अफसाल ए जिगर
उर्दू/हिंदी गज़ल भाग - 05
कवि का परिचय -
नाम - शमशेर खान
उपनाम - प्रेम, शमशेर गांधी
तखल्लुस - पहले परवाना नाम से लिखना शुरू किया। पत्नी अख्तर बानो (सदफ) के सुझाव पर जिगर चूरूवी नाम से लिखना शुरू किया।
पैदाइश - 18.04.1978 सहजूसर, चूरू (राजस्थान)
पिता का नाम - श्री भालू खां (पूर्व विधायक (1980 से 1985), चूरू।
माता का नाम - सलामन बानो (गृहणी)
ताअलिम -
1. रामावि सहजूसर में पहली कक्षा में दाखिला 10.07.1984 से 1993 में मेट्रिक तक।
2. राउमावि बागला, चूरू से हेयर सेकंडरी 1993 से 1995 तक
3. राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय भाषाई अल्पसंख्यक अजमेर से BSTC, 1995 से 1997
4. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में स्नातक 1998 से 2001 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय, अजमेर)
5. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में अधिस्नातक 2004 से 2005 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय बीकानेर से गोल्ड मेडलिस्ट - 2005 उर्दू साहित्य)
6. कश्मीर विश्वविद्याल, श्रीनगर के नंद ऋषि शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय से B.Ed.- (2007 - 8)
7. इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय से विशेष आवश्यकता विद्यार्थियों के शिक्षण हेतु विशेष अध्ययन - 2012
8. वर्तमान में LLB में प्रवेश (13.08.2025 से)
विवाह - पत्नी अख्तर बानो (सदफ) से 20.10.1996 में विवाह हुआ।
संतान - तीन पुत्रियां
1. अंजलि खान (LLM)
2. रोजा खान (BSC Nursing) सेवारत
3. प्रेरणा खान (BSC Nursing) सेवारत
व्यवसाय -
1. निजी विद्यालय शिक्षक एवं विद्यालय संचालन - 1997 से 1999
2. राजकीय सेवा तृतीय श्रेणी अध्यापक 10.07.1999 से 14.12.2014 तक
3. द्वितीय श्रेणी शिक्षक 14.12.2014 से 01.09.2023 तक
4. स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति 01.09.2023 से
पद -
1. तहसील अध्यक्ष - शिक्षक संघ शेखावत, चूरू
2. जिला मंत्री शिक्षक संघ शेखावत चूरू
3. प्रदेशध्यक्ष, सर्व शिक्षा अभियान कर्मचारी संघ, राजस्थान
4. प्रदेशाध्यक्ष, युवा मुस्लिम महासभा, राजस्थान
5. प्रदेश संयोजक, राजस्थान तृतीय भाषा बचाओ आंदोलन
6. प्रदेश संयोजक, संविदा मुक्ति आंदोलन राजस्थान
7. प्रदेश सचिव अखिल भारतीय कांग्रेस सेवादल 2024 से
8. जिलाध्यक्ष शिक्षक प्रकोष्ठ कांग्रेस, चूरू 2025 से
9. संयोजक चूरू विधानसभा समस्या एवं समाधान समिति, चूरू
आंदोलन -
1. संविदा मुक्ति आंदोलन
2. दांडी यात्रा
3. सामाजिक सरोकार
पुस्तकें -
1. मिरातुल जिगर
2. हृदयांश (हिंदी कविता संग्रह)
3. कालजे री कोर (राजस्थानी कविता संग्रह)
4. कसासुल जिगर - गजल समूह
5. मिनाज ए जिगर - नज़्म संग्रह
6. मूलांश
7. इमरान ए जिगर
8. प्रस्तुत पुस्तक के बारे में -
लेखक ने उर्दू, हिंदी, मारवाड़ी भाषा की लगभग सभी विधाओं में कलम आजमाई है। प्रस्तुत दीवान शमशेर भालू खां का प्रथम प्रयास है। लेखक का मत है कि वर्तमान समय में काव्य में शुद्ध भाषा एवं शख्त बहर, गेयता और माप का चलन संभव नहीं है। इस दौर में भाषाओं के कुछ शब्द इस तरह से घुलमिल गए हैं कि उन्हें एक भाषा में बांधना शब्द के साथ अन्याय होगा। हिंदी - उर्दू दोनों भाषाओं में सम्मिलित ग़ज़ल, गीत, कविता एवं छंदों का उपयोग आम बात हो गई है।
अतः हमें बंधनों को तोड़ते हुए सम्मिलित विधाओं में सभी भाषाओं का मेल करते हुए साहित्य सृजन करना चाहिए।
अंत में लेखक के कथन अनुसार उन्होंने इस किताब को किसी भी बंधन से मुक्त रखते हुए भावों को जनता तक पहुंचाने का एक छोटा सा प्रयास किया है।
शायर की जुबान.....
तूफ़ाँ बनकर उड़ेंगे हम ज़ुल्म के साये से
वही अज़ियत वही दर्द इंसान पराए से।
फेहरिस्त -
01. आंख बंद.......
02. कसर......
03. क्या करूं......
04. जमाना......
05. हया.......
06. बस्ती.....
07. बना रहा......
08. दिन......
09. डरे.....
10. कुछ नहीं......
11. सीखो.......
12. लोग.......
13. परवाह......
14. नाम..........
15. खाली..........
16. हस्ती..........
17. हर जिंदगी.......
18. आसान........
19. रोज.....
20. साया.....
21. तुम जानो.....
22. बहाने.....
23. अफ़साल.......
24. ए दिल.......
25. दाग.......
26. जमीर.....
27. बाकी है...
28. बचा के रखना....
29. शुरुआत हुई....
30. लोग......
31. अहद.......
32. लड़ते.....
33. जिंदगी.....
34. हुआ है क्या...
35. बात कह दूं....
36. तमन्ना.....
37. हम....
38. लड़ती रही....
39. लगती हो.....
40. फकीर......
41. आसान.......
42. इख़्वत..........
43. नाम........
44. आ बैठा.....
45. परेशान.......
46. सवाल क्या है......
47. जानता है......
48. कीमत....
49. चीज है.......
50. बढ़ जाता है.....
51. बदल..
52.तुम जानो..
53. करीब था...
54. आहिस्ता.....
55. कर के देख....
56. नहीं...
57. करते हैं...
58. बेचारा.....
59. अच्छा है....
60. कर लिया...
61. निकलेगा....
62. गुलाब थी...
63. मौजूफ....
64. दोबारा...
65. घर ....
01. आंख बंद.......
हम कबूतरों ने आंख बंद करसमझा बिल्ली को भागा दिया।
मुझ जाहिद की ना अहली ने
पीढ़ियों पर वो दाग लगा दिया।
अपना कहोगे किसे ओर नहीं
मुजरिम ने मुलजिम बना दिया।
बारीक सा फर्क वो ना समझे
जमीर को सियासत बना दिया।
अपन की डुग डुगी राग अपना
मैने खुद को खुद से दगा दिया।
जर्ब एक ओर बस्ती पर मेरी
लुटेरे को मुहाफिज बना दिया।
जिगर सुन के मार या जा मर
निडर को डरना सीखा दिया।
02. कसर....
खरे सोने को कसर लग गई
किसे किसकी नज़र लग गई।
ना रहे यकजा हम भाई अब
है कदूरत की ख़बर लग गई।
ढक रखे थे अंगार ए आफ़ात
उड़ा धुंआ नारे नगर लग गई।
सबों रोज कयामत गुजरती है
आंख खूं से तर बतर लग गई।
जिगर को तड़प से सुकूं मिले
बेखतर मर्ज ए खतर लग गई।
03. क्या करूं......
जिगर है कुसादा तेरे घर का क्या करूं
खैर से लबरेज हुं तो शर का क्या करूं।
खतर से लड़ता है रोज हायल मिजाज
सीने में बस रहे इस डर का क्या करूं।
मुश्किलें उलझनें बांध कर रखतीं मुझे
जमीं पर ही सही तेरे पर का क्या करूं।
हामी ओ नासिर खुदा तेरा भी मेरा भी
नाहक हराम माल ओ जर का क्या करूं।
मिजान नहीं निजाम बदला पैमाने भी
तलाफी कमा शरे अकबर का क्या करू।
हिलाल के टुकडे मंजरे आम जो हुए
तोशा खाना में छुपे अख्तर का क्या करूं।
मुझ नजरे शमशीर को समझोगे तुम
खुदा दे तुम्हें नजरे बशर का क्या करूं।
04. मजदूर.......
मज़दूर के साथ बैठो तो दर्द कहे
भीगा पसीने में धूप को सर्द कहे।
तब्दीले हालात के वादे कई हुये
वो मेरा हुआ कब मसना गर्द कहे।
उसके नाम से चलाते हैं करोबार
हाय रे मज़बूर किसे हमदर्द कहे।
खून जला सूखे पसीने की जगह
पूरी मज़दूरी पहले मिले फर्द कहे।
सो जाता है टाट पर फुटपाथ पर
कुचल दो इसे ज़माना बेदर्द कहे।
ज़िंदाबाद इंक़लाब जिंदाबाद कहे
कहें काँपते हाथ ये होंठ ज़र्द कहे।
हके मज़दूर के लिये लड़ेगा जिगर
शूरमा कहे या दहशतगर्द कहे।
04. जमाना.......
तल्खी में भी खूब जराना हुआ
सदा ना एक सा जमाना हुआ।
पुकारे ना पास आया आने वाला
सीधे पा आया ले जाना हुआ।
बजारा हूँ रंग खरीद बेचना काम
कौन अपना कौन बेगाना हुआ।
शिकवा शिकायत फितरत नहीं
तेरा आना दर्द का जाना हुआ।
अपने हैं सब गैर की महफिल में
है चेहरा एक-एक पहचाना हुआ।
सही गजलूम का मुखालिफ होना
जालिम का हद से सताना हुआ।
जायेद ना तारिकियां ना रोशनी
खातिर नश्लों के मिट जाना हुआ
दरगुज़र गुस्ताखियों रवादारी से
जिगर मुश्किलों से याराना हुआ।
05. हया ......
यूं आहिस्ता से हया का तब्सिरा देते हैं।
चुप-चुपके से देख नज़र गिरा देते हैं।
न इमाम न मुकतदी न साइल न जर्फ
लोग यहां क्या क्या मशविरा देते हैं।
कनखियों से देख किरदार के रसूख वो
यहीं हैं जो मुश्किल में घिरा देते हैं।
साख जड़ से कट के जो बेदम हुई बेबस
पत्तों को नाम सरफिरा देते हैं।
नीव से जुड़े रहना बेमानी कहने वालो
जान लो वजूद अस्फाले जखीरा देते हैं।
तकमीले सन्न नागवार जिगर जनता हूँ
ये अमल समरात शीरीन कसीरा देते हैं।
06. बस्ती........
इस बस्ती में परेशानी कुछ खास नहीं
सब खामोश हैं सुकून किसी पास नहीं।
तेरे चेहरे पर अजब सी उलझन देखता
मैं जानता हूँ सब पर तुझे अहसास नहीं।
तुलु आफताब से कब्ल घर छोड़ने वाले
बता ए मुसाफिर तू क्यों उदास नहीं।
मुड़ के देख पुकारता कोई अपना होगा
मुख़्तसर जिन्दगी पूरी तलाश नहीं।
भागता हूँ मुसीबत से दूर वास्ते सुकून
हूं इब्ने आदम मगर होता ए काश नहीं।
उधार के लिए चंद लम्हे यूँ न गुजार
खुश तबीअत जिगर बदमुआश नहीं।
बेवकूफ जो किसी को बेवकूफ बना रहा है
कोई बताए सही आखिर क्या माजरा है।
वादे इरादे जुदा खाया क्या क्या पचा रहा है
दाग दामन में, इल्जाम बू पर लगा रहा है।
गुजिस्ता दौर दज्जाल का फितना नागुजिर
बहकी बातें कर, पागल हमें समझा रहा है।
बदलना अईंन किस हाथ में नहीं जान लीजे
कोई जा रहा जहां से वहां कोई आ रहा है।
जब मुंतसिर हो बिखर गए मोती माला के
इत्तेदादे जिगर नई जान नई रुह ला रहा है।
08. दिन........
वो दिन ना रहे तो यह दिन ना रहेंगे
किस ने कहा हम तेरे बिन ना रहेंगे।
होगी कयामत तो हम इंसान न रहेंगे
चरिंदे परिंदे खल्क में जिन ना रहेंगे।
उम्र लंबी हो तो क्या बड़ी होनी जी
तजुर्बेकार हमसर कम सिन ना रहेंगे।
सफें खूब लगती रहीं ताजियत को
कोई नाम न रहेगा नामचिन ना रहेंगे।
जिगर हो मुराद खैर आफियत सबको
हसर में रिश्ते नहीं भाई बहिन ना रहेंगे।
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09. डरे........
अगर तुम डर रहे हो तो आना मत
अगर तुम आ रहे हो तो डरना मत
तुम जिंदगी जीने के लिए आए हो
पूरी जीने तक यार मेरे मरना मत
कोई बात नहीं जो कुछ नहीं किया
अंजाम ना हो तो शुरू करना मत
गहरा समंदर है और अंधेरा काफी
बेहिम्मत पार यहां उतरना मत
जिगर अहल ना अहल बात क्या
पार ना हो सरहद पांव धरना मत
10. कुछ नहीं.......
पाने को कुछ नहीं ले जाने को कुछ नहीं
काबिज रुसवाई गम उठाने को कुछ नहीं।
उड़ जाएं एक दिन तस्वीर के रंगों की तरह
बेरंग पानी है और मिलाने को कुछ नहीं।
हम वक्त की टहनी पर बैठे परिंदों की तरह
आए ना साथ ले के ले जाने को कुछ नहीं।
खटखटाते दरवाजा एक दूसरे के मन का
एक भरा पेट जायद खाने को कुछ नहीं।
मुलाकातें ना सही आहटें आती रहें उनकी
दर्द से फटे जमीं और समाने को कुछ नहीं।
11. सीखो....
समंदर की तरह हद में रहना सिखो
बात करने से पहले कहना सीखो।
बड़े हैं घर मजबूत दीवार खूबसूरत
जो प्यार से बनाया वहां रहना सिखो।
कयादत के अंदाज हैं ज़हर के दरिया
उतरे हो इसमें यार तो बहना सीखो
गुजारिश कासिद की कब्ल हवाले मकतूब
जो हो अंदाज ए यार को सहना सीखो।
जिगर कायनात की खुशी किसे नसीब
जो मिला शुक्र खुदा का कहना सीखो।
12. लोग.......
दो रोटियों में मोल में बिकते हैं लोग
कैसे हैं कैसे असल में दिखते हैं लोग।
ऐब लाख छुपाएं फिरते अपने हम
तहरीर अलग, अलग लिखते हैं लोग।
कब तक रुकेंगे दार ए फानी में लोग
बोझ पाप का सर पर छिपते हैं लोग।
सदाकत के लिहाफ ओढ़ कर शराफा
ले बसारत चले कहां टिकते हैं लोग।
जिगर लाओ चीर के सदा ए हक़ तुम
देने से धोखा नहीं झिझकते हैं लोग।
13. परवाह..........
खित्तों में बंटे होंगे कोई परवाह नहीं
अंदाज़ यही जिंदा रहे परवाह नहीं।
कोई जागा कोई सोया फिर जागेगा
तू आवाम पर फिदा रहे परवाह नहीं।
वाकिफ कौन अनजान जानकर हाल
राज ए अदम पोसीदा रहे परवाह नहीं।
चंद नहीं सब कुछ हरचंद की बजाय
गूँज हरचंद की निदा रहे परवाह नही।
तुरूप चल दिया आखिरी दांव उसने
चल तू चल आबदीदा रहे परवाह नहीं।
नदियाँ सींचती रहेंगी सब के सूखे खेत
जिगर तेरे ऐब नादिदा रहे परवाह नहीं।
14. नाम ......
इस मोहब्बत को क्या इलहाम दूँ
आ के मैं तुझे क़ातिल का नाम दूँ।
मरग ही में सही रूह को आराम दूँ
रूदाली का मेरी लहद पे काम दूँ।
मुअत्तबर को ऐतबार का इनाम दूँ
जान दूँ या दिल दूँ क्या इकराम दूँ।
तपिशे आफताब को इश्के जाम दूँ
आ तुझे मेरे महबूब का कलाम दूँ।
कफालत में तेरी दीवाना आज है
जामिन को मैं अपने क्या दाम दूँ।
जिगर दाना की जान बनकर रहा
गुलशन को पेशकश गुलफ़ाम दूँ।
15. खाली........
क्या अफसोस के हुआ जमाना खाली
यहां हुआ मेरा आना और जाना खाली।
नहीं खाली सिम्ते ज़मीं खुदा के नाम से
हवा, खुश्बू परिंद का चहचहाना खाली
गुरेज ना कर ए सफीर चल बदस्तूर
करना है एक दिन आशियाना खाली।
दरयाफ्त कर मजूनूं से फसाना इश्क़
क्या कहे देख उसका शर्माना खाली।
हुई बज्म तेल ओ बाती जले से रोशन
नादां समझे चाराग जलाना खाली।
दो पल का अहसास मुझ फकीर सुन
फानी हर शे तईं दिल लगाना खाली।
आया मैं और तू यां कोई तो बात है
जिगर बेवजह ना आना जाना खाली।
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16. हस्ती......
जो मर मिटे वतन पे वो हस्ति ला फानी है
जावेद है जिस कफन का रंग नहीं धानी है।
रोज उन मजारों पे चढ़ते अकीदत के फूल
गाह ए शहीद की फिजा भी क्या सुहानी है।
राय बहादुर मिट गए नहीं याद करने वाला
सर नाइट लाट साहब बिसरी हुई कहानी है।
मानसिं जयचंद कल आज कल रहे हैं रहेंगे
धन्य भगत बिस्मिल राजगुरु की नानी है।
मोहुब्बे वतन खाक में मिल कर नामवर रहे
जंग में चमके शमशीर क्या नई पुरानी है।
17. हर जिंदगी.........
हर जिंदगी को खुदा ने खूब इनाम दिया है
जमीन पर काम और अंदर आराम दिया है।
दवा जब महंगी हों तो तावीज की तरगीब
चुटकी भर राख को सिफा नाम दिया है।
कज़ा के वक्त याद ए खुदा डर नहीं तो क्या
बड़े सज्दे इबादत को लंबा कयाम दिया है।
जावेद तुम न हम और न ही पीरो मुर्शीद
चोर किसी को सिपाहगिरी काम दिया है।
जिगर ये आग आबे हयात से गुल ना होगी
हमने जाम ए कौसर अपने नाम किया है।
18. आसान......
सच का जीना मुश्किल आसान नहीं
झूठ की दुनिया आबाद विरान नहीं।
निकले बातचीत से मशले का हल
आदमी है आदमी आदमी हैवान नहीं।
तकाजा दिये का रोशनी से सही नहीं
शमा से फानुश जले परेशान नहीं।
फ़ाज़िल की रिवायत बस नामवर हुई
हदे दर्द गुजरा ख़ातिमे अरमान नहीं।
होश सँभाल कर रख बहक न जाना
हर ख़ुशी से महरूम यह जहान नहीं।
19. रोज......
रोज हजार तदफीने जलती चिताएं हजारों में
है कौन मसीहा जो सब रोक सके इशारों में।
जब पाए फेरे जाते हैं सब तेरे मेरे जाते हैं
छोड़ छाड़ कर सब प्यारा मिल गया प्यारों में।
मरे ख्वाहिश न मरी अरमाने जन्नत साथ चले
जन्नत मिले फिरदोश रहें दूध शहद के धारों में।
राहे फलाह जो दिखलाये संत बन फकीर वही
फर्क इंसानों ने किया नबियों और अवतारों में।
चांद के टुकड़े हुये तो सूरज निगलना मुमकिन
लिखे को माने नादान तकदीर देखता तारों में।
एक के नाम अनेक करे कलम की ताकत से
सौ झूठ को चिल्ला कर बदले सच के नारों में।
जिगर दिखाये अनदिख को वो ज़माना आया है
देखे को अनदेखा करने खड़े हैं लाख कतारों में।
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20. साया......
दरख़्त का साया उसका घर होगा
बढ़ती खामोशी का तो असर होगा
जड़ें सुख ना जाएं आशियाने की
गर्म अश्कों से उसे किया तर होगा
सांझ का वक्त जाने रात आने तक
हुस्न ये ना जाने अब किधर होगा
कयामत रोज आती इस शहर में
बंद पिंजरे में परिंदा कटे पर होगा
खबर सुनी जो उसके आने की घर
अहवाल से मेरे वो बा खबर होगा
वक्त ने सिखाए सबक ऐसे भी
अफसोस याद ये जिंदगी भर होगा
जिगर होश फाख्ता रंग ए जमाना
ना इंसान तो ना दौलतो जर होगा
21. तुम जानो....
जला दिया बाती या तेल तुम जानो
किसने किस से खेला खेल तुम जानो।
पानी को ना बांध हद तोड़ निकलेगा
मासुक को समझा रखैल तुम जानो।
बिकते हैं लोग जो कीमत सही लगे
किसकी किसने लगाई सैल तुम जानो।
नदी समंदर की चाह में दूर से आ मिले
पास रहे पर ना बढ़ाया मेल तुम जानो।
सात समंदर का पानी खुद पे उंडेल कर
जिगर मन का ना मिटा मैल तुम जानो।
22. बहाने.........
तुने कर लिए उतने जितने भी बहाने थे
हां यह सब तेरे मुझे भुलाने के बहाने थे।
खातिर में कभी तेरी रही क्या कमी मेरी
जो छांव दे सबको वो घर ही जलाने थे।
मदहोश रहा लेकिन तुझे न भुलाया था
तू भूल गया मुझको इतने ही याराने थे।
तू सोच रहा शायद हम लौटके न आयेंगे
तू चूक गया जालिम जितने भी निशाने थे।
कुछ दूर चले अख्तर संग रोशन चरागों से
हम बन के सूरज निकले रोशन जमाने थे।
नजर का ये धोखा हमें कब तक रोकेगा
हिज्जे से रवां हो गए तेरे ही फसाने थे।
जिगर कहो सब से कोई ना गम करना
ये दिन सुहाना है वो मौसम भी सुहाने थे।
23. अफसाल.....
हसरतें बाकी रही कुछ कर गुजरने की
मुझे आदत तो नहीं बात से मुकरने की।
थोड़ा हौसला चंद उसूल कुछ काम
हालात ने रखी है शर्त यूं सुधरने की।
सुलगते सवाल और सूखा सा लहजा
दुआ तूफानो बर्क से पार उतरने की।
यहां वहां कहां कहां रेत सा तपता रहा
कोशिश चट्टान को दांत से कुतरने की।
सामना मुश्किल का जिंदगी तक जिगर
तार तार खुल कर बिखरने उधड़ने की।
24. ए दिल.........
ए दिल चल उस जगह की तलाश में
जहां इंसान न दिखे जिंदा लाश में।
जहां हक बातिल की दुनिया से दूर हो
सुगुफ्त जबीं देखूं ना मायूसी काश मैं।
ना किसी सीने में आग ना कोई डर रहे
पूरी हर आरजू हो एक अहसास मैं।
आंचल ना पसारे नीचा ना कोई हाथ हो
बिखरे रंग गुलाल खुशियों की आस में।
जिगर जीतोगे कदम साबित रहना
बिखर ना जाना हवा बदहवास में।
25. दाग...
उठते धुएं से ना जंगल की आग से
घर मेरा जला है घर के चिराग से
वो चित्कारें वो कटते हुये बदन
लुटती लाज कहे दामन के दाग से
शैतान का डर नहीं खुला दुश्मन है
डर है डरे हैं संग रहे घर में नाग से
दर्दले दरिया बनी नंग धडंग सड़क
रूह चीरती भीड़ जुबां के झाग से
जिगर चीर दे खामोशियां सभी
उलझन में दिमाग पैरों की पाग से
26. जमीर.....
वो जिंदा ही नही जिनके ज़मीर नहीं होते
फकत माल ओ नाम से अमीर नही होते।
वादियों की ठण्डी हवा का अंदाज अलग
आवारा गर्म लू के थपेड़े समीर नहीं होते।
तपिस सह कर पके आहिस्ता आहिस्ता
सिर्फ दूध में डूबे चावल खीर नहीं होते।
पूरी हर आरजू खुदा का करम जिस पर
इंसान सब ऐसे अहले तकदीर नही होते।
दमे कज़ा दवा की दुआ की जरूरते तिब
तुक्का जो लग जाये उसे तीर नही कहते।
बहिस्त की चाह में इबादतो नमाज अदा
नाम के वलीउल्लाह पीर नहीं होते।
जिगर सफेद जुल्फो दाढ़ी लिबास तो क्या
बिना रूहानी शख्शियत फकीर नहीं होते।
27. बाकी है.....
मेरा इसरार बाकी है तेरा इकरार बाकी है
तेरी जीत की गर्दन में मेरा हार बाकी है।
कई जीत बाकी है और कुछ हार बाकी है
अना की जिद के आगे मेरा इनकार बाकी है।
सताया कितना तूने यह मेरा दिल ही जाने है
सजाए सीने में खंजर और तलवार बाकी है।
मुश्किलें दूर होती हैं अगर हौसला हो बाकी
कर फैसला खुद का खुद मुख्तार बाकी है।
खताओं के शहर सिर्फ रात नहीं होती
जिगर ज़मीर जिंदा है तो सब यार बाकी है।
28. बचा के रखना....
जरा सी हिम्मत बचाये रखना फिक्र करो ना मैं आ रहा हूं
तुम निभाओ फर्ज अपना मैं कर्ज अपना चुका रहा हूं।
कोई समय की सुबह सुहानी कोई समय की रात अच्छी
डरो ना तुम एक पल भी मैं आ रहा हूं मै आ रहा हूं।
बस गए वल वले जो दिल की दुनिया से निकाल फेंको
भटक जाओ ना तुम रास्ते से संग तुम्हारे मैं आ रहा हूं।
थोड़ी सी इबरत उन से ले लो टूटे जो फिर जुड़ गये हैं
उठो रुको ना बढ़ते जाओ तुम्हारी हिम्मत बढ़ा रहा हूं।
जिगर कहां से लाओगे सर तुम कभी झुके ना बुजदिली से
कहो के आओ साथ मेरे पहले मैं अपना सर कटा रहा हूं।
29. शुरुआत हुई........
बेहद पाबंदियां बगावत की शुरुआत हुई
लगावट से आगे अदावत की शुरुआत हुई ।
मकतूल क़ातिल वकील हैं तो इंसान ही
हल्फ़ में उम्मीद ए सखावत क्या बात हुई।
परवाना जुगनू दीवाना इनकी दुनिया अलग
जाँनिसारी नूर और इश्क यहीं शुरुआत हुई।
बहुत दूर से चल कर आए हो बैठो थक गए
क्या सच है बताओ किस से क्या बात हुई।
किसी की बराबरी करना कहना यह हुआ
बौछार, शबनम और बरसात एक बात हुई।
जमीन न छोड़ पर आने तक खातिर तो रख
मंजिल है दूर बस परवाज की शुरूआत हुई।
कच्ची डोर से बांधना मुमकिन जो जाने तुझे
समंदर साहिल से बंधे यह खूब करामात हुई।
30. लोग......
31. अहद......
दौरे अहद ना पूछ क्या क्या हमने ना सहा
खून के घूंट पिए और चांद को आइना कहा।
मुंतसिर अदवा से कुव्वत आराई मजीद
यह खून जिगर का बन कर पसीना बहा।
मुकीम हवा रवां सरगोसियां सुना गई सब
जिक्र महफिल में उसके आने का ना रहा।
आए और अपना कह के चल दिए मेहरबां
बंधे पेट के पत्थर ने खुद से कमी ना कहा।
हमने खुश्बू फूलों से उसूलों से आती देखी
न उजड़े वो बाग उसूलों का किला ना ढहा।
32. ..लड़ते.....
हम ही लड़ते हैं खुद के वजूद से
छाछ से जलकर डरते हैं दूध से।
वो मरा नहीं तलवार के वार से
जाल में फंस कर मर गया सूद से।
किरदार का कत्ल हो तो हो जाए
मंजूर नहीं मिलना गैर माबूद से।
मसला हल हो तो खुदा का करम
न हो तो हो गुजर अपना हुदूद से।
जिगर सरापा या हो महफिले ग़म
नाम का रहा वास्ता खुश्नूद से।
33. जिंदगी......
हर जिंदगी को खुदा ने खूब इनाम दिया है
जमीन पर काम और अंदर आराम दिया है।
दवा जब महंगी हों तो तावीज की तरगीब
चुटकी भर राख को सिफा नाम दिया है।
कज़ा के वक्त याद ए खुदा डर नहीं तो क्या
बड़े सज्दे इबादत को लंबा कयाम दिया है।
जावेद तुम न हम और न ही पीरो मुर्शीद
चोर किसी को सिपाहगिरी काम दिया है।
जिगर ये आग आबे हयात से गुल ना होगी
हमने जाम ए कौसर अपने नाम किया है।
34. मौत......
मौत ने बड़े बड़ों को समा दिखाया
सूरमा रुस्तम को खाक में मिलाया।
शाह सिकन्दर के हौसले आली थे
वक्ते मदफन दोनो हाथ खाली थे।
ना कारुन बाकी ना कोई साथी रहे
जांगजू बाकी ना उसके हाथी रहे।
चले जो पैर पटक के हिलती जमीं
जिस्म खा गई उनके रेत की नमी।
बड़े - छोटे का आखिरी ठिकाना है
आखिर अंधेरी कब्र में लौट जाना है।
करे सो पाये रब का कानून सालिम
नेक को नेकी सजा पाएगा जालिम।
जिगर अजमत खुदा की निराली है
आने का तय जाने का दिन खाली है।
34. हुआ है क्या .....
आसमान छू ले कोई हुआ है क्या
मन का तार किसी ने छुआ है क्या
यूं नहीं लगती आग किसी कोने में
सुलगता हुआ कहीं पे धुंआ है क्या
आलम ए गम ना देख आंसू ना देख
देख यह घर गम का कुआं है क्या
काबिल हूं बोझ उठाने के तन्हा नहीं
मुझ मुकद्दर संग तेरी दुआ है क्या
जिगर खोने पाने की बात क्या कीजे
जी खोल के जी जिंदगी जुआ है क्या
35. बात कह दूं..
फुर्सत में हो तो एक बात कह दूं
मेरे दिल में हैं वो जज़्बात कह दूं।
जज्ब न होते अब बागी अरमान
तुम सुनो तो सब हालात कह दूं।
गालिब मुझ जबीं पर परेशां क्यों
गुजरे हैं क्या वो तासूरात कह दूं।
जरूरियात कलील पेशा ए नादिर
आदमी को आदम जात कह दूं।
जिगर ने खूंन को आब कर लिया
चश्म के लहू को बरसात कह दूं।
36. तमन्ना ......
तमन्नाओं के शहर बसाए गए
हसीन सपने यूं ही सजाए गए।
कल किसने देखा जिएं मरें
चरागे शाद आज जलाए गए।
दर दर की ठोकरें अपने हिस्से
कसरत से तसने सुनाए गए।
कारवां बना आखिर मोड़ तक
ऐवान ए हसरत जलाए गए।
गुजार दी हयात गम में जिगर
असमान सर पर उठाए गए।
39. हम......
जख्मों से जो डर जाता है
समझो वहीं वो मर जाता है।
कामयाबी नहीं आसान दोस्त
पाने वाला खो कर जाता है।
खाईयां लाख रुकावटों की
जुनून है तो उतर जाता है।
बहार खिजां के बाद आती हैं
पुराना जाए नया घर आता है।
जिगर का दर खुशियों भरा
संवारते संवारते संवर जाता है।
38. लड़ती रही......
हालात से लड़ती रही जान मेरी
रब की इनायत यह मुस्कान मेरी।
कदम दर कदम चलता संभल कर
वक्तन सही फैसला है पहचान मेरी।
पाकीजा लफ़्ज़ अजमत की बात
वास्ते हक़ दिलो जां कुर्बान मेरी।
हजारों आरजूऐं दफ़न सीने में मेरे
समझे बेकरारी कोई बेजुबान मेरी।
सद मील सफर अकेले तय किया
करम रब का रखी जिसने शान मेरी।
हर ख्वाहिश को पूरा करना फर्ज
पुर इंकलाब गलियां सुनसान मेरी।
मैंने तुझे बनाया उसने कहा जिगर
आहंगी है सीना मखमली जुबान मेरी।
39. लगती हो......
सर्द सुबह की धूप सी लगती हो
शायर को दाद खूब सी लगती हो।
मंजिल - ए - मंसूब सी लगती हो
लड़कपन के महबूब सी लगती हो।
लगती हो पानी के कमल सी
खिली खिली दूब सी लगती हो।
प्यालों में, जाम में, छलकती सी
सुनहरी शाम गूरूब सी लगती हो।
नहीं दिखता जब रास्ता कोई
सिर्फ तुम असलूब सी लगती हो।
40. फकीर........
फकिराँ के किस्से अजब होते हैं
सीने चाक सिले लब होते हैं।
ये कुर्बान नहीं बे सबब होते हैं
गली में माशूक की तलब होते हैं।
खुद अपने ही में बेखुद होते हैं
इनके मस्त, मलंग लक़ब होते हैं।
बदल जाते हैं फरमान आसमां के
फैसलों के सामने ये जब होते हैं।
जिगर पीरी के इम्कान नादिदा
वली आलिम ए ग़ैब गजब होते हैं।
40. आसान.....
आसान है तनकीद हर किसी के लिए
बात तो तब है के कोई इबारत लिखें।
किसी की तरफ अंगुली करने वाले
तुझ पर उठी तीन अंगुलियां न दिखें।
पशो पेश में हूँ,देखूं किसे किस को नहीं
लिखने वाले तेरे लिए वो क्या लिखे।
हर हूनर अजमाया तस्कीन के लिए
तेरे दर की रोशनी में चराग मेरे बिके।
जिगर महाफिल के उसूल याद रहे तुझे
टिकेंगे वही अस्खास जो साथ तेरे टिके।
42. इख़्वत..........
एक सफ में साथ खड़ा होने वाला
पैगाम ए अख्वत से बड़ा होने वाला।
महदूद हो गया महमूद से अयाज अब
दौरे खिलाफ इम्तिहां कड़ा होने वाला।
साजिंदे की तरतीब हो गई बे असर
जूतियों में है ताज पर जड़ा होने वाला।
खिला की हर शे तेरे कदमों का तबर्रुक
नहीं कोनेन में तुझ से बड़ा होने वाला।
जिगर अदावत के सफर तेरी तहरीर में
हो मर्दे मोमिन बात पर अड़ा होने वाला।
43. नाम....
इस मुहब्बत को मैं क्या नाम दूं
ए तिफ्ल तुझे खुद अपना नाम दूं।
अपने महबूब को एक अहसान दूं
मर के भी कार ए खैर अंजाम दूं।
तेरे जिस्म के जख्म सब मेरे हुये
दे दूं तुझे अपनी जिंदगी तमाम दूं।
तेरे ख्वाब मेरी आंखों में चमकते
तेरी खुशी का बता क्या दाम दूं।
डूबते सूरज को पूछा कब आएगा
हुई रात तो किस को इल्जाम दूं।
साथी भी पूछते हैं सवाल जवाब दो
हूं खुली किताब सुबह शाम दूं।
जिगर भर रख शोले वक्त के लिये
पहना के ताज कांटों का इनाम दूं।
44. आ बैठा.......
मुर्दों के शहर में आ बैठा
हाय किस से दिल लगा बैठा।
चने लोहे के चबा बैठा
कसम यह कैसी उठा बैठा।
बैठा सब के भले के लिये
करते हवन हाथ जला बैठा।
कुछ उम्मीद से घर आये वो
और में हौंसला बढ़ा बैठा।
खेला खतर से बेखतर हो के
झुर्रियां बढ़ा उम्र घटा बैठा।
दीवारे शहदरी के उस ओर
इधर था कोई उधर जा बैठा।
जिगर मुश्किल खूं की सफाई
गिरोह में गिरह लगा बैठा।
45. परेशान......
हम ना समझ हैं और परेशान भी हैं
ए दानिश तुम आकर जरा समझा दो।
सूखी लकड़ी सी अकड़ रस्सी सा बल
यह अना की आग कल्ब में बुझा दो।
देख फंसे हैं पेंच कई हर मसला फंसा
आओ मिल बैठ, सुलह से सुलझा दो।
खड़ा चौराहे पे और भटक गया रस्ता
मेहरबां तुम ही कोई राह सुझा दो।
जिगर बाज़ीगर की जान तोते में कैद
फैलाओ जाल और उसे उलझा दो।
46. सवाल क्या है......
बाजार का पूछे हाल क्या है
खरीददार तेरा सवाल क्या है।
यहां बिकता है तन मन सोना
तेरी जरूरत का माल क्या है।
निकल जाये हाथी फंसे चींटी
बातों से सुलझे तो जाल क्या है।
लाखों चेहरे एक जबीं पर यहां
पहचान ले कोई मजाल क्या है।
आखिर जाना है सब छोड़ कर
साथ ले चले वो आमाल क्या है।
ढकते बदन साड़ी,धोती सूट से
अब जो पहने वो रूमाल क्या है।
दाल में काला कहावत सुनी कभी
पूरी ना हो काली वो दाल क्या है।
तारीख के पन्ने बदल दिये हमने
किया नहीं यह कमाल क्या है।
जिगर फुरसत से मिलने आना
देखो अभी हुआ बवाल क्या है।
47. जानता है.......
वही जानता है जो खोता है कुछ
इंसानी हाथ में नहीं होता है कुछ।
सुबहे रोशनी शाम का धुंधलका
ये आफात हैं खुशी का मुचलका।
दानिश की रजा रफकते खलक
लकीर के फकीर न उतरे हलक।
बनाये रास्तों पे चलना है आसन
नई राह तलाशने में क्या नुकसान।
किस किस से अब लड़ेगा यार तू
ऐसे तो अपनो से बिछड़ेगा यार तू।
कहेंगे लोग तुम्हे हासिल हुआ क्या
कह देना हमने खेला जुआ है क्या।
जर्द चेहरों पर हंसी की बात कर
ना झुके उस जबीं की बात कर।
48. कीमत.....
आंसुओं से किश्त मुस्कुराने की चुकाई
क़ीमत तेरे ना आने के बहाने की चुकाई।
शबनम की दुआ के ना हो सुबह कभी
सदफ देख बूंद बारिश की मुस्कुराई।
साल दर साल यही सिलसिला रहा
नदी करे धूप से खाली समंदर की भरपाई।
बरजख हैसियते बहिश्तो दोजख रखे
हसर में काम आयेगी यहीं की कमाई।
इंसान है पीसता रहा मजहब के पाटों में
मजहब एक है खल्क ए खुदा की भलाई।
सुन टोपी टीके माला से पहचानने वाले
तू मुर्तद है करवाता भाई से भाई की लड़ाई।
कहते हैं मियां के दुआ काम नहीं करती
जिगर संभाल हलक जो गिजा तूने खाई।
49. चीज है....
यह इश्क़ भी बेकार की चीज़ है
जो था कोई चीज़ वो नाचीज़ है।
मुस्कुरा कर देखतीं बहारे बेज़ार
कल आ ए चांद आज तीज है।
खुल कर नफरतें के घर कीजिये
यहीं फूटने मुहब्बत के बीज हैं।
दीद के शोलों से जलाते हो दिल
कल के दुश्मन आज अज़ीज़ हैं।
कब सुनती है भूख मन की बात
ना देखनी देखती वो देहलीज हैं।
मुर्दा हूँ बस्ती मरों की में हूँ मकीं
तेरी मुश्किल का नहीं तावीज है।
बसेरा जन्नत में मरने के बाद हो
इस दोजख की क्या तजवीज हैं।
हुनर हैं तारे तोड़ लाने का जिगर
काम में ले इतनी कहाँ तमीज़ हैं।
50. बढ़ जाता है....
खुशियों के इंतज़ार की लम्बी घड़ियों में
बेदर्द वक़्त का पल्लू इंतहा बढ़ जाता है।
तेज़ चमक धूप और तलाश हो शाये की
सूरज है कि दूर से सर पर चढ़ जाता है।
मुमकिन दरिया की दो बूंद कर दें शेराब
ये प्यास का अहसास है कि बढ़ जाता है।
खरीद ली ख़ूब मिल्कियत ज़मीनो मकां
जखीरा नेकियों का भी कम पड़ जाता है।
दानिश रफ़ीक़ हाकिम सालेह से वाजिब
ता शफ़ जाहिद अमीन शैफ लड़ जाता है।
ए शोक ना ले तू इम्तिहान जज़्ब का मेरे
जादू का हक़ीक़त से काम पड़ जाता है।
राम महेश चांद को ममता से बुलाकी देख
जिगर की उम्मीद का घर उजड़ जाता है।
51. बदल
बदल ने अब सुखी जमीं को भिगो दी
अब्र ने मुश्किलें एक लड़ी में पिरो दी।
यह ज़िन्दगी है मुखालफत रोज़ होगी
चाहे सूखी आंखे अश्कों में डुबो दी।
आदमी आदमी को पहचान सके गर
उस ने मांगी एक जान हम ने दो दी।
तमाशा ही तो है जो है किया हमने
संभली न अजदाद पुरखों ने जो दी।
हमवार इंतहा खुशनूद दामन खाली
सदियों की सल्तनत लम्हों में खो दी।
फासले फलसफे नहीं हिम्मत से तय
पा ने की उम्मीद खोने ने ही तो दी।
जिगर पढ़ के फ़राग दिली वसूल हो
तरीकते शफ़ किस ने किस को दी।
52. #तुम_जानो....
जला दिया बाती तेल तुम जानो
कौन खेल गया खेल तुम जानो।
पानी को न बांध हद तोड़ निकले
मासूक को समझा रखैल तुम जानो।
बिकते हैं लोग कीमत सही लगे
किसने यहां लगाई सैल तुम जानो।
नदी सागर की चाह में आ कर मिले
पास रह के न बढ़ा मेल तुम जानो।
सात समंदर का पानी उंडेल कर
जिगर का उतरा न मैल तुम जानो।
53. करीब था....
तेरा हाथ मेरे हाथ के क़रीब था
थाम ना सका मैं बद नसीब था।
जान पे बन आई तुझ से जुदाई
अहले ख़ाना के संग बेहद गरीब था।
मूसा का सफर हारून को वसीयत
भूल गया खुदाई हुआ रकीब था।
जला देती है आग पत्थर को मोम सा
आतिशे नमरुद से बचा हबीब था।
ग़में ओलाद ने छीनी बिनाई ए याकूब
हाकिमे मिस्र यूसुफ का नसीब था।
जिंदा उठा लिया खुदा ने इब्ने मरियम
ईसा रुहल्लाह वही अहले सलीब था।
जिगर समंदर में खींच के मां की सांस
बख्शने वाला सज्जाद को नजीब था।
54. आहिस्ता ....
गुलों ने छोड़ा पराग आहिस्ता आहिस्ता
पत्थर से जुदा नाग आहिस्ता आहिस्ता।
मुदाखलत के अक्स आहिस्ता निकले
बेशुकुं खाली दिमाग़ आहिस्ता आहिस्ता।
देखे अक्सर मुद्दे से भटकते अहलकार
हुआ रुक्न लाबलाग आहिस्ता आहिस्ता।
जो घर ढहा उसका दीवार मेरी भी गिरी
धुआं धुआं है आग आहिस्ता आहिस्ता।
खुशी न रही तो ग़म भी नहीं रहेंगे बदेर
ए दिल नींद से जाग आहिस्ता आहिस्ता।
मिटा के वजूद फैलाए रोशनी घर घर में
तेल- बाती - चिराग आहिस्ता आहिस्ता।
परायों ने उठा लिया है बोझ भाई का
जिगर हुआ बेलाग आहिस्ता आहिस्ता
55. कर के देखो
#कर_के_देखो....
हर मुश्किल को आसान कर के देखो
तुम जीने का अरमान कर के देखो।
बस मुट्ठी में यह जहान कर के देखो
तुम दुनिया को हैरान कर के देखो।
हर साल की तनकीद कीजिए जनाब
काबिलियत पर गुमान कर के देखो।
भूल कर भूल माजी की आगे बढ़ो
खुद ही खुद का उत्थान कर के देखो।
घर दिया तो खानगाह में हो दिया
घर पे खुद के अहसान कर के देखो।
दिखे अच्छा वो हो अच्छा जरूरी नहीं
आदमी की पहचान कर के देखो।
आलिम दुश्मन अच्छा अहमक यार से
ज़रा दोस्ती का मिज़ान कर के देखो।
56. नहीं
#नहीं_गया....
मालो ज़र की तलाश में वो घर नहीं गया
वो कमाता रहा जब तक मर नहीं गया।
आरजूओं का बोझ सर से उतर नहीं गया
अब तक मरहलों से कई गुजर नहीं गया।
डरता नहीं यहां पर मैं अपने वजूद से
जीता हूं मर मर के यह डर नहीं गया।
चारों तरफ जाल है अपना ये हाल है
डर मेरे मरने का पल भर नहीं गया।
मुन्तखब किताबे जिंदगी की नज़्में
लिखे पढ़े वो हरुफ के अंदर नहीं गया।
पहले से जब्त हैं मेरे दिल के ज़ज़्बात
दूर मुझ से मुश्किलों का समंदर नहीं गया।
जिगर पीढ़ियों का दर्द समेटता इंसान
वो कौम कौनसी जहां पैगम्बर नहीं गया।
#करते_हैं..
बारिश के क़तरे ज़मिं को हरा करते हैं
अश्कों से ज़ख़्मों को भरा करते रहे।
सच में जिंदगी का हक़ नहीं अदा
बस इसी बात से हम डरा करते हैं।
इंसान का दिल पत्थर नहीं है मोम
जिस्म फ़ानी अरवाह नहीं मरा करते हैं।
उम्मीद ही तो है जो छोड़ी नहीं जाती
दुआ लंबी जिंदगी की करा करते हैं।
मंदिर में पूजा मस्जिद में नमाजी
डर है डर कर वहां पग धरा करते हैं।
हक किसी का दबा के हुए मन में राजी
हकीकत में आग पेट में भरा करते हैं।
जिगर यहां से बेदाग जाना मुश्किल
बेदाग चेहरा अपना सुनहरा करते हैं।
58. बेचारा...
सिकुड़ता दिल ज़माने से हारा
बीता साल, महीना, दिन सारा
सीने की घुटन से है जी पामाल
जिगर हैरान इब्ने इंसान बेचारा
59. अच्छा है
#अच्छा.....
नया रिश्तों का मंज़र अच्छा लगता हैं
रेगिस्तानी को समंदर अच्छा लगता है।
दुनिया की सैर कर के इब्नेबतुता
गया घर यह घर अच्छा लगता है।
मिलने के बहाने ढूंढते हैं चंद से हम
कोई न मिले अक्सर अच्छा लगता है।
लगे शोर नाला ए बुलबुल कभी
खुश हो कौवे का टर अच्छा लगता है।
काटने दौड़ते महलों के नमदे कालीन
थके मुसाफिर को पत्थर अच्छा लगता है।
चढ़ते सूरज को सलाम करते हैं सब
वक्त ठहर जा ये पहर अच्छा लगता है।
एवानो इरम की आसाइस नागवार
जिगर घर का बिस्तर अच्छा लगता है।
60. कर लिया....
#कर_लिया
बेकरार दिल ने करार ए आम कर लिया
ख्वाब एकेक तेरा अपने नाम कर लिया।
इस्तकामत की पासदारी नहीं आसान
बेदारी का नाम हमने आराम कर लिया।
रौनक ए बाग यारों में पहचान बन गई
कातिल फूलों का सर इल्ज़ाम कर लिया।
बहते आंसुओं की बात पुरानी हो गई
वक्ते खिजाओं को गुलफाम कर लिया।
तोड़ कल का रिश्ता पुराना आज नया
बदल अपनायत सुबह शाम कर लिया।
पीढ़ियों की कमाई बे आबरू गंवाई
इज़्ज़त सरे बाज़ार नीलाम कर लिया।
कब तक बचोगे एबे फरेब से जिगर
मीठे करे गप खारे को हराम कर लिया।
60. निकलेगा...
यकीन बाहर हमारा गुरूर निकलेगा
यह मामला घर से दूर निकलेगा।
बिखरा सूरज से कोई नूर निकलेगा
कांच के टुकड़ों से कोहिनूर निकलेगा।
वो कहते हैं कुछ नहीं होना तेरा यार
रास्ता यहां से कोई जरूर निकलेगा।
शहर आ गया गांव का अनपढ़ फर्द
मासूम के सर कोई कसूर निकलेगा।
यकीन है ये भरोसा नहीं टूटेगा जिगर
पाप का घड़ा चकनाचूर निकलेगा।
61. यहाँ
मर्ज़ी से मंजिल कहाँ मिलती है यहां
रिश्तों पे जमी बर्फ पिघलती है यहां।
मेरे अपनों पर नहीं मेरा कोई काबू यहां
तेज गोलियों से ज़बान चलती है यहां।
निकला घर से कच्ची उम्र में नौजवाँ
आर्जुएँ जवानी को निगलती है यहां।
मिट्टी ने साथ न छोड़ा हमने छोड़ा उसे
ढालें जिस सांचे में यह ढलती है यहां।
जिगर रूह जावेद मिट नहीं सकती
जिस्म का ढांचा ये बदलती है यहां।
62. गुलाब थी...
गुज़री हयात ग़म के घेरों से अजाब थी
निकल गई अपनी जवानी गुलाब थी।
बेखलल हुर्रियत के काम करता रहा
मयकदों ने गले में उंडेली शराब थी।
ज़र्द पत्ते खुद दरख़्त से हुए जुदा
एक वक्त इनकी भी अपनी ताब थी।
तिफ्ल को न जोड़ आसाइसे रकीब से
हैं ख्वाहिश इनमें जो अपनी जनाब थी।
बहर दरिया को मौकूफ न कर सका
जरूरत ए आब उसे बेहिसाब थी।
63. मौकुफ
क़िस्मत को गर यह गवारा होगा
हम जिस के हुए वो हमारा होगा।
रहो तुम जालो फरेब के चमन में
जो है मेरा वो नहीं बेचारा होगा।
अंधे तूफ़ान उस घर को उड़ा गए
वक्त पे मालिक ने न संवारा होगा।
तोहमत उजड़ने की न लगाओ हवा पे
तुमने सफ़ीना भंवर में उतरा होगा।
गुल चमन गुलफाम कुछ बाकी न रहे
बका वही जो खुदा को गवारा होगा।
दोबारा अजल को मिलते नहीं देखा
बिन पानी फूल खिलते नहीं देखा।
हर बात का वक्त मुकर्रर होता है
दिन में तारे को निकलते नहीं देखा।
हो दर्द की दवा माकूल महफूज़
ज़ख़्म बेमरहम सिलते नहीं देखा
अपनों का बिछड़ना है दर्दनाक
बेवजह के हाथ हिलते नहीं देखा।
चलोगे तो आबले पैरों के मेहमां
जिगर पड़े पांव छिलते नहीं देखा।
******
65. घर .....
घर बचाए कोई कैसे टूट जाने के बाद
ज़ब्त चला जाता अना आने के बाद।
फरेब में ऐब है जो कोई भी करे
बाज नहीं आया फ़रेब खाने के बाद।
मिट्टी के आशियाने महलों से ठीक
शिकम सेर हुआ इक ज़माने के बाद।
चला था नई दुनिया की खोज में वो
लौट आया सूरज डूब जाने के बाद।
जिगर फ़ना के फैसले ला मुफीद नहीं
#जिगर_चूरूवी
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