेहरों का रंग जर्द हटे 
अंधेरा अब घनघोर ना हो।।

अगड़ा हो ना कोई पिछड़ा हो
छोटा हो ना कोई बड़ा हो
अपने से ना कोई बिछड़ा हो
पीठ पे भाई की भाई खड़ा हो
सत्य का पुकारी कोई मर्द हो
गल हार प्रेम रत्न जड़ा हो।।
                ***********
33. शुरू करें.....
लड़ना शुरू करें 
बीच मे रह गई
जो अधूरी इबारत 
पूरी करें हम

आप नहीं माने 
हमने बात पूरी 
शिद्दत से रखी
आप भी हैं हम भी हैं
आजमाकर देखेंगे
हस्ती खुद की
बात आन पड़ी
वजूद की

कब तक नहीं मानोगे
इंक़लाब के सैलाब में
बह ना जाये खुमार
अभी दरखास्त है
सुन लीजिए
हम जो उतरेंगे
मरने पर

हम मरें या बचें
पर इंक़लाब
बरपा रहेगा
आखिरी दम तक
इंक़लाब जिंदाबाद
              ************
34. होली ........
फाग रस है, रंग नाचे 
गाये धमाल चंग नाचे 
होली है भई होली है 
रसिया महरी संग नाचे 
नाचे सारा देश झूमकर 
रोम-रोम अंग-अंग नाचे 
भारत भूमि हो वंदनीय 
बजे नगारे मृदंग नाचे 
समृद्धि की बहती बयार 
राजा संग मलंग नाचे 
हम नाचें तुम भी नाचो 
सब के सब संग नाचें 
शुभ मुबारक रंगोत्सव 
जैसे जल तरंग नाचे

जिगर चूरूवी 
होली की शुभकामनाएं
               **********
35. गांधी..........
गांधी कठिन,दुर्गम मार्गगामी
गांधी विवेकशील अग्रगामी

गांधी अहिंसा शस्त्र संचालक
गांधी निर्मल सुधीर क्षमा पालक

गांधी का मार्ग सुगम सौम्य सरल
गांधी का मार्ग रसधार अविरल

गांधी अहम को भस्म करने का नाम है
गांधी होना बहुत मुश्किल काम है।

गांधी का सपना हर हाथ को काम
गांधी करते बुनियादी शिक्षा को आम

गांधी के रास्ते कब मिलता आराम है
गांधी होना बहुत मुश्किल काम है।
                  *********
36. करीब...........
मंज़िल करीब है 
चलना ज्यादा है
थक ना जाना
रुक ना जाना
कितनों का हौसला हो
कइयों की उम्मीद
ए रहबर कॉम के
तू रुकना मत
तू थकना मत
कांटे होंगे रास्तों में
तपन होगी खूब
जलन सीने में होगी
अगन मन में होगी
पर हारना नहीं
पैर पसारना नहीं
टूटने लगे हिम्मत
पुकारना अपनों को
खुली आँखे रखना
देखना सपनों को
जीनत है तू यारों की
किस्मत दिलदारों की
सदा सुन हरकारों की
शान तू सरदारों की
बीर मेरे दबना नहीं
अब तू रुकना नहीं।
               ************
37. राणा सांगा.........
अस्सी घावों से नही डरे जो
संग्राम सिंह था नाम उनका
लड़े मातृ भूमि की रक्षार्थ
लड़ना ही था काम उनका

मानस मरने से जो डर गया
योद्धा तत्सामय वो मर गया
गई दुश्मन की गर्दन सर से
या खुद का रण में सर गया

वीर गाथाएं बिसराते लोग
उन समाधि पे कम जाते लोग
भूल गए मूल धर्म मर्म को
बस पाखंड फैलाते लोग

राणा सांगा महाराणा प्रताप
आज कर रहे होंगे संताप
धर्म और जाति में बांधे उन्हें
उद्धार नहीं हो लगेगा पाप
                ************
38. बैठक.......
बैठने में हर समस्या का हल है
बैठ कर एकता हो तो सफल है।

बात से ही बात पा लेते हैं हम
आपदा से निजात पा लेते हम।

मैं बड़ा से कोई बड़ा हुआ नहीं
एक पहिए से चला जुआ नहीं।

कृपाण है तीर है सामने निशाना 
आंख हाथ साथ तो क्या बहाना।

समय दें फूल को फल बन सके
उगे जो बीज पेड़ बना तन सके।

सुनहरी सब चीज न होती सोना
बीती को बिसार के छोड़ दे रोना।

मरना एक दिन तो क्यों बुरा बने
मात जने जो वो मनुज पूरा बने।

सब बातों का एक ही निष्कर्ष है
एकता में जीत और उत्कर्ष है।
*********************************
39. श्री राम .........
लू में समीर शीत है राम
भारत मां की प्रीत है राम
राम नाम सदा सुखदाई
दुखियारों की जीत है राम
कल आज अतीत है राम
मर्यादाओं की रीत है राम

इसके उसके सबके राम
पताल धरती नभ के राम
राम नाम से मझधार कटे
बसे हृदय में सबके राम
नाम बड़ा पुनीत है राम
मर्यादाओं की रीत है राम

सीता जी बिन अधूरे राम
लक्ष्मण भाई से पूरे राम
जड़ चिंतन कण कण बसे 
प्रतिक्षित सबरी सबूरे राम
सुंदर वन का गीत है राम
मर्यादाओं की रीत है राम

तुलसी की चौपाई में राम
बजरंगी की परछाई में राम
पाप विनाशी नाम राम का
बाकी झूठ सच्चाई है राम
सत्य की की जीत है राम
मर्यादाओं की रीत है राम

पितृ आज्ञा के पालक राम
दिव्य अद्भुत बालक राम
राम जी जीवन का अंग हैं
सत्य सनातन मालक राम
मित्रता राम अमीत है राम
मर्यादाओं की रीत है राम

भय अधर्म के नाशक राम
सत्य अहिंसा उपासक राम
भुला कोऊ सुमिरन राम की
अवधपुरी के शासक राम
राम ही स्वर संगीत है राम
मर्यादाओं की रीत है राम

आज राम और कल है राम
वायु,धरा,ऊष्मा जल है राम
राम नाम को बेचना छल है
अविरल निश्छल है राम
घृणा नहीं प्रीत है राम
मर्यादाओं की रीत है राम
*******************************
40. सपने......
इन आँखों के सपने 
देखना इन आंखों से
मैं नहीं हम मिलकर
देखते हैं कब पूरे करें
इन आँखों के सपने
इनको की ज़रूरत
थोड़ी सी हंसी प्यार
बस एक मुस्कुराहट
मिलकर देंगे इनको
इन आँखों के सपने
परी की दास्तां यही
सब गलत यह सही
इन आँखों के सपने
बिना कुछ कहे कहीं
खुली आँखों से देखें
हम तुम हम सब 
इन आँखों के सपने
*********************************
41. समर्थन.....
*********************************
42. शक्ति...........
अपनी शक्ति पहचान
बिना डरे आगे बढ़े
जीवन झूठ मृत्यु सत 
सब सत्य द्वार पे खड़े
हार है तो सीख सही
जीत इम्तहान ले कड़े
पागलपन आवश्यक 
सूझ नहीं जिस पे चढ़े
क्या छोटा क्या बड़ा
करो तो कुछ काम बड़े
आब वही ताब वही 
हीरा ताज या हार जड़े
जिंदा वही रहे रहेंगे
लड़ मरे या मर के लड़े
********************************
43. दास....
मन मंदिर के द्वार खड़ा विश्वास का दास
पद बढ़ा तो कद घटा हुआ मति विनाश

कर्मफल उपदेश गीता गुंजा चार दिशा
कृष्ण कहे अर्जुन से हे तात करो विश्वाश

मर्यादा के श्री राम ने त्यागा राज घर बार
साथिन सीता अनुगामी कौ करे परिहास

समय खेले खेल निराले खेले बखत सारा
खूंटी निगले गलहार का हरिश्चंद्र उच्छवास

पान सड़े ना घोड़ा अड़े अनहोनी ना होय
होनी को न बांध सके कितने करे प्रयास

अबल को सबल किया कुकुर रंगा सियार
मसीतां दौड़े काजीजी जो हो भयंकर त्रास

हीन भाव से आत्म बल हुआ मरे समान
सूतली रोके हाथी को नहीं शक्ति आभास
*********************************
44. जीवन मित्र......
जीवन क्या एक सरल सा चल चित्र है
शत्रु यहां कोई और नहीं अभिन्न मित्र है

घोर अंधेरा मां की कोख एक जीवन था
संबंधों की पवित्रता आज हुई अपवित्र है

बढ़ी उम्र संग बढ़ा जीवन वैभव विलास
रहना सहना तेरा मेरा वर्णन सचित्र है

गरल पान कभी कभी अमृत की धार से
सुख दुःख रूपी भाव आत्मा के भीतर है

बिखरी जीवनी सब पर समेटे नहीं जाति
जीवन तू निर्मल ये कहानी बड़ी विचित्र है

मरे जो मारे नहीं अभिलाषाओं के प्राण
कागजी फूलों में सुरभि परोपकारी इत्र है 

मृत्यु सत्य सनातन जीवन एक धोखा 
लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति जीना उसका पवित्र है
******************************
45. कल जो........
कल जो जीते थे शान से मचलते थे गुमान में
उन राख की अस्थियां बिखरी हैं श्मशान में

शक्ति प्रवाह का घमंड छेद करे आसमान में
सूखे बांस सा बदन हुआ शब्द नहीं जबान में

इंगित तर्जनी के पल में धुआं उठाते जहान में
वो तीर कहां जो चलते थे लौट आये कमान में

बल रूप मोह मद छल पाया संसार अमान में
परोपकार से भटका मन मान रहा अरमान में

राज मोहर जूते की नोक शब्द सी फरमान में
वंशज उनके फिरते मारे इसी लोक जहान में 

कुल की लाज बचा कर रखे रहे चाहे छान में
लो दीपक गाथा गाती जलकर उनकी शान में

नरोत्तम पुरुष सुन जिगर बात रखियो ध्यान में
गांव सराहे सो सरे खुद मुरख कहे हूं महान मैं।
*************************
46. चोट.......
चोट लगी जिस तन को वो ही जाने पीर
दर्द करे एक सा क्या राजा क्या फकीर

मन की चोट कौन देखे चाहे घाव गंभीर
जो पढ़े बात मन की वो ही सच्चा पीर

लीला कृष्ण - राम की एक कदे ना बीर 
एक हांके रथ रण में एक चलाये तीर 

लोक कल्याण हेतु सदा सत कहे कबीर
कौन मूर्ख वो जो मातम में उड़ाये अबीर 

अनेक रंग संसार के एक ही भयो शरीर
अडिग रहे जो वचन का वही सच्चा वीर

बर्बर सम्मुख धीरज धरे हो न अधीर
साम दाम दण्ड भेद सम्मुख सदा गंभीर

जड़ता जड़ से मिटे दे छाती को चीर
आखर सूर्य किरण सा आ बसे कुटीर
*******************************
47. दिया......
भगवान के रूप काली और भवानी भी
उसी का दिया बुढ़ापा और जवानी भी

सुदर्शन सा संहार करे मुरली की तान से
स्वः इच्छा के अनुरूप मांग रे भगवान से

नृसिंह वामन वाराह रूप धरे नाना प्रकार
खोजे हम मुरख निराकार प्रभु में साकार

राम नाम सदा सुखदाई जो ले प्रातः काल
राम नाम की लूट हुई तो आगे कौन हवाल

सीमित करे असीमित को धरे मंदिर माय
मेरा मेरा कहे फिरे जो सब में समाता जाय 

प्रभु को नर नारी का पदार्थ रूप नहीं देना
कण के रचियता की रचना पर ध्यान देना

अंतिम रूप कल्कि का जब रूप धरेगा वो
सब पाखंड मिट जायेंगे शाश्वत रहेगा वो

सबके दाता को दूं मैं देख ज़रा तू दर्पण
तन मन आत्मा तेरी तेरा तुझ को अर्पण

ईश्वर की रचना है जो प्रेम करो उन सब से
जिसे ढूंढ रहा तु वो सब देख रहा कब से
********************************
48. तपा सोना.........
खूब छिता तपा होगा वो सोना 
जो लालनाओं का गल हार बना
झेल सहस्त्र आपदा नष्ट हो कर
प्रगति मय सुंदर यह संसार बना

मिट मिट कर बनना सृष्टि नियम
परिवर्तन शील नियम अधिनियम
कटा गांठ से गन्ना उगता बार बार
सहन दर्द कर जन्मे ईशा मरियम

सीधा पेड़ गगन चुम्बी ताड़ बना
रज कण जम धीरे से पहाड़ बना
ढला दिन सांझ सूर्योदय की ओर
घना हरा वन आज उजाड़ बना

अंधकार सत्य पदार्थ एक प्रकाश
लाखों तारों से दिखे ना आकाश
वेगवान नक्षत्र जलकर होते खाक
बना जो मिटेगा होता क्यों उदास

समुद्र जहां थे आज रेत के ढेर है
जहां रात्रि शाश्वत वहीं तो सवेर है
बदलता समय बदले रंग जमाना
सत्य प्रकाश नहीं सत्य अंधेर है
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49. पांव पखारें.......
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50. मीत आयेगा....
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51. पितामह.......
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52. द्रोपदी........
देवी द्रोपदी का चीर हरण हुआ
भीषण महाभारत का रण हुआ।
दुखी सीता बिलखती रोती है
लंका की हालत क्या होती है।
दुर्योधन का अट्टहास सुनोगो
बोलो तुम किस को चुनोगे।

दुस्सासन की हिम्मत फिर हुई
है भयानक भयभीत निरभई।
लाज लूटने वाला कौरव कौन है
भीष्म पितामह क्यों मौन है।
ऐसे राम राज के स्वपन बुनोगे
बोलो तुम किस को चुनोगे।

दिल्ली में सोया राज दरबार है
कठोर तम हृदयी की सरकार है।
जले देश राजा विमान सवार है
राजाजी धिक्कार है धिक्कार है।
मन की कही मन की कब सुनोगे
बोलो तुम किस को चुनोगे।

ट्रैक्टर नीचे कुचलता किसान कहे
लाज लुटेरे बेटी पहलवान कहे।
स्थापित धर्म दंड का सम्मान कहे
हिंदू ईसाई सिख मुसलमान कहे।
धर्म की भट्टी में कब तक भूनोगे
बोलो तुम किस को चुनोगे।

भारत राष्ट्र का सम्मान बचालो
इंद्र का वज्र गदा हनुमान उठालो।
हे कृष्ण अब सुदर्शन संभालो
गांडीव से अर्जुन के तीर चलालो।
सहस्त्ररण भीम बन वीर घूमोगे
बोलो तुम किस को चुनोगे।
*********************************
52. मैं और तुम....
घर का आंगन

मैं और तुम 
संग बैठकर
रसोई के चौके पर
साथ खाना खाएं।

या छाक लेकर
तुम आ जाओ
दोपहर की छुट्टी
संग मनाएं।

खेलें छुपन छुपाई
हाथ लगाई
बजरी के पहाड़ पर
जो मैने छानी है।

छुट्टी नहीं मिलती
ओवर टाइम भी है
नही आ सकता मैं
जल्दी घर।

दिन में केसा दिखता है
बच्चों से भरा आंगन
अपने घर का
जरा बताना।

में सोचता हूं
एक दिन
सूरज उगे तक सोता रहूं
अपनी छत पर।

एक अरमान मेरे मन में
परिवार के साथ
हंस बोलकर
एक दिन जरूर बिताऊं
********************************
53. कला....
सबकी सुनना भी एक कला है 
कोई कहे बुरा कोई कहे भला है
जलेगी बाती दिया कब जला है
वज्र से पहले लोह भट्टी में गला है
समय पूर्व सूरज उगा न ढला है
सबकी सुनना भी एक कला है।

क्रंदित मन की व्यथा सुनेगा कौन
उलझे सूत से रस्सी बुनेगा कौन
कटे पंख को प्रियतम चुनेगा कौन
खंडित चरखे से रूई धुनेगा कौन
श्रेय की यह भूख बड़ी बला है
सबकी सुनना भी एक कला है।

अपने ही अपनों से रूठ चुके हों
तरु के पात साखों से टूट चुके हो
रक्षित का घर रक्षक लूट चुके हों
घन आवेशित बादल फूट चुके हों
सन्नाटों से आबंध मौन टला है
सबकी सुनना भी एक कला है।

दरिद्र नारायण की सखी सहेली
नारक जीवन बन गया पहेली
अकड़े चुकंदर बन गुड की भेली 
तुम ही राजा भोज हम गंगू तेली
मलीनता के तन वस्त्र उजला है
सबकी सुनना भी एक कला है।

बाहर भीतर का एक सा व्यवहार
सबके सुख में अपना सुख अपार
टहनी में लाया बसंत नव संचार
हे, ईश्वर करो तुम सब का उद्धार
दुख समझे वो जो दुख में पला है
सबकी सुनना भी एक कला है।
*******************---------*******
54. राहुल......
राहुल गांधी और भाजपा

राहुल जी का हाहाकार
देखो भाजपा हुई लाचार
आंख तरेडे चौकीदार
पागल हो गया तड़ीपार
सजगता का सृजनहार 
राहुल जी का हाहाकार

पाप गागरिया भर लिनी
शर्म बेच अड़ाने धर दिनी
सफेद आंख न डरपे चीनी
विवेक से अब दूरी कीनी 
56 इंच को चढ़ा बुखार
राहुल जी का हाहाकार

सैनिक मारे कितने अपने
15 लाख के झूठे सपने
राम नाम पर लूटे सबने
लगे असत्य माला जपने
मिला देश को तारणहार
राहुल जी का हाहाकार

काले को सफेद बताया
परायो को भेद बताया
किसानी और खेत मिटाया
बिन बुलाए बिरयानी खाया
एक भारत प्यार अपार
राहुल जी का हाहाकार

पड़ोसी सब शत्रु किए है
नोटबंदी में मर मर जिए हैं
जीएसटी ने घाव गंभीर किए है
बताएं जरा कौन काम किए हैं
जवाब नहीं तो हुए लाचार
राहुल जी का हाहाकार

संसद को सब मौन किया
यह अधिकार तुम्हें कौन दिया
सीबीआई,ईडी को फोन किया
पैसा ले कर लोन दिया
फड़के नीरव के रिश्तेदार
राहुल जी का हाहाकार

रेल बेची तेल बेचा
एयरपोर्ट और सेल बेचा
भाईचारा और मेल बेचा
कोलइंडिया और गेल बेचा
कांग्रेस देश की पहरेदार
राहुल जी का हाहाकार
********************************
55. बैठक.....
बैठने में हर समस्या का हल है
बैठ कर एकता हो तो सफल है।

बात से ही बात पा लेते हैं हम
आपदा से निजात पा लेते हम।

मैं बड़ा से कोई बड़ा हुआ नहीं
एक पहिए से चला जुआ नहीं।

कृपाण है तीर है सामने निशाना 
आंख हाथ साथ तो क्या बहाना।

समय दें फूल को फल बन सके
उगे जो बीज पेड़ बना तन सके।

सुनहरी सब चीज न होती सोना
बीती को बिसार के छोड़ दे रोना।

मरना एक दिन तो क्यों बुरा बने
मात जने जो वो मनुज पूरा बने।

सब बातों का एक ही निष्कर्ष है
एकता में जीत और उत्कर्ष है।
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                   - पूर्ण - 



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