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अरावली एक विश्लेषण

ढाई सौ करोड़ पुरानी अरावली के संबंध में एक विश्लेषण - 
अरावली मुद्दा क्या है ?
अरावली पर्वतमाला से जुड़ा मामला कई वर्षों से उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन रहा है, जिसका मूल प्रश्न यह रहा है कि 🔥 प्रश्न 01अरावली पहाड़ियाँ आखिर हैं क्या और उन्हें कैसे परिभाषित किया जाए?
⚖️ इस मुद्दे पर - अलग-अलग राज्यों में अलग परिभाषाएँ लागू थीं, जिससे खनन, निर्माण और पर्यावरण संरक्षण को लेकर भ्रम बना हुआ था।
हालिया सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री श्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में गठित केंद्र सरकार की समिति द्वारा प्रस्तावित वैज्ञानिक परिभाषा को स्वीकार किया गया, जिसके अनुसार—
जिस भू-भाग की ऊँचाई आसपास के सामान्य धरातल से कम से कम 100 मीटर अधिक है, वही अरावली हिल मानी जाएगी। यदि ऐसी दो या दो से अधिक पहाड़ियाँ 500 मीटर के दायरे में हों, तो उन्हें अरावली रेंज कहा जाएगा।
सरकार का तर्क है कि इससे पूरे देश में एक समान और स्पष्ट परिभाषा लागू होगी।
इसी बिंदु पर विवाद शुरू हुआ है, क्योंकि अरावली केवल ऊँचाई नहीं, बल्कि पूर्ण पारिस्थितिक तंत्र है।
🔥प्रश्न 02 - इस निर्णय से नुकसान : -
उपलब्ध सरकारी और तकनीकी अध्ययनों के अनुसार राजस्थान में मौजूद अरावली की पहाड़ियों में से लगभग 90% पहाड़ियाँ 100 मीटर की ऊँचाई की शर्त पूरी नहीं करतीं है जिसका सीधा अर्थ है कि हमारे राजस्थान की केवल 8 से 10% पहाड़ियाँ ही अरावली की कानूनी परिभाषा में आएँगी शेष इस से अलग हो जाएंगी जिसका दोहन किया जा सकेगा। सरकार इन 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों के खनन पट्टे जारी कर सकेगी।
यह तथ्य इसलिए बेहद गंभीर है क्योंकि
अरावली का सबसे बड़ा हिस्सा राजस्थान में ही स्थित है, 
ये छोटी और मध्यम ऊँचाई वाली पहाड़ियाँ हैं जो - 
🔔वर्षा जल को रोक कर भूजल पुनर्भरण करती हैं।
🔔धूल भरी आँधियों को रोकती हैं।
🔔थार रेगिस्तान के फैलने से रोकती हैं।
☀️विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि ये पहाड़ियाँ संरक्षण से बाहर हुईं, तो - 
अलवर, जयपुर, दौसा, सीकर, झुंझुनूं, उदयपुर, राजसमंद जैसे जिलों में - 
😭 भूजल स्तर और गिरेगा
😭 सूखे की तीव्रता बढ़ेगी
😭 खनन और अनियंत्रित निर्माण को बढ़ावा मिलेगा
राजस्थान पहले ही जल-संकटग्रस्त राज्य है। ऐसे में अरावली का कमजोर होना केवल पर्यावरणीय नहीं, आर्थिक सामाजिक और स्वास्थ्य संकट को जन्म देगा।
🔥प्रश्न 03. जनता क्यों जागे?
अब यह समझना ज़रूरी है कि यह लड़ाई केवल अदालत या सरकार की नहीं है, यह लड़ाई समाज की है।
आज यदि अरावली कागज़ों से मिटाई जा रही है, तो कल - 
🔹किसान के खेत सूखेंगे।
🔹शहरों में पानी महँगा होगा।
🔹बच्चों को प्रदूषित हवा विरासत में मिलेगी।
सबसे खतरनाक बात यह है कि अरावली का नुकसान वापस सुधरने वाला नहीं है।
एक बार पहाड़ कटे, जलधाराएँ टूटीं और जंगल नष्ट हुए—तो उन्हें वापस लाने में सदियाँ लगती हैं।
इसलिए अब चुप रहना तटस्थता नहीं, भविष्य के खिलाफ खड़ा होना है।
🔥जनता को सवाल पूछने होंगे - 
✍️क्या विकास का अर्थ प्रकृति को खत्म करना है?
✍️क्या हमारे बच्चों का हक आज के मुनाफे से कम है?

अरावली बचाओ, क्योंकि यह सिर्फ पहाड़ नहीं—जीवनरेखा है।
अरावली बचेगी, राजस्थान बचेगा।
आज की आवाज़ से, कल सुरक्षित होगा।

अरावली के संबंध में श्री अशोक गहलोत का बयान
वर्ष 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने जिस 100 मीटर फार्मूले को खारिज किया, उसे 2024 में भाजपा सरकार ने रिपोर्ट देकर सही क्यों ठहराया?
- भाजपा सरकार प्रदेश के भविष्य से खिलवाड़ कर अरावली को माफियाओं को सौंपना चाहती है। कांग्रेस ने अवैध खनन माफिया पर हमेशा कड़ी कार्रवाई की।
       Congress V.S. BJP 
- अवैध खनन पर
- कांग्रेस राज में वर्ष 2019 में 930 FIR
- भाजपा में 2024 में 508 FIR हुई।
- जुर्माने की वसूली
- कांग्रेस 5 साल में 464 करोड़ (2008 से 2013)
- भाजपा केवल 200 करोड़- (2013 से 18) 
श्री गहलोत ने अरावली मुद्दे पर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री श्री भूपेंद्र यादव व श्री राजेन्द्र राठौड़ द्वारा भाजपा की ओर से जारी मिथ्यापूर्ण बयानों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि भाजपा सरकारों की खनन माफियाओं से हमेशा मिलीभगत रही है। भाजपा के लोग अपनी गलत नीतियों पर पर्दा डालने हेतु पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों पर अनर्गल आरोप लगा रहे हैं। 
इस संबंध में सम्पूर्ण सत्य एवं साक्ष्य सरकारी दस्तावेजों में अंकित हैं।

2010 V/S 2024: 100 मीटर परिभाषा का सच क्या है?
श्री गहलोत ने कहा कि यह सत्य है कि 2003 में तत्कालीन राज्य सरकार को विशेषज्ञ समिति ने आजीविका और रोजगार के दृष्टिकोण से 100 मीटर की परिभाषा की सिफारिश की थी, जिसे राज्य सरकार ने एफिडेविट के माध्यम से 16 फरवरी 2010 को माननीय सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा। परन्तु माननीय कोर्ट ने इसे केवल तीन दिन बाद 19 फरवरी 2010 को ही खारिज कर दिया। तत्कालीन सरकार ने माननीय कोर्ट के सम्मान में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) से मैपिंग करवाई। अरावली क्षेत्र में अवैध खनन रोकने हेतु रिमोट सेंसिंग (Satellite Imagery) का उपयोग करने के निर्देश दिए गए। 15 जिलों में सर्वे हेतु 7 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया। 
राज्य सरकार ने अवैध खनन रोकने की सीधी जिम्मेदारी संबंधित जिले के पुलिस अधीक्षक एवं जिला कलेक्टर को सौंपी गई। खान विभाग के साथ - साथ इन जिलों के पुलिस थानों को भी कार्रवाई के अधिकार दिए गए जिससे अवैध खनन काफी हद तक रुका।
प्रश्न उठता है कि 14 वर्ष पूर्व सन् 2010 में जो परिभाषा सुप्रीम ने खारिज की थी उस परिभाषा को 2024 में राजस्थान की भाजपा सरकार ने समर्थन करते हुए केन्द्र सरकार की समिति से सिफारिश की अनुशंसा क्यों की? 
क्या इसके पीछे किसी का दबाव था या इसके पीछे बड़ा खेल खेला जा रहा है?

आंकड़े गवाह हैं :- 
कांग्रेस की सख्ती बनाम भाजपा की नरमी
पूर्व मुख्यमंत्री ने बताया कि हमारी सरकार की नीति अवैध खनन के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की रही है जिसके परिणामस्वरूप -
1. अवैध खनन से जुर्माना वसूली - 
कांग्रेस सरकार (2019-2024) 464 करोड़ रुपये भाजपा सरकार (2013-2018) द्वारा वसूले गए 200 करोड़
2. सख्त कार्रवाई - 
कांग्रेस सरकार ने गत 5 वर्षों (2018 से 2023 तक) (पहले तीन वर्षों में ही 2019 - 20 में 930, 2020 - 21 में 760, और 2021-22 में 1,305 FIR दर्ज) कुल 4206 FIR दर्ज की। 
3. वर्तमान सरकार के पहले साल के आंकड़े बताते हैं कि कार्रवाई की गति धीमी पड़ गई है, (2024-25) पहले साल में केवल 508 FIR दर्ज कर पाई है। FIR की संख्याओं में यह गिरावट दिखाती है कि भाजपा सरकार खनन माफिया के प्रति नरम है जिससे खनन माफिया के हौसले फिर से बुलंद हो रहे हैं।
राजस्थान को रेगिस्तान बनने से बचाएं
श्री गहलोत ने आम जन से आह्वान किया है कि अरावली केवल पहाड़ नहीं, बल्कि राजस्थान की जीवनरेखा है जो थार मरुस्थल को बढ़ने से रोकती है। 
केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव जी स्वयं इसी प्रदेश के अजमेर जिले में जन्मे और अलवर से सांसद हैं, उनसे अपेक्षा थी कि वो अरावली के संरक्षक बनेंगे, न कि विनाशक। जिस प्रकार खेजड़ली में हमारे पूर्वजों ने श्रीमती अमृता देवी के नेतृत्व में पेड़ों एवं प्रकृति के लिए बलिदान दिया था एवं उसी भावना के साथ हमें अरावली को बचाना होगा।
मेरी कविता - 
#मैं_अरावली

सौ मीटर से
कम ऊंची पहाड़ी
न मेरा अंश

मैं अरावली
अपराधी हो गई
कोर्ट ने कहा

ये सौ मीटर
नीचे जमीन में है
वो तो मैं हूं ना

यह मैं नहीं
मेरी जड़ें आधार
अस्तित्व मेरा।

सदियां बीती
गुजरात से दिल्ली
को जोड़ती हूं।

थार रोकती
नदी बहाती हूं मैं
जिसकी सजा।

अन्यथा तुम
में से जो चुप है वो
मेरा कातिल

परिभाषाएं 
गलत गढ़ते हो
प्रकृति की।

भूगोल में भी
कानून आड़े आया
यह बताया।

कुछ सालों में
यह लुट जाएगा
उथला शेष।

बिना पानी के
देहली तक रेत
सूखी नदियां।

पारिस्थितिकी
वन्य जीव ये पेड़
भरे भंडार।

न हरियाली
सूखा बवंडर उड़े 
दम तोड़ते।

नहीं कागज
साक्ष्य अरावल
कुदरत का।

विकासवान
विकसित भारत
अंधकार में।

ये चीज़ नहीं
अरावली पर्वत
जीवन स्त्रोत।
#जिगर_चूरूवी 

जै अरावल जै रजपुताना - 

सुण सिरकार मत कर बावल
कोरो भाठो नहीं अरावल
मान राखजे इण रो सावल
बांधण री ना कर उतावल
लड़ मेवाड़ी आण खोल द्यो
जै एकलिंगजी री बोल द्यो।


अरबां बरस रो ओ खूंटों
सरजीवण है बूंटो बूंटो
थे मतना आ माटी चूंटो
दावो सो मीटर रो झुंटों
जन्मभौम रो पाछो मोल द्यो
जै एकलिंगजी री बोल द्यो।


रणथंभौर रो है मान ब ठ है
हल्दीघाटी को मैदान अठ है
बा चेतकड़ री शान क ठ है
मीरा गाती गुणगान ज ठ है
सो न पर मूं ग रो झोल द्यो
जै एकलिंगजी री बोल द्यो।

रायसीना थे इब के चावो 
सुकड़ी,साहिबी,लूणी बचाओ
आओ सगला मिल कर आओ
इण धरती रो करज चुकाओ
खोल हाथियां की न्योल द्यो
जै एकलिंगजी री बोल द्यो।

रूंखां न बचावणियां थे तो
बातां पर मरज्यावणिया थे तो
सुण पुकार आवणिया थे तो
माथे माटी लगावणिया थे तो
जिगर लुटेरां न मत पोल द्यो
जै एकलिंगजी री बोल द्यो।
#जिगर_चूरूवी

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