जिगर चूरवी कसासुल जिगर मजमुआ ए गजल 02
शायर का ताअरूफ -
नाम - शमशेर खान
उपनाम - प्रेम, शमशेर गांधी
तखल्लुस - पहले परवाना नाम से लिखना शुरू किया। पत्नी अख्तर बानो (सदफ) के सुझाव पर जिगर चूरूवी नाम से लिखना शुरू किया।
पैदाइश - 18.04.1978 सहजूसर, चूरू (राजस्थान)
पिता का नाम - श्री भालू खां (पूर्व विधायक (1980 से 1985), चूरू।
माता का नाम - सलामन बानो (गृहणी)
ताअलिम -
1. रामावि सहजूसर में पहली कक्षा में दाखिला 10.07.1984 से 1993 में मेट्रिक तक।
2. राउमावि बागला, चूरू से हेयर सेकंडरी 1993 से 1995 तक
3. राजकीय शिक्षक प्रशिक्षण विद्यालय भाषाई अल्पसंख्यक अजमेर से BSTC, 1995 से 1997
4. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में स्नातक 1998 से 2001 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय, अजमेर)
5. राजकीय लोहिया महाविद्यालय चूरू से स्वयंपाठी के रूप में अधिस्नातक 2004 से 2005 तक (महाराजा गंगा सिंह विश्वविद्यालय बीकानेर से गोल्ड मेडलिस्ट - 2005 उर्दू साहित्य)
6. कश्मीर विश्वविद्याल, श्रीनगर के नंद ऋषि शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय से B.Ed.- (2007 - 8)
7. इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय से विशेष आवश्यकता विद्यार्थियों के शिक्षण हेतु विशेष अध्ययन - 2012
8. वर्तमान में LLB में प्रवेश (13.08.2025 से)
विवाह - पत्नी अख्तर बानो (सदफ) से 20.10.1996 में विवाह हुआ।
संतान - तीन पुत्रियां
1. अंजलि खान (LLM)
2. रोजा खान (BSC Nursing) सेवारत
3. प्रेरणा खान (BSC Nursing) सेवारत
व्यवसाय -
1. निजी विद्यालय शिक्षक एवं विद्यालय संचालन - 1997 से 1999
2. राजकीय सेवा तृतीय श्रेणी अध्यापक 10.07.1999 से 14.12.2014 तक
3. द्वितीय श्रेणी शिक्षक 14.12.2014 से 01.09.2023 तक
4. स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति 01.09.2023 से
पद -
1. तहसील अध्यक्ष - शिक्षक संघ शेखावत, चूरू
2. जिला मंत्री शिक्षक संघ शेखावत चूरू
3. प्रदेशध्यक्ष, सर्व शिक्षा अभियान कर्मचारी संघ, राजस्थान
4. प्रदेशाध्यक्ष, युवा मुस्लिम महासभा, राजस्थान
5. प्रदेश संयोजक, राजस्थान तृतीय भाषा बचाओ आंदोलन
6. प्रदेश संयोजक, संविदा मुक्ति आंदोलन राजस्थान
7. प्रदेश सचिव अखिल भारतीय कांग्रेस सेवादल 2024 से
8. जिलाध्यक्ष शिक्षक प्रकोष्ठ कांग्रेस, चूरू 2025 से
9. संयोजक चूरू विधानसभा समस्या एवं समाधान समिति, चूरू
आंदोलन -
1. संविदा मुक्ति आंदोलन
2. दांडी यात्रा
3. सामाजिक सरोकार
पुस्तकें -
1. मिरातुल जिगर
2. हृदयांश (हिंदी कविता संग्रह)
3. कालजे री कोर (राजस्थानी कविता संग्रह)
4. कसासुल जिगर - गजल समूह
5. मिनाज ए जिगर - नज़्म संग्रह
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- जिगर चूरूवी की ग़ज़लगोई -
परंपरा और समकालीनता के मध्य एक अनुशासित मुक्त काव्य-प्रयोग
इस आलेख के माध्यम से समकालीन हिंदी-उर्दू ग़ज़ल परंपरा में जिगर चूरूवी की रचना-शैली का आलोचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है जो उनका काव्य शास्त्रीय अरूज़, लोकभाषा, और आधुनिक वैचारिक चेतना के बीच एक संतुलित संवाद स्थापित करता है।
इस अध्ययन का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि जिगर चूरूवी की ग़ज़लगोई न तो शुद्ध क्लासिकल ढाँचे में सीमित है और न ही पूर्णतः मुक्त छंद की ओर प्रवृत्त, बल्कि एक ऐसी “अनुशासित मुक्त लय” का उदाहरण है, जो समकालीन ग़ज़ल को नई दिशा प्रदान करती है।
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1. भूमिका
ग़ज़ल एक ऐसी काव्य-विधा है जिसने ऐतिहासिक रूप से शिल्प और संवेदना के बीच संतुलन साधा है। बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और इक्कीसवीं शताब्दी में ग़ज़ल के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि वह क्लासिकल अरूज़ की कठोरता और आधुनिक अनुभव की जटिलता के बीच कैसे स्वयं को प्रासंगिक बनाए। इस संदर्भ में जिगर चूरूवी की ग़ज़लगोई एक महत्त्वपूर्ण समकालीन हस्तक्षेप के रूप में देखी जा सकती है।
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2. शिल्प और बह्र : संरचना का पुनर्पाठ
जिगर चूरूवी की ग़ज़लों में रमल और हज़ज जैसी पारंपरिक बह्रों की स्पष्ट छाया मिलती है, किंतु उनका प्रयोग पारंपरिक अनुकरण तक सीमित नहीं है। वे बह्र को काव्य का अंतिम उद्देश्य न मानकर एक लयात्मक ढाँचे के रूप में ग्रहण करते हैं।
कई स्थानों पर उनकी पंक्तियाँ शास्त्रीय अरूज़ की कठोर मात्रिक गणना से विचलित होती प्रतीत होती हैं, परंतु यह विचलन शिल्पगत असावधानी नहीं, बल्कि भावगत प्राथमिकता का परिणाम है। इस दृष्टि से उनकी ग़ज़लगोई को मीटर-आधारित कविता के स्थान पर लय-आधारित काव्य कहा जा सकता है।
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3. भाषा और शब्दावली
जिगर चूरूवी की भाषा बहुस्तरीय है। इसमें उर्दू की काव्यात्मक कोमलता, हिंदी की सहज संप्रेषणीयता और संस्कृत-प्रेरित शब्दों की वैचारिक गंभीरता एक साथ उपस्थित हैं।
धार्मिक और पौराणिक शब्दावली—जैसे काबा, मंदर, इंद्र, पुरंदर—यहाँ आस्था के प्रचार के लिए नहीं, बल्कि दार्शनिक और नैतिक विमर्श के उपकरण के रूप में प्रयुक्त होती है। यह भाषा-प्रयोग उनकी ग़ज़लों को संकीर्ण धार्मिक अर्थों से मुक्त रखता है।
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4. विषय-वस्तु : वैचारिक आयाम
उनकी ग़ज़लों के प्रमुख विषयों में ईश्वर और मनुष्य का संबंध, सत्ता की नैतिकता, व्यवस्था पर व्यंग्य, और हार-जीत का दार्शनिक विवेचन शामिल है।
विशेष उल्लेखनीय यह है कि कवि वैचारिक प्रतिरोध को उद्घोषणा या आक्रोश में नहीं बदलता। उसके यहाँ व्यंग्य सूक्ष्म है और प्रश्नोन्मुखता प्रधान। यह विशेषता उन्हें समकालीन वैचारिक कविता की भीड़ में अलग पहचान देती है।
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5. नग़्मगी और रदीफ़-क़ाफ़िया
ग़ज़ल की मूल आत्मा उसकी नग़्मगी में निहित होती है। जिगर चूरूवी इस परंपरा के प्रति सजग दिखाई देते हैं।
उनके रदीफ़—विशेषतः क्रियात्मक रदीफ़ जैसे “लिख दे”—कविता में एक आवृत्त संगीतात्मक प्रभाव उत्पन्न करते हैं। क़ाफ़िया चयन ध्वन्यात्मक दृष्टि से सुसंगत है, जिससे ग़ज़ल पाठ और गायन—दोनों के लिए उपयुक्त बनती है।
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6. परंपरा से संबंध
जिगर चूरूवी की ग़ज़लगोई मीर की सादगी, ग़ालिब की वैचारिक गहराई और फ़ैज़ की मानवीय संवेदना से भावात्मक संवाद स्थापित करती है, किंतु यह संवाद अनुकरणात्मक नहीं है।
इसके अतिरिक्त, उनकी रचनाओं में राजस्थानी लोक-संवेदना और मंचीय काव्य परंपरा की छाया भी देखी जा सकती है, जो उन्हें भौगोलिक और सांस्कृतिक विशिष्टता प्रदान करती है।
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7. निष्कर्ष
समग्रतः जिगर चूरूवी की ग़ज़लगोई को “बह्र-प्रेरित, लय-आधारित समकालीन ग़ज़ल” के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।
उनकी रचनाएँ यह प्रमाणित करती हैं कि ग़ज़ल की प्रासंगिकता आज भी बनी रह सकती है, यदि शिल्प को साधन और संवेदना को लक्ष्य माना जाए।
यह ग़ज़लगोई किसी स्थापित स्कूल की घोषणा नहीं, बल्कि एक निर्माणशील काव्य-दृष्टि का संकेत है—जो भविष्य में एक सशक्त साहित्यिक परंपरा का रूप ले सकती है।
आपका दोस्त
प्रस्तुत पुस्तक के बारे में -
लेखक ने उर्दू, हिंदी, मारवाड़ी भाषा की लगभग सभी विधाओं में कलम आजमाई है। प्रस्तुत दीवान शमशेर भालू खां का प्रथम प्रयास है। लेखक का मत है कि वर्तमान समय में काव्य में शुद्ध भाषा एवं शख्त बहर, गेयता और माप का चलन
संभव नहीं है। इस दौर में भाषाओं के कुछ शब्द इस तरह से घुलमिल गए हैं कि उन्हें एक भाषा में बांधना शब्द के साथ अन्याय होगा। हिंदी - उर्दू दोनों भाषाओं में सम्मिलित ग़ज़ल, गीत, कविता एवं छंदों का उपयोग आम बात हो गई है।
अतः हमें बंधनों को तोड़ते हुए सम्मिलित विधाओं में सभी भाषाओं का मेल करते हुए साहित्य सृजन करना चाहिए।
अंत में लेखक के कथन अनुसार उन्होंने इस किताब को किसी भी बंधन से मुक्त रखते हुए भावों को जनता तक पहुंचाने का एक छोटा सा प्रयास किया है।
मेरे इश्क़ की पहचान इतनी सी है।
मेरे हाथ काँपते लब मुस्कुराते रहे।
- जिगर चूरूवी
फेहरिस्त
01. उर्दू .......
02. फिर मिलेंगे..........
03. अर्श की मंशा........
04. सनम हाय.......
05. ना ही जान ली.......
06. नहीं डरते.....
07. कब गए......
08. नंगे पा......
09. खफा मुझ से.....
10. दाग धोना चाहता .....
11. जंगल की आग.....
12. मरा सूद से.....
13. आसमान को छूले...
14. धारों में......
15. बस्ती में......
16. जलता रहा......
17. फील से.......
18. हयात......
19. हो जाता हूं मैं........
20. बदल जाते हैं....
21. कातिल हो ......
22. बदल ना हो....
23. छुपाओगे......
24. मत......
25. नहीं.....
26. मफ़हूम......
27. जनाब......
28. अख्तर......
29. ईद मुबारक.....
30. कोई......
31. गली - गली.....
32. बदलेंगे.......
33. ख्याल.......
34. दाम......
35. खाली.....
36. मकसद.......
37. करता हूं.......
37. बात.....
38. हूं......
39. हो......
40. कीजिए......
41. थोड़ी है.....
42. कहो.......
43. तेरे.......
44. आऊं......
45. नारी.....
46. चलो......
47. बात हो......
48. समझती हो तुम...
49. समझते हो...
50. अर्क़ ए हिना..
51. बांटिए...
52. खुदा...
53. ज़रूरी है.....
54. पहचान....
55. तुम्हारा है....
56. सिखाया गया...
57. लिख दे.....
58. पहन लेता हूं....
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01. उर्दू........
हिंद में पैदा हुई जबां उर्दू
पली बढ़ी हुई यहां जवां उर्दू
ग़ालिब मीर दर्द की दास्तां उर्दू
गुलज़ार नसीम की पहचां उर्दू
बगीचे की कली गजल इसकी
गीत नज़्म तराने की मां उर्दू
मुंसिफ कलम की रोशनाई इसमें
है अदालत की रूह ओ जां उर्दू
चाहत सियासत की हस्ती मिटा दे
दिल में बसी है मिठास जहां उर्दू
लिख बोल पढ़ सुन दिल की बात
इश्क का नगमा ए जहां उर्दू
बख्शे अंजुमन को रोशनी जो
जिगर होती गई खुद विराँ उर्दू
02. फिर मिलेंगे.......
फिर मिलेंगे नए मसलों पे गुफ्तगू होगी
गर ये रात आखरी है तो सलाम दोस्तो।
दूरियां मुफीद रोज़ मिलने से यार
समस - ओ क़मर करे ना कलाम दोस्तो।
बख्त की दानिश्वरी मकबूल न हुई
कमब्खत मशहूर टकरा के जाम दोस्तो।
बदल दो ज़ालिम रश्म ओ हुक्मरान्
ग़ारतो इन्साफ पे ना इल्जाम दोस्तो।
रहबर कहे रह बेखौफ में हूँ ना
करे वहीं अपना काम तमाम दोस्तो।
गर मिले कोई तो दिल से मिलना
दरिचे खोल के इश्क सरे आम दोस्तो।
कुछ तो है ये शोर फिजूल नहीं
जिगर करे है अपना काम दोस्तो।
03. अर्श की मंशा........
अब जानी अर्श की मंशा ग़म देने की
वहदानियत आजमाना कमाल हो गया।
करम से खाकसार को तौकीर बक्शी
तेरा दे के भूल जाना कमाल हो गया।
नाफरमां फितरत को शुकराना नागवार मशगूलियत का बहाना कमाल हो गया।
परिंदो की चहक ओर मौज ए समंदर
अब्र ए रहमत बरसाना कमाल हो गया।
पूछेगा खुदा ज़ी कर जिगर क्या किया
शर्म से सर को झुकाना कमाल हो गया।
04. सनम हाय.........
सनम हाय! तूने यह क्या किया
हसद मुझ से उसको रुस्वा किया।
इबादत की हद तक चाहतें की
पर वादा ना तू ने वफा किया।
गुजारिश ए तल्कीन हम से
यहां जो किया तुमने बुरा किया
माजी की तहरीर कोई लिखेगा
हकदार का हक किसने अदा किया।
इतना था साथ अपना ए जिंदगी
हमने तेरे नुकसान को नफा किया।
फितरत से फिरा नहीं मुशरिक हाय
दिल से कुफ्र ए दिखावा खुदा किया।
लहद पे आये तो कहना जिगर
अकसीर बन तूने वबा किया।
05. ना ही जान ली......
ना ही जान ली ना दिखाया रस्ता
जिंदा मार गए आहिस्ता आहिस्ता।
निकले आह किए की वक्त गुज़िस्ता
कान वो भर गए आहिस्ता आहिस्ता।
बदनाम नाम है यह भी एक काम है
दिल से उतर गए आहिस्ता आहिस्ता।
उस गली में चर्चे अपनी शफकत के
क्या वो कर गए आहिस्ता आहिस्ता।
'जिगर' की जान कुर्बान तो गिला क्या
हम खुदा के घर गए आहिस्ता आहिस्ता।
06. नहीं डरते .......
हम बागी हैं नहीं डरते सरकारों से।
जंग हो तो ख़ौफ़ क्या तलवारों से।।
जश्न मनाते हैं मनायेंगे शाहकारों से।
हौसला ना कुंद जुनूँ नक्कारों से।।
हवा हैं तूफ़ां बनते देर नहीं होगी।
मौत से याराना है ना डरा हरकारों से ।।
मिटा के हस्ती खुद की आए हैं सनम।
गाजी कब डरे नेजा तीर तर्रारों से।।
कहत लुकमे का आखिर कब तक।
भला पल का जीना पट्टे के साल हजारों से
जिगर आजाद था है मरेगा आज़ाद।
जिल्लत की मौत डरे हम सरदारों से।
07. कब गए....
जिंदा मजबूर खुदकुशी को जब गए
आरजू ए मरग करने कब गए।
खुद को खत्म करने की हसरत से
तमन्नाओं की खन्दक में दब गए।
गर कुव्वत खुदा दे मुर्दे से सवाल की
पूछूं रस्ता सही क्या जिस पे- सब गए।
आजारे जिंदगी से मोहलत नहीं
खाहिस ए बख्शीश खुश्क लब गए।
इंतजार में इंसाफ के महीने हुए
मुकदमा सव्वाल का बीत रजब गए।
देहाती समझ दफ्तर से बाहर किया
तब्दील खिलवत पे खम - सब गए।
जिगर मरो में शामिल समझ उनको
कर मजबूर से बहाने अजब गए।
08. नंगे पा......
साथ रह कर रातों में जागे हैं
हाकिम के पीछे नंगे पा भागे हैं।
बुनते बिखर जाते सपने जिनके
हाँ हम ही वो कच्चे धागे हैं।
किसने देखे राज दिल खोल कर
कब किसके क्या अरमां जागे हैं।
आकर थम जाएं सब रास्ते यहां
मोड़ जिंदगी के कितने आगे हैं।
जिगर आए खूब छोड़ गए खूब
ना सोच कौन छोड़ेगा या सागे हैं।
9. खफा मुझ से......
कर नुमाया किरदार ए वफ़ा मुझसे
मैं न हूं, हो कोई न ख़फ़ा मुझसे।
अना फसाद की बात न कहो मुझसे
क़र्ज़ ए मिल्लत कैसे हो अदा मुझसे।
यकिं में आबाद नामवरी रह जाये
सीने से लगा लूं दिल जो लगा मुझसे।
मुक़्तदी की बक्शीश इमाम के क़ब्ल
करूं वो इमामत राज़ी हो खुदा मुझसे।
मैं दरख़्त हूँ साया साथ नहीं रखता
मिलो सूरज से बन कर बड़ा मुझसे।
जिगर बारूद ओ तेग का दौर न रहा
न रही कलम न कागज़ छुपा मुझसे।
10. दाग धोना चाहता......
रूह के दाग धोना चाहता हूं
औलादे आदम रोना चाहता हूं।
उलट के रोज सफआते अखबार
पढ़ता हूं वही जो ना चाहता हूं।
न देखी ना सुनी न कही गई जो
हकीकत मैं वो होना चाहता हूं।
शोर में गुल हुये शखी के कलाम
बीज अमन के बोना चाहता हूं।
दे दे तकालिफ सब जिगर को
बोझ सरों के ढोना चाहता हूं।
उठते धुएं से ना जंगल की आग से
घर मेरा जला घर के चिराग से।
वो चित्कारें वो कटते हुये बदन
लुटती लाज कहे दामने दाग से।
शैतान का डर नहीं खुला दुश्मन
है डर संग आस्तीन के नाग से।
दर्द ले दरिया बनी नंगी सड़क
रूह चीरती भीड़ जुबां के झाग से।
जिगर चीर दे सब खामोशियां
उलझता दिमाग पैरों की पाग से।
12. मरा सूद से......
हम लड़ते हैं खुद के वजूद से
छाछ से जला डरा दूध से।
मरा नहीं तलवार के वार से
जाल में फंस के मरा सूद से।
किरदार का कत्ल हो जो हो
नहीं गवारा मिलन गैर माबूद से।
मसला हल हो तो खुदा का करम
न हो न गुजर मेरा हुदूद से।
जिगर सरापा हो महफिले ग़म
नाम का रहा वास्ता खुशनुद से।
13. आसमान को छू ले.....
आसमान को छू ले कोई हुआ है क्या
मन का तार किसी ने छुआ है क्या।
यूं ही नहीं लगती आग किसी कोने में
सुलगता हुआ कहीं पर धुंआ है क्या।
आलम ए गम ना देख आंसू ना देख
बता मेरा घर गम का कुआं है क्या।
काबिल हूं बोझ उठाने के तन्हा नहीं
मुझ मुकद्दर संग तेरी दुआ है क्या।
जिगर खोने पाने की बात क्या
कीजे जी खोल जिंदगी जुआ है क्या।
14. धारों में....
रोज दफन चिंताएं जलती हजारों में
है कौन मसीहा जो रोक सके इशारों में।
जब पाए फेरे जाते, सब तेरे - मेरे जाते हैं।
छोड़छाड़ उधमपटक मिल जाते प्यारों में
हम मरे, ख्वाहिशे जन्नत न मरी अपनी
मिले फिरदोश रहें दूध शहद के धारों में।
राहे फलाह दिखाये संत वही फकीर
फर्क इंसानों ने किया नबियों,अवतारों में।
चांद के टुकड़े, सूरज निगलना मुमकिन
लिखे को माने नादां देखे नसीब तारों में।
एके नाम अनेक कलम ने कर दिखाए
सच छुपा झूठ के चिल्लाते कर नारों में।
जिगर दिखाये अनदेखा जमाना आया है
देखे को अनदेखा करने खड़े कतारों में।
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15. बस्ती में......
इस बस्ती में परेशानी कुछ खास नहीं
खामोशी में सुकून किसी के पास नहीं।
तेरे चेहरे की उलझन को जानता हूँ
मेरी हिकमत का तुझे अहसास नहीं।
सूरज निकले से पहले घर छोड़ने वाले
ए मुसाफिर बता तू क्यों उदास नहीं।
शहर में अकेले तन्हा मरे से लोग
मेरे गांव में कोई जिंदा लाश नहीं
मुड़ के देख पुकारे कोई अपना तुझे
मुख़्तसर जिन्दगी की पूरी तलाश नहीं।
भागता हूँ मुसीबत से दूर वास्ते सुकून
हूँ इब्ने आदम होता ए काश नहीं।
माँग के लिए चंद लम्हे यूँ न गुजार
खुश तबीअत जिगर बद मुआश नहीं।
15. जलता रहा.....
मतला
दूर के चराग़ सा रोशन रात भर
तेरी याद में ये चिराग़ जलता रहा।
खड़े हुए तुम सफ़-ए-ज़रिन में
बंद मुट्ठी में रेत सा फिसलता रहा।
आने की डाह शहर न सोया होगा
सूरज निकलता चाँद ढलता रहा।
गूंजती पहलू में बलागत-ए-यार
यूं सफ़र यादों का चलता रहा।
मक़्ता
जिगर के साये ख़्वाब में ना आने दे
क्यों घर यहाँ से वहाँ बदलता रहा।
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16. खुश हुआ......
आदमी की मौत पे इंसा खुश हुआ
भाई मरा और- नादान खुश हुआ।
गबम रॉकेट से तबाह शहर हुए
रोई ज़मीन आसमान खुश हुआ।
बंजर खेत घर काल की मार से
सामंत लगा कर लगान खुश हुआ।
जरूरत इंसा को समझने की इंसां
पंडित आरती मियां दे अजान खुश हुआ।
कमा कर चंद पैसे बदल लिया अंदाज
ऐंठे शर्माजी अकड़े ख़ान खुश हुआ।
बाप लावारिश मां रोती कलपती
ऐसों से कब खुदा भगवान खुश हुआ।
बिकते यहां आजा सब्जी के मोल
जिगर छुपाकर पहचान खुश हुआ।
ना दिया हुआ ज्ञान याद रखिए
ना किया हुआ काम याद रखिए।
न लोगों के इल्जाम याद रखिए
तुम नहीं हो गुलाम याद रखिए।
मुहसिन सुबह शाम याद रखिए
सच है मौत का नाम याद रखिए।
यहीं स्वर्ग मोक्ष धाम याद रखिए
बद से बुरा बदनाम याद रखिए।
आप जिगर का कलाम याद रखिए
सलाम हो या राम राम याद रखिए।
18. रास्ता नहीं.......
ये हुआ क्या जो मिला रास्ता नहीं
क्या तेरा मुझ से अब - वास्ता नहीं।
खुली राहें मंजिल की जानिब कदम
राहें मुसाफिर खुद तलाशता नहीं।
दर दिल आगोशे कफस कब तलक
खुदा पत्थर के सनम तरासता नहीं।
बला का जादू जलवागर आंखों में
मीठे मीठे लोग ज़हर खरासता नहीं
बुझी को आग नहीं राख कहते हैं
जिगर राख पर बनाता नाश्ता नहीं।
मिटाने चले हरम को लश्कर-ए-फील
मिट गए वो तय्यार अबाबील से।
हक़ ज़िंदा था, है, रहेगा हमेशा
ना माने तो पूछ दरिया-ए-नील से।
दो जहां के वली सरवर-ए-कायनात
मक़सूद सिफारिश रब्ब-ए-कफील से।
बाद विसाल जा-ए-फानी से गुज़र
चल वहाँ मुसाफिर हो खलील से।
नासमझ समझें जाँ-कश है जिगर,
अमन हूँ, पढ़ा जो सुना जिब्रील से।
18. हयात........
काश तू पहचानती, मैं गले लगाता
अक्सर हुआ गुजर, तेरे पास से हयात।
मैं टूटता हूँ, वो खिंचती मुँह मोड़कर
यूँ बसर हो रही, मेरे पास से हयात।
कल आई नई उम्मीद, नये जोश के संग
हो गई बे असर, सवेरे पास से हयात।
तुम चलो तो सब चलें, मैं भी साथ चला
समेटे कब्र के अंधेरे, पास से हयात
रंग है मौजू, कलम भी, रोशनाई भी
रंग बेफिक्र चितेरे, पास से हयात।
हादसे, नसीहत देते, हम लेते रहे
नादाँ है जिगर बहुतेरे, पास से हयात।
तूफ़ाँ बनके उड़ेंगे हम ज़ुल्म के सायों में
घेरे अज़ियत, ज़ेरे अहसास से हयात।
18. हो जाता हूं मैं......
कंधा मिले तो सर रख सो जाता हूँ
पलकों पर बैठाए का हो जाता हूँ मैं।
जागते हुए सपनों में खो जाता हूँ
उदास हो कर कोने में रो जाता हूँ मैं।
बिछड़ने का ग़म समझता हूँ दोस्त
बका ए उम्मीद नादीदा हो जाता हूँ मैं।
सुन कहानी जन्नत और जहन्नम की
ओर मस्जिद के ये जाता वो जाता हूँ मैं।
फरिश्ते को पत्थर, मसीह को सलीब
यही किस्मत का रास्ता तो जाता हूँ में।
देखता रहा दाग दामन पे औरों के
जिगर खुद का नहीं धो पाता हूँ मैं।
बदल जाते हैं.......
वक्त बदलता है तो इंसान बदल जाते हैं
माबूद खुदाई के निशान बदल जाते हैं
देख खाली पेट भाई जान बदल जाते हैं
सोने के ढेर से हम ईमान बदल जाते हैं
हमदम के भेष में पहचान बदल जाते हैं
ले दे कर देव और रहमान बदल जाते हैं
नज़र के सामने सामान बदल जाते हैं
लालच की बला से जवान बदल जाते हैं
हो गर जेब गर्म अरमान बदल जाते हैं
मोह में फरिश्ते से शैतान बदल जाते हैं।
मुखबिर खुद की पहचान बदल जाते हैं
हाफिज बदलते निगहबान बदल जाते हैं।
जिगर रहे तुम खुद खुदा की पनाह में
मौत पहले दुनिया ज़हान बदल जाते है।
*******†*
20 कातिल हो.....
कहते हो तुम के मासूम हो लेकिन
सब जानते हैं के तुम कातिल हो
दबा रहे सच को रेशमी कपड़ों तले
हकीकत में नहीं नफरत के काबिल हो
सच नहीं जो तुम दिखाते फिरते हो
सच यह है कि तुम नाअहल आदिल हो
बीज नफरतों के हल से लगाए तुमने
खूं ए मिल्लत से हुआ क्या हासिल हो
क़तरों से जमीं की तपन नहीं बुझती
आसमा से बारिश अमन की नाजिल हो
है सच किताब ए मज़हब में लिखा जो
रहेगा हक़ सदा और फना बातिल हो
जिगर समझ हकीकत क्या है क्या नहीं
मुंतजिर रह कब सुर ए इस्राफिल हो
21. बदल ना हो.....
आज है जैसा शायद कल ना हो
है कौनसी मुश्किल जिसका हल ना हो।
मिलें चार यार तो आँखें हों चार
और माथे पर यार के बल ना हो।
लख्ते सनम पास बैठने से पहले
हो पाकीज़ा मन में छल ना हो।
मुदाख़लत आपकी हिकमत में खूब
है सियासत वो जिसमें दल बदल ना हो।
बुज़ुर्गी ओढ़ ली जवानी में जिगर
बेकार सब ख़ौफ़-ए उज्ज़ व जल ना हो।
23. छुपाओगे......
हुईं तुम से ग़लतियाँ | कहाँ छुपाओगे
कल आज या कल | सामने आओगे
रात की तारीकियों में | बापर्दा गुनाह
सुबह के अखबारों में | निकलवाओगे
मुकरना हर दफा सही | नहीं ना सही
साख बाजार में | किस तरह बचाओगे
मुंसिफ के फैसलों ने | दरार पैदा की
कानून कुदरत का | अमल में लाओगे
कलम की अब आज़ादी | पुरानी बात
ढूंढ़ आज़ाद कलम | कहां से लाओगे
24. मत.......
गर डर है कोई तो मरना मत
गर मरना ही है तो डरना मत।
बेलौस जिंदगी बसर के लिए
रहो हद में हद से गुजरना मत।
कुछ नहीं जो कुछ नहीं किया
बेअंजाम बात तुम करना मत।
गहरा समंदर है बेहद तारिक
हौसला ना हो तो उतरना मत।
जिगर अहल नाअहल है क्या
पूरा ना हो वो कौल करना मत।
25. नहीं.....
गर डर है कोई तो मरना मत
गर मरना ही है तो डरना मत।
बेलौस जिंदगी बसर के लिए
रहो हद में हद से गुजरना मत।
कुछ नहीं जो कुछ नहीं किया
बेअंजाम बात तुम करना मत।
गहरा समंदर है बेहद तारिक
हौसला ना हो तो उतरना मत।
जिगर अहल नाअहल है क्या
पूरा ना हो वो कौल करना मत।
26. मफ़हूम.......
बेवफ़ा तुझ को कैसे कह दूँ
वफ़ाएँ मेरी पूरी नहीं हैं।
कमी हैं बहुत के हूँ परेशां
काविश मेरी पूरी नहीं हैं।
कैसे न आते जो मैं बुलाता
पर सदा, मेरी पूरी नहीं है।
काश उनको जिगर से लगा लूँ
हाय हसरतें मेरी पूरी नहीं हैं।
तुम सफीकों की महरबानी
खाबिदा नींद पूरी नहीं है।
करते हैं मसलक की बातें
बात इखलास अधूरी नहीं हैं।
क्यों पुकारूँ उसे ज़ोर दे कर
दरमियाँ जब दूरी नहीं हैं।
फ़हम जिगर मफ़हूम दुआ का
कोई कमी है जो पूरी नहीं हैं।
अंग्रेजों भारत छोड़ो हर तरफ यह राग था
खेली गई खून से होली वो जलियांवाला बाग था।
अंग्रेजी मिशन के भारत आने का विरोध पुरजोर था
आजादी जन्म सिद्ध अधिकार यह नारा चहुंओर था।
डायर के हुक्म से यहां दनादन चली थीं गोलियां
मरने वालों कह रहे थे इंकलाब की बोलियां।
इंसानों से ज्यादा वहां बंदूकों का साया था
आसमान भी रोया तब काला बादल छाया था।
मंजूर नहीं थी गुलामी चाहे प्राण ही निकल गए
कुर्बान होने को बलिदानी घरों से बाहर निकल गए।
आज भी वो लाशों का कुआं याद शहीदों की दिलाता है
देख खून से लथपथ काया रोम रोम उठ जाता है।
वो भारत के लाल सपूत जाति थी न्यारी न्यारी
देख एकता कांपे गौरे हुकुम उनका था भारी।
जात धर्म से ऊपर प्यारी देश की आजादी थी
वो मां के राज बेटे थे बेटी रानी शहजादी थी।
आज फिर जरूरत ऐसे ही इंकलाब की आन पड़ी
आजादी की रक्षा हेतु चाहे गवानी जान पड़ी।
जिगर भारत का बेटा खुद जान हथेली पर लेलेगा
देख मातृभूमि की खातिर अब कौन जान से खेलेगा।
28. अख्तर.......
रज़ा ए खुदा के लिए सज्दे में सर रखे हो
दिल में खुलूस का ज़ामिन किधर रखे हो
मुदाखलत के फेर में तुम कहीं के न रहे
कहते फिरते हो हर दिल में घर रखे हो।
बरवक्त फिरे काबे से मुशरिक जैसे
इतना दोगलापन मेरे यार किधर रखे हो
मुसाफिर खुद करे हिफाजत सामान की
नाहक़ बोझ अपना दूसरों के सर रखे हो।
ना मयस्सर एक दिया अंधेर रातों के लिए
बातों में ज़ेबां शम्स ओ कमर रखे हो।
बोदा हुआ तराना, साज तारीख बन गए
लिख गीत नया कमाले सुखन गर रखे हो
जिगर आरजू के अख्तर मुट्ठी में समेटे
ना मंजिल दूर गर मादा ए सफर रखे हो।
29. ईद मुबारक....
रज़ा ए खुदा के लिए सज्दे में सर रखे हो
दिल में खुलूस का ज़ामिन किधर रखे हो
मुदाखलत के फेर में तुम कहीं के न रहे
कहते फिरते हो हर दिल में घर रखे हो।
बरवक्त फिरे काबे से मुशरिक जैसे
इतना दोगलापन मेरे यार किधर रखे हो
मुसाफिर खुद करे हिफाजत सामान की
नाहक़ बोझ अपना दूसरों के सर रखे हो।
ना मयस्सर एक दिया अंधेर रातों के लिए
बातों में ज़ेबां शम्स ओ कमर रखे हो।
बोदा हुआ तराना, साज तारीख बन गए
लिख गीत नया कमाले सुखन गर रखे हो
जिगर आरजू के अख्तर मुट्ठी में समेटे
ना मंजिल दूर गर मादा ए सफर रखे हो।
छोड़िए उनको जो जात धरम की बात करते हैं
रिसते हुए जख्म के मरहम की बात करते हैं।
मिटा दो वो यादें जो कचोटती हैं दिल को
वजूद ए शयातीन के बरहम की बात करते हैं।
बुजदिल नाक ना मूंछ का मालिक हुआ
अक्सर निभाते नहीं वो कसम की बात करते हैं।
बदस्तूर जारी अहले सितम की गर्दिश यां
गुबार ए खातिर रवां कलम की बात करते हैं।
पैकर ए अख़्लाक जा ए तमाशा शब ओ रोज़
रूखी सी ज़िन्दगी में शबनम की बात करते हैं।
बहक गए क़दम जो साबित क़दम ना रहे
शुकून से जिगर के लिए करम की बात करते हैं।
31. गली - गली....
पूछ खुद से क्यों ग़म ख़्वार हो तुम
कौम ओ मिल्लत के गद्दार हो तुम।
मुद्दत से बद दस्तूरी की दुहाई देते
मुस्लिम हो, क्या असरदार हो तुम।
भुल कर पैगामे इख्वानियत ए रसूल
मा किरदारे रसूल बेकिरदार हो तुम।
खीसा रकबत के उसूलों से भर कर
कहते फिरते खुदाया लाचार हो तुम।
मौला तम्बीअ कर अहमक मुल्ला को
नहीं पासे से पंडित के बेजार हो तुम।
जुर्म बख्शा न जायेगा जा ए बरजख
कहो खत्मे ईमान के गुफ़्तार हो तुम।
जिगर ईमान के मुहाफिज गली गली
दहलीजे इस्लाम के हवलदार हो तुम।
32. बदलेंगे......
बदलेंगे कब हम तुम ख्याल क्या है
बीते को छोड़ कर बता हाल क्या है।
बुजुर्गों का अपना वकार था सो था
खुद की खुद बता मजाल क्या है।
आदात बटेर बाज़ी रिन्दो मय के जा
बरअक्श हालात पर सवाल क्या है।
मुगालते में ज़िंदा होने के पड़े मियां
तू फौत नहीं तो नामे विसाल क्या है।
की तकलीद इसकी उसकी सबकी
खुद पे नहीं एतमाद मलाल क्या है।
गुजरी जो तुझ पे रहा न कुछ बाकी
सफेद पुतलियों में जलाल क्या है।
जिगर गुजरे जिस गली से हम कौम
मुशीर के निशाने पे दलाल क्या है।
******†*
33. ख्याल.........बदलेंगे कब हम तुम ख्याल क्या है
बीते को छोड़ कर बता हाल क्या है।
बुजुर्गों का अपना वकार था सो था
खुद की खुद बता मजाल क्या है।
आदात बटेर बाज़ी रिन्दो मय के जा
बरअक्श हालात पर सवाल क्या है।
मुगालते में ज़िंदा होने के पड़े मियां
तू फौत नहीं तो नामे विसाल क्या है।
की तकलीद इसकी उसकी सबकी
खुद पे नहीं एतमाद मलाल क्या है।
गुजरी जो तुझ पे रहा न कुछ बाकी
सफेद पुतलियों में जलाल क्या है।
जिगर गुजरे जिस गली से हम कौम
मुशीर के निशाने पे दलाल क्या है।
34. दाम......दाम कौड़ी ना कोई दरहम है
वक्त ही सबसे बड़ा मरहम है।
वक्त भुलाता खुशी या ग़म है।
वक्त की लाठी में बड़ा दम है।
वक्त शुरुआत वक्त ही खत्म है
हां - हां वक्त बेवफ़ा सनम है।
पल दिन बरस सदी बीत गए
जिए जितना उतना कम है।
जिगर बदले वक्त हवा के रुख
यह वक्त है जो बड़ा बेरहम है।
35. खाली......
क्या अफसोस के हुआ जमाना खाली
यहां हुआ मेरा आना और जाना खाली।
नहीं खाली सिम्ते ज़मीं खुदा के नाम से
हवा, खुश्बू परिंद का चहचहाना खाली
गुरेज ना कर ए सफीर चल बदस्तूर
करना है एक दिन आशियाना खाली।
दरयाफ्त कर मजूनूं से फसाना इश्क़
क्या कहे देख उसका शर्माना खाली।
हुई बज्म तेल ओ बाती जले से रोशन
नादां समझे चाराग जलाना खाली।
दो पल का अहसास मुझ फकीर सुन
फानी हर शे तईं दिल लगाना खाली।
आया मैं और तू यां कोई तो बात है
जिगर बेवजह ना आना जाना खाली।
36. मकसद.......
बे मकसद नहीं यहां आना तेरा
हासिल क्या जब हो जाना तेरा।
खो कर ज़र पाया मर्तबा कुछ
हुआ जाने के लिए आना तेरा।
वादे हजार इक वफ़ा ना कर सके
याद है मुझे यूं भूल जाना तेरा।
बिखरे कागज़ के फूल यहां वहां
ये दौरे ग़म और खिलखिलाना तेरा।
तमन्ना थी मुश्किल में कुशाई उसकी
मुद्दत हुई सुने नया बहाना तेरा।
37. करता हूं.......
करीब हो कर दूर से बात करता हूं
मगरुर नहीं गुरूर से बात करता हूं।
आफताब जलाया चराग़ बुझा कर
नूर ए नज़र नूर से बात करता हूं।
होश वाले बातें करते बदहवास सी
मदहोश हूं शुरूर से बात करता हूं।
दी दुआ किसी ने बद्दुआ से नवाजा
मा सुर ताल हुजूर से बात करता हूं।
हसरत में ताकीदे मजहब ठीक नहीं
मैं बंदगी में ना हूर से बात करता हूं।
37. बात.....
सब चांद की हम तारों की बात करते हैं
उजड़े चमन में बहारों की बात करते हैं।
यूं तो हैं बहुत से लोग यहां रसूखदार
खुदा के बंदे खुद्दारों की बात करते हैं।
अकेले रहना अहम है जो रह सके कोई
वहम की भीड़ कतारों की बात करते हैं।
एक से दुनिया रोशन मुस्ताक एक के
एक के ना हो हजारों की बात करते हैं।
बड़ी दुश्वारी जिगर है मुगालते में जहाँ
दीया देखा नहीं सितारों की बात करते हैं
हूं.......
जुगनू को दिन में पकड़ने की जद में हूं
कोई कहे गुजर गया मैं हद में हूं।
अमन की चाहत हरदम यही मद में हूं।
बैठा कहीं गेसू ए यार की सरहद में हूं।
बंदगी के राज जाने मस्जिद की दिवार
मस्त हूं मैं फिराक ए हुस्मद में हूं।
मदफन को आए चंद लोग वक्ते कजा
खुश हूं मैं आगोशे लम या लद में हूं।
जिगर जंग ए जिंदगी में शिकस्तां नहीं
अच्छों में ना सही पर ना मैं बद में हूं।
39. हो......
खुदाया मेरी आह में इतना तो असर हो
अश्क गिरे के कब्ल सनम को खबर हो।
खुश्क जमीन का हर ज़र्रा तर ब तर हो
सुनूं देखूं चाहे जो सब उस के नजर हो।
उसका गुलाम बन के आजाद ए शिफ्त
माशूक हो वो अहले बशर से अबतर हो।
कजा की किसे फिक्र जब आयेगी आए
दम निकले मोहसिन के कंधे पर सर हो।
फुर्सत के पल मुश्किल से मिलते हैं यार
वीराना हो वहां संग मेरे जाने जिगर हो।
40. कीजिए.....
खामियां खुद की छिपाया कीजिए
पर यूं ना आग लगाया कीजिए।
ना कह सके सच तो झूठ से बच
साहब अफवाह ना फैलाया कीजिए।
बरसे अब्र किस की तमन्ना नहीं
खुदारा बाढ़ बन के न आया कीजिए।
जो देखा सच नहीं सुने का मुगालता
देखा सुना खुद तो बताया कीजिए।
अमानतें खो गईं वकार चला गया
कब्र पर बाप की जाया कीजिए।
खुद ना कर सको फैसला तो सुनो
चले आया कीजे हमें बुलाया कीजिए।
अफ़साल जिंदगी की मुर्झाई जिगर
दोजख से खुद को बचाया कीजिए।
41. थोड़ी है......
क़ौम का जज़्बा आसान थोड़ी है
छोड़ना घर अपना आसान थोड़ी है।
आवमी ज़बान की तरक्की के लिए,
हाँ मीलों चलना आसान थोड़ी है।
नश्लें गई गुलामी किया करती थी,
हमें बनाना गुलाम आसान थोड़ी है।
लड़ी लड़ाई आज़ादी की दीवानों ने,
सोए जमीर जगाना आसान थोड़ी है।
मैं चला, आयेगा जिसको आना है,
सुनसान रस्ते आसान थोड़ी है।
जुनूँ की हद से गुजरता सब ओ रोज मैं,
जिगर बनाना पहचान आसान थोड़ी है।
***********
42. तल्खी.......
तल्खी में भी खूब तराना हुआ
सदा ना एक सा जमाना हुआ।
पुकारता हूँ ना पास आया आने वाला
सीधे पा देख आया ले जाना हुआ।
बंजारा हूँ रंग खरीदना बेचना काम
किसका अपना कौन बेगाना हुआ।
शिकवा शिकायत फितरत नहीं
तेरा आना ही दर्द का जाना हुआ।
अपने सब गैर की महफ़िल में
चेहरा एक-एक पहचाना हुआ।
लाज़िम मजलूम का मुखालिफ होना
मलऊन का हद से जो सताना हुआ।
जावेद ना तारिकियाँ ना रोशनी सदा
खातिर नश्लों के मिट जाना हुआ।
दरगुज़र गुस्ताखियाँ रवादारी पर
जिगर मुश्किलों से याराना हुआ।
42. कहो..........
सुनो एक बात कोई कहानी कहो
फकीर को राजा दासी को रानी कहो।
कह दो के सूरज हथेली पर उठा लिया
खतावार की खता को नादानी कहो।
बात बात पर नाहक सताना छोड़िए
तुम सा नहीं कोई ला सानी कहो।
हालात पर आंसू बहाना बंद कीजिए
समझ सके बात वो बा मानी कहो।
जिगर परिंदे की फरियाद सुने खुदा
दुआ रब से करो पर बेजुबानी कहो।
43. तेरे.....
सब हैं तेरे खुद किसी का हो कर देख
जमीन पर लेट कांटों पर सो कर देख।
मुकद्दर में लिखा ना मिटे किसने कहा
मेहनत का दाना ज़मीं में बो कर देख।
मुसाफ़त से उलझनें सुलझ जाएं गर
वो सफीर बन मुसाफिर हो कर देख।
मिला कब बैठे निवाला शेर को मांद में
ओजान खुद का सानो पर ढो कर देख।
जिगर लहू से ना सींच नश्लों की फसल
वक्त पे जाग और वक्त पर सो कर देख।
44. आऊं.......
तुम रूठों और मैं मनाने आऊं
घर तुम्हारे इस बहाने आऊं।
उदास हो तो ग़म बटाने आऊं
खुशी में संग मुस्कुराने आऊं।
कांटों से हो लिबास तार - तार
ओढ़ लबादा नया दिखाने आऊं।
खता हो तुझ से या मेरी कोई
सुनने तुम्हारी अपनी सुनने आऊं।
मुस्ताक हूं कोई रास्ता मिले जिगर
तुम मिलो तो नजर मिलाने आऊं।
45. नारी......
ना नूरी ना नारी है हम सब भिखारी हैं
बड़ी बिसात मेरी ना औकात तुम्हारी है।
किसी के आगे झुके दुनिया सारी है
लगी नाम शोहरत दौलत की बीमारी है।
कलम ने लिखा लोहे पर खुदा का हुक्म
बढ़ कर हर शे से या रब जात तुम्हारी है।
हाय ले चले कंधे पर मेरी खाक उठा कर
समझ दुनिया ना तुम्हारी है ना हमारी है।
जिगर सिला रहमी की उम्मीद ना कर
दारेन है यह खालिस यहां दुनियादारी है।
47. चलो.......
दम निकले मंजिल तक चल सको तो चलो
सूरज की तरह उग सको ढल सको तो चलो।
अंधेर राह में चराग़ बन जल सको तो चलो
जवां सा उछल बच्चे सा मचल सको तो चलो।
समेट लो सब सितारे आगोश में अपनी तुम
आग निगल के राख बदन से मल सको तो चलो
जान की अमान दम निकलने तक हो तो सही
मिट्टी में मिल कर हड्डियों से गल सको तो चलो।
मिरास ए मोतबर आन ए जिगर हो गई अब
अच्छा किसी सीने पे मूंग दल सको तो चलो।
47. बात हो ........
तारे तोड़ने की नहीं, सजाने की बात हो
रोशनी हर घर तक ले जाने की बात हो।
निकले बेटी - बहु बैखोफ सड़क पर
हो दिन जाने या रात आने की बात हो।
रिश्ते अनमोल नहीं बेमोल होता है प्यारे
ताल्लुक तौल देख खजाने की बात हो।
जिद जीत की हर कीमत पर पुर असर
जिंदा जमीर लाख हराने की बात हो।
नहीं आसान अबतरी बरतरी सिपास
खोना लाज़िम गर पाने की बात हो।
मसलक के असल की हकीकत जान ले
जर्रा जितना ईमान बचाने की बात हो।
जिगर अमन की ख्वाहिश बागी को नहीं
हो संग नवां साना ब साने की बात हो।
**************
48. समझती हो तुम........
समझाता हूं मैं क्या नहीं समझती हो तुम
बखुद नायब मोती परी समझती हो तुम।
नहीं महफूज जमाने में गौहर ओ गिलमा
खोटे सिक्के को शे खरी समझती हो तुम।
फंसे हो जाल में अहमक अय्यार के यार
कोन मुजरिम, खुद को बरी समझती हो तुम।
विरान बियाबान ने गिलाफ गुलफाम के ओढ़े
कांटे हैं वो जिसे घास हरी समझती हो तुम
ढूंढता रहा आदमियत हुजूम हजारों का
सोई हुई कोम को मरी समझती हो तुम।
जानते हैं सब, सब चुपके से देख रहे यां
गगरी नहीं आधी जो भरी समझती हो तुम।
जिगर जन्नत रिजवान की मोहताज नहीं
शोला है वो जिसे अख्तरी समझती हो तुम।
**************
49. समझते हो.......
टीस दर्द की दास्तां जानते हो तुम
बात क्यों नहीं मेरी मानते हो तुम
सामने खड़े जमीर ने मुझ से पूछा
खुद को ही नहीं पहचानते हो तुम
खुद परस्ती का इल्जाम लोगों को
परस्तीस के नाम पे लानतें हो तुम
मुद्दत से ढूंढते खुदा को ना भीतर
खाक दर - दर की छानते हो तुम
जिगर समझ के सिफर है दुनिया
बड़ा हूं मैं अक्सर उफानते हो तुम
************
50. अर्क ए हिना........
अर्क ए जिगर निचोड़े आहिस्ता आहिस्ता
खुश्क हिना रंग छोड़े आहिस्ता आहिस्ता।
लबों से बदाम तोड़े आहिस्ता आहिस्ता
खुद से मेरा नाम जोड़े आहिस्ता आहिस्ता।
सुन कुर्बते यार का गालिब असर इस तरह
बेखुदी से इल्हाम जोड़े आहिस्ता आहिस्ता।
एक एक लफ्ज टपकता शहद की बूंद सा
मेरे लब से जाम जोड़े आहिस्ता आहिस्ता।
शिकम ए सदफ से वसूल ए मोती की आरजू
डूबने से नाता आम जोड़े आहिस्ता आहिस्ता।
***********
51. बांटिए.......
तलवार नहीं कलम बांटिए, हो सके तो गम बांटिए
हौंसले को पर दे दो, बांटो खुशी चाहे कम बांटिए।
तोड़ दे तफरीक की दीवार, तहकीक की चोट से
बांट लो टपकते आंसू , उजड़ते घर सिकम बांटिए।
डर से कौन अपना हुआ ना शेराब चाकू की नोक से
बाजारे नफरत में दुकाने हुब मुस्कुरा के रहम बांटिए।
मकफ्ल नाउम्मीदी ओ शर को कर के आइए इधर
वाइज किराते उम्मीद हर कदम दम ब दम बांटिए।
ख्वार नश्लें मसलक की जिद् के जद आ खड़ी हुई
काबा घर खुदा का जा ला कर जम - जम बांटिए।
मुझ से ना पूछ रोशनी थी वो अब ना दीद क्यों हुई
मुहाफिज ए नूर को अंधेरों के ना सितम बांटिए।
जिगर हमसर, हमसफर हमदर्द की बन मिशाल
बरिवायत खंजर को फूल, खार के दिरहम बांटिए।
************
52. खुदा ....
खुदा का वजूद है या नहीं
ये मुबाहिसे का मसला नहीं।
होते कत्ल उसकी मर्ज़ी नहीं
मसला है यह के है खुदा नहीं।
निजाम अजब यहां शैतानी
ये निजाम क्यों बदला नहीं।
करे दुआ कुबूल वो खुदा है
वर्ना मैं कहूं के खुदा नहीं।
बहस इंसानों में उसके लिए
यहां रुका वो जो चला नहीं।
नूर या नार है किए का सिला
वो कहां जो कुछ किया नहीं।
जिगर खुद में इंसो शैतां मौजूद
ख़लकत उसकी है कहां नहीं।
53. ज़रूरी है.....
उसे साहिबे अदब कहलाना जरूरी है
मन की बात ज़बान पे लाना जरूरी है।
कहते हैं हम यहां लड़ते खुदा के लिए
पर रहम ए कुन का आना जरूरी है।
हमल चीर अजन्मे को मारे नहीं खुदा
पड़ा अक्ल पर पर्दा हटाना ज़रूरी है।
नशा मजहब का सर चढ़ कर बोलता
यह ज़हर जात का उतरवाना जरूरी है।
नफरतों के नालों में बह गया अमन
भाई इंसां का इंसान बताना जरूरी है।
जन्नत के लिए ओरों का क़त्ल क्यूं
खून ऐसे किसी का बहाना जरूरी है।
जिगर हो रोशनी मय्यसर हर बाम को
जले शमां नहीं अंधेर जलाना जरूरी है।
54 पहचान
ख़िलअत से पहचान कर मिला करना
तुम्हें मैं ठीक लगूं तो इत्तिलाअ करना।
हो राज़ी देख कर अक्स जो है नहीं सही
मिले मन तो खिले मन से मिला करना।
वजूद मेरा पहचान का नहीं मोहताज
महजबीं हो तुम कायनात में ज़िला करना।
मैं ना रहूं तो कोई बात नहीं रहे कोई
ना मिलने का मुझसे न तू गिला करना।
गुज़र ए हयात के तबकात लिखे गए
तुम चमन में ग़ुल के जैसे खिला करना।
ना पूछ हाल मेरा अब बाद विशाल के
इन अहवाल से चश्म न गिला करना।
जिगर के दाग़ दर्द की अज़ीयत से कम
कश्मकश में बर्क का न सिलसिला करना।
55. तुम्हारा है
यह घर हमारा, ये संसार तुम्हारा है
मन से जुड़ा हर इक तार तुम्हारा है।
ज़मीं तुम्हारी, और वक़्त तुम्हारा है
फ़ौज तुम्हारी है, सरदार तुम्हारा है।
सूरज को चाँद कहो, नीम को आम
बेचो फिर, छापो अख़बार तुम्हारा है।
मुक्तदी, मुअज़्ज़िन, इमाम तुम ही हो
हक़-ए-तकबीर, सरकार तुम्हारा है।
फाँसी दो या सलीब की सज़ा दो
जज अदालत इख्तियार तुम्हारा है।
सब कुछ तुम हो, तो खुदा क्या चीज़
रूह पर भी अधिकार तुम्हारा है।
जो लाया है वही खिलाएगा ज़रूर
ये अंदाज़ हमें नागवार तुम्हारा है।
फिरऔन, क़िसरा, नमरूद गुज़र गए
होना वही हश्र, इस बार तुम्हारा है।
जिगर छोड़ दे वो गली जहाँ फूल नहीं
गुलफाम उनका, हर ख़ार तुम्हारा है।
56. सिखाया_गया
जनमत को दबाना सिखाया गया
अफसर को बहाना सिखाया गया।
बड़े साब की हां में हां मिलाना सीख
काम को अटकाना सिखाया गया।
किसान को तोड़ने के बने कायदे
मजदूर को दबाना सिखाया गया।
सड़कों पे तालिबों पर बरसते डंडे
पूंछ कहां पे हिलाना सिखाया गया।
जिगर प्रभारी मंत्री से मिले कलक्टर
लूट का हिस्सा बंटाना सिखाया गया।
57. लिख दे
दिल में काबा किसके अंदर लिख दे
जले खुद, बचाए गैर कलंदर लिख दे।
जाने का दर्द लिख माटी की पाटी पे
अंदर उठता मन का समंदर लिख दे।
जीत की रीत होती है बड़ी निराली
हार के ना जीता वो धुरंधर लिख दे।
उकेरा काग़ज़ पे नक्श खुदा किसने
लिख उस पे मसीत या मंदर लिख दे।
जिगर हारता मेनका के जाल में
उस इंद्र का नाम पुरंदर लिख दे।
58. पहन लेता हूं...
बगल में छुरी मन में राम पहन लेता हूं
मैं गुनाह कर के एहराम पहन लेता हूं।
फितरत में बस गई अय्यारियां मेरे
मजे से जामे हराम पहन लेता हूं।
बिखरी रोशनी में न रही कुव्वत कोई
अब अंधेरे ना तमाम पहन लेता हूं।
उजड़ा नहीं जड़ से कटा हुआ सजर
शबनम को सरेआम पहन लेता हूं।
जिगर रहम की दरखास्त न करना
कफन पर कोहराम पहन लेता हूं।
मुकम्मल
जिगर चूरूवी
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